(ख) जल संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solution खण्ड (क) इकाई 1.

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solution
खण्ड (क)

इकाई 1. (ख) जल संसाधन

जल संसाधन


जल संसाधन

 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर:

1. वृहद क्षेत्र में जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी को कहते हैं-
(a) उजला ग्रह
(b) नीला ग्रह
(c) लाल ग्रह
(d) हरा ग्रह
उत्तर- (b) नीला ग्रह 
2. कुल जल का कितना प्रतिशत भाग महासागरों में निहित है?
(a) 9.5 %
(b) 95.5 %
(c) 96 %
(d) 96.6 %
उत्तर- (d) 96.6 % 
3. देश के बाँधों को किसने भारत का मंदिर कहा था?
(a) महात्मा गाँधी
(b) डॉ राजेन्द्र प्रसाद
(c) पंडित नेहरू
(d) स्वामी विवेकानंद
उत्तर- (c) पंडित नेहरू
4. प्राणियों के शरीर में कितना प्रतिशत जल की मात्रा निहित होती है?
(a) 55 %
(b) 60 %
(c) 65 %
(d) 70 %
उत्तर- (c) 65 %
5. बिहार में अति जल-दोहन से किस तत्व का सकेन्द्रण बढ़ा है?
(a) फ्लोराइड
(b) क्लोराइड
(c) आर्सेनिक
(d) लौह
उत्तर- (c) आर्सेनिक 
लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:
प्रश्न 1. बहुउद्देशीय परियोजना से आप क्या समझते है?
उत्तर – वैसी नदी घाटी परियोजना जिसका निर्माण दो या दो से अधिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जाता है उसे बहुउद्देश्यीय परियोजना कहा जाता है। इन परियोजना के विकास के मुख्य उद्देश्य प्रायः इस प्रकार होते है-
          ● बाढ़ नियंत्रण
          ● मृदा अपरदन पर रोक
          ● पेयजल एवं सिंचाई हेतु जलापूर्ति
          ● विद्युत उत्पादन
          ● उद्योगों के जलापूर्ति
          ●  परिवहन
          ● मनोरंजन
          ● वन्य जीव संरक्षण, मत्स्य पालन, जल कृषि, पर्यटन इत्यादि।
जैसे- भाखड़ा-नाङ्गल, हीराकुंड, दमोदर, गोदावरी, कृष्णा इत्यादि  नदी परियोजन बहुउद्देशीय है।
प्रश्न 2. जल संसाधन के क्या उपयोग है? लिखें।
उत्तर– जल संसाधन का मानवीय जीवन में काफी उपयोगी है। यहाँ तक कि जीवन-सृजन में भी जल महत्वपूर्ण है। प्राणी एवम वनस्पति में भी अधिकांश भाग जल ही होते है। जल के उपयोग की सूची इस प्रकार है।  –पेयजल, घरलू कार्य, सिंचाई, उद्योग, जन स्वास्थ्य, स्वच्छ्ता तथा मूत्र विसर्जन इत्यादि।
प्रश्न 3. आन्तर्राष्ट्रीय जल-विवाद कारण है?
उत्तर– दो या अधिक राज्यों के बीच नदी जल के समुचित बंटवारे न होना ही जल-विवाद का मुख्य कारण है। चूँकि जल संसाधन का उपयोग सभी के लिए अति आवश्यक एवं व्यापक है।
जैस- कावेरी नदी के जल बंटवारे का विवाद कर्नाटक एवम तमिलनाडू के बीच काफी पुराना है।
प्रश्न 4. जल संकट क्या है?
उत्तर – जल की अनुपलब्धता ही जल संकट कहलाता है । जल संकट के भाव उत्पन्न  होते ही मानव मस्तिष्क पर सुख ग्रस्त या अनावृष्टि क्षेत्र(जहाँ वर्ष का अभाव हो) का चित्र उपस्थित होना स्वाभाविक है। पृथ्वी पर विशाल जल सागर होने एवं नवीकरणीय संसाधन होने के बावजूद जल संकट का होना एक जटिल समस्या है। जल संकट का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, उनकी व्यापक मांग, जल का अति उपयोग तथा जल के असमान वितरण का होना है। 
              
प्रश्न 5. भारत की नदियों के प्रदूषण के कारणों का वर्णन कीजिये।
उत्तर– भारत की नदियों के प्रदूषण के निम्नलिखित कारण है-
◆ मृत जानवरों एवं लाशों का नदियों में फेंक दिया जाना। 
◆ घरेलू एवं औद्योगिक अवशिष्टों का नदी में गिराया जाना।
◆  शहरों में बढ़ती आबादी एवं शहरी जीवनशैली।
◆ वाहित  मल कल का नदियों में निस्तारण। 
◆  धार्मिक अनुष्ठान एवम अन्धविश्वस।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
प्रश्न 1. जल संरक्षण से आप क्या समझते है ? इसके क्या उपाय है?
उत्तर –  जल संसाधनों की सीमित आपूर्ति,तेजी से फैलते प्रदूषण एवं वर्तमान समय मे मांग को देखते हुए जल संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन करना अति आवश्यक है ताकि लोगों के स्वस्थ जीवन, खाद्यान- सुरक्षा, आजीविका और उत्पादक अनुक्रियाओं को सुनिश्चित किया जा सके और नैसर्गिक परिवर्तनों के निम्नीकरण पर विराम लगाया जा सके। इस संदर्भ में निम्निलिखित विधियाँ कारगर हो सकती है –
(i) भूमिगत जल की पूनर्पूर्ति- पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने ‘जल मिशन’ संदर्भ देकर भूमि जल पुनर्पूर्ती पर बल दिया था। जिससे खातों, गांवों, शहरों, उद्योगों को पर्याप्त जल मिल सके। इसके लिए वृक्षारोपण, जैविक तथा कम्पोस्ट खाद का उपयोग, वेटलैंड्स(वेटलैंड्स) का संरक्षण, वर्षा जल का संचयन एवं मल-जल शोधन पुनः चक्रण जैसे क्रियाकलाप उपयोगी हो सकते हैं।
(ii) जल संभर प्रबंधन (Watershed Management)- जल प्रवाह या जल जमाव का उपयोग कर उद्यान, कृषि वानिकी, जल कृषि, कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इससे पेयजल की आपूर्ति भी की जा सकती है। इस प्रबंधन को छोटी इकाइयों पर लागू करने की आवश्यकता है।
(iii) तकनीकि विकास- तकनीकी विकास से तात्पर्य ऐसे उपक्रम से है जिसमें जल का कम-से-कम उपयोग कर, अधिक से अधिक लाभ लिया जा सके। जैसे ड्रिप सिंचाई, लिफ्ट सिंचाई, सूक्ष्म फुहारों से सिंचाई, सीढ़ीनुमा खेती इत्यादि।
प्रश्न 2. वर्षा जल की मानव जीवन में क्या भूमिका है? इसके संग्रहण व पुनः चक्रण के विधियों का उल्लेख करें।
उत्तर – जल संकट की समस्या को को कम करने की दिशा में में वर्षा जल संग्रह एक लोकप्रिय एवं राहनीय कदम हो सकता है। वर्षा जल मानव जीवन मे काफी उपयोगी है पश्चिमी भारत खासकर राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षा-जल का संग्रहण छत पर करते थे। पश्चिम बंगाल के बाढ़ मैदान में सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाने का चलन था। शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वर्ष-जल को एकत्रित करने के लिए गड्ढ़ों का निर्माण कर मृदा सिंचित का कार्य किया जाता था। मेघालय के शिलांग में छत पर वर्षा जल संग्रहण आज भी परम्परागत रूप में परिचित है।

                 कर्नाटक के मैसूर जिले में स्थित गंगथर गाँव में छत पर जल संग्रहण की व्यवस्था 200 घरों में है जो जल संरक्षण की दिशा में एक मिसाल है। वर्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश बाजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षा-जल संरक्षण एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।


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इकाई-1. (क) प्राकृतिक संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (क)

     बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (क)

इकाई-1. (क) प्राकृतिक संसाधन

प्राकृतिक संसाधन


प्राकृतिक संसाधन

वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

1. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है:
(a) वनोन्मूलन
(b) गहन खेती
(C) अति पशुचारण
(d) अधिक सिंचाई
उत्तर- (d) अधिक सिंचाईं

2. सौपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है?
(a) हरियाणा
(b) पंजाब
(C) कर्नाटक
(d) उत्तराखंड
उत्तर- (d) उत्तराखंड

3.मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में से कहाँ है?
(a) उत्तर प्रदेश
(b) राजस्थान
(C) कर्नाटक
(d) महाराष्ट्र
उत्तर- (b) राजस्थान

4. मेढ़क के प्रजनन को नष्ट करने वाला रसायन कौन है?
(a) बेंजीन
(b) यूरिया
(c) एंड्रिन
(d) फॉस्फोरस
उत्तर – (c) एंड्रिन

5. काली मृदा का दूसरा नाम क्या है?
(a) बलुई
(b) रेगुर मृदा
(c) लाल मृदा
(d) पर्वतीय मृदा
उत्तर- (b) रेगुर मृदा

लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्यों के नाम बतावें। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगायी जा सकती हैं?
उत्तर– जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्य  बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा इत्यादि है।

       इस मृदा में गन्ना, धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन जैसी फसल उपयुक्त मानी जाती है।

प्रश्न 2. समोच्च कृषि से आप क्या समझते है?
उत्तर– पहाड़ी क्षेत्रों में जल के तेज बहाव के कारण होने वाले मृदाअपरदन से बचने के लिए पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली सीढ़ीनुमा खेती को समोच्च कृषि कहा जाता है।
प्रश्न 3. पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में कृषि की कौन-सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है?
उत्तर– पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पट्टिका कृषि पध्दति उपयोगी मानी जाती है। यह फसलों के बीच घास की पट्टियां विकसित करने पर आधारित है। 

प्रश्न 4. भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है ? यहाँ की क्या विशेषता है।

उत्तर– भारत के पूर्वी तटीय भागों में गंगा- ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, एवं कावेरी नदियों द्वारा डेल्टा का विकास हुआ है। यहाँ जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है जिसका निर्माण बालू, सिल्ट, एवं मृतिका के विभिन्न अनुपात से होता है। इसका रंग धुंधला से लेकर लालिमा लिये हुये भूरे होता है।

प्रश्न 5. फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर– दो फसलों के बीच एक दलहन या तेलहन की फसलों को उगाना ही फसल चक्रण कहलाता है। इसके द्वारा मृदा के पोषणीय स्तर को बरकरार रखा जा सकता है क्योंकि इससे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर- अति सिंचन से जलाक्रांतता (WaterLogging) की समस्या पैदा होती है जिससे मृदा में लवणीय और क्षारीय गुण बढ़ जाती है जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी होते है। अर्थात इससे मृदा की उर्वरा शक्ति घटते जाती है और भूमि धीरे-धीरे बंजर में बदल जाती है।                                                                                                                        
              इस प्रकार की समस्या मुख्यत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अति सिंचाई से भूमि का निम्नीकरण की समस्या देखने को मिलती है।
प्रश्न 2. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर- मृदा को बंजर या अनुपजाऊ होने से बचाना ही मृदा संरक्षण कहलाता है। मृदा पारितंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल पेड़ पौधों के विकास का माध्यम है बल्कि पृथ्वी पर विद्यमान अनेकों जीव समुदायों के भरण-पोषण भी करती है। मृदा में मौजूद उर्वराशक्ति मानव के आर्थिक क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। लगभग 1 सेंटीमीटर मोटी मृदा परत के निर्माण में हजारों वर्षों का समय लगता है।                         
                     मृदा का अपने मूल स्थान से अपरदन के विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना भू-क्षरण कहलाता है। यह मृदा की एक बहुत बड़ी समस्या है। मृदा-क्षरण के कई कारणों जैसे वायु और जल के तेज बहाव, जलक्रांतता,अतिपशुचारण, खनन, रसायनों का अत्यधिक उपयोग जैसी मानवीय अनुक्रियाओं द्वारा होता है। वृक्षारोपण, पट्टिका कृषि, फसलचक्रण, समोच्च कृषि इत्यादि द्वारा मृदा-क्षरण को रोकना ही मृदा संरक्षण का मुख्य तरीका है। रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का उपयोग मृदा संरक्षण में सहायक होता है। वृक्षारोपण से भी मृदा संरक्षण बढ़ता है; क्योंकि इससे मृदा को बाधा पहुँचती है और इनकी पत्तियों से प्राप्त ह्यूमस मृदा की गुणवत्ता को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
प्रश्न 3. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।
उत्तर- भारत पशुधन के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल किया जाता है। विश्व मे सबसे अधिक पशु भारत में ही पाये जाते है परंतु यहाँ स्थायी चारागाह के लिए बहुत कम भूमि उपलब्ध है जो कि पशुधन के लिए पर्याप्त नहीं है। परिणामस्वरूप पशुपालन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। 
            भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान लगभग नगण्य होने का कारण निम्नलिखित कारण है-
◆उत्तम किस्म के पशुनस्लों में भारी कमी।
◆वैज्ञानिक प्रणाली एवं तकनीकी ज्ञान का अभाव।
◆चारागाह का अभाव।
◆बढ़ती आबादी का दबाव।
◆पूँजी का अभाव इत्यादि। 
◆ इच्छा शक्ति की कमी। 
◆पशुचिकित्सक का अभाव।

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इकाई 1 भारत : संसाधन एवं उपयोग / बिहार बोर्ड-10 GEOGRAPHY SOLUTIONS  खण्ड (क)

इकाई 1 भारत : संसाधन एवं उपयोग

खण्ड (क)

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ GEOGRAPHY SOLUTIONS 

संसाधन एवं उपयोग



संसाधन एवं उपयोग

वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

1.कोयला किस प्रकार का संसाधन है?

(a) अनवीकरणीय

(b) नवीकरणीय

(c) जैव

(d) अजैव

उत्तर- (a) अनवीकरणीय

2.सौर ऊर्जा निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन है:

(a) मानवकृत

(b) पुनः पूर्तियोग्य

(C) अजैव

(d) अचक्रीय

उत्तर- (b) पुनः पूर्तियोग्य

3. तट रेखा से कितने कि०मी० क्षेत्र सीमा अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र कहलाते है?

(a) 100 N.M.

(b) 200N.M.

(C) 150 N.M.

(d) 250N.M.

उत्तर- (b) 200 N.M.

4. डाकुओं की अर्थव्यवस्था का संबंध है:-

(a) संसाधन संग्रहण से

(b) संसाधनों के अनियोजित विदोहन से

(C) संसाधन के नियोजित दोहन से

(d) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर- (b) संसाधनों के अनियोजित विदोहन से

5. समुद्री क्षेत्र में राजनैतिक सीमा के कितनी कि०मी० क्षेत्र तक राष्ट्रीय सम्पदा निहित है:-

(a) 10.2 कि०मी०

(b) 15.5 कि०मी०

(C) 12.2 कि०मी०

(d) 19.2 कि०मी०

उत्तर- (d) 19.2 कि०मी०

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. संसाधन को परिभाषित कीजिये।

उत्तर- संसार में उपलब्ध वे सभी वस्तुएँ जिसका मानव अपने उपयोग में करता हो उसे संसाधन कहते है। जिमरमैन के अनुसार, संसाधन होते नहीं बनते हैं। संसाधन भौतिक एवं जैविक दोनों हो सकते हैं। भूमि मृदा,जल खनिज जैसे भौतिक संसाधन मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति संसाधन बन जाते हैं। जैविक संसाधन वनस्पति, वन्यजीव तथा जलीय जीव जो मानवीय जीवन को सुखमय बनाते हैं।

प्रश्न 2. संभावी एवं संचित-कोष संसाधन में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- संभावी संसाधन- संभावी संसाधन ऐसे संसाधन को कहते है जिसका उपयोग भविष्य में लाये जाने की संभावना बनी रहती है। यह किसी विशेष क्षेत्र में मौजूद होते है। जैसे- हिमालयी क्षेत्र का खनिज, राजस्थान एवम गुजरात क्षेत्र में पवन और सौर ऊर्जा का उपयोग अभी तक नहीं किया किया गया।

संचित-कोष संसाधन- ऐसे संसाधन जिसे वर्तमान में उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता है, संचित-कोष संसाधन कहलाता है। यह भी भविष्य की पूँजी है। जैसे – नदी जल का उपयोग भविष्य में व्यापक रुप से जल विधुत निर्माण में किया जाएगा।

प्रश्न 3. संसाधन संरक्षण की उपयोगिता को लिखिए।

उत्तर – संसाधनों का योजनाबद्व समुचित एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है। संसाधनों  का अविवेकपूर्ण या अतिशय उपयोग विविध प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देते है। अतः इन समस्याओं से बचने हेतु विभिन्न स्तरों पर संरक्षण की आवश्यकता है। इस संदर्भ में महान दार्शनिक महात्मा गांधी के विचार प्रासंगिक है – “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत कुछ है लेकिन पेटी के लिए कुछ नहीं”। मेधा पाटेकर का ‘नर्मदा  बचाओ आंदोलन’ सुंदर लाल बहुगुणा का ‘चिपको आंदोलन’ एवं संदीप पाण्डे  द्वारा वर्षा -जल संचय कर कृषित भूमि का विस्तार,संसाधन संरक्षण दिशा में अत्यंत सराहनीय  कदम है।

प्रश्न 4. संसाधन निर्माण में तकनीक की क्या भूमिका है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- संसाधन-निर्माण में तकनीक की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण होती है, केवल संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है बल्कि संसाधनों में वांछित परिवर्तन के साथ-साथ तकनीकी  का उपयोग करना अति आवश्यक है। क्योंकि अनेक प्रकृति-प्रदत्त वस्तुएँ तब तक संसाधन का रूप नहीं लेती जबतक कि किसी विशेष तकनीक द्वारा उन्हें उपयोगी नहीं बनाया जाता। जैसे- नदियों के बहते जल से पनबिजली उत्पन्न करना, बहती हुई वायु से पवन ऊर्जा उत्पन्न करना, भूगर्भ में उपस्थित खनिज अयस्कों का शोधन कर उपयोगी बनाना, इन सभी में अलग-अलग तकनीकों की आवश्यकता होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. संसाधन के विकास में ‘सतत विकास’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिये।

उत्तर- पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना भविष्य की आवश्यताओं के मद्देनजर, वर्तमान विकास को कायम रखने की धारणा ही ‘सतत विकास’ की अवधारणा कहलाता है। संसाधन मनुष्य के जीविका का आधार है। जीवन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए संसाधनों के सतत विकास की अवधारणा अति आवश्यक है। ‘संसाधन प्रकृति प्रदत उपहार है’ की अवधारणा के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध दोहन किया, परिणामस्वरूप अनेकों पर्यावरणीय समस्याएं उतपन्न हो गयी है। जैसे- भूमण्डलीय तपन (Global Warming), ओज़ोन क्षय, पर्यावरण-प्रदूषण, मृदाक्षरण, भूमि-विस्थापन, अम्लीय वर्षा, असमय ऋतु-परिवर्तन इत्यादि।

       अतः उपरोक्त समस्याओं से निजात पाने हेतु वर्तमान समय में सतत विकास की अवधारणा को विश्व स्तर पर पालन करने की आवश्यकता है ताकि विश्व शांति के साथ साथ जैव जगत को भी गुणवत्तापूर्ण जीवन लौट सके और वर्तमान विकास के  साथ भविष्य भी सुरक्षित हो सके।

प्रश्न 2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिये।

उत्तर- स्वामित्व के आधार पर संसाधन चार प्रकार के होते है-

व्यक्तिगत संसाधन: ऐसे संसाधन जिस पर किसी खास व्यक्ति का अधिकार हो उसे व्यक्तिगत संसाधन कहते है। जैसे- भूखंड, घर व अन्य जायदाद, बाग-बगीचा, तालाब, कुआँ इत्यादि जिस पर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।

सामुदायिक संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर किसी खास समुदाय का आधिपत्य होता है, उसे सामुदायिक संसाधन कहते है। जैसे- गाँवों में  श्मशान, मंदिर या मस्जिद परिसर, सामुदायिक भवन, तालाब आदि। शहरों में सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल मैदान, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, एवं गिरिजाघर।

राष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर राष्ट्र या देश का अधिकार हो, उसे राष्ट्रीय संसाधन कहते है। जैसे- किसी राजनीतिक सीमा के अंतर्गत भूमि, खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन व वन्यजीव एवं समुद्री जीव (200 KM महासागरीय क्षेत्र तक) राष्ट्रीय संसाधन है।

अंतरार्ष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर दो या दो से अधिक देशों का अधिकार हो, उसे अंतराष्ट्रीय संसाधन कहते है। जैसे- किसी देश की तट रेखा से 200 KM की  दूरी तक का क्षेत्र (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र)।



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अध्याय 13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन

 खण्ड (ब)  अध्याय 13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन 

बिहार बोर्ड के 9वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें


 अध्याय 13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन 

13 समुदाय आधारित आपदा प्रबंवस्तुननिष्ठ प्रश्नोत्तर
 
1. आपदा प्रबंधन के तीन प्रमुख अंगों में कौन एक निम्नलिखित में शामिल नहीं है?
(क) पूर्वानुमान,चेतावनी एवं प्रशिक्षण
(ख) आपदा के समय प्रबंधन गतिविधियाँ
(ग) आपदा के बाद निश्चित रहना
(घ) आपदा के बाद प्रबंधन का कार्य करना
उत्तर – (ग) आपदा के बाद निश्चित रहना 
2. प्रत्येक ग्रीष्म ऋतु में कौन सी आपदा लगभग निश्चित है?
(क) आगजनी
(ख) वायु दुर्घटना
(ग) रेल दुर्घटना
(घ) सड़क दुर्घटना
उत्तर – (क) आगजनी
3. सामुदायिक प्रबंधन के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कौन एक प्राथमिक क्रियाकलाप में शामिल नहीं है? 
(क) निकटतम प्राथमिक चिकित्सा केंद्र को सूचना। 
(ख) प्रभावित लोगों को स्वछ जल और भोजन की उपलब्धता की गारंटी करना।
(ग) आपदा की जानकारी प्रशासन तंत्र को नहीं देना।
(घ) आपातकालीन राहत शिविर की व्यवस्था करना। 
उत्तर – (ग) आपदा की जानकारी प्रशासन तंत्र को नहीं देना। 
4. ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति के प्रमुख कार्य नहीं है?
(क) प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं करना।
(ख) सभी को सुरक्षा देना।
(ग) राहत शिविर का चयन एवं राहत पहुँचाने का कार्य करना।
(घ) स्वछता का ख्याल रखना।
उत्तर – (क) प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं करना।
 
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
1.अग्निशमन दस्ता आने के पूर्व समुदाय द्वारा कौन से प्रयास किए जाने चाहिए?
उत्तर- अग्निशमन दस्ता के आने के पूर्व ही समुदाय इसके प्रभाव को कम करने का प्रयास करता है। ये निम्नलिखित काम होना चाहिए-
◆झुलसे हुए लोगों को एक जगह ले जाकर प्राथमिक उपचार आवश्यक है। 
◆आगजनी स्थिति में पंचायत या विद्यालय भवन में ले जाना महत्वपूर्ण है। 
◆ जले हुए भाग पर पानी डालना और चंदन के लेप लगाने से जले लोगों को बड़ी राहत मिलती है 
◆ जले हुए भाग पर बर्फ के उपयोग से भी राहत मिलती है। 
◆टेलीफोन या मोबाइल का प्रयोग करते हुए निकटतम अस्पताल से एंबुलेंस को मंगाकर अर्द्ध जले हुए लोगों को अच्छे उपचार के लिए अस्पताल पहुँचाना चाहिए।
◆ जले हुए क्षेत्र पर जल का छिड़काव करें या खलिहान के फसल को हटाने का कार्य करें।
2.ग्रामीण स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति के गठन में कौन-कौन से सदस्य शामिल होते हैं?
उत्तर- ग्रामीण स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति के गठन में निम्नलिखित सदस्य होते हैं-
◆ विद्यालय के प्रधानाचार्य
◆ गाँव के मुखिया
◆ गाँव के सरपंच
◆ गाँव के दो समर्पित
◆ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का एक डॉक्टर
◆ राष्ट्रीय सुरक्षा सेवा के सदस्य (NSS)
◆ ग्राम सेवक
◆  स्वयं सहायता समूह की दो महिलाएँ 
3.आपदा प्रबंधन के लिए समुदाय में किन अच्छे गुणों का होना आवश्यक है?
उत्तर- आपदा प्रबंधन के लिए समुदाय में निम्नलिखित अच्छे गुणों का होना आवश्यक है-
◆ समुदाय के लोग व्यक्तिगत हितों की अपेक्षा समाज के हित का ध्यान रखें।
◆ सामूहिक कार्यों के लिए साहसी, परिश्रमी लोगों का चयन करना चाहिए। कमजोर, आलसी और लालची लोग समाज पर बोझ बन जाते हैं।
◆ सामूहिक संगठन के सदस्यों में जात-पात, धर्म-संप्रदाय की तुच्छ भावना की जगह मानव कल्याण और सद्भाव की भावना रहनी चाहिए।
◆ सदस्यों में सजगता आवश्यक है जिससे वे आपदा से निपटने के लिए तुरंत काम कर सकें। अनेक ऐसे उदाहरण है जब समाज के प्रबुद्ध लोगों ने संप्रदायिक मतभेदों को दूर कर बड़ी घटनाओं को रोका है।
◆ समुदाय के लोगों में साहस, उत्साह तथा न्याय के गुण होने चाहिए, गैर-कानूनी कार्य करने वालों पर सख्ती बरतना भी समुदाय का आवश्यक गुण है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
1. आपदा प्रबंधन में समुदाय की केंद्रीय भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर- आपदा का रूप कोई भी क्यों ना हो उसका विनाशकारी प्रभाव जान-माल पर पड़ती ही है। आपदा का पहला झटका मनुष्य को ही लगता है और मनुष्य ही आपदा को पहला झटका भी देता है। जब वह आपदा को न्यून करने का समुदायिक प्रयास प्रारंभ करता है। आपदा से होने वाली वास्तविक ह्रास का सही अनुमान समुदाय ही लगा सकता है। आपदा प्रबंधन के लिए जो भी आकस्मिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती है उसके वितरण में तथा प्रत्येक परिवार तक उसके लाभ को पहुँचाने में समुदाय की केंद्रीय भूमिका होती है।
        समुदाय ही आपदा के पूर्वानुमान की जानकारी देता है और समुदाय के लोग ही सबसे पहले आपदा का सामना करते हैं। आपदा में मकान जल सकते हैं, घरें गिर सकती है, बाढ़ आ सकता है, किंतु समुदाय नहीं टूटता है। समुदाय सुख-दुख का साथी होता है और भारत जैसे ग्रामीण देश में आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समुदाय की होती है। प्रशासनिक प्रबंधन कार्य और स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रबंधन कार्य भी सामुदायिक नेतृत्व के माध्यम से ही सफलता पूर्वक संभव होता है।
2. ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति के कार्यों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर – ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति के निम्नलिखित कार्य होते हैं-
◆ पूर्वानुमान के आधार पर चेतावनी एवं सूचना देना- यह प्रबंधन समिति जिला मुख्यालय से प्राप्त सूचनाओं को तत्काल लोगों तक पहुंच जाएगा।
◆ राहत शिविर का चयन और प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने का कार्य- इसी के साथ जिला प्रशासन को सूचित करेगा अगर आगजनी है तो दमकल को सूचित करेगा।
◆ राहत कार्य- मुख्य रूप से लोगों को भोजन एवं पेयजल उपलब्ध कराना। 
◆ प्राथमिक उपचार की व्यवस्था।
◆ सभी को सुरक्षा देना- महिला, बच्चों को विशेष रुप से ध्यान देना।
◆ स्वच्छता का ख्याल रखना- स्वच्छता रखने से विभिन्न प्रकार की बीमारी नहीं फैलती है।
3. आपदा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है?
उत्तर- आपदा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी को निम्नलिखित प्रकार से सुनिश्चित किया जा सकता है-
◆ निकटतम विद्यालय में विद्यार्थियों के बीच यह घोषित करना कि बाढ़ अथवा आंधी की संभावना है इसलिए घर में लोगों को सचेत कर देना।
◆ मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर में जाकर प्राकृतिक अथवा मानव जनित संभावित आपदाओं की जानकारी देना। यह जानकारी उस समय उचित होगा जब प्रार्थना के लिए अधिक से अधिक लोग उपस्थित हों। यदि आवश्यक हो तो धर्मस्थल में लगे हुए सार्वजनिक उदघोषणा के द्वारा भी जानकारी दी जा सकती है।
◆ ऐसे परिवारों की सूची बनाना जहाँ अत्यधिक उम्र के वृद्ध, शिशु, गर्भवती महिला, बीमार और विक्षिप्त लोग हों। ऐसे लोगों के विस्थापन हेतु विशेष दल का गठन करना।
◆ पंचायत भवन और गाँव के विद्यालय में राहत शिविर के लिए आपातकालीन व्यवस्था करना जिसमें खान-पान के अतिरिक्त नाव, तैरनेवाले जैकेट, चिकित्सक और अभियंताओं की व्यवस्था करना।

◆ आगजनी, महामारी, जाति और संप्रदायिक तनाव और ओलावृष्टि जैसे आपदा में परिवहन की व्यवस्था रखना, जो संबंधित अधिकारी तक मोबाइल अथवा फोन नहीं रहने पर सूचना पहुँच सके।


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5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN / हिंद महासागर के तलीय उच्चावच

5. BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

(हिंद महासागर के तलीय उच्चावच)

BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN



BOTTOM RELIEF OF INDIAN OCEAN

         हिंद महासागर के तली का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसकी लंबाई लगभग 10000 किमी० और चौड़ाई 9000 किमी० है। इसका क्षेत्र 7.34 करोड़ वर्ग किमी० है। यह कुल महासागरीय जल का 20% जल अपने पास रखता है। इसके किनारे पर पूर्व में आस्ट्रेलिया, उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप उपस्थित है।

         हिंद महासागर का दक्षिणी भाग अंटार्कटिका के पास, पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ जाता है। इसका तलीय भाग एवं तटीय भाग कठोर एवं सघन चट्टानों से निर्मित है। हिंद महासागर के तटीय भाग में ब्लॉक पर्वतों का प्रमाण मिलता है क्योंकि इसका निर्माण गोंडवाना भूखंड के विखंडन एवं उनके स्थानांतरण से हुआ है। हिन्द महासागर के पूर्वी भाग में मोड़दार पर्वतों की श्रेणियाँ है जो हिमालय का ही भाग माना जाता है। इसी मोड़दार पर्वत श्रृंखला पर कोको द्वीप, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह स्थित है। सामान्यत: प्रायद्वीपीय भारत दक्षिण में स्थित हिंद महासागर को दो भागों में बाँट देता है-

(1) बंगाल की खाड़ी

(2) अरब सागर।

       हिंद महासागर के सीमांत क्षेत्रों में कई छोटे-छोटे सागर मिलते हैं। जैसे- फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, मोजांबिक चैनल, अंडमान सागर इत्यादि।

     1965 में अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान जर्मन एवं भारतीय समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। इनके अनुसार हिंद महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। जॉनसन महोदय ने प्रादेशिक विशेषताओं के आधार पर हिंद महासागर को तीन भागों में वर्गीकृत किया है:-  

(1) पश्चिमी भाग- अफ्रीका के समीप, औसत गहराई 2000 फैदम

(2) पूर्वी भाग- ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में, औसत गहराई 3000 फैदम

(3) सँकरा और महाद्वीपीय मग्नढाल वाला क्षेत्र मध्यवर्ती भाग- एक उत्थित कटक के रूप में।

            सामान्य तौर पर हिंद महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं:-

(1) महाद्वीपीय मग्नतट

      हिंद महासागर के मग्नतट में काफी विविधता दिखाई देती है। इसकी औसत चौ० 640 किलोमीटर है। सबसे चौड़ा मग्नतट अफ्रीका के पूर्व और मेडागास्कर के समीप में पाए जाते हैं। इसी तरह बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में भी चौड़े मग्नतट मिलते हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग और अंटार्कटिका के उत्तरी भाग में सँकरे मग्नतट मिलते हैं। जावा एवं सुमात्रा द्वीप के पास इसकी चौड़ाई मात्र 160 किलोमीटर है।

(2) महाद्वीपीय मग्नढाल

     यह महाद्वीपों का अंतिम किनारा होता है। जिन-जिन क्षेत्रों में सँकरे महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ मग्नढाल तीव्र होता है और जिन क्षेत्रों में मंद ढाल वाले महाद्वीपीय मग्नतट मिलते हैं वहाँ पर महाद्वीपीय मग्नढाल भी मन्द होता है।

(3) महासागरीय कटक

       हिंद महासागर में उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला एक मुख्य कटक मिलता है और इस मुख्य घटक के सहारे सहायक कटक भी मिलते हैं। हिंद महासागरीय कटक का आकार ‘Y’ अक्षर के समान है। यह समुद्र तल से 4000 मीटर नीचे तक अवस्थित है। यह कटक हिंद महासागर को पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में बाँट देता है। कहीं-कहीं पर यह कटक समुद्री सतह से ऊपर चला जाता है जिस पर कई द्वीप बसे हुए हैं। जैसे- लक्षद्वीप, मालद्वीप, मॉरीशस द्वीप, कोकस किलिंग द्वीप, क्रिसमस द्वीप, रियूनियन द्वीप, सेशेल्स द्वीप, चैगोस द्वीप, डियागो गार्सिया द्वीप, प्रिंस एडवर्ड द्वीप, क्रोजेट द्वीप, कारगुलेन द्वीप, एमस्टर्डम द्वीप, सेंट पॉल द्वीप,  इत्यादि। यह उत्तर में प्रायद्वीपीय भारत के किनारे से शुरू होकर दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला हुआ है।

       प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिण में इस कटक की चौड़ाई सर्वाधिक है। इसे लक्षद्वीप और मालद्वीप के बीच लक्काद्वीप चैगोस कटक कहते हैं। यही कटक दक्षिण की ओर बढ़ता चला जाता है। इसे विषुवत रेखा तथा 30° दक्षिणी अक्षांश के बीच चैगोस सेंटपॉल कटक कहते हैं। 30° से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसे एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक कहते हैं। यहाँ पर इसकी चौड़ाई 1600 कि०मी० हो जाता है। 50° दक्षिणी अक्षांश के पास यह दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। पश्चिमी शाखा को करगुलेन गॉसबर्ग कटक और पूर्वी शाखा को इंडियन अंटार्कटिका कटक कहते हैं।

        हिंद महासागर का मुख्य कटक कई भागों में विभक्त है। जैसे- 5° दक्षिणी अक्षांश से एक शाखा निकलकर उत्तर-पश्चिम दिशा में चली जाती है जिसे सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक कहते हैं। 18° दक्षिणी अक्षांश के पास से एक कटक निकलती है जिसे सेशेल्स कटक कहते हैं। यही कटक अचानक दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जिसे मलागासी कटक कहते हैं। 48° दक्षिणी अक्षांश के पास हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में एक कटक अवस्थित है, जिसे प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक कहते हैं। पूर्वी हिंद महासागर में 50° दक्षिणी अक्षांश के पास से ही एक कटक पूरब की ओर चली जाती है, जिसे दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक कहते हैं।

सूची-

1. लक्काद्वीप चैगोस कटक

2. चैगोस सेंटपॉल कटक

3. एम्सटर्डम सेंटपॉल कटक

4. करगुलेन गॉसबर्ग कटक

5. इंडियन अंटार्कटिका कटक

6. सोकोत्रा चैगोस या कॉल्सबर्ग कटक

7. सेसिल्स कटक

8. मलागासी कटक

9. प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक

10. दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक

(4) महासागरीय मैदान

      महासागरीय कटक हिंद महासागर को कई गहन सागरीय मैदानों में विभक्त करते हैं। जैसे-

(i) ओमान बेसिन– ओमान की खाड़ी में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(ii) अरेबियन बेसिन- यह लक्काद्वीप चैगोस कटक और  सोकोत्रा द्वीप चैगोस के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(iii) सोमाली बेसिन- यह सोकोत्रा चैगोस, सेंटपाल कटक और सेशेल्स कटक के बीच स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(iv) मॉरीशस बेसिन- यह मलागासी और सेंट पाल कटक के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट है।

(v) नेटाल बेसिन- मलागासी और दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के बीच स्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vi) अटलांटिक-भारतीय-अंटार्कटिका बेसिन– यह अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका और प्रिंस एडवर्ड क्रोजेट कटक के बीच अवस्थित है। इसकी औसत गहराई 18000 फीट है।

(vii) अंडमान बेसिन- यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार के पूर्वी भाग में स्थित है। इसकी औसत गहराई 6000 से 12000 फीट है।

(viii) भारत-ऑस्ट्रेलिया बेसिन- इसका विस्तार 10° दक्षिणी अक्षांश से 50° दक्षिणी अक्षांश के बीच पूर्वी हिंद महासागर में हुआ है। इसकी औसत गहराई 12000 से 18000 फीट के बीच है।

(ix) पूर्वी भारतीय अंटार्कटिका बेसिन- यह पूर्वी हिंद महासागर के सबसे दक्षिणी भाग में स्थित है जिसकी औसत गहराई 12000 फीट है।

(5) महासागरीय गर्त

        हिंद महासागर में 6 प्रमुख गर्त मिलते हैं। इसके 60% भूभाग पर गहन सागरीय मैदान है। इसलिए इसमें गर्तों की संख्या बहुत कम है। हिंद महासागर का सबसे गहरा गर्त सुंडा गर्त है जो सुमात्रा एवं जावा द्वीप के पश्चिमी भाग में स्थित है जिसकी गहराई 7725 मीटर है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हिंद महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है।



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