अध्याय 1.2 (ख) वन एवं वन्य जीव संसाधन

इकाई 1. अध्याय 1.2 (ख) वन एवं वन्य जीव संसाधन

बिहार बोर्ड के 8वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें


वन एवं वन्य जीव

अध्याय 1.2 (ख) वन एवं वन्य जीव संसाधन

I. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर
सही विकल्प को चुनें।
1. भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्रफल किस राज्य में है?
(क) मेघालय
(ख) मणिपुर
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) महाराष्ट्र
उत्तर- (ग) मध्य प्रदेश
2. विश्व में लगभग कितने प्रकार की वनस्पतियाँ मिलती है?
(क) 5 लाख
(ख) 10 हजार
(ग) 50 लाख
(घ) 10 लाख
उत्तर- (घ) 10 लाख
3. बिहार उत्तर प्रदेश एवं झारखंड में किस प्रकार के वन पाए जाते हैं?
(क) उष्णकटिबंधीय पतझड़ वन
(ख) उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
(ग) शीतोष्ण पतझड़ वन
(घ) कोणधारी वन
उत्तर- (क) उष्णकटिबंधीय पतझड़ वन
4. इनमें कौन उभयचर जीव है?
(क) केचुआ
(ख) कछुआ
(ग) कौवा
(घ) बाघ
उत्तर – (ख) कछुआ
5. इनमें कौन भारत का राष्ट्रीय पशु है?
(क) मोर
(ख) शेर
(ग) ऊँट
(घ) बाघ
उत्तर- (घ) बाघ
6. रेड डाटा बुक क्या है?
(क) विलुप्त हो रहे प्रजातियों की सूची
(ख) भारत के वनों की सूची
(ग) भारत के सभी पशुओं की सूची
(घ) भारत के सभी पक्षियों की सूची
उत्तर- (क) विलुप्त हो रहे प्रजातियों की सूची (1970)
7. देश में राष्ट्रीय उद्यानों की कुल संख्या कितनी है?
(क) 448
(ख) 14
(ग) 85
(घ)21
उत्तर- (ग) 85
II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें।
1. वन है तो हम है।
2. कृत्रिम रूप से किए गए पौधारोपण को  सामजिक वानिकी कहा जाता है।
3. हिमालय वन  से प्राप्त रसायन कैंसर के उपचार में उपयोगी है।
4. चंदन के वन कर्नाटक में मिलते हैं।
5. अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सदाबहार वन जाते हैं।
6. गौतम बुद्ध अभयारण्य गया जिला में है।
7. वन को पृथ्वी का फेफड़ा कहा जाता है।
III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 50 शब्दों में)
1. सामाजिक वानिकी किसे कहा जाता है?
उत्तर- सामजिक स्तर पर परती या बेकार भूमि पर पर्यावरण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए कृत्रिम वनों का विकास किया जाता है, जिसे सामाजिक वानिकी कहा जाता है। दुसरे शब्दों में कृत्रिम रूप से किए गए पौधारोपण को सामजिक वानिकी कहा जाता है।
2. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन के तीन प्रमुख वृक्षों के नाम लिखिए।
उत्तर- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन के तीन प्रमुख वृक्षों के नाम – शीशम, सागवान, साल।
3. किस वर्ग के लोगों के लिए वन आश्रय स्थली का काम करता है?
उत्तर- जनजातीय वर्ग के लोगों के लिए वन आश्रय स्थली का काम करता है।
4. उन राज्यों के नाम लिखिए जहाँ देश में सदाबहार वन पाए जाते हैं?
उत्तर- असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम।
5. वनों के कोई तीन महत्व लिखिए।
उत्तर- (i) जलावन एवं फर्नीचर के लिए।
(ii) कई उद्योगों के लिए कच्चा माल में।
(iii) औषधियों के निर्माण में।
IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 200 शब्दों में)
1. वन से आप क्या समझते हैं? भारत में पाए जाने वाले वनों का विस्तृत विवरण दीजिए।
उत्तर- वह स्थान जहाँ पेड़-पौधों का घनत्व सामान्य से अधिक होता है उसे वन/जंगल कहा जाता हैं।
             100 से 200 सेंटीमीटर वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन पाए जाते हैं। 50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मरुस्थलीय वन पाये जाते हैं। भारत के कुल वन क्षेत्रों में 93 प्रतिशत उष्ण कटिबन्धीय वन तथा 87 प्रतिशत शीतोष्ण कटिबन्धीय वन पाए जाते हैं।
2. वन में पाए जाने वाले विभिन्न प्राणियों का वर्गीकरण उदाहरण के साथ दीजिए।
उत्तर- वन और वन्य जीवों की बीच आपस में गहरा संबंध होता है। यहाँ विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु अपना जीवन व्यतीत करते हैं। जिनमें मांसाहारी जीव जैसे – शेर, बाघ आदि। 
शाकाहारी जीव जैसे-हिरण, हाथी आदि। 
उभयचर जीव जैसे-मेढ़क, कछुआ आदि।
सरीसृप जीव जैसे-सांप, छिपकली, जोंक, केंचुआ आदि पाए जाते हैं। इन जीवों के अलावा यहाँ विभिन्न  प्रकार के पक्षी भी मिलते हैं।
3. वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर – वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण संघ इस दिशा में अनेक कार्यक्रम चला रहा है। वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य एवं जैवमंडल क्षेत्र विकसित किए गए हैं।
       
        इस समय देश में 85 राष्ट्रीय उद्यान, 448 अभ्यारण्य एवं 16 जैवमंडल सुरक्षित क्षेत्र हैं। बिहार में कांवर झील पक्षी विहार (बेगूसराय), गया में गौतम बुद्ध अभ्यारण्य, पश्चिमी चम्पारण में वाल्मीकि नगर वन्य प्राणी अभ्यारण्य प्रसिद्ध हैं।

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इकाई 1. अध्याय 1.1 (क) भूमि, मृदा एवं जल संसाधन

 इकाई 1. अध्याय 1.1 (क) भूमि, मृदा एवं जल संसाधन

बिहार बोर्ड के 8वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

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इकाई 1. अध्याय

I. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर

सही विकल्प को चुनें।

1. पृथ्वी का कितने प्रतिशत भाग पर स्थल है?
(क) 71
(ख) 29
(ग) 41
(घ) 46
उत्तर- (क) 71
2. विश्व में सघन जनसंख्या कहाँ मिलती है?
(क) पहाड़ों पर
(ख) पठारों पर
(ग) मैदानों में
(घ) मरुस्थल में
उत्तर- (ग) मैदानों में
3. भारत में भूमि उपयोग संबंधी आँकड़े कौन रखता है?
(क) भूगर्भ विज्ञान विभाग
(ख) भू राजस्व विभाग
(ग) गृह विभाग
(घ) चिकित्सा विभाग
उत्तर – (ख) भू राजस्व विभाग
 4. भूमि उपयोग के कुल कितने प्रमुख वर्ग है?
(क) 9
(ख) 7
(ग) 5
(घ) 3
उत्तर- (ग) 5
5. मृदा में कुल कितने स्तर पाए जाते हैं?
(क) 2
(ख) 3
(ग) 4
(घ) 7
उत्तर- (ग) 4
6. समोच्च रेखीय खेती करना किसका उपाय है?
(क) जल प्रदूषण को रोकने का
(ख) मृदा अपरदन को रोकने का
(ग) जल संकट को दूर करने का
(घ) भूमि की उर्वरता घटाने का
उत्तर – (ख) मृदा अपरदन को रोकने का
7. रासायनिक दृष्टि से जल किस का संयोजन है?
(क) हाइड्रोजन एवं नाइट्रोजन का
(ख) ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन का
(ग) हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का
(घ) ऑक्सीजन एवं कार्बन का
उत्तर- (ग) हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का
8. इनमें कौन एक महासागर नहीं है?
(क) अंटार्कटिक
(ख) आर्कटिक
(ग) हिन्द
(घ) प्रशांत
उत्तर- (क) अंटार्कटिक
 II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें:-
1. मृदा में जीवों के सड़े-गले अवशेषों कोक ह्यूमस कहा जाता है।
2. दक्कन क्षेत्र में काली मृदा पाई जाती है।
3. लेटराइट मृदा का निर्माण प्रक्रिया निक्षालन से होता है।
4. भूमि एक प्राकृतिक संसाधन है।
5. महासागरों में जल का 97.3 प्रतिशत भाग पाया जाता है।
III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 50 शब्दों में)
1. भूमि उपयोग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर – भूमि उपयोग मानव के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं। भूमि पर ही कृषि कार्य होता है तथा इसी पर पेड़-पौधे, उगते हैं तथा मकान, गाँव, शहर, तालाब, नहर, कुंआ, चापाकल, सड़कमार्ग, रेलमार्ग, पाइपलाइन मार्ग, कारखाना, विभिन्न खेलों के मैदान एवं स्टेडियम इत्यादि इसी पर बने होते हैं।
2. मृदा निर्माण में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर – किसी स्थान पर मृदा के निर्माण में वहाँ उपस्थित मौलिक चट्टान, क्षेत्र की जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु, क्षेत्र की ऊँचाई, क्षेत्र की ढाल तथा समय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
3. भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर – भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले दो महत्वपूर्ण कारक होता है :- प्राकृतिक कारक और मानवीय कारक।
प्राकृतिक कारक-
            स्थल रूप में भिन्नता, मृदा की विशेषता, खनिजों की उपस्थिति, जलवायु एवं जल संबंधी विशेषताएँ इत्यादि जैसे प्राकृतिक कारक भूमि उपयोग में परिवर्तन लाते हैं।
मानवीय कारक-
           तकनीकी ज्ञान में वृद्धि, जनसंख्या वृद्धि, श्रमिकों की उपलब्धता तथा मानवीय आवश्यकताओं में अंतर इत्यादि जैसे कारक भूमि उपयोग को प्रभावित करते हैं।
4. ऋतुक्षरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – जब चट्टानें ऋतु अर्थात समय के साथ टूट-फुट कर अपने ही मूल स्थानों पर कणों के रूप में बिखरने लगती है तो उस प्रक्रिया को ऋतुक्षरण कहा जाता है। इसे अपक्षय  के नाम से भी जाना जाता है। 
IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 200 शब्दों में)
1. भूमि उपयोग क्या है? भूमि उपयोग के विभिन्न वर्गों का विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूमि उपयोग का तात्पर्य कुल उपलब्ध भूमि का विविध कार्यों में होनेवाले उपयोग के आँकड़ों से है। इससे संबंधित आँकड़े हमेशा बदलते रहते हैं। मतलब यह कि विभिन्न देशों के मध्य इसका प्रारूप एक जैसा नहीं मिलता है। कहीं वन क्षेत्र अधिक मिलता है, तो कहीं शुद्ध बोई गई भूमि का क्षेत्र, तो कहीं बंजर भूमि का क्षेत्र अधिक मिलता है। भारत में भूमि उपयोग प्रारूप संबंधी आँकड़े या रिकार्ड भू-राजस्व विभाग रखता है।
         
         भूमि उपयोग के विभिन्न वर्ग निम्नलिखित हैं:-
(i) वन क्षेत्र की भूमि
(ii) कृषि कार्य के लिए अनुपलब्ध भूमि
a. बंजर एवं व्यर्थ भूमि
b. सड़क, मकान, उद्योगों में लगी भूमि
(iii) परती भूमि
a. चालू परती भूमि (जिस भूमि पर एक वर्ष या उससे कम समय से कृषि नहीं की गई हो)
b. अन्य परती भूमि (जिस भूमि पर एक वर्ष से अधिक तथा पाँच वर्ष से कम समय से कृषि नहीं की गई हो।)
(iv) अन्य कृषि अयोग्य भूमि
a. स्थायी चारागाह की भूमि
b. कृषि योग्य बंजर भूमि (जिस भूमि पर पाँच वर्ष से अधिक समय से खेती नहीं की गई हो।)
(v) शुद्ध बोई गई भूमि
2. मृदा निर्माण प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- किसी स्थान पर मृदा के निर्माण में वहाँ उपस्थित मौलिक चट्टान, क्षेत्र की जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्म जीवाणु, क्षेत्र की ऊँचाई, क्षेत्र की ढाल तथा समय की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मृदा निर्माण प्रक्रिया में सबसे पहले मौलिक चट्टानें टूटती हैं। टूटे हुए कणों के और महीन होने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। हजारों लाखों वर्षों बाद वही चट्टानी टुकड़ा भौतिक, रासायनिक एवं जैविक ऋतुक्षरण से महीन कणों में बदल जाता है, जो ‘मृदा’ कहलाता है। सामान्यत: यह एक सेंटीमीटर मोटी सतह वाली मृदा के निर्माण में सैकड़ों हजारों वर्ष लग जाते हैं।
               
           इस प्रकार मृदा निर्माण की प्रक्रिया काफी लंबी अवधि में पूरी होती है। परिणामस्वरूप इस क्रम में मृदा के तीन स्तर तैयार हो जाते हैं। इन्हें ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः ‘अ’ स्तर, ‘ब’ स्तर, एवं ‘स’ स्तर के नाम से जाना जाता है। ऊपरी स्तर ‘अ’ में ह्यूमस की अधिकता होती है। ‘ब’ स्तर में बालू एवं पंक की प्रधानता होती है। ‘स’ स्तर में ऋतुक्षरण/अपक्षरण से प्राप्त चट्टानी कण मिला करते हैं। जबकि सबसे निचले स्तर में मूल चट्टानें होती हैं।
3. मृदा अपरदन के कारकों का उल्लेख कर इसके बचाव हेतु उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर- मृदा अपरदन के मुख्य कारक हैं- वनों की कटाई, पशुचारण, आकस्मिक तेज वर्षा, तेज पवन, अवैज्ञानिक–कृषि पद्धति तथा बाढ़ के प्रभाव से मृदा का अपरदन ज्यादा होता है । तेज पवन या पानी के बहाव से मैदानी या चौरस क्षेत्रों में सतही अपरदन होता है। जबकि उबड़-खाबड़ क्षेत्रों में क्षुद्रनालिका या अवनालिका अपरदन होता है। मृदा अपरदन के कारण मृदा के मौलिक गुणों एवं उर्वरता में कमी आने लगती है। इसका असर फसलों, फलों एवं साग-सब्जियों के उत्पादन पर पड़ता है। इसलिए मृदा संरक्षण के उपायों को अपनाना जरूरी है। मृदा संरक्षण के लिए हमें निम्नलिखित उपाय करना चाहिए-
(i) पर्वतीय क्षेत्रों में समोच्चरेखी खेती करना चाहिए।
(ii) फसल चक्र तकनीक को अपनाना चाहिए।
(iii) खेती के वैज्ञानिक तकनीक को अपनाना चाहिए।
(iv) जैविक खाद का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
(v) पर्वतीय ढलानों पर वृक्षारोपण का कार्य करना चाहिए।
(iv) बंजर भूमि पर घास लगाने का कार्य करना चाहिए।
4. जल प्रदूषण के कारकों का उल्लेख कर इसके दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- जल के स्वाभाविक/प्राकृतिक गुणों में अंतर आना या जल में अवांछित पदार्थों का मिल जाना, जो जीवन के लिए हानिकारक हो, जल प्रदूषण कहलाता है। जल प्रदूषण के निम्नलिखित स्रोत हैं:-
(i) घरेलू कूड़ा-करकट का उचित निपटान न करना।
(ii) औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों का नदियों में प्रवाहित करना।
(iii) नगरीय क्षेत्रों का गंदा जल का जमाव या नदियों में प्रवाहित करना।
(iv) लाशों या मरे जानवरों को नदियों में प्रवाह करना।
               
         इस प्रदूषित जल को पीने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं। जैसे-उल्टी आना, किडनी का खराब होना, पेट दर्द, सिर दर्द, डायरिया, छाती दर्द, हड्डी का विकृति, वजन घटना, दिमागी विकृति इत्यादि।
             
           जल प्रदूषण से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय करना चाहिए:-
(i) नदियों, तालाबों में अपशिष्ट पदार्थों को डालने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
(ii) रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के उपयोग पर रोक लगाना चाहिए।
(iii) लाशों या मरे जानवरों को नदियों में प्रवाह पर रोक लगाना चाहिए।
5. जल संकट क्या है जल संकट के लिए जिम्मेदार कारकों का उल्लेख कर इसे दूर करने के उपायों का विवरण दीजिए।
उत्तर– किसी निश्चित क्षेत्र के भीतर जल उपयोग की मांगों को पूरा करने के लिए उपलब्ध जल संसाधनों की कमी को ही जल संकट कहा जाता है। विश्व के सभी महाद्वीपों में रहने वाले लगभग 2.8 बिलियन लोग हर वर्ष कम से कम एक महीने जल की कमी से किसी न किसी रूप से प्रभावित होते हैं। 1.2 अरब से अधिक लोगों के पास पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है।
       
      जनसंख्या का तीव्र गति से बढ़ना, जल का अति दोहन, जल का अनुचित उपयोग, जल का असमान वितरण, जल का प्रदूषित होना, शहरों में पनपती अपार्टमेंट संस्कृति इत्यादि जल प्रदूषण के बड़े कारण हैं। कई शहरों में आवश्यकता से अधिक जल उपलब्ध है, परंतु वे प्रदूषित हैं। इसी तरह, कई  शहर महासागरों के किनारे अवस्थित हैं परंतु वहाँ जल का उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए जल की कमी या जल संकट पूरे विश्व में व्याप्त है। जल संकट को दूर करने के निम्नलिखित उपाय हैं:-
⇒ जल के पुन:चक्रण तकनीक को अपनाना चाहिए।
⇒ सिंचाई के लिए आधुनिक तकनीकों को उपयोग करना चाहिए।
⇒ बच्चों के बीच जल संरक्षण की महत्ता को बताना चाहिए।
⇒ प्राचीन जल संचय तकनीकों का भी उपयोग करना चाहिए।
⇒ वर्षा जल संग्रह की आधुनिक तकनीक का उपयोग करना चाहिए।
⇒ छत का वर्षा जल संग्रहित करना चाहिए।
⇒ जल का समुचित उपयोग करना चाहिए।
⇒ जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
6. भारत में पाई जाने वाली मृदा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारत में जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल मृदा, पीली मृदा, लैटेराइट मृदा, मरूस्थलीय मृदा एवं पर्वतीय मृदा पाई जाती है।
⇒ जलोढ़ मृदा देश के सभी नदी घाटियों में पाई जाती है। उत्तर भारत का विशाल मैदान पूर्णत: जलोढ़ मृदा से निर्मित है। नवीन जलोढ़ मृदा को खादर एवं पुराने जलोढ़ मृदा को बाँगर कहा जाता है। जलोढ़ मृदा चावल, गेंहूँ, मक्का, गन्ना एवं दलहन फसलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसमें ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है।
⇒ काली मृदा ऐलुमिनियम एवं लौह यौगिक की उपस्थिति के कारण काली होती है। यह मृदा कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना तथा तामिलनाडु में यह मृदा अधिक पाई जाती है।
⇒ लाल एवं पीली मृदा प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी एवं दक्षिणी हिस्से में पाई जाती है। लोहे के अंश के कारण इस मदा का रंग लाल होता है। जल में मिलने के बाद यह मृदा पीली रंग की हो जाती है। ज्वार, बाजरा, मक्का, मुंगफली, तंबाकू और फलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त यह मृदा उड़ीसा, झारखंड एवं मेघालय में पाया जाता है।
⇒ लैटेराइट मृदा का निर्माण निक्षालन की प्रक्रिया से होता है। यह मृदा केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु राज्यों में मिलती है। मरूस्थलीय मृदा हल्के भूरे रंग की होती है जो राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा एवं दक्षिणी पंजाब में पाई जाती है।

⇒  पर्वतीय मृदा पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है।


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इकाई 1. अध्याय 1. संसाधन

 इकाई 1. अध्याय 1. संसाधन

बिहार बोर्ड के 8वीं कक्षा का भूगोल विषय का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर

सरल एवं आसान शब्दों में उत्तर देना सीखें



अध्याय 1. संसाधन

I. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर

सही विकल्प को चुनें।

1. इनमें से कौन एक प्राकृतिक संसाधन है
(क) पंचायत भवन
(ख) विद्यालय
(ग) भूमि
(घ) हवाई अड्डा
उत्तर – (ग) भूमि
2. इनमें कौन प्राकृतिक संसाधन नहीं है
(क) सूरज
(ख) मिट्टी
(ग) जाल
(घ) हवाई जहाज
उत्तर – (घ) हवाई जहाज
3. केरल में पाया जाने वाला थोरियम किस प्रकार के संसाधन का उदाहरण है
(क) निजी
(ख) नवीकरणीय
(ग) संभाव्य
(घ) जैव संसाधन
उत्तर – (ग) संभाव्य
4. संसाधन निर्माण के लिए क्या आवश्यक है
(क) तकनीक
(ख) आवश्यकता
(ग) ज्ञान
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (ग) ज्ञान
II. खाली स्थान को उपयुक्त शब्दों से पूरा करें।
1. मानव संसाधन क्षेत्र के विकास के लिए आधार का काम करते हैं।
2. राजस्थान में पाया जाने वाला तांबा वास्तविक संसाधन का उदाहरण है।
3. दिमागीएवं शारीरिक क्षमता मानव संसाधन बनाने के लिए आवश्यक है।
4. संसाधन के लिए मूल्य की अभिव्यक्ति विविध प्रकार से की जाती है। 
III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 50 शब्दों में) 
1. संसाधन की परिभाषा दें। 
उत्तर – वे सभी जीव-जन्तु, वस्तुएँ एवं पदार्थ जिसका मानव अपने उपयोग में लाता है, संसाधन कहलाता है।
2. संसाधन के वर्गीकरण के प्रमुख आधार कौन-कौन से हैं? 
उत्तर – संसाधन के वर्गीकरण के प्रमुख आधार निम्नलिखित है-
  • उत्पत्ति के आधार पर– जैव और अजैव संसाधन
  • उपलब्धता के आधार पर– नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य संसाधन
  • स्वामित्व के आधार पर– व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन
  • विकास के स्तर एवं उपयोग के आधार पर– संभावी, विकसित भंडार और संचित कोष संसाधन
  • वितरण के आधार पर- स्थानीय एवं सर्वत्र उपलब्ध संसाधन
3. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण क्यों जरूरी है? 
उत्तर – प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना अत्यंत जरूरी है ताकि उनका उपयोग अधिक समय तक किया जा सके। अर्थात भावी पीढ़ीयों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रख सकें।
4. नवीकरणीय संसाधन किसे कहा जाता है ? उदाहरण के साथ लिखें।
उत्तर – वैसे संसाधन जिसकी पुन: पूर्ति प्राकृतिक रूप से होती रहती है, उसे नवीकरणीय संसाधन कहते है। जैसे- पवन, सूर्य की किरण, मिट्टी, जल इत्यादि।
5. प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में असमानता के प्रमुख कारणों को लिखें।
उत्तर – प्राकृतिक संसाधनों के वितरण पर भू-आकृतियों, जलवायु, ऊँचाई, वनस्पति इत्यादि जैसे अनेक भौतिक कारकों का प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी पर इन सभी कारकों में विभिन्नता होने के कारण संसाधनों का वितरण  में असमानता होती है।
IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें। (अधिकतम 200 शब्दों में)
1. प्राकृतिक संसाधन का वर्गीकरण उपयुक्त उदाहरण के साथ प्रस्तुत करें।
उत्तर- ⇨ विकास एवं उपयोग की दृष्टि से प्राकृतिक संसाधन दो प्रकार के होते है:-
(i) वास्तविक संसाधन- पश्चिम एशिया का पेट्रोलियम, आस्ट्रेलिया का सोना, झारखंड का अभ्रक, मध्य प्रदेश का मैंगनीज एवं राजस्थान का तम्बा इत्यादि।
(ii) संभाव्य संसाधन- केरल में मिलने वाला थोरियम, लद्धाख में पापा जाने वाला यूरेनियम इत्यादि।
⇨ उत्पत्ति के आधार पर प्राकृतिक संसाधन  दो प्रकार के होते है:-
(i) जैविक संसाधन- पेड़-पौधे, वन, जीव-जंतु इत्यादि।
(ii) अजैविक संसाधन- खनिज, चट्टान, मिट्टी, भूमि, खेत तालाब, नदी, झील इत्यादि।
⇨ उपलब्धता के आधार पर प्राकृतिक संसाधन  दो प्रकार के होते है:-
(i) नवीकरणीय संसाधन- सूर्य की किरणे एवं पवन इत्यादि। 
(ii) अनवीकरणीय संसाधन- कोयला, पेट्रोलियम, अभ्रक इत्यादि।
⇨ स्वामित्व के आधार पर संसाधन चार प्रकार के होते है:-
(i) व्यक्तिगत संसाधन- भूखंड,घर व अन्य जायदाद, बाग-बगीचा,तालाब, कुआँ इत्यादि जिस पर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।
(ii) समुदायक संसाधन- गाँवों में श्मशान,मंदिर या मस्जिद परिसर, सामुदायिक भवन, तालाब आदि। शहरों में सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल मैदान, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, एवं गिरिजाघर।
(iii)राष्ट्रीय संसाधन- किसी राजनीतिक सीमा के अंतर्गत भूमि, खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन व वन्यजीव एवं समुद्री जीव (200 KM महासागरीय क्षेत्र तक) राष्ट्रीय संसाधन है।
(iv) अंतरार्ष्ट्रीय संसाधन- किसी देश की तट रेखा से 200 KM की  दूरी तक का क्षेत्र(अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र)।
⇨ वितरण के आधार पर प्राकृतिक संसाधन  दो प्रकार के होते है:-
(i) सर्वत्र उपलब्ध संसाधन- मिट्टी, पवन इत्यादि।
(ii) स्थानिक संसाधन- कोडरमा में पाया जाने वाला अभ्रक, जादूगोड़ा में मिलने वाला यूरेनियम, छोटानागपुर क्षेत्र में पाया जान बाला कोयला इत्यादि।
2. “संसाधन बनाए जाते हैं।” उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट करें।
उत्तर- संसाधन होते नहीं बनाये जाते हैं यह कथन ई. जिम्मरमैन का है। संसाधन ऐसा स्त्रोत है, जिसका उपयोग मानव अपने फायदे के लिए करता है। जिम्मरमैन का मानना था कि कोई वस्तु प्रकृति में भले ही उपस्थित है, परन्तु जब तक हम उसका उपयोग अपने फायदे के लिए नहीं करते हैं, तब तक  हम उसे संसाधन नहीं कह सकते हैं।
 
           इस प्रकार  “संसाधन बनाये जाते हैं।” जैसे- नदी या मरुस्थल में पड़े बालू का वहाँ कोई उपयोग नहीं होता, परन्तु जब वहाँ से उठाकर बालू को निर्माण कार्य हेतु गाँव या शहर में लाया जाता है तब इसका उपयोग और मूल्य दोनों बदल जाते हैं। अत: हम यह कह सकते हैं कि संसाधन बनाये जाते हैं।
3. संसाधन संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालें। 
उत्तर- बिना संसाधन के मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। परन्तु इन संसाधनों के उपयोग की तकनीकी ज्ञान एवं उन संसाधनों की आवश्यकता का होना आवश्यक है। मनुष्य ने अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। हमने इसका इस्तेमाल तो किया ही है इसे इस प्रकार प्रदूषित भी कर दिया है कि वे आज सीधे उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं।
         
         यही नहीं, हमने कई संसाधनों (जैसे कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि) का इतना अधिक खनन एवं उपयोग किया है कि इनके भंडार धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। भविष्य में इनके भंडार खत्म होने की पूरी संभावना है। मानव के लिए इनका होना भविष्य में भी उतना ही जरूरी है जितना की आज। मानव जीवन सतत् चलता रहे, इसके लिए यह जरूरी है कि हम इन अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित कर इसे भावी पीढ़ीयों के लिए संरक्षित करें।
4. संसाधन के अत्यधिक दोहन से मानव ने संकट पैदा कर दिया है। इस कथन से आप कहाँ तक सहमत है।

उत्तर- संसाधनों के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन इन संसाधनों के उपयोग की तकनीक एवं उन संसाधनों की आवश्यकता का होना अति आवश्यक है। मनुष्य ने अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। हमने इसका इस्तेमाल तो किया ही है इसे इस प्रकार प्रदूषित भी कर दिया है कि वे आज सीधे उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं।

          यही नहीं, हमने कई संसाधनों का इतना अधिक खनन एवं उपयोग किया है कि इनके भंडार धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर है। भविष्य में इनके भंडार समाप्त होने की पूरी सम्भावना है। मानव के विभिन्न आवश्कताओं की पूर्ति  लिए इनका होना भविष्य में भी उतना ही जरूरी है जितना की आज। मानव जीवन सतत् चलता रहे, इसके लिए यह जरूरी है कि हम इन अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित कर इसे भविष्य के लिए संरक्षित करें। अर्थात संसाधनों के अत्यधिक दोहन से मानव ने संकट पैदा कर दिया है। इस कथन से हम पूर्णत: सहमत है।


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1. मानव विकास सूचक / Human Development Index

1. मानव विकास सूचक 

(Human Development Index)


मानव विकास सूचक⇒मानव विकास सूचक

             मानव विकास सूचक का प्रथम प्रकाशन 1990 में यू.एन.डी.पी. (U.N.D.P. United Nation Development Programme) द्वारा प्रकाशित किया गया। इस सूचक का विकास संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से चार अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा मिलकर किया गया है। जैसे:-

(i) WRI – World Resource Institute

(ii) UNEP – United Nation Invironmental Programme

(iii) UNDP – United Nation Development Programme

(iv) WB – World Bank

        यह प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है जो विश्व के विभिन्न प्रदेशों में मानव विकास की स्थिति को बताता है। यह सूचक तीन महत्वपूर्ण चरों पर आधारित है-

(i) जीवन प्रत्याशा या आयु (Longevity) 

(ii) ज्ञान (Knolwledge) – आयु के आधार पर दो वर्गों में बांटा गया है – 0-15 वर्ष की आयु के बच्चों का जीवन प्रत्याशा और 15 से अधिक (Adult Literaney level)

(iii) रहन-सहन का स्तर या जीवन स्तर (Standary of Living) – यह तीन P पर आधारित है – Purchasing, Power and Parity.

          मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार जीवन प्रत्याशा अप्रत्यक्ष रूप से खान-पान स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं को बताता है। ज्ञान किसी भी समाज के जागरूकता और चेतना को बताता है जो संसाधनों के विकास पारिस्थतिकी संरक्षण और स्वास्थ्य जीवन शैली में सहायक हो सकता है।

        जीवन स्तर वह आधार है जो किसी भी देश के क्रय क्षमता को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के संदर्भ में बताता है। वर्तमान उदारीकरण के युग में सकल राष्ट्रीय उत्पाद की तुलना में क्रय क्षमता अधिक उपयोगी सूचक है।

             मानव विकास रिपोर्ट – 1995 में, 174 देशों को इन दोनों चरों से संबंधित सूचनाएं प्राप्त हो सकी। अतः मानव विकास रिपोर्ट 174 देशों के लिए तैयार की गई। 1996 और 1997 का रिपोर्ट भी 174 देशों पर आधारित था। यह रिपोर्ट तीनों ही सूचनाओं को मिलाकर संयोजित सूचक (Composite Index) विकसित करता है।

       इस मापक को विकसित करने के लिए तीनों चरों को अधिकतम और न्यूनतम मान लिया गया है और देश विशेष के संदर्भ में विचलन विधि का प्रयोग करते हुए साख्यिकी मान निकाला गया है। तीनों ही चरों को सांख्यिकी मान को जोड़ कर उस तीन से भाग दिया गया है और भागफल ही सूचक मान है।

    मानव विकास सूचक विकसित करने के बाद विश्व के देशों को तीन वर्गों में बांटा गया है:-

(i) L.H.D. (Low Human Development Country) 

(ii) MHD (Mean Human Develoment Country) 

(ii) HHD (High Human Development Country)

          L.H.D का सूचक मान < 0.5 अर्थात् 0.5 से कम है। इसके अंतर्गत 1995 के अनुसार 58 देश है – प्रमुख देशों में भारत, मोरक्को एवं गेबोन सहित अधिकतर अफ्रीकी देश, द० एशिया के सभी देश आते हैं। 

       MHD का सूचक मान 0.5 से 0.8 है। इसके अंतर्गत भी 8 देश है जिसमें ब्राजील, चीन, टर्की, द० अफ्रीका, रूस, सऊदी अरबिया, मिस्र और अल्जीरिया जैसे देश है। पूर्वी यूरोप तथा मध्य एशियाई गणतंत्र इसी वर्ग में आते है।  पू० एशिया के भी अधिकतर देश, मध्य अमेरिका और द० अमेरिका के अधिकतर देश इसी वर्ग में है। 

         HHD का सूचक माग (above > 0.800) है। इसके अंतर्गत सभी विकसित देशों के अलावे ब्रुनेई, UAE. कतार, मेक्सिको, क्यूबा, बहामास, टोबैगो, मारिशस जैसे देश इस वर्ग में आते है। 

       ब्रुनेई, कतार और U.A.E तेल निर्यात आधारित देश है जिसने मानव विकास पर पर्याप्त खर्च किया है। मेक्सिको उन देशों में है जहां प्रतिव्यक्ति आय कम होने के बावजूद मानव विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गई है। 

       मानव विकास की वार्षिक रिपोर्ट की अनिवार्यता इसलिए महसूस की गई है कि विश्व के आर्थिक सामाजिक विषमता तेजी से बढ़ रहा थी। इसे दूर करने के लिए आवश्यक है कि वैसे देशों की पहचान की जाए जहाँ कि मानव विकास के लिए निवेश आवश्यक है और इस दिशा में अधिक आय वर्ग के देश, बहुराष्ट्रीय कंपनियां तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं (जैसे WHO, UNICEF) सकारात्मक सहयोग दे सकती है।

        इस दिशा में कई कदम उठाए गए है। जैसे IDA (International Development Agencies) ने निर्णय लिया है कि उन देशों को ऋण नहीं दिए जाएंगे जिनका Standard of Living उच्च या प्रति व्यक्ति आय 400 से अधिक है। इसी प्रकार W.H.O. और Unicef निम्न मानव विकास के देशों में अपने कार्यों को प्राथमिकता दे रहा है।

        मानव विकास रिपोर्ट में धन के वितरण की विषमता पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। 1995 के रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 225 अति धनी (Ultra rich) व्यक्ति है जिनकी कुल सम्पत्ति One Milion Dollar है जो विश्व के 2.5 व्यक्ति की आय के बराबर है।

       इसी प्रकार से यह रिपोर्ट बताता है कि विश्व के मात्र 20% जनसंख्या के पास विश्व का 34.75 GNP (Gross National Product) इसी 20% जनसंख्या का 84.7% के व्यापार का लाभ मिलता है। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार इन विषमताओं का अंत मात्र आर्थिक विकास, निवेश, उदारीकरण के द्वारा नहीं वरन् सफल मानव विकास के द्वारा संभव है।

 2. मानचित्र के प्रकार 

 2. मानचित्र के प्रकार / Type of Map


मानचित्र के प्रकार

मानचित्र मापनी के आधार पर दो प्रकार के होते हैं: 

(1) Large Scale Map (बड़ी मापक मानचित्र)

(i) Cadastral Map (भूसम्पति मान‌चित्र) 

(ii) Topographical Map (स्थलाकृति मानचित्र)

(2) Small Scale Map (छोटी मापक मानचित्र)

(i) Wall Map (दीवारी मानचित्र)

(ii) Atlas Map (एटलस मानचित्र)

1. Large Scale Map (बड़ी मापनी मानचित्र)

            एक छोटे भूभाग को बड़े इकाई (Scale/ मापनी) पर दिखाये जाने वाले मानचित्र को Large Scale Map कहते हैं।

1cm = 10km.

(i) Cadastral Map (भूसम्पति मानचित्र) 

⇒ यह एक Large Scale Map है।

⇒ यह एक ऐसा Map है जिस पर किसी एक गाँव का, ग्राम पंचायत का, खेतों के मेढ़ को, ग्रामीण रास्तों को, गाँव में मिलने वाला कुँआ, छोटे -2 जलाशय, सार्वजनिक स्थान इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है। यह Map भूमि Survey करने वाले अमीन, C.O. और जिला में अवस्थित survey विभाग के पास होता है।

⇒ भूसम्पति मानचित्र का प्रयोग भूराजस्व पदाधिकारी कर वसूली में करते हैं। इसके अलावे इसका प्रयोग नगर नियोजन एवं भूमि उपयोग के नियोजन में किया जाता है।

⇒ भारत के गाँवों में 1:3960 या 16″ = 1 मील से 1:1980 (32″ = 1 मील) तक पैमाना पर भूसम्पत्ति मानचित्र बनाये जाते हैं।

(ii) स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Map)

⇒ जहाँ Cadastral Map में निजी भवन, ग्रामीण कुँआ, जलाशय इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है वहीं स्थलाकृतिक मानचित्र पर विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतिक लक्षण जैसे उच्चावच, प्रवाह प्रणाली, वन क्षेत्र, दलदली क्षेत्र इत्यादि को गाँव के साथ -2 दिखाया जाता है।

⇒ स्थलाकृतिक मानचित्र पर प्राकृतिक विशेषताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक भूदृश्य को भी प्रदर्शित करते हैं।

⇒  स्थलाकृतिक मानचित्र सामान्यत: 1: 2,50,000 (1″ = 4 मील) से 1: 62500 (1″ = 1 मील) तक की मापनी पर बनाया जाता है।

⇒ 1″ = 4 मील से छोटी मापनी पर बनने वाला स्थलाकृतिक मानचित्र को ही भौगोलिक मानचित्र कहते हैं।

⇒ भारत में स्थलाकृतिक मानचित्रों का निर्माण 1: 62500 को 1: 50000 की मापनी में बदलकर प्रदर्शित किया जाता है।

(2) छोटी मापनी का मानचित्र (Small Scale Map)

⇒ छोटी मापनी के मानचित्र पर बहुत बड़े भूभाग को मानचित्र के छोटे इकाई पर प्रदर्शित करते हैं। जैसे:- 1m = 10,000 km 

(i) दीवाल मानचित्र (Wall Map)

⇒ दीवाल मानचित्र एक ऐसा मानचित है जिसपर पूरे विश्व को, एक महाद्वीप को, एक देश को, एक राज्य को, एक जिला को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ Wall Map का प्रयोग मुख्यतः शिक्षण संस्थानों या कार्यालयों में किया जाता है।

⇒  Wall Map की मापनी Atlus Map के मापनी से बड़ी होती है। लेकिन स्थलाकृतिक मानचित्र के तुलना में छोटी होती हैं।

⇒  भारत में Wall Map 1: 15000000 1: 25,00000 के मापनी पर बनाया जाता है।

(ii) Atlas Map (एटलस मानचित्र)

Atlas Map एक Small Scale Map है। इन मानचित्रों में एक छोटे से कागज के पन्नों पर पूरे विश्व, महाद्वीप, देश, इत्यादि को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र 1:2,0000000 के मापनी पर बनाये जाते हैं। इस प्रकार के मानचित्र पर अलग -2 क्षेत्रों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं। इसलिए इसे “क्षेत्र वर्णी मानचित्र” भी कहते हैं।

भारत में सरकारी एटलस का प्रकाशन Survey of India, देहरादून द्वारा होता है

⇒ भारतीय सर्वेक्षण विभाग भारत के रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

⇒ भारत में सर्वप्रथम प्रो० S.P. चटर्जी ने “बंगाल इन Maps” एटलस प्रकाशित किया था।

⇒ भारत के महापंजीकार कार्यालय के अधीन कार्यरत जनगणना विभाग ने पूरे देश और सभी प्रान्तों का 32 खण्डों में विभक्त कर एक एटलस का प्रकाशन किया है।

NOTE ग्लोब⇒ यह पृथ्वी का वास्तविक प्रतिरूप होता है। इसका आकार गोल तथा 23 1/2° अक्ष पर झुका होता है।

⇒ उद्देश्य एवं विषय सामग्री के आधार पर मानचित्र के प्रकार। 

               इसके आधार पर मानचित्र को दो भागों में बाँटते है:

(A) प्राकृतिक मानचित्र 

(i) खगोलीय मानचित्र (Astronomical Map)

(ii) स्थलीय मानचित्र (Orographic Map) Relief Map

(iii) भूगर्भीक मानचित्र (Geological Map) – इसमें चट्टानों के संस्तर को प्रदर्शित करते हैं। चट्टानों के एक संस्तर को Bed कहते हैं।

मानचित्र के प्रकार

(iv) जलवायु मानचित्र (Climate Map) 

(v) वनस्पति मानचित्र (Vegitation Map) 

(vi) मृदा मानचित्र (Soil Map)

(B) सांस्कृतिक मानचित्र 

        यह भी कई प्रकार का होता है। जैसे- आर्थिक मानचित्र,  राजनीतिक मानचित्र, सैनिक मानचित्र, ऐतिहासिक मानचित्र, सामाजिक मानचित्र, वितरण मानचित्र 

वितरण मानचित्र  (Distribution Map)

⇒ भौगोलिक तत्वों को वितरण मानचित्र के माध्यम से प्रदर्शित करते हैं। यह मूलतः चार प्रकार का होता है।

(i) रंगारेखी मानचित्र (Chromatic Map) 

⇒ जब मानचित्र पर विभिन्न आकड़ों को विभिन्न रंगों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो उसे Chromatic Map (रंगारेखी मानचित्र) कहते हैं।

(ii) प्रतीक चिह्न

⇒ इसमें फसलों, खनिजों आदि के वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र में अक्षरों एवं वर्णों का प्रयोग कर जो मानचित्र प्रस्तुत किया जाता है। वैसे Map को क्रोसमैटिक मैप कहते हैं।

(iii) सम्मान रेखा मानचित्र (Isopleth)

⇒ ऐसा मानचित्र जिसपर भौगोलिक तत्वों को समताप रेखा (Isotherm), समवर्षा रेखा (Isohyte), समधूप रेखा (lsohel), समोच्च रेखा (Contour) के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

(iv) वर्णमात्री मानचित्र (Choropleth map) 

⇒ वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को आड़ी तिरछी लम्बवत रेखाओं के द्वारा प्रदर्शित करते हैं उसे Choropleth कहते हैं।

नोट:- Atlas में सबसे ज्यादा प्रयोग रंगारेखी मानचित्र (Chromatic Map) का किया जाता है।


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