4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN / अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच

4. BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN 

(अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN ⇒
BOTTOM RELIEF OF ATLANTIC OCEAN

           अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा अफ्रीका के मध्य 8.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। यह संपूर्ण विश्व के क्षेत्रफल का 1/6 भाग तथा प्रशांत महासागर के क्षेत्रफल का 1/2 भाग है। इसका आकार अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के समान है जिससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारंभ में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका यूरोप तथा अफ्रीका से मिले थे। बाद में महाद्वीपीय प्रवाह के कारण उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका अलग होकर पश्चिम दिशा में प्रवाहित हो गए। जिस कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ।

       उत्तर में यह डेविस की खाड़ी तथा डेनमार्क जलडमरूमध्य एवं नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिन्द महासागर से मिला हुआ है। अटलांटिक महासागर दक्षिण में सर्वाधिक चौड़ा है। 35° दक्षिणी अक्षांश पर इसकी पूर्वी-पश्चिमी चौड़ाई 5920 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा की ओर यह निरंतर सँकरा होता जाता है। साओरोक अंतरीप तथा लाइबेरिया तट के बीच चौड़ाई 2560 किलोमीटर ही है। उत्तर की ओर चौड़ाई पुनः बढ़ती जाती है। 40° उत्तरी अक्षांश पर यह 4800 किलोमीटर हो जाती है। अटलांटिक महासागर के सीमांत सागरों में रूम सागर, कैरेबियन सागर, मेक्सिको की खाड़ी, बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, बैफिन की खाड़ी आदि प्रमुख है।

           अटलांटिक महासागर के नितल में निम्नलिखित चार प्रमुख रूप देखने को मिलते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

            कुछ भागों को छोड़कर अटलांटिक महासागर के चारों ओर चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। उत्तरी अटलांटिक महासागर में मग्नतट सर्वत्र सपाट एवं चौड़े हैं। मग्नतट की चौड़ाई समीपी तट के उच्चावच पर आधारित होती है। पर्वतीय अथवा पठारी तटों के मग्नतट अत्यधिक सँकरे और मैदानी तटों के मग्नतट अत्यधिक विस्तृत और समतल होते हैं। जैसे – बिस्के की खाड़ी से उत्तमाशा अंतरीप के बीच अफ्रीका का मग्नतट तथा 5°-10° S अक्षांश के बीच ब्राजील का मग्नतट सँकरा हो गया है। इसके विपरीत उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी भाग तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के मग्नतट 240 से 400 किलोमीटर तक चौड़े है। न्यूफाउंडलैंड (ग्रांड बैंक) तथा ब्रिटिश द्वीप (डागर बैंक) के चारों ओर विस्तृत मग्नतट पाए जाते हैं। ग्रीनलैंड तथा आइसलैंड के बीच मग्नतट चौड़े हैं। दक्षिणी अटलांटिक महासागर में बाहियाब्लैंक तथा अंटार्कटिका के बीच चौड़े मग्नतट पाए जाते हैं। अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सँकरे मैदान मिलते हैं। इस महासागर के मग्नतटों पर कई सीमांत सागर तथा असंख्य द्वीप पाए जाते हैं।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

        यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मंद होता है। अटलांटिक महासागर में 12.4 प्रतिशत भाग पर मग्नढाल का विस्तार है।

(3) मध्य अटलांटिक कटक (Mid Atlantic Ridge)

           मध्य अटलांटिक कटक उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोवेट द्वीप तक ‘S’ अक्षर के आकार में 14400 किलोमीटर की लंबाई में फैला है तथा कहीं भी सागरतल से 4000 मीटर से नीचे नहीं जाता। इस श्रेणी की उपस्थिति ही अटलांटिक के नितल की सबसे बड़ी विशेषता है। भूमध्यरेखा के उत्तर इस कटक/श्रेणी को डॉल्फिन उभार तथा दक्षिण में चैलेंजर उभार कहते हैं। आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच इस कटक को विविल थामसन कटक कहते हैं। ग्रीनलैंड के दक्षिण में कटक चौड़ा हो जाता है जिसे टेलीग्राफ पठार कहते हैं। 50°N अक्षांश के पास इस कटक की शाखा न्यूफाउंडलैंड उभार के नाम से अलग न्यूफाउंडलैंड तट तक चली जाती है। 40°N अक्षांश के दक्षिण मध्यवर्ती कटक से एक शाखा अजोर उभार के नाम से अजोर तट की ओर जाती है। भूमध्यरेखा पर सियरा लिओन उभार उ०-पू० की ओर तथा पारा उभार उत्तर-पश्चिम की ओर मध्यवर्ती कटक की दो शाखाओं के रूप में चले जाते हैं। 40°S  अक्षांश के पास इस कटक की एक शाखा वालविस कटक अफ्रीका के मग्नतट की ओर तथा दूसरी शाखा रियोग्रांडे उभार के नाम से दक्षिण अमेरिका की ओर मुड़ जाती है।

(4) महासागरीय बेसिन या द्रोणी (Oceanic Basin)

          मध्यवर्ती अटलांटिक कटक द्वारा अटलांटिक महासागर दो विस्तृत बेसिनों में विभक्त है जिनमें अनेक छोटी-छोटी बेसिनें पायी जाती हैं। इनमें प्रमुख बेसिन निम्नलिखित है:-

(i) लेब्राडोर बेसिन- यह उत्तर में ग्रीनलैंड तथा दक्षिण में न्यूफाउंडलैंड के मध्य 4000 मीटर की गहराई तक फैली है।

(ii) उतरी अमेरिका बेसिन- यह उत्तरी अटलांटिक महासागर की सबसे बड़ी बेसिन है। जिसका विस्तार 12° से 40° उत्तरी अक्षांशों के मध्य उत्तरी अमेरिका के तट से 5000 मीटर की गहराई तक विस्तृत है।

(iii) ब्राजील बेसिन- यह दक्षिणी अटलांटिक महासागर में भूमध्य रेखा से 30° दक्षिणी अक्षांश तथा दक्षिणी अमेरिका के तट एवं पारा उभार के मध्य स्थित है।

(iv) स्पेनिश बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक के पूर्व आईबेरियन के पास 30° से 50° उत्तरी अक्षांश के बीच 5000 मीटर की गहराई तक है।

(v) उत्तरी तथा दक्षिणी कनारी बेसिन- यह दो वृत्ताकार बेसिनों से मिलकर बनी है, जिसका विभाजन उच्च भाग द्वारा होता है।

(vi) केपवर्ड बेसिन- यह मध्य अटलांटिक कटक तथा अफ्रीका के मध्य 10° से 20° उत्तरी अक्षांशों के बीच 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(vii) गायना बेसिन- यह गायना कटक तथा सियरा लियोन के मध्य उ०-प० से द०-पू० दिशा में 4000-5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(viii) अंगोला बेसिन- अफ्रीका के तट से प्रारम्भ होकर उ०-पू० से द०-प० दिशा में वॉलविस कटक तक 5000 मी० की गहराई तक विस्तृत है।

(ix) केप बेसिन – 25° से 45° द० अक्षांशों के मध्य अफ्रीका के पश्चिम में स्थित है।

(x) अगुल्हास बेसिन – उत्तमाशा अंतरिप के दक्षिण में 40° से 50° दक्षिणी अक्षांश के मध्य इसका विस्तार अधिक है।

(5) महासागरीय गर्त (Ocean Deeps)

        अटलांटिक महासागर में प्रमुख 19 गर्त पाए जाते हैं। इनमें प्यूर्टोरिको गर्त सबसे गहरा है जिसकी गहराई 4812 फैदम है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरेबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है। अटलांटिक महासागर के तटों के सहारे अभिनव वलन की अनुपस्थिति के कारण गर्त कम पाए जाते हैं। 19 प्रमुख गर्तों में रोमांश गर्त, नरेस गर्त, बाल्डीबिया गर्त, बुचानन, मोसले, चुन, दक्षिणी सैनविच गर्त है।

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अटलांटिक महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधता पूर्ण विशेषताएँ देखने को मिलती है।


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3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियन

3. Submarine Canyons / अंत: समुद्री कंदरायें/ कैनियनSubmarine Canyons



Submarine Canyons ⇒

                       स्थल  की भाँति महाद्वीपीय मग्नतट एवं महाद्वीपीय ढाल पर भी सँकरी, गहरी एवं खड़ी दीवाल से युक्त घाटियाँ पाई जाती है। ऐसे ही घाटियों को सागरीय कंदरायें कहते हैं। महासागरीय जल में डूबे होने के कारण इसे अंतः सागरीय कंदरायें कहते हैं।

विशेषताएँ

◆ समुद्री कंदरायें महाद्वीपीय मग्नतट और मग्नढाल पर वहीं मिलती है जहाँ पर बड़ी-बड़ी नदियों के मुहाना पाई जाती है।

◆ अंत: सागरीय कंदराएँ अधिकतर महासागरीय तटीय भागों के सहारे लंबवत रूप से पाए जाते है।

◆ समुद्री कंदराओं के पार्श्व का ढाल बिल्कुल खड़ा होता है इसका का अनुप्रस्थ काट V-आकार की घाटी के समान होता है।

◆ समुद्री कंदरा में ज्यों-ज्यों स्थलीय भाग से गहन सागरीय क्षेत्र की ओर जाते हैं त्यों-त्यों उसकी गहराई एवं ढाल में वृद्धि होती जाती है। सामान्यत: इसकी गहराई 2000 – 3000 फीट तक होता है।

◆ अंत: सागरीय कंदरा के तली में रेत, सिल्का, सिल्ट एवं बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

◆ निर्माण प्रक्रम के आधार पर अंत: सागरीय कंदराएँ दो प्रकार के होती है –

(i) हिमानी के द्वारा निर्मित कंदरायें

(ii) अन्य प्रक्रम के द्वारा निर्मित कंदरायें

उत्पत्ति

           हिमानी के द्वारा निर्मित कंदराओं को फियोर्ड कहते हैं। फियोर्ड का निर्माण प्रायः महाद्वीपीय एवं पर्वतीय हिमानी के अचानक समुद्र में उतरने के कारण होता है। फियोर्ड को कुछ समुद्रीवेता समुद्री कंदरा के श्रेणी में नहीं रखते। क्योंकि उनका मानना है कि इसका अध्ययन हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति के अंतर्गत किया जाना चाहिए।

            अन्य प्रक्रम से निर्मित कंदराओं की उत्पत्ति के सम्बंध में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। जैसे :-

(1) पटलविरूपणी या वलन सिद्धान्त (Diastrophic Theory) –

             इस सिद्धांत के अनुसार महाद्वीपीय मग्नतट एवं मग्नढाल पर भूसंचलन की क्रिया के कारण निर्मित वलन या भ्रंशन के कारण समुद्री कंदराओं का निर्माण हुआ है। कैलिफोर्निया और हडसन की खाड़ी के तट पर इसी क्रिया से निर्मित समुद्री कंदरायें मिलती है।

(2) भू-पृष्ठीय अपरदन का सिद्धांत  –

             इसे डाना (1863) और शेफर्ड (1941) ने इस मत को प्रतिपादित किया था। इनके अनुसार स्थल भाग के निमग्न (डूबने) हो जाने के कारण स्थल पर मिलने वाली नदियाँ भी निमग्न हो गई। अंततः उन पर सागरीय जल का फैलाव हो गया। कालांतर में वही नदियाँ अंत: समुद्री कंदरायें कहलाए।

(3) पंक तरंग सिद्धान्त (Turbidity Current Theory) –

             इस मत का प्रतिपादक डेविस, डेली जैसे भूगोलवेत्ता है। इनके अनुसार तट की ओर चलने वाले तीव्र पवनों के कारण तटीय भागों में बड़ी मात्रा में जलराशि एकत्रित हो जाती है जिसमें पंक (कीचड़) मिला होता है। यही पंक जब पुनः समुद्र की ओर लौटती है तो उनके अपरदन से अंतः सागरीय कंदराओं का निर्माण होता है। यही सिद्धांत सर्वाधिक मान्यता रखता है।

वितरण 

             बियर्ड एवं शेफर्ड महोदय ने विश्व के 102 कन्दराओं पर शोध किया और पाया कि कंदराएँ सर्वत्र पाई जाती है। अटलांटिक महासागर में यू.एस.ए. के पूर्वी तट पर चेसापिक कैनियन और कनाडा में हडसन कैनियन प्रमुख है। फ्रांस के दक्षिण पश्चिम तट पर बिस्फे की खाड़ी में केप ब्रिटेन कैनियन, पुर्तगाल के पश्चिमी तट पर नजारे कैनियन, अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कांगो कैनियन विश्व प्रसिद्ध है।

             इसी तरह प्रशांत महासागर के तट पर भी कई कैनियन मिलते हैं। जैसे- आलास्का तथा कनाडा के तट पर कोलंबियन कैनियन पाई जाती है।

            हिंद महासागर में गिरने वाली लगभग सभी प्रमुख नदियों के मुहानों पर कैनियन का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष

        निष्कर्षत: इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से कहा जा सकता है कि अंत: सागरीय कंदराएँ या कैनियन महाद्वीपीय मग्नतट और महाद्वीपीय मग्नढाल पर मिलने वाली एक विशिष्ट सागरीय स्थलाकृति है।


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2. Ocean Bottom Relief / महासागरीय नितल उच्चावच

2. Ocean Bottom Relief 

(महासागरीय नितल उच्चावच)


 महासागरीय नितल उच्चावच⇒

       प्रारंभ में ऐसी मान्यता थी कि महासागरीय सतह तश्तरी के समान होते हैं अर्थात इसके किनारे में ऊँचाई अधिक और बीच में सबसे गहरा क्षेत्र होगा। लेकिन चैलेंजर अभियान (1884,1888) के बीच खोजों से कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए। जैसे पूरे धरातल का 70.8 प्रतिशत भूभाग पर समुद्र और शेष 29.2 प्रतिशत भाग पर स्थल का फैलाव है। समुद्र में सबसे गहरा भाग किनारे पर है। विश्व का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला अटलांटिक महासागर में अवस्थित है। वस्तुतः इस अभियान के बाद यह मान्यता विकसित हुई कि पृथ्वी के भूपटल का अध्ययन दो भागों में बांट कर किया जाना चाहिए:-

(1) समुद्री स्थलाकृति

(2) स्थलीय स्थलाकृति

      क्योंकि समुद्री स्थलाकृति में भी वे सभी जटिलताएँ पाई जाती है जो स्थलीय स्थलाकृति में पाई जाती है। जिस प्रकार स्थलीय स्थलाकृति के विकास में भू-संचलन, अपरदन, निक्षेपन जैसे अंतर्जात एवं बहिर्जात बल का प्रभाव पड़ता है। ठीक उसी प्रकार समुद्री भूपटल पर भी पड़ता है। चैलेंजर अभियान के बाद समुद्री वैज्ञानिकों ने सोनार नामक वैज्ञानिक यंत्र का प्रयोग करके समुद्री उच्चावच का निर्धारण करने का प्रयास किया। वर्तमान में यह कार्य कृतिम उपग्रह के माध्यम से किया जा रहा है।

        अधिकतर समुद्री वैज्ञानिकों ने समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु उच्चतादर्शी वक्र (Hypsographic Curve Method)  को महत्वपूर्ण मानते हैं। इस दिशा में कोसीना (1921), Severdrup (1942) का कार्य सबसे महत्वपूर्ण है। Severdrup महोदय ने समुद्री भूपटल के क्षेत्रफल का प्रतिशत के रूप में X-अक्ष पर और ऊँचाई को Y-अक्ष पर लेते हुए उच्चतादर्शी वक्र को खींचा।

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        Severdrup ने अपने अध्ययन में बताया कि समुद्र की औसत ऊँचाई 3800 मीटर और स्थल की औसत ऊँचाई 840 मीटर है। समुद्री उच्चावच का अध्ययन करने हेतु समुद्री भूपटल को छ: प्रमुख समुद्री स्थलाकृति के रूप में विभाजित कर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि।

        उपरोक्त स्थलाकृतियों को एक काल्पनिक Hypsographic Curve के द्वारा दिखाया गया है-

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(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelves)

         यह महाद्वीप का ही भाग है जो सागर में डूबा होता है। यह ग्रेनाइट जैसे चट्टान से निर्मित होता है। यहाँ सागर छिछला होता है। इसका निर्माण धँसान या उत्थान से या अपरदन क्रिया से संभव होता है। डेली जैसे समुद्रीवेता के अनुसार “प्लीस्टोसीन कल्प में हिमानीयुग के अंत होने के बाद समुद्र के सतह में 150m का उत्थान हुआ।” इसका तात्पर्य है कि प्लीस्टोसीन काल तक महाद्वीपीय मग्नतट स्थलखंड के ही प्रत्यक्ष भूभाग थे। इसका ढाल समुद्र की ओर होता है। इसका औसत ढाल 1°/ Km या 17 फीट/मील बताया जाता है। संपूर्ण समुद्री क्षेत्रफल का 8.6 प्रतिशत भाग महाद्वीपीय मग्नतट के अंतर्गत आता है।

   महाद्वीपीय मग्नतट का वितरण अत्यंत ही असमान है। इसका सर्वाधिक विस्तार उत्तरी अटलांटिक महासागर में हुआ है। यहाँ इसका विस्तार हडसन की खाड़ी से लेकर नार्वेजियन सागर तक लगभग लगातार हुआ है। इसका प्रमुख कारण इस प्रदेश में समुद्री प्लेटफार्म का अवस्थित होना है। ये प्लेटफॉर्म प्लीस्टोसीन युग में हिमानी के पिघलने के बाद बढ़े हुए समुद्री जलस्तर के अपरदन से निर्मित हुआ है।

    अटलांटिक महासागर के दक्षिणी भाग में सर्वाधिक सँकरे मग्नतट मिलते हैं। विश्व का सबसे सँकरा महाद्वीपीय मग्नतट अफ्रीका महाद्वीप में नामीबिया के अंगोला तट के मध्य मिलता है (चौ० 10 से 15 मीटर)। पुनः ब्राजील के तट, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट, अफ्रीका के पूर्वी तट सँकरे महाद्वीपीय मगनतट का निर्माण करते हैं। इसका प्रमुख कारण भू-भ्रंश क्रिया है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग और उत्तरी भाग में मग्नतट चौड़ा है। इसका प्रमुख कारण निक्षेपन का कार्य बताया जाता है। दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट या एंडीज तट सँकरे है। इसी तरह उत्तरी अमेरिका का प्रशांत तट सँकरा है। इसका प्रमुख कारण दो प्लेटो का प्रत्यावर्तन (टकराना) है। अधिकतर छिछले सागर में महाद्वीपीय मग्नतट काफी चौड़ा हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन को बताया जाता है। यूरोप का उत्तरी सागर एक छिछला सागर है। यही कारण है कि उस सागर में विश्व के बड़े-बड़े मछलियों के बैंक अवस्थित है। जैसे- डागर बैंक

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल (Continental Slope)

      यह महाद्वीपीय मग्नतट का अग्र भाग है। यह तीव्र ढाल का क्षेत्र है। यह ग्रेनाइट से निर्मित होता है। इसे महाद्वीपों का अंतिम किनारा माना जाता है। इसमें बेसाल्ट से निर्मित चट्टानें मिलने लगती है। औसतन 200 से 300 मीटर की गहराई तक महाद्वीपीय मग्नढाल मिलते हैं लेकिन चिली और पेरू का तट इसका अपवाद है। यहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल 3700 मीटर की गहराई तक मिलते हैं। महासागरीय क्षेत्रफल का 8.5 प्रतिशत भूभाग इसके अंतर्गत आता है। इसका औसत ढाल 2° से 4.2°/Km होता है। ढालों का निर्माण धँसान क्रिया या प्लेटों के प्रत्यावर्तन से हुआ है। अफ्रीका के किनारे तथा उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिण अमरिका के पश्चिमी तट पर प्रत्यावर्तन क्रिया के कारण ही ढाल तीव्र पाए जाते हैं। 

(3) महासागरीय कटक एवं महासागरीय उभार (Oceanic Ridge and Sea Arc)

          यह एक ऐसी स्थलाकृति है जिसकी ऊँचाई समुद्री भूपटल से समुद्र तल तक या उससे नीचे भी हो सकता है। यह एक पहाड़ीनुमा स्थलाकृति है जिसमें चोटियाँ पाई जाती है और पार्श्व का ढाल तीव्र होता है। संरचना के दृष्टिकोण से रेखीय होते हैं। इसमें बेसाल्टिक चट्टानों की प्रधानता होती है। महासागरीय कटक का निर्माण प्लेटों के अपसरण सीमा के सहारे हुआ है। अपसरण सीमा के सहारे प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती है और दरार का निर्माण करती है। इन दरारों से ही मैग्मा पदार्थ मैग्मा चैंबर से बाहर आकर शीतल होती है और कटकों का निर्माण करती है।

       विश्व का सबसे लंबा समुद्री कटक अटलांटिक महासागर में स्थित है जिसकी लंबाई 14400 किलोमीटर है जिसका आकार अंग्रेजी अक्षर ‘S’ के समान है। इसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से लेकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक हुआ है। यह पृथ्वी पर का सबसे लंबा पर्वत श्रृंखला के रूप में जाना जाता है। इसकी औसत ऊँचाई 2000 से 4000 मीटर तक है। कई स्थानों पर समुद्र से बाहर आकर छोटे-छोटे द्वीपों का निर्माण किया है। इसे उत्तरी अटलांटिक महासागर में विविल थॉमसन कटक और डॉल्फिन कटक कहते हैं जबकि दक्षिणी अटलांटिक में विषुवत रेखा के पास चैलेंजर कटक कहते हैं।

       हिंद महासागर में भी कई समुद्री कटक मिलते हैं जिसकी लंबाई 9000 किलोमीटर है जिसका विस्तार लक्षद्वीप से लेकर अंटार्कटिका तक है। इसका औसत ऊंचाई 2000 मीटर है। इसी कटक पर मालद्वीप, सेल्सेस, मॉरीशस जैसे द्वीप स्थित है। इसके कई स्थानीय नाम है। जैसे- लक्का द्वीप चैगोस, सेंटपॉल चैगोस, एमस्टरडम सेंटपॉल कटक, करगुएलेन गॉसबर्ग कटक।

      प्रशांत महासागर में भी कई कटक मिलते हैं। जैसे- लॉर्डहोवे कटक, टुआमाई कटक, एलबेडरॉस कटक, कोकस कटक, हवाईयन कटक इत्यादि के नाम से प्रसिद्ध है।

(4) महासागरीय बेसिन या मैदान (Oceanic Basin)

       समुद्र के अंदर मिलने वाले सपाट मैदान को महासागरीय बेसिक या गहन सागरीय मैदान कहते हैं। सेवरडरूप ने बताया कि महासागरीय कटक के दोनों ओर महासागरीय मैदान का निर्माण हुआ है। यह मैदान 3000 से 6000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। हैरिहेस महोदय ने इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण महासागरीय नितल प्रसार को बताया है।

       विश्व के सभी प्रमुख महासागर में महासागरीय मैदानों का प्रमाण मिलता है। जैसे अटलांटिक महासागर में अटलांटिक कटक के पश्चिमी भाग में चार गहन सागरीय मैदान मिलते हैं। जैसे- लैब्राडोर का मैदान, उत्तरी अमेरिकी बेसिन, ब्राजीलियन बेसिन, अर्जेंटीना बेसिन तथा अटलांटिक कटक के पूर्वी भाग में कुल सात मैदान मिलते हैं। जैसे – स्पेनिश मैदान, केपवर्डे मैदान, केनारी मैदान, गिनी मैदान, अंगोला मैदान, केप बेसिन, अगुल्हास बेसिन मिलते हैं।

      इसी तरह हिंद महासागर में ओमान बेसिन, अरब बेसिन, सोमाली बेसिन, मॉरीशस बेसिन, अंडमान बेसिन, अंटार्कटिक बेसिन, जैसे गहन सागरीय मैदान मिलते हैं।

     इसी तरह प्रशांत महासागर में कैलिफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिण-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत बेसिन मिलते हैं।

(5) महासागरीय गर्त (Oceanic Deeps)

        महासागरीय या समुद्री गर्त समुद्र का सबसे गहरा भाग होता है। इसकी औसत गहराई 6000 मीटर से अधिक होता है। यह एक रेखीय एवं सँकरी संरचना वाली आकृति है। इसके किनारे का ढाल काफी तीव्र होता है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण प्लेटों का प्रत्यावर्तन है। कुल समुद्री क्षेत्रफल का 7% भाग इसके अंतर्गत आता है।

    विश्व में प्रमुख 57 समुद्री गर्त है। विश्व का सबसे गहरा समुद्री गर्त मेरियाना गर्त (11.02 Km) है जो फिलीपींस द्वीप के पूर्वी भाग में अवस्थित है। विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 फैडम) जो दक्षिण प्रशांत महासागर में अवस्थित है। प्रशांत महासागर में प्रमुख 57 गर्तों में 32 गर्त और अटलांटिक महासागर में 19 गर्त तथा हिंद महासागर में 6 गर्त पाए जाते हैं।

   अटलांटिक महासागर का सबसे गहरा गर्त प्यूर्टोरिको गर्त है जबकि हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है। प्यूर्टोरिको गर्त उत्तरी अटलांटिक महासागर में कैरीबियन सागर के प्यूर्टोरिको द्वीप के पास स्थित है जिसकी औसत गहराई 4622 फैदम है। सुंडा गर्त इंडोनेशिया में सुमात्रा एवं जावा के मध्यवर्ती भाग में अवस्थित है जिसका औसत गहराई 3826 फैदम है।

(6) अन्य स्थलाकृतियाँ जैसे समुद्री कंदरा, समुद्री पहाड़ी, अवशिष्ट पहाड़ी, प्रवाल भित्ति इत्यादि

     समुद्री भूपटल पर कई स्थालाकृतियाँ भी मिलते हैं। जैसे- चूना पत्थर से युक्त जीव-जंतुओं के निक्षेप से प्रवाल भित्तियों का प्रमाण मिलता है। ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी-पूर्वी भाग में विश्व का सबसे लंबा प्रवाल भित्ति ग्रेट बैरियर रीफ मिलता है।   

        अन्य समुद्री स्थलाकृतियों में समुद्री कंदरा का विशेष स्थान प्राप्त है। यह ‘V’ आकृति का होता है। इसका निर्माण समुद्री तरंगों के अपरदन से महाद्वीपीय मग्नढाल पर होता है।

    समुद्री पहाड़ी (Sea Mount) तथा ग्योट दो विशिष्ट प्रकार के समुद्री स्थलाकृति है। सी माउंट का आकार गुंबदाकार पहाड़ी के समान होता है। जब सी माउंट का ऊपरी भाग टूटकर या अपरदित होकर सपाट हो जाता तो उसे ग्योट कहते हैं।

निष्कर्ष

   इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचनाओं वाली भूपटल है।


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1. Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन

1. Change in Sea Level 

(समुद्र तल में परिवर्तन)


Change in Sea Level / समुद्र तल में परिवर्तन⇒Change in Sea Level

        समुद्री जल का तल (S.L.) समुद्री वातावरण का एक गत्यात्मक पहलू है। यद्यपि पृथ्वी तंत्र के कुल जल की मात्रा निश्चित है। लेकिन समय-समय पर जल के अवस्था में परिवर्तन के कारण समुद्र तल में भी परिवर्तन होता है। समुद्र तल का परिवर्तन कई कारकों का परिणाम है। जैसे-

◆ हिमयुग के आगमन से समुद्र तल में गिरावट आती है और जब हिमयुग की समाप्ति होती है तथा वातावरण का तापमान अधिक हो जाता है तो स्थलीय हिम पिघलकर समुद्र में आ जाते हैं और जल स्तर ऊँचा हो जाता है।

◆ भूगर्भिक प्रक्रियाएँ भी समुद्र के जलस्तर में परिवर्तन लाते हैं। जैसे अगर भूगर्भिक हलचल के कारण समुद्री नितल का धँसान होता है तो जल स्तर गिरती है और जब उत्थान होता है तो जलस्तर बढ़ती है। जैसे- कई स्थलीय भूभागों पर समुद्री जीवाश्म के प्रमाण मिलते हैं जो यह बताता है कि कभी वहाँ पर समुद्री जल रहा होगा और जब वहाँ समुद्र रहा होगा तो निश्चित रूप से एक समुद्री जलस्तर भी रहा होगा। जब उस भू-भाग का उत्थान हो जाता है तो समुद्र का जलस्तर ऊपर की ओर खिसक जाता है लेकिन यह एक सापेक्षिक घटना है।

नोट : अगर समुद्र नितल का धँसान होता है तो जलस्तर नीचे चली जाती है और जब समुद्र नितल का उत्थान होता है तो समुद्र जलस्तर बढ़ जाता है।

◆ विभिन्न जलवायु विज्ञान एवं समुद्री विज्ञान के वैज्ञानिकों ने समुद्र तल में होने वाले परिवर्तन को गत्यात्मक मानते हुए यह माना है कि समुद्र तल में परिवर्तन जल के आयतन में बढ़ोतरी या कमी से होती है।

         उपरोक्त तीनों कारकों में से प्रथम कारक है समुद्र तल परिवर्तन के लिए सबसे उत्तरदायी कारक है।

         विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र तल में 110 से 140 मीटर तक परिवर्तन हुआ है। प्रायः सभी हिम युग में समुद्र का तल 100 से 150 मीटर के बीच नीचे चले गए थे। प्लीस्टोसीन के अंतिम हिमानी युग के अंत में समुद्र का तल वर्तमान तल से 110 मीटर नीचे पहुँच गया था। फेयरब्रिज के अनुसार “समुद्रतल में सतत सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं।” लेकिन 1800 ई० के बाद में इसमें काफी स्थिरता आई है। हालाकि औद्योगिक क्रांति के बढ़ते प्रभाव के कारण 1970 के दशक से वातावरण में तापमान के बढ़ोतरी से समुद्र तल में भी बढ़ोतरी होने लगी है। सामान्य नियम के अनुसार 1℃ वायुमंडलीय तापमान के बढ़ने से 0.55 mm समुद्री तल में वृद्धि होती है। “विश्व जलवायु विज्ञान संस्था” के अनुसार 1985 से 1997 के बीच औसत तापमान में बढ़ोतरी 0.37℃ हुआ है।

परिणाम
        अनेक पारिस्थैतिक वैज्ञानिकों के अनुसार 2030 ई० तक समुद्रतल में 3 मीटर तक वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में विश्व के कई द्वीपीय देश पूर्णत: जलमग्न हो सकते हैं। मालदीप तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर के कई द्वीप समुद्र में डूब जाएँगे। कई तटीय महासागर जैसे मुंबई, न्यूयार्क, टोकियों, मैक्सिको सिटी, रियो डे जेनेरियो पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कई प्रवाल भित्ति जलमग्न हो जाएंगे। अधिक समुद्री तल के परिवर्तन से जलवायु पर भी विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। नदियों के मुहाने पर समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाएगा। कई तटीय मैंग्रोव या ज्वारीय वनस्पति विलुप्त हो जाएंगे। केवल बांग्लादेश में ही 1.5 करोड़ जनसंख्या को विस्थापित होना पड़ेगा। अर्थात समुद्रतल में हो रहे परिवर्तन का विनाशकारी प्रभाव अवश्य संभावी है। 

उपाय

         भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र तल में हो रहे बढ़ोतरी का अध्ययन करवाया है। इन दोनों के बीच पाए जाने वाले सह संबंध को देखते हुए एक आपातकालीन योजना बनाने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत लगभग एक करोड़ आबादी को तटीय क्षेत्र से विस्थापित कर सुरक्षित स्थान पर बसाने का कार्य किया जा रहा है। इसी तरह विश्व के कई देश ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्र तल में हो रहे परिवर्तन पर नजर टिकाए हुए हैं। समुद्र तल में परिवर्तन न  हो इसके लिए कई देशों ने शिखर बैठक कर पृथ्वी सम्मेलन के दस्तावेज पर, क्योटो प्रोटोकॉल पर, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर अपना सहमति व्यक्त किया है ताकि एक ओर वायुमंडल को गर्म होने से बचाया जाय वहीं दूसरी ओर समुद्री तल में हो रहे परिवर्तन को भी रोक जाय।


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अध्याय 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ : नाभिकीय, जैविक और रासायनिक

 खण्ड (ब) अध्याय 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ : नाभिकीय, जैविक और रासायनिक

बिहार बोर्ड के 9वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें


अध्याय 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ : नाभिकीय, जैविक और रासायनिक

अध्याय 11 मानवीय
11.3 नाभिकीय
वस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर
1. इनमें से कौन परमाणु ऊर्जा केन्द्र है?
(क) कैगा
(ख) वाराणसी
(ग) दिल्ली
(घ) मेरठ
उत्तर – (क) कैगा
 
2. हीरोशिमा किस देश में है?
(क) भारत
(ख) जापान
(ग) चीन
(घ) ताईवान
उत्तर – (ख) जापान
 
3. परमाणु विस्फोट से बचने के लिए सर्वप्रथम प्रतीक चिन्ह का विकास किसने किया है?
(क) टोकियो विश्विद्यालय
(ख) कैम्ब्रिज विश्वद्यालय
(ग) कैलिफोर्निया विश्विद्यालय
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर – (ग) कैलिफोर्निया विश्विद्यालय (1946)
 
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर 
 
1. परमाणु ऊर्जा क्या है?
उत्तर – परमाणु के नाभिक के संलयन तथा विखंडन की प्रक्रियाओं द्वारा काफी अधिक मात्रा में ऊर्जा निकलती है जिसे परमाणु ऊर्जा कहा जाता है। इसके अंतर्गत यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों का उपयोग किया जाता है।
 
2. विश्व में सर्वप्रथम परमाणु बम किस देश पर गिराया गया था?
उत्तर – परमाणु बम का सर्वप्रथम विस्फोट 1945 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में जापान के दो नगरों पर परमाणु बम गिराया गया था। सर्वप्रथम 6 अगस्त, 1945 में हवाई हमले के द्वारा हिरोशिमा पर तथा पुनः 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराये गए। इससे लाखों लोगों की मौत हुई।
 
3. भारत के किस राज्य में परमाणु परीक्षण किया गया?
उत्तर – भारत के राजस्थान के मरुस्थल(पोखरण) में परमाणु परीक्षण किया गया था।
 
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर 
 
1. रेडियेशन से क्या क्या हानि होती है ? मनुष्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी दें।
उत्तर – रेडियेशन से निम्नलिखित हानि होती है- 
(i) रेडियेशन के प्रभाव से जीवों में अनुवांशिक पदार्थ (Genetic Materials) में उत्परिवर्तन की दर में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरुप हड्डी का टी० वी०, कैंसर, शारीरिक विकृतियां तथा अंगों के समुचित विकास में असमानताएँ उत्पन्न हो सकती है। 
(ii) पराबैगनी किरणों के प्रभाव से त्वचा संबंधी रोग  हो सकते हैं। 
(iii) नाभिकीय विस्फोटों  होने से ओजोन की सुरक्षा परत का क्षय होता है।
(iv) रेडियोधर्मी पदार्थों के रेडियेशन से ब्लड कैंसर, बांझपन, दृष्टिदोष आदि रोग हो सकते हैं।
 
2. परमाणु ऊर्जा से क्या लाभ है।  वर्णन करें।
उत्तर – परमाणु ऊर्जा से निम्नलिखित लाभ होते हैं-
◆ बिजली के उत्पादन में,
◆ परमाणु बम्ब बनाने में,
◆ इससे गाड़ियाँ चलाई जा सकती है,
11.2 रासायनिक आपदा (Chemical Disaster)
वस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर
 
1. भोपाल में रसायनिक गैस रिसाव कब हुआ था?
(क) 1984
(ख) 1990
(ग) 1930
(घ) 2004
उत्तर – (क) 1984
 
2. तूतीकोरिन में 1997 ई० में गैस रिसाव से कौन-सी बीमारी उतपन्न हुई थी?
(क) उल्टी होना
(ख) सर्दी एवं खाँसी
(ग) उल्टी होना एवं छाती में जलन
(घ) मस्तिष्क ज्वर
उत्तर – (ग) उल्टी होना एवं छाती में जलन
 
3. अम्लीय वर्षा का सर्वाधिक प्रभाव कहाँ पड़ा
(क) पटना महानगर
(ख) दामोदर घाटी क्षेत्र
(ग) उत्तरी बिहार
(घ) असम घाटी क्षेत्र
उत्तर – (ख) दामोदर घाटी क्षेत्र
 
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर 
 
1. किस देश द्वारा गैस के प्रयोग से यहूदियों को मारा गया था।
उत्तर – जर्मनी द्वारा गैस के प्रयोग से यहूदियों को मारा गया था।
 
2. कीटनाशक में किस रासायनिक पदार्थ का प्रयोग होता है?
उत्तर – कीटनाशक में मिथाइल आइसोसाइनेट तथा हाइड्रोजन साइनाइड रसायन का प्रयोग किया जाता है। 
 
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
 
1. गैस रिसाव होने पर किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिए?
उत्तर – गैस रिसाव की स्थिति में वहाँ मौजूद सभी लोगों को स्पष्ट दिशा-निर्देश देने की जरूरत है ताकि वे सभी लोग वायु की उल्टी दिशा में जायें। गैस रिसाव पर लोगों को यथाशीघ्र मास्क लगा लेना चाहिए। सभी कर्मचारियों की एक निश्चित अंतरात पर चिकित्सों द्वारा जाँच होनी चाहिए। कारखानों में सायरन की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि तत्काल सभी को सूचित किया जा सके।
 
2. रासायनिक आपदा के अंतर्गत आने वाली समस्याओं का वर्णन करें।
उतर – रासायनिक आपदा के अंतर्गत निम्नलिखित तीन समस्याएँ आती है-
 
(i) विषेले रासायनिक उत्पाद से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँ
 
(ii) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँ 
 
(iii) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदाएँ
 
(i) विषैले रासायनिक उत्पाद से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँ – इसआपदा का सर्वाधिक प्रभाव कृषि उत्पाद पर देखने को मिलता है। रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से न सिर्फ मृदा के सूक्षम जीवों का विनाश होता है बल्कि उत्पाद भी विषैली हो जाता है। इसके अलावा कई प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है जो जानलेवा साबित होती हैं। इससे हमेशा अम्लीय वर्षा का डर बना रहता है विशेषकर महानगरों में।
 
(ii) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँ – रासायनिक आयुध के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के जहरीले गैसों के प्रयोग के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थों में भी ऐसे गैस सन्निहित होते हैं जिनके प्रभाव से त्वचा में जलन और गलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है यहाँ तक कि मृत्यु भी हो जाती है।
 
(ii) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदा – गैस रिसाव बड़ी आपदा का रूप ले सकता है। भोपाल गैस रिसाव (1984) इसका प्रमाण है। पुनः 1999 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन गैस रिसाव के उदाहरण है। 
 
11.3  जैविक आपदा (Biological Disaster)
 
वस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर
 
1. डेंगू बीमारी का क्या कारण है?
(क) आग लगने से
(ख) एक बर्तन में अधिक समय तक पानी रहने से
(ग) बाढ़ आने से
(घ) गंदे भोजन से
उत्तर – (ख) एक वर्तन में अधिक समय तक पानी रखने से
 
2. एंथ्रेक्स क्या है?
(क) अति सूक्ष्म जीव
(ख) युद्धपोत
(ग) जंगली जानवर
(घ) युद्ध का एक अस्त्र
उत्तर – (क) अति सूक्ष्म जीव
 
3. भारत में एड्स से लगभग कितने लोग प्रभावित है?
(क) 25 लाख
(ख) 30 लाख
(ग) एक करोड़
(घ) 50 लाख
उत्तर – (क) 25 लाख
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर:
 
1. प्लेग और हैजे का क्या कारण है?

उत्तर – प्लेग – पास्चुरेला पेस्टिस नामक जीवाणु से होता है। 

हैजे – विब्रियो कॉमा नामक जीवाणु से होता है।
2.एड्स की बीमारी के कारणों को बतायें।
उत्तर – एड्स वायरस जनित बीमारी है। इसका फैलाव वंशानुगत या दूषित रक्त चढ़ाने से होता है। बड़ों में यह असुरक्षित यौन संबंध के कारण होता है।
 
3. हेपाटाइटिस बीमारी के कारणों को बतायें।
उत्तर – यह हेपेटाईटिस बी (HBV) नामक वायरस के कारण होता है। इससे लीवर व यकृत को क्षति होती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:
 
1. जैविक आपदा कितने प्रकार के हैं ? उनका संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर – जैविक आपदा को चार वर्गों में विभाजित किया गया है-
(i) कम विनाशकारी बीमारियाँ
(ii) घातक बीमारियाँ
(iii) भरे क्षेत्र को प्रभावित करने वाले अति घातक बीमारियाँ
(iv) दीर्घकाल तक प्रभावित करने वाली बीमारियाँ
 
(i) कम विनाशकारी बीमारियाँ- प्रथम वर्ग में उन बीमारियों को रखा गया है जिसका कारण सूक्ष्म जीवाणु और वायरस होता है। ये वो जीवाणु और वायरस होते हैं जो चिकन पॉक्स, केनिन, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं। ये वो बीमारी है जो अति विनाशकारी नहीं होते हैं। इसे तात्कालिक बचाव के लिए कुछ सामान्य नियमों का पालन करना आवश्यक है। जैसे- ग्लब्स, मास्क जैसे सामानों का सतत प्रयोग करना चाहिए। दूषित पदार्थों के उपयोग से भी जैविक आपदा उत्पन्न होती है।
 
(ii) घातक बीमारियाँ- इस जैविक आपदा के अंतर्गत ऐसी बीमारियों को रखा गया है जिनकी उत्पत्ति का कारण सूक्ष्म जीवाणु और वायरस है। इस वर्ग से उत्पन्न बीमारियों में हेपेटाइटिस ए, बी और सी, इनफ्लुएंजा, लाइम डिजीज मिजिल्स, चिकेन-पॉक्स और एड्स जैसी बीमारियाँ संभव है। ऐसी बीमारियों से बचने के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण आवश्यक है।
 
(iii) भरे क्षेत्र को प्रभावित करने वाले अति घातक बीमारियाँ- जैविक आपदा के तीसरे भाग में ऐसे सूक्ष्म जीवाणु और वायरस को रखा गया है जो मानव समूह के लिए विनाशकारी आपदा ला सकता है। इसके अंतर्गत एंथ्रेक्स, पश्चिमी नील वायरस, वेनेजुएलियन एन्सेफेलाइटिस, स्मॉल पॉक्स, ट्यूबरक्लोसिस वायरस, रिफ्ट वैली बुखार, येलो बुखार तथा मलेरिया, हैजा, डायरिया प्रमुख है।
 
(iv) दीर्घकाल तक प्रभावित करने वाली बीमारियाँ- चौथे स्तर के जैविक आपदा के अंतर्गत अति विनाशकारी वायरस को रखा गया है। इसमें आने वाले वायरस वोलीवियन तथा अर्जेंटियन बुखार तथा वर्ल्ड फ्लू, एड्स, डेंगू बुखार, मारवर्ग बुखार, एबोला बुखार इत्यादि प्रमुख है।
 
2. जैविक अस्त्र क्या है ? इससे उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर – युद्ध के मारक अस्त्रों में अब नई तकनीक के अस्त्र बनाए गए हैं जिन्हें जैविक अस्त्र कहते हैं। इसे भारी विनाश का अस्त्र भी कहा गया है। जैविक अस्त्रों की तकनीक का विकास जापानियों द्वारा किया गया। किंतु जैविक अस्त्रों का वास्तविक प्रयोग 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद प्रारंभ हुआ। एंथ्रेक्स नाम के जवानों को अमेरिका के महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्रों में डाक सेवा के द्वारा अथवा अज्ञात व्यक्तियों द्वारा पहुँचाया जाने लगा।                       
 
3. जैविक आपदा से बचाव के उपाय बतायें।
उत्तर – जैविक आपदा से बचाव के लिए आपदा जोखिम प्रबंधन की आवश्यकता होती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें हैं-
(i) गर्म पानी पीना एवं ताजा भोजन ग्रहण करना चाहिए।
(ii) आवश्यक कीटनाशक दवाओं का छिड़काव तथा प्रशासनिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। 
(iii) अनजान व्यक्ति द्वारा दिये गये किसी भी प्रकार के डिब्बे या सामान को हाथ लगाने या छूने की जरूरत नहीं क्योंकि इसमें एंथ्रेक्स की संभावना हो सकती है। 
(iv) किसी अनजान वस्तु को छूने के लिए ग्लब्स का प्रयोग किया जाना चाहिए।
(v) कुत्ते के दलों की मदद से जैविक अस्त्रों की जगह की पहचान की जानी चाहिए है।

(vi) जैविक अस्त्रों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।


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