21. Primary Economic Activities of Humans (मनुष्य की प्राथमिक आर्थिक गतिविधियाँ)

Primary Economic Activities of Humans

(मनुष्य की प्राथमिक आर्थिक गतिविधियाँ)



Q. मानव के प्राथमिक व्यवसायों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

Primary Economic Activities

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएं करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसी आर्थिक क्रियाएं सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएं करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

        मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:-

1.  प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation)

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation)

3. तृतीयक (Tertiary Occupation)

4.  चतुर्थक  व्यवसाय (Quaternary Occupation)

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):

      प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना, घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख व्यवसाय हैं।

    विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत हैं। भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है। मानव के प्रमुख प्राथमिक व्यवसायों का विवरण निम्नानुसार है:-

(i) आखेट, एकत्रीकरण या संग्रहण:-

    विश्व के कुछ प्रदेशों में आज भी लोग आखेट, संग्रहण या एकत्रीकरण जैसी आर्थिक क्रियाओं द्वारा अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। उष्ण कटिबन्धीय वनों में रहने वाले अफ्रीका के पिग्मी, मलेशिया के सेमांग, कालाहारी मरुस्थल के बुशमैन, आस्ट्रेलिया के मरुस्थल में रहने वाले आदिम लोग, उत्तरी ध्रुवीय प्रदेशों में रहने वाले एस्किमो एवं लैप्स लोग इस प्रकार की आर्थिक क्रियाओं में संलग्न हैं।

     ये लोग अपने आस-पास के पर्यावरण पर पूर्णतया आश्रित होते हैं। ये लोग अपने भोजन के लिए पौधों से विभिन्न प्रकार के फल, जड़ें और पत्तियाँ एकत्रित करते हैं। ये इन पदार्थों की खोज में इधर-उधर घूमते रहते हैं। पशु-पक्षियों के आखेट तथा झीलों और नदियों में मछली पकड़कर ये लोग अपनी भोजन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। आखेट के लिए ये भाले और धनुष-बाण जैसे साधारण हथियारों का प्रयोग करते हैं।

     अपनी वस्त्र और मकान सम्बन्धी आवश्यकता पूर्ति के लिए ये लोग अपने आस-पास के पर्यावरण में उपलब्ध सामग्री उपयोग में लाते हैं। इन लोगों को अपने प्राकृतिक आवास की पूरी जानकारी होती है, क्योंकि इनकी सभी आवश्यकताएं स्थानीय पर्यावरण से ही पूरी होती हैं।

     उष्ण कटिबन्धीय वनों में रहने वाले लोग साधारण पैमाने पर जीविकोपार्जन हेतु और निर्यात के लिए वाणिज्यिक संग्रहण का कार्य करते हैं। इसके लिए ये चिकिल रस (इसका उपयोग चिविंग गम बनाने में किया जाता है), बलाता (इसका उपयोग समुद्री केविल, गोल्फ की गेंद का खोल बनाने में किया जाता है), नट (गिरी फल), रेशों, जड़ी-बूटियों, लाख, गोंद, आदि संग्रहण करते हैं।

(ii) पशुपालन:-

     आखेट और संग्रहण युग के बाद पशुपालन युग का प्रारम्भ हुआ। इस युग में विभिन्न पर्यावरण में रहने वाले लोगों ने विभिन्न प्रकार के पशुओं को पालतु बनाया। उदाहरण के लिए सवाना घास भूमियों में गाय-बैल, मरुस्थलों में ऊंट, स्टेपी घास भूमियों में भेड़, टुण्डा प्रदेशों में रेण्डियर, एण्डीज के पर्वतीय प्रदेशों में तामा और अल्पाका तथा तिब्बत एवं हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में याक, आदि पशुओं को पालतू बनाया गया। इन पालतू पशुओं से मानव को दूध, मांस, ऊन और खालों की प्राप्ति होती है। इनसे मानव की भोजन, वस्त्र और अन्य अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

     चलवासी पशुपालक अपने पालतू पशुओं के लिए चारे और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। प्रत्येक चलवासी जाति एक निश्चित क्षेत्र में रहती है तथा उन्हें अपने उस क्षेत्र में चारागाहों और जल की आपूर्ति के स्रोत क्षेत्रों तथा ऋतुओं के अनुसार होने वाले परिवर्तनों की पूरी जानकारी होती है।

      सहारा मरुस्थल, पूर्वी अफ्रीका के तटीय भाग, सऊदी अरब, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, चीन, मंगोलिया के शुष्क भाग, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका, मालागासी के पश्चिमी भाग तथा यूरेशिया के दुण्ड्रा के दक्षिणी सीमान्त पर स्थित क्षेत्रों में चलवासी पशुपालन होता है।

      पूर्वी अफ्रीका के मसाई, नाइजीरिया के फुलानी, सहारा मरुस्थल में बद्दू, मध्य एशिया में खिरगीज लोग चतवासी पशुपालन में संलग्न हैं। इन क्षेत्रों में जलवायु उष्ण एवं शुष्क है। यहाँ घास छोटी एवं विरल होती है जो ग्रीष्म ऋतु में सूख भी जाती है। इन क्षेत्रों में प्रति इकाई भूमि की वहन क्षमता कम होती है। ये पशुपालक अपने पशुओं के साथ चारागाहों की खोज में घूमते रहते हैं। ये लोग तम्बुओं में रहते हैं और कठोर जीवन व्यतीत करते हैं।

     पर्वतीय प्रदेशों में चरवाहे ग्रीष्म ऋतु में अपने पशुओं को चराने के लिए अधिक ऊंचे स्थानों पर ले जाते हैं और शीत ऋतु में घाटियों में उतर आते हैं। इस प्रकार अपने पशुओं के साथ पशुपालकों के ऋतुओं के अनुसार प्रवास को ऋतु प्रवास (Transhumance) कहते हैं। उदाहरण के लिए हिमालय के पर्वतीय प्रदेश के गुज्जर, गद्दी, बकरवाल और भोटिया ऋतु प्रवास करते हैं।

     इसी प्रकार दुण्डा प्रदेश के लैप्स चरवाहे ग्रीष्म ऋतु में उत्तर की ओर तथा शीत ऋतु में दक्षिण में कोणधारी वनों की ओर प्रवास करते हैं।

    वर्तमान में चलवासी पशुचारण क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना हो जाने से लोग अब उद्योगों के पास पक्के मकानों में रहने लगे हैं। इसी प्रकार दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में चलवासी पशुचारण का स्थान व्यापारिक पशुपालन ने ले लिया है। किरगीजस्तान, कजाखस्तान और उजबेकिस्तान में चलवासी पशुचारण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध कराके कपास की कृषि की जाने लगी है।

    आधुनिक युग में पशुपालन वैज्ञानिक तरीकों से व्यापारिक आधार पर हो रहा है। उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र, ब्राजील का पठारी भाग और अर्जेण्टीना में विस्तृत पम्पास घास स्थल, वेनेजुएला का लानोस घास स्थल, दक्षिणी अफ्रीका का वेल्ड क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की शीतोष्ण घास भूमि, कैम्पियन सागर के पूर्व तथा अरल सागर के उत्तर के विस्तृत भाग व्यापारिक पशुपालन के उल्लेखनीय क्षेत्र हैं।

     व्यापारिक पशुपालन उद्योग पूर्णतया प्राकृतिक चारागाहों पर आश्रित नहीं है। विस्तृत क्षेत्रों में चारे की फसलों और पौष्टिक घासों की खेती की जाती है। पशुओं को सुख-सुविधा सम्पन्न बाड़ों में रखकर खिलाया-पिलाया जाता है। विशेष नस्ल के पशु पाले जाते हैं, जिनकी दूध या मांस उत्पादन क्षमता अत्यधिक होती है। पशुओं के प्रजनन, नस्ल सुधार, रोगों की रोकथाम तथा बीमार पशुओं के इलाज, आदि की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

     पशुओं को बड़े-बड़े बाड़ों में रखा जाता है। इनमें मांस के लिए पशु पाले जाते हैं। डेनमार्क तथा न्यूजीलैण्ड में बड़े पैमाने पर दुग्ध व्यवसाय होता है। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में भेड़ ऊन तथा मांस के लिए व्यापारिक स्तर पर पाली जाती हैं।

    व्यापारिक पशुचारण में लोगों को प्रवास नहीं करना पड़ता है। वे एक ही स्थान पर रहते हैं। चारे की फसलों की खेती तथा दूध और मांस से संसाधित पदार्थ बनाने के लिए मशीनों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इन संसाधित पदार्थों का बाजार अन्तर्राष्ट्रीय है।

(iii) लकड़ी काटना:-

    लकड़ी काटने के व्यवसाय का व्यापारिक स्तर पर विकास मुलायम लकड़ी के वृक्षों वाले शंकुधारी वन प्रदेशों में हुआ है। इमारती लकड़ी, लुग्दी, कागज तथा कृत्रिम रेशे बनाने के लिए वनों से लाखों पेड़ काटे जाते हैं। स्वीडन, फिनलैण्ड्स, रूस, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका के विस्तृत क्षेत्रों में शंकुधारी वन हैं। इन देशों के इन वनों में लकड़ी काटने का काम व्यापारिक स्तर पर होता है।

      पेड़ काटने तथा ल‌ट्ठे ढोने के लिए मशीनों का उपयोग होता है। चिराई के कारखाने लकड़ी के ल‌ट्ठों को संसाधित करके लुग्दी और कागज बनाते हैं। इन प्रदेशों में काटे गए पेड़ों के स्थान पर नए पेड़ लगाने का कार्य साथ-साथ चलता रहता है। इन प्रदेशों में परिवहन की पर्याप्त सुविधाएं हैं। बड़ी मात्रा में लुग्दी, कागज और अखबारी कागज संसार के अनेक देशों को निर्यात किया जाता है।

     उष्ण और उपोष्ण कटिबन्धीय वनों में लकड़ी काटने का व्यवसाय कुछ सुगम्य क्षेत्रों तक ही सीमित है। सागौन, महोगनी, चंदन और रोजवुड के वृक्ष उष्ण कटिबन्धीय वनों में तथा बीच, वर्थ, मैपिल और ओक के वृक्ष मध्य अक्षांशीय वनों में मिलते है। इनका उपयोग इमारते तथा कर्नीचर बनाने में किया जाता है।

     भारत, चीन तथा अफ्रीका के घने बसे कुछ देशों में जलाऊ लकड़ी तथा काठ-कोयले की मांग को पूरा करने के लिए पेड़ों, झाड़ियों तथा दूसरे पौधों का सफाया हो चुका है। इन प्रदेशों में काटे गए पेड़-पौधों के स्थान पर नए पेड़ न लगाने के कारण मिट्टी का अपरदन और बाढ़ों की आवृत्ति बढ़ी है।

(iv) मत्स्य ग्रहण:-

     मध्य अक्षांशों के तटीय प्रदेशों में मछली पकड़ने का काम व्यापारिक स्तर पर विकसित हो चुका है। शक्ति चालित नावों तथा जलपोतों के द्वारा मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। बड़े-बड़े जहाज तैरते हुए कारखानों का काम करते है जिनमें पकड़ी हुई मछलियों को संसाधित करके डिब्बों में पैक कर दिया जाता है। जहाजों में बने प्रशीतकों की सुविधा के कारण मछलियों को संसार के अनेक देशों में निर्यात किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ग्रेट ब्रिटेन, जापान तथा नार्वे में व्यापारिक मत्स्य ग्रहण बड़े पैमाने पर विकसित हो गया है।

(v) खनन:-

     भू-गर्भ में से खनिजों को निकालने की क्रिया को खनन कहते हैं। खनिजों की उपलब्धता वाले क्षेत्रों को खान क्षेत्र कहते हैं। खनिज प्रकृति में पाए जाने वाले वे जड़ पदार्थ हैं जो रासायनिक तत्व भी हो सकते हैं और यौगिक भी। पृथ्वी पर खनिजों का वितरण असमान है। अधिकांश खनिज नवीकरण के योग्य नहीं हैं।

     कोई भी देश खनिजों की उपलब्धता की दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं है। खनिजों के व्यापारिक दोहन को अयस्क की मांग, अयस्क की गुणवत्ता, भू-वैज्ञानिक दशाएं, खान की गहराई तथा पहुंच की दृष्टि से खानों की सुगम्यता, उपलब्ध प्रौद्योगिकी, आवश्यक पूंजी की उपलब्धता, श्रमिकों की आपूर्ति, आदि कारक प्रभावित करते हैं। खनन का कार्य शुरू होने से परिवहन की सुविधाओं का विकास होने लगता है तथा उस क्षेत्र में लोग बसने के लिए आने लगते हैं।

     अयस्कों के बेनीफिसीएशन संयन्त्र या तो खानों के समीप स्थापित होते हैं या फिर उपभोक्ता केन्द्रों के निकट स्थापित होते हैं। पेट्रोलियम से प्राप्त अनेक प्रकार के उत्पादों के परिवहन की तुलना में अशुद्ध पेट्रोलियम का परिवहन सस्ता पड़ता है। अतः तेल शोधनशालाएं बन्दरगाहों के समीप या उपभोक्ता केन्द्रों के समीप स्थापित की जाती हैं।

       खनन तथा उससे जुड़े व्यवसायों में लगे लोगों की संख्या में प्रतिवर्ष परिवर्तन होता रहता है। इस परिवर्तन के अनेक कारण है, जैसे एक खान के बन्द होने के बाद दूसरी खान का प्रारम्भ होना, अयस्क का लागत मूल्य, अयस्क की मांग, अन्य देशों में नए निक्षेपों की खोज, आदि। अनेक देशों की अर्थव्यवस्था में खनिजों का उत्पादन उल्लेखनीय स्थान रखता है। बोत्सवाना, अजरबेजान, गेबन, कजाखस्तान, चिली, पश्चिमी सहारा, जाम्बिया, आदि कुछ ऐसे देश हैं जिनके कुछ निर्यात मूल्य में 90 प्रतिशत तक भाग खनिजों का होता है।

(vi) कृषि:-

    कृषि एक बहुप्रचलित व्यवसाय है। कृषि के लिए सबसे पहले भूमि से वनस्पति को साफ करना पड़ता है। इसके बाद जुताई करके, चुने हुए पौंधों की खेती की जाती है। जिनसे मानव की भोजन, रेशों या अन्य उत्पादों की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

     कृषि के सबसे प्राचीन रूप को स्थानान्तरी कृषि कहते हैं। स्थानान्तरी कृषि अधिकतर उष्ण कटिबन्धीय वनों में रहने वाले लोगों द्वारा की जाती है। वे वनों में पेड़-पौधों को काटकर जला देते हैं। इस प्रकार वन भूमि साफ हो जाती है। वे कुदाल की मदद से रतालू, मैनिआक, टैपिओका, आदि जड़ वाली फसलें उगाते हैं।

     वन भूमि के साफ किए गए भागों को दो या तीन साल तक खेती करने के बाद परती भूमि के रूप में छोड़ दिया जाता है और अन्यत्र वन भूमि का दूसरा टुकड़ा साफ कर कृषि की जाती है। स्थानान्तरी कृषि की इस प्रक्रिया में मूल वनों का स्थान कम घने वन ले लेते हैं। इस प्रकार की कृषि में एक छोटे से समुदाय के निर्वाह के लिए विशाल क्षेत्र की आवश्यकता होती है। उत्तर-पूर्वी भारत की जनजातियाँ, मलेशिया के सेमांग तथा अमेजन बेसिन की जनजातियाँ स्थानान्तरी कृषि करती हैं।

     मानव सभ्यता के विकास में स्थायी कृषि एक महत्वपूर्ण चरण था। इससे स्थाई बस्ती बसाने को प्रोत्साहन मिला, क्योंकि आसपास ही खेतों में वर्ष भर काम रहता था। प्रत्येक ऋतु में चुनी हुई फसलों की खेती करने के लिए ऋतुओं की दशाओं का सावधानीपूर्वक अध्ययन जरूरी था। भूमि को साफ करने, मिट्टी की जुताई, उपलब्ध जल का सावधानीपूर्वक सिंचाई द्वारा उपयोग तथा फसल काटने के लिए गांव में रहने वाले लोगों का सहयोग आवश्यक हो गया था।

       अतिरिक्त भोजन सामग्री उपलब्ध होने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई। फसलों से प्राप्त भूसे तथा पुआल, आदि से पालतू पशुओं को चारा मिल जाता था। पशुओं का खेतों की जुताई तथा कृषि के अन्य कार्यों में उपयोग किया जाता था। इस प्रकार एक प्रभावशाली संगठन बन गया।

      अतिरिक्त खाद्यान्न उन लोगों के हिस्से में आता था जो समुदाय की किसी न किसी रूप में सेवा करते थे। पहिए की खोज के बाद पशुओं को गाड़ी खींचने के काम में लाया जाने लगा। अतिरिक्त खाद्यान्न को अन्य उत्पादों से बदलने के लिए गाड़ियों में लाद कर बाहर ले जाया जाने लगा। सड़कों के निर्माण से विभिन्न समुदाय सम्पर्क में आने लगे, विचारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ।

     कृषि का प्रारम्भ निर्वाह कृषि के रूप में हुआ, क्योंकि इससे स्थानीय समुदाय की आवश्यकताएं तुरन्त पूरी हो जाती थी। पिछले 125 वर्षों में परिवहन तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास के साथ-साथ कृषि में विशिष्टीकरण हो गया है। अधिकतर कृषि कार्यों में मशीनों का प्रयोग करके, विशाल क्षेत्रों में एक फसल की खेती विशेष रूप से होने लगी है।

    दूसरे देशों को निर्यात करने के लिए फसल विशेष की कृषि जैसे- कपास, मक्का, गेहूँ, आदि बड़े पैमाने पर होने लगी है। इस प्रकार की कृषि को व्यापारिक कृषि कहते हैं।

    रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है। रोपण कृषि के अन्तर्गत सैकड़ों हेक्टेअर भूमि में कहवा, चाय, मसाले, रबड़, आदि की फसलें पैदा की जाती हैं। इन फसलों को मुख्य रूप से निर्यात के लिए ही पैदा किया जाता है। निर्यात से पूर्व इन फसलों को बड़े-बड़े कारखानों में संसाधित किया जाता है। रोपण कृषि में भारी मात्रा में पूंजी का निवेश होता है तथा इसमें बड़ी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता होती है। रोपण कृषि भारत, श्रीलंका, मलेशिया, आदि देशों के कुछ भागों में की जाती है।

     मिश्रित कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका तथा न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

     ट्रक फार्मिंग एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि नगरीय क्षेत्रों के समीप की जाती है।

     उद्यान कृषि के अन्तर्गत नगरीय उपभोग केन्द्रों के समीपवर्ती क्षेत्रों में फल और फूलों की कृषि की जाती है।

    आधुनिक कृषि के अन्तर्गत कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है।

    विस्तृत कृषि, व्यापारिक कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग कृषि, उद्यान कृषि आदि आधुनिक ढंग से की जाती है।

MCQs/UGC NET/JRF Quick Revision

1. मानव की आर्थिक क्रियाओं में क्षेत्रीय विभिन्नता का सबसे उपयुक्त कारण कौन-सा है?

Which best explains regional variation in human economic activities?

(A) केवल जनसंख्या का आकार / Population size only

(B) भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण की क्षेत्रीय विभिन्नता / Regional variation in physical and social environment

(C) केवल राजनीतिक सीमाएँ / Political boundaries only

(D) केवल तकनीकी विकास / Technological development only

Answer: (B)

2. निम्न में से कौन-सा आर्थिक क्रियाओं के चार-स्तरीय वर्गीकरण का सही क्रम है?

Which is the correct four-fold classification of economic activities?

(A) Primary → Secondary → Tertiary → Quaternary

(B) Primary → Tertiary → Secondary → Quaternary

(C) Secondary → Primary → Quaternary → Tertiary

(D) Tertiary → Primary → Secondary → Quaternary

Answer: (A)

3. निम्नलिखित में से कौन-सी गतिविधि प्राथमिक व्यवसाय की मूल प्रकृति को सर्वाधिक स्पष्ट करती है?

Which activity best represents the basic nature of a primary occupation?

(A) Software development

(B) Banking

(C) Forest resource collection

(D) Retail trade

Answer: (C)

4. प्राथमिक व्यवसायों के संबंध में निम्न में से कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding primary occupations?

(A) वे पूर्णतः प्रकृति से स्वतंत्र होते हैं।

(B) वे मुख्यतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं।

(C) उनमें विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता कभी नहीं होती।

(D) वे केवल विकसित देशों में पाए जाते हैं।

Answer: (B)

5. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसायों का समूह है?

Which is a group of primary occupations?

(A) Banking, insurance, trade

(B) Mining, agriculture, fishing

(C) Teaching, research, consulting

(D) Manufacturing, construction, processing

Answer: (B)

6. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय नहीं है?

Which is NOT a primary occupation?

(A) Fishing

(B) Mining

(C) Agriculture

(D) Manufacturing

Answer: (D)

7. प्राथमिक व्यवसायों के लिए अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होने का मुख्य कारण क्या है?

Why do primary occupations generally require relatively extensive areas?

(A) वे सीधे प्राकृतिक संसाधनों एवं भूमि पर निर्भर होते हैं।

(B) उनमें केवल urban population कार्य करती है।

(C) उनमें केवल मशीनों का प्रयोग होता है।

(D) उनका प्राकृतिक पर्यावरण से कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

8. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय और उसके पर्यावरण के बीच सही संबंध दर्शाता है?

Which correctly relates a primary occupation to its environment?

(A) घासभूमि — पशुपालन

(B) खनिज क्षेत्र — मत्स्य ग्रहण

(C) नदी — खनन ही केवल

(D) वन — बैंकिंग

Answer: (A)

9. आखेट एवं संग्रहण आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?

What is the major characteristic of hunting and gathering economy?

(A) पूर्णतः स्थायी कृषि

(B) अत्यधिक औद्योगिकीकरण

(C) स्थानीय प्राकृतिक पर्यावरण पर अत्यधिक निर्भरता

(D) बड़े पैमाने का विनिर्माण

Answer: (C)

10. निम्न में से कौन-सा आखेट एवं संग्रहण से संबंधित नहीं है?

Which is NOT associated with hunting and gathering?

(A) फल एवं जड़ें एकत्र करना

(B) पशु-पक्षियों का आखेट

(C) मछली पकड़ना

(D) बड़े पैमाने पर मशीन आधारित उद्योग

Answer: (D)

11. निम्न में से कौन-सा समूह source के अनुसार आखेट-संग्रहण से संबंधित समुदायों का उदाहरण देता है?

Which group represents communities associated with hunting and gathering according to the source?

(A) पिग्मी, सेमांग, बुशमैन

(B) मसाई, फुलानी, बद्दू

(C) गुज्जर, गद्दी, बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (A)

12. उष्ण कटिबंधीय वनों में वाणिज्यिक संग्रहण में निम्न में से किसका संग्रह किया जाता है?

Which may be collected commercially in tropical forests?

(A) लाख, गोंद एवं जड़ी-बूटियाँ

(B) केवल गेहूँ

(C) केवल कोयला

(D) केवल लौह-अयस्क

Answer: (A)

13. आखेट-संग्रहण समुदायों की प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति गहरी जानकारी का प्रमुख कारण क्या है?

Why do hunting-gathering communities possess detailed knowledge of their natural environment?

(A) उनकी आवश्यकताओं का बड़ा भाग स्थानीय पर्यावरण से पूरा होता है।

(B) वे केवल आधुनिक उद्योगों पर निर्भर होते हैं।

(C) वे स्थायी कृषि करते हैं।

(D) वे केवल आयातित वस्तुओं का उपयोग करते हैं।

Answer: (A)

14. पशुपालन के विकास के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा क्रम source की व्याख्या से सर्वाधिक संगत है?

Which sequence is most consistent with the source’s explanation of the development of pastoralism?

(A) व्यापार के बाद संग्रहण का विकास

(B) उद्योग के बाद आखेट का विकास

(C) आखेट-संग्रहण के बाद पशुपालन का विकास

(D) कृषि के बाद ही सभी प्रकार के पशुपालन का विकास

Answer: (C)

15. निम्न में से कौन-सा पशु-पर्यावरण का सही युग्म है?

Which is the correctly matched animal-environment pair?

(A) मरुस्थल — ऊँट

(B) टुण्ड्रा — गाय-बैल

(C) सवाना — याक

(D) तिब्बत — ऊँट

Answer: (A)

16. तिब्बत एवं हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में किस पशु का पालन source में बताया गया है?

Which animal is associated with pastoralism in Tibet and Himalayan mountainous regions?

(A) Camel

(B) Yak

(C) Reindeer

(D) Alpaca

Answer: (B)

17. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन की मूल विशेषता है?

Which is a basic characteristic of nomadic pastoralism?

(A) चारे एवं पानी की खोज में स्थान परिवर्तन

(B) एक ही खेत में स्थायी फसल उत्पादन

(C) केवल urban market services

(D) पूर्णतः factory-based livestock production

Answer: (A)

18. चलवासी पशुपालक अपने स्थान परिवर्तन के दौरान मुख्यतः किन संसाधनों की खोज करते हैं?

Which resources primarily determine the movement of nomadic pastoralists?

(A) चारा और पानी

(B) कोयला और लौह-अयस्क

(C) बाजार और बैंक

(D) कारखाने और बंदरगाह

Answer: (A)

19. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन का क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is an area of nomadic pastoralism mentioned in the source?

(A) सहारा मरुस्थल

(B) अमेजन का शहरी क्षेत्र

(C) पश्चिमी यूरोप का औद्योगिक क्षेत्र

(D) जापान का महानगरीय क्षेत्र

Answer: (A)

20. निम्न में से कौन-सा समुदाय चलवासी पशुपालन से संबंधित है?

Which community is associated with nomadic pastoralism?

(A) मसाई

(B) डेनिश डेयरी किसान

(C) पम्पास के आधुनिक कृषक

(D) कनाडाई लकड़ी उद्योग कर्मी

Answer: (A)

21. पर्वतीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में ऊँचाई की ओर और शीत ऋतु में घाटियों की ओर पशुपालकों का जाना कहलाता है—

Seasonal movement of pastoralists to higher elevations in summer and valleys in winter is called:

(A) Transhumance / ऋतु प्रवास

(B) Plantation

(C) Shifting cultivation

(D) Truck farming

Answer: (A)

22. निम्न में से कौन-सा ऋतु प्रवास का सही उदाहरण है?

Which is an example of transhumance?

(A) कनाडा के औद्योगिक श्रमिक

(B) सहारा के स्थायी कृषक

(C) हिमालय के गुज्जर, गद्दी एवं बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (C)

23. निम्न में से कौन-सा कथन Transhumance को Nomadic Pastoralism से अलग करता है?

Which distinguishes transhumance from nomadic pastoralism?

(A) Transhumance में seasonal movement एक अपेक्षाकृत निश्चित ऊर्ध्वाधर/क्षेत्रीय pattern का अनुसरण करता है।

(B) Transhumance में पशुपालन नहीं होता।

(C) Nomadic pastoralism में कभी movement नहीं होता।

(D) दोनों में कोई अंतर नहीं है।

Answer: (A)

24. आधुनिक काल में कुछ क्षेत्रों में चलवासी पशुपालन के स्थान पर व्यापारिक पशुपालन आने का एक प्रमुख कारण क्या बताया गया है?

What is one reason for the replacement of nomadic pastoralism by commercial livestock farming in some regions?

(A) कृषि का पूर्ण अंत

(B) प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण अभाव

(C) पशुओं का विलुप्त होना

(D) उद्योगों एवं आधुनिक सुविधाओं का विकास 

Answer: (D)

25. व्यापारिक पशुपालन की कौन-सी विशेषता उसे चलवासी पशुपालन से अलग करती है?

Which feature distinguishes commercial livestock farming from nomadic pastoralism?

(A) पशुपालक एक स्थान पर रहकर वैज्ञानिक एवं व्यापारिक तरीके अपनाते हैं।

(B) वे लगातार नए चरागाह खोजते हैं।

(C) वे केवल प्राकृतिक घास पर निर्भर रहते हैं।

(D) वे बाजार से पूर्णतः कटे रहते हैं।

Answer: (A)

26. व्यापारिक पशुपालन में चारे की फसलों की खेती का क्या महत्व है?

What is the significance of fodder cultivation in commercial livestock farming?

(A) पशुओं के लिए नियंत्रित एवं पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना

(B) पशुपालकों को प्रवास के लिए बाध्य करना

(C) प्राकृतिक चरागाह समाप्त करना ही इसका उद्देश्य है।

(D) केवल निर्यात फसल पैदा करना

Answer: (A)

27. निम्न में से कौन-सा व्यापारिक पशुपालन का प्रमुख क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is a major region of commercial livestock farming mentioned in the source?

(A) उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र

(B) सहारा का केंद्रीय मरुस्थल ही

(C) हिमालय का प्रत्येक भाग

(D) अमेजन का प्रत्येक भाग

Answer: (A)

28. व्यापारिक पशुपालन में नस्ल सुधार एवं रोग नियंत्रण का महत्व किस बात को दर्शाता है?

What does emphasis on breeding and disease control indicate in commercial livestock farming?

(A) इसका वैज्ञानिक एवं बाजारोन्मुख स्वरूप

(B) इसका पूर्णतः निर्वाह स्वरूप

(C) इसका पर्यावरण से पूर्ण विच्छेद

(D) इसका केवल खानाबदोश स्वरूप

Answer: (A)

29. लकड़ी काटने का व्यापारिक विकास विशेष रूप से किस प्रकार के वन प्रदेश में हुआ?

Commercial logging developed particularly in which forest region?

(A) मरुस्थलीय प्रदेश

(B) शंकुधारी वन प्रदेश

(C) टुण्ड्रा का बर्फीला क्षेत्र

(D) घासभूमि

Answer: (B)

30. निम्न में से कौन-सा लकड़ी काटने वाले प्रमुख देशों का समूह है?

Which group represents major commercial logging countries mentioned in the source?

(A) अर्जेंटीना, ब्राजील, वेनेजुएला, उरुग्वे

(B) मिस्र, सऊदी अरब, लीबिया, चाड

(C) भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया

(D) स्वीडन, फिनलैंड, रूस, कनाडा 

Answer: (D)

31. लकड़ी से लुग्दी एवं कागज बनाने वाले उद्योगों का वनों से संबंध किस प्रकार का है?

What is the relationship between pulp and paper industries and forests?

(A) वन कच्चा माल प्रदान करते हैं।

(B) वन केवल बाजार प्रदान करते हैं।

(C) वन केवल श्रमिक प्रदान करते हैं।

(D) वन का कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

32. मध्य अक्षांशीय तटीय प्रदेशों में व्यापारिक मत्स्य ग्रहण के विकास में कौन-सा कारक महत्वपूर्ण है?

Which factor is important for commercial fishing in middle-latitude coastal regions?

(A) शक्तिचालित नावों एवं जलपोतों का उपयोग

(B) केवल पारंपरिक भाले

(C) केवल ऊँट परिवहन

(D) केवल वर्षा जल

Answer: (A)

33. बड़े मत्स्य जहाजों में मछलियों को संसाधित एवं पैक करने की सुविधा किस प्रवृत्ति को दर्शाती है?

Processing and packing fish aboard large fishing vessels indicates:

(A) मत्स्य व्यवसाय का औद्योगिक एवं व्यापारिक स्वरूप

(B) केवल निर्वाह मत्स्य ग्रहण

(C) पशुपालन

(D) स्थानान्तरी कृषि

Answer: (A)

34. खनन को प्राथमिक व्यवसाय क्यों माना जाता है?

Why is mining classified as a primary occupation?

(A) इसमें पृथ्वी से प्राकृतिक खनिज संसाधनों का प्रत्यक्ष निष्कर्षण होता है।

(B) इसमें केवल manufactured goods बेचे जाते हैं।

(C) इसमें केवल financial services होती हैं।

(D) इसमें केवल research किया जाता है।

Answer: (A)

35. निम्न में से कौन-सा खनन के व्यापारिक दोहन को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है?

Which is NOT a factor affecting commercial exploitation of minerals?

(A) अयस्क की मांग

(B) अयस्क की गुणवत्ता

(C) खान की गहराई एवं सुगम्यता

(D) केवल देश की भाषा

Answer: (D)

36. खनिजों के वितरण के संबंध में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding mineral distribution?

(A) खनिजों का वितरण असमान है और अधिकांश खनिज non-renewable हैं।

(B) सभी देश खनिजों में आत्मनिर्भर हैं।

(C) सभी खनिज renewable हैं।

(D) खनिज पूरे विश्व में समान रूप से वितरित हैं।

Answer: (A)

37. खनन प्रारम्भ होने के बाद किसी क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं के विकास और बस्ती विस्तार का क्या संबंध हो सकता है?

What may be the relationship between mining and transport/settlement development?

(A) खनन के कारण परिवहन सुविधाएँ विकसित हो सकती हैं और लोगों का आगमन बढ़ सकता है।

(B) खनन हमेशा बस्तियों को समाप्त करता है।

(C) खनन का परिवहन से कोई संबंध नहीं है।

(D) खनन केवल समुद्र में होता है।

Answer: (A)

38. पेट्रोलियम शोधनशालाओं के संदर्भ में source में कौन-सा तर्क दिया गया है?

What reasoning is given in the source regarding petroleum refineries?

(A) अशुद्ध पेट्रोलियम का परिवहन कई petroleum products की तुलना में सस्ता हो सकता है।

(B) पेट्रोलियम का परिवहन असंभव है।

(C) सभी refineries केवल खानों के ऊपर स्थापित होती हैं।

(D) पेट्रोलियम का कोई परिवहन नहीं होता।

Answer: (A)

39. कृषि के विकास के संदर्भ में सबसे प्राचीन रूप किसे बताया गया है?

Which is described as the oldest form of agriculture?

(A) स्थानान्तरी कृषि

(B) रोपण कृषि

(C) मिश्रित कृषि

(D) ट्रक फार्मिंग

Answer: (A)

40. स्थानान्तरी कृषि की मूल प्रक्रिया में क्या शामिल है?

What is involved in the basic process of shifting cultivation?

(A) वनस्पति को काटना-जला कर भूमि साफ करना और कुछ वर्षों बाद दूसरी भूमि पर जाना

(B) स्थायी खेतों में लगातार एक ही भूमि पर खेती करना

(C) केवल greenhouse cultivation

(D) केवल commercial dairy farming

Answer: (A)

41. स्थानान्तरी कृषि में भूमि को कुछ वर्षों के बाद छोड़ने का प्रमुख कारण क्या है?

Why is land left fallow after a few years in shifting cultivation?

(A) समुद्री जल का बढ़ना

(B) भूमि की उर्वरता/उत्पादकता में कमी और नए क्षेत्र की आवश्यकता

(C) उद्योगों की अधिकता

(D) बाजार का पूर्ण अभाव

Answer: (B)

42. निम्न में से कौन-सा स्थानान्तरी कृषि का प्रमुख क्षेत्र source में बताया गया है?

Which is a major area of shifting cultivation mentioned in the source?

(A) उष्ण कटिबंधीय वन

(B) शीतोष्ण घासभूमि ही

(C) मरुस्थलीय क्षेत्र ही

(D) ध्रुवीय हिम क्षेत्र

Answer: (A)

43. स्थायी कृषि के विकास का एक प्रमुख सामाजिक-भौगोलिक परिणाम क्या था?

What was a major socio-geographical consequence of permanent agriculture?

(A) अतिरिक्त खाद्यान्न समाप्त हो गया।

(B) मानव पूरी तरह खानाबदोश बन गया।

(C) परिवहन समाप्त हो गया।

(D) स्थायी बस्तियों को प्रोत्साहन मिला।

Answer: (D)

44. व्यापारिक कृषि की प्रमुख विशेषता क्या है?

What is a major characteristic of commercial agriculture?

(A) बाजार/निर्यात के लिए विशेष फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन

(B) केवल स्थानीय निर्वाह के लिए उत्पादन

(C) केवल जंगली पौधों का संग्रहण

(D) केवल पशुपालन

Answer: (A)

45. रोपण कृषि को कृषि का विशिष्टीकृत रूप क्यों कहा जाता है?

Why is plantation agriculture considered a specialized form of agriculture?

(A) केवल वन्य उत्पादों का संग्रहण

(B) केवल छोटे घरेलू खेतों में खाद्यान्न उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) बड़े क्षेत्र में चाय, कॉफी, रबर आदि विशेष फसलों का मुख्यतः व्यापारिक/निर्यात उद्देश्य से उत्पादन

Answer: (D)

46. निम्न में से कौन-सा रोपण कृषि का सही समूह है?

Which is the correct group of plantation crops?

(A) चाय, कॉफी, रबर

(B) गेहूँ, जौ, बाजरा

(C) चना, मसूर, मटर

(D) केवल घास और चारा

Answer: (A)

47. मिश्रित कृषि की सबसे उपयुक्त पहचान क्या है?

What best identifies mixed farming?

(A) फसल उत्पादन और पशुपालन का एक साथ होना

(B) केवल फल उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) केवल वन संग्रहण

Answer: (A)

48. ट्रक फार्मिंग मुख्यतः किससे संबंधित है?

Truck farming is mainly associated with:

(A) मरुस्थल में ऊँट पालन

(B) नगरीय क्षेत्रों के समीप साग-सब्जियों की कृषि

(C) पर्वतीय क्षेत्रों में याक पालन

(D) समुद्र में मत्स्य ग्रहण

Answer: (B)

49. उद्यान कृषि का प्रमुख स्थानिक संबंध किससे है?

What is the major locational association of horticulture mentioned in the source?

(A) केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में कृषि

(B) केवल खनिज क्षेत्रों में कृषि

(C) नगरीय उपभोग केन्द्रों के समीप फल एवं फूलों की कृषि

(D) केवल समुद्र के भीतर कृषि

Answer: (C)

50. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों के बदलते स्वरूप को सबसे अच्छी तरह दर्शाता है?

Which best represents the changing nature of primary economic activities?

(A) प्रकृति से पूर्ण स्वतंत्रता

(B) निर्वाह से व्यापारिक एवं वैज्ञानिक उत्पादन की ओर बढ़ता विशिष्टीकरण

(C) प्राथमिक गतिविधियों का पूर्ण अंत

(D) केवल शिकार पर स्थायी निर्भरता

Answer: (B)

20. Meaning and Scope of Economic Geography (आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)

Meaning and Scope of Economic Geography

(आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. आर्थिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय-क्षेत्र एवं नूतन प्रवृतियों की विवेचना कीजिए।

Meaning and Scope of Economic

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चरण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

3. Water use, Problems and Conservation in India (भारत में जल उपयोग, समस्या तथा संरक्षण)

Water use, Problems and Conservation in India

(भारत में जल उपयोग, समस्या तथा संरक्षण)



Q. भारत में जल संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर चर्चा कीजिए। 

       जल प्राकृ‌तिक संसाधन है। मानव सहित जैविक संसार के जीव-जंतुओं के लिए जल अनिवार्य है। यही कारण है कि जल को जीवन से तुलना की जाती है। जल को लेकर यहाँ तक कहा जाने लगा है कि अगला विश्वयुद्ध जल के कारण ही लड़ा जायेगा। पूरे विश्व के 71% भाग पर समुद्री जल का विस्तार हुआ है। कुल स्वच्छ जल की 97% भाग अण्टार्कटिका या ध्रुवीय क्षेत्र में अवस्थित है। शेष तीन 3% जल स्थल पर जलाशयों और भूमिगत जल के रूप में अवस्थित है।

Water use

      हमारी पृथ्वी के ऊपर 480 लाख घन किमी० जल उपलब्ध है। उनमें से कुछ जल वायुमण्डल में कुछ जल भूमिगत जल के रूप में और शेष जल महाद्वीप और महासागर के रूप में अवस्थित है। भारत जल संसाधन के मामले में एक धनी राष्ट्र है। जल रूपी प्राकृतिक संसाधन का भारत में कई तरह से उपयोग में लाये जाते हैं। जैसे:-

(1) सिंचाई के रूप में:-

     जल का उपयोग किसानों के द्वारा कसल के उत्पादन हेतु सदियों से किया जाता रहा है। इसके लिए किसान नहर, नलकूप, कुंआ, तालाब और परम्परागत संसाधनों का उपयोग करते हैं। किसान इन जलाशयों से जल का दोहन कर फसल को शुष्क मौसम में सिंचाई कर बचाने का प्रयास करते हैं। हरित क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि सिंचाई, फसलों के उत्पादन और उत्पादकता के बीच सह संबंध पायी जाती है अर्थात् जितना अधिक सिंचाई होगा उतना ही अधिक फसल उत्पादन होने की संभावना होती है।

(2) जलविद्युत के उत्पादन में:-

      तापीय ऊर्जा के उत्पादन से कई पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होने लगी है। अत: इसके विकल्प के रूप में नदियों पर बड़े-2 बाँधों का निर्माण कर जलविद्युत का उत्पादन किया जा रहा है। भारत का पहला जलविद्युत केन्द्र शिवसमुद्रम (1902 ई०) है। भारत में सबसे बड़ा जल-विद्युत केन्द्र भाखड़ा-नांगल टेहरी है।

       भारत जलविद्युत उत्पादन हेतु लगभग सभी बड़े-बड़े नदियों पर बाँधों का निर्माण कर चुका है और जिन पर नहीं हुआ है उस पर बाँध बनाने की योजना प्रस्तावित है। भारत की नदियों से 8400 मेगावाट, जलविद्युत का उत्पादन किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारत के कुल विद्युत उत्पादन में 24-27% योगदान जलविद्युत का है।

(3) पेयजल के रूप में:-

      प्रत्येक जीव अपना प्यास जल का सेवन कर बुझाते हैं। इस तरह जल प्रमुख पोषक तत्त्व के रूप में शामिल हो जाता है। पेयजल की आवश्यकता ग्रामीण एवं नगरीय दोनों क्षेत्रों में है। एक अनुमानित आंकड़ा के अनुसार भारत के मात्र 63% घरों में ही पेयजल की सुविधा उपलब्ध है। इनमें भी मात्र 56% ग्रामीण क्षेत्र में 81.5% नगरी क्षेत्र में पेयजल की सुविधा उपलब्ध है।

    ग्रामीण क्षेत्र में पेयजल भूमिगत जल से पूर्ति की जाती है। वहीं नगरीय क्षेत्रों में पास में अवस्थित जलशयों से की जाती है।

(4) घरेलू कार्य के रूप में:-

       भारत में जल का प्रयोग घरेलू कार्यों के रूप में भी बड़े पैमाने पर की जाती है। जैसे- स्नान करने में, सफाई कार्य में, खाना बनाने में इत्यादि में।

(5) सौद्योगिक उपयोग में:-

      औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त जल की आपूर्ति आवश्यक है। 1972 ई० में स्थापित “सिंचाई आयोग” के अनुसार 50 अरब घन मी० उद्योगों के लिए आवश्यक है लेकिन मात्र 30 अरब घन मी० जल 2000 ई० में उपलब्ध था। 2025 ई0 तक 120 अरब घन मी० औद्योगिक जल की माँग बढ़ने की संभावना है।

(6) परिवहन के रूप में:-

     जल का प्रयोग समुद्री एवं आन्तरिक जल परिवहन के रूप में किया जाता है। आज भारत के 95% अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समुद्र के माध्यम से होता है। भारत में आन्तरिक परिवहन का विकास पर्याप्त मात्रा में नहीं हुआ है फिर भी हल्दिया से प्रयागराज तक गंगा नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या-1, सदया से दुबरी तक ब्रह्मपुत्र नदी में राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या WNH-2, तथा केरल के पास कोवलम को WNH-3 घोषित किया गया है। भारत के डेल्टाई क्षेत्रों में स्थानीय लोग जल का प्रयोग परिवहन के रूप में करते हैं।

(7) जलचक्र के रूप में:-

      जलचक्र हमारे पारिस्थैतिक तंत्र का एक प्रमुख प्रक्रिया है जिसके तहत समुद्री जल वाष्पीकृत होकर आकाश में पहुंचता है जिससे वायुमंडल की आर्द्रता बनी रहती है। पुनः ऊँचाई पर जाकर जलवाष्प संघनित होकर बादलों का निर्माण करती है जिससे वर्षण का कार्य होता है।

      वर्षा जल भारत के विभिन्न जलाशयों में जल की आपूर्ति करती हैं। जलाधिक्य वाले क्षेत्रों से जल नदियों के माध्यम से समुद्र तक पुनः पहुँच जाते हैं। इस संपूर्ण जलचक्र के दौरान अनेक जीव-जन्तु जल ग्रहण करते हैं जिससे हमारे देश की जैविक विविधता और पर्यावरण सुरक्षित रहती है।

(8) पर्यटन के विकास में:-

      जल संघनित होकर बर्फ का निर्माण करती है। पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ-बारी के कारण पर्यटन उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर होता है। बड़े-2 बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ इंदिरा गाँधी कमांड कैनाल क्षेत्र भाखड़ा-नांगल बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना की ओर जल के कारण ही आकर्षित होते हैं। वर्तमान समय में हाइड्रोनिकल पार्क जल की महता को और रेखांकित किया है।

(9) मत्स्य पालन के रूप में:-

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में जल का प्रयोग कई प्रकार से किया जा रहा है। जब संसाधनों के अत्याधिक दोहन के कारण यह एक विरल प्राकृतिक संसाधन बन चुका है। अतः जल से संबंधित समस्याओं की पहचान कर उनका संरक्षण आवश्यक है।

जल संसाधन से संबंधित समस्याएँ

       भारत में जल संसाधनों से संबंधित समस्याओं को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन कर सकते हैं:-

(1) जल उपलब्धता की समस्या:-

     भारत में सतही जल का अनुमानित भण्डार 1869 अरब घन मी० है। इनमें से मात्र 690 अरब घन मी० जल उपयोग के लिए उपलब्ध है। भारत के कुल भूमिगत जल का मात्र 450 अरब घन मी० जल उपयोग के लिए उपलब्ध है। 2025 ई० तक भारत में 1050 अरब घन मी० जल की आवश्यकता होगी। ये आँकड़े बताते हैं कि 2025 ई० तक जल की कमी नहीं होगी, लेकिन उसके बाद जल की जबड़दस्त कमी की समस्या उत्पन्न होगी।

     भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता में कमी आ रही है। 1951 ई० में प्रति व्यक्ति 5514 घन मी० जल उपलब्ध था जो 2001 ई० में घटकर 1869 घन मी० जल रह गई जो घटते हुए जल उपलब्धता स्पष्ट संकेत है।

    प्रादेशिक स्तर पर भी जल संसाधन के वितरण में काफी विषमता है। जैसे-सम्पूर्ण उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में भूमिगत जल उपलब्ध है। वहीं दक्षिण भारत में भूमिगत जल का घोर अभाव है। भारत का उ०-पूर्वी क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वर्षा (2000 सेमी० से अधिक) होती है। जबकि उ०-प० भारत और वृष्टिछाया प्रदेशों में 100 सेमी० से भी कम वर्षा होती है।

     भारत में जल की उपलब्धता में मौसम के अनुसार भी विविधता देखी जाती है। जैसे- वर्षा ऋतु में भारत की 90% वर्षा हो जाती है। जबकि शेष ऋतुएं जलाभाव की समस्या से जुझते रहती है।

(2) उपयोग से संबंधित समस्याएँ:-

     सभी के लिए स्वास्थ की सुविधा उपलब्ध करवाना भारत सरकार एवं राज्य सरकारों का मौलिक कर्तव्य है लेकिन लोगों को जो जल पीने के लिए मिल रहा है। वह जल 90% तक प्रदू‌षित हो चुका है। राजस्थान, गुजरात, प० मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में पेयजल की गंभीर समस्या है। “राष्ट्रीय प्रायोगिक आर्थिक शोध परिषद” के रिपोर्टानुसार भारत के आधे से अधिक ग्रामीण घरों में पेयजल का कोई भी साधन मौजूद नहीं है।

     भारत में सिंचाई साधनों का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है, लेकिन इसके बावजूद भारत के 2/3 कृषि भूमि वर्षा पर ही निर्भर है। पुनः इसमें क्षेत्रीय विषमताएँ भी देखी जा सकती है।

      भूमिगत जल संसाधन के अत्याधिक दोहन के कारण भूमिगत जल स्तर में भारी गिरावट आ रही है। भारत के 10 राज्यों के 114 जिलों में मई-जून में जिलाधिकारियों को सिंचाई कार्य पर रोक लगानी पड़ती है।

      भारत में सिंचाई के लिए जो जल उपलब्ध है उसका भी मात्र 40% जल का ही प्रयोग हो पाता है। शेष जल बेकार चले जाते हैं। नदियों पर छोटे-2 बाँध के अभाव में वर्षा जल प्रवाहित होकर समुद्र तक पहुंच जाते हैं।

(3) गुणवता की समस्या:-

      भारत में जल प्रदूषण की गंभीर समस्या है। इसका प्रमुख कारण उद्योगों, नगरो, घरेलू अवशिष्ट पदार्थों को जल में प्रवाहित किया जाना है। इसके अलावे कृषि कार्यों में प्रयोग किये जाने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक है। लोगों की गलत जीवन शैली और धार्मिक रुढ़ि‌वादिता भी जल के प्रदूषित कर रही है।

      जिन क्षेत्रों में बड़े-2 बांधों के निर्माण किया गया है उन क्षेत्रों में नीचले स्तर के घुलनशील रासायनिक पदार्थ के ऊपर आ जाने से जल की गुणवत्ता में कमी आ रही है।

(4) प्रबंधन से संबंधित समस्या:-

        भारत में पर्याप्त मात्रा में जल की मात्रा उपलब्ध है लेकिन उचित प्रबंधन के अभाव में जल बेकार हो रहे हैं। राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता में कमी आम व्यक्ति में जागरूकता के अभाव जल संसाधन के समक्ष और जटिल समस्याएं उत्पन्न कर रही है। अत: इनका संरक्षण अति आवश्यक है।

जल संरक्षण के उपाय

     जल एक बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन है जिसका संरक्षण अति आवश्यक है। भारत में जल संरक्षण के लिए जा रहे उपायों को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

(1) वर्षा जल संग्रहण:-

    भारत में पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है, लेकिन नदियों के माध्यम से जल प्रवाहित होकर समुद्र में चले जाते हैं। अतः वर्षा जल का संग्रहण अनिवार्य है। इसके लिए कई कार्य अपेक्षित है। जैसे- ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत जल स्तर से बनाये रखने के परम्परागत सिंचाई साधनों को विकसित किया जा रहा है। जैसे- आहर, तालाब, जोहर इत्यादि का पुनर्निर्माण करवाया जा रहा है।

       नगरीय क्षेत्रों में लोगों को नवीन तकनीक पर आधारित जल संग्रहण की हारवेस्टिंग (कटाई/दोहन) के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जैसे- नगरीय लोगों के लिए वाटर प्रूफ छत का निर्माण करना अनिवार्य बनाया जा रहा है। इसके तहत छत पर इकट्टा किये गये वर्षा जल को बोरिंग के माध्यम से भूमिगत करने की सलाह दी जाती है। घरों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को घर के बाहर गड्डा/गर्त का निर्माण कर जल संग्रहण निर्माण करने की सलाह दी जाती है।

    पर्वतीय एवं पठारीय क्षेत्रों में वर्षा जल का संग्रहण तालाबों एवं झीलों में किया जाता रहा है। उसे पुर्नुद्धार की योजना सरकार की है। भारत के उन जिलों में जहाँ पेय जल की गंभीर समस्या मौजूद है उन जिलों में भूमिगत जल दोहन करने के लिए किसानों को लाइसेन्स दिया जा रहा है ताकि मनमानी तरीके से का दोहन आप नहीं कर सके। मनमाने जल दोहन पर रोक लगाने के लिए सरकार नगरीय क्षेत्रों में टैक्स (कर) वसूला करती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के किसान आज भी इस दायरे से बाहर है। सरकार की योजना है कि भूमिगत जल दोहन करने वाले किसान से टैक्स वसूला जाय।

      वर्षा जल के संग्रहण हेतु नदियों पर छोटे-2 बाँधों का निर्माण किया जा रहा है तथा उत्तर भारत की नदियों को दक्षिण भारत की नदियों से जोड़ने की एक योजना चल रही है जिसे “राष्ट्रीय जल ग्रीड योजना” के नाम से भी जानते हैं। इसके द्वारा उतर भारत के बाढ़‌ वालें पानी को द० भारत के शुष्क प्रदेश में पहुंचाया जा सकेगा।

(2) जल संभर प्रबंधन / जल संभर विकास योजना:-

    भारत में जल के संरक्षण हेतु जल संभर प्रबंधन योजना (Water Shade Management Porogramme) चलाया जा रहा है। जल विभाजक एक ऐसा उत्थित भूभाग है जहाँ से वर्षा जल दो विपरीत दिशाओं में बहना प्रारंभ करता है। इसके तहत योजना निर्माणकर्ताओं ने कृषि विकास, वन प्रबंधन और जल संरक्षण का उद्देश्य रखा है। हरियाणा के चंडीगढ़ के पास सूखा माजरी गाँव तथा MP के मकगाँवा गाँव के लोगों ने जल सम्भर विकास योजना का लाभ उठाते हुए जल संरक्षण का अभूतपूर्व प्रयास किया है।

(3) जल को अप्रदूषित रखना:-

     जल प्रदूषण का सबसे प्रमुख कारण औद्योगिक कचड़े, नालियों के पानी लौर शौच की जलशयों के किनारे किया जाना इत्यादि है। औद्योगिक इकाईयों को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सख्त निर्देश दे चुका है कि आप जल को उपचारित करने के बाद ही जल को जलाशयों में छोड़े। नगरों से निकलने वाले जल को उपचारित करने के लिए मैला टंकी की स्थापना की गई है। किसानों को रासायनिक उर्वरक के स्थान पर जैव उर्वरक प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। 

    जल को सुरक्षित रखने के लिए “विद्युत शवदाह गृह” का निर्माण किया जा रहा है। लोग खुले में शौच परित्याग न कर सके, इसलिए जगह पर “सामुदायिक शौचालय” का निर्माण किया जा रहा है। इस क्षेत्र में विन्देश्वरी पाठक की संस्था “सुलभ इंटरनेशनल” सराहनीय कार्य कर रही है।

अन्य उपाय:-

     जल संसाधन के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में आधुनिक तकनीक भी कारगर साबित हो रही है। जैसे- वाशिंग मशीन के प्रयोग को बढ़ावा देकर जल की खपत को कम किया जा सकता है। जल संरक्षण पर आधारित विज्ञापन का प्रसारण कर जन जागृति लायी जा सकती है। बढ़ती हुई जनसंख्या और पशुओं की संख्या के कारण जल का निरंतर माँग बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में इनकी संख्या को रोकने वाले कार्यक्रम को त्वरित लागू किया जा रहा है। वन प्रबंधन कर वनों का विस्तार किया जा रहा है ताकि जलचक्र सुचारू रूप से संचालित हो सहे।

निष्कर्ष

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में जल संसाधन के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दिशा में कई महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे हैं, लेकिन पूर्ण राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के अभाव में ये सभी कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं।

    अतः इस क्षेत्र में जन जागृति प्रशासनिक एवं राजनैतिक प्रतिबद्धता, जल संरक्षण कार्यक्रम को रोजगार से जोड़‌कर इस कार्यक्रम को त्वरित किया जा सकता है। राजस्थान के अल्वर क्षेत्र में राजेन्द्र सिंह के द्वारा जल संरक्षण का कार्य बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। अतः उनके ही समान बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आकर कार्य करने की आवश्यकता है तभी जल संरक्षण के पूरे लक्ष्य को प्राप्त किया जा सका है।

2. Distribution, use, related prmobles and conservation of land resources in India. (भारत में भूमि संसाधन के वितरण, उपयोग, संबंधित समस्या तथा संरक्षण)

 Distribution, use, related problems and conservation of land resources in India.

(भारत में भूमि संसाधन के वितरण, उपयोग, संबंधित समस्या तथा संरक्षण)



             भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है। धरातल के सबसे ऊपरी सतह में मिलने वाला असंगठित पदार्थ को मृदा कहते हैं। चूंकि मृदा में आर्थिक लगान देने की क्षमता होती है। इसलिए इसे संसाधन की श्रेणी में रखते हैं।

     भारत मृदा संसाधन के मामले में एक समृद्ध राष्ट्र है। क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश है। विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4% भूभाग भारत के पास उपलब्ध है। इसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी० है।

     मुख्य भूमि का विस्तार 8°4′ N से 37°6’N अक्षांश है। जबकि देशान्तरीय विस्तार 68०7′ से 97°25′ तक है। इसके सीमा का विस्तार 15200 किमी० है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 58% भूभाग कृषि योग्य भूमि के अन्तर्गत आता है। यह विश्व के कुल कृषि योग्य भूमि का 11% है।

Distribution

     विशालकाय भूभाग होने के कारण मृदा के ऊपर अनेक प्रकार के भौतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक कारकों का प्रभाव पड़ता है। इन कारकों के कारण ही अलग-2 क्षेत्र में अलग-2 प्रकार से भूमिका उपयोग किया जाता है।

     भारतीय मृदा संसाधन उपयोग को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन करते हैं:-

(1) वनीय भूमि के रूप में

(2) कृषि कार्य के रूप में

(3) निर्मित भूमि के रूप में

(4) अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष आर्थिक लगान न देने वाली भूमि।

(1) वनीय भूमि के रूप में:-

     पर्यावरण के दृष्टिकोण से भारत में कम से कम 33% भूभाग पर वन होना चाहिए। इसमें भी मैदानी भारत में 20% और पठारी भाग में 60% भूभाग पर वन होना चाहिए। लेकिन भारत के कुल क्षेत्र के मात्र 22.1% भारत पर वन उपलब्ध है। इसमें पंजाब एवं हरियाणा ऐसे राज्य हैं जो वन विहीन है। पूर्वोत्तर, छतीसगढ़, MP, ओडिशा इत्यादि ऐसे राज्य है जहाँ के भूमि पर वन का विस्तार अधिक है।

(2) कृषि वर्ष के रूप में:-

     कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश के कुल क्षेत्रफल का 40% भूभाग को ही कृषि कार्य में लगाया जाना चाहिए। लेकिन भारत अपने कुल क्षेत्रफल का 58% भूमि का प्रयोग कृषि क्षेत्र में कर रहा है। इसमें 47% भूभाग प्रत्यक्ष कृषि के रूप में, 7.5% परती भूमि के रूप में, 25% चारे भूमि के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

      भारत में सर्वाधिक कृषि योग्य भूमि मैदानी क्षेत्र में उपलब्ध है। भारतीय मृदा पर अनेक प्रकार के फसलों की कृषि की जाती है जिनमें खाद्यान्न फसल, तेलहन, दलहन एवं नगदी फसल प्रमुख है।

(3) निर्मित क्षेत्र के रूप में:-

      इसके अन्तर्गत भूमि का प्रयोग अधिवासीय माकान के रूप में परिवहन मार्ग में खनन भूमि के रूप में, नगर एवं औद्योगिक क्षेत्रों के विकास में किया जा रहा है। भूगोलवेत्ताओं के अनुसार किसी भी देश के कुल क्षेत्रफल का 14% भूभाग का प्रयोग निर्मित क्षेत्र के रूप में किया जाना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में 13.5% भूमि प्रयोग इस रूप में कर रहा है।

(4) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लगान न देने वाली भूमि के रूप में:-

      इसके अन्तर्गत हिमाच्छादित भूमि, चट्टानी भूमि, मरुस्थलीय भूमि, दलदली भूमि में शामिल करते है। पर्यावरणवादियों के अनुसार किसी भी देश में 13% भूभाग पर ऐसी भूमि होनी चाहिए। वर्तमान समय में भारत के पास 13% ऐसे भूमि उपलब्ध है।

     भारत के भूमि प्रयोग प्रतिरूप से स्पष्ट है कि भारत में भू-उपयोग काफी असंतुलित है जिसके कई कारण है। जैसे-

(i) भारत की लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या,

(ii) प्रति इकाई भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या दबाव,

(iii) कृषि योग्य भूमि में लगातार कमी,

(iv) प्रति वर्ष बड़े पैमाने पर वनों की कटाई,

(v) अवैज्ञानिक कृषि पद्धति, जैस- झूम कृषि, सीढ़ीनुमा कृषि।

(vi) अत्याधिक पशुचारण,

(vii) बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग,

(viii) किसानों के द्वारा फसल चक्र को अपनाया नहीं जाना,

(ix) तीव्र औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण,

(x) बाढ़, सूखाड़, मरुस्थलीकरण, हिमस्खलन, भूस्खलन जैसे प्राकृतिक कारण।

भारतीय मृदाओं की समस्याएँ

      भारतीय मृदा कई मानवीय कारक प्राकृतिक कारक से प्रभावित होती रही है जिसके कारण भारतीय मृदा के समक्ष निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हुई है-

(1) मृदा अपरदन की समस्या,

(2) घटती मृदा उर्वरता,

(3) जल जमाव की समस्या

(4) भूमि लवणीकरण की समस्या

(5) मरुस्थलीयकरण की समस्या

(1) मृदा अपरदन की समस्या:-

     मृदा के ऊपरी सतह के हटने की क्रिया ‘मृदा अपरदन’ कहलाता है। जब मृदा का ऊपरी भाग एक चादर रूप में फटता है तो उसे ‘परत अपरदन’ या ‘चादर अपरदन’ कहते हैं। अगर जल बहाव के कारण छोटे-बड़े नाली के रूप में मृदा अपरदन होता है, तो उसे गली एवं अवनालिका अपरदन कहते है। चम्बल नदी घाटी क्षेत्र इसके लिए विश्व प्रसिद्ध है।

        भारत में मृदा अपरदन के कई कारक सक्रिय है। जैसे- मरुस्थलीय क्षेत्र में शुष्क वायु और आकस्मिक वर्षा, तटीय क्षेत्र में समुद्री तरंग पर्वतीय क्षेत्र में हिमानी और झूम कृषि मैदानी क्षेत्र में बाढ़ एवं अवैज्ञानिक कृषि पद्धति, पठारी क्षेत्र में खनन कार्य इत्यादि प्रमुख है। अत्याधिक चराई के कारण भारत में सबसे अधिक मृदा का अपरदन शिवालिक क्षेत्र में उत्पन्न हुआ है।

(2) घटती मृदा उर्वरता:-

      भारतीय भूमि पर सैकड़ों वर्षों से कृषि कार्य किया जा रहा है। पुन: हरित क्रांति के दौरान बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किये जाने के  कारण एवं वनीय ह्रास के कारण मृदा के उर्वरता में लगातार कमी आ रही है। किसानों के द्वारा अवैज्ञानिक कृषि पद्धति अपनाये जाने के कारण भी यह समस्या गंभीर होती जा रही है।

      रासायनिक उर्वरक के  प्रयोग किये जाने से मृदा के उर्वरता में सर्वाधिक कमी पंजाब, हरियाणा, प० उत्तर प्रदेश तथा कमाण्ड एरिया प्रोजेक्ट वाले क्षेत्र में उत्पन्न हुई है। अत्यधिक भूमिगत जल संसाधन के दोहन से मृदा में नमी की कमी होने लगती है। कृषि अर्थ में पशुओं के स्थान पर यंत्रों के प्रयोग से भूमि तथा पशु के बीच के सहचर्य में कमी आयी है जिसके चलते भूमि की उर्वरता में लगातार कमी हो रही है।

नोट: भारत में कमांड एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम (सीएडीपी) 1974 में भूमि और जल प्रबंधन में सुधार के लिए व्यापक कार्यक्रम के हिस्से के रूप में शुरू किया गया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य प्रमुख और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के कमांड क्षेत्रों में पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करके कृषि उत्पादकता को बढ़ाना था।

(3) जल जमाव के समस्या:-

         भारत में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ पर जल जमाव की गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। जैसे- इंदिरा गाँधी नहर के अतिरिक्त जल को जैसलमेर और बाडमेर को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण वहाँ जल जमाव की समस्या उत्पन्न हो गई है। इसी तरह से बहुदेशीय नदी घाटी परियोजना के तहत बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण किया जाता है और बाँधों के पीछे बड़ी मात्रा में जल का भण्डारण किया जाता है जिसके कारण उसके इर्द-गिर्द के क्षेत्र में भूमिगत जल ऊपर उठ जाते हैं और जल-जमाव की समस्या उत्पन्न करते है।

(4) भूमि लवणीकरण के समस्या:-

     मृदा में लवण बढ़ने की क्रिया को लवणीकरण कहते हैं। भारत में यह समस्या उन क्षेत्रों में उत्पन्न हुई है जहाँ वर्षा कम और वाष्पीकरण अधिक होती है। पुनः नहरी जल से सिंचाई का कार्य होता है। हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में यह एक गंभीर समस्या है।

(5) मरुस्थलीकाण की समस्या:-

      मरुस्थल का विस्तार मरुस्थलीकरण कहलाता है। थार मरुस्थल के पूर्वी उतरी सीमावर्ती क्षेत्रों में यह एक गंभीर समस्या है।

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत की मृदा कई समस्याओं से ग्रसित है। 

मृदा संरक्षण

     भारत की एक अरब से भी अधिक जनसँख्या के सुपोषण को ध्यान में रखते हुए मृदा संसाधनों के उचित उपयोग तथा संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यक है। मृदा संरक्षण के दिशा में कई उपाय किये जा रहे हैं। जैसे-

(1) वृक्षों  के कटाई पर प्रतिबंध:-

      वृक्षों की कटाई रोकने हेतु कई प्रकार के कानून का निर्माण किया गया है। इस कानून उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को दण्ड देने के प्रावधान है। ‘चिपको आंदोलन’ इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा।

(2) वृक्षारोपण:-

     गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, प० मध्य प्रदेश के किसानों के द्वारा तेज हवाओं से होने वाला मृदा अपरदन को रोकने के लिए मेढ़ वानिकी, कृषि वानिकी का सफल प्रयोग किया गया है। मृदा अपरदन को रोकने हेतु वृक्षारोपण सबसे उपयुक्त उपाय है। अतः इस कार्य के लिए सामजिक वानिकी कार्क्रम को चलाकर वनीय भूमि को बढ़ाया जा रहा है।

(3) स्थानान्तरित कृषि पर प्रतिबंध:-

     इस कृषि के अन्तर्गत नाजूक पर्यावरण में निवास करने वाले आदिवासी समाज जंगलों को काटकर जलाता है और उस पर कृषि का कार्य करता है जिसके कारण बड़े पैमाने पर भूमि की सक्षमता में कमी आती है। अत: भारत सरकार ने 1976 ई० में ही झूम कृषि निषेध कानून बनाकर इस पर निषेध लगाती है।

(4) समोच्च रेखीय जुलाई:-

     पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों को समोच्च के अनुरूप हल जुताई के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

(5) बाढ़ नियंत्रण:-

     मृदा ह्रास तथा बाढ़ के बीच में गहरा सह-संबंध है। अतः बाढ़ नियंत्रण हेतु बहुद्देश्यीय नदी घाटी परियोजना, उचित जल प्रबंधन, नदी जोड़ों कार्यक्रम को लागू किया जा रहा है।

(6) परती भूमि पुर्नोद्वार:-

     भारत में लगभग 96 लाख हेक्टेयर भूमि परती भूमि के अन्तर्गत आता है। भारत में सबसे ज्यादा परती भूमि आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में उपलब्ध है। परती भूमि पर चारागाह फलोद्यान में विकास दर उसे उपयोग में लाया जा सकता है। बंजर भूमि पर जल भण्डारण कर उर्वर भूमि के रूप में रखा जा सकता है। चम्बल नदी घाटी क्षेत्र में भूमि के समतलीकरण कर अवनलिका अपरदन से निपटा जा रहा है।

(7) लवणीय मृदा उद्धार:-

      भारत में सर्वाधिक लवणीय मृदा UP, पंजाब तथा पश्चिम बंगाल में है। भारत में 80 लाख हेक्टेयर भूमि पर लवणीय मिट्टी के विस्तार हुआ है। लवणीय भूमि पर जिप्सम का प्रयोग कर, गोबर एवं जैविक उर्वरक प्रयोग कर उर्वर भूमि बदला जा सकता है।

(8) अन्य उपाय:-

    मृदा संरक्षण के कई अन्य उपाय भी लाये जा रहे है या लाये जा सकते हैं। जैसे- 

(i) सहायक नदियों पर छोटे-2 बाँधों का निर्माण करना।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रों में ग्रीन बोल्ट तथा बाड़ का निर्माण करना।

(iii) पशुओं तथा मृदा के बीच में सहचर्य को बढ़ाना।

(iv) जैविक उर्वरक का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करना।

(v) फसल चक्र के उपयोग को बढ़ावा देना।

(vi) सतत् कृषि विकास को बढ़ावा देना।

(vii) Soil Clinic का निर्माण करना।

(viii) USA के तर्ज पर भारत में भी मृदा सेवा केन्द्र तथा मृदा सेवा आन्दोलन को चालाया जाना।

निष्कर्ष:

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट‌ है कि भारत में मृदा से संबंधित जहाँ कई समस्याएँ उत्पन्न हुई है वहीं उससे निपटने के दिशा में कई संस्थागत एवं संरचनात्मक प्रयास भी किये जा रहे है।

1. Land Resources (भूमि संसाधन)

Land Resources

(भूमि संसाधन)



Q1. भारत में भूमि संसाधन के उपयोग एवं संरक्षण का वर्णन कीजिए।

Q2. भारत में बंजर भूमि प्रबंधन

       भारत प्राकृतिक संसाधनों के मामले में एक धनी राष्ट्र है। भूगोलवेताओं ने संसाधन को परिभाषित करते हुए कहा है कि वह कोई भी वस्तु जो मानव में संतुष्टि प्रदान करता है, उसे संसाधन कहते हैं।” इस परिभाषा के मद्देनजर भूमि भी एक प्राकृतिक संसाधन का ही उदा० बन जाता है। मृदा या भूमि धरातल के सबसे ऊपरी भाग में पायी जाती है जिसका निर्माण जैविक एवं अजैविक तत्वों के ऋतुक्षरण से होता है। मृदा एक प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि यह न केवल मानव को संतुष्टि प्रदान करता है बल्कि इससे आर्थिक लगान भी प्राप्त होती है तथा यह अन्य सभी प्राकृतिक संसाधनों का आधार होता है।

Land Resources

     भारत भूमि संसाधन के मामले में एक समृद्ध राष्ट्र है। जैसे क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश है जिसका क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी० है। पूरे विश्व के क्षेत्रफल का 2.4% भूभाग हमोर देश के पास है। पूरे विश्व के 11% कृषि योग्य भूमि भारत के पास है। भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 58% भूभाग कृषि कार्य के अंतर्गत आते हैं। भारत के पास जितनी भूमि उपलब्ध है उसका उपयोग भिन्न-2 प्रकार से किया जाता है। मोटे तौर पर भारतीय भूमि संसाधन के उपयोग को चार शीर्षकों में बाँटकर अध्ययन करते हैं:-

(1) वनीय क्षेत्र के रूप में:

     पर्यावरण के दृष्टिकोण से भारत के कुल क्षेत्रफल का 33% भूभाग पर वन होना चाहिए था लेकिन भारत के मात्र 22.1% भूभाग पर ही वन उपलब्ध है। इसमें भी मैदानी क्षेत्र में 20% भूभाग पर और पठारी क्षेत्र में 60% भूभाग पर वन होना चाहिए था। लेकिन पंजाब, हरियाणा, दिल्ली इत्यादि ऐसे क्षेत्र हैं जो पूर्णतः वन विहीन हो चुके हैं। भारत में जो वन बचे हुए हैं वो द० भारत, मध्य भारत तथा पर्वतीय ढलानों पर उलब्ध है। बढ़ती हुई जनसंख्या, जनजातीय क्रियाविधि और विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्य के कारण वनों का तेजी से ह्रास हो रहा है। वनीय ह्रास के कारण मृदा में भूमि तापन, आर्द्रता ह्रास एवं अपरदन की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(2) कृषि के रूप में:-

     कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश के कुल क्षेत्रफल का 40% भूभाग पर ही कृषि कार्य किए जाना चाहिए लेकिन वर्तमान समय में इससे अधिक भूमि पर कृषि कार्य किया जा रहा है। जैसे- 47% भूभाग पर प्रत्यक्ष रूप से कृषि किया जा रहा है। 7.5% परती भूमि के अन्तर्गत शामिल है। 2.5% भूभाग पर पशुचारण किया जा रहा है। इस तरह स्पष्ट है कि अत्याधिक कृषि कार्य एवं पशुपालन के कारण भूमि उपयोग का प्रारूप असंतुलित हो चुका है।

(3) निर्मित क्षेत्र के रूप में:-

     इसके अन्तर्गत अधिवासीय क्षेत्र, परिवहन मार्ग, खनन भूमि, औद्योगिक क्षेत्र, नगरीय क्षेत्र इत्यादि को शामिल करते हैं। भूगोलवेताओं के अनुसार 14% भूभाग पर ही निर्माण का कार्य होना चाहिए लेकिन वर्तमान समय में 13.5% भूभाग पर निर्माण का कार्य हो रहा है।

(4) प्रत्यक्ष आर्थिक लगान न देने वाले भूमि के रूप में:-

     इसके अंतर्गत हिमाच्छादित भूमि, दलदली क्षेत्र, मरुस्थलीय क्षेत्र एवं चट्टानी भूमि को शामिल करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी देश में 13% भूभाग ऐसे उपयोग के क्षेत्र में होना चाहिए। हलांकि वर्तमान समय में भारत के पास 13% ऐसे भूमि उपलब्ध है। लेकिन भारत में अप्रत्यक्ष आर्थिक लगान देने वाले भूमि को धीरे-2 प्रत्यक्ष आर्थिक लगान वाले क्षेत्र में शामिल किया जा रहा है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मृदा संसाधन का उपयोग कई प्रकार से किया जा रहा है।

मृदा की समस्यायें

     मृदा संसाधन के अत्याधिक दोहन के कारण कई प्रकार के समस्याओं का अभ्युदय हुआ है। जैसे-

(i) बंजर भूमि का तेजी से विकास हो रहा है। “राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड के अनुसार 175 मिलियन हेक्टयर भूमि बंजर भूमि के रूप में बदल चुका है।

(ii) “भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद” के अनुसार भारत के 60% भूमि के स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आयी है। स्वास्थ्य में गिरावट का तात्पर्य मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणु तथा ह्यूमस में तेजी से ह्रास है। मृदा में उपस्थित आर्द्रता ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है। भूमि के नंगा होने के कारण मिट्टी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। उपरोक्त स्वास्थ्य में गिरावट का प्रमुख कारण अवैज्ञानिक कृषि पद्धति है। पुनः वैज्ञानिक कृषि पद्धति के तहत उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर इत्यादि का प्रयोग किया जाना है।

(iii) भूमि अपरदन की समस्या-

     अपरदन के मूलतः 5 दूत होते हैं जिसके कारण अलग-2 क्षेत्रों में मृदा अपरदन की समस्या उत्पन्न हुई है। जैसे- बढ़ता हुआ जल के कारण नदी घाटी क्षेत्र में, हिमानी के कारण पर्वतीय क्षेत्र में, शुष्क वालु के कारण थार मरुस्थलीय क्षेत्र में, समुद्री तरंग के कारण तटवर्ती क्षेत्र में, भूमिगत जल के कारण मेघालय के गारों-खासी क्षेत्र, बिहार कैमूर क्षेत्र तथा उत्तराखण्ड के देहरादून क्षेत्र में यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

(iv) मृदा प्रदूषण

    उर्वरकों, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा औद्योगिक कचड़ों को खुले क्षेत्र में फैला दिये जाने के कारण यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

(v) खनन एवं परित्यक्त भूमि के विस्तार की समस्या-

      जिन क्षेत्रों में खनन के कार्य सम्पन्न हो जाता है। उन खनन क्षेत्रों को परित्यक्त भूमि के रूप में छोड़ दिया जाता है। ऐसे भूमि का भारत में लगातार विस्तार हो रहा है।

      उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए मृदा संरक्षण का कार्य अनिवार्य है। मृदा के संरक्षण हेतु 6वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र सरकार ने तीन बोर्ड का गठन किया था-

1. राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड

2. राष्ट्रीय भूमि उपयोग एवं संरक्षण बोर्ड

3. राष्ट्रीय बंजर भूमि एवं भू उपयोग परिषद

      प्रथम बोर्ड के गठन का मुख्य उद्देश्य संसाधनात्मक दृष्टि से जिस भूमि का पतन हो चुका है उनके संरक्षण एवं विकास हेतु कार्यक्रम का निर्माण करना है। दूसरे बोर्ड के गठन के मुख्य उद्देश्य प्रत्येक राज्यों में भूमि उपयोग प्रतिरूप का निर्धारण करना है। तीसरे बोर्ड के गठन के मुख्य उद्देश्य “मृदा संरक्षण के संबंध में विभिन्न प्रकार के नीतियों का निर्धारण करना है।”

     भारत में भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) को विकसित किया गया है जो कृत्रिम उपग्रह इंटरनेट तथा कम्प्यूटर के माध्यम से सूखा, बाढ़, बंजर भूमि इत्यादि के संबंध में विभिन्न प्रकार के आँकड़ों को इकठ्ठा करता है तथा उनके संरक्षण हेतु तार्किक उपाय भी बताता है। भारतीय GIS को ऊपर में बताये गये तीनों बोर्ड से जोड़ दिया गया है।

     भारत में भूमि विकास कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है। जैसे- 8वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भारतीय बंजर भूमि को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया गया है-

(i) वनीय बंजर भूमि

(ii) गैर वनीय बंजर भूमि-

      वनीय बंजर भूमि पर सामाजिक वानिकी कार्यक्रम चलाकर बनीय बंजर भूमि विकास किया जा रहा है। दूसरी ओर गैर वनीय बंजर भूमि को कृषि क्षेत्र में लाने के प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए किसानों को खेती में जिप्सम का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इस तकनीक का प्रयोग प्राय: उन क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ पर अत्यधिक सिंचाई के कारण लवणीय मृदा का विकास हुआ है। पुन: कंकड-पत्थर से युक्त बंजर भूमि की जलग्रहण विधि के द्वारा मिट्टी के उर्वर बनाने प्रयास किया जाता है।

     उपरोक्त कार्यक्रमों के अलावे योजना आयोग ने भारत को 15 कृषि जलवायु क्षेत्र में विभक्त कर कृषि कार्य करने की सलाह दिया है ताकि किसान मृदा की क्षमता या पर्यावरण के अनुकूल कृषि कार्य कर सके।

     केन्द्र सरकार ने राज्यों को यह सलाह दिया है कि आप समन्वय के आधार पर मृदा संरक्षण का उपाय करें। इसके तहत छोटे क्षेत्र बंधों का निर्माण कर मरुस्थलीय क्षेत्र में बाड़ों का विकास कर यह कार्य करने की सलाह दी गई है।

      चम्बल नदी घाटी क्षेत्र में उबड़-खाबड़ भूमि क्षेत्र को समतल भूमि के क्षेत्र में बदला जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में मृदा अपरदन नहीं हो इसके लिए 1976 ई० में झूम कृषि पर रोक लगा दी गई थी और उसके स्थान पर कंटूर फार्मिंग या “सीढ़ीनुमा कृषि” करने की सलाह दी गई है।

     किसानों को फसल चक्र अपनाने की सलाह दी गई है। रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक उर्वरक प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। भू-उपयोग के प्रतिरूप में आये परिवर्तन को पुनर्स्थापित किया जा रहा है। मिट्टी की स्वास्थ्य की जाँच हेतु “Soil Clinic” की स्थापना की जा रही है।

निष्कर्ष:

     उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मृदा सरक्षण हेतु कई प्रकार के उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों के बावजूद USA के तर्ज पर “एकीकृत मृदा सेवा केन्द्र” की स्थापना किया जाय तथा गंभीर मृदा अपरदन एवं मृदा स्वास्थ ह्रास वाले क्षेत्रों में त्वरित कार्यवाही करने हेतु उचित संस्थागत एवं संरचनात्मक सुविधाओं का विकास किया जाय।

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