6. भूगोल में मापनी (Scale)

भूगोल में मापनी एवं मापनी के प्रकार

भूगोल में मापनी एवं मापनी के प्रकार 

⇒ मापनी (Scale) के द्वारा मानचित्र पर के दूरी और धरातल पर के दूरी के बीच सह-संबंध स्थापित किया जाता है।

⇒ मापनी में धरातलीय दूरी को कम करके प्रदर्शित किया जाता है, अर्थात् मानचित्र पर वास्तविक धरातल पर के सापेक्षिक दूरी और वास्तविक दूरी के अनुपात को मापनी कहते हैं। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे- अगर धरती पर के वास्तविक दूरी 5km को 1Cm के रूप में दिखलायी जाती है तो मापनी का मान 1Cm = 5Km होगा।

     मापक को विभिन्न विद्वानों ने परिभाषित करने का प्रयास किया है। प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ यहाँ दी जा रही हैं-

स्ट्रेलर के अनुसार, “मापक धरातल की वास्तविक दूरी तथा मानचित्र पर प्रदर्शित दूरी के पारस्परिक अनुपात को कहते हैं”।

(Scale is the ratio between map distance and the actual ground distance that the map represents.)

मोंकाहाउस एवं विलकिन्सन के अनुसार, “मापक मानचित्र पर प्रदर्शित की गई किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी तथा धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी के पारस्परिक सम्बन्ध को प्रकट करता है, चाहे वे कथन द्वारा जैसे 1″ = 1 मील या प्रदर्शक भिन्न द्वारा जैसे प्र भि. 1/63360, प्रकट किया गया है।”

(Scale denotes the relationship which the distance between any two points on the map bears to the corresponding distance on the ground, expressed either in words as one inch to one mile or as a representative fraction R.F. 1/63360.)

कनेटकर एवं कुलकर्णी के अनुसार, “किसी मानचित्र या ड्राइंग का मापक, मानचित्र या ड्राइंग की प्रत्येक दूरी तथा उससे सम्बन्धित धरातल की दूरी के निश्चित अनुपात को कहते हैं।” 

(The scale of a map or drawing is the fixed proportion in which every distance on the map or drawing bears to the corresponding distance on the ground.)

आर० एल० सिंह के अनुसार, “धरातल की वास्तविक दूरी तथा उसकी मानचित्र पर प्रदर्शित दूरी के सम्बन्ध को मापक कहते हैं।”

मापक का महत्व (Importance of Scale)-

⇒ मापक के माध्यम से छोटे क्षेत्रों को बड़े आकार में तथा बड़े क्षेत्रों को छोटे आकार में मानचित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।

⇒ मापक द्वारा किसी भी मानचित्र में दो स्थानों (बिन्दुओं) के मध्य धरातल की वास्तविक दूरी ज्ञात  की जा सकती है। 

⇒ मापक के माध्यम से एक मानचित्रकार अपने उद्देश्य के अनुसार किसी भी क्षेत्र का छोटा या बड़ा मानचित्र तैयार कर सकता है।

    इस प्रकार मापक मानचित्र का प्राण माना जाता है। इसके बिना मापक का कोई महत्व नहीं होता है। बिना मापक के बनाए गए मानचित्र को रेखा मानचित्र (Sketch Map) कहा जाता है। इसको सहायता से भी धरातल के प्रत्येक भाग का प्रदर्शन कागज पर किया जा सकता है। मानचित्र के उपयुक्त मापक चुनते समय (i) कागज तथा (ii) मानचित्र की रचना करने का उद्देश्य आदि पर विशेष निर्भर रहना पड़ता है।

भूगोल में मापनी

Or 1Cm = 5x1000m x 100Cm 

Or 1Cm = 500000Cm 

RF = 1 : 500000

भूगोल में मापनी के प्रकार

(A) आकार के आधार पर मापनी दो प्रकार का होता है:-

(i) लघु मापनी (Small Scale) 

(ii) दीर्घ मापनी (Large Scale)

(i) लघु मापनी (Small Scale) 

⇒ लघु मापनी में वास्तविक दूरी को मील या किमी० के रूप में और मानचित्र के दूरी को इंच या सेमी० के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

जैसे – 1″ = 50 मील

1 Cm = 50 km

⇒ लघु मापनी पर धरातल के वास्तविक दूरी को मानचित्र पर छोटे से इकाई के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार के मापनी का प्रयोग एटलस और दीवार मानचित्र में किया जाता हैं।

(ii) दीर्घ मापनी (Large Scale)

⇒ दीर्घ मापनी में धरातल के छोटे-2 दूरियों को बड़े इकाई में प्रदर्शित किया जाता है। जैसे – 1Cm = 500cm।

⇒ दीर्घ मापनी का प्रयोग भूसम्पत्ति मानचित्र (Cadastral Map), स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map), सैनिकों के द्वारा प्रयोग किये जाने वाले मानचित्र इत्यादि में किया जाता है।

नोट : भूसम्पति मानचित्र (Cadastral Map) की मापनी सबसे बड़ी होती है। इसके पश्चात क्रमश: स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographic Map), दीवारी मानचित्र (Wall Map, एटलस मानचित्र (Atlas Map)) का स्थान आता है। (CTWA)

मानचित्र मापनी प्रदर्शित करने की विधि:

         मानचित्र पर मापनी को तीन प्रकार से प्रदर्शित किया जाता है-

(1) कथनात्मक विधि (Statement Method)

⇒ कथनात्मक विधि के द्वारा मापनी को शब्दों के रूप में लिखा जाता है। जैसे 1Cm = 1Km

⇒कथनात्मक विधि का प्रयोग प्राय: भूसम्पत्ति मानचित्र, भवन प्लान वाले मानचित्र में किया जाता है।

(2) आलेखी विधि / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)

          एक सीधी रेखा को कई समान भागों में विभाजित कर उस पर वास्तविक दूरी को अंकों के रूप में प्रदर्शित कर दिया जाता है।

इस मापनी के दो भाग होते हैं-

(i) Primary Division वाले भाग

(ii) Secondery Division वाले भाग

            इस मापनी के द्वारा मानचित्र पर km, m और Cm के रूप में एक साथ दूरियों को ज्ञात कर सकते है।

मापनी

(3) प्रतिनिधि भिन्न विधि (Representative Fraction Or R.F. Method)

⇒ प्रतिनिधि भिन्न विधि के द्वारा मानचित्र के दूरी को और वास्तविक दूरी को एक रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ भिन्न में अंश और हर होता है, Numenator (अंश) और  Denominator (हर) के रूप में प्रदर्शित जाता किया जाता है।

⇒ अंश मानचित्र पर के इकाई दूरी को व्यक्त करता और हर पृथ्वी पर के वास्तविक दूरी को व्यक्त करता है।

⇒ मानचित्र एवं धरात‌ल पर मापी गई दूरियों के अनुपात को  प्रतिनिधि भिन्न (R.F.) कहते है।

⇒ R. F. को हमेशा अनुपात के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ मानचित्र पर के दूरी को हमेशा ईकाई (1) रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ R.F. विधि का सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी देश में भाषा ज्ञान के बिना प्रयुक्त कर सकते हैं।

⇒ R.F. विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि जब मानचित्र को बड़ा या छोटा किया जाता है, तो अनुपात में दोष उत्पन्न हो जाता है।

नोट :

 1 Cm = 10 mm 

100 Cm = 1 m 

1000 m = 1 km

8/5 Km = 1 मील 

1″ = 2.54 Cm

TMC = Trilian cubic meter

R.F = Map Distance/ Ground Distance 

1 Km = 1,00000 cm (1000 m x 100 Cm) 

1 मील =  63,360″ (1760 गज x 3 फीट x 12 इन्च)

1 मील = 1760 गज (5280 फीट)

1 गज = 3फीट (36″ = 12″ × 3 फीट)

1 फीट = 12″

1 मील = 8 फर्लांग

भूगोल में मापक के अनुप्रयोग

(Applications of Scale in Geography)

1. मानचित्रण (Cartography):-

    मापक का सबसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोग मानचित्र निर्माण में होता है। इसके माध्यम से पृथ्वी की वास्तविक दूरी एवं क्षेत्रफल को निश्चित अनुपात में छोटा करके कागज पर प्रदर्शित किया जाता है। उपयुक्त मापक के चयन से मानचित्र अधिक सटीक, स्पष्ट एवं विश्वसनीय बनता है तथा विभिन्न प्रकार के विषयगत (Thematic) मानचित्र तैयार किए जा सकते हैं।

2. स्थलाकृतिक सर्वेक्षण (Topographical Survey):-

    स्थलाकृतिक मानचित्रों के निर्माण में मापक का विशेष महत्व है। इसके माध्यम से पर्वत, पठार, घाटी, नदी, ढाल, ऊँचाई तथा अन्य भू-आकृतियों का सही एवं विस्तृत निरूपण किया जाता है। सर्वेक्षण कार्यों में मापक के प्रयोग से धरातलीय विशेषताओं का सटीक मापन एवं विश्लेषण संभव होता है।

3. क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning):-

     क्षेत्रीय नियोजन में मापक का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों के संसाधनों, जनसंख्या, परिवहन, भूमि उपयोग तथा विकास की योजनाएँ तैयार करने में किया जाता है। उपयुक्त मापक वाले मानचित्र क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन करने तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास की योजना बनाने में सहायक होते हैं।

4. नगर नियोजन (Urban Planning):-

     नगर नियोजन में बड़े मापक (Large Scale) वाले मानचित्रों का उपयोग किया जाता है। इनके माध्यम से सड़कों, भवनों, आवासीय क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों, पार्कों, जलापूर्ति, सीवरेज तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की योजनाएँ वैज्ञानिक ढंग से तैयार की जाती हैं। इससे नगरों का सुव्यवस्थित एवं सतत विकास संभव होता है।

5. कृषि नियोजन (Agricultural Planning):-

     कृषि भूगोल में मापक का उपयोग भूमि उपयोग, मृदा वितरण, सिंचाई नेटवर्क, फसल क्षेत्र, कृषि उत्पादन तथा कृषि विकास योजनाओं के निर्माण में किया जाता है। बड़े मापक वाले मानचित्र किसानों एवं योजनाकारों को खेतों की वास्तविक स्थिति एवं संसाधनों का सही आकलन करने में सहायता प्रदान करते हैं।

6. परिवहन योजना (Transport Planning):-

     रेलमार्ग, सड़क मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, हवाई अड्डे तथा जलमार्गों की योजना एवं निर्माण में मापक अत्यंत उपयोगी होता है। इसके माध्यम से मार्गों की वास्तविक दूरी, दिशा तथा संपर्क का सही निर्धारण किया जाता है, जिससे परिवहन प्रणाली अधिक प्रभावी एवं सुगम बनती है।

7. रक्षा एवं सैन्य उपयोग (Defence and Military Applications):-

    सैन्य कार्यों में बड़े एवं मध्यम मापक वाले मानचित्रों का व्यापक उपयोग किया जाता है। सीमाओं की निगरानी, सैन्य ठिकानों की स्थापना, सैनिकों की आवाजाही, युद्ध रणनीति तथा सुरक्षा योजनाओं के निर्माण में मापक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सटीक मापक राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।

8. पर्यावरण अध्ययन (Environmental Studies):-

    वन क्षेत्र, नदी बेसिन, जलग्रहण क्षेत्र, जैव विविधता, भूमि क्षरण, प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन में मापक का व्यापक उपयोग किया जाता है। इससे पर्यावरणीय परिवर्तनों का विश्लेषण, संसाधनों का संरक्षण तथा सतत विकास की योजनाएँ तैयार करने में सहायता मिलती है।

9. GIS एवं Remote Sensing:-

   आधुनिक भूगोल में भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं सुदूर संवेदन (Remote Sensing) के अंतर्गत मापक का अत्यधिक महत्व है। डिजिटल मानचित्रों का निर्माण, स्थानिक (Spatial) विश्लेषण, उपग्रह चित्रों की व्याख्या तथा विभिन्न भौगोलिक सूचनाओं के एकीकरण में उपयुक्त मापक का प्रयोग किया जाता है, जिससे अधिक सटीक एवं विश्वसनीय परिणाम प्राप्त होते हैं।

10. आपदा प्रबंधन (Disaster Management):-

    बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात, सूखा तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम क्षेत्रों की पहचान एवं प्रबंधन में मापक का महत्वपूर्ण योगदान है। विभिन्न मापकों वाले मानचित्रों की सहायता से संवेदनशील क्षेत्रों का विश्लेषण, राहत एवं बचाव कार्यों की योजना तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) की रणनीतियाँ तैयार की जाती हैं।



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 5. भौगोलिक सूचना तंत्र क्या है

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भौगोलिक सूचना तंत्र⇒

                भौगोलिक सूचना तंत्र भौगोलिक आँकड़ों एवं सूचनाओं के संग्रहण, विश्लेषण और मानचित्रण का एक कम्प्यूटर आधारित तकनीक है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सूचना तकनीक (IT) कहते हैं।

भौगोलिक सूचना तंत्र

⇒ भूगोलवेत्ता मार्बल ने इसे परिभाषित करते हुए कहा “GIS क्षेत्रीय सूचना संग्रहण, विश्लेषण एवं प्रदर्शन का एक तंत्र है।” 

⇒ क्लार्क महोदय ने कहा है कि “भौगोलिक सूचना तंत्र विभिन्न सूचनाओं के एकत्रीकरण, संग्रहण, विश्लेषण और प्रदर्शन का कम्प्यूटर आधारित तंत्र है।”

⇒ गुडचाइल्ड के अनुसार “GIS विभिन्न क्षेत्रीय सूचनाओं का भौगोलिक तथ्यों से संबंधित समस्याओं का समाधान करने वाला एक उन्नत तकनीक है।”

⇒ GIS भूगोल, भूविज्ञान, मानचित्रकला, सुदूर संवेदन तकनीक, वायु फोटोग्राफी, सर्वेक्षण, सांख्यिकी और कम्प्यूटर विज्ञान से संबंधित एक समेकित तकनीक है।

भौगोलिक सूचना तंत्र का उद्देश्य

(1) विभिन्न प्रकार के भौगोलिक आकड़ों का संग्रहण, विश्लेषण और प्रदर्शन किया जाता है।

(2) सूचनाओं को विश्लेषित कर उसे आसान बनाता है।

(3) आकड़ों  के विश्लेषण के आधार पर नियोजन तथा निर्णय की प्रक्रिया को अधिक तार्किक और वैज्ञानिक बनाता है।

(4) कम्प्यूटर आधारित समन्वित तकनीक की उपलब्धता से समय और धन की बचत करता है।

भौगोलिक सूचना तंत्र के प्रयोग के क्षेत्र

(1) यह सम्पति मानचित्र, परिवहन मानचित्र बनाने में उपयोगी है।

(2) यह कृषि, उद्योग, नगर स्थानीकरण में मदद करता है।

(3) विभिन्न दुर्घटनाओं का मानचित्रण कर सकते है।

(4) जनसंख्या का मानचित्रण एवं विश्लेषण कर सकते है।

(5) भूमि उपयोग के नियोजन एवं प्रबंधन में मदद करता है।

(6) पर्यावरण के विश्लेषण में मदद करता है।

(7) धरातल के स्वरूप का विश्लेषण करता है।

(8) GIS कम्प्यूटर रूपीय यंत्र के माध्यम से संचालित होता है। इसे डडले स्टाम्प ने भौगोलिक सूचना तंत्र का सुनहला बछड़ा (Golden Caw) कहा है।

           जब कई कम्प्यूटर आपस में तार या किसी अन्य युक्ति से जुड़ जाते है तो उसे Network या Internet (इंटरनेट) कहते हैं।

मोटे तौर पर कम्प्यूटर के सभी सामाग्री को दो भागों में बाँटते है:-

(1) हार्डवेयर

(2) सॉफ्टवेयर

(1) हार्डवेयर

प्रमुख हार्डवेयर उपकरण:-

(i) डिक्स ड्राइव

(ii) डिजिटर

(iii) प्लॉटर

(iv) स्कैनर,

(v) भ्यूजुअल डिस्प्ले यूनिट

(vi) की बोर्ड

(vii) माउस

(viii) वेब कैमरा

(ix) CPU

(x) मोडेम

(1) पेन ड्राइव

(2) सॉफ्टवेर

         भौगोलिक रेखाचित्रण एवं मानचित्रण के लिए कई सॉफ्टवेयर बाजार में उपलब्ध है। जैसे-

(i) SYMVV

(ii) RGRIG

(iii) SYMAP

(iv) LOTUS

(v) HG

(vi) BASIC

(vii) ILWLS

(viii) ANCVIEW

(ix) OSIRIS

नोट: CPU = सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट

ALU = अर्थमेटिक लोजिक यूनिट

TALLY = यह एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसका प्रयोग वाणिज्य के क्षेत्र में किया जाता है।

फोरटन और C++ = ये दोनों ऐसे Software है जिसका प्रयोग व्यापार एवं वाणिज्य में किया जाता है।

पास्कल= वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन हेतु प्रयुक्त होता है।

फोटोसॉफ्ट= इसमें चित्र बनाने का कार्य होता है।


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4. प्रमुख भौगोलिक यंत्र

4. प्रमुख भौगोलिक यंत्र



प्रमुख भौगोलिक यंत्र⇒

                      भूगोल में प्रमुख भौगोलिक यंत्र से जो कि भिभिन्न प्रतियोगिताओं में बार-बार पूछे जाते है वे निम्नलिखित है- 

(1) प्लैनीमीटर⇒ मानचित्र पर क्षेत्रफल मापने वाला यंत्र

प्रमुख भौगोलिक यंत्र

(2) पेन्टोग्राफ/ इंडीगोग्राफ/ इपिस्कोप / पेंटोग्राफिक कैमरा⇒ मानचित्रों का विवर्धन एवं लघुकरण करने वाला यंत्र

(3) क्लाइनोमीटर⇒ भूतल पर कोण एवं  ढाल मापने का यंत्र

(4) पैरेलैक्स⇒ फोटोग्राफ के आधार पर ऊँचाई नापता है।

(5) ओपिसोमीटर⇒  मानचित्रों पर दूरियों के मापन हेतु प्रयुक्त यंत्र

(6)  रेनगेज⇒ वर्षा मापने वाला यंत्र

(7) हाईग्रोमीटर⇒ वायु में उपस्थित आर्द्रता मापने वाला यंत्र

(8) इग्रोग्राफ⇒ मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शास्यकाल आदि एक साथ दर्शाएँ जाने वाले ग्राफ

(9) रिक्टर स्केल⇒ भूकंप के झटके मापने में रिक्टर स्केल का प्रयोग होता है।

(10) नेफ्रोस्कोप⇒ बादलों की दिशा और गति मापने वाला यंत्र

(11) सिस्मोग्रफ⇒ भूकंप की तीव्रता मापने वाला यंत्र

(12) मोह पैमाना (Moh’s Scale)⇒ चट्टानों की कठोरता मापने वाला यंत्र

(13) हाईग्रोग्राफ⇒ वायु में आपेक्षिक आर्द्रता मापने वाला यंत्र

(14) पायरोमीटर⇒ उच्च तापमान मापने वाला यंत्र

(15) साइनोमीटर⇒ आकाश के नीलापन का मापने वाला यंत्र

(16) एक्टिनेमीटर⇒ विकिरण की तीव्रता मापने वाला यंत्र

(17) एनिमोमीटर⇒ पवन की गति मापने वाला यंत्र

(18) ओक्टास⇒ मेघाच्छादन की मात्रा मापने वाला यंत्र

(19) करेंटमीटर⇒ जलप्रवाह मापने वाला यंत्र

(20) इवैपोरीमीटर / एटमोमीटर⇒ जलवाष्प मापने वाला यंत्र अर्थात एक वैज्ञानिक उपकरण है जो एक निश्चित समय में किसी नम सतह से वायुमंडल में होने वाले जल के वाष्पीकरण (Evaporation) या वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) की दर को मापता है। 

(21) स्पीडोमीटर/ओडोग्राफ/ ओडोमीटर⇒ वाहन की गति मापने वाला यंत्र

(22) बैरोमीटर⇒ वायुदाब मापने का यंत्र

(23) फैदोमीटर⇒ समुद्र की गहराई मापने वाला यंत्र



1. ओपीसोमीटर का प्रयोग किया जाता है-

(a) क्षेत्रफल मापन में

(b) दूरी मापन में

(c) दिशा मापन में

(d) प्रवणता मापन में

2. सापेक्षिक आर्द्रता के मापन हेतु किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है?

(a) हाइड्रोमीटर

(b) बैरोमीटर

(c) हाइग्रोमीटर

(d) मैनोमीटर

3. उच्च तापमान के मापन हेतु किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है?

(a) साइनोमीटर

(b) पायरोमीटर

(c) एक्टिनोमीटर

(d) लाइसीमीटर

4. आकाश के नीलापन का मापन किस भौगोलिक यंत्र द्वारा किया जाता है?

(a) साइनोमीटर

(b) क्लाइनोमीटर

(c) एक्टिनोमीटर

(d) पायरोमीटर

5. विकिरण की तीव्रता के मापन हेतु किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है?

(a) क्रोनोमीटर

(b) एक्टिनोमीटर

(c) वेनट्यूरीमीटर

(d) क्लाइनोमीटर

6. पवन की गति निम्नलिखित में से किस यंत्र से मापी जाती है?

(a) बैरोमीटर

(b) एनीमोमीटर

(c) विण्डवेन

(d) रोटामीटर

7. भूकम्पीय तरंगों का मापन निम्नलिखित में से किस यंत्र द्वारा किया जाता है?

(a) बैरोग्राफ

(b) सीस्मोग्राफ

(c) क्लाइमोग्राफ

(d) इर्गोग्राफ

8. ओक्टास मापनी का प्रयोग किसके मापन के लिए किया जाता है?

(a) वायुमण्डलीय आर्द्रता

(b) मेघाच्छादन की मात्रा

(c) ओस जमाव का स्तर

(d) सौर प्रकाश की मात्रा

9. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) इवैपोरीमीटर- जलवाष्प मापन

(b) करेण्टमीटर- जलप्रवाह मापन

(c) एटमोमीटर- दो स्थानों के मध्य दूरी का मापन

(d) रोटामीटर- जलीय आर्द्रता मापन

10. मानचित्रों के विवर्धन एवं लघुकरण के लिए निम्न में से किस यंत्र का प्रयोग किया जाता है?

(a) पैण्टोग्राफ

(b) इपीस्कोप

(c) पैण्टोग्राफिक कैमरा

(d) इनमें से सभी

11. कैलोरीमीटर से क्या मापा जाता है?

(a) तापमान

(b) ऊष्मा की मात्रा

(c) अवशोषण

(d) रंग

12. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) मानचित्र पर दो स्थानों के मध्य की दूरी- ऑपिसोमीटर

(b) मानचित्र पर क्षेत्रफल (Area)- प्लैनीमीटर

(c) ज्वालामुखी लावा का तापमान- पायरोमीटर

(d) सौर्य विकिरण की मात्रा- क्रोनोमीटर

13. मोह पैमाना (Moh’s Scale) से निम्न में से किसका मापन किया जाता है?

(a) मृदा स्तरों की मोटाई

(b) मृदा जल की मात्रा

(c) चट्टानों की कठोरता

(d) मृदा में अम्लीयता की मात्रा

14. नेफोमीटर (Nephometer) से निम्नलिखित में से किसका मापन किया जाता है?

(a) वर्षा की मात्रा

(b) बादलों की दिशा व गति

(c) सागरीय लवणता की मात्रा

(d) इनमें से सभी

15. ब्यूफोर्ट स्केल पर निम्न में से क्या दर्शाया जाता है?

(a) भूकम्पीय तरंगों की गति

(b) पवन की गति

(c) बहते हुए जल की गति

(d) इनमें से सभी

16. ‘टी’ मापक (T-Scale) पर निम्न में से किसका मापन किया जाता है?

(a) भूकम्पीय तरंगें

(b) चक्रवातों की शक्ति

(c) पवनों की गति

(d) ज्वालामुखी उद्‌गार से निःसत

17. लाइसोमीटर से निम्न में से किसका मापन किया जाता है?

(a) वायुमण्डलीय आर्द्रता

(b) मेघों की दिशा तथा गति

(c) सौर विकिरण की मात्रा

(d) मृदा से होकर नीचे जाने वाली अन्तःस्रावी जल की मात्रा

18. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) बाथीमीटर- समुद्री गहराईयाँ

(b) एस्ट्रोलैब- ग्रहों एवं तारों की ऊँचाईयाँ

(c) एक्टिनोमीटर- पदार्थों की शीतलता

(d) पायरोमीटर- दूरस्थ वस्तुओं का उच्च तापमान

19. इर्मोग्राफ (Ergograph) पर निम्न में से किसका सम्बन्ध प्रदर्शित किया जाता है?

(a) जलवायविक दशाएँ एवं फसलों का वर्धन काल

(b) आर्द्र बल्ब तापमान एवं आर्द्रता

(c) तापमान एवं वार्षिक वर्षा

(d) सापेक्ष आर्द्रता एवं तापमान

20. सापेक्षिक आर्द्रता को निम्नलिखित में से किस ग्राफ पर दिखाया जाता है?

(a) बैरोग्राफ

(b) हीदरग्राफ

(c) क्लाइमोग्राफ

(d) हिप्सोमेट्रिक ग्राफ

21. मानचित्र पर दूरियों को मापने के लिए निम्न में से किस यन्त्र का प्रयोग किया जाता है?

(a) पौनीमीटर

(b) रोटामीटर

(c) ऑपिसोमीटर

(d) रेल्यूरोमीटर

22. हाइग्रोमीटर के उपयोग की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या करता है-

(a) जल की शुद्धता मापने हेतु

(b) वायुमण्डलीय दाब मापने हेतु

(c) तरल पदार्थों की गति

(d) वायु में आर्द्रता मापने हेतु

23. मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शस्यकाल आदि एक साथ दर्शाए जा सकते हैं-

(a) हीदरग्राफ पर

(b) क्लोइमोग्राफ पर

(c) इर्गोग्राफ पर

(d) बैण्डग्राफ पर

24. रिक्टर स्केल का प्रयोग किसके मापने में किया जाता है?

(a) समुद्र की दिशा

(b) इनमें से कोई नहीं

(c) समुद्र की गहराई

(d) भूकम्प के झटके

25. रिक्टर स्केल निम्नलिखित की तीव्रता मापता है-

(a) भूकम्प

(b) समुद्री गहराई

(c) वायु

(d) शरीर ऊष्मा

26. रिक्टर पैमाने पर निम्नलिखित में से किसको मापा जाता है?

(a) रॉकेट के उड़ने के 5 मिनट पश्चात् उसकी गति

(b) तड़ित झंझा की प्रबलता

(c) भूकम्प की तीव्रता

(d) लॉन टेनिस में खिलाड़ी द्वारा मारे गये गेंद की गति

27. बादलों की दिशा एवं गति को मापने वाला यंत्र कहलाता है-

(a) एनीमोमीटर

(b) रेनगेज

(c) नेफोस्कोप

(d) हाइग्रोमीटर

28. वायु में आपेक्षिक आर्द्रता मापन हेतु प्रयुक्त उपकरण है-

(a) हाइग्रोग्राफ

(b) हाइड्रोग्राफ

(c) पैन्टोग्राफ

(d) बैरोग्राफ

29. सीस्मोग्राफ क्या रिकार्ड करता है?

(a) हृदय की धड़कन

(b) वायुमण्डल का दबाब

(c) भूकम्प की तीव्रता

(d) इनमें से कोई नहीं



नोट:  प्रमुख भौगोलिक यंत्र को और विस्तार से जाने



(1) प्लैनीमीटर (Planimeter)

✍️ यह मानचित्र पर किसी अनियमित क्षेत्र का क्षेत्रफल मापने का यंत्र है।

✍️ कृषि भूमि, वन क्षेत्र, झील आदि का क्षेत्रफल ज्ञात करने में प्रयोग होता है।

✍️ यह मानचित्रीय मापन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण है।



(2) पेन्टोग्राफ / इंडीगोग्राफ / इपिस्कोप / पेंटोग्राफिक कैमरा

✍️ इनका उपयोग मानचित्रों के विवर्धन (Enlargement) एवं लघुकरण (Reduction) के लिए किया जाता है।

✍️ पेन्टोग्राफ एक यांत्रिक यंत्र है, जबकि इपिस्कोप व कैमरा प्रकाशीय विधि पर आधारित हैं।

✍️ सर्वेक्षण एवं मानचित्रण में अत्यधिक उपयोगी।



(3) क्लाइनोमीटर (Clinometer)

✍️ इसका प्रयोग ढाल (Slope) और कोण (Angle) मापने में किया जाता है।

✍️ पहाड़ी क्षेत्रों, सड़कों, नहरों की ढाल मापने में उपयोगी।

✍️ भौतिक भूगोल में अत्यंत महत्वपूर्ण यंत्र।



(4) पैरेलैक्स (Parallax)

✍️ फोटोग्राफ या वायुचित्रों के आधार पर ऊँचाई (Height) मापने की विधि।

✍️ यह कोई यंत्र नहीं बल्कि फोटोग्रामेट्री की तकनीक है।

✍️ पर्वत, भवन, वृक्ष आदि की ऊँचाई ज्ञात करने में प्रयोग।



(5) ओपिसोमीटर (Opisometer)

✍️ मानचित्र पर घुमावदार रेखाओं (नदी, सड़क, रेलवे लाइन) की दूरी मापने का यंत्र।

✍️ इसे कर्व मीटर भी कहते हैं।



(6) रेनगेज (Rain Gauge)

✍️ यह वर्षा की मात्रा मापने का यंत्र है।

✍️ वर्षा को मिलीमीटर या सेंटीमीटर में मापा जाता है।

✍️ मौसम विज्ञान में प्रमुख उपकरण।



(7) हाईग्रोमीटर (Hygrometer)

✍️ वायु में उपस्थित आर्द्रता (Humidity) मापने का यंत्र।

✍️ यह आर्द्रता की मात्रा बताता है, पर रिकॉर्ड नहीं करता।



(8) इग्रोग्राफ (Agrograph)

✍️ यह एक संयुक्त ग्राफ है जो एक साथ मौसमी दशाएँ, शुद्ध क्षेत्रफल, शस्यकाल (Crop Season)
दर्शाता है।

✍️ कृषि भूगोल में प्रयोग होता है।



(9) रिक्टर स्केल (Richter Scale)

✍️ भूकंप के झटकों की तीव्रता (Magnitude) मापने की मापनी।

✍️ यह लॉगरिदमिक स्केल है।

✍️ प्रत्येक अंक 10 गुना अधिक तीव्रता दर्शाता है।



(10) नेफ्रोस्कोप (Nephroscope)

✍️ बादलों की दिशा और गति मापने का यंत्र।

✍️ मौसम पूर्वानुमान में सहायक।



(11) सिस्मोग्राफ (Seismograph)

✍️ भूकंप की तरंगों को रिकॉर्ड करने वाला यंत्र।

✍️ यह भूकंपीय तरंगों का ग्राफ बनाता है।

✍️ सिस्मोलॉजी का प्रमुख उपकरण।



(12) मोह पैमाना (Moh’s Scale)

✍️ चट्टानों एवं खनिजों की कठोरता (Hardness) मापने की मापनी।

✍️ इसमें 1 से 10 तक के खनिज होते हैं।

✍️ उदाहरण: टैल्क (1), हीरा (10)



(13) हाईग्रोग्राफ (Hygrograph)

✍️ यह वायु की आपेक्षिक आर्द्रता को लगातार रिकॉर्ड करने वाला यंत्र।

✍️ हाईग्रोमीटर से अधिक उन्नत।



(14) पायरोमीटर (Pyrometer)

✍️ अत्यधिक उच्च तापमान मापने का यंत्र।

✍️ भट्टियों, ज्वालामुखी, उद्योगों में उपयोग।



(15) साइनोमीटर (Cyanometer)

✍️ आकाश के नीलापन (Blue Colour of Sky) को मापने का यंत्र।

✍️ वायुमंडलीय अध्ययन में प्रयोग।



(16) एक्टिनेमीटर (Actinometer)

✍️ सूर्य से प्राप्त विकिरण की तीव्रता मापने का यंत्र।

✍️ जलवायु अध्ययन में सहायक।



(17) एनिमोमीटर (Anemometer)

✍️ पवन की गति मापने का यंत्र।

✍️ मौसम विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण।



(18) ओक्टास (Oktas)

✍️ आकाश में मेघाच्छादन की मात्रा मापने की इकाई।

✍️ 0 से 8 के पैमाने पर मापा जाता है।



(19) करेंटमीटर (Current Meter)

✍️ नदी या जलधारा के जलप्रवाह की गति मापने का यंत्र।

✍️ जल संसाधन अध्ययन में उपयोग।



(20) इवैपोरीमीटर (Evaporimeter)

✍️ वाष्पीकरण (Evaporation) की मात्रा मापने का यंत्र।

✍️ कृषि एवं जलवायु अध्ययन में उपयोगी।



(21) स्पीडोमीटर / ओडोग्राफ / ओडोमीटर

✍️ वाहन की गति और चली हुई दूरी मापने वाले यंत्र।

✍️ परिवहन में सहायक।



(22) बैरोमीटर (Barometer)

✍️ वायुदाब (Atmospheric Pressure) मापने का यंत्र।

✍️ मौसम परिवर्तन की भविष्यवाणी में अत्यंत महत्वपूर्ण।



(23) फैदोमीटर (Fathometer)

✍️ समुद्र की गहराई मापने का यंत्र।

✍️ नौपरिवहन एवं समुद्र विज्ञान में उपयोग।

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल (World: Cultural Region/Realm)

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

(World: Cultural Region/Realm)



विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल⇒

प्रश्न प्रारूप 

Q.1. विश्व के वृहत सांस्कृतिक परिमंडल

Q.2. संसार के सांस्कृतिक प्रदेश

Q.3. सांस्कृतिक प्रदेश से आप क्या समझतें है? विश्व को सांस्कृतिक प्रदेशों में वर्गीकृत करने वाले आधार को स्पष्ट करें तथा सर्वमान्य वर्गीकरण की योजना प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक के विशेषता लिखें।

(नोट : संस्कृति– रीति-रीवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, रहन-सहन, संगीत कला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, रंगमंच के समुच्च को संस्कृति कहते हैं।)

विश्व के सांस्कृतिक प्रद

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

            मानव भूगोल में संस्कृति का अध्ययन एक अनिवार्य घटक है क्योंकि संस्कृति की उत्पत्ति, विकास और निर्धारण में पर्यावरण की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-2 पर्यावरण में अलग-2 संस्कृतियों का विकास हुआ है। संस्कृति के आधार पर भौगोलिक प्रदेशों का निर्धारण करना सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। ब्लाश महोदय ने कहा कि “सांस्कृतिक प्रदेश वह भौगोलिक क्षेत्र है जिसकी सांस्कृतिक दृश्यावली आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होती है।

           संस्कृति मानव की जीवनशैली को कहते हैं। मानव के जीवनशैली में रीति-रिवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, संगीतकला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, नृत्यकला, इत्यादि को शामिल करते हैं। मानव के जीवन शैली में शामिल उपरोक्त तत्वों के समुच्च को संस्कृति कहते हैं। अलग-2 भौतिक पर्यावरण में अलग-2 प्रकार के सांस्कृतिक प्रदेश का विकास हुआ है। इन्हीं विविधताओं को ध्यान में रखकर कई इतिहासकार, मानवशास्त्री एवं भूगोलवेता विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है।

        भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक प्रदेश का वर्गीकरण ब्रोक एवं बेल महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम “A Geography of Mankind” है। इस पुस्तक में ब्रोक ने 8 संस्कृति के तत्वों को आधार मानकर सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है। जैसे- (1) धर्म (2) भाषा (3) लोककार्य (4) प्रजातीय संरचना (5) आर्थिक क्रिया (6) खान-पान (7) लोक संगीत और (8) सामाजिक विश्वास एवं मान्यताएँ।

          ब्रोक के अनुसार सभी चरों/घटकों के आधार पर स्वतंत्र रूप से अनेक सांस्कृतिक प्रदेश विकसित किये जा सकते हैं। लेकिन, सभी को मिलाकर के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण किया जा सकता है। ब्रोक महोदय ने संश्लिष्ट विधि (सभी को मिलाकर) का प्रयोग करते हुए विश्व को चार प्रमुख और दो लघु सांस्कृतिक प्रदेश में वर्गीकृत किया है:-

विश्व के वृहत / प्रमुख सांस्कृतिक प्रदेश

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

(3) इंडिक सांस्कृतिक प्रदेश

(4) पूर्वी एशियाई या बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश

विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश

(i) मिजो अफ्रिकन एवं जनजातीय सांस्कृतिक पदेश

(ii) दक्षिण-पूर्वी एशियाई संक्रमण सांस्कृतिक प्रदेश

             इन सांस्कृतिक प्रदेश के नामाकरण से स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक प्रदेश के निर्धारण में धर्म की भूमिका सर्वाधिक है। धर्म के आधार पर ही ईसाई प्रधान और इस्लामिक प्रधान संस्कृति का नामाकरण किया गया है। जबकि अन्य सांस्कृतिक प्रदेश का नामकरण स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है।

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों की विशेषता

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

             ईसाई प्रधान संस्कृति का विकास विश्व के वृहत भौगोलिक क्षेत्रों में हुआ है। ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का विकास उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और साइबेरियाई क्षेत्रों में हुआ है। इन सभी क्षेत्रों में ईसाई धर्म का बोलवाला है। लेकिन इनमें भी कई आन्तरिक विविधताएँ पायी जाती हैं। इन विविधताओं को आधार मानते हुए पुन: इसे 7 उप सांस्कृतिक प्रदेश में बाँटते हैं।

जैसे:-

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश 

(iii) दक्षिणी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

(vi) अस्ट्रेलिया-न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश 

(vii) अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

         पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग निवास करते हैं जो प्रत्येक धार्मिक मान्यता को वैज्ञानिक तर्क और महत्त्व के दृष्टिकोण से देखते हैं। ये लोग अंधविश्वासी नहीं होते हैं। यूरोप में पुनर्जागरण का श्रेय इन्हीं को जाता है। विश्व में पहली बार औद्योगिक क्रांति का जन्म इसी प्रदेश में हुआ। जीवन शैली पर नगरीकरण एवं वाणिज्यिककरण का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। इनके प्रभाव के कारण ही सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों क पतन हुआ है। परिवार एवं विवाह जैसी संस्थाएँ कमजोड़ हुई है। व्यक्तिवाद का विकास अधिक हुआ है। मानव के जीवन पर धर्म का प्रभाव कम और आर्थिक कार्यों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। अपने साहस एवं तर्क के आधार पर विश्व के कई क्षेत्रों में स्थानान्तरित होकर बड़े-2 उपनिवेशों की स्थापना किया है। 

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

          पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में वर्तमान CIS (Common-wealth of Indipendent state) में शामिल प्रदेशों को रखा जाता है। इस सांस्कृतिक प्रदेश को समय के आधार पर तीन भागों में बाँटते हैं-

(a) अक्टूबर क्रांति के पूर्व का सांस्कृतिक भूदृश्य- उस वक्त यहाँ कैथोलिक धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव था। अधिकतर बस्तियाँ चर्च के इर्द-गिर्द बसी थी। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था था। भूमिपतियों के द्वारा कृषकों का शोषण किया जाता था।

(b) अक्टूबर क्रांति के बाद पूर्वी यूरोप की सांस्कृतिक भूदृश्य- अक्टूबर क्रांति के बाद इस क्षेत्र में गत्यात्मक परिवर्तन देखा गया। अक्टूबर क्रांति के पूर्व सोवियत संघ का उदय हुआ जिसके कारण इन क्षेत्र में साम्यवादी दर्शन का विकास हुआ जिसमें धर्म को ‘विष’ से तुलना किया गया। आर्थिक एकीकरण को बढ़ाना दिया गया। 65 वर्षों तक साम्यवाद का दर्शन यहाँ कायम रहा।

(c) ग्लास्नोस्ट पेरिस्तोत्रिक के बाद का पूर्वी यूरोप- इन दोनों संकल्पना के जन्मदाता गोर्बाचेव है जिसका तात्पर्य खुलापन एवं उदारीकरण है। इसके कारण वहाँ से साम्यवादी दर्शन का प्रभाव समाप्त हो गया। चुले एवं उदार अर्थव्यवस्था के आगमन से नवीन सांस्कृतिक भूदृश्य का विकास हो रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में यह सांस्कृतिक प्रदेश पश्चमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश का हिस्सा बन जायेगा ।

(iii) दक्षिण यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

        यहाँ के जीवन शैली पर कैथोलिक धर्म और बेटिकन सिटी का प्रभाव अधिक रहा है। इटली, स्पेन, पुर्तगाल, यूनान इसके प्रतिनिधि राष्ट्र है। यहाँ लैटिन भाषा बोली जाती है। अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का योगदान अधिक है। यहाँ कभी अंधविश्वास का इतना अधिक बोलवाला था कि चर्चों से स्वर्ग के टिकट दिये जाते थे। इस प्रदेश के लोगों ने दक्षिण अमेरिका में जाकर अपने उपनिवेश का स्थापना किया। 

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

       आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश की तुलना पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से की जा सकती है, क्योंकि यहाँ के लोग भी प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग है। यहाँ काकेसाइड प्रजाति के लोग बसे हैं। भाषा एवं संस्कृति के अन्य घटक पश्चिम यूरोप से आंग्ल अमेरिका में आयात किये गये हैं। लेकिन आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से इस माइने में भिन्न है कि पश्चिम यूरोप में उद्योग एवं खनन जैसे आर्थिक गतिविधियों का वर्चस्व है जबकि आंग्ल अमेरिका में उद्योग, खनन एवं कृषि कार्यों का महत्त्व अधिक है।

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

            ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश में यह विकासशील सांस्कृतिक प्रदेश का उदाहरण है। यहाँ नीग्रोइड प्रजाति के लोग निवास करते हैं। गरीबी एवं पिछड़ेपन की समस्या अधिक है। यहाँ कैथोलिक धर्म और लैटिन का आयात दक्षिण यूरोप से किया गया है। पुर्तगाल, स्पेन के लोग सोना ही खोज में अपने क्रोस (#) लेकर पहुँच गये। समाज में आज भी जनाजातिय संस्कृति का बोलबाला है।

(vi) आस्ट्रेलियाई – न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश

         इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास अब यूरोपीय लोगों के द्वारा किया गया है जो औपनिवेशिक देशों के आजाद होने के बाद बेघर हो गये थे। यहाँ प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग रहते हैं। यहाँ की भाषा अंग्रेजी और प्रजाति काकेसाइड है। आर्थिक दृष्टिकोण से पश्चिम यूरोप और आंग्ल अमेरिका के सदृश्य है। ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि एवं उद्योग पर आधारित है। जबकि न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था वाणिज्यिक पशुपालन पर आधारित है। 

(vii) अफ्रीकी सांस्कृतिक प्रदेश

           अफ्रीका महाद्वीप में ईसाई संस्कृति यो क्षेत्रों में देखी जाती है- (a) दक्षिण अफ्रीका के केप प्रान्त और (b) पूर्वी अफ्रीका के उच्च भूमि पर। इन दोनों क्षेत्रों में पश्चिमी यूरोप के काकेसाइड प्रजाति के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग आकर बसे हैं। केपप्रान्त के लोगों ने कृषि उद्योग और व्यापार का विकास किया है जबकि पूर्वी अफ्रीका में बगानी कृषि एवं खनन कार्यों के आधार पर निर्माण किया है सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण किया है।

        अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ईसाई संस्कृति का व्यापक क्षेत्र में विकास हुआ है। कई लघु सांस्कृतिक प्रदेश मिलकर एक एकीकृत ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का निर्माण करते हैं।

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

         इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का विकास मरुस्थलीय एवं अर्द्ध मरुस्थलीय क्षेत्रों में हुआ है। इसका विस्तार दक्षिण में सहारा मरुस्थल, उत्तर में मध्य एशिया, पूर्व में ब्लूचिस्तान से लेकर पश्चिम में तुर्की तक हुआ है। इसी प्रदेश में मक्का एवं मदीना अवस्थित है जहाँ इस्लाम धर्म का उदय हुआ। इस संस्कृति पर पर्यावरण का प्रभाव अध्याधिक पड़ा है। पर्यावरण के ही कारण यहाँ भूगोल, गणित, खगोल विज्ञान, मानचित्रकला इत्यादि का विकास हुआ है। जल की कमी के कारण जल का मितव्ययी उपयोग, खाद्य पदार्थो की कमी के कारण खान-पान में माँस का प्रयोग एवं लम्बे समय तक उपवास रखने की परंपरा प्रारंभ हुई है। मक्का की ओर मुँह करके नवाज पढ़ते हैं। धूल से बचने हेतु बुर्का और साफा का प्रयोग करते हैं। परम्परागत रूप से यह घुमक्कड़ जनजातियों का क्षेत्र है। वनस्पति का अभाव होता है। बाहर का जीवन अल्याधिक कठोर एवं प्रतिस्पर्द्धा से युक्त होते है। इसलिए महिलाओं को चार दीवारी में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक प्रदेश के धर्म शिया और सुन्नी में विभक्त हैं। सुन्नी परम्परावादी होते हैं जबकि शिया आधुनिक एवं तर्क में विश्वास करते हैं। इनके जीवन शैली पर कुरान का प्रभाव अधिक देखा जाता है। हाल के वर्षो में इन क्षेत्रों में पेट्रोलियम खनिज मिलने के कारण श्रमिक, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। पेट्रो-डॉलर जैजी संकल्पना का विकास हुआ है। OPEC जैसे संगठन तेल के मूल्यों पर नियंत्रण स्थापित कर विश्व के सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

(3) इण्डिक सांस्कृतिक प्रदेश

        इण्डिक सांस्कृतिक प्रदेश का विकास मुख्यत दक्षिण एशिया में हुआ है। यहाँ हिन्दू धर्मावलम्बी है के अलावे अनेक धर्म के लोग निवास करते हैं। विश्व में सर्वाधिकक हिन्दू, मुसलमान, सिख और जैन समुदाय के लोग यहाँ रहते हैं। यह अभूतपूर्व सहिष्णुता का प्रदेश है। यहाँ धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, इसलिए इस प्रदेश को धान प्रधान संस्कृति (Paddy Cultures) कहते हैं। यहाँ की सम्पूर्ण जीवनशैली मानासून के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए इसे मानसूनी सांस्कृतिक प्रदेश भी कहते हैं। यहाँ ग्रामीण जीवनशैली, बैलगाड़ी, परम्परागत हल, धान की कृषि, मानसूनी जलवायु इत्यादि मिलकर इंण्डिक संस्कृति को जन्म देते हैं। इस प्रदेश में कई क्षेत्रीय भाषाएँ जैसे, बंगाली, तमिल, तेलगू, कन्नड इत्यादि बोली जाती है। यहाँ कई प्रकार के लिखित प्रजातियों का विकास हुआ है। इसलिए इस प्रदेश को “मेल्टिंग पॉट ऑफ रेस” (Melting Pot of Race) का क्षेत्र भी कहते हैं। यहाँ के लोग धोती, कुर्ता, गमछा, साड़ी, लहंगा आदि जैसे वस्त्र धारण करते हैं। लोक संस्कृति में प्राकृतिक तत्व की प्रचुरता अधिक मिलती हैं।

        इस तरह इ‌ण्डिक संस्कृति पूरे विश्व में अलग पहचान रखती है।

(4) बौद्ध या पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश⇒

      इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास जापान, चीन, ताइवान, मंगोलिया वियतनाम जैसे देशों में हुआ है। इस प्रदेश को पुनः दो भागों में बाँटते हैं:- (i) चीनी सांस्कृतिक प्रदेश (ii) जापानी सांस्कृतिक प्रदेश

          चीनी सांस्कृतिक प्रदेश में साम्यवाद प्रभाव से धार्मिक प्रभाव कम हुआ है, लेकिन सर्वत्र सांस्कृतिक एकरूपता में वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में खुलेपन एवं उदारीकरण के कारण चीन में भी श्रम, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। इससे जबड़दस्त औद्योगिकीकरण, नगरीकरण इत्यादि को बढ़ावा मिला है। 

      बौद्ध संस्कृति में जापान का सांस्कृतिक प्रदेश औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाणिज्यिकरण और प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। जापान एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास प्राकृतिक संसाधन नगण्य है फिर भी विश्व का विकसित राष्ट्र है। यहाँ की लोक संस्कृति मे राष्ट्रीयता का प्रभाव अधिक देखा जाता है।

अप्रत्यक्ष रूप से चीनी और जापानी सांस्कृतिक प्रदेश पर मानसूनी संस्कृति या इण्डिक इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का प्रभाव देखा जा सकता है क्योंकि यहाँ भारत से ही बौद्ध धर्म आयात होकर आया है और द्वितीय इण्डिक संस्कृति के सामन ही मानसूनी जलवायु का प्रभाव है।

        विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश 

(i) दक्षिणी-पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश

      इस संस्कृति का विकास इण्डोनेशिया, वियतनाम, थाइलैण्ड, म्यांमार, लाओसा, कंबोडिया जैसे देशों में हुआ है। यह प्रदेश प्रजातीय दृष्टिषेण से बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश नहीं हैं जबकि संस्कृति है दृष्टिकोण से इण्डिक संस्कृति से नजदीक है।

(ii) मिजो अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

        इस संस्कृति का विकास मध्य अफ्रीका एवं विश्व के अनेक जनजातीय प्रदेशों में हुआ है। यहाँ के लोग प्रकृतिवादी, टोटेमवादी, अंधविश्वासी ज्यादा होते हैं। प्राथमिक-आर्थिक क्रिया कलाप में दक्ष होते हैं। प्राय: घुमक्कड जीवन शैली को जीते हैं। गरीबी, बेरोजगारी जैसे समस्याओं का बोलावाला है। 

निष्कर्ष: इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश विशिष्ट भौगोलिक पर्यावरण के कारण ही अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।


15. फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान

15. फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान



फ्रांसीसी भूगोलवेताओं का भूगोल में योगदान⇒

प्रश्न प्रारूप
Q. भूगोल की विभिन्न शाखाओं के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के योगदान की समीक्षा कीजिए।

              20वीं शताब्दी के फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने भूगोल की सभी शाखाओं को विकसित करने का प्रयास किया लेकिन मानव भूगोल एवं प्रादेशिक भूगोल पर विशेष जोर दिया था। फ्रांस में मूलत: उच्च कोटि के मानव भूगोलवेता बड़ी संख्या में सामने उभरकर आये। फेब्रे, ब्लाश, लीप्ले, जीन ब्रून्श, डिमांजिया, डि मार्टोनी, चोर्ले जैसे भूगोलवेताओं का नाम उल्लेखनीय है। इसके अलावे गालो, ब्लेन्चार्ड, सीगफ्रायड जैसे भूगोलवेताओं ने राजनीतिक भूगोल के विकास में योगदान दिया।

फ्रांसीसी भूगोलवेताओं

               जर्मनी की तुलना में यहाँ भूगोल का विकास देरी से हुआ। जर्मनी में जहाँ नियतिवाद का समर्थन करने वाले भूगोलवेता अधिक उभरे वहीं फ्रांस में संभववाद का समर्थन करने वाले भूगोलवेता उभरकर सामने आये। इसके पीछे कई कारण थे।
(1) फ्रांस में संभववाद का समर्थन करने वाले जो भी भूगोलवेता उभरकर सामने आये उन सभी का शैक्षणिक पृष्ठभूमि इतिहास से संबंधित थी।
(2) फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने यह प्रत्यक्ष रूप से अपने आँखों से देखा कि किस तरह मानव ने बड़े-2 महानगरों, ट्रांस साइबेरियन रेलवे और बड़े-2 उद्योगों की स्थापना कर प्रकृति पर विजय प्राप्त किया है।

          उपरोक्त दो कारकों का प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के चिन्तन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। फ्रांस में विकसित भूगोल को पुष्ट करने का प्रयास कई भूगोलवेताओं द्वारा किया गया है। जैसे-
(1) एलिसी रेकलस ⇒ इन्होंने 1875 ई० से 1894 ई० के बीच ‘विश्व का नवीन भूगोल’ नामक पुस्तक की रचना की। यह पुस्तक रिटर के द्वारा लिखित ‘अर्डकुण्डे’ के समकक्ष माना जाता है। रेकलस के इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद ‘पृथ्वी एवं उनके निवासी’ (Earth and its Inhavitent) के रूप में किया गया है।

(2) फेब्रे⇒ फेब्रे को भूगोल में संभववाद का जन्मदाता माना जाता है क्योंकि इन्होंने ही सबसे पहले ‘संभववाद’ शब्द का प्रयोग किया था।

(3) बिडाल डि-ला-ब्लाश (1845-1918 ई०)⇒  फ्रांस में आधुनिक भूगोल का विकास करने का श्रेय ब्लाश को जाता है। फ्रांस में रहते हुए इन्होंने भूगोल पर चिन्तन का कार्य किया। इसका परिणाम यह हुआ कि फ्रांस में उनके कई शिष्य उभरकर सामने आये। एक समय आलम यह था कि फ्रांस का शायद ही कोई ऐसा विद्यालय या विश्वविद्यालय हो जहाँ पर उनका शिष्य शिक्षक के रूप में कार्यरत नहीं हो।

             ब्लाश को मानव भूगोल का संस्थापक माना जाता है। वे नियतिवाद के घोर विरोधी और संभववाद के समर्थक थे। ब्लाश ने कहा कि भूगोल में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों दृश्यों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने भूगोल के कुल 6 लक्षणों / विशेषताएँ बतलाये।

(1) भूगोल में पार्थिव घटनाओं की एकता का अध्ययन होता है।

(2) पार्थिव घटनाएँ विभिन्न प्रकार के समायोजन या परिवर्तन का परिणाम है।

(3) भूगोल स्थानों का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विषय है।

(4) पार्थिक घटनाओं का विश्लेषण करने हेतु वैज्ञानिक विधि का अपनाया जाना चाहिए।

(5) मानव के द्वारा अपने पर्यावरण में किये जा रहे परिवर्तन का अध्ययन आवश्यक है।

(6) पर्यावरण के सभी तत्वों का समाकलन एवं विश्लेषण भूगोल में आवश्यक है।

         ब्लाश क्षेत्रीय भूगोल / प्रादेशिक भूगोल में विश्वास करते थे। उन्होंने 1903 ई० में फ्रांस का भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। जिसमें उन्होंने लघु समरूप प्रदेश की संकल्पना विकसित किया। पुन: उन्होंने भौगोलिक प्रदेश को परिभाषित करते हुए कहा कि “प्रदेश एक ऐसी क्रियान्वित प्रणाली है जहाँ की असमान दिखाई देने वाली कई वस्तुएं आपस में जुड़े होते हैं और कालान्तर में एक विशिष्ट पहचान देते हैं।”

         ब्लाश मानव को एक क्रियाशील प्राणी मानते थे। इसके आधार पर उन्होंने अपना समर्थन संभववाद की ओर प्रकट किया। उनका मानना था कि मानव अपने विवेक से वातावरण के विभिन्न तत्वों का प्रयोग करता है। वे प्रकृति को एक सलाहकार से अधिक कुछ नहीं मानते थे। ब्लाश महोदय ने जैविक प्रदेशों की व्याख्या करने हेतु “जेनरा-डी-बाइस” की भी संकल्पना प्रस्तुत किया था।
         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ब्लाश फ्रांस के एक विलक्षण भूगोलवेता थे।

(4) जीन ब्रून्श (1869-1930 ई०)⇒ जीन ब्रून्श ब्लाश के ही शिष्य थे। इन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था’  Robber Economy की संकल्पना विकसित किया जिसमें उन्होंने संभववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े प्रकृति के गर्भ से खनिजों को निकालता रहता है और प्रकृति मौन बनी रहती है। ब्रून्श ने भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन  हेतु दो सिद्धांतों का प्रतिपादन किया-

(1) क्रियाशीलता का सिद्धांत

(2) अंतर संबंधों का सिद्धांत

            पुन: ब्रून्श महोदय ने मानव भूगोल के विषय क्षेत्र को तीन वर्गों में विभक्त किया है-

(i) प्रथम वर्ग- इसमें मिट्टी के अनुत्पादक प्रयोग, जैसे- मकान, सड़क इत्यादि के अध्ययन को शामिल किया है।
(ii) दूसरा वर्ग– इसमें वनस्पति और जन्तु जगत पर मानव विजय से संबंधित तथ्यों को शामिल किया है।
(iii) तीसरा वर्ग- इसमें मिट्टी का वर्गीकरण उपयोग, पौधों एवं पशुओं का विनाश और खनिजों का शोषण जैसे तत्वों को शामिल किया है।
          जीन ब्रून्श ने भौगोलिक चिंतन को प्रस्तुत करने के लिए 1920 ई० में ‘ह्यूमन जियोग्राफी डी ला फ्रांस’ नामक पुस्तक प्रस्तुत किया। इस पुस्तक के प्रथम खंड में प्रादेशिक भूगोल पर प्रकाश डाला गया है।
(5) अल्बर्ट डिमांजिया (1872-1940 ई०)⇒ डिमांजिया भी ब्लाश के सर्वोत्तम शिष्यों में से एक थे। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘मानव भूगोल की समस्या’ है। उन्होंने ग्रामीण बस्तियों पर शोध विशेष रूप से किया है। यह भी संभववाद के समर्थक के। इस तथ्य का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा है कि मानव सतत् अपने प्रयास से वातावरण को परिमार्जित और रूपांतरित करता रहता है। डिमांजिया भूमि का वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया है, जिसकी प्रशंसा फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने मुख्य रूप से किया है।
(6) डि मार्टोनी (1873-1955 ई०)⇒ डि मार्टोनी ब्लाश का और दामाद दोनों था। इसकी रूची भौतिक भूगोल में अधिक थी। इन्होंने आल्पस पर्वत पर होने वाले हिमनद से अपरदन और उससे निर्मित स्थलाकृतियों का विस्तार से अध्ययन किया है। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम भूगोल भूगोल है।
(7) ब्लैंचार्ड⇒ ब्लैंचार्ड का अध्ययन मूलत: नगरीय भूगोल से सम्बंधित है। इन्होंने फ्रांस में ‘स्कूल ऑफ अरबन ज्योग्रफर’ नामक संस्था की भी स्थापना की। उन्होंने ‘फ्रेंच आल्पस’ पुस्तक की रचना की जिसमें ग्रामीण घरों के प्रकारों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला।
(8) सीगफ्रायड⇒ यह फ्रांस का एक मात्र ऐसा भूगोलवेता है जिसकी रुची राजनीतिक भूगोल और चुनाव भूगोल में था। उन्होंने अपने विचारों को फ्रांस का राजनैतिक भूगोल नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया। सिगफ्रायड राज्यों के सीमा का निर्धारण हेतु कई तकनीकों का विकास किया।
(9) एम.शोरे⇒ एम. शोरे का मुख्य योगदान औपनिवेशिक भूगोल में रहा है। इन्होंने उपनिवेश बनाने वाले देशों और बनने वाले देशों की विशेषता और प्रक्रिया पर विशेष रूप से प्रकाश डाला है। औपनिवेशिक भूगोल में डुबॉय जैसे भूगोलवेता का भी विशिष्ट योगदान रहा है।
(10) गालो⇒ आधुनिक भूगोलवेताओं में एक महान भूगोलवेता रहा है। इन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उत्तरी-पूर्वी फ्रांस, मध्य यूनान और स्वेज नहर का अध्ययन किया है।
       उपरोक्त भूगोलवेताओं के अलावे भी ऐसे कई भूगोलवेता हैं जिन्होंने फ्रांसीसी भूगोल के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैसे- गॉट मैन नामक भूगोलवेता ने ‘मेगैलोपोलिश’ (Magalopolis) शब्द का प्रयोग किया। चोर्ले महोदय ने भूगोल में मॉडल निर्माण पर प्रकाश डाला। जे. अन्सेल महोदय ने राजनीतिक भूगोल में योगदान दिया।
निष्कर्ष – इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि फ्रांसीसी भूगोलवेताओं ने भूगोल के विभिन्न शाखाओं को विकसित करने में अपना विशिष्ट योगदान दिया है। लेकिन मानव भूगोल, राजनीतिक भूगोल, नगरीय भूगोल इत्यादि के विकास पर इनका विशेष योगदान रहा है।
उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

        भौगोलिक ज्ञान के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं का अतुलनीय योगदान है। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने अनेक नई संकल्पनाओं का प्रतिपादन किया तथा अनेक पूर्ववर्ती संकल्पनाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। मानव भूगोल व प्रादेशिक भूगोल के क्षेत्रों में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने जितना योगदान किया हैं उतना विश्व के किसी अन्य देश के भूगोलवेत्ताओं ने नहीं किया। ब्लाश (Blache), ब्रून्स (J. Brunches), डिमांजियाँ (Demangeon), गालो (Gallois), ब्लैचार्ड (Blanchard), डि-मार्तोनी (De-Mortonne), चोर्ले (Chorley) आदि फ्रांसीसी भूगोल के क्षितिज पर दीप्तिमान भूगोलवेत्ता हैं। फ्रांस में जिन भौगोलिक विचारधाराओं को बल मिला, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):–

       मानव भूगोल के विकास में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं का किसी भी अन्य देश के भूगोलवेत्ताओं से अधिक योगदान है। व्लाश, ब्रूस, डिमांजियां, आदि मानव भूगोल के सर्वप्रमुख विद्वान थे।

     ब्लाश ने Principles of Human Geography ग्रन्थ लिखा। इसमें संसार की जनसंख्या के वितरण, घनत्व व प्रवसन, मानव अधिवास, मानव वातावरण सम्बन्ध, आदि पर प्रकाश डाला गया है। ब्लाश को सम्भववाद का प्रवर्तक माना जाता है।

    जीन ब्रूस मानव भूगोल का दूसरा प्रमुख विद्वान था। इसकी पुस्तक ‘मानव भूगोल’ (Geographie-Humanie) 1910 में प्रकाशित हुई। ब्रूस ने मानव भूगोल के तथ्यों का यथार्थ विभाजन प्रस्तुत किया था। ब्रूस ने परिवर्तनशीलता के सिद्धान्त (Principle of Activity) व अन्तर्क्रिया सिद्धान्त (Principle of Interaction) का प्रतिपादन किया। ब्रूस का अन्तर्क्रिया सिद्धान्त ब्लाश के पार्थिव एकता के सिद्धान्त पर आधारित था।

     डिमांजियां ने ‘मानव भूगोल की समस्याएँ’ (Problems of Human Geography) लिखी। इसमें मानव भूगोल की परिभाषा दी गई है व विषय क्षेत्र पर भी प्रकाश डाला गया है।

(ii) सम्भववाद (Possibilism):-

      इस विचारधारा का जन्म फ्रांस में हुआ। ब्लाश इसका प्रवर्तक माना जाता है। फेब्रे (Febre), ब्रूस (Brunhes), डिमांजियां (Demangeon) व ब्लैचार्ड (Blanchard) इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक थे।

      सम्भववाद की विचारधारा, वातावरण निश्चयवाद की विरोधी विचारधारा है। सम्भववाद के समर्थकों का मत है कि मानव अपने कार्यकलापों के लिए स्वतन्त्र होता है। उस पर प्रकृति का कोई नियन्त्रण नहीं होता। दूसरे शब्दों में, मानव प्रकृति से अधिक शक्तिशाली है। मानव प्रकृति के नियन्त्रण में नहीं है, वरन् प्रकृति मानव के नियन्त्रण में है।

(iii) प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography):-

     फिलिप बुआचे (Phillippe Buache) प्रथम भूगोलता था, जिसने राजनीतिक सीमाओं के आधार पर किए जाने वाले भौगोलिक अध्ययनों का विरोध किया। उसने कहा कि हमें आंकड़ों का एकत्रीकरण व भौगोलिक अध्ययन प्राकृतिक सीमाओं पर करना चाहिए। उसके अनुसार नदी द्रोणियां सर्वोत्तम प्राकृतिक सीमाएँ हैं।

     इसी आधार पर फ्रांस में प्रादेशिक भूगोल का विकास हुआ यश गालो दि मर्तीनी, आदि ने इस विचारधारा को महत्वपूर्ण आश्रय दिया। प्रादेशिक भूगोल के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘विश्व भूगोल’ (Geographie Univer selle) नामक ग्रन्थमाला ने अदा की। इसकी योजना ब्लाश ने तैयार की थी, परन्तु उसकी मृत्यु के बाद गालो ने यह कार्य सम्भाला। यह ग्रन्थमाला वैज्ञानिक शुद्धता के साथ उत्कृष्ट शैली में लिखी गई थी।

(iv) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

       फ्रांस में भौतिक भूगोल का भी पर्याप्त विकास हुआ। दि मर्तोनी सर्वप्रमुख भौतिक भूगोलवेत्ता था। उसने 1909 में भौतिक भूगोल की प्रथम पाठ्य पुस्तक (Traite de Geographie Physique) प्रकाशित की। उसने आल्पस मध्य यूरोप तथा फ्रांस का भौतिक भूगोल भी लिखा। ब्लैँचाई ने 1938 में आल्पस का भौतिक भूगोल प्रकाशित कराया। बौलिंग (Bauling) ने फ्रांस के मध्यवर्ती पठार का भौतिक भूगोल लिखा।

(vi) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

       सीगफ्रीड (Siegfried) व असेल (J. Ancel) के नेतृत्व में फ्रांस में राजनीतिक भूगोल का विकास हुआ। सीगफ्रीड ने फ्रांस में राजनीतिक दलों और चुनावों में भौगोलिक कारकों का विश्लेषण किया था। उसने राजनीतिक भूगोल पर अनेक वक्तव्य दिए थे तथा पुस्तकें प्रकाशित कीं। अन्सेल ने ‘यूरोप का राजनीतिक भूगोल’ तीन ग्रन्थों में प्रकाशित किया था।

(vii) औपनिवेशिक भूगोल (Colonial Geography):-

      डुबोइस (M. Dubois), पेरिस में, 1892 में, औपनिवेशिक भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। 1902 में औपनिवेशिक भूगोल का अध्ययन पेरिस के अतिरिक्त सियोन्स, मार्सली, बोर्डियो काएन, टूलाउज, आदि विश्वविद्यालयों में भी फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के सहयोग से होने लगा था।

  औपनिवेशिक भूगोल पर फ्रांसीसी विचारधारा की सर्वोत्तम पुस्तक डिमांजियां की ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ (L’ Empire Britamnique) 1923 में प्रकाशित हुई थी। बर्नार्ड, गौतियर, ट्रेश, गोरो, मोनोड, रोबीक्युएन, आदि अन्य मुख्य औपनिवेशिक भूगोलवेत्ता थे।


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