4. बफर राज्य / Buffer State

4. बफर राज्य
(Buffer State)


बफर राज्य⇒बफर राज्य

                बफर राज्य वह सार्वभौमिक, भौगोलिक इकाई है जो सामान्यतः दो बड़े और शक्तिशाली राज्यों के बीच अवस्थित है। दूसरे शब्दों में बफर क्षेत्र/ राज्य दो शक्तिशाली राष्ट्रों के सीमाओं को अलग कर तनाव कम करते हैं। नेपाल इसका का एक अच्छा उदा० है। यह भारत और चीन नामक दो शक्तिशाली सीमाओं को अलग करता है।

विशेषता :-
(1) बफर राज्य का आकार काफी छोटा होता है।

(2) इसकी संरचना प्रायः रेखीय होती है।

(3) इसमें भौगोलिक प्रतिकूलताएँ मौजूद होते हैं।

(4) दो शक्तिशाली राष्ट्रों के सीमाओं को अलग कर प्रत्यक्ष संघर्ष की स्थिति को समाप्त करते हैं।

(5) विशिष्ट परिस्थितियों में दो राष्ट्रों के बीच मध्यस्थता का कार्य करते हैं।

(6) ऐसे राज्य दोनों शक्तिशाली राष्ट्रों से आर्थिक सहायता प्राप्त करता है।

(7) प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते इनकी अर्थव्यवस्था अस्थिर होती है।

(8) इसके पास अपना कोई रक्षा बजट नहीं होता है।

(9) यह अपने स्वभाव से ही कभी भी शक्तिशाली बनने का प्रयास नहीं करते हैं।

उत्पत्ति
             इसका विकास वैसे ही परिस्थितियों में होती है जहाँ पर निम्नलिखित भौगोलिक कारण सक्रिय रहते हैं:-

(1) अगर कोई राज्य सीमान्त क्षेत्र में विकसित हुआ हो। जैसे- 1947 ई० के पूर्व ब्रिटिश साम्राज्य और रूसी साम्राज्य के बीच अफगानिस्तान बफर राज्य का कार्य करता था।

(2) अगर दो बड़े राष्ट्रों और शक्तिशाली देशों के बीच में विशिष्ट प्रजाति, संस्कृति, भाषा के लोग अधिवासित होते हैं तो वहाँ भी बफर राज्य का विकास होता है।

(3 ) अगर दो राष्ट्रों के बीच सदियों से संगठित प्रजातीय समूह निवास कर रहा हो और धीरे-2 राष्ट्रीयता की भावना का विकास कर लिया हो तो वैसी परिस्थितियों में बफर राज्य का विकास होता है।

परिवर्तन

           द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसके महत्व में कमी आयी है क्योंकि-

(1) युद्ध के तौर तरीकों में जबरदस्त बदलाव आया है।

(2) संचार साधनों के विकसित होने के कारण तनाव की स्थिति में दोनों शक्तिशाली राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष हॉटलाइनों के माध्यम से बातचीत कर लेते हैं। फलत: बफर राज्य की सहायता नहीं ली जाती है।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के गठित हो जाने के बाद विवादों को सुलझाने में इनकी मदद नहीं ली जाती है।

         बफर राज्य के महत्व घटने के कारण कई नाकारात्मक परिणाम उभर कर सामने आये हैं। जैसे – रूस के द्वारा अफगानिस्तान पर आक्रमण किया गया, चीन ने तिब्बत को हड़प लिया, नेपाल और भारत के बीच में समय-समय पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई।

पर्तमान में प्रासंगिकता

               बफर राज्य की संकल्पना भले ही धुमिल पड़ रही हो लेकिन मौलिक महत्ता आज भी यथावत है। जैसे-

(1) आज भी ये दो शक्तिशाली राष्ट्रों के सीमाओं को अलग करते हैं

(2) असामयिक गोली-बारी एवं तनाव की स्थिति उत्पन्न होते नहीं देते हैं।

(3) दोनों राष्ट्रों के सेनाओं को पृथक रखते हैं।

निष्कर्ष : इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बफर राज्य की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

3. अंतर्राष्ट्रीय सीमा का वर्गीकरण

3. अंतर्राष्ट्रीय सीमा का वर्गीकरण

(Classification of International Border)


अंतर्राष्ट्रीय सीमा का वर्गीकरण⇒अंतर्राष्ट्रीय सीमापरिचय 

         सीमा दो राज्य या दो राष्ट्र या दो प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षेत्र को विभाजित करने वाली भू-राजनैतिक संकल्पना है। इसे रेखीय संकल्पना भी कहते हैं। सीमा प्रतिकूल एवं अनुकूल दोनों क्षेत्रों से गुजरती है। सीमा रेखा पर अभिसारी शक्तियाँ कार्य करती है। यहाँ जनसंख्या एवं संसाधन का अभाव होता है। सीमा दो राज्यों के बीच विभाजक का कार्य करती है।

          सीमा शांत और अशान्त दोनों प्रकार के हो सकती है। जैसे- भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा अशान्त सीमा का उदा० है। जबकि USA और कनाडा की सीमा शान्त सीमा का उदा० है।

अंतर्राष्ट्रीय सीमा का वर्गीकरण

             सीमा का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(1) उत्पत्ति के आधार पर या जनन विभाजन

(2) आकारिकी विभाजन                        

(1) उत्पत्ति के आधार या जनन विभाजन के आधार पर सीमा का कारिकी वर्गीकरण:–                 

             उत्पत्ति के आधार पर सीमा चार प्रकार के होते हैं- जैसे-

(i) पूर्ववर्ती सीमा ⇒ इसकी तुलना पूर्ववर्ती नदी से की जाती है। वैसी नदी को पूर्ववर्ती नदी कहते हैं जो स्थलाकृतिक उत्थान के पूर्व से ही मौजूद हो। इसी तरह से जिन राष्ट्रों के बीच सीमा पुरानी हो और सीमा के दोनों ओर अलग-2 संस्कृति का विकास हुआ हो। वैसी सीमा को पूर्ववर्ती सीमा कहते हैं। जैसे- USA और कनाडा के बीच स्थित सीमा रेखा।

(ii) परवर्ती सीमा ⇒ ऐसी सीमा की तुलना परवर्ती नदी से करते हैं अर्थात् भौगोलिक क्षेत्र के उत्थान के बाद ढाल के अनुरूप विकसित नदी को परवर्ती नदी कहते हैं। परवर्ती सीमा में इसी तरह से संस्कृति का विकास पहले होता और सीमा का विकास बाद में होता है। जैसे- भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित सीमा रेखा।

(iii) अवशिष्ट सीमा ⇒ इसकी तुलना अवशिष्ट पर्वत से की जा सकती है। वैसे पर्वत जो कभी विश्व के सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला थी जो बाद में अपरदन के कारण अवशिष्ट पर्वत के रूप में बदल चुकी है। इसी तरह अशिष्ट सीमा वह है जो कभी दो राष्ट्रों के बीच में सीमा का कार्य विभाजन का कार्य करती थी लेकिन अब अपनी पहचान खो चुकी है। जैसे- चीन और तिब्बत के बीच स्थित सीमा।

(iv) अध्यारोपित सीमा ⇒ वैसी सीमा रेखा जिसे सामरिक एवं राजनैतिक कारणों से एक ही सांस्कृतिक प्रदेश को विभाजित करने के लिए सीमा का निर्माण कर दिया जाय तो उसे अध्यारोपित सीमा कहते हैं। जैसे -पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी के बीच स्थित सीमा।

(2) आकारिकी (Morphology) के आधार पर सीमा का कारिकी वर्गीकरण:-                

          राजनीतिक विज्ञान में आकारिकी के आधार पर सीमा का विभाजन तिन आधार पर के किया गया है:-

(I) भू-आकृति के आधार/ भौगोलिक आधार पर

(II) ज्यामितीय आकार के आधार‌ पर

(III) मानवीय सिद्धांतों के आधार पर

(I) भू आकृति के आधार पर

NOTE :-

(a) 1° – महाद्वीप तथा महासागर

(b) 2° – पहाड़, पठार, मैदान

(c) 3° – अपरदन एवं निक्षेपण से निर्मित स्थलाकृति, जैसे – डेल्टा, गारा, ड्रमलिन

               भू-आकृति के आधार पर पृथ्वी के धरातल पर कई ऐसे भूआकृतियों का विकास हुआ है जो दो देशों के सीमा को विभाजित करती है। जैसे:-

(i) पर्वतीय सीमा⇒ दो राष्ट्रों के बीच में जब पर्वत अवस्थित होता है तो वैसी स्थिति में पर्वतीय चोटियाँ सीमा रेखा का कार्य करती हैं।

उदा० – द. अमेरिका में  चिली-अर्जेण्टीना के सीमा बीच एण्डीज पर्वत

भारत-चीन के बीच हिमालय पर्वत

(ii) नदी सीमा⇒ जब दो राष्ट्रों के बीच में नदी प्रवाहित होती है तो वैसी सीमा को नदी सीमा कहते हैं। नदी या जलशयों में सीमा निर्धारित करने का एक अन्तर्राष्ट्रीय समझौता है जिसके अनुसार जब दो देशों के बीच कोई नदी या जलीय स्थलाकृति हो तो उस नदी या जलाशय के मध्यवर्ती भाग से सीमा रेखा गुजरेगी।

(ii) दलदली सीमा⇒ कई राष्ट्रों के सीमावर्ती क्षेत्रों में दलदली क्षेत्र का विकास हुआ है। ये दलदली क्षेत्र ही दो राष्ट्रों के बीच में सीमा का कार्य करती हैं। जैसे- बेल्जियम-नीदरलैण्ड के बीच में , युक्रेन-वेलारूस के बीच में दलदली सीमा का विकास हुआ है।

(iii) वनीय सीमा⇒ कई देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में सघन वन का विकास हुआ है। इन वनीय क्षेत्रों के मध्यवर्ती भाग से सीमा रेखा गुजरती है। जैसे- फिनलैंड और रूस के बीच सीमा वनीय सीमा से लगती है।

(iv) मरुस्थलीय सीमा⇒ कई राष्ट्रों के सीमावर्ती क्षेत्रों में मरुस्थलीय स्लाथाकृति के विकास हुआ है। ऐसी स्थिति में मरुस्थलीय क्षेत्र के मध्यवर्ती भाग से सीमा का निर्धारण किया जाता है। जैसे मिश्र-लीबिया के बीच स्थित मरुस्थल से सीमा रेखा गुजरती है। भारत और पाकिस्तान के बीच थार मरुस्थल क्षेत्र से सीमा रेखा गुजरती है।

II. ज्यामितीय आकार पर आधारित सीमा

            सीमा के निर्धारण में अक्षांश, देशान्तर और संदर्भ बिन्दु को मानते हुए ज्यामितीय सीमा का निर्धारण किया जाता है।

(i) अक्षांशीय सीमा⇒ कनाडा और USA के बीच में 49° उत्तरी अक्षांश रेखा, उत्तरी कोरिया और दक्षिणी कोरिया के बीच में 38° उत्तरी अक्षांश रेखा सीमा का कार्य करती है। USA में राज्यों की सीमा अक्षांशों के आधार पर की गई है। ऐसी सीमा रेखाएँ प्राय: शान्त सीमाएँ होती है।

(ii) संदर्भ बिन्दु पर आधारित सीमा⇒  जब दो राष्ट्रों के सीमा पर इतनी प्रतिकूल परिस्थितियाँ होती हैं कि वहाँ पर सीमा का निर्धारण करना अत्यंत दुष्कर हो जाती है ऐसी स्थिति में ऊँची-2 पर्वत की चोटियों को संदर्भ बिन्दु मानते हुए सीमा का निर्धारण किया जाता है। जैसे- गैबेन और कैमरून बीच आधारित सीमा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। 

(III) मानवीय सिद्धांतों पर आधारित सीमा

           धर्म, भाषा, संस्कृति, प्रजातीय गुण को ध्यान में रखते हुए भी सीमाओं का निर्धारण कई देशों में किया गया है।

(i) धर्म आधारित सीमा⇒ 1947 ई० में भारत और पाकिस्तान के बीच में द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर सीमा का निर्धारण किया गया। जैसे:- मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिए गए और शेष भाग भारत में रह गए।

(ii) भाषा के आधार पर सीमा⇒ भाषाई विविधाएँ सीमा निर्धारक के प्रमुख कारण है। जैसे- यूरोपीय प्रायद्वीप में स्थित देशों के बीच भाषा के आधार पर सीमा का निर्धारण किया गया है।

(iii) संस्कृति के आधार पर सीमा⇒ जब दो राष्ट्र की संस्कृतियाँ अलग -2 होती हैं, तो वैसी स्थिति में भी उन दोनों के बीच में संस्कृति पर आधारित सीमा विकसित होती है। जैसे- भारत और चीन के बीच स्थित सीमा सांस्कृतिक सीमा का उदा० है।

(iv) प्रजाति पर आधारित सीमा⇒ जब दो देशों के बीच अलग-2 प्रजाति के लोग अधिवासित होते है तो वैसी परिस्थिति में विकसित होने वाली सीमा प्रजातीय सीमा कहलाती है। जैसे- (इराक और ईरान) के बीच स्थित सीमा।

निष्कर्ष

             इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि सीमा का निर्धारण हेतु कई आधार का प्रयोग किया जाता है।

2. सीमान्त एवं सीमाएँ में अंतर / Difference Between Frontiers and Boundaries

2. सीमान्त एवं सीमाएँ में अंतर

(Difference Between Frontiers and Boundaries)


सीमान्त एवं सीमाएँ में अंतर⇒सीमान्त एवं सीमाएँ

             सीमान्त और सीमाएँ दो राज्य या दो राष्ट्र या दो प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षेत्र को विभाजित करने वाली भू-राजनैतिक संकल्पना है। वे दोनों ही संकल्पनाओं में निम्नलिखित अन्तर स्थापित किया जा सकता है।

(1) सीमान्त एक ऐतिहासिक घटना है जबकि सीमा वर्तमान समय की राजनैतिक सच्चाई है। इन दोनों के बीच द्वितीय विश्वयुद्ध विभाजक रेखा का कार्य करता है।

(2) सीमान्त एक प्रादेशिक संकल्पना है जबकि सीमा एक रेखीय संकल्पना है। इसका तात्पर्य है कि सीमान्त क्षेत्र में विस्तृत भूमि पायी जाती थी। जबकि आज सीमाएँ एक रेखा में तब्दील हो चुकी है। अर्थात क्षेत्रफल या विस्तृत भूमि का अभाव होता है।

(3) सीमान्त प्राय: प्रतिकूल भौगोलिक क्षेत्र से गुजरता था। जैसे- भारत और चीन के बीच में हिमालय ऐसा ही सीमान्त क्षेत्र था। जबकि सीमा प्रतिकूल एवं अनुकूल दोनों क्षेत्रों से गुजरती है। जैसे- जब भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन हुआ तो भारत और पाकिस्तान के बीच में जिस सीमा का निर्धारण किया गया, वह गुजरात, राजस्थान इत्यादि में प्रतिकूल क्षेत्र लवणीय एवं मरुस्थलीय क्षेत्र से गुजरती है। जबकि पंजाब में निर्धारित की गयी सीमा अनुकूल क्षेत्र से गुजरती है।

(4) सीमान्त क्षेत्र में अपसारी शक्तियाँ कार्य करती है जबकि सीमा रेखा पर अभिसारी शक्तियाँ कार्य करती है। इसका तात्पर्य है कि सीमान्त क्षेत्र में कोई भी प्रशासनिक, राजनैतिक गतिविधियाँ संचालित नहीं की जाती थी। सेना का जमाव कीलों के ऊपर होता था न कि सीमान्त क्षेत्रों में होता था अर्थात् सीमान्त क्षेत्र राजनैतिक एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण से शून्य क्षेत्र था।

         अभिसारी सीमा का तात्पर्य दो अलग-2 राजनीतिक, प्रशासनिक, सैनिक अभिव्यक्ति का टकराव। आज कीलों (दुर्ग) की सुरक्षा महत्वपूर्ण नहीं रह गई है बल्कि सीमा की सुरक्षा महत्वपूर्ण रह गई है।

(5) सीमान्त क्षेत्र में पर्याप्त जनसंख्या और संसाधन होते हैं। लेकिन सीमा पर इसका अभाव होता है।

(6) सीमान्त की प्रकृति स्थायी होती थी। जबकि सीमा की प्रकृति अस्थाई होती है अर्थात् सीमा क्षेत्र में दो राष्ट्रों के द्वारा दावा एवं प्रतिदावा किये जाने के कारण कभी स्थिर नहीं रह पाती है।

(7) सीमान्त क्षेत्र प्रायः शान्ति का क्षेत्र होता था। लेकिन सीमा शान्त एवं अशान्त दोनों प्रकार के हो सकती है। जैसे- भारत, पाकिस्तान की सीमा, भारत-चीन की सीमा अशान्त सीमा के उदहारण है। जबकि USA और कनाडा की सीमा शान्त सीमा के उदा० है।

(8) सीमान्त क्षेत्र दो अलग-2 राज्यों को जोड़ने का कार्या करता था। जबकि सीमा क्षेत्र दो राज्यों के विभाजन के विभाजक का कार्य करती है।

(9) सीमान्त क्षेत्र की प्रकृति बर्हिमुखी हुआ करती थी जबकि सीमा की प्रकृति अन्तः मुखी हुआ करती है।

(10) सीमान्त क्षेत्र से कोई भावनात्मक संबंध राज्य की नहीं होता था। जबकि सीमा से राज्य का भावनात्मक लगाव होता है।

सीमान्त का सीमा में बदलना

               द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सभी सीमान्त रेखाएँ सीमा रेखा के रूप में बदल गयी क्योंकि –

(1) संचार साधनों एवं परिवहन साधने का विकास बहुत तेजी से हुआ जिसके आधार पर कोई भी राष्ट्र चप्पे-2 भूमि पर पहुँच सकता है और संचार साधनों के द्वारा उस पर नजर रख सकता है।

(2) तकनीकी विकास ने यह संभव बना दिया है कि प्रतिकूल क्षेत्र में सीमा का निर्धारण कर उसकी सुरक्षा की जाय।

(3) आधुनिक राज्यों में संसाधन के प्रति काफी जागरूकता आयी है। इसलिए प्रत्येक राज्य अपने संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है।

4) जिस तेजी से जनसंख्या बढ़ रही है उस दृष्टिकोण से भी कोई भी राष्ट्र अपने सीमा तक पूर्ण नियंत्रण चाहेगा।

(5) राज्य आधारित राष्ट्रीयता का विकास होने के कारण किसी भी राष्ट्र के लोग अपने सीमा क्षेत्र में स्थित सम्पूर्ण भूमि पर नियंत्रण चाहते हैं।

निष्कर्ष

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि सीमान्त एवं सीमाएँ दो अलग-2 संकल्पना है। लेकिन दोनों की मौलिक भावनाएँ एक ही है। सीमान्त जहाँ ऐतिहासिक अभिव्यक्ति थीं वहीं सीमा वर्तमान की अभिव्यक्ति है।

1. राजनीतिक भूगोल की प्रकृति, परिभाषा और कार्यक्षेत्र / Nature, Definition and Scope of Political Geography

1. राजनीतिक भूगोल की प्रकृति, परिभाषा और कार्यक्षेत्र  

(Nature, Definition and Scope of Political Geography)


राजनीतिक भूगोल की प्रकृति, परिभाषा और कार्यक्षेत्र⇒राजनीतिक भूगोल की प्रकृति

                    राजनीतिक भूगोल मानव भूगोल के अन्तर्गत एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यदि मानव भूगोल पार्थिव पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में मानव के बहुमुखी क्रियाकलापों का अध्ययन है, तो राजनीतिक भूगोल उन अनेक मानव क्रिया- कलापों में से राजनीतिक क्रियाकलापों की क्षेत्रीय व्याख्या है।

          राजनीतिक भूगोल के सम्बन्ध में प्राचीन काल से ही विद्वान अपने मत प्रकट करते आए हैं। प्रारम्भिक विचारकों के मत पूर्णरूपेण राजनीतिक भूगोल पर केन्द्रित न होकर सामूहिक विचार अभिव्यक्ति के रूप में थे। काण्ट ने 1756 में व्यक्त किया कि राजनीतिक भूगोल राजनीतिक इकाइयों के सम्बन्ध एवं उनकी प्राकृतिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करता है। इसके पश्चात् अनेक विद्वानों ने राजनीतिक भूगोल को परिभाषित किया। यहां नीचे कुछ विद्वानों की परिभाषाएं दी जा रही हैं।

एन. जे. जी. पोण्ड्स के अनुसार- “राजनीतिक भूगोल राजनीतिक दृष्टि से संगठित क्षेत्रों, उनके संसाधनों, विस्तार एवं उन कारणों से सम्बन्धित है जिनसे एक विशिष्ट भौगोलिक स्वरूप का विकास होता है।”

एच. एच. स्प्राउट के अनुसार- “राजनीतिक भूगोल राजनीतिशास्त्र के एक क्षेत्र के रूप में है, क्योंकि राजनीतिशास्त्र की स्थापना प्रादेशिक भूगोल की आधारशिला पर हुई है।”

कार्लसन के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल पृथ्वी एवं राज्य के अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन करता है, अतः यह राज्यों में भौगोलिक सम्बन्ध को व्यक्त करता है।”

डी. डिटलसी के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल का सार तत्व राजनीतिक क्षेत्र है तथा किसी क्षेत्र का राजनीतिक महत्व उसके जलवायु, भूआकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों से सुस्पष्ट रूप से सम्बन्धित है।”

रिचार्ड हार्टशोर्न के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल भिन्न- भिन्न स्थानों में विभिन्न राजनीतिक उपक्रमों को पृथ्वी तल पर व्याप्त विविध लक्षणों से सम्बन्धित कर अध्ययन करता है।”

गोलबेट के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल मानव भूगोल का वह भाग है जिसमें उन राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है, जिसका क्षेत्रीय सन्दर्भ हो, वैसे ही जैसे जीव विज्ञान जीवों का अध्ययन है।”

कोहेन के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल वह विषय है। जो राजनीतिक घटनाओं का भौगोलिक विवेचन प्रस्तुत करता है। अन्य शब्दों में राजनीतिक भूगोल का उद्देश्य राजनीतिक घटनाओं की स्थानानुसार भिन्नताओं को स्पष्ट करना है।”

अलेक्जेण्डर के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल धरातलीय लक्षणों के रूप में राजनीतिक प्रदेशों का अध्ययन है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मानव द्वारा विभिन्न प्रकार से क्षेत्र के संगठन का अध्ययन किया जाता है।

फाल्कनबर्ग तथा स्टोट्ज के अनुसार – “जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि राजनीतिक भूगोल राजनीतिक इकाइयों का भूगोल है तथा साथ ही यह राष्ट्रों के मध्य अन्तर्सम्बन्धों की भौगोलिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।”

रिचार्ड मूर के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल, राजनीतिक एवं भौगोलिक उपक्रमों के मध्य स्थानगत अथवा क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।”

ए. ई. मूडी के अनुसार – “राजनीतिक भूगोल का अध्ययन मुख्यतः वर्तमान दशाओं से सम्बन्धित होता है, किन्तु भूतकालीन घटनाओं को आज अवस्थित स्वरूप के परिवर्तन के रूप में ध्यान में रखा जाता है।”

जे. आर. बी. प्रेसकॉट के अनुसार- “राजनीतिक भूगोल राजनीतिक निर्णयों एवं क्रियाओं से उत्पन्न भौगोलिक परिणामो से सम्बन्धित है तथा उन सभी भौगोलिक तत्वों को इसमें यथोचित मान्यता प्रदान की जाती है जो राजनीतिक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।”

             उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राजनीतिक भूगोल की प्रकृति से सम्बन्धित स्पष्ट रूप से तीन दृष्टिकोणों का उल्लेख किया जा सकता है। ये सम्बन्ध के अध्ययन के रूप पारिस्थितिकी दृष्टिकोण, क्षेत्रीय एवं स्थानिक दृष्टिकोण तथा संगठनात्मक अथवा आचरणात्मक दृष्टिकोण हैं।

राजनीतिक भूगोल का कार्यक्षेत्र

            किसी भी विषय का अध्ययन का वर्णन उसकी विषय वस्तु अथवा कार्यक्षेत्र होता है अर्थात् अध्ययन हेतु क्या सम्मिलित किया जाए और क्या नहीं? किसी भी विज्ञान को सीमाबद्ध करना आवश्यक होता है। क्रमबद्ध विज्ञान की शाखा अथवा भूगोल की विभिन्न शाखाओं के अनुरूप राजनीतिक भूगोल मुख्यतः एक प्रासंगिक अध्ययन है। इसके अन्तर्गत अध्ययन प्रसंग राजनीतिक दृष्टि से संगठित क्षेत्र अथव राज्य है। राजनीतिक क्षेत्र वह क्षेत्र है जिसमें सर्वत्र एक अथव एक से अधिक स्वरूप की राजनीतिक घटनाएं पाई जाती हैं। राजनीतिक घटनाएं वे हैं, जो राजनीतिक लक्षणों से सम्बन्धित हैं तथा जिनका उद्भव राजनीतिक विचारों में निहित शक्तियों के कारण होता है।

           राजनीतिक भूगोल के अन्तर्गत राजनीतिक भूदृश्य प्रारूप का विश्लेषण तथा विवरण प्रस्तुत किया जाता है, जो सम्पूर्ण सांस्कृतिक भूदृश्यावली का अंश है अथवा इसमें राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु धरातलीय क्षेत्र के संगठित प्रयोग का अध्ययन किया जाता है। यदि सम्पूर्ण मानव निर्मित भूदृश्यावली का वर्गीकरण विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति तथा उपयोग के आधार पर किया जाए तो राजनीतिक भूदृश्यावली के अन्तर्गत दृश्यमान तत्व सम्भवतः अल्पतम् तथा आर्थिक भूदृश्यावली के तत्व अधिकतम होंगे।

संक्षेप में राजनीतिक भूगोल का अध्ययन क्षेत्र निम्नांकित है:-

(1) राजनीतिक भूगोल के अन्तर्गत राजनीतिक राज्य का सम्पूर्ण अध्ययन किया जाता है।

(2) राज्य में स्थित प्राकृतिक संसाधन जो राज्य की जनसंख्या को प्रश्रय देता है तथा अन्य कार्यों को पूर्ण करता है।

(3) राज्य में निवास करने वाली जनसंख्या का सामाजिक एवं प्रजातीय स्वरूप राज्य की आन्तरिक प्रशासन व्यवस्था को प्रभावित करता है। अतः राजनीतिक भूगोल के अन्तर्गत जनसंख्या, भाषा, जाति, धर्म, आदि का अध्ययन किया जाता है।

(4) राज्य आन्तरिक साधनों के साथ-साथ अन्य राज्यों से प्राप्त संसाधनों पर भी आधारित रहता है। अतः इन्हें प्राप्त करने के लिए विभिन्न समझौतों को करना पड़ता है। ये समझौते विभिन्न कारणों से किए जाते हैं। अतः राजनीतिक भूगोल में इन समझौतों का भी अध्ययन किया जाता है।

(5) राजनीतिक निर्णयों में भौगोलिक उपक्रम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः इनका भी अध्ययन किया जाता है।

(6) राजनीतिक भूगोल में निर्वाचन से सम्बन्धित तथ्यों का भी अध्ययन किया जाता है।

(7) राजनीतिक भूगोल उन क्षेत्रों का भी अध्ययन करता है जो राजनीतिक दृष्टि से संगठित नहीं हैं, फिर भी किसी भी प्रकार से राजनीतिक घटना से सम्बन्धित होते हैं तथा भविष्य के सम्भावित राजनीतिक क्षेत्र हो सकते हैं।

15. जेट स्ट्रीम / Jet Sream

15.  जेट स्ट्रीम / Jet Sream


जेट स्ट्रीम

       ऊपरी वायुमण्डल में अर्थात क्षोभमंडल के ऊपर तथा समताप मंडल के नीचे क्षैतिज एवं तीव्र गति से चलने वाले वायु को जेट स्ट्रीम कहते हैं। यह हवा प्रायः 9-18 km की ऊँचाई के बीच चलती है। इस जेटस्ट्रीम की खोज द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों ने किया था। कालान्तर में स्वीडिश वैज्ञानिक रॉक्सबी (स्वेडेन) ने इसका व्यापक अध्ययन किया। इसलिए उनके नाम पर इसे रॉक्सबी तरंग भी कहते हैं।

        जेट स्ट्रीम हमारे वायुमण्डल का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इसे मौसम वैज्ञानिकों ने “मौसम का नियंत्रणकर्ता” बताया है। यह मानसून की उत्पत्ति तथा भारत में आने वाला बाढ़ एवं सुखाड़ का भी वैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

         प्रारंभ में जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति के विषय में मतभेद थे। कुछ वैज्ञानिकों ने इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेडली शेल के माध्यम से किया है।

जेट स्ट्रीम

त्रि- कोशकीय मॉडल

         वर्तमान समय में सेटेलाइट के अध्ययन से भी स्पष्ट हो चुका है कि इसकी उत्पत्ति की व्याख्या हेडली सेल के माध्यम से किया जा सकता है। अर्थात यह कहा जाता है कि जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति का मूल कारण निम्न वायुमण्डल की तापीय विशेषता है। वस्तुतः जब निम्न वायुमण्डल के वायु जब ऊपरी वायुमण्डल में पहुँचते हैं तो ठण्डी एवं भारी होकर क्षैतिज अवस्था में चलने लगते हैं। इसी क्षैतिज वायु को जेट स्ट्रीम कहते हैं। जेट स्ट्रीम कहने का मुख्य कारण इसमें जेट जैसी आवाज उत्पन्न होती है। वस्तुतः मौसम वैज्ञानिकों ने चार प्रकार के जेटस्ट्रीय बताया है:-

(1) ध्रुवीय रात्री जेट वायु

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट वायु

(3) उपोष्ण जेट वायु

(4) उष्ण पूर्वी जेट वायु

(1) ध्रुवीय जेट वायु-

         ध्रुवीय रात्री जेट वायु 60° अक्षांश के आगे दोनों गोलार्द्धों में चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इसे आर्कटिक जेट हवा एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में अण्टार्कटिक जेट हवा कहते हैं। यह पश्चिम से पूरब दिशा की ओर चलती है। यह जेट हवा पूरे विश्व में ध्रुवीय क्षेत्र में चलती है। इसकी उत्पत्ति का आधार उपध्रुवीय निम्न वायुदाब से कोरिऑलिस प्रभाव के कारण ऊपर उठती हुई हवा है।

       कुछ ऊँचाई के बाद तापीय ह्रास के कारण पुनः यह वायु ऊपर नहीं जा पाती और क्षैतिज रूप ग्रहण कर लेती है। इसकी क्षैतिज दिशा मुख्यतः ध्रुवीय ऊपरी भाग में होती है। क्योंकि ध्रुवों के ठीक ऊपर निम्न वायुदाब बना होता है। जाड़े के दिनों में ध्रुवीय प्रदेश में रात की अवधि काफी लम्बी (छ: महीने) होती है। रात में यह वायु अति तीव्र गति से प्रवाहित होती है। इसलिए इसे ध्रुवीय रात्रि जेट हवा कहते हैं।

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा-

       45°-65° अक्षांश के बीच केवल उत्तरी गोलार्द्ध में चलने वाली जेट हवा है। इसकी दिशा भी पश्चिम-पूरब की ओर होती है। यह भी उपरोक्त अक्षांश के बीच पूरे भूमण्डल पर चलती है। ध्रुवीय सीमाग्र जेट वायु की उत्पत्ति निम्न वायुमण्डल के उस क्षेत्र में होती है जहाँ ध्रुवीय एवं पछुआ हवा मिलकर सीमाग्र का निर्माण करते हैं।

         सीमाग्र निर्माण में ध्रुवीय वायु में बैठने की प्रवृत्ति होती है जबकि पछुवा वायु तुलनात्मक दृष्टि से गर्म होने के कारण ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है। ऐसी स्थिति में 9-18 Km. की ऊँचाई के बीच वायुप्रवणता का विकास होता है और इस प्रवणता के अनुसार जब गर्म प्रदेश की वायु ठण्डे प्रदेश की ओर चलने लगती है तो उसे “ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा” कहा जाता है।

(3) उपोष्ण जेट हवा-

       उपोष्ण जेट हवा 20°-35° अक्षांश के बीच मुख्यतः उतरी गोलार्द्ध में चलती है। यह पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह भी एक विश्वस्तरीय हवा है। इसकी उत्पत्ति का कारण विषुवतीय प्रदेश की वह गर्म वायु है जो सूर्य के तापीय प्रभाव कारण वायु गर्म होकर ऊपरी वायुमण्डल तक पहुँचता है, ऊपरी वायुमण्डल में जब तापीय कमी आती है तो यह क्षैतिज रूप से उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने लगती है।

       लेकिन, धीरे-2 कोरिआलिस प्रभाव में वृद्धि होने के कारण पश्चिम से पूरब दिशा की ओर चलने लगती है। ऊपरी वायुमण्डल की यही हवा 30°-35° अक्षांश में बैठकर धरातल पर HP का निर्माण करती है।

(4) उष्ण पूर्वी जेट वायु-

         यह एक स्थानीय जेट हवा है जो 8°- 35° अक्षांश के बीच सिर्फ उतरी गोलार्द्ध में चलती है। यह जेट हवा दक्षिण एशिया, द०-पूर्वी एशिया, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, उ०पूर्वी अफ्रीका के ऊपर ग्रीष्म ऋतु में चलती है। यह जेट हवा स्थलाकृतिक विषमताओं के कारण उत्पन्न होती है। जैसे:- मार्च महीने से ही तिब्बत का पठार तीव्र गति से गर्म होने लगता है और उसके सम्पर्क में आने वाला वालु गर्म होकर ऊपर उठने लगती है।

        ऊपरी वायुमंडल में यही हवा तापीय ह्रास के कारण ठण्डी एवं भारी होने लगती है और पुन: क्षैतिज रूप से उत्तर एवं दक्षिण दिशा में चलने लगती है। लेकिन दक्षिण की ओर आने वाली क्षैतिज हवा फेरल के नियमानुसार प्रारंभ में उ०-पू० से द०-प० की ओर चलने लगती है और बाद में धीरे-धीरे पूर्णत: पूरब से प० दिशा में प्रवाहित होने लगती है, इसीलिए इसे ही उष्ण पूर्वी जेट हवा कहते हैं।

निष्कर्ष:-

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रथम तीन जेट, वायु विश्वस्तरीय जेट हवा है जबकि अंतिम स्थानीय जेट हवा का उदाहरण है। कोटेश्वरम महोदय ने बताया कि अंतिम दो जेट वायु का संबंध मानसून की उत्पत्ति से है। उष्ण पूर्वी जेट हवा के कारण दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति होती है जबकि उपोष्ण जेट हवा के कारण लौटती हुई मानसून की उत्पत्ति होती है। मौसम वैज्ञानिकों का यह मानना है कि, जेट स्ट्रीम का अभी पूर्ण अध्ययन किया जाना शेष है। इसके अध्ययन से जलवायु विज्ञान की कई जटिल समस्याएँ समाधान होने की संभावना है।


Read More:-
error: