15. Describe the gases causing green house effect (हरित गृह प्रवाह को बढ़ाने वाली गैसों का वर्णन)

15. Describe the gases causing green house effect

(हरित गृह प्रवाह को बढ़ाने वाली गैसों का वर्णन)



      कार्बन डाइ ऑक्साइड के अलावा जल वाष्प, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन और ओजोन अन्य गैसें हैं जो धरती का तापमान बढ़ा रही हैं। इनमें वायुमण्डल में अत्यधिक जीवाश्म ईंधन के दहन से निरंतर कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। पिछले वर्षों में हुए औद्योगीकरण के कारण वायुमण्डल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ गयी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार एक ही वर्ष में 1.8 टन तक कार्बन डाइ ऑक्साइड वायुमण्डल में बढ़ जाती है। अतः आज के औद्योगिक युग में अनुमानतः कार्बन डाइ ऑक्साइड विगत युगों से दुगुनी मात्रा में निकल रही है। प्रत्येक वर्ष 4 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड विलुप्त हो जाती है।

      एक प्रतिवेदन के अनुसार इस समय प्रतिवर्ष 5.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड पेट्रोल और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाने से वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष दो अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड उष्णकटिबन्धीय वनों के विनाश के कारण वायुमण्डल में पहुँच रही है। इस प्रकार उद्योग और आधुनिक परिवहन के साधनों में ईंधन के दहन के द्वारा 5.7 अरब टन अर्थात् 600 करोड़ टन (6 अरब टन) कार्बन डाइ ऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में छोड़ी जाती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मृदा जुताई द्वारा उत्पन्न कार्बन डाइ-ऑक्साइड, 200 करोड़ टन वायुमण्डल में प्रतिवर्ष निकलती है।

       इस प्रकार कुल 7.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड में सिर्फ 3.8 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड ही वायुमण्डल में बची रहती है। शेष करीब 4 टन कार्बन डाइ ऑक्साइड हर वर्ष गायब हो जाती है। इसे लापता कार्बन डाइक्साइड कहते हैं। प्रतिवेदन के अनुसार ऐसा न होने पर वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा एकाएक कई गुना बढ़ जायेगी और ग्रीन हाउस प्रभाव में वृद्धि होने से धरती का तापमान अचानक बढ़ जायेगा। इस आशंका के मद्देनजर वैज्ञानिक लापता कार्बन डाइ ऑक्साइड का पता लगाने के काम में पूरे जोर-शोर से जुटे हैं।

      वैज्ञानिकों के एक वर्ग का अनुमान है कि आधी कार्बन डाइ ऑक्साइड समुद्रों द्वारा अवशोषित हो जाती है तथा आधी वनस्पतियों द्वारा अवशोषित होने पर भी लगभग 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिवर्ष वायुमण्डल में जमा हो रही है। कार्बन डाइ-ऑक्साइड की यह मात्रा ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न कर समस्त पृथ्वी को निरंतर गर्म कर रही है। भविष्य में प्रत्येक दशक में तापमान में औसतन 0.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी और परिणामस्वरूप अगले 300 वर्षों में यदि इसी तरह प्रकृति बनी रही तो तापमान 10 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाने का अनुमान है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2025 में पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा और सन् 2050 में 2.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा।

     सन् 2100 में 5.5 डिग्री तथा सन् 2300 में पृथ्वी का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जायेगा। आज वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड 0.03 प्रतिशत से बढ़कर 0.05 प्रतिशत तक पायी जा रही है। आधुनिक परिवहन के साधन, उद्योग, घटते वन और बढ़ते नगरों से पिछले सौ वर्षों में 36,000 करोड़ टन कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न की है और इससे अधिक आज उत्पन्न की जा रही है। चीन कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान रखता है। विश्व में सन् 1960 से 1990 के बीच ज्वलनशील ईंधन ने वायुमण्डल में लगभग 14 प्रतिशत कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि कर दी है। इससे तापमान में सन् 1960 से 0.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वृद्धि हुई है। जबकि पूर्व वर्षों में कई सदियों से यह मात्रा लगभग एक-सी रही है और सन्तुलन कायम रहा है। यद्यपि वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की 0.03 प्रतिशत मात्रा पृथ्वी में ऊर्जा सन्तुलन जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों के लिये आवश्यक हैं वनस्पतियों की वृद्धि और विकास के लिए यह वांछनीय है। लेकिन इसकी निरंतर वृद्धि से भविष्य में घातक परिणाम सामने आ सकते हैं जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं। हर वर्ष 110 अरब टन कार्बन डाइ-ऑक्साइड धरती से होने वाली तमाम जैविक प्रक्रियाओं द्वारा वायुमण्डल में पहुँचती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, उद्योगों, मोटर वाहनों, घरेलू उपयोग आदि की ऊर्जा की आवश्यकता के लिये जलाये गये कोयले या पेट्रोल (जीवाश्म ईंधनों) से हर वर्ष 5.7 अरब टन कार्बन डाइ ऑक्साइड वायुमण्डल में पहुँच रही है। इसके अलावा हर वर्ष दो अरब टन से भी ज्यादा कार्बन डाइ ऑक्साइड धरती के कहे जाने वाले उष्ण कटिबन्धीय जंगलों के विनाश से (खेती के लिए/ आग जलाकर साफ किये जाने के कारण) वायुमण्डल में पहुँच रही है।

       कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न करने वाली अनेक प्रक्रियाएँ हैं। इनमें मुख्य हैं ईंधन का दहन, कार्बनिक पदार्थों का विघटन, पेड़-पौधों और जन्तुओं के शरीर में भोजन के कारण और अन्य अप्राकृतिक विधियों से भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन होता है। विभिन्न उद्योग जो कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन पर आश्रित हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा के लिए जिम्मेदार हैं। वनों के जलने और नष्ट होने से यह बढ़ी और औद्योगीकरण के पूर्व में वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा 290 पी. पी. एम. (पार्टस पर मिलियन) या 0.029 प्रतिशत थी। विगत वर्षों में 0.003 प्रतिशत से बढ़कर आज यह 0.38 प्रतिशत हो गयी है। इस प्रकार इसमें लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है।

      कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि यदि इसी दर से पृथ्वी पर होती रही तो आने वाले सौ वर्षों में इसका असर या स्तर औद्योगीकरण के पहले के स्तर से दुगुना हो जायेगा। इस तथ्य का ठीक-ठीक अनुमान लगाये जाने पर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी भविष्यवाणी की जा सकती है कि सन् 2030 में सार्वत्रिक माध्यताप (Global Mean Temperature) सन् 1980 की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सन् 2030 में पृथ्वी इतनी गर्म होगी, जितनी कि पिछले 1,20,000 वर्षों में कभी नहीं रही होगी।

     ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली गैसों में आधी से अधिक कार्बन डाइ-ऑक्साइड ही प्रभावी है। शेष के अधिकांश भाग में क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें हैं। औद्योगीकरण की गति दुगुने से अधिक है। अतः इन गैसों का मिश्रण भविष्य में बढ़ेगा।

     वायुमण्डल में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का होना तथा इससे होने वाली सर्वात्रिक तापन (global warming) वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिये गहन चिन्ता का विषय है। सन् 1989 में प्रकाशित यू. एस. ए. नेशनल रिसोर्सेज, डिफेन्स काउनसलिंग के प्रतिवेदन के अनुसार सार्वत्रिक तापन ध्रुवों पर सबसे अधिक होगा। सात-आठ डिग्री फारेनहाइट की ध्रुव पर 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान की वृद्धि कर सकती है। इतने अधिक गरमाहट से कार्बन डाइ ऑक्साइड की बहुत बड़ी मात्रा जो कि अभी मिट्टी और वनस्पति के साथ जमी है, बाहर आयेगी। इससे सार्वत्रिक तापन को और बढ़ावा मिल सकता है। सार्वत्रिक तापन के साथ-साथ बदलती हुई प्रवृत्ति (Inter-Governmental Panel on Climatic Change) के अनुसार सन् 1940 तक गरमाहट प्रदर्शित करती है और इसके पश्चात् सन् 1970 तक शीतलन की प्रकृति परिलक्षित होती है। अब सन् 1970 के बाद फिर से गरमाहट होने का संकेत मिला है अर्थात् वर्तमान में तापमान में वृद्धि हो रही है जो पहले की तुलना में कहीं ज्यादा है। सन् 1980 से 1990 का दशक इस शताब्दी का सर्वाधिक गरम दशक रहा है।

हरित गृह प्रभाव को बढ़ाने वाली अन्य गैसें:-

       स्पष्ट है कि ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करने वाली प्रमुख गैसों की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक होती जा रही है और इसी कारण पृथ्वी का औसत तापमान भी बढ़ता जा रहा है। 1980 के दशक में पृथ्वी पर सबसे अधिक गर्मी पड़ी थी वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो अगले 25 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो यह वृद्धि में पृथ्वी का औसतन तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में तो यह वृद्धि 5 डिग्री से 7 डिग्री तक भी हो सकती है। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है कि अगले 50 वर्षों में पृथ्वी इतनी गर्म हो जायेगी जितने पिछले एक लाख वर्षों में कभी नहीं रही होगी।

        हरित ग्रह प्रभाव को प्रभावी बनाने वाली निम्नलिखित क्रियाएँ एवं गैसें हैं-

1. जल वाष्प:-

       जल वाष्प एक प्राकृतिक ग्रीन हाउस गैस है। तापमान बढ़ाने में इसकी एक अलग भूमिका है। होता यह है कि ग्रीन हाउस गैसों के कारण तापमान में वृद्धि होने से जल के वाष्पन की दर भी बढ़ जाती है। इससे वायुमण्डल में ज्यादा वाष्प जमा होती है और परिणामस्वरूप तापमान और बढ़ जाता है। इसकी मात्रा स्थान-स्थान के मौसम पर निर्भर करती है।

2. नाइट्स ऑक्साइड:-

       नाइट्रस ऑक्साइड सूक्ष्म विषाणुओं की मिट्टी में क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम है। नाइट्रस ऑक्साइड में उर्वरकों के प्रयोग से और कृषि कार्यों में उत्पन्न चीजों के सड़ने-गलने से नाइट्रोजन निकलती है। यह प्राकृतिक तौर पर जीवाणु की मिट्टी और पानी में क्रिया द्वारा उत्पन्न होती है। नाइट्रस ऑक्साइड भी प्रतिवर्ष 0.25 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन् 2030 में औद्योगिक युग के पूर्व की तुलना में यह 34 प्रतिशत अधिक उत्पन्न होगी। इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइ ऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रकट करता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत उष्ण कटिबन्धीय मिट्टी है जहाँ पर जीवाणु नाइट्रोजन के प्राकृतिक यौगिकों से क्रिया करके नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करते हैं। यह नाइट्रस ऑक्साइड के पूरे वायुमण्डलीय उत्सर्जन का 20-30 प्रतिशत इसी क्षेत्र में उत्पन्न होता है।

     कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के इस्तेमाल, भूमि की सफाई के लिये जलाये गये पेड़-पौधे, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने से और नाइलोन उद्योगों द्वारा छोड़ी जाने वाली गैसों के कारण वायुमण्डल में इसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। अब अध्ययनों से यह पता चलता है कि इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा लगभग 0.31 प्रतिशत प्रति दस लाख भाग है।

3. मीथेन गैस:-

       मीथेन एक प्राकृतिक गैस है जो जीवाणुओं और उनकी क्रियाओं के परिणामस्वरूप बड़ी मात्रा में पैदा होती है। अर्थात् वह अपघटों की देन है। वायुमण्डल में अधिकांश मीथेन के स्रोत जैविक हैं। मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि, दलदल से निकलती है इसलिए यह मार्श गैस भी कहलाती है।

       इसी प्रकार लगभग 36 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर चावल की खेती की जाती है। इस पैदावार के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। यह गैस भी प्रमुख ग्रीन हाउस पैदा करने वाली गैसों में एक है। 

      अकेले भारत में मवेशियों की संख्या लगभग 46 करोड़ के आसपास है। जुगाली करने वाले ये जानवर जब भी हवा छोड़ते हैं, मीथेन गैस की कुछ मात्रा वायुमण्डल में मिल जाती हैं। यह सागरों, ताजे पानी, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग, जैविक पदार्थों के सड़ने आदि से उत्पन्न होती है। इस स्रोत के अलावा गाय, भैंस, भेड़-बकरी, घोड़ा, ऊँट, सुअर आदि पशु और लकड़ी खाने वाले कीड़े जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने के लिए जिम्मेदार पाया गया है।

      हिमानियों के अंदर पाये गये बुलबुलों के नमूनों और हाल के परीक्षणों से पता चला है कि उन्नसवीं सदी के शुरूआत के साथ वायुमण्डल में मीथेन की मात्रा बढ़ रही है। यह पिछले कुछ दशकों में 0.9 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। पूरे विश्व में वर्तमान में लगभग 52.5 करोड़ टन मीथेन धान के खेतों से उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में कार्बन मोना ऑक्साइड और कुछ अन्य प्रदूषक गैसें मीथेन को वायुमण्डल में ज्यादा देर तक रोकने में सहायक हैं। 1990 में इस गैस की वायुमंडल में मात्रा 1.72 भाग प्रति लाख (पी.पी.एम.) पायी गयी है तथा लगभग 11 प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ रही है। जनसंख्या वृद्धि के साथ समानान्तर वृद्धि से मिथेन की वृद्धि का स्तर बढ़ रहा है। तापमान बढ़ने में इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक प्रभावी है।

4. क्लोरोफ्लोरो कार्बन:-

       क्लोरोफ्लोरो कार्बन सिन्थेटिक यौगिकों का समूह है। सी. एफ. सी. एस. (CFCs) वायुमण्डल के ऊपरी सतह पर समताप मण्डल में क्लोरीन को मुक्त करती है, जो ओजोन को तोड़ती है। ओजोन परत सूर्य की अल्ट्रा वायलेट किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। सी. एफ. सी. एस. तथा सी. एफ. सी. 12 का प्रत्येक अणु कार्बन डाइ-ऑक्साइड की तुलना में 20 हजार गुना ताप रोकती है। इन दोनों की मात्रा 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। यह मनुष्य का अनुसंधान है और प्राकृतिक तौर पर नहीं पायी जाती है। ये यौगिक एयरकण्डीशनरों तथा रेफ्रीजरेटरों में प्रशीतन (Cooling) और छिड़काव यंत्रों में प्रणोदक (Propelent) के रूप में झाग (Foam) को फैलाने और इलेक्ट्रॉनों की घटकों की सफाई और आग बुझाने के आधुनिक यंत्रों में इस्तेमाल होते हैं। पिछले छः दशकों में इसकी खपत में अत्यधिक वृद्धि हुई है और आज 4 प्रतिशत की दर से वायुमण्डल में इसकी मात्रा बढ़ रही है।

5. ओजोन:-

      समताप मण्डल की ओजोन पराबैंगनी विकिरण को सोखकर धरती के जीव-जन्तुओं की रक्षा करती है लेकिन निचले वायुमण्डल में इसका जमाव गर्मी बढ़ाने का काम करती है। यह गैस प्राकृतिक तौर पर निचले वायुमण्डल में बहुत कम मात्रा में मौजूद होती है। यह नाइट्रोजन के ऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रोकार्बन और अन्य कार्बनिक यौगिकों के आपसी क्रिया से बनी है। इसकी मात्रा का सही-सही पता नहीं लगाया जा सका है। इसके अलावा समताप मण्डल की ओजोन का क्षय कुल मिलाकर गर्मी बढ़ाता या घटाता है। इस विषय पर भी और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

6. सर्वत्र औसत तापमान में वृद्धि के प्रभाव:-

      जीवाश्म अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि विगत 14,500 वर्षों में समुद्र स्तर में 100 मीटर से भी अधिक की वृद्धि हुई है। साथ ही पृथ्वी के सर्वत्र औसत तापमान में वृद्धि के अनेक प्रभाव भविष्य में परिलक्षित होंगे। तापमान के बढ़ने से समुद्र में ऊष्णीय प्रसार होगा जिससे इसका तल ऊपर उठ सकता है। अगर पृथ्वी के ध्रुवों पर जमी हुई बर्फ पिघलती है तो इसकी सतह कहीं ज्यादा उठ जाने की सम्भावना है। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले 100 वर्षों में समुद्र की सतह 0.10 से 0.15 सेमी. ऊपर उठ चुकी है और प्रत्येक दशक में जब तापमान 0.3 डिग्री बढ़ेगा तो समुद्र की सतह 6 सेमी, उठेगी, अथवा सागरों के तल में औसत 6 सेमी. की बढ़ोत्तरी भविष्य में हो सकती है। सन् 2030 तक इसमें 17 से 26 सेमी. का उठाव और आ सकता है जिससे समुद्र के किनारे बसे देशों में बाढ़ आ जायेगी। परिमापक के आधार पर बताया गया है कि मात्र 1 मीटर की समुद्र तल में उठाव से मिस्र देश की 12 से 15 प्रतिशत कृषि भूमि तथा बंगलादेश की 25 प्रतिशत से अधिक उपजाऊ भूमि जलमग्न हो जायेगी। सन् 1930 से 1990 के मध्य के 50 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। ताप वृद्धि के परिणामस्वरूप दक्षिण मध्य यूरेशिया एवं उत्तरी अमेरीका की वायु शुष्कता में वृद्धि हुई और कहीं-कहीं धूल भरी आँधियाँ भी चली हैं।

      वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणियाँ भी की हैं कि पृथ्वी का तापमान वर्तमान ताप से 30 डिग्री और बढ़ जाये तो अटलाण्टिका और आर्कटिक ध्रुवों के विशाल हिमावरण पिघल जायेंगे और समुद्र की सतह 100 मीटर ऊँची हो जायेगी। समस्त तटीय प्रदेश उस जल प्लावन में डूब जायेंगे। उस समय में सिडनी, मियामी, मोंटी कार्लों, कोलकाता और मुम्बई महानगर जलमग्न हो जायेंगे। अलनीनो जो ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरीका के तट पर बहती थी, आज गर्म हो गयी है और निकटवर्ती वनस्पति और जीव जगत रूपान्तरण के दौर से गुजर रहा है।


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14. Gobal Consequences of Climatic Change (जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणाम)

14. Gobal Consequences of Climatic Change

(जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणाम)



           जलवायु परिवर्तन के विश्वव्यापी परिणामों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत वर्णन किया जा सकता है- 

1. विश्व में फसल प्रारूप और उत्पादन में परिवर्तन होना:-

         मौसम वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक शोध में पाया कि पर्यावरण में हो रहे तापमान में परिवर्तन का प्रभाव फसलों की पैदावार पर भी पड़ सकता है। यह प्रभाव विभिन्न स्थानों के लिये अलग-अलग होंगे। इस अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि “ग्लोबल वार्मिंग” के कारण विश्व के गरीब और विकासशील देशों की फसलों की पैदावार के ऊपर इसके नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेंगे, वहीं कुछ विकसित देशों की फसलों के पैदावार में इससे वृद्धि की सम्भावना है।

      मौसम वैज्ञानिक महेन्द्र शाह की रिपोर्ट के अनुसार वायुमण्डल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण आने वाले 70 वर्षों में विश्व की कुल फसलों की पैदावार में वृद्धि होगी। साथ ही भूमध्य रेखा के पास के देशों की फसलों की पैदावार पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। भूमध्य रेखा के पास ज्यादातर गरीब या विकासशील देश हैं, जिसके कारण करीब-करीब करोड़ों लोगों की इससे प्रभावित होने की आशंका है।

      ब्राजील, भारत और दूसरे अफ्रीकी देशों की फसलों की पैदावार कम होने की आशंका है जबकि रूस, चीन, कनाडा तथा अर्जेन्टाइना की फसलों की पैदावार में वृद्धि होने की सम्भावना व्यक्त की गयी है। इन मौसम वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के लिये पृथ्वी को लगभग 2.2 मिलियन छोटे हिस्सों में बाँट लिया। फिर उनमें से प्रत्येक हिस्से से सम्बन्धित आंकडों, जिनमें मौसम, मिट्टी के प्रकार, भू-प्रदेश, फसलों के प्रकार आदि का अध्ययन किया, फिर इसकी तुलना उन्होंने मौसम परिवर्तन के प्रचलित तीन मॉडलों से की। इसके बाद उन्होंने यह निष्कर्ष दिया कि भूमध्य रेखा के पास का क्षेत्र भविष्य में और गर्म होता जायेगा, जिससे कि वर्तमान में जो फसल उगाई जा रही है, उनकी पैदावार मुश्किल हो जायेगी।

        वहीं उत्तरी अमेरिका, रूस तथा चीन के तापमान में भी बढ़ोत्तरी होगी, पर फिर भी वे ठंडे प्रदेश बने रहेंगे, जिससे कृषि का इन उत्तरी हिस्सों में विकास सम्भव हो पायेगा। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन उन देशों को अपनी फसलों के विकल्प खोजने में सहायक सिद्ध होगा, जिन देशों की फसलों को पैदावार के लिये फसलों का चयन कर पायेंगे। सन् 2003 को सदी का सबसे गर्म वर्ष माना गया है।

2. मरुभूमि में वृद्धि होगी:-

        एक अध्ययन के बाद यह पता चला है कि 19वीं शताब्दी की तुलना में 20वीं सदी में पृथ्वी का औसत तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। सन् 1860 जब से वैश्विक तापमान का रिकार्ड रखा जा रहा है, के बाद से पाया गया कि बीती सदी में 90 का दशक सर्वाधिक गर्म वर्ष रहा है जिसमें 1998 में गर्मी के सभी रिकार्ड टूट गये। पिछले 200 वर्षों में वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ गयी। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के इस बढ़ते स्तर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि सन् 2100 सदी के उत्तरार्द्ध तक पृथ्वी का औसत तापमान आज की अपेक्षा 1.00 से 3.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा।

    वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग के नए खतरों में धरती पर बढ़ते रेगिस्तान को भी जोड़ रहे हैं। मस्थलीकरण का विस्तार इतनी तीव्र गति से बढ़ रहा है कि दुनिया के 110 देशों में रेगिस्तान पांव फैला चुका है। इनमें अल्पविकसित, विकासशील और विकसित सभी तरह के देश शामिल हैं। हर वर्ष मानवीय गतिविधियों के कारण लगभग पांच लाख हेक्टेयर भूमि रेगिस्तान में बदल जाती है। इसके कारण वायुमण्डल के तापमान में अस्थिरता आ जाती है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बहुत बढ़ जाता है।

      अगर हमारे वातावरण का तापमान इसी तरह चढ़ता रहा तो आने वाली सदी में एक ओर विश्व के अधिकांश हिस्से ग्लेसियरों की बर्फ पिघलने के कारण जलमग्न हो जायेंगे तो साथ ही दूसरी ओर शेष बची दुनिया मरुस्थल से आच्छादित हो जायेगी और दोनों ही परिस्थितियाँ मनुष्य के जीवन के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं हैं।

3. जैव विविधता में परिवर्तन:-

     जलवायु परिवर्तन का जैव विविधता प्रभाव दो रूपों में दिखलाई देता है-

(1) धनात्मक प्रभाव,

(2) ऋणात्मक प्रभाव।

(1) धनात्मक प्रभाव-

       तापमान वर्षा परिवर्तन से कुछ जातियों को लाभ हुआ है। जैसे वे जातियाँ जो अनुकूलन करने में सक्षम हैं या विश्व के अन्य स्थानों में फैलकर आवास बना लिये हैं अथवा जिन जातियों में मनुष्य लाभ के प्रति प्रभावी हुआ है अथवा मनुष्य का संग-साथ प्रभावी हो गया है। जैसे- चूहा (Mice), कबूतर, घरेलू चिड़ियाँ आदि। इसी प्रकार CO2 की वृद्धि पर वनस्पति जगत में वृद्धि हुई है।

(2) ऋणात्मक प्रभाव-

      जलवायु परिवर्तन से विश्व में ऊष्मीकरण हुआ है। ताप वृद्धि को बहुत से जीव सह नहीं पाते हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण उन जातियों की क्षति हुई जो प्राचीन अवशेष मात्र रह गयी हैं अथवा स्थान विशेष पर ही थोड़ी मात्रा में पायी जाती हैं अथवा आनुवांशिक जैव विविधता कम है अथवा जिनकी वृद्धि दर न्यून है अथवा स्थानान्तरित करने वाले जीवों को जलवायु परिवर्तन से क्षति हुई है। जैसे- भारत में शीत ऋतु में साइबेरिया से कुछ पक्षी आते हैं। यदि कहीं भी जलवायु परिवर्तन होता है तो इनका क्षतिग्रस्त होना स्वाभाविक है।

4. ध्रुवीय हिमखण्ड पिघलेंगे:-

      पृथ्वी के तापमान में बढ़ोत्तरी होने के कारण ध्रुवों पर जमे हिम खण्डों और हिमाचल के हिमनदों के पिघलने की प्रक्रिया में तेजी आयी है। इन हिमखण्डों के पिघलने से समुद्रों के जल स्तर में लगातार वृद्धि हो रही है। एक ओर अंटार्कटिका की बर्फ की सतह में दरारें उभर आयी हैं, तो दूसरी ओर आर्कटिक महासागर की चालीस प्रतिशत बर्फ पिछले पचास वर्षों में पिघल चुकी है। अंटार्कटिका की तीन बर्फीली परतें- दक्षिणवर्ती, दक्षिण लार्सन और प्रिंस गुस्तव तो पूरी तरह पिघल कर गायब हो चुकी हैं।

     ओस्लो में चल रहे एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे बांग्लादेश और नीदरलैंड सहित विश्व के अनेक देशों के तटीय इलाकों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। विशेषज्ञों ने बताया है कि बर्फ पिघलने के कारण आल्प्स पर्वतमाला के ग्लेशियर पिछले दो दशकों में 20 प्रतिशत से ज्यादा सिकुड़ गये हैं।

     दुनिया के सबसे सघन हिमालयी ग्लेशियर श्रृंखला की ऐन तलहटी में अवस्थित भारत के अनेक राज्यों में इस परिघटना ने खतरे की घंटी बजा दी है।

       वैज्ञानिकों ने चेताया है कि इस प्राकृतिक आपदा से बचाव के लिये समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गये तो जान-माल की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक परियोजना में किये गये अध्ययन के अनुसार, वाहनों, फैक्ट्रियों और बिजलीघरों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के कारण दुनिया का तापमान सन् 2100 तक 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। ऐसा विद्वानों के दूसरे वर्ग का अनुमान है।

     उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और काठमांडू स्थित ईसीमॉड संस्थान के एक संयुक्त परियोजना में हिमालय के तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गयी थी। परियोजना में नेपाल और भूटान हिमालय के 4000 ग्लेशियरों तथा 5000 बर्फानी झीलों का व्यापक जमीनी और उपग्रहीय अध्ययन किया गया। इसके निष्कर्षो में बताया गया था कि नेपाल और भूटान की दर्जनों बर्फीली झीलें ग्लेशियरों के पिघलने के कारण खतरनाक हद तक फूल गयी हैं और आगामी पाँच वर्षों के भीतर कभी भी फट सकती हैं। अध्ययन में सम्भावना जतायी गयी है कि झीलों में लगातार बढ़ रहें जलस्तर के कारण हिमालय और इसकी तलहटी के क्षेत्र भीषण बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।

       संयुक्त राष्ट्र अध्ययन में कहा गया था कि हिमालय का सबसे बड़ा हिस्सा भारत में पड़ता है लेकिन भारतीय क्षेत्र में पड़ने वाले ग्लेशियरों की स्थिति का आंकलन अभी तक नहीं किया गया है। हालांकि भारत भूगर्भीय सर्वेक्षण विभाग के अध्ययनों से पता चला है कि भारतीय हिमालय में पड़ने वाले ग्लेशियर पिघलने के कारण 15 मीटर प्रतिवर्ष की गति से सिकुड़ रहे हैं। पिछले दिनों तिब्बत की पारि छू नदी में बन गयी कृत्रिम झील के कारण हिमाचल प्रदेश में अब तक खतरा बना हुआ है।

    अनेक विशेषज्ञ कृत्रिम झील बनने की परिघटनाओं को ग्लेशियरों के पिघलने से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की सम्भावनाएँ तलाशे जाने के मद्देनजर ग्लेशियरों के पिघलने और इसके परिणामस्वरूप बर्फानी झीलों के फटने की प्रवृत्ति को गम्भीरता से लिये जाने की जरूरत बतायी है।

5. निचले द्वीप व देशों का अस्तित्व संकटमय होगा:-

        विश्व के दो सबसे छोटे असइलैंड देशों कीरीबती एवं तुवेलू का अस्तित्व संकट में है। समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण वे डूबने ही वाले हैं। इन देशों का अस्तित्व संकट में हैं, वैज्ञानिकों की चेतावनी के बाद भी न सँभलने का मालद्वीप एवं बंगाल की खाड़ी के ‘सागर-द्वीपसमूह’ में पाँच में से तीन द्वीपों का अस्तित्व संकट में है।

       आइसलैंड फोरम की नौरा में हाल ही सम्पन्न बैठक में तुवेलू के मामले में चर्चा हुई, जो कि समुद्र तल से सिर्फ पाँच मीटर ऊँचा है। यह देश कब डूब जाए, कहा नहीं जा सकता। इससे 12 हजार लोगों की जान खतरे में है।

6. जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य संकट होगा-

      पर्यावरणविद् या मौसम वैज्ञानिक वार्मिंग के अनुसार कई तरह की बीमारियों के पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। साथ ही इसका हमारे पर्यावरण पर भी बहुत बुरा असर देखने को मिल रहा है। ब्रिटेन जैसे विकसित देश में भी जलवायु के कारण बदलते मौसम ने कई समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि अमेरीका व अन्य चुनिंदा देशों की तरह ब्रिटेन की भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से अग्रणी भूमिका रही है। ब्रिटेन के नागरिक भी अब गरीब देशों की समझी जाने वाली उष्ण कटिबन्धीय बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं।

      ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस तरह के आकलन में पाया कि हर वर्ष गर्मी के मौसम के तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है, जो यहाँ नागरिकों को मलेरिया और डेंगू के अलावा जोड़ों की बीमारियाँ दे रहा है। ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह चेतावनी दी है कि अगले 20 वर्षों में यहाँ के वायुमण्डल के तापमान में जो बढ़ोत्तरी होगी, उससे ग्रीष्मकाल के दौरान अनुमानतः आधे इंग्लैण्ड में महामारियों का संकट उठ खड़ा होगा। इसके अलावा विषाक्त भोजन के मामले में भी बढ़ोत्तरी हो रही है।

      एक अनुमान के अनुसार ग्रीष्माकाल में ब्रिटेन में भोजन विषाक्त के दस हजार, लू के दो हजार और त्वचा कैंसर के पांच हजार नये रोगियों की संख्या हर वर्ष बढ़ जायेगी। ग्लोबल वार्मिंग का ऐसा प्रभाव इस रूप में देखने को मिलेगा कि गर्मियों के बाद भीषण शीत, हृदयघात से मरने वालों की संख्या बढ़कर 80 हजार तक पहुँच जायेगी। इसके बाद सन् 2020 तक इस संख्या में 15 हजार और सन् 2050 तक पाँच हजार नये रोगियों के बढ़ने की आशंका वैज्ञानिक जता चुके हैं।

       ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय के वैज्ञानिक प्रो. डोनाल्डसन तो और भी भयावह तस्वीर पेश करते हैं। उनके अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण देश में जटिल किस्म की उष्ण कटिबन्धीय बीमारी “नील फीवर” का प्रसार हो सकता है।

निष्कर्ष

    संक्षेप में, जलवायु परिवर्तन के पृथ्वी पर प्रभाव के बारे में हो सकता है कि हम अधिक आँक रहे हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम वास्तविकता से कम आँक रहे हैं, इसलिये जरूरी है कि ग्रीन हाउस गैस सान्द्रता को घटाने के लिये हम प्रभावशाली कदम बढ़ायें।

13. Climatic Change (जलवायु परिवर्तन)

13. Climatic Change

(जलवायु परिवर्तन)



      हरितगृह प्रभाव, प्रदूषण एवं अन्य भौतिक परिवर्तनों से पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन उल्लेखनीय मात्रा में हो रहे हैं। पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन का बहुत बड़ा कारण ग्रीन हाउस गैस (कार्बन डाइ ऑक्साइड, जलवाष्प, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) की सतत् वृद्धि से बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय उपमहाद्वीप की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन पानी में समा जायेगी।

      अकेले बांग्लादेश की ही 13 मिलियन आबादी प्रभावित होगी। चावल उत्पादन में 16 प्रतिशत की कमी आ जायेगी, क्योंकि बाग्लादेश में चावल उत्पादन के लिए उपाजाऊ जमीन का 17.5 प्रतिशत हिस्सा सागरों में समा जायेगा। बढ़े हुए तापमान के कारण पेड़ों तथा जमीन की ऊपरी सतह नमी के वाष्पीकरण में तेजी से वृद्धि होगी। अमेरीका की सम्मानित संस्था ईपीए के अनुसार तापमान में 4ºC वृद्धि से वाष्पीकरण में 30 से 40 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जिससे एशिया तथा अफ्रीका के अर्द्धशुष्क प्रदेश पूर्ण शुष्क प्रदेशों में बदल जायेंगे। घास के बड़े-बड़े मैदानों में तेजी से कमी आयेगी, जिससे पशुओं के चारे, पानी की समस्या विकराल रूप लेगी।

    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफ्रीका, मध्य पूर्व तथा दक्षिण यूरोप में पीने के पानी की समस्या और बढ़ेगी। विश्व की औसत वर्षा में वृद्धि होगी पर इसके वितरण में असमानता बढ़ती जायेगी। तापमान में वृद्धि के कारण वातावरण के निचले स्तर में शक्तिशाली प्रदूषक “ओजोन” की मात्रा में वृद्धि हो रही है। तापमान के साथ-साथ मच्छरों से फैलने वाले रोग जैसे- मलेरिया, पीला बुखार, डेंगू आदि में वृद्धि होगी। सन् 2001 तक अमरीका में उद्योगों से उत्सर्जित होने वाली कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा सन् 1990 के स्तर से 8.3 प्रतिशत बढ़ चुकी थी।

        जलवायु परिवर्तन के निम्नलिखित कारक जिम्मेदार है-

1. प्रदूषण:-

     प्रदूषण आज की अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। जलवायु परिवर्तन में प्रदूषण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बढ़ती आबादी के कारण विभिन्न क्षेत्रों में पर्यावरण असन्तुलित हो रहा है। महानगरीय क्षेत्रों में औद्योगीकरण एवं जनसंख्या विस्फोट के कारण तापमान द्वीप, प्रदूषण, गुम्बद तथा ‘ओजोन परत में छेद’ आदि के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है जिससे प्रदूषण क्षेत्र न्यून वर्षा के गर्म क्षेत्र बन जाते हैं। वायुमण्डल में ओजोन परत में छेद होने के कारण आगत वर्षों में पराबैंगनी किरणों का प्रभाव 8 से 15 प्रतिशत और बढ़ जायेगा। महानगरीय सीमेंट के जंगलों में एक विशेष जलवायु परिवर्तन हो जाया करता है जिससे उच्च तापमान द्वीप बनते हैं। 

2. भौतिक परिवर्तन-

       अलनिनो प्रभाव इस भौतिक परिवर्तन में उल्लेखनीय है। दक्षिणी अमेरीकी महाद्वीप के तटवर्ती प्रशांत महासागर में तापमान असमान रूप से बढ़ जाने से मौसम में बदलाव आता है। इसका सीधा असर भारत के दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पर पड़ता है जो भारत में 80 प्रतिशत वर्षा से अधिक के लिये जिम्मेदार है। यह मानसून मई से सितम्बर तक सक्रिय रहता है।

   भारत, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान में अलनिनो का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अर्थात् भारतीय महाद्वीप में अलनिनो ने भारतीय मानसून को अत्यधिक प्रभावित किया ही है। साथ ही आस्ट्रेलिया और दक्षिणी चीन में अनावृष्टि की है।

अलनिनो का प्रभाव-

     अलनिनो प्रशांत महासागर में पैदा होने वाली गर्म जलधाराओं का प्रभाव है जो पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा सकता है। यह गर्म जलधारा मात्रा प्रशांत महासागर में इसलिए पैदा होती है क्योंकि इस क्षेत्र पर सूर्य की सीधी किरणों के कारण समुद्र का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। जलवायविक वैज्ञानिकों का मानना है कि अलनिनो के कारण पैदा होने वाली हवाएँ पूरब से पश्चिम की ओर जिस भी क्षेत्र से गुजरती है वहाँ पर जलवायु के विपरीत प्रभाव डालती हैं। अलनिनो के कारण इंडोनेशिया में सूखा पड़ा। भारत में भी अलनिनो के प्रभाव से मानसून अस्थिरता की पराकाष्ठा पर पहुँच गया है।

3. वनों का ह्रास-

       वनों की आग का प्रभाव आस्ट्रेलिया और इण्डोनेशिया के जंगलों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। वन भूमि पर कृषि भूमि का दबाव भारत में सबसे अधिक वन विनाश का प्रभाव जलवायु पर और जलवायु का प्रभाव वन विनाश पर स्पष्ट है। विश्व सन्दर्भ में तापमान की बढ़ोत्तरी जलवायु परिवर्तन का मुख्य बिन्दु है।

   विगत अनुमान से जलवायु परिवर्तन विशेषतः दुगना बढ़ रहा है। निरंतर जलवायु का पृथ्वी पर खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है। यह जैसा सोचा गया था, उससे कहीं अधिक घातक है। पृथ्वी को इस भयावह प्रभाव से बचाने की सख्त जरूरत है। ये चेतावनी संयुक्त राष्ट्र द्वारा गत माह “मौसम परिवर्तन” पर तीसरी अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए “Inter Governmental Panel on Climate Change” डॉ. राबर्ट वाटसन ने दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी का तापमान पूर्वानुमानों की तुलना में दुगुनी गति से बढ़ रहा है। मौसम परिवर्तन पर्यावरण से जुड़ा यह गम्भीर मुद्दा है।

      अध्ययन दल से जुड़े एक अन्य सदस्य ने भूमण्डल का तापमान बढ़ने का पर्यावरण के लिये महासंकट की भविष्यवाणी की है। संयुक राष्ट्र की ताजी रिपोर्ट तीन हजार वैज्ञानिकों के कठिन परिश्रम के बाद तैयार की गयी है। कम्प्यूटर आधारित गणना के आधार पर दावा है कि शताब्दी के अन्त तक तापमान में 5.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस स्थिति के लिये वे प्रकृति को नहीं, बल्कि इंसानी गतिविधियों को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण और गैसों का निस्तारण हालात बिगाड़ने में सर्वाधिक दोषी हैं। पृथ्वी के पर्यावरण पर मँडरा रहे खतरे के लिए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिकी रूप से समृद्ध देश जिम्मेदार हैं। 

     औद्योगिक प्रदूषण एवं उद्योगों से निकली गैसों के वायुमण्डल में मिलने से पृथ्वी क तापमान बढ़ रहा है। मौसम विज्ञान अध्येता डॉ. आर. वाटसन का कहना है कि “मौसम के पृथ्वी पर प्रभाव के बारे में हो सकता है कि हम अधिक आंक रहे हों, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम वास्तविकता से कम आंक रहे हैं। इसलिये जरूरी है कि ग्रीन हाउ गैस सान्द्रता को घटाने के लिये हम प्रभावशाली कदम बढ़ाएँ।” उनका विश्वास है कि यह गैस औद्योगिक रूप से समृद्ध देश ही सर्वाधिक बढ़ रहे हैं।

      विश्व सन्दर्भ में जलवायु परिवर्तन को संक्षेप में लिखा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन से मुख्य आशय तापमान की बढ़ोत्तरी है जिसे डॉ. दिनेश मणि ने अपने शोध लेख ‘पृथ्वी की गरमाहट’ में बतलाया कि भारत और अन्य देशों में 2010 से 2070 ई० तक की अवधि में हरित ग्रह प्रभाव के कारण मानसून में भारी वृद्धि होगी तथा नीचे के इलाके जलमग्न एवं बाढ़ग्रस्त हो जायेंगे। छोटे द्वीप डूब जायेंगे और समुद्र के तट नष्ट हो जायेंगें और कृषि भूमि एवं मछलियाँ कम हो जायेंगी। विश्व का तापमान बढ़ने से मलेरिया, कालाजार, मस्तिष्क शोध, नेत्र रोग, आदि बढ़ सकते हैं।

     अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण संगठन की रिपोर्ट से भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इथोपिया आदि देशों में मलेरिया, कालाजार की वापसी इसका प्रमाण है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार आगामी वर्षों में विश्व के औसत तापमान में प्रति दशक 0.3 प्रतिशत की वृद्धि होगी और इस प्रकार विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि सन् 2100 के अन्त तक 3.6 सेल्सियस तापमान बढ़ जायेगा।

     वाशिंगटन स्थिति प्रसिद्ध अनुसंधान केन्द्र ‘Climate Institute’ ने एशिया में जलवायु परिवर्तन नामक नवीन प्रतिवेदन में बतलाया कि हरित ग्रह गैसों की अधिकता के कारण भारत, लक्षद्वीप, पाकिस्तान, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, फिलीपीन्स, ब्रिटेन (आइसलैण्ड) आदि देशों में तापमान और समुद्र सतह में उठाव का संकट निकट भविष्य में है।

       प्रतिवेदन के अनुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों में ज्यादा वृद्धि होती है तो इन देशों के समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से 3 डिग्री और मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस से 4.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में समुद्र का जलस्तर 15 सेमी. से 90 सेमी. तक बढ़ सकता है। यदि ग्रीन हाउस गैसों में मध्यम स्तर की वृद्धि होती है तब समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.3 डिग्री और मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है।

     जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से फलोत्पादन एवं कृषि उत्पादन में अंतर आना स्वाभाविक है। कार्बन डाई ऑक्साइड की सान्द्रता के कारण वायुमण्डल में नमी बढ़ती है और वर्षा की सम्भावना बढ़ जाती है। कीटजनित रोगों के लिए अनुकूल होते हैं तो खाद्य समस्या को प्रत्यक्ष प्रभावित करते हैं

      सर्वात्रिक परिसंचरण मॉडल सन् 2030 तक विश्व तापमान में 1.5 से 5.2 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होने का संकेत देते हैं। ये मॉडल ऊपरी वायुमण्डल के ठण्डा होने के साथ-साथ सतह के गर्म होने का संकेत भी देते हैं। खासकर ऊपरी तथा मध्य अक्षांशों में तापमान में सर्वाधिक परिवर्तन होने की सम्भावना है।

       शरदकाल में तापमान की वृद्धि औसत परिवर्तन में दुगुनी या उससे भी ज्यादा हो सकती और यह वृद्धि बड़ी तेजी से होगी। दुगनी कार्बन डाइ ऑक्साइड सान्द्रता के साथ जलचक्र 10 प्रतिशत अधिक तीव्रता से काम करेगा, वायुमण्डल के तापमान में 5.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि औसत उसकी जलवहन क्षमता की लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ा देगी जो कि जलवायु में भारी परिवर्तन का संकेत है।

4. Latitude, Longitude, International Date Line and Time (अक्षांश, देशांतर, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा व समय)

4. Latitude, Longitude, International Date Line and Time

(अक्षांश, देशांतर, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा व समय)



अक्षांश (Latitude) या Parallel

        पृथ्वी के केन्द्र पर बनाये गये उदग्र (Vertical) कोणीय मान को अक्षांश कहते हैं। दूसरे शब्दों में ग्लोब पर किसी स्थान तथा विषुवतरेखा के मध्य कोणीय दूरी को उस स्थान का आक्षांश कहते हैं। यह कोणीय दूरी ग्लोब के केन्द्र से मापी जाती है। 

➤ सामान्य परिभाषा के अनुसार ग्लोब पर पूरब से पश्चिम दिशा की ओर खींची गयी काल्पनिक रेखा को अक्षांश रेखा कहते हैं।

➤ ग्लोब पर समान आक्षांश वाले बिन्दुओं को मिलाने वाले काल्पनिक वृत्तों को आक्षांश वृत्त कहा जाता है। विषुवत रेखा पूर्ण वृहत् वृत्त (Great Circle) होती है तथा शेष समस्त आक्षांश वृत्त लघु वृत्त होते हैं।

वृहत वृत्त:-

      वृहत वृत्त वह रेखा होती है जो गोलाकार पृथ्वी को दो समान परिधियों वाले गोलाद्धों में विभाजित करती है। पृथ्वी पर सभी देशान्तरों (Meridians) के अतिरिक्त भूमध्य रेखा/विषुवत रेखा एक वृहत वृत्त भी है।

➤ भूमध्यरेखा पृथ्वी के मध्य से होकर गुजरने वाली अक्षांश रेखा है। इसे विषुवत रेखा या  0° अक्षांश भी कहते हैं। इस पर वर्ष भर दिन-रात बराबर होते हैं। इसलिए इसे विषुवत रेखा कहते हैं।

➤ विषुवत रेखा वृहत् वृत का उदाहरण है क्योंकि यह पृथ्वी को दो बराबर भागों में बाँटती है।

➤ भूमध्यरेखा पृथ्वी को दो गोलार्द्धों (उत्तरी और दक्षिणी) में विभक्त करती है।

➤ अक्षांश रेखाओं का मान न्यूनतम 0º और अधिकतम 90º होता है।

➤ उत्तरी गोलार्द्ध में खीची गई अक्षांश रेखा को N के द्वारा और दक्षिणी गोलार्द्ध में खींची गई  रेखा को S के द्वारा निरुपित करते है।

अश्व अक्षांश (Horse Latitude):-

       30° से 35° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश के मध्य स्थित पेटी को अश्व अक्षांश कहा जाता है। इसे उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (Subtropical High Pressure Belt) भी कहते हैं। इसके बनने का कारण इन अक्षांशो के मध्य प्रतिचक्रवातों का उत्पन्न होना है।

0º अक्षांश⇒ भूमध्यरेखा या विषुवत रेखा (Equator)

23½º N अक्षांश⇒ कर्क  रेखा (Tropic of Cancer)

23½º S अक्षांश⇒ मकर रेखा (Tropic of Capricorn)

66½º N अक्षांश⇒ आर्कटिक वृत्त

66½º S अक्षांश⇒ अण्टार्कटिक वृत

90º N⇒ उतरी ध्रुव

90º S⇒ दक्षिणी ध्रुव

➤ 23½° से 66½° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र कहते हैं। यहाँ पर वर्ष भर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

➤ प्रति 1° पर एक अक्षांश निर्मित होता है। विषुवत रेखा से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर जाने पर अक्षांशीय वृत्त का आकार छोटा होता जाता है, जो ध्रुवों पर अंततः एक बिन्दु में परिवर्तित हो जाता है।

➤ 90° अक्षांश एक बिंदु के रूप में पाया जाता है, जिसे ध्रुव (Pole) कहते हैं। 90° उत्तरी अक्षांश को उत्तरी ध्रुव (North Pole) तथा 90° दक्षिण अक्षांश को दक्षिणी ध्रुव (South Pole) के नाम से जाना जाता है।

➤ 66½° से 90° उत्तरी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र को ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Region) कहते हैं। यहाँ 6 महीने का दिन तथा 6 महीने की रात होती है।

➤ भूमध्य रेखा की परिधि की आधी लम्बाई 60° अक्षांश रेखा पर प्राप्त होती है।

➤ 90° अक्षांश रेखा एक बिन्दु के समान होती है।

➤ सभी अक्षांश रेखा (90º को छोड़कर) देशान्तर रेखा को समकोण पर काटती है।

➤ सभी अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समान्तर और समान दूरी पर अवस्थित होते हैं।      

➤ किसी भी स्थान का अक्षांश रेखा का निर्धारण Pole Star से आने वाली किरण और चक्षु अक्ष के बीच बने कोणीय माप के द्वारा निर्धारित करते हैं।

➤ ग्लोब पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 89-89 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव एक बिंदु के रूप में है न कि रेखा या वृत्त के रूप में।

➤ मानचित्र पर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 है।

नोट: यदि अक्षांश रेखाओं को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश रेखाएँ होंगे। इस प्रकार विषुवत रेखा को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 होगी क्योंकि दोनों ध्रुव मानचित्रों पर एक रेखा के रूप में होती है न कि बिंदु के रूप में।

➤ अक्षांशों की कुल संख्या 180 है।

नोट: यदि अक्षांशों को 1° के अंतराल पर खींचते हैं, तो उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों में 90-90 अक्षांश होंगे। यहाँ विषुवत रेखा का मान 0 अक्षांश होगा, इस प्रकार कुल अक्षांशों की संख्या 180 होगी क्योंकि दोनों ध्रुवों का अंश 90º मानचित्र या ग्लोब पर होगा, यहाँ पर एक रेखा या बिंदु के रूप में नहीं होगा।

➤ प्रति 1º की अक्षांशीय दूरी लगभग 111 Km के बराबर होती है जो पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण भूमध्यरेखा से ध्रुवों तक भिन्न-भिन्न मिलती है। अर्थात् दो अक्षांशों के बीच की दूरी 111 किमी० होती है।

Latitude

देशान्तर या याम्योत्तर (Longitude):

         ग्लोब पर प्रमुख याम्योत्तर (Prime meridian) तथा किसी दिये गये स्थान के मध्य की कोणीय दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं। यह दूरी ग्लोब के ध्रुवीय अक्ष से मापी जाती है।

➤ देशान्तर ग्लोब पर निर्मित होने वाले ऐसे काल्पनिक अर्द्धवृत्त हैं, जो उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को जोड़ते हैं। ये देशांतर सदैव अक्षांशों के लम्बवत् निर्मित होते हैं, जो 0° देशान्तर अर्थात् ग्रीनवीच रेखा से किसी स्थान की कोणीय दूरी होती है।

➤ 180° देशान्तर, प्रधान याम्योत्तर के साथ मिलकर ग्लोब पर बृहत-वृत्त का निर्माण करती है।

➤ 0° देशांतर इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन के समीप स्थित ग्रीनविच नामक स्थान से होकर जाता है, जिसे मानक देशांतर अथवा प्रधान याम्योत्तर (मध्याह्न रेखा) कहा जाता है।

➤ दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को देशान्तर रेखा कहते हैं।

➤ देशान्तर रेखा हमेशा उत्तर से दक्षिण दिशा में खींची जाती है।

➤ दो देशान्तर रेखाओं के बीच में विषुवत रेखा पर अधिकतम दूरी (111.3 किमी०) होती है जबकि ध्रुवों की ओर जाने पर दोनों देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी घटते जाती है।

➤ देशान्तर रेखाएँ पृथ्वी के केन्द्र पर क्षैतिज तल में बनाया गया कोण को व्यक्त करता है।

➤ देशान्तर रेखाओं का न्यूनतम मान 0º और अधिकतम मान 180° होता है।

➤ इस तरह कुल  देशांतर रेखाओं की संख्या ग्लोब पर 360 (180+1+179) और मानचित्र पर 361 (180+1+180) होती है।

➤ 0º देशान्तर रेखा को प्रधान मध्यान्ह / प्रधान याम्योत्तर रेखा (Prime Meridian) कहा जाता है। जबकि 180°  देशांतर रेखा को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं।

➤ 0° देशान्तर रेखा पृथ्वी को दो भागों में बाँटती है-

(i) पूर्वी गोलार्द्ध और

(ii) पश्चिमी गोलार्द्ध।

➤ पूर्वी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को E के द्वारा और पश्चिमी गोलार्द्ध के देशान्तर रेखा को W के द्वारा विरूपित करते हैं।

देशान्तर

➤ 1884 ई0 में वाशिंगटन बैठक के दौरान यह निर्णय लिया गया कि 0° देशान्तर रेखा लंदन के एक ग्रीनवीच शहर में स्थित “रॉयल वेधशाला” के कैम्पस में स्थित एक Pointer से होकर गुजरती है। शेष सभी देशान्तर रेखाओं को पूरब एवं पश्चिम में इसके अनुरूप ही खींचते हैं। इस समय ग्रीनविच मध्याह्न को शून्य मानकर अन्य देशान्तरों की गणना की जाती है। समय का निर्धारण भी इसी को आधार मानकर किया जाता है।

भूग्रिड (The Earth Grid):-

          किसी प्रक्षेप रचना में एक निश्चित मापनी पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं के रेखा जाल को भूग्रिड कहते हैं।

गोरे (Gore)

      दो देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी गोरे (Gore) नाम से जानी जाती है।

समय का निर्धारण

       पृथ्वी एक घूर्णन पूरा करने में लगभग 24 घंटे का समय लेती है। घूर्णन की यह अवधि पृथ्वी दिवस (Earth Day) कहलाती है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी गोलाकार होने के कारण 24 घंटे में 360° पूरा कर लेती है। इसलिए प्रत्येक 15° देशान्तर की दूरी को पूरा करने के लिए यह एक घंटा तथा 1° देशान्तर की दूरी को पूरा करने के लिए 4 मिनट का समय लेती है।

➤ 0° से 180° पूर्व की ओर जाने पर 12 घंटे का समय लगता है और इस प्रकार यह ग्रीनविच समय से 12 घंटे आगे होता है। ठीक इसी प्रकार 0° से 180° पश्चिम की ओर जाने पर ग्रीनविच समय से 12 घंटे का समय लगता है। यही कारण है कि 180° पूर्व व पश्चिम देशान्तर में कुल 24 घंटे अर्थात् एक दिन और एक रात का अंतर पाया जाता है।

➤ पृथ्वी को एक-एक घंटे के 24 समय क्षेत्रों में बाँटा गया है। इन समय क्षेत्रों को ग्रीनविच मीन टाइम व मानक समय में एक घंटे के अन्तराल के आधार पर विभाजित किया गया है अर्थात प्रत्येक जोन 15° के बराबर होता है।

➤ पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। अतः अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समय पर दिन की शुरुआत होती है।

➤ ग्रीनविच मीन टाइम से पूर्व स्थित स्थानों पर ग्रीनविच मीन टाइम से पश्चिम दिशा में स्थित स्थानों की तुलना में सूर्योदय पहले होता है।

➤ चूँकि सूर्य पूर्व में उदित होता है तथा पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है। अत: 0° देशान्तर से पूर्व का समय आगे तथा पश्चिम का समय पीछे रहता है। इसी कारण पृथ्वी के सभी स्थानों पर समय की भिन्नता देखने को मिलती है।

मानक समय (Standard Time)

       मानक समय किसी देश के मध्य से गुजरने वाली याम्योत्तर का माध्य होता है, जो स्थानीय समय की असुविधा को दूर करने के लिए संपूर्ण देश के लिए लागू माना जाता है। प्रत्येक देश का मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम से आधे घंटे (अथवा 0° देशान्तर के 7½º)  के गुणक के अन्तर पर निर्धारित किया जाता है।

➤ मानक समय स्वेच्छा से चयनित याम्योत्तर का स्थानीय समय होता है जो एक विशिष्ट क्षेत्र या देश के लिए मानक समय निर्धारित करता है। उदाहरण के लिए 82½° पूर्वी देशान्तर (याम्योत्तर) जो कि प्रयागराज के निकट मिर्जापुर से होकर गुजरती है, संपूर्ण भारत के लिए मानक समय (IST) का निर्धारण करती है।

➤ भारत का स्थानीय समय ग्रीनविच मानक समय से 5½ घंटा आगे है। अतः जब ग्रीनविच में दोपहर के 12 बजे हों तो उस समय भारत में शाम के 5½ (5:30PM) बजेंगे। इससे भारत के विभिन्न प्रदेशों में देशान्तरीय अंतर के कारण समय की भिन्नता को समायोजित करने की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

➤ किसी देश का मानक समय उस देश के माध्य देशांतर पर निर्भर करता है, अर्थात् प्रत्येक देश का एक मानक समय होता है, परंतु कुछ देश इसके अपवाद हैं। जैसे- अविभाजित रूस में 11 समय क्षेत्र (Time Zone) थे जो विभाजन के बाद केवल चार रह गए हैं, इसी प्रकार कनाडा में 6, संयुक्त राज्य अमेरिका में 6 तथा चीन में 1 समय क्षेत्र हैं, वर्तमान समय में भारत में भी दो समय क्षेत्र बनाने की माँग बढ़ रही है।

स्थानीय समय (Local Time)

      स्थानीय मध्याह्न समय वह समय है जब सूर्य उस स्थान विशेष पर लम्बवत् चमकता है। इस प्रकार यह पृथ्वी पर स्थान विशेष का सूर्य की स्थिति से परिकलित समय है। भारत के सर्वाधिक पूर्व (अरुणाचल प्रदेश) एवं सर्वाधिक पश्चिम (गुजरात के द्वारका) में स्थित स्थानों के स्थानीय समय में लगभग दो घंटे का अंतर पाया जाता है।

स्थानीय समय की गणना में सहायक कुछ प्रमुख कारक

➤ 0° देशांतर (ग्रीनविच रेखा) के बायीं ओर पश्चिमी देशांतर व दायीं ओर पूर्वी देशांतर होता है जबकि 180° देशांतर (अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा) के बायीं ओर पूर्वी देशांतर व दायीं ओर पश्चिमी देशांतर होता है।

➤ किसी भी देशांतर से जब बायीं ओर जाते हैं तो प्रत्येक 1° देशांतर पर समय में 4 मिनट की कमी आती है, जबकि दायीं ओर 4 मिनट की वृद्धि होती है।

➤ 180° देशांतर (अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा) के बायीं ओर जाने पर एक दिन जोड़ना पड़ता है, जबकि दायीं ओर जाने पर एक दिन घटाना पड़ता है।

➤ किसी जलपोत या विमान द्वारा यात्रा करने पर स्थानीय समय निकालने के पश्चात् उसमें आवश्यकतानुसार यात्रा अवधि को जोड़ा या घटाया जाता है। वह विमान या जलपोत कब पहुँचेगा यह ज्ञात करने के लिए यात्रा अवधि को स्थानीय समय में जोड़ा जाता है, जबकि वह कब चला था यह जानने के लिए स्थानीय समय निकालने के पश्चात् यात्रा अवधि घटाई जाती है।

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line)

       ग्लोब पर 180° याम्योत्तर के लगभग समानांतर स्थलखंडों को छोड़ते हुए निर्धारित की गई काल्पनिक रेखा, जिसे अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है।

➤ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर के सहारे निर्मित हुई है जो 180° देशान्तर के दायें या बायें मुड़ जाती है ताकि स्थलीय भागों का विभाजन न हो और लोगों को तिथियों के बारे में भ्रम न हो।

➤ रूस, एल्यूशियन द्वीप, फिजी, टोंगा तथा चैथम द्वीपों के कारण तीन स्थानों से हट गई है, ये रेखा 8 स्थानों पर विचलित भी हुई है।

➤ साइबेरिया को विभाजित होने से बचाने एवं साइबेरिया को अलास्का से अलग रखने के लिए 75° उत्तरी अक्षांश पर यह पूर्व की ओर मोड़ी गई है।

➤ यह रेखा आर्कटिक सागर, चुक्ची सागर, बेरिंग जल सन्धि व प्रशान्त महासागर से होकर गुजरती है।

➤ बेरिंग जलसन्धि अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समानान्तर स्थित है।

➤ बेरिंग सागर में यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है।

➤ फिजी द्वीप समूह एवं न्यूजीलैंड के विभिन्न भागों को एक साथ रखने के लिए यह रेखा दक्षिणी प्रशांत महासागर में पूर्व दिशा की ओर मोड़ी गई है।

➤ अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पूर्व व पश्चिम में एक दिन का अंतर पाया जाता है। अतः इसे पार करते समय एक दिन बढ़ाया या घटाया जाता है।

➤ जब कोई जलयान अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार कर पश्चिम दिशा में यात्रा करता है तो एक दिन जोड़ दिया जाता है तथा जब पूर्व दिशा में यात्रा करता है तो एक दिन घटा दिया जाता है।

➤ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के अनुसार कोई भी समय (मध्य रात्रि, सूर्योदय, सूर्यास्त आदि) सबसे पहले किरिबाति देश के कॅरोलीन द्वीप समूह के लाँग आइलेट में होता है। यह देश प्रशांत महासागर में स्थित है।

➤ नार्वे देश को अर्द्धरात्रि सूर्य का देश कहा जाता है क्योंकि उत्तरी नॉर्वे के हेमरफेस्ट शहर में एक वर्ष में 76 दिन-रात सिर्फ 40 मिनट की होती हैं।

➤ ये आर्कटिक वृत्त (66½º अक्षांश) के ऊपर स्थित है जहाँ सूर्य का प्रकाश 6 महीने के लिए रहता है।

Latitude



अक्षांश, देशांतर, अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा व समय से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण किसी दिये गये स्थान की कोणीय दूरी क्या कहलाती है?

[A] प्रधान देशान्तर
[B] देशान्तर
[C] अक्षांश
[D] इनमें से कोई नहीं

2. निम्नलिखित में से कौन-सा वृहत वृत्त (Great Circle) का उदाहरण है?

[A] कर्क रेखा
[B] भूमध्य रेखा
[C] मकर रेखा
[D] आर्कटिक रेखा

3. ट्रॉपिक ऑफ कैंसर (Tropic of Cancer) निम्न में से क्या है?

[A] एक प्रकार की रक्त सम्बन्धी बीमारी
[B] कैंसर की रोकथाम का एक वैज्ञानिक उपकरण
[C] 23½º उत्तरी अक्षांश रेखा
[D] 23½º दक्षिणी अक्षांश रेखा

4. ध्रुवों की तरफ जाने पर अक्षांश रेखाओं के व्यास की प्रकृति कैसी होती है?

[A] यह स्थिर रहता है।
[B] यह बढ़ता है।
[C] यह घटता है।
[D] पहले घटता है पुनः बढ़ता है।

5. सूची-1 को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए-

सूची-1         सूची-II

a. भूमध्य रेखा 1. 66½º दक्षिण

b. कर्क रेखा  2. 66½º उत्तर

c. मकर रेखा  3. 0°

d. आर्कटिक वृत्त 4. 23½º उत्तर

e. अंटार्कटिक वृत्त 5. 23½º दक्षिण

कूट:

      a b c d e

[A] 5 4 3 1 2
[B] 3 4 5 2 1
[C] 2 1 3 4 5
[D] 4 3 2 5 1

6. धरातल पर 1° अक्षांश की दूरी निम्न में से किसके बराबर होती है?

[A] 11 किमी०
[B] 21 किमी०
[C] 111 किमी०
[D] 121 किमी०

7. भूमध्य रेखा के अतिरिक्त कौन-सी अक्षांश रेखा पृथ्वी को दो बराबर भागों में विभाजित करती है?

[A] 23½º N
[B] 23½º
[C] 66½º एवं 66½º
[D] कोई भी अक्षांश नहीं

8. मकर रेखा अथवा 23½º दक्षिणी अक्षांश वृत्त निम्नलिखित में से कहाँ से होकर गुजरती है? 

[A] जिम्बाब्वे
[B] मालागासी
[C] भारत
[D] ग्रीनलैंड 

9. वह काल्पनिक रेखा जो पृथ्वी को दो भागों में बाँटती है, क्या कहलाती है?

[A] भूमध्य रेखा
[B] मकर रेखा
[C] कर्क रेखा
[D] इनमें से कोई नहीं

10. 66½º दक्षिणी अक्षांश को कहते हैं-

[A] आर्कटिक वृत्त
[B] कर्क रेखा
[C] अंटार्कटिक वृत्त
[D] मकर रेखा

11. दोनों ध्रुवों को जोड़ने वाली वह काल्पनिक रेखा जो भूमध्य रेखा को समकोण पर प्रतिच्छेद करती है, क्या कहलाती है?

[A] मध्याह्न
[B] अक्षांश
[C] देशान्तर
[D] इनमें से कोई नहीं

12. दो देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी निम्न में से किस नाम से जानी जाती है?

[A] बेल्ट
[B] गोरे
[C] काले
[D] समय पेटी

13. एक देशान्तर से दूसरे देशान्तर के बीच कितना समयान्तराल होता है?

[A] 4 मिनट
[B] 1 घण्टा
[C] 15 मिनट
[D] 12 घण्टा

14. वह अक्षांश रेखा जिस पर सदैव दिन व रात की अवधि समान रहती है, है

[A] भूमध्य रेखा
[B] कर्क रेखा
[C] मकर रेखा
[D] हिंज रेखा

15. निम्नलिखित में से कौन सुमेलित नहीं है?

[A] कर्क रेखा – 23½º N
[B] मकर रेखा – 23½º S
[C] आर्कटिक वृत्त – 66½º N
[D] प्रधान याम्योत्तर-180°

16. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] देशान्तर रेखाओं की कुछ संख्या 180 है।
[B] किसी भी स्थान की ग्रीनविच रेखा से कोणीय दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहा जाता है।
[C] देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी विषुवत रेखा पर अधिकतम एवं ध्रुवों पर शून्य होती है।
[D] विषुवत रेखा पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी 111.3 किमी० होती है।

17. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी स्थिर रहती है।
[B] किसी भी स्थान की प्रधान याम्योत्तर से कोणीय दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहा जाता है।
[C] विषुवत रेखा एक बृहत् वृत्त है।
[D] सभी देशान्तर रेखाएँ वृहत् वृत्त है।

18. दो अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी लगभग होती है-

[A] 111 मील
[B] 111 किमी०
[C] 121 मील
[D] 121 किमी०

19. 1° देशान्तर की सर्वाधिक दूरी कहाँ पर होगी?

[A] कर्क रेखा पर
[B] विषुवत रेखा पर
[C] मकर रेखा पर
[D] इनमें से कोई नहीं

20. कुल अक्षांशों की संख्या कितनी है?

[A] 66
[B] 90
[C] 180
[D] 360

21. देशान्तरों की संख्या कितनी है?

[A] 24
[B] 90
[C] 180
[D] 360

22. विषुवत रेखा के समानान्तर कल्पित रेखाएँ क्या कहलाती है?

[A] अक्षांश रेखाएँ
[B] ग्रीन विच रेखा
[C] देशान्तर रेखाएँ
[D] मध्याह्न रेखाएँ

23. पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

[A] अक्षांश रेखा
[B] अन्तर्राष्ट्रीय रेखा
[C] देशान्तर रेखा
[D] मिलन रेखा

24. प्रधान मध्याह्न रेखा किस स्थान से होकर गुजरती है?

[A] ग्रीन विच
[B] सिडनी
[C] ग्रीनलैंड
[D] इलाहाबाद

25. ग्रीन विच रेखा से तात्पर्य है-

[A] 0° अक्षांश
[B] 0° देशान्तर
[C] 180° पूर्वी देशान्तर
[D] 180° पश्चिमी देशान्तर

26. मकर रेखा निम्न में से किस देश से होकर नहीं जाती है?

[A] चिली
[B] द० अफ्रीका
[C] अर्जेण्टीना
[D] फिलीपीन्स 

27. पृथ्वी एक घण्टे में कितना देशान्तर घूम लेती है?

[A] 20°
[B] 12°
[C] 15°
[D] 18°

28. दक्षिणी ध्रुव का अक्षांश है-

[A] 70°
[B] 80°
[C] 90°
[D] 100°

29. सूची-1 को सूची-11 के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचिओं के नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।

सूची-1     सूची-11

a. विषुवत रेखा 1. 23½º उत्तरी अक्षांश

b. कर्क रेखा 2. 23½º दक्षिणी अक्षांश

c. मकर रेखा 3. 0° देशान्तर

d. ग्रीन विच रेखा 4. 0° अक्षांश

कूट: a b c d

[A] 4 1 2 3
[B] 4 1 3 2
[C] 2 3 4 1
[D] 3 4 2 1

30. सूची-I को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए तथा सूचिओं के नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।

सूची-1     सूची-II

a. आर्कटिक वृत्त 1. 66½º दक्षिणी अक्षांश

b. अंटार्कटिक वृत्त 2. 0° अक्षांश

c. अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 3. 66½º उत्तरी अक्षांश

d. विषुवत रेखा 4. 180° देशान्तर

कूट: a b c d

[A] 4 1 3 2
[B] 4 1 2 3
[C] 3 1 4 2
[D] 1 2 4 3

31. दो स्थानों के देशान्तरों में 1° का अन्तर होने पर उनके समयों में कितना अन्तर होगा?

[A] 15 मिनट
[B] 8 मिनट
[C] 4 मिनट
[D] 2 मिनट

32. निम्नलिखित में से किस देश से होकर कर्क रेखा नहीं गुजरती है?

[A] भारत
[B] म्यान्मार
[C] चीन
[D] जायरे

33. उत्तरी गोलार्द्ध में भू-धरातल अधिकतम है-

[A] 30° N – 40° N
[B] 40° N – 50° N
[C] 50°N – 60° N
[D] 60° N – 70°N

34. मानचित्र पर स्थित अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

[A] दोनों समानान्तर रेखाएँ है।
[B] दोनों एक-दूसरे को लम्बवत काटती है।
[C] दोनों ध्रुवों पर मिलती है।
[D] दोनों भूमध्य रेखा पर मिलती है।

35. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहलाता है-

[A] 0° अक्षाश
[B] 0° देशान्तर
[C]  66½º अक्षांश
[D] 180° देशान्तर

36. ग्रीनविच से 180° मध्याह्न काल्पनिक रेखा कहलाती है-

[A] अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा
[B] मकर रेखा
[C] अक्षांश रेखा
[D] कर्क रेखा

37. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा की स्थिति निम्न में से किसके निकटतम है?

[A] 0° अक्षांश
[B] 90° पूर्वी एवं पश्चिमी देशान्तर
[C] 0° देशान्तर
[D] 180° पूर्वी एवं पश्चिमी देशान्तर

38. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा टेढ़ी-मेढ़ी है। ऐसा होने का कारण है

[A] समय एवं तिथि के अन्तर को समाप्त करना
[B] हवाई जहाजों के लिए सही तिथि रखना
[C] 180° देशान्तर की विशिष्टता स्थापित करना
[D] मार्ग में पड़ने वाले द्वीपों को छोड़ने हेतु

39. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा बिलकुल सीधी नहीं है, क्योंकि इसका कारण है-

[A] अन्तर्राष्ट्रीय समझौता
[B] कोरियोलिस बल
[C] कुछ देशों के विभिन्न भागों के दिन एवं समय को एकसमान रखना
[D] उपर्युक्त में सभी

40. उत्तरी प्रशान्त महासागर में अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के विचलन का कारण है-

[A] हवाई द्वीप समूह
[B] क्यूराइल द्वीप समूह
[C] एल्यूशियन द्वीप समूह
[D] उपर्युक्त सभी

41. यदि अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा पर दिन के 12 बजे हो तो उस समय भारत का मानक समय क्या होगा?

[A] 6.30 सुबह
[B] 5.30 शाम
[C] 5.30 सुबह
[D] 6.30 शाम

 

42. भारत का प्रामाणिक समय किस देशान्तर से लिया गया है?

[A] 81½º W
[B] 82½º W
[C] 81½º E
[D] 82½º E

43. भारत का प्रामाणिक समय किस स्थान से निश्चित किया जाता है?

[A] मुम्बई
[B] दिल्ली
[C] मिर्जापुर (प्रयागराज)
[D] कोयम्बटूर

44. निम्नलिखित में से किस स्थान का प्रामाणिक समय एवं स्थानीय समय लगभग एक समान है?

[A] मिर्जापुर (प्रयागराज)
[B] नई दिल्ली
[C] अहमदाबाद
[D] राँची

45. भारत के सर्वाधिक पूर्व एवं पश्चिम में स्थित स्थानों के स्थानीय समय में कितना का अन्तर है?

[A] 1 घण्टा
[B] 2 घण्टा
[C] 2 घण्टा 30 मिनट
[D] 1 घण्टा 30 मिनट

46. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर से कितनी बार विचलित होती है?

[A] 8
[B] 60
[C] 10
[D] 4

47. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° याम्योत्तर से अन्तर करती है जिससे कि वह-

[A] एक ही प्रशासन के अन्तर्गत द्वीप समूह को विभाजित न करे।
[B] बेरिंग जलडमरूमध्य को विभाजित न करे।
[C] एक ही प्रशासन के अन्तर्गत भू-भागों को विभाजित करें।
[D] प्रशान्त महासागर को दो बराबर भागों में विभाजित करें।

48. यदि किसी स्थान का स्थानीय मानक समय ग्रीनविच समय से 12 घण्टे आगे है तो वह स्थान कहाँ स्थित होगा?

[A] 90° E
[B] 90° W
[C] 180° E
[D] 180° W

49. ग्रीनविच पर समय मध्याह्न 12 बजे हैं, 50º पूर्वी देशान्तर पर स्थित एक स्थान पर समय क्या होगा?

[A] प्रातः 8.40
[B] सांय 3.20 
[C] प्रातः 5.00
[D] मध्य रात्रि 12.00

50. यदि ग्रीनविच (0° देशान्तर) पर रात्रि के 12.00 बजे है तो 30° पूर्वी देशान्तर पर स्थित काहिरा में क्या समय होगा?

[A] 2:00 बजे रात्रि
[B] 8:00 बजे रात्रि
[C] 10 बजे रात्रि
[D] 12 बजे रात्रि

51. पृथ्वी पर दो स्थानों की स्थिति के अनुदैर्ध्य का अंतर 15° है। स्थानीय समय में कितना का अंतर होगा?

[A] 2 घण्टे
[B] 1 घण्टा
[C] 5 घण्टे
[D] 15 घण्टे

52. यदि दो स्थानों के बीच समय में अन्तर 2 घण्टे 20 मिनट है तो देशान्तर में अन्तर होगा?

[A] 35°
[B] 45°
[C] 40°
[D] 30°

53. अन्तर्राष्ट्रीय दिनांक रेखा कहाँ से होकर गुजरती है?

[A] 0°
[B] 180°
[C] 90°
[D] 270°

54. ग्रीनविच किस देश में है?

[A] यू०एस०ए०
[B] यू० के० 
[C] भारत
[D] हॉलैंड 

55. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

[A] यह एक काल्पनिक रेखा है।
[B] बेरिंग सागर में यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है।
[C] 75° उत्तरी अक्षांश पर यह रेखा पश्चिम की ओर मोड़ी गई है।
[D] न्यूजीलैंड एवं फिजी द्वीप समूह को एक साथ रखने के लिए दक्षिणी प्रशान्त महासागर में यह रेखा पूर्व की ओर मोड़ी गई है।

56. भारत और ग्रीनविच के मानक समय में कितने का अन्तर है?

[A] 4 घण्टा 30 मिनट
[B] 5 घण्टा 30 मिनट
[C] 5 घण्टा 15 मिनट
[D] 6 घण्टा 30 मिनट

57. अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा का निर्धारण किस वर्ष किया गया?

[A] 1662 ई०
[B] 1745 ई०
[C] 1884 ई०
[D] 1947 ई०

58. पृथ्वी को कितने समय कटिबन्धों में बाँटा जा सकता है?

[A] 2
[B] 4
[C] 24
[D] 64

59. एक देशान्तर को पार करने में दो स्थानों के स्थानीय समय के बीच क्या अन्तर होता है?

[A] 8 मिनट
[B] 4 मिनट
[C] 2 मिनट
[D] 0 मिनट

3. Earth’s motions (पृथ्वी की गतियाँ)

3. Earth’s motions (पृथ्वी की गतियाँ)



पृथ्वी की गतियाँ

         पृथ्वी की मुख्यतः दो गतियाँ है-

(1) घूर्णन या परिभ्रमण या दैनिक गति:-

       पृथ्वी सदैव अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा में लट्टू के समान घूमती रहती है, जिसे पृथ्वी का घूर्णन (Rotation) या परिभ्रमण कहते हैं। इस गति के कारण ही पृथ्वी पर दिन व रात होते हैं। इसीलिए इस गति को दैनिक गति भी कहा हैं।

➤ पृथ्वी का अक्ष भूमध्यरेखीय तल के लम्बवत् रहता है तथा पृथ्वी के केन्द्र से होकर गुजरता है।

➤ इसके एक पूर्ण घूर्णन की अवधि लगभग 24 घंटे (23 घंटा, 56 मिनट 4.09 सेकेण्ड) है। यह अवधि एक दिन का निर्माण करती है।

➤ यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर झुकी हुई न होती तो सर्वत्र दिन-रात की अवधि एक समान होती।

➤ यदि पृथ्वी अपनी अक्ष पर न घूमती और सूर्य की परिक्रमा न करती तो पृथ्वी के एक गोलार्द्ध में सदैव दिन बड़े और रातें छोटी होतीं तथा दूसरे गोलार्द्ध में सदैव रातें बड़ी और दिन छोटे होते।

➤ पृथ्वी के घूर्णन की यह गति भूमध्यरेखा पर 0.5 किमी. प्रति सेकेण्ड होती है, 60° अक्षांश पर इसकी आधी 0.23km/h तथा ध्रुवों पर शून्य हो जाती है। अर्थात् ध्रुवों की ओर यह गति क्रमशः कम (धीमी) होती जाती है।

➤ ज्वारीय घर्षण पृथ्वी की घूर्णन गति को कम कर देता है। इस क्रिया के फलस्वरूप दिन की अवधि 0.002 सेकेण्ड प्रति शताब्दी की दर से बढ़ जाती है।

➤ पवनों व समुद्री धाराओं में विक्षेपण, दैनिक ज्वार-भाटा की स्थिति में परिवर्तन, ध्रुवों का चपटाकार स्वरूप, भूमध्य रेखा का उभार (Bulge) तथा उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव का गतिमान होना पृथ्वी के घूर्णन गति के कारण ही सम्भव होते हैं।

(2) परिक्रमण अथवा वार्षिक गति:-

        पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार मार्ग पर 365 दिन तथा 6 घंटे में एक परिक्रमा पूर्ण करती है। पृथ्वी की इस गति को परिक्रमण या वार्षिक गति कहते हैं।

➤ पृथ्वी के परिक्रमण पथ अर्थात् अंडाकार मार्ग को भू-कक्षा (Earth Orbit) कहते हैं।

➤ चूँकि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अण्डाकार कक्ष में घूमती है, इसीलिए पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी परिवर्तित होती रहती है। पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी 14.96 करोड़ किमी. है।

➤ एक वर्ष में एक बार पृथ्वी सूर्य से सबसे दूरस्थ बिन्दु पर तथा दूसरी बार सबसे निकटस्थ बिन्दु पर स्थित होती है।

नक्षत्र दिवस (Sidereal Day):-

     एक मध्याह्न रेखा के ऊपर किसी निश्चित नक्षत्र के लगातार दो बार गुजरने के बीच की अवधि को नक्षत्र दिवस कहते हैं। यह 23 घंटे, 56 मिनट व 4 सेकण्ड अवधि की होती है।

सौर दिवस (Solar Day):- 

     किसी निश्चित मध्याह्न रेखा के ऊपर से सूर्य के दो बार गुजरने की अवधि को सौर दिवस के नाम से जाना जाता है।

➤ जब सूर्य को गतिहीन मानकर पृथ्वी द्वारा उसके परिक्रमण की गणना दिवसों के रूप में की जाती है तब सौर दिवस प्राप्त होता है। इसकी अवधि पूरे 24 घंटे की होती है।

➤ औसत सौर दिवस, नक्षत्र दिवस से 3 मिनट 56 सेकेण्ड बड़ा होता है। इसका कारण यह है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर जब एक चक्कर पूरा करती है तो वह अपने कक्ष पर पूर्व की स्थिति से एक अंश आगे निकल जाती है। पृथ्वी की किसी निश्चित मध्याह्न रेखा को सूर्य के सम्मुख पुनः आने में कुछ अतिरिक्त समय लग जाता है।

लीप वर्ष:-
       पृथ्वी एक वर्ष या 365 दिन 6 घण्टे में सूर्य का एक चक्कर लगाती है। हम लोग एक वर्ष 365 दिन का मानते हैं तथा सुविधा के लिए 6 घंटे को इसमें नहीं जोड़ते हैं। चार वर्षों में प्रत्येक वर्ष के बचे हुए 6 घंटे मिलकर एक दिन यानी 24 घंटे के बराबर हो जाते हैं। इसके एक अतिरिक्त दिन को फरवरी के महीने में जोड़ा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी माह 28 के बदले 29 दिन का होता है। इस प्रकार ऐसा वर्ष जिसमें 366 दिन होते हैं उसे लीप वर्ष कहा जाता है। 

उपसौर (Perihelion):-

   पृथ्वी जब सूर्य के अत्यधिक पास होती है तो इसे उपसौर कहते हैं। ऐसी स्थिति प्रत्येक वर्ष 3 जनवरी को होती है।

➤ उपसौर के समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी 14.70 करोड़ किमी. होती है।

➤ उपसौर की दशा में पृथ्वी सूर्य से सामान्य दिनों की अपेक्षा 7 प्रतिशत अधिक सूर्यताप (Insolation) प्राप्त करता है।

➤ उपसौर की दशा में पृथ्वी का दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर होता है। इसीलिए यहाँ गर्मी थोड़ी बढ़ जाती है

➤ इस दशा में चूँकि उत्तरी गोलार्द्ध की दूरी अधिक होती है इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ने वाली गर्मी थोड़ी कम हो जाती है।

अपसौर (Aphelion):-

     पृथ्वी जब सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है तो इसे अपसौर कहते हैं। ऐसी स्थिति प्रत्येक वर्ष 4 जुलाई को होती है।

➤ अपसौर के समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की औसत दूरी 15.20 करोड़ किमी. होती है।

➤ अपसौर की दशा में पृथ्वी सूर्य से सामान्य दिनों की अपेक्षा 7 प्रतिशत कम सूर्यताप (Insolation) प्राप्त करता है।

➤ अपसौर की दशा में पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर होता है। इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में पड़ने वाली गर्मी थोड़ी कम हो जाती है।

➤ इस दशा में चूँकि उत्तरी गोलार्द्ध  की दूरी कम होती है इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ने वाली गर्मी थोड़ी अधिक हो जाती है।

Earth

एपसाइड रेखा:-

        उपसौरिक एवं अपसौरिक को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा सूर्य के केन्द्र से गुजरती है, इसे ही एपसाइड रेखा कहते हैं।

दिन और रात का छोटा व बड़ा होना

      विषुवतरेखीय भाग को छोड़कर विश्व के शेष सभी भागों में विभिन्न ऋतुओं में दिन और रात की अवधि में अंतर पाया जाता है। विषुवत रेखा पर सदैव दिन और रात की अवधि बराबर होती है, क्योंकि इसे प्रकाश वृत्त सदैव दो बराबर भागों में बाँटता है। अतः विषुवत रेखा का आधा भाग प्रत्येक स्थिति में सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है।

➤ ग्लोब पर वह वृत्त जो दिन तथा रात को विभाजित करता है उसे प्रदीप्ति वृत्त कहते हैं।

पृथ्वी पर दिन और रात की स्थिति

     उत्तरी गोलार्द्ध 21 मार्च से 23 सितम्बर की अवधि के दौरान सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहाँ दिन बड़े एवं रातें छोटी होती हैं। हम जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। इस समय उत्तरी ध्रुव पर दिन की अवधि छः महीने की होती है और दक्षिणी ध्रुव पर छः महीने की रात होती है।

     दक्षिणी गोलार्द्ध 23 सितम्बर से 21 मार्च की अवधि के दौरान सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। हम जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है जबकि उत्तरी ध्रुव पर इस समय छः महीने की रात रहती है।

सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी कि स्थिति

उत्तर अयनांत (Summer Solstice):–
       21 जून को विषुवत वृत के उत्तरी भाग में सबसे लंबा दिन तथा सबसे छोटी रात होती है। ठीक इसके विपरीत इसी दिन दक्षिणी गोलार्ध में सबसे लंबी रात एवं छोटी दिन होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को उत्तर अयनांत कहते है।  
दक्षिण अयनांत (Winter Solstice) :-
       22 दिसंबर को विषुवत वृत के दक्षिणी भाग में सबसे लंबा दिन तथा सबसे छोटी रात होती है।ठीक इसके विपरीत इसी दिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबी रात एवं छोटी दिन होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को दक्षिण अयनांत कहते है। 
विषुव-
       21 मार्च एवं 23 सितंबर को सूर्य की किरणें  विषुवत वृत्त पर सीधी पड़ती है। इस अवस्था में कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर नहीं झुका रहता है, इसलिए पूरी पृथ्वी पर रात एवं दिन बराबर होते हैं। इसे विषुव कहा जाता है।
       23 सितंबर को उत्तरी गोलार्ध में शरद ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में बसंत ऋतु होती है। 21 मार्च को स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है क्योंकि इस दिन उत्तरी गोलार्ध में बसंत ऋतु तथा दक्षिणी गोलार्ध में शरद ऋतु होती है। 

21 जून की स्थिति

➤ 21 मार्च व 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत होती हैं। 21 मार्च के बाद सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-साथ उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि में भी वृद्धि होने लगती है व ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है।

➤ 21/22 जून तक सूर्य कर्क रेखा के लम्बवत स्थिति में आ जाता है। इस स्थिति को कर्क संक्रान्ति या ग्रीष्म अयनांत कहते हैं।

➤ 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़ा (सर्वाधिक अवधि वाला) तथा रात्रि छोटी (न्यूनतम अवधि वाली) होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है। 21 जून के पश्चात् 23 सितम्बर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है।

22 दिसम्बर की स्थिति

➤ 22 दिसम्बर को दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर तथा उत्तरी गोलार्द्ध विपरीत दिशा में स्थित होता है। इस तिथि को सूर्य मकर रेखा (Tropic of Capricorn) पर लम्बवत् चमकता है। इस स्थिति को मकर संक्राति या शीत अयनांत (Winter Solstice) कहते हैं। इस तिथि को दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़ा (सर्वाधिक अवधि वाला) तथा रातें छोटी (न्यूनतम अवधि वाली) होती हैं।

➤ इस दौरान दक्षिणी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब अर्थात् ग्रीष्म ऋतु होती है। इसके विपरीत उत्तरी गोलार्द्ध में इस समय उच्च वायुदाब अर्थात् शीत ऋतु होती है, क्योंकि कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य भाग से होकर गुजरती है। इसीलिए इस समय उत्तर-पश्चिम भारत में उच्च वायुदाब का केन्द्र विकसित होता है।

➤ वस्तुतः सूर्य के दक्षिणायन होने अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध की ओर उन्मुख होने की प्रक्रिया 23 सितम्बर के पश्चात् प्रारंभ हो जाती है, जिससे दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी होने लगती हैं। इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में इसके विपरीत स्थिति देखी जाती है। 22 दिसम्बर के उपरान्त 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है।

21 मार्च व 23 सितम्बर की स्थितियाँ

➤ इन दोनों स्थितियों में सूर्य की किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत् पड़ती हैं। इसलिए इस समय सभी अक्षांश रेखाओं का आधा भाग सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है। और सर्वत्र दिन व रात की अवधि समान होती है।

➤ इन तिथियों में दिन व रात की अवधि के समान रहने एवं ऋतु की समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को विषुव अथवा सम रात-दिन (Equinox) कहा जाता है।

➤ 21 मार्च की स्थिति को बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) एवं 23 सितम्बर वाली स्थिति को शरद विषुव (Autumnal Equinox) कहा जाता है।

➤ जब सूर्य अण्डाकार (Ecliptic) कक्ष के सहारे वसन्त विषुव (Vernal Equinox) या शरद विषुव (Autumnal Equinox) की दिशा में होता है तो इसका दिक्पात (Declination) शून्य होता है। उस समय पृथ्वी के सभी स्थानों पर दिन व रात 12 घण्टे के होते हैं।

➤ यदि पृथ्वी का अक्ष, कक्ष तल (Orbital Plane) के समकोण पर होता तो पृथ्वी पर ऋतुओं का परिवर्तन नहीं होता। प्रत्येक अक्षांश पर रहने वाले मनुष्य वर्ष भर एक ही प्रकार की ऋतु की अनुभव करते। भूमध्यरेखा के आस-पास के प्रदेश में सदैव ग्रीष्म ऋतु तथा ध्रुवों के पास सदैव शीत ऋतु का अनुभव होता।

➤ उत्तरी ध्रुव पर 6 महीने का दिन वसन्त विषुव (Vernal Equinox) से प्रारम्भ होता है तथा 6 महीने की रात शरद विषुव (Autumnal Equniox) के साथ प्रारम्भ होती है। ऐसी दशा दक्षिणी गोलार्द्ध में भी पायी जाती है।



पृथ्वी की गतियाँ से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. पृथ्वी पर दिन तथा रात्रि चक्र किसके कारण होता है?

[A] पृथ्वी का घूर्णन
[B] पृथ्वी का परिक्रमण
[C] पृथ्वी का घूर्णन तथा परिक्रमण दोनों
[D] इनमें से कोई नहीं

2. पृथ्वी अपनी धुरी के चारों तरफ किस दिशा में घूमती है?

[A] पूर्व से पश्चिम
[B] पश्चिम से पूर्व
[C] उत्तर से दक्षिण
[D] दक्षिण से पूर्व

3. अपने अक्ष पर पृथ्वी एक चक्कर कितने समय में पूरा करती है?

[A] 23 घंटे 30 मिनट
[B] 23 घंटे 56 मिनट 4.9 सेकंड
[C] 23 घंटे 10 मिनट 2 सेकंड
[D] 24 घंटे

4. पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में लगते हैं लगभग-

[A] 365.25 दिन
[B] 365 दिन
[C] 365.50 दिन
[D] 365.75 दिन

5. पृथ्वी की परिक्रमण धुरी (ध्रुवीय धुरी) सदा झुकी होती है:

[A] दीर्घवृत्तीय धुरी से 23.1° पर
[B] दीर्घवृत्तीप धुरी से 23.00 पर
[C] दीर्घवृत्तीय पुरी से 24.5° पर
[D] दीर्घवृत्तीय धुरी से 23.5° पर

6. अपने परिक्रमा पथ में पृथ्वी लगभग किस माध्य वेग से सूर्य के चक्कर लगाती है?

[A] 30 km/s
[B] 40 km/s
[C] 50 km/s
[D] 20 km/s

7. परिक्रमण करती हुई पृथ्वी या एक ग्रह की अपने कक्ष में सूर्य से अधिकतम दूरी को क्या कहा जाता है-

[A] उपसौर
[B] अपसौर
[C] अपोजी
[D] पेरिजी

8. पृथ्वी, सूर्य से अपनी अधिकतम दूरी पर होती है-

[A] 30 जनवरी को
[B] 22 दिसंबर को
[C] 22 सितंबर को
[D] 4 जुलाई को

9. परिक्रमण करती हुई पृथ्वी या एक ग्रह की अपने कक्ष में सूर्य से न्यूनतम दूरी को क्या कहा जाता है-

[A] उपसौर
[B] अपसौर
[C] अपोजी
[D] पेरिजी

10. पृथ्वी की उपसौर (Perihelion) स्थिति किस महीने में होती है?

[A] जून
[B] जनवरी
[C] सितंबर
[D] मार्च

11. किस दिन पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है?

[A] 23 सितंबर
[B] 3 जनवरी
[C] 4 जुलाई
[D] 21 मार्च

12. पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, इस सिद्धांत को पेश करने वाले प्रथम व्यक्ति कौन थे?

[A] अल्बर्ट आइंस्टीन
[B] गैलीलियो
[C] कॉपरनिकस
[D] न्यूटन

13. यह किसने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया कि सूर्य हमारे सौर मण्डल का केन्द्र है, और पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है?

[A] गैलीलियो
[B] न्यूटन
[C] पाणिनी
[D] कॉपरनिकस

14. निम्नलिखित में से यह किसका मत था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है?

[A] ब्रह्मगुप्त
[B] आर्यभट्ट
[C] वराहमिहिर
[D] उपर्युक्त में से कोई नहीं

15. पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के लिए लगने वाले समय की गणना करने वाले प्रथम भारतीय भूगोलशास्त्री कौन थे?

[A] आर्यभट्ट
[B] वेद भटनागर
[C] भास्कराचार्य
[D] बिशु देवतामापी

16. पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा कर रहा कृत्रिम उपग्रह इसलिए पृथ्वी पर नीचे नहीं गिरता क्योंकि पृथ्वी का आकर्षण-

[A] चंद्रमा के आकर्षण से निष्क्रिय हो जाता है
[B] उतनी दूरी पर अस्तित्वहीन होता है
[C] उसकी नियमित चाल के लिए आवश्यक गति प्रदान करता है
[D] उसकी गति के लिए आवश्यक त्वरण प्रदान करता है

17. प्रदीप्ति का वृत्त पृथ्वी को कौन से दो गोलर्द्धों में विभाजित करता है?

[A] उत्तरी और दक्षिणी
[B] पूर्वी और पश्चिमी
[C] दिन और रात
[D] ग्रीष्म और शीत

18. इक्विनोक्स (Equinox)/विषुव होता है जब-

[A] दिन और रात बराबर होते हैं 
[B] एक वर्ष के दौरान सबसे छोटा दिन होता है
[C] एक वर्ष के दौरान सबसे बड़ा दिन होता है
[D] एक वर्ष के दौरान जब सबसे अधिक वर्षा होती है

19. विश्व के सभी अंगों में 23 सितंबर को दिन और रात की समान लंबाई को क्या कहते हैं?

[A] शरदकालीन विषुव
[B] खगोलीय विषुव
[C] शीतकालीन विषुव
[D] वसंतकालीन विषुव

20. दिन-रात जिस कारण होते हैं, वह है-

[A] भू-परिभ्रमण
[B] भू-परिक्रमण
[C] पृथ्वी के अक्ष का झुकाव
[D] 91 डिग्री पश्चिम

21. वह कौन-सी तिथि/तिथियों है, जब दोनों गोलर्द्धों (Hemispheres) में दिन और रात बराबर होते हैं?

[A] 22 दिसंबर
[B] 21 जून
[C] 21 मार्च एवं 23 सितंबर
[D] 21 जून एवं 22 दिसंबर

22. जब दिन और रात की अवधि बराबर होती है तो सूर्य की किरणें सीधी पड़ती है-

[A] भूमध्य रेखा पर
[B] उत्तरी ध्रुव पर
[C] दक्षिणी ध्रुव पर
[D] कर्क रेखा पर

23. अलग-अलग ऋतुओं में दिन-समय और रात्रि-समय के विस्तार में विभिन्नता किस कारण से होती है?

[A] पृथ्वी का, सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्तीय रीति से परिक्रमण
[B] पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन
[C] स्थान की अक्षांशीय स्थिति
[D] पृथ्वी का नत अक्ष पर परिक्रमण

24. निम्नलिखित तिथियों में से किसमें दोपहर को आपकी छाया (Shadow) सबसे छोटी होती है?

[A] मार्च 21
[B] दिसम्बर 25
[C] जून 22
[D] फरवरी 14

25. निम्नलिखित में से किस तिथि पर उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल अयनांत को देखा जाता है?

[A] 21 जून
[B] 5 अगस्त
[C] 18 जुलाई
[D] 19 दिसंबर

26. निम्नलिखित में से किस-किस तिथियों पर उत्तरी गोलार्द्ध में शीतकाल अयनांत को देखा जाता है?

I. 22 दिसंबर

II. 5 अगस्त

III. 10 जनवरी

[A] केवल I
[B] I तथा II दोनो
[C] केवल III
[D] केवल II

27. निम्नलिखित में से किस तिथि पर दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकालीन अयनांत (Summer solstice) को देखा जाता है?

[A] 22 दिसंबर
[B] 5 अगस्त
[C] 18 जुलाई
[D] 23 सितंबर

28. निम्नलिखित में से किस तिथि पर दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल अयनांत को देखा जाता है?

[A] 5 अगस्त
[B] 10 अगस्त
[C] 15 फरवरी
[D] 21 जून

29. 21 जून को शीतकालीन सोलस्टिस (अयनांत)…… गोलार्द्ध में होता है।

[A] उत्तरी
[B] पूर्वी
[C] पश्चिमी
[D] दक्षिणी

30. दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे बड़ा दिन है-

[A] 22 दिसम्बर
[B] 22 जून
[C] 21 मार्च
[D] 22 सितम्बर

31. दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है।

[A] 22 नवंबर
[B] 22 दिसंबर
[C] 22 मार्च
[D] 21 जून

32. उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन कौन-सा है?

[A] 21 मार्च
[B] 21 सितंबर
[C] 21 जून
[D] 21 अप्रैल

33. उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है।

[A] 22 नवंबर
[B] 22 दिसंबर
[C] 22 मार्च
[D] 22 जून

34. वर्ष का सबसे बड़ा दिन कौन-सा होता है?

[A] 21 जून
[B] 21 मई
[C] 22 दिसंबर
[D] 25 दिसंबर

35. कौन सी तिथि को सबसे छोटे दिन और सबसे लम्बी रात के रुप में जाना जाता है?

[A] 23 सितम्बर
[B] 3 जनवरी
[C] 22 दिसम्बर
[D] 24 सितम्बर

36. भारत निम्नलिखित में से किस गोलार्द्ध में स्थित है?

[A] उत्तरी और पूर्वी
[B] दक्षिणी और पूर्वी
[C] उत्तरी और पश्चिम
[D] उत्तरी और दक्षिणी

37. भारत में सबसे छोटा दिन कब होता है?

[A] 23 सितम्बर
[B] 22 दिसम्बर
[C] 23 जून
[D] 23 अप्रैल

38. निम्न में किस दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच सबसे कम दूरी होती है?

[A] 21 जून
[B] 22 दिसंबर
[C] 22 सितंबर
[D] 3 जनवरी

39. निम्नलिखित में से कौन-सा लीप वर्ष या अधिवर्ष था?

[A] 1100
[B] 1300
[C] 1900
[D] 2000

40. ‘मध्यरात्रि सूर्य’ का क्या अर्थ है?

[A] सांध्य प्रकाश
[B] उदीयमान सूर्य
[C] बहुत चमकदार चंद्रमा
[D] सूर्य का ध्रुवीय वृत्त में देर तक चमकना

41. निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में ‘मध्यरात्रि सूर्य’ को देखा जा सकता है?

[A] उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में
[B] उष्ण शीतोष्ण क्षेत्रों में
[C] आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में
[D] सूर्यग्रहण के समय कहीं भी

42. मध्य रात्रि का सूर्य इनमें से किस क्षेत्र में दिखायी देता है?

[A] भूमध्यसागरीय क्षेत्र में
[B] भूमध्यरेखीय क्षेत्र में
[C] आर्कटिक क्षेत्र में
[D] जापान से पूर्व में

43. सूची-1 को सूची-11 के साथ सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

सूची-I (घटना) सूची-II (दिनांक)

a. ग्रीष्म संक्रांति 1. 21 जून

b. शीत संक्रांति 2. 22 दिसम्बर

c. बसन्त विषुव 3. 23 सितम्बर

d. शरद विषुव 4. 21 मार्च

कूट :

[A] a-1, b-2, c-4, d-3
[B] a-1, b-4, c-2, d-3
[C] a-3, b-2, c-4, d-1
[D] a-3, b-4, c-2, d-1

44. सूर्य ग्रहण के समय, निम्नलिखित में से कौन मध्य में रहता है?

[A] पृथ्वी
[B] चंद्रमा
[C] सूर्य
[D] कोई अन्य ग्रह

45. सूर्य ग्रहण कब होता है?

[A] जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के बीच होता है
[B] जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के बीच होता है
[C] जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में होता है
[D] जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी को जोड़ने वाली रेखा पर नहीं होता है

46. प्रत्येक सूर्यग्रहण होता है-

[A] केवल अमावस्या के दिन
[B] केवल पूर्णिमा के दिन
[C] दोनों (A) तथा (B)
[D] न (A) न ही (B)

47. खग्रास (पूर्ण) सूर्यग्रहण केवल सीमित भू-क्षेत्र में ही दिखाई पड़ता है क्योंकि

[A] पृथ्वी की सतह सपाट नहीं है बल्कि उसमे उभार और अवनमन हे
[B] पृथ्वी के अनुप्रस्थ परिच्छेद की तुलना में पृथ्वी पर पड़ने वाली चंद्र की छाया का आकार छोटा होता है
[C] सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का तथा पृथ्वी के चारों ओर चंद्र का प्रक्षेप पथ पूर्णतः वृत्ताकार नहीं है
[D] वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य की किरणे चंद्रछाया के अधिकांश परिधीय क्षेत्र तक पहुँच सकती है

48. सूर्य या चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया कितने भाग में विभाजित हो जाती है?

[A] पांच भाग
[B] दो भाग
[C] चार भाग
[D] तीन भाग

49. हीरक बलप, ईश्वर की आँख और बेती के मनके, निम्नलिखित प्राकृतिक घटनाओं में से किस एक के हिस्से है?

[A] पूर्वीय ज्योति
[B] सूर्यग्रहण
[C] तड़ित
[D] सौर आँधी

50. हीरक वलय एक दृश्य है जिसे देखा जा सकता है-

[A] पूर्ण सूर्यग्रहण के अंत में
[B] पूर्ण सूर्यग्रहण के आरम्भ में
[C] केवल पूर्णता पथचिन्ह के परिधीय क्षेत्रों पर
[D] केवल पूर्णता पथचिन्ह के केंद्रीय क्षेत्रों पर

51. चन्द्रग्रहण तब होता है जबकि-

[A] सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी हो
[B] पृथ्वी व चन्द्रमा के बीच सूर्य हो
[C] सूर्य व पृथ्वी के बीच चन्द्रमा हो
[D] उक्त में से कोई भी अवस्था हो

52. चंद्र ग्रहण के समय, निम्नलिखित में से कौन मध्य में रहता है?

[A] पृथ्वी
[B] चंद्रमा
[C] सूर्य
[D] कोई अन्य ग्रह

53. कौन-सी परिस्थिति में चन्द्रग्रहण होता है-

[A] नव चन्द्र
[B] अर्द्ध चन्द्र
[C] पूर्ण चन्द्र
[D] उपर्युक्त में कोई नहीं

54. सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा कब आता है?

[A] चन्द्र ग्रहण
[B] सूर्य ग्रहण
[C] नक्षत्र दिन
[D] पूर्णिमा के दिन

55. ग्रहण के दौरान पड़ने वाली छाया का सबसे काला भाग-

[A] प्रभामंडल
[B] प्रच्छाया
[C] उपच्छाया
[D] ब्लैक होल

56. सिजिगी (syzygy) क्या है?

[A] सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की एक ही सीधी रेखा में स्थिति
[B] सूर्य तथा चंद्रमा के बीच पृथ्वी की स्थिति
[C] पृथ्वी के एक ही ओर सूर्य तथा चंद्रमा की स्थिति
[D] सूर्य और पृथ्वी से चंद्रमा की समकोणीय स्थिति

57. निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?

[A] युति-वियुति बिन्दु (सिजिगी) संयोजन सूर्यग्रहण का कारण है।
[B] सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा की 180° कोण की एक सीधी रेखा की स्थिति युति-वियुति बिन्दु (सिजिगी) कहलाती है।
[C] युति-वियुति बिन्दु प्रतिकूलता चन्द्र ग्रहण का कारण है।
[D] युति-वियुति बिन्दु संयोजन केवल उपसौर के समय होता है।

58. वसंत ज्वार तब आते हैं, जब

[A] चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी एक रेखा में होते हैं
[B] सूर्य पृथ्वी के सबसे निकट होता है
[C] चंद्रमा पृथ्वी से सबसे दूर होता है
[D] पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के साथ समकोण पर होता है

59. लघु ज्वार-भाटा होते हैं-

[A] प्रबल
[B] दुर्बल
[C] मध्यम
[D] अत्यंत प्रबल

60. बृहत ज्वार भाटा आता है-

[A] जब सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी से समकोण बनाते हैं।
[B] जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते है
[C] जब तेज हवा चलती है
[D] जब रात बहुत ठंडी होती है

61. सभी वृहत् ज्वारों में सबसे ऊँचा ज्वार किस समय घटित होता है?

[A] विषुव के साथ पूर्णिमा या अमावस्या
[B] दक्षिण अयनान्त के साथ पूर्णिमा या अमावस्या
[C] उत्तर अयनान्त के साथ पूर्णिमा या अमावस्या
[D] दक्षिण अयनान्त और वैसे ही उत्तर अयनान्त

62. अप्रत्यक्ष उच्च ज्वार उत्पन्न होने का कारण है-

[A] सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल
[B] चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल
[C] पृथ्वी का अपकेन्द्रीय बल
[D] पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

63. कथन I : ज्वार-भाटा, चंद्रमा और सूर्य के द्वारा लगने वाले गुरुत्वीय बल तथा पृथ्वी के घूर्णन के सम्मिलित प्रभावों के कारण समुद्री स्तरों में होने वाले उतार-चढ़ाव है।

कथन II : पृथ्वी, सूर्य के सापेक्ष 24 घंटे में एक बार पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है।

कूट:

[A] दोनों कथन व्यष्टितः सत्य है किन्तु कथन II, कपन I का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
[B] दोनों कथन व्यष्टितः सत्य है और कथन II, कथन I का सही स्पष्टीकरण है।
[C] कथन I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है।
[D] कथन I असत्य है, किन्तु कथन II सत्य है।

64. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. लघु ज्वार भाटा तब आती है जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य एक पंक्ति में होते हैं।

2. बृहत् ज्वार भाटा के दौरान तट के निकट जब तीव्र झंझा गुजरता है तो उच्च ज्वार पर, तरंगे ज्वारीय तरंगों का कारण बन सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

[A] केवल 2
[B] केवल 1
[C] 1 और 2 दोनों
[D] न तो 1 और ही 2

65. निम्न प्रश्न में दो वक्तव्य है, एक को कथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है, इन वक्तव्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण कर इन प्रश्नों का उत्तर नीचे दिए कूट की सहायता से चुनिए-

कूट:

कथन (A): लघु ज्वार-भाटाओं के समय उच्च ज्वार सामान्य से निश्तर तथा निम्न ज्वार सामान्य से उच्चतर होता है।

कारण (R): लघु ज्वार भाटा बृहत ज्वार-भाटा के विपरीत पूर्ण चन्द्र के स्थान पर नव चन्द्र के समय होता है।

[A] A और R दोनों सही है और R, A का सही स्पष्टीकरण है
[B] A तथा R. दोनों सही है परन्तु R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है
[C] A सही है, परन्तु R गलत है
[D] A गलत है, परन्तु (R) सही है

66. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. चंद्र समकोण स्थिति में लघु भाटा आता है।

2. चंद्र समकोण स्थिति के दौरान ज्वार भाटा उत्पन्न करने वाले बल एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/है?

[A] केवल 2
[B] केवल 1
[C] 1 और 2 दोनों
[D] न तो 1 और न ही 2

67. महासागरों और समुद्रों में ज्वार-भाटाएँ किसके/किनके कारण होता/होते हैं?

1. सूर्य का गुरुत्वीय बल

2. चन्द्रमा का गुरुत्वीय बल

3. पृथ्वी का अपकेन्द्रीय बल

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

[A] केवल 2 और 3
[B] केवल 1
[C] केवल 1 और 3
[D] 1, 2 और 3

68. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

 सूची-I (जननिक अवस्थाएँ) सूची-II (परिणामी ज्वारभाटा)

a. सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी से 1. बृहत् ज्वार-भाटा समकोण पर है

b. सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी सरल 2. लघु ज्वार-भाटा रेखा में है

c. चन्द्रमा पृथ्वी के समीपतम है 3. अपभू ज्वार-भाटा

d. चन्द्रमा पृथ्वी से सबसे अधिक 4. भूमिनीच ज्वार-भाटा दूरी पर है।

कूट:

[A] a-2, b-4, c-1, d-3
[B] a-2, b-1, c-4, d-3
[C] a-3, b-4, c-1, d-2
[D] a-3, b-1, c-4, d-2

69. ‘ब्लू मून’ परिघटना होती है जब-

[A] एक ही कैलेण्डर वर्ष में दो लगातार माहों में चार पूर्णिमाएँ हो
[B] एक ही माह में दो पूर्णिमा हो
[C] एक ही केलंण्डर वर्ष में तीन बार एक ही माह में दो पूर्णिमाएँ हो
[D] उपरोक्त कोई नहीं

70. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की जलवायु सामान्यतः गर्म होती है, क्योंकि ये …… क्षेत्र के आसपास स्थित होते हैं।

[A] ध्रुव
[B] दक्षिणी गोलार्द्ध
[C] अधिक ऊंचाई
[D] भूमध्य रेखा

71. ग्रह गति का केप्लर नियम बताता है कि कालावधि का वर्ग….. के बराबर है।

[A] अर्ध दीर्घ अक्ष
[B] अर्ध दीर्घ अक्ष के वर्ग
[C] अर्ध दीर्घ अक्ष के घन
[D] अर्ध दीर्घ अक्ष की चौथी के समानुपाती

72. मौसम बदलने का क्या कारण है?

[A] पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना
[B] पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना (चक्कर लगाना) एवं सूर्य के चारों ओर घूमना (चक्कर लगाना)
[C] पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना व अपने अक्ष पर झुका होना
[D] पृथ्वी का अपनी धूरी पर चक्कर लगाना व अपने अक्ष पर झुका होना

73. मौसम-परिवर्तन पृथ्वी की गति की किस विशिष्टता से होता है-

[A] पुरी पर 23½ अंश का झुकाव
[B] सूर्य के चारों ओर परिक्रमा
[C] ऊपर बताये गये (A) व (B) का सम्मिलित प्रभाव
[D] अपनी धुरी पर घूमना

74. निम्नलिखित में से किसने सबसे पहले यह कहा था कि पृथ्वी गोलाकार है?

[A] कोपरनिकस
[B] अरस्तु
[C] टॉलमी
[D] स्ट्रेबो

75. निम्नलिखित में से किसने सुझाया था कि पृथ्वी का धुरी पर अवस्था बदलना जलवायु परिवर्तन के लिए एक कारक है?

[A] मिलुटिन मिलन कोलिच
[B] रॉबर्ट एक
[C] जॉर्ज सिम्पसन
[D] टी. सी. चैम्बरलिन

76. निकोलस कोपरनिकस प्रसिद्ध है?

[A] यह बताने के लिए कि ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं न कि पृथ्वी के
[B] दूरबीन के आविष्कार के लिए
[C] केलकुलस (Calculus) की खोज के लिए
[D] मानव शरीर को शल्प क्रिया का अध्ययन करने के लिए

77. निम्न में से कौन जलवायु परिवर्तन के खगोलीय सिद्धान्तों से सम्बन्धित नहीं है?

[A] पृथ्वी की पूर्णन अक्ष की तिर्यकता (झुकाव)
[B] पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रता (अण्डाकार कक्षीय मार्ग)
[C] विषुव अयन (पृथ्वी की सूर्य से अपसौर या उपसौर की स्थिति)
[D] सौर किरणित ऊर्जा (सौर विकिरण)

78. पृथ्वी अपने कक्ष में लगभग 4400 किमी. प्रति घंटा की गति से घूमती है। इस तेज गति को हम अनुभव क्यों नहीं करते हैं?

[A] अपने कक्ष में पृथ्वी की गति की अपेक्षा में हमारी गति शून्य है।
[B] पृथ्वी के आकार की अपेक्षा में हम बहुत छोटे है।
[C] सम्पूर्ण सूर्य मंडल भी चलायमान है।
[D] पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण निरन्तर हमें पृथ्वी के केन्द्र की ओर खींचता है।

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