1.Cartography / मानचित्रावली

Cartography

मानचित्रावली

         पृथ्वी के समस्त भूभाग अथवा किसी एक भाग को कागज पर सांकेतिक चिन्हों के द्वारा उचित मापक (Scale) तथा प्रक्षेप (Projection) पर चित्रण को ही मानचित्र कहते हैं। और इस प्रकार मानचित्रों के संग्रह को मानचित्रावली अथवा एटलस (Atlas) कहा जाता हैं। 

 किसी भी मानचित्र की शुद्धता एवं उपयोगिता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है:-

(1) दिशा (Direction) – 10

Cartography

N = North – उत्तर

S = south – दक्षिण

E = East – पूरब

W = West – पश्चिम

NE = इषाण कोण

NW =  वायु कोण

SW = नैऋत्य कोण

SE = आग्नेय कोण

Zenith = आकाश

Nadir = पाताल

(2) मापक (Scale)

(3) उचित प्रक्षेप (Suitable Projection)

(4) उचित सांकेतिक चिह्न

(5) मानचित्रकार की कुशलता

(6) उचित निर्माण की विधि

✶मानचित्र निर्माण करने की विधि

(1) सर्वेक्षण विधि के द्वारा

(2) फोटोचित्रण विधि के द्वारा

(3) रेखाचित्रों एवं आरेख के द्वारा

(4) कम्प्यूटर एवं दूर संवेदन विधि के द्वारा 

नोट :- सर्वेक्षण विधि में मानचित्र बनाने हेतु जरीब, थियोडोलाइट, प्रिज्मेटिक कम्पास, शाहुल जैसे उपकरण का प्रयोग किया जाता है।

✶मानचित्र रचना के इतिहास को निम्नलिखित चरण में बाँटते हैं:-

(1) प्राचीन काल

(2) अंध काल – युरानी -रोमन के पत्नन से शुरू

(3) पुनर्जागरण काल – 1500-1600 ई०

(4) आधुनिक काल – औद्योगिक क्रांति से

I प्राचीन काल

➡ 3000 वर्ष पूर्व सर्वप्रथम मिस्र के लोगों ने मानचित्र निर्माण की कला का विकास किया।

* वास्तव में यूनानी विद्वानों को मानचित्र प्रारंभ करने का श्रेय जाता है। जैसे: –

(1) इरैटोस्थनीज ने सर्वप्रथम पृथ्वी के परिधि को अनुमानित किया तथा उसने भूमध्य रेखा को भी निर्धारित करने का प्रयास किए।

(2) हिप्पारकस ने पहली बार विश्व मानचित्र पर अक्षांश और देशान्तर रेखाओं का जाल खींचा। 

(3) क्रेटस ने पहली बार यह अनुमान लगाया कि पृथ्वी की आकृति एक गोलाभ के समान है।

(4) टॉलेमी

पुस्तक- “ज्योगरफिया सिन्टैक्सिस” या “अल्मागस्ट”

           इस पुस्तक में टॉलमी ने मानचित्र निर्माण हेतु वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किए। उन्होंने मानचित्र के संबंध में बताया कि मानचित्र में निम्नलिखित तीन गुण आवश्य होना चाहिए:-

(1) दिशा शुद्ध होनी चाहिए।

(2) आकृति शुद्ध होती चाहिए।

(3) क्षेत्रफल शुद्ध होनी चाहिए।

II अंध काल

➡अंधकाल में बनाये गये मानचित्र में पृथ्वी को चपटा दिखाया गया और पृथ्वी के केन्द्र में एरुसेलम या जेरूसेलम को दिखाया गया। 

➡अंध काल का प्रारंभ: 6 ठी शताब्दी से मानी जाती है। और 15वीं शताब्दी तक रही। इस काल में रोमन सभ्यता का उदय हुआ। लोगों के सोच पर चर्च और पोप का जबरदस्त प्रभाव पड़ा जिसके कारण लोगों के वैज्ञानिक चिंतन समाप्त हो गई। 

III. पुनर्जागरण काल

➡ पुनर्जागरण काल की   शुरूआत 16वीं शताब्दी से होती है। 

➡डच (आयरलैण्ड)वैज्ञानिक/विद्वान मर्केंटर महोदय ने मानचित्र कला को टॉलेमी के प्रभाव से मुक्त किया।  

➡ फ्रांसीसी विद्वान कैसीनी वे 1779 ई० में फ्रांस के सर्वेक्षण कर मानचित्रावली का प्रकाशन किया।

➡इसी काल में या 1767 ई० में सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की गई। 

IV आधुनिक काल

➡ आधुनिक काल की  शुरुआत औद्योगिक क्रांति के बाद से मानी जाती है। इसे मानचित्र निर्माण कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।

➡ इस चरण में मानचित्र का निर्माण सुदूर संवेदन प्रणाली इत्यादि के द्वारा किया जाने लगा ।

➡भारत में 1924 ई0 से कैमरा के द्वारा या वायुफोटोग्राफी की पद्धति प्रारंभ हुई। 

➡भारत में 1975 ई० से सुदूर संवेदन प्रणाली का विकास हुआ।

➡भारत में मुद्रणकला का विकास 1804 ई०-1860 ई० के बीच हुआ। इसी काल में जर्मनी में Stieler, फ्रांस में ब्लाश और मारटीन तथा इंगलैण्ड में “Bartholemou” नामक मानचित्रावली प्रकाशित की गई।

✶मानचित्र के निर्माण में निम्नलिखित उपकरण की आवश्यकता पड़ती है।

(1) Set BoX (औजार बॉक्स)

(2) Protactar (चाँद) 

(3) Scale

(4) Dividers

(5) Pencil

(5) Set Square (प्रकाल)

(6) इरेजर

(2) T- Square का Scale

(3) Drawing Board / Table 

(4) स्लाइड कैलीपस

(5) इंडियन इंक

(6) Sticking टेप

(7) साण्डरस या काइंड्स किण्ड Drawing Paper

(8) UNO स्टेनसिल

(9) लीराय Pen


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3. विकास केन्द्र और विकास ध्रुव / Growth Centre and Growth Pole 

3. विकास केन्द्र और विकास ध्रुव / Growth Centre and Growth Pole


विकास केन्द्र और विकास ध्रुव⇒

                  प्रादेशिक नियोजन हेतु कई विशिष्ट मॉडल विकसित किये गये हैं। उनमें से उपरोक्त दोनों मॉडल को विश्व व्यापी मान्यता प्राप्त है। यह मॉडल पदानुक्रमिक, समन्वित प्रादेशिक विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता है। इस मॉडल का विकास 50 के दशक में पेरॉक्स महोदय ने किया था। लेकिन भौगोलिक संदर्भ में इसका सर्वप्रथम प्रयोग बोडोविले महोदय ने किया था। बोडोविले ने कहा है कि किसी भी प्रदेश के नियोजन या विकास हेतु मनुष्य की दो प्रवृतियों का अध्ययन आवश्यक है। प्रथम – अभिसारी प्रवृति और द्वितीय – अपसारी प्रवृत्ति। 

              अभिसारी प्रवृतियाँ किसी भी कार्यों का केन्द्रीयकरण करती है। जबकि अपसारी शक्तियाँ कार्यों का विकेन्द्रीकरण करती हैं। प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में यह देखना आवश्यक है कि किस प्रकार के कार्यों  का केन्द्रीयकरण किस केन्द्रीय स्थल पर हो रहा है। इसी के साथ यह भी देखना आवश्यक है कि किसी भी कार्यों का विकेन्द्रीयकरण आस -पास के क्षेत्रों में कैसे हो रहा है।

बोडोबिले –“प्रादेशिक नियोजन का महत्वपूर्ण आधार केन्द्रीय बस्तियों का पदानुक्रमिक नियोजन, है।” इस संदर्भ में उन्होंने केन्द्रीय बस्तियों के नियोजन हेतु चार पदानुक्रम निर्धारित किये हैं।

पदानुक्रम    केन्द्रीय स्थल 

(1)               विकास ध्रुव

(2)               विकास केन्द्र

(3)              विकास बिन्दु

(4)               सेवा केन्द्र

            विकास ध्रुव का तात्पर्य किसी वृहत प्रदेश के नियोजन से है। विकास केन्द्र का तात्पर्य मध्य स्तरीय प्रादेशिक नियोजन से है जबकि विकास बिन्दु और सेवा केन्द्र  का तात्पर्य लघु स्तरीय प्रादेशिक नियोजन से है।

           बोडोविले के अनुसार किसी प्रदेश के सर्वाधिक केन्द्रीय स्थल पर विकास ध्रुव का विकास होता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि ध्रुव सम्पूर्ण प्रदेश के लिए आकर्षण का केन्द्र होता है। विकास ध्रुव वह स्थान है जहाँ पर शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार के अतिरिक्त ऐसे विशिष्ट कार्यो को करता है जो उस प्रदेश के अन्य किसी केन्द्र पर संभव नहीं है। विकास ध्रुव नव-उत्पाद का केन्द्र होता है। विकास के अवयव इसी केन्द्र से विकेन्द्रीकृत होकर सम्पूर्ण केन्द्र में पहुँचते हैं। 

          दूसरे शब्दों में विकास ध्रुव किसी भी भौगोलिक प्रदेश का सबसे बड़ा नगर होता है। विकास ध्रुव को प्राथमिक नगर से ही सम्बोधित किया जा सकता है। प्रत्येक प्राथमिक नगर या विकास ध्रुव के सहयोग हेतु कई विकास केन्द्र का विकास होता है। विकास केन्द्र वह केन्द्रीय स्थल है जहाँ पर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों का केन्द्र होता है। विकास केन्द्र के विकास के पीछे दो प्रमुख कारण है – 

(1) विकास ध्रुव वाले नगरों में कार्यों का अति केन्द्रीयकरण न हो और 

(2) ग्रामीण नगरीय जनसंख्या स्थानान्तरण को विकास केन्द्र में ही रोककर विकास ध्रुव के जनसंख्या को नियंत्रित किया जाय।

                  विकास बिन्दु भी रोजगारी उन्मुख केन्द्रीय स्थल है। लेकिन विकास केन्द्र से यह कई मायने में भिन्न है।:-

(1) विकास केन्द्र की तुलना में विकास बिन्दु का विकास कम महत्व वाले केन्द्रीय स्थल पर होता है। इसकी जनसंख्या के आकार काफी छोटा होता है और विकास केन्द्र के प्रति पूरक होता है।

(2) विकास केन्द्र में बड़े-बड़े उद्योग विकसित होते हैं तथा रोजगार प्रदान करने की अधिक क्षमता होती है जबकि विकास बिन्दु स्थानीय कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का विकास होता है तथा कम लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं।

          सेवा केन्द्र सबसे लघु आकार के केन्द्रीय बस्ती है। यहाँ पर प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक डाक संचार, लघु स्तर के बैंक एवं लघु स्तरीय प्रशासनिक सुविधा उपलब्ध होती है। ये सामान्यत: छोटे जनसंख्या आकार वाले होते हैं। आम लोगों के दैनिक आकर्षण का केन्द्र होता है। इसे नीचे के मॉडल से भी समझा जा सकता है –विकास केन्द्र और विकास ध्भारत के संदर्भ में

            भारत के प्रारंभिक नियोजन के दिनों में 5वीं पंचवर्षीय योजना तक नियोजन की विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया अपनाये जाने के कारण अंत: प्रादेशिक और अन्तर प्रादेशिक विषमता का जन्म हुआ। अत: छठी पंचवर्षीय योजना में यह अनुभव किया गया कि भारत की नियोजन प्रक्रिया को तीव्र करने के लिए विकास ध्रुव मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। प्रो० R. P. मिश्रा, श्रो. सुन्दरम, प्रो० देश पाण्डेय और L.S.भट्ट जैसे भूगोलवेताओं ने अपने तर्कों से योजना आयोग को प्रभावित किया और विकास ध्रुव पर आधारित नियोजन को लागू करने के लिए तैयार किया। R. P. मिश्रा ने केन्द्रीय स्थलों के नियोजन हेतु 5 पदानुक्रम की आवश्यकता पर जोर दिया क्योंकि उन्होंने माना कि भारत एक गाँवों का एक देश है। बड़े- बड़े गाँवों में सेवा केन्द्र विकसित करने की आवश्यकता है और छोटे गाँवों में लघु सेवा केन्द्र विकसित करने की आवश्यकता है।

पदानुक्रम    केन्द्रीय स्थल 

(1)               विकास ध्रुव

(2)               विकास केन्द्र

(3)               विकास बिन्दु

(4)               सेवा केन्द्र

(5)               लघु सेवा केन्द्र

                बोडोबिल ने कहा था कि सेवा केन्द्र कोई भी गाँव या नगर हो सकता है। R.P. मिश्रा ने उनके विचारों  का समर्थन करते हुए कहा कि केन्द्रीय ग्रामीण बस्ती में विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने हेतु लघु सेवा केन्द्र का विकसित किया जाना आवश्यक है। वर्तमान समय में योजना आयोग/नीतिआयोग R. P. मिश्रा के द्वारा बताये गये 5 पदानुक्रम पर आधारित नियोजन की प्रक्रिया अपना रही है। इसके लिए निम्नलिखित 5 पदानुक्रम और अनुकूल जनसंख्या का निर्धारण किया गया है। विकास केन्द्र और विकास ध्

            योजना आयोग ने भारत के सभी 35 महानगरों को विकास ध्रुव के रूप में मान्यता दिया है। योजना आयोग के अनुसार भारत में कम-से-कम 500 विकास केन्द्रों की स्थापना की योजना है। एक विकास केन्द्र में 12 लाख जनसंख्या को रखा जा रहा है। विकास केन्द्र को ही ध्यान में रखकर 1980 ई0 से औद्योगिक शंकुल की स्थापना की जा रही है। इसके अलावे महानगरों में बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर महानगरों के बाहर विकास केन्द्र विकसित करने की योजना है। जब किसी भी विकास केन्द्र को विकसित किया जाता है तो निम्नलिखित तथ्यों पर गौर किया जाता है:-

(1) कितने लोग उस केन्द्र पर आते हैं और कितने लोग जाते हैं।

(2) किन-किन परिवहन साधनों का वहाँ विकास हुआ है।

(3) वर्तमान समय में उस स्थान का कार्यिक संरचना और संरचनात्मक सुविधाएँ क्या-क्या है 

(4) जनसंख्या वृद्धि का दर क्या है 

(5 ) औद्योगिक संसाधनों की विकसित होने की क्या संभवना है। 

             विकास बिन्दु का तात्पर्य उन स्थानों से है जो स्थानीय संसाधनों की मदद से लघु उद्योगों को विकसित कर सकते हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में विकास बिन्दुओं की विशेष भूमिका हो सकती है। योजना आयोग भारत में 10 हजार विकास बिन्दुओं को पहचानकर उन्हें विकसित करने की प्रयास कर रही है। एक विकास बिन्दु को एक से दो लाख जनसंख्या को ध्यान में रखकर विकसित करने की प्रयास कर रही है।

            सेवा केन्द्रों का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है। भारत में लगभग 30 हजार सेवा केन्द्रों की पहचान कर उसे विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। सामान्यतः प्रखण्ड स्तर पर सेवा केन्द्र विकसित करने की योजना है। सेवा केन्द्रों में Cold Storage, खाद्यान्न भण्डारण सुविधा, दैनिक बाजार इत्यादि विकसित करने की योजना है।

      ग्रामीण सेवा केन्द्र पंचायत स्तर पर विकसित करने की योजना है। भारत में 1 लाख गाँव को ग्रामीण सेवा केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। ये सेवा केन्द्र निश्चित रूप से ग्रामीण विकास कार्यक्रम को त्वरित कर सकेंगे। 

निष्कर्ष 

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विकास ध्रुव मॉडल के अन्तर्गत विकसित किये जा रहे सभी केन्द्रीय स्थल एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करेंगी जिससे अंतः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दूर हो सकेगी। पिछले 20 वर्षों के दौरान विकास ध्रुव नीति पर आधारित नियोजन का कार्य किये जाने के बाद भी इसका लाभ कुछ सीमित क्षेत्रों को ही मिल पाया है। लेकिन इस मॉडल के अनुसार महानगरों का विकास तेजी से हो रहा है। ग्रामीण स्तर पर पंचायतों का नियमित चुनाव नहीं होने के कारण तथा उनके राजनीतिक अधिकार नहीं दिये जाने के कारण यह मॉडल पूर्ण से सफल नहीं हो सकता है।

➡वृद्धि केन्द्र = विकास केन्द्र

प्रश्न प्रारूप 

1. विकास ध्रुव सिद्धांत के आलोचनात्मक व्याख्या भारतीय नियोजन के संदर्भ में करे।

2. प्रदेशों का सीमांकन / प्रादेशीकरण / Regionalization / Delimitation of Regions

2. प्रदेशों का सीमांकन/प्रादेशीकरण

(Regionalization / Delimitation of Regions)



प्रदेशों का सीमांकन⇒प्रदेशों का सीमांकन

            भौगोलिक प्रदेशों का सीमांकन / प्रादेशीकरण एक जटिल कार्य है। प्रारंभ में यह कार्य अनुभावाश्रित विधि से किया जाता था। लेकिन वर्तमान समय में प्रदेशों का सीमांकन सांख्यिकी विधि के द्वारा किया जा रहा है। अनुभावाधित विधि के द्वारा प्रदेशों के सीमांकन से दो प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती है:-

(1) दो प्रदेशों के बीच में एक संक्रमण पेटी का विकास होता था।

(2) विकास एवं नियोजन के कार्य में कठिनाई उत्पन्न होती थी।

           द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रदेशों के सीमांकन में सांख्यिकी विधि के साथ-साथ अनुभावाश्रित विधि को ध्यान में रखकर प्रादेशीकरण का कार्य किया जा रहा है। प्रदेशों के सीमांकन हेतु हेगेट महोदय ने Thiessen Polygon Model और न्यूनतम दूरी विधि (Minimum Distance Method) का विकास किया है।

       Thiessen polygon विधि केन्द्रीयता पर आधारित है। हेगेट का मानना है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश की कोई-न-कोई विशिष्टता होती है और उस विशिष्टताओं का कहीं-न-कहीं केन्द्रीयकरण होता है। उसी केन्द्रीय स्थान से विशिष्टता का मूल्यांकन करके सीमांकन का कार्य किया जाता है।

           कुछ भूगोलवेताओं ने प्रदेशों के सीमांकन हेतु गुरुत्वाकर्षण मॉडल का विकास किया है। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का विकास किया है।

p = MA x MB /d2

जहाँ:-

p = प्रदेश की सीमा है। 

MA और MB = दो प्रदेशों की विशिष्टता 

d = दो प्रदेशों के बीच की दूरी है।

       इस मॉडल के आधार पर 60 के दशक तक प्रदेशों का सीमांकन किया जाता था। उपर में बताये गये दोनों मॉडल विशिष्ट विशुद्ध रूप से सांख्यिकी पर साधारित थे। इसमें अनुभावाश्रित विधि का उपयोग कहीं नहीं किया गया था। यही कारण है कि 60 के दशक के मध्य से सांख्यिकी सह अनुभावाश्रित विधि के द्वारा प्रदेशों के सीमांकन का कार्य किया जाने लगा।

       यह मॉडल नियोजन प्रदेशों के सीमांकन हेतु उपयोगी मॉडल माना जाता है। इसी मॉडल के आधार पर राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का तथा भारत के अन्य महानगरीय प्रदेश के नियोजन का कार्य किया गया है।

       इस विधि के अंतर्गत प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल से पहले किसी भी प्रदेश का बाहरी सीमा का निर्धारण करते हैं। उसके बाद अनुभव के आधार पर प्रदेशों के सर्वेक्षण कार्य कर गुरुत्वाकर्षण मॉडल के द्वारा निर्धारित प्रदेशों के सीमा में संशोधन का कार्य किया जाता है। यही कारण है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का बाहरी सीमा सहारनपुर, भरतपुर, अलीगढ़ और सोनीपथ तक फैल चुका है।

निष्कर्ष 

         अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश का सीमांकन उसकी विशिष्ट तथ्यों की पहचान कर की जाती है। वर्तमान भूगोल में प्रदेशों क सीमांकन नियोजन और विकास के लिए काफी उपयोगी है। प्रदेशों के सीमांकन का कार्य भूगोल में जहाँ एक ओर उपयोगिता लाता है वहीं अन्तरविषयक अध्ययन में भी मदद करता है।


1. प्रदेश की संकल्पना (Concept of Region)

1. प्रदेश की संकल्पना

(Concept of Region)



प्रदेश की संकल्पना⇒प्रदेश की संकल्पना

           ‘प्रदेश’ शब्द का विकास मूलत: भूगोल विषय के अन्तर्गत किया गया है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम यूनानी भूगोलवेता हेरोडोटस और रोमन भूगोलवेता स्ट्रेबो ने किया था। आधुनिक भूगोल में प्रदेश शब्द का प्रयोग जर्मन भूगोलवेता रीटर ने किया था। वस्तुतः रीटर ने ‘प्रदेश’ शब्द का उपयोग द्वैतवाद उपागम के रूप में किया था जिसके कारण भूगोल में “क्रमबद्ध बनाम प्रादेशिक भूगोल” की द्वैतवाद प्रारंभ हुआ था।

         साधारण शब्दों में प्रदेश का तात्पर्य स्थलखण्ड के उस इकाई से है जहाँ पर अधिकतर भौगोलिक तत्वों में समरूपता पायी जाती है। उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ उसके आस-पास के क्षेत्रों की परिस्थितियों से भिन्न होती है।

हर्बटशन ⇒ “प्रदेश पृथ्वी की सतह का वह क्षेत्र है, जहाँ भूमि, जल, वायु, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव के बीच क्षेत्रीय सह-संबंध होता है।”

डिक्सन ⇒ प्रदेश विशिष्ट आर्थिक समरूपता वाला क्षेत्र है। लेकिन इसका आधार भौतिक परिस्थितियों की समरूपता होती है। 

➡ अमेरिका के नियोजन समीति ने कहा है कि “प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ की परिवेश विशेष के संदर्भ में विशेष लक्षणों वाली मानवीय अभियोजना का स्वरूप विकसित हुआ है।”

➡ रूसी भूगोलवेता गैरीसीमोव ने संलिष्ट एकीकृत प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत की है जिसके अन्तर्गत आधुनिक नियोजन का कार्य और पारिस्थैतिक विकास की नीति/कार्य एक साथ की जाती है। ऐसे ही पारिस्थैतिकी पर आधारित नियोजन वाले क्षेत्र को प्रदेश कहते है।

प्रदेश की विशेषताएँ

            सामान्यतः भौगोलिक प्रदेश की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है। जैसे:-

➡सभी प्रदेशों में मिलने वाले भौगोलिक घटकों के बीच सरूपता होती है।

➡कोई भी भौगोलिक प्रदेश दूसरे भौगोलिक प्रदेश की तुलना में विशिष्ट होता है और आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होता है।

➡किसी भी प्रदेश के भौगोलिक घटकों के बीच सह-संबंध एवं सह-अस्तित्व पाया जाता है। 

➡किसी भी प्रदेश में पदानुक्रमिक विभाजन की विशेषताएँ होती है। 

➡एक जैसे भौगोलिक प्रदेश में समस्याएँ भी एक सामान होती है।

➡प्रदेशों का सीमांकन उद्देश्य के आधार पर किया जाता है। 

➡दो प्रदेशों के बीच में सीमा खींचना एक कठिन कार्य है अर्थात् दो प्रदेशों के मिलन क्षेत्र में संक्रमण प्रदेश मिलने की संभावना होती है।

➡प्रदेशों के सीमांकन की दो विधियाँ है:- 

(i) अनुभावाश्रित विधि (Empirical method)

(ii) सांख्यिकी विधि (Statistical method)

➡ सांख्यिकी विधि के द्वारा प्रदेशों का सीमांकन करने पर संक्रमण क्षेत्र मिलने की संभावना नहीं रहती है। 

प्रदेश के प्रकार (प्रदेशों का वर्गीकरण

➡ किसी भौगोलिक प्रदेशों को तीन आधारों पर बाँटा जा सकता है:-

(i) एक कारक पर आधारित प्रदेश। जैसे:- जलवायु प्रदेश, मिट्टी प्रदेश, जैविक प्रदेश, इत्यादि।

(ii) बहुकारक आधारित प्रदेश। जैसे:- आर्थिक प्रदेश, सामाजिक प्रदेश

(iii) सम्पूर्ण कारकों पर आधारित प्रदेश। जैसे:- आर्थिक-सामाजिक नियोजन प्रदेश, संश्लिष्ट एकीकृत प्रदेश इत्यादि।

       आधुनिक भूगोल में किसी भी प्रदेश का कार्यिक महत्व बढ़ता जा रहा है। अतः पूरे विश्व में कार्यिक महत्व पर विशेष जोर दिया जा रहा है। कार्यों के आधार पर प्रदेशों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है। जैसे:- नियोजन प्रदेश, नगरीय प्रदेश, कमांड क्षेत्र प्रदेश, महानगरीय प्रदेश, औद्योगिक प्रदेश इत्यादि। 

       लिंटन तथा व्हिटलसी महोदय ने प्रदेश के विशिष्ट गुणों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। लिंटन महोदय ने प्रदेशों का वर्गीकरण 7 पदानुक्रम में व्हिटलसी ने 4 पदानुक्रम में वर्गीकृत किया हैं:-

लिंटन के अनुसार

पदानुक्रम      प्रदेश

(1)               महाद्वीप

(2)              वृहत प्रदेश

(3)               प्रान्त 

(4)                खण्ड

(5)                ट्रैक्ट

(6)                 स्टो

(7)              बसाव स्थान 

व्हिटलसी   के अनुसार

पदानुक्रम    प्रदेश

(1)            प्रभामंडल

(2)            प्रान्त

(3)             जिला

(4)            स्थानीय

निष्कर्ष:-

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल में प्रदेशों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया है। लेकिन उनमें से सर्वाधिक मान्यता कार्यों के आधार पर प्रदेशों के वर्गीकरण को प्राप्त है।

प्रश्न प्रारुप

1. प्रदेश की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।

2. संक्षेप में प्रदेश के लक्षण बताइये।

1. Concept of Rural and Urban Settlement / ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना

1. Concept of Rural and Urban Settlement



(ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना or ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल की संकल्पना)

             ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। बस्ती भूगोल के अन्तर्गत मानवीय अधिवास, प्रतिरूप, उनके प्रकार, उनका वर्गीकरण, समस्याएँ, अंतर प्रादेशिक और अन्तः प्रादेशिक तत्वों, बस्ती से जुड़े पर्यावणीय मुद्दों एवं उससे संबंधित समस्त पक्षों का अध्ययन किया जाता है।

          बस्ती का तात्पर्य वैसे भौगोलिक क्षेत्र से हैं जहाँ पर मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है। रोमन भूगोलवेता स्ट्रैबो ने सामूहिक अधिवास वाले स्थानों के लिए ‘Okument’ शब्द का प्रयोग किया। जबकि जर्मन भूगोलवेता रेटजेल ने ‘Ekumen’ शब्द पर प्रयोग किया। हालांकि भूगोल में बस्ती भूगोल की शुरुआत करने का श्रेय जर्मन भूगोलवेता कार्ल रीटर को जाता है क्योंकि इन्होंनें सबसे पहले बस्ती भूगोल शब्द का प्रयोग किया था। 

Concept of Rural and Urban Settlement

ग्रामीण बस्ती

बस्ती के प्रकार

      कार्यों के आधार पर बस्ती दो प्रकार के होते हैं।:-

(1) ग्रामीण बस्ती

(2) नगरीय बस्ती

            अगर इन दोनों बस्तियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाय तो उससे इनकी संकल्पना स्वत: स्पष्ट हो जाती है। जैसे:-

कार्यों के आधार पर 

         ग्रामीण बस्ती का तात्पर्य किसी स्थान पर निवास करने वाला उस सामूहिक अधिवास से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या प्राथमिक आर्थिक क्रियाकलाप में संलग्न रहती है। यहाँ पर प्राथमिक आर्थिक क्रियाकलाप का तात्पर्य कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, शिकार, खाद्य संग्रहण, खनन इत्यादि से है।

     जबकि नगरीय बस्ती का तात्पर्य उस सामूहिक अधिवासीय स्थल से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  में संलग्न रहती है। यहाँ पर द्वितीय एवं तृतीय कार्यों का तात्पर्य उद्योग, निर्माण, विनिर्माण, परिवहन, वाणिज्य व व्यापार एवं सेवा क्षेत्र से है।

➡ कार्यों के आधार पर ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना को ही भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

➡ ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना को निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर और स्पष्ट किया जा सकता है :- 

जनसंख्या के आकार के आधार पर 

     अगर जनसंख्या के आधार पर इनका विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि ग्रामीण बस्तियों की जनसंख्या का आकार छोटा होता है जबकि नगरीय बस्तियों की जनसंख्या का आकार बड़ा होता है। अलग-अलग  देशों में नगरीय बस्ती होने के लिए अलग आकार सुनिश्चित किये गये है। जैसे- भारत में 5000 जनसंख्या अधिवासीय क्षेत्र को नगर, न्यूजीलैण्ड और स्वीडेन में 200, अमेरिका में 500 सामूहिक अधिवासीय क्षेत्र को नगर के रूप में मान्यता दी जाती है। दूसरी ओर भारत में कई ऐसे गाँव हैं जिनकी जनसंख्या 10 हजार से भी अधिक है फिर भी उन्हें नगर के श्रेणी में नहीं रखा जाता है। 

जनसंख्या के घनत्व के आधार पर

         जनसंख्या घनत्व को आधार मानते हुए भी ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती में अन्तर स्थापित किया जाता है। जैसे- जिस स्थान पर 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या अधिवास करती है, वैसे स्थान को नगरीय बस्ती और उससे कम जनघनत्व वाले क्षेत्र को ग्रामीण बस्ती के श्रेणी में रखा जाता है।

सामाजिक जीवन / बंधन 

           ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक जीवन काफी सुदृढ़ होता है। परिवार, विवाह, नातेदारी जैसे सामाजिक संस्थाएँ जीवंत होती है। लेकिन नगरीय बस्तियों में सामाजिक बंधन का तत्व कमजोर होता है। यहाँ पर प्राथमिक सामाजिक संस्थाओं का कार्य स्कूल, कॉलेज, हॉस्पीटल, क्लब इत्यादि के द्वारा किया जाता है।

आर्थिक गतिविधियों का विशिष्टीकरण

              ग्रामीण बस्ती में आर्थिक गतिविधियों का विशिष्टीकरण नहीं होता है जबकि नगरीय बस्तियों के आर्थिक गतिविधियों का न केवल विशिष्टीकरण होता है बल्कि केन्द्रीयकरण भी होता है। 

आधारभूत संरचनाओं का स्तर 

                  ग्रामीण बस्तियों में आधारभूत संरचनाओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। अगर होता भी है तो उनका स्तर निम्न होता है। जबकि नगरीय बस्तियों में आधारभूत संरचनाओं के विकास का स्तर उच्च होता है।

नियोजित एवं अनियोजित बस्ती

                  ग्रामीण बस्तियाँ प्राय: जैविक एवं अनियोजित तरीके से विकसित होती है। जबकि नगरीय बस्तियाँ नियोजित एवं अनियोजित देनों प्रकार के हो सकती है।

निष्कर्ष

         इस तरह उपर के तथ्यों से  स्पष्ट है कि ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती दो अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। इन दोनों अधिवासीय क्षेत्र निर्धारण करने का सबसे उचित तरीक कार्यिक आधार को माना जाता है।


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