7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

( Indian remote sensing satellite-IRS)


भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

                   भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखला का प्रथम उपग्रह IRS-1A को मार्च 1988 में सोवियत वोस्टक रॉकेट (Soviet Vostak Rocket) की सहायता से अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इसी श्रृंखला का द्वितीय उपग्रह IRS-1B को अगस्त, 1991 को प्रक्षेपित किया गया जो अभी भी निरन्तर कार्य कर रहा है। इस पर 72.5 मीटर विभेदन के LISS-1 तथा 36.25 मीटर के LISS-2A व LISS-2B संवेदक के दो कैमरे लगे हुये हैं। ये कैमरे चार स्पैक्ट्रम बैंड 0.45 से 0.86 माइक्रोमीटर पर कार्य करते हैं। इसी प्रकार तृतीय उपग्रह IRS-1C को 28 दिसम्बर, 1995 में रूसी रॉकेट द्वारा मोलिया से प्रक्षेपित किया गया। इस पर निम्नलिखित तीन कैमरे लगे हुये थे-

(i) पेंक्रोमेटिक कैमरा (Panchromatic Camera-PAN):-

             यह एक उच्च विभेदक (5.8 मीटर) पेंक्रोमेटिक बैंड पर कार्य करता है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 70 किमी० होती है। इसमें स्टीरियोस्कोपित विम्ब देखने की क्षमता है। 

(i) LISS-3 (A Linear Imaging Self Scanning Sensor):-

           यह चार स्पेक्ट्रल बैंड पर कार्य करता है। इनमें तीन दृश्य अवरक्त स्पैक्ट्रल (VNIR) बैंड तथा एक लघु तरंग अवरक्त (SWIR) प्रभाग है। इसका भूमि विभेदन VNIR बैंड पर 23.5 मीटर तथा SWIR बैंड पर 70.5 मीटर है जिनकी स्वाथ चौड़ाई क्रमशः 41 किमी० तथा 148 किमी० है।

(iii) WIFS (A Wide Field Sensor-WIFS):-

          यह एक निम्न विभेदक (188.3 मीटर) कैमरा है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 810 किमी० है। उपग्रह में एक टेपरिकार्डर भी है जो आंकड़ों को अंकित करता है।

              चतुर्थ उपग्रह IRS-1D को 29 सितंबर 1997 को प्रक्षेपित किया गया जो IRS-1C के ही समान है। IRS-P2, तथा IRS-P1, को भारत में निर्मित PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) द्वारा क्रमश: 15 अक्टूबर, 1994 व 21 मार्च, 1996 को प्रक्षेपित किया गया। IRS-1A व 1B की ही भांति IRS-P2, में भी LISS-2 कैमरा लगा है जबकि IRS-P1 में WIFS कैमरा लगा हुआ है।

            IRS-P4, को PSLV-C2 द्वारा 26 मई, 1999 को सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में छोड़ा गया। यह अपने तरह का एक नया प्रयोग था। इस पर समुद्रीय रंगीन मोनीटर (Ocean Colour Monitor) तथा बहु आवृत्ति स्कैनिंग लघुतरंग रेडियोमीटर (Multi Frequency Scanniring Microwave Radiometer) लगे हुये हैं।

          उपग्रह नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में स्थित है। इसके अतिरिक्त लखनऊ तथा माउरीटियस उपस्टेशन भी निरन्तर आई. आर. एस. उपग्रह का प्रबोधन (Monitor) करते हैं। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (NRSA) का आंकड़ों को प्राप्त करने वाला स्टेशन हैदराबाद के पास सादनगर में स्थित है। यहां पर उपग्रह से आंकड़ों को प्राप्त कर इन्हें प्रयोग के योग्य बनाया जाता है। तत्पश्चात् हैदराबाद में NRSA द्वारा आंकड़ों को वितरित करने की सुविधा है।

           भारतीय सुदूर संवेदन प्रणाली का सबसे मुख्य आधार राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन प्रणाली (National Natural Resources Management System-NNRMS) है जो भारत के प्राकृतिक संसाधनों के आंकड़ों का प्रभावशाली ढंग से प्रबन्धन करती है। आई. आर. एस. के आंकड़ों को कई उपयोगों में लाया जाता है जैसे कि कृषि फसलों का उत्पादन अनुमान, सूखाग्रस्त क्षेत्रों का प्रबन्धन, बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण, भूमि उपयोग मानचित्रण बेकार भूमि का प्रबन्धन, जल संसाधनों का प्रबन्धन, समुद्रीय संसाधनों का सर्वेक्षण, नगरीय योजनायें, खनिज संभावनायें, वन सर्वेक्षण इत्यादि।

              आई. आर. एस. आंकड़ों का अनोखा उपयोग IMSD (Intergrated Mission for Sustainable Development) है। वास्तव में IMSD के अन्तर्गत 174 जिलों को सम्मिलित किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य उपग्रहीय तथा सामाजिक व आर्थिक धरातलीय आँकड़ों की सहायता से सतत विकास (Sustainable Development) करना है। IRS श्रृंखला के सामान्य लक्षणों तथा उनके संवेदकों की विशेषताओं को इस प्रकार नीचे देखा जा सकता है-

आई. आर. एस. श्रृंखला की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-1A/1B IRS-P2
ऊँचाई (Altitude) 904 किमी० 817 किमी०
कक्षीय काल (Orbital Period) 103.2 मिनट 101.35 मिनट
सम-सामयिक विभेदन   (Temporal Resolution)  22 दिन 24 दिन

भूमध्य रेखा पार करने का समय (Equatorial Crossing Time)

10 बजे सुबह 10 बजे सुबह
संवेदक (Sensors) LISS-1 व LISS-2 LISS-2
आई. आर. एस. 1C की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-1C
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.69०
दूरी (Ditance between Adjacent Traces) 117.5 किमी०
पुनरावृत्ति (Repitative for LISS-3) 24 दिन
पुनरावृत्ति (Repitative for WIFS) 5 दिन
दृश्यालोकन (Revisit of Pan) 5 दिन
नादिर बिन्दु पर कवरेज (Coverage) 398 किमी०
स्टीरियोग्राफिक क्षमता (Stereo Coverage Capacity) 5 दिन
आई. आर. एस. P3 की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-P3
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
कक्षीय प्रकार (Orbital Period) 101.35 मिनट
भूमध्य रेखा पार करने का समय 10.30 बजे सुबह
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.73०
संवेदक (Sensors) WIFS, MOS, X-Ray

          भारत ने प्रथम प्रयास 1975 से लेकर 2014 तक 73 भारतीय उपग्रहों को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। भारत के सभी उपग्रहों का उत्तरदायित्व भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन के अधीन है।

     भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (INSAT) को भू-तुल्यकालिक कक्षों में स्थापित किया गया है। यह प्रणाली एशिया-प्रशान्त क्षेत्र की सबसे बृहत घरेलू संचार उपग्रह प्रणाली (Domestic Communication Satellite System) है। इसे वर्ष 1983 में INSAT-B के प्रक्षेण के साथ ही स्थापित किया गया था। भारत के इतिहास में संचार सेक्टर के क्षेत्र में एक क्रांति है जो निरन्तर चल रही है। समय-समय पर इसमें कई परिवर्तन होते चले गये हैं। INSAT अन्तरिक्ष प्रणाली के अन्तर्गत 24 उपग्रह प्रक्षेपित है उनमें से 10 सफलतापूर्वक अब भी कार्यरत हैं।

भारत के प्रक्षेपणयान (India Launch Vehicles)

            भारत के प्रमुख प्रक्षेपणयान निम्नलिखित हैं-

उपग्रह प्रक्षेपणयान (Satellite Launch Vehicle – SLV-3):-

          इस क्षेत्र में भारत की क्षमता का पहला प्रदर्शन SLV-3 का निर्माण था। 1980 में SLV-3 ने अपनी सफलतम उड़ान भरी जिसने 40 किग्रा० के रोहणी उपग्रह को ध्रुवीय कक्ष के नजदीक पहुंचाया। SLV-3 की लम्बाई 22.7 मीटर है जिसकी क्षमता 17 टन वजन उठाने की है। SLV-3 के दो अन्य प्रक्षेपण मई, 1981 व अप्रैल, 1983 में सम्पन्न किये गये।

आवर्धक उपग्रह प्रक्षेपणयान (The Augmented Satellite Launch Vehicle-ASLV):-

         ASLV की प्रथम सफलता 20 मई, 1992 को प्राप्त हुई जब रोहणी उपग्रह (SROSS-C) को पृथ्वी के नजदीक कक्ष में स्थापित किया गया। ASLV के द्वारा दूसरा प्रक्षेपण 4 मई, 1994 को सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ जब SROSS-C2, उपग्रह को छोड़ा गया था। ASLV पांच अवस्थाओं वाला यान है जो 150 किलो० पेलोड (Payload) की क्षमता रखता है।

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान (Polar Satellite Launch Vehicle-PSLV):-

              ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान के विकास में यह भारत की तीसरी सफलता थी। 21 मार्च, 1996 में PSLV की सफलता से भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि यह आई. आर. एस. उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की क्षमता रखता है। PSLV-D, द्वारा सुदूर संवेदक उपग्रह IRS-P, को 817 किमी० दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में स्थापित किया गया। PSLV-D3 को द्वितीय विकास उड़ान 15 अक्टूबर, 1994 को हुई जब IRS-P2, उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्ष में स्थापित किया गया।

              PSLV, 283 टन भार वाला 44 मीटर लम्बा यान है। यह 1000 से 1200 किग्रा भार वाले सुदूर संवेदन उपग्रह को 900 किमी० की दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह यान चार अवस्थाओं का है। इसकी पहली अवस्था 2.8 मीटर व्यास की 129 टन भारी है। इस पर एक ठोस मोदक मोटर (Solid Propellant Motor) है जिसके चारों ओर 6 मोटर जड़ी हुई हैं। 2.8 मीटर व्यास वाली दूसरी अवस्था है जो तरल इन्जन तकनीक पर आधारित है। यह 37.5 टन (Liquid Propellant) का उपयोग करता है।

             तीसरी अवस्था में 7.2 टन ठोस मोदक मोटर है तथा चौथी अवस्था में पुनः तरल मोदक की है जिसमें 2 टन मोदक है। इस पर एक संकीर्ण लूप निर्देशन प्रणाली है।

भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपणयान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle- GSLV):-

           भारत ने भृतुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपणयान का भी निर्माण किया है जिसकी प्रक्षेपण क्षमता 2500 किग्रा० के संचार उपग्रहों को भू-स्थैतिक कक्ष में स्थापित की है। GSLV का निर्माण PSLV को परिवर्तित करके तैयार किया गया है जिस पर 6 ठोस मोदक स्ट्रैप मोटर तथा 4 तरल मोदक स्ट्रेप मोटर लगी है। इसमें PSLV की दो अन्य अवस्थाओं को बदलकर एक क्रायोजिनिक अवस्था की गई है।

भारतीय अन्तरिक्ष केन्द्र तथा इकाईयाँ (Indian Space Centers and Units):-

           भारत में अन्तरिक्ष विज्ञान के विकास एवं अनुसंधान के लिये देश के विभिन्न भागों में अन्तरिक्ष केन्द्रों की स्थापना की गई है जिनमें प्रमुख निम्न हैं-

1. विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (VSSC):-

             यह केन्द्र तिरुअनन्तपुरम में स्थित है। प्रक्षेपणयान के विकास तथा रॉकेट अनुसंधान में इस केन्द्र की अग्रणी भूमिका है। केन्द्र इसरो के प्रक्षेपणयान विकास प्रोजेक्ट की योजनायें तैयार कर उन्हें क्रियान्वित करता है।

2. इसरो उपग्रह केन्द्र (ISAC):-

              यह केन्द्र बंगलौर में स्थित है। यहां पर वैज्ञानिक तकनीक तथा उपयोग मिशन (Application Mission) के लिये उपग्रह प्रणाली का डिजाइन, निर्माण, परीक्षण तथा प्रबन्धन किया जाता है।

3. अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (SAC):-

          इसरो के अहमदाबाद केन्द्र पर अनुसंधान एक विकास कार्य किये जाते हैं। इनमें मुख्यतः अन्तरिक्ष तकनीक के व्यावहारिक उपयोग के लिए सोच, विचार (Conceiving), संगठन तथा निर्माण प्रणाली तैयार करना है। क्रियाकलापों का मुख्य विषय क्षेत्र उपग्रहीय संचार प्रणाली, सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान, ज्योडेसी इत्यादि हैं।

4. सहार केन्द्र (SHAR):-

             यह आन्ध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा में इसरो का प्रमुख प्रक्षेपण केन्द्र है। यहां पर उपग्रह प्रक्षेपण के अतिरिक्त ठोस मोदक रॉकेट मोटर का  वृहद पैमाने पर प्रक्रीयन तथा भूमि परीक्षण भी किया जाता है।

भारतीय सुदूर संवेदन उपग

अंतरिक्ष केंद्र और भारत में इकाइयाँ

5. तरल मोदक प्रणाली केन्द्र (Liquid Propulsion System Center-LPS):-

           इस प्रकार की सुविधा तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर तथा महेन्द्रगिरी (तमिलनाडु) केन्द्रों में उपलब्ध है जहां पर इसरो प्रक्षेपणयान व उपग्रह प्रोग्राम के लिये तरल मोदक प्रणाली का खाका, निर्माण तथा परीक्षण किया जाता है।

6. विकास एवं शैक्षिक संचार इकाई (Development and Educational Communication Unit-DECU):-                       

              अहमदाबाद केन्द्र आन्तरिक उपयोग प्रोग्रामों के संकल्पन (Conception), परिभाषा, योजना तथा सामाजिक आर्थिक मूल्यांकन के लिये प्रमुख हैं।

7. इसरो टेलीमेटरी, ट्रेकिंग व कमान्ड नेटवर्क (ISTRAC):-

              इसका केन्द्रीय कार्यालय तथा स्पेसक्राफ्ट नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में है। इसके भूमि नेटवर्क केन्द्र श्रीहरिकोटा, तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर, लखनऊ, पोर्टब्लेयर तथा माउरीटियस में है।

8. प्रधान नियंत्रण सुविधा (Master Control Facility- MCF):-

           कर्नाटक में स्थित हसन केन्द्र प्रक्षेपण के बाद की क्रियाओं के लिये उत्तरदायी है। विशेषकर इन्सेट उपग्रह के कक्षीय मैनुअवर (Manoeuvers) स्टेशन का रख-रखाव तथा कक्षीय संचालन इत्यादि क्रियायें हैं।

9. इसरो जड़त्व प्रणाली इकाई (ISRO Inertial Systems Unit):-

             तिरुअनन्तपुरम केन्द्र उपग्रह तथा प्रक्षेपणयान के लिये जड़त्व प्रणाली का बाहरी खाका तथा निर्माण करता है।

10. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory-PRL):-

                यह प्रयोगशाला अन्तरिक्ष विभाग के अधीन अहमाबाद में स्थित है जो अन्तरिक्ष अनुसंधान एवं अन्य विज्ञानों के अनुसंधान का अग्रणी राष्ट्रीय केन्द्र है।

11. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (National Remote Sensing Agency-NRSA):-

                 यह केन्द्र भी अन्तरिक्ष विभाग के अधीन हैदराबाद में स्थित है। यहां पर सुदूर संवेदन उपग्रह के आंकड़ों को प्रक्रियन के पश्चात प्रयोगकर्ता तक उपलब्ध कराता है। इसके द्वारा वायु सुदूर संवेदन का संचालन भी किया जाता है।

12. राष्ट्रीय मेसोस्फीयर-स्ट्रेटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर रडार सुविधा (National Mesophere Stratosphere Toposphere Radar Facilitiy):-

               इस केन्द्र पर वायुमण्डलीय विज्ञान अनुसंधान किया जाता है। अन्तरिक्ष विभाग के अधीन यह केन्द्र तिरुपति में स्थित है।

13. भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (Indian Institute of Remote Sensing- IIRS):-

               भारती सुदूर संवेदन संस्थान एक प्रमुख शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान है जो कि भारत सरकार के अन्तरिक्ष विभाग में राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेन्सी के अन्तर्गत आता है। इसकी स्थापना सुदूर संवेदन के क्षेत्र में दक्ष व्यवसायियों को विकसित करने के लिये की गई है। संस्थान का प्रमुख कार्य क्षेत्र के प्रयोगकर्ता समुदाय में तकनीक हस्तान्तरण द्वारा अपनी क्षमताओं का निर्माण करना है। यह संस्थान सुदूर संवेदन के विभिन्न उपयोगों के क्षेत्रों में डिप्लोमा एवं स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्रदान करता है। यह संस्थान देहरादून में स्थित है।

         इस संस्थान का प्रमुख मिशन सुदूर संवेदन तथा ज्योइनफारमेटिक्स के क्षेत्र में शिक्षा एवं परिशिक्षण के द्वारा व्यावसायिक श्रेष्ठता को जारी रखना तथा प्रोत्साहन करना है। इसका दूसरा उद्देश्य भूविज्ञान, मानचित्रण, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण, पर्यावरण प्रबन्धन इत्यादि विषयों में धरातलीय अनुभवों तथा प्रयोगकर्ता के संवाद को एकीकृत करना है। इसका तीसरा महत्वपूर्ण कार्य प्राकृतिक संसाधनों के विकास तथा प्रबन्धन के लिये सामाजिक-आर्थिक सोच-विचार का ध्यान रखते हुये अन्तर विषयी अन्तरापृष्ट की स्थापना करना है।

          उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिये संस्थान में तकनीक तथा उपयोग के लिये कई विभाग हैं जो फोटोग्रामेंट्री सुदूर संवेदन, ज्योइन्फोरमेटिक्स तथा विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन को संचालित करते हैं। इनमें प्रमुख विभाग हैं-

(i) फोटोग्राफी एवं सुदूर संवेदन,

(ii) भू-विज्ञान,

(iii) कृषि एवं मृदा

(iv) जल संसाधन

(v) समुद्र विज्ञान

(vi) वन एवं पारिस्थितिकी

(vii) मानव अधिवास विश्लेषण तथा

(viii) ज्योइन्फोर्मेटिक।

प्रश्न प्रारूप

Q. भारतीय सुदूर संवेदक उपग्रह पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Indian remote sensing satellite-IRS.)



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6. लैण्डसेट उपग्रह

    6. लैण्डसेट उपग्रह

(Landsat Satellites)


लैण्डसेट उपग्रह

             लैंडसेट उपग्रह को भू-संसाधन तकनीक उपग्रह (Earth Resource Technology Satellite-ERTS) कहते हैं। इसको संयुक्त राज्य अमेरिका के नासा द्वारा ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया गया। ERTS-1 का प्रक्षेपण 13 जुलाई, 1972 में किया गया था जो 6 जनवरी, 1978 से कार्य करना बन्द कर दिया था। यह तितली की आकृति का 3 मीटर लम्बा तथा 1.5 मी० अर्द्धव्यास का है। इस पर 4 मीटर लम्बे सौर्य ऊर्जा पैनल लगे हुये हैं। यह एक सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह है जो भूमध्यरेखा को प्रत्येक पथ में ठीक एक समय (स्थानीय समय) पर पार करता है। लैंडसेट 1, 2 व 3 भूमध्यरेखा को सुबह 11 बजे पार करता है। सुबह के समय आसमान स्वच्छ एवं साफ रहता है जो कि सौर्य ऊर्जा के परावर्तन विशेषताओं के लिये तथा फोटोग्राफिक उपयोगों के लिये बहुत उपयुक्त होता है।

लैण्डसेट उपग्रह

लैण्डसेट उपग्रह

               संयुक्त राज्य अमेरिका के 43 राज्यों तथा 36 देशों में ERTS-1 में 300 प्रयोग किये गये थे। 22 जनवरी, 1975 को ERTS-B को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित करने से पूर्व नासा (NASA) ने ERTS प्रोग्रम का नाम बदलकर ‘लैंडसेट’ (Landsat) प्रोग्राम रख दिया। इसके क्रम में जो भी उपग्रह छोड़े गये उनका नाम लैंडसेट रखा गया। इस प्रकार पांच लैंडसेट उपग्रह सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किये गये। लैंडसेट-6, प्रक्षेपण के दौरान असफल हो गया था।

लैण्डसेट उपग्रह

लैण्डसेट उपग्रह

लैण्डसेट उपग्रह द्वारा लिया गया फोटो

लैंडसेट के उद्देश्य (Objects of Landsat):-

          लैंडसेट का प्रमुख उद्देश्य सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा बहुआयामी धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त करना एवं इनको भू-स्थित केन्द्र (Ground Station) को भेजना है। दूसरा, प्राप्त आंकड़ों को भू-केन्द्र पर परिष्कृत कर उपयोग के योग्य तैयार करना तथा उपयोगकर्ता तक पहुँचाना है।

लैंडसेट उपग्रह की विशेषता (Characteristics of Landsat Satellite):-

             लैंडसेट उपग्रह की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं-

1. यह उपग्रह ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर (82° उ० तथा 82° द०) अन्य सम्पूर्ण पृथ्वी के सुदूर संवेदन सूचनाओं को एकत्र करने की क्षमता रखता है।

2. सभी लैंडसेट पृथ्वी का एक चक्कर 103 मिनट में लगा लेते हैं तथा एक दिन में पृथ्वी का 14 चक्कर लगाते हैं।

3. सामान्य रूप से ये भूमध्यरेखा को 9° के कोण पर पार करते हैं जहाँ पर भूमध्यरेखा से इनकी दूरी 2760 किमी० होती है।

4. इनका दृश्यांश की चौड़ाई (Swath Width) लगभग 185 किमी० हैं।

5. यहाँ प्रतिदिन के क्रमिक घुमाव के मध्य बिम्ब विस्तार (Image Coverage) में लम्बे समय का अन्तर होता है। प्रत्येक आने वाले दिन में उपग्रह का घुमाव कक्षा धीरे-धीरे पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है। इसलिये बीते हुये दिन एवं आने वाले दिन के बिम्बों में अति व्यापन (Overlap) पाया जाता है।

6. लैंडसेट 1, 2 एवं 3 सम्पूर्ण पृथ्वी को 18 दिन में तय कर लेते हैं जबकि लैंडसेट 4 व 5 पृथ्वी को 16 दिन में तय कर लेते हैं।

7. इस प्रकार एक ही क्षेत्र के प्रति 16 अथवा 18 दिनों के अन्तराल पर बिम्ब प्राप्त होते रहते हैं। एक दृश्य को एक वर्ष में उपग्रह के द्वारा 20 बार तय किया जाता है। 

8. भूमध्यरेखा पर अतिव्यापक (Overlap) 14% तथा अन्य अक्षांशों पर निम्न रहता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. लैण्डसेट उपग्रह के उद्देश्य एवं विशेषताओं का वर्णन करें।

(Describe the objectives and characteristics of Landsat Satellites.)



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5. भू-स्थैतिक उपग्रह,  सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह एवं ध्रुव कक्षीय उपग्रह

5. भू-स्थैतिक उपग्रह, सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह एवं ध्रुव कक्षीय उपग्रह

(The Geostationary Satellite,  Sun-Synchronous Satellite and Polar Orbit Satellite)


भू-स्थैतिक उपग्रह, सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह एवं ध्रुव कक्षीय उपग्रह

भू-स्थैतिक उपग्रह (Geostationary Satellite):-

           भू-स्थैतिक उपग्रहों 36000 किमी० की ऊँचाई पर प्रक्षेपित किया जाता है तथा इनकी गति पृथ्वी की गति के समान होती है। इस प्रकार पृथ्वी के घूर्णन काल से मेल खाने वाले वेग से गतिमान उपग्रह को भू-स्थैतिक (Geostationary) उपग्रह कहते हैं। इनका कोणीय वेग पृथ्वी के कोणीय वेग के समान होता है। इनकी कक्षा वृत्ताकार होती है जो पश्चिम से पूर्व की ओर गति करते हुये 24 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेते हैं।

भू-स्थैतिक उपग्रह

Geostationary Orbit

              समय की इतनी ही अवधि में पृथ्वी अपने ध्रुवीय अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती हुई एक चक्कर पूरा कर लेती है। इस प्रकार पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) पथ व उपग्रह के परिक्रमण (Revolution) की दिशा तथा समय अन्तराल समान होने के कारण ये पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि इन्हें भू-स्थैतिक (Geostationary) भू-उपग्रह कहा जाता है। स्थैतिक (Stationary) होने के कारण ये सम्पूर्ण गोलार्द्धीय डिस्क को देख सकते हैं। इनका विस्तार (Coverage) 70°N से 70°S अक्षांश तक सीमित होता है तथा एक उपग्रह पृथ्वी का 1/2 भाग को ढक सकता है। समस्त पृथ्वी को तय करने के लिये तीन भू-स्थैतिक उपग्रहों की आवश्यकता होती है।

भू-स्थैतिक उपग्रह

Earth Coverage by Geostationary Satellite

             ज्योस्टेशनरी भू-उपग्रह दूर संचार सेवाओं एवं मौसम विज्ञान से सम्बन्धित जानकारियों के लिये उपयोग किये जाते हैं। वर्तमान समय में भूमध्य रेखा के ऊपर 36000 किमी० से अधिक दूरी पर भूस्थैतिक उपग्रह स्थित हैं।

प्रमुख भू-स्थैतिक (Geostationary) उपग्रह है-

(i) GOES-E (संयुक्त राज्य अमेरिका),

(ii) GOES-W (संयुक्त राज्य अमेरिका),

(iii) METEOSA (यूरोपीय अन्तरिक्ष संस्था),

(iv) GOMS (रूस),

(v) GMS (जापान) तथा

(vi) INSAT (भारत) 

सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह (Sun-Synchronous Satellite):-

              सूर्य तुल्यकालिक उपग्रहों को ध्रुवीय कक्ष के नजदीक वाले भू-उपग्रह भी कहते हैं। इनका कक्षीय पक्ष ठीक ध्रुव से न होकर ध्रुव के नजदीक से गुजरता है। अधिकतर सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह ठीक 10:30 बजे भूमध्य रेखा को पार करते हैं। इस समय सूर्य का कोण कम होता है। जिसके परिणामस्वरूप धरातलीय उच्चावच की छाया परिलक्षित होती है। दिन के अतिरिक्त सूर्य-तुल्यकालिक उपग्रह रात्रि में भी तापीय बिम्ब लेने में सक्षम होते हैं। जो भाग उपग्रह पथ के रात्रि में पड़ते हैं, उनके बिम्ब रात्रि में लिये जा सकते हैं। उनकी ऊँचाई इतनी होती है कि उपग्रह पृथ्वी के सम्पूर्ण भाग को तय कर सकता है तथा प्रत्येक अक्षांश रेखा को स्थानीय समय के अनुसार दो बार पार करता है। ध्रुवीय कक्ष में ये उपग्रह ऐसे गति करते हैं कि वे प्रत्येक बार भूमध्य रेखा को एक ही स्थानीय समय पर पार कर सकते हैं। चूँकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है इसलिये उपग्रह की कक्षा का धरातलीय मार्ग सूर्य की दिशा में अर्थात् पूर्व से पश्चिम की ओर की निरन्तर आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार इन भू-उपग्रहों की सहायता से निरन्तर सम्पूर्ण पृथ्वी का अवलोकन किया जा सकता है तथा ये सामयिक आधार (Periodic Basis) पर पुनरावृत्तिक (Repitative) कवरेज देते रहते हैं।

सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह

Sun-Synchronons Orbits (Landsat)

         उपरोक्त चित्र में किसी सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह की कार्यशैली को दर्शाया गया है। उपग्रह धरातल से 900 किमी० की ऊँचाई पर वृत्ताकार ध्रुवीय कक्षा में चक्कर लगाता है। उपग्रह का कक्षा पथ भूमध्य रेखा पर 98.22° का कोण बनाता है। यह 103 मिनट में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरा कर लेता है। इस प्रकार 24 घंटे में सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह पृथ्वी के 14 बार परिक्रमा करते हैं। ध्रुव कक्षीय एवं सूर्य तुल्यकालिक उपग्रहों में लेडसेट, स्पाट तथा आई. आर. एस. प्रमुख हैं।

स्वाथ (Swath):-

          यहाँ पर यह भी समझना आवश्यक है कि उपग्रह का संवेदक किस प्रकार धरातल के सफर को तय करता है। जैसे ही कोई भू-उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो संवेदक द्वारा पृथ्वी के धरातल का कुछ भाग तय किया जाता है। इस तय किये गये पट्टिका को उपग्रह का स्वाथ (Swath) कहते हैं।

          अलग-अलग भू-उपग्रहों में स्वाथ की चौड़ाई अलग-अलग 10 किमी० से 100 किमी० के मध्य रहती है। जब भू-उपग्रह जैसे कि लैण्डसेट (Landsat) पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं तो इनके संवेदक द्वारा एक बार में घरातल की 158 किमी० चौड़ी पट्टी को कवर किया जाता है। इस प्रकार एक दिन में केवल 14 पट्टियों का ही संवेदन हो पाता है तथा इन क्रमोत्तर पट्टियों के मध्य का भाग बिना कवर किये ही छूट जाता है। यह स्थिति अलग-अलग अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न होती है। भूमध्य रेखा पर दो उत्तरोत्तर परिक्रमणों के धरातलीय मार्गो के बीच की दूरी लगभग 2760 किमी० तथा 40° उ० अक्षांश पर लगभग 2100 किमी० होती है। यह दूरी उच्च अक्षांशों की ओर निरन्तर कम होती जाती है जिससे अतिव्यापन (Overlap) बढ़ता जाता है। भूमध्यरेखा पर अतिव्यापन (Overlap) की मात्रा 14% तथा 81° उत्तरी अक्षांश पर सबसे अधिक 85% होती है। संवेदन पट्टियों के निरन्तर पश्चिम की ओर खिसकने से अक्षांशों को छोड़कर पृथ्वी के शेष भागों को 18 दिन में कवर कर देता है।

स्वाथ

Swath-Area Sensed by a Satellite in One Pass

            सभी सुदूर संवेदन संसाधन उपग्रहों (Resource Satellite) को सूर्य तुल्यकालिक श्रेणी में रखा गया है। इनमें से कुछ लैण्डसेट (Landsat), स्पॉट (Spot), आई. आर. एस. (IRS), नोआ (NOAA), सीसैट (SEASAT), टीरोंस (Tiros, एच.सी.एम.एम. (HCMM), स्काइलैब (Skylab), अन्तरिक्ष सटल (Space Shuttle) इत्यादि हैं। इन भूउपग्रहों का उपयोग धरातल में अतिरिक्त आकाशीय पिण्डों को देखने के लिए भी किया जा सकता है। जिस पर वायुमण्डल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। भू-उपग्रहों द्वारा पृथ्वी का सिंहावलोकन सामयिक रूप से किया जाता है जो कम खर्च पर प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन (Management) के लिये बहुत उपयोगी होते हैं। प्रारम्भ में इनके विकास तथा निर्माण पर अत्यधिक खर्च होता था परन्तु पृथ्वी के पुनरावृत्ति सिंहावलोकन से अन्तरिक्षयान (Space Craft) सेवायें वायुयान आधारित सुदूर संवेदन की तुलना में मितव्यायी होते हैं। अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म को निम्न तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(i) निम्न उँचाई वाले उपग्रह (Low Altitude Satellite)

(ii) अधिक ऊँचाई वाले ज्योस्टेशनरी उपग्रह (High Altitude Geostationary Satelles)

(iii) अन्तरिक्ष शटल या अन्तरिक्ष यान (Space Shuttle)

ध्रुव कक्षीय उपग्रह (Polar Orbit Satellite):-

            ध्रुव कक्षीय एक ऐसी कक्षा पथ है जो 80° से 100° कोण पर झुका रहता है। 90° से अधिक झुकाव से अभिप्राय यह है कि उपग्रह की गति (Motion) पश्चिम दिशा की ओर होना है। ऐसा इसलिये किया गया है क्योंकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है तथा पूर्व दिशा की ओर ऊर्जा की कम आवश्यकता होती है। ध्रुव कक्षीय उपग्रह सम्पूर्ण पृथ्वी का अवलोकन करने में असमर्थ होते हैं। उपग्रहों को 600 किमी० से 1000 किमी० की ऊँचाई पर प्रतिनिधिक रूप से स्थापित किया जाता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. स्थैतिक उपग्रह एवं सूर्य तुल्यकालिक उपग्रह पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Geostationary Satellite and sun-synchronous tellite.)



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4. सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

4. सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

(Remote Sensing Platforms)


सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

                     प्लेटफार्म का अर्थ है कि अन्तरिक्ष में ऐसा स्थान या स्थिति जहाँ पर कैमरा या संवेदक (Sensor) लगा हुआ होता है तथा जो लक्ष्य या घरातल के किसी भाग की सूचनाओं को प्राप्त करता है। सुदूर संवेदन में प्रयोग किये जाने वाले सभी गुब्बारों, हैलीकाप्टरों, वायुयानों, अन्तरिक्ष शटल, राकेटों तथा अन्तरिक्षयानों को सुदूर संवेदन का प्लेटफार्म कहा जा सकता है।

            इनका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के आधार पर किया जाता है। सुदूर संवेदन के प्रोग्राम के उद्देश्य, संवेदक के प्रकार (Types of Sensor), प्रचालन उँचाई (Operating Height), पेलोड (Payload), प्रचालन परास (Operating Range), समय (Time), लागत (Cost) इत्यादि को ध्यान में रखकर किसी भी प्लेटफार्म का चयन किया जा सकता है।

प्लेटफार्म के प्रकार (Types of Platform)

          पृथ्वी के धरातल से ऊँचाई के आधार पर सुदूर संवेदन प्लेटफार्म को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

1. भू-आधारित प्लेटफार्म (Ground Based Platform)

2. वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म (Air Based Platform)

3. अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म (Space Based Platform)

सुदूर संवेदन प्लेटफार्म

1. भू-आधारित प्लेटफार्म (Ground Based Platform):-

           सुदूर संवेदन प्रणाली में धरातल पर आधारित प्लेटफार्म का उपयोग मुख्यतः धरातलीय संसाधनों के अध्ययन के लिये किया जाता है। भूमि सत्यापन द्वारा वास्तविक स्थिति से सम्बन्धित सूचनाओं को एकत्रित कर प्रयोगशाला में अध्ययन किया जाता है। इस प्लेटफार्म के अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता स्वयं घटना स्थल पर जाकर पूर्व एकत्रित सूचनाओं का सत्यापन कर नई सूचनाओं को सम्मिलित करने के पश्चात किसी परिणाम या निष्कर्ष पर पहुँचता है।

        भू-धरातल की वास्तविक सत्यता का अवलोकन एवं मापन कई प्रकार से जा किया सकता है। वायुमण्डल विज्ञान तथा जलवायु विज्ञान से सम्बन्धित घटनाओं को धरातल पर अवलोकन करना एक रोचक विषय है। इसका उपयोग तब और भी अधिक हो जाता है जब कई प्रकार की क्रियायें वायुमण्डल के 4 या 5 किलोमीटर की ऊँचाई तक घटित होती है। रडार, डॉपलर, लीडर, लघुतरंग रेडियोमीटर, डॉवसन, स्पेक्ट्रोमीटर इत्यादि कई स्थल आधारित सुदूर संवेदन के यंत्र हैं जिनका उपयोग मौसम एवं जलवायु विज्ञान की सूचनाओं को एकत्र करने के लिए किया जाता है।

2. वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म (Air Based Platform):-

          वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म का प्रयोग मुख्यतः वायु फोटोचित्रों को खींचने के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य, फोटो-विश्लेषण (Photo Interpretation) तथा फोटोग्रामेट्रिक अध्ययन करना होता है । इनको प्राप्त करने के लिये वायुयानों पर क्रमवीक्षक (Scanner) लगे होते हैं। क्रमवीक्षक की उपयोगिता एवं कार्य के परख की जाँच, वायुयान एवं उपग्रह मिसन से पूर्व भलीभाँति की जाती है। उद्देश्य एवं उपयोगिता के आधार पर क्रमवीक्षक में भिन्नतायें होती हैं। वायुमण्डल आधारित प्लेटफार्म को पुनः दो उप वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) गुब्बारा आधारित प्लेटफार्म (Balloon Based Plafform)

(ii) वायुयान निर्मित प्लेटफार्म (Aircraft Based Platform)

गुब्बारा आधारित प्लेटफार्म (Ballon Based Platform):-

      सुदूर संवेदन उद्देश्य की पूर्ति के लिये गुब्बारों की उपयोगिता 1900 के बाद प्रारम्भ हुई थी। सर्वप्रथम पृथ्वी के धरातल के अध्ययन के लिये गुब्बारे विकसित किए गये थे। प्रारम्भ में गुब्बारों का उपयोग विभिन्न ऊँचाइयों पर संवेदक (Sensor) की उपयोगिता प्रमाणित करने के लिये किया गया था। मौसम विज्ञान में गुब्बारों का उपयोग हवा की गति को नापने के लिये किया गया था। आजकल मौसम सम्बन्धी वायुमण्डलीय दशाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिये इन प्लेटफार्मों का काफी प्रयोग होता है। भिन्न-भिन्न आकार व आकृति के आधार पर गुब्बारा आधारित प्लेटफार्म को निम्नलिखित तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-

(a) स्वतंत्र गुब्बारे (Free Balloons),

(b) बन्धन सूत्र गुल्बारे (Tithered Balloons) तथा

(c) शक्तियुक्त गुब्बारे (Powered Balloons)।

वायुयान आधारित प्लेटफार्म (Air Based Platform):-

        विस्तृत धरातलीय दृश्य को देखने के लिये लगभग 20 मीटर की ऊंचाई से वायुयानों का उपयोग किया जाता है। हवाई सर्वेक्षण (Aerial Survey), यंत्रों के भार (Equipment Weight) तथा सर्वेक्षण लागत के आधार पर अलग-अलग प्रकार के वायु आधारित साधन प्रयोग किये जाते हैं। जैसे कि हैलीकॉप्टर, लघु वायुयान, इत्यादि जिन पर वायु कैमरे लगे रहते हैं। हवाई कैमरे अत्यधिक भारी होते हैं जो वायुयान के तल पर एक छिद्र पर जड़े होते हैं। अधिकतर वायुयान 8 किमी० से नीचे लेकिन धरातल से 500 मीटर की ऊँचाई से उड़ते हैं। प्रायः ये 150 किमी० प्रति घंटे की गति से उड़ते हैं।

      हवाई कैमरे अत्यधिक नाजुक (Sophisticated) तथा खर्चीले होते हैं। अब धीरे-धीरे इनके भार (30 किलो) एवं खर्च को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। हैलीकॉप्टर कम रफ्तार से कम ऊँचाई पर आसानी से उड़ सकता है जो अति उच्च विभेदन (Resolution) के विवरणों को प्राप्त करता है। सामान्यतः वायुयानों का प्रयोग सुदूर संवेदन के रूप में वायु फोटो चित्रों तथा क्रमवीक्षक (Scanner) बिम्बों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। वायुयान में कुछ सावधानी रखना अति आवश्यक है। वायुयान अत्यधिक स्थिर, कम्पन रहित तथा समान गति क्षमता रखने वाला होना चाहिए। ऊँचाई के आधार पर वायुयानों को वर्गीकृत किया जा सकता है। भारत में सुदूर संवेदन के उपयोग में लाये जाने वाले वायुयानों को निन्मलिखित वर्गों में बाँटा गया है-

 वायुयानों के प्रकार

वायुमान का नाम ऊँचाई (मीटर) न्यूनतम उड़ान गति (किमी प्रति घंटा)
डकोटा (Dakota) 18000-20000 240
एवरो (Avro) 25000 600
सेसना (Cessna) 29000 350
केनबरा (Canbera) 45000 360
U-2 21300 798
रॉकवेल (Rockwell) 108000 6620

          परम्परागत वायुयान के अतिरिक्त हैलीकॉप्टर, ड्रोनें (Drones), डाईरीजीबल (Dirigible) तथा सेलप्लेन (Sailplane) का उपयोग भी सुदूर संवेदन के लिये किया जाता है। टेलीविजन तथा फोटोग्राफी (कम ऊंचाई से) में इनका विशेष प्रयोग होता है।

वायु-आधारित सुदूर संवेदन प्रणली के यन्त्र

            भारत में वायुयान आधारित सुदूर संवेदन प्रणाली के निम्न यंत्र हैं जिनको सर्वहित सम्वन्धी उपयोगों में लाया जाता है।

(i) समुद्रीय रंगीन रेडियोमीटर (Ocean Colour Radiometer)

(ii) मॉड्लर बहु स्पेक्ट्रल क्रमवीक्षक (Modular Multispectural Scanner)

(iii) इसरो-एम. एस. एस. (ISRO MISS)

(iv) कैमरा (Camera)

कैमरा (Camera)-

          लघु आकार की फोटोग्राफी के लिये विभिन्न प्रकार के वायु कैमरे प्रयोग में लाये जाते हैं। विभिन्न ऊंचाइयों से प्राप्त वायव चित्रों को स्टीरियो मॉडल पर देखा जा सकता है। दृश्य प्रभाग (Visible) तथा अवरक्त (Infrared) स्पैक्ट्रम बैंड के अन्तर्गत विभिन्न फिल्टर तथा फिल्मों का उपयोग वायु फोटोग्राफी के लिये किया जाता है। अवरक्त (Infrared) श्याम और श्वेत रंग की फिल्में, रंगीन एवं श्याम श्वेत फोटोग्राफी के लिये की जाती है। इस प्रकार के फोटोचित्रों को देखकर विश्लेषण किया जा सकता है। वायु फोटोग्राफी के लिये निम्न प्रकार के कैमरों का उपयोग किया जाता है:-

(i) हैसलब्लेड- 70 मिलीमीटर फिल्म (श्याम व श्वेत एवं रंगीन)

(ii) निकोन, कैमरा इत्यादि- 35 मिलीमीटर फिल्म

(iii) मैट्रिक कैमरा- 9 इंच फिल्म (श्याम व श्वेत, रंगीन, अवरक्त इत्यादि)

हवाई सर्वेक्षण मिशन (Aerial Survey Mission):-

              यहाँ पर मिशन से अभिप्राय हवाई सर्वेक्षण कार्य को सम्पन्न कराने से है। आधुनिक वायुजन्मित संवेदक प्रणाली में उच्च भेदन के जी. पी. एस. रिसीवर लगे होते हैं तथा कुछ पर आई.एम.यू. (I.M.U.)। जी.पी.ए. का उपयोग नौकायन एवं संवेदक की स्थिति निर्धारण के लिये किया जाता है। सर्वेक्षण कार्य कैमरे के उदभासन स्टेशन के लिये तथा किसी आकृति के विम्ब की धरातल पर जानने लिये निर्देशांकों की आवश्यकता होती है। इस कार्य के लिये वायुयान के 30 किमी० के दाररे में जी.पी.एस. स्टेशन के सन्दर्भ की आवश्यकता होती है।

            IMU (Inertial Measuring Unit) के दो प्रमुख लाभ हैं-

(i) IMU द्वारा दी गई गणना का उपयोग, जी.पी.एस. द्वारा लिये गये निर्देशांकों में सुधार के लिये किया जा सकता है।

(ii) IMU संवेदक का कोण नापने में सहायक होता है।

          IMU पर घूर्णादर्शी (Gyro) तथा गति या वेग बढ़ाने वाला मीटर जुड़ा होता है। यह एक नाजुक, भारी तथा महंगा यंत्र है। इसे प्रत्यक्ष संवेदक दिगविन्यास (Direct Sensor Orientation) कहते हैं जिसके द्वारा संवेदक की स्थिति तथा रुख ज्ञात किया जा सकता है। GPS तथा IMU, निर्धारण स्थिति (Position) तथा दिगविन्यास प्रणाली के लिये अति आवश्यक हैं। इनके द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भूसन्दर्भित (Georeperencing) किया जा सकता है।

         प्रायः यह देखा गया है कि मिशन योजना (Mission Planning) तथा इसका सम्पादन किसी व्यापारिक सर्वेक्षण कम्पनी या वृहत राष्ट्रीय संस्था या सेना द्वारा किया जाता है।

वायु आधारित प्लेटफार्म के लाभ (Advantages of Aricraft Platforms)

             वायु आधारित प्लेटफार्म के निम्न लाभ हैं-

1. उच्च विभेदन (High Resolution):-

            वायुयान आधारित सर्वेक्षणों में प्राप्त विभेदन (Resolution) उपग्रहों से प्राप्त विभेदन की तुलना में अधिक होता है। स्थानीय विभेदन (Spatial Resolution) की दृष्टि से उच्च स्तरीय फोटोचित्रों की प्राप्ति होती है।

2. विभिन्न मापनियों के बिम्ब (Images of Different Scale):-

          चूँकि ऊँचाई पर वायुयान की उड़ान चालक अथवा प्रयोग करने वाले की इच्छा पर निर्भर है। इसलिये ऊँचाई के अनुसार अलग-अलग मापनियों पर आधारित वायुफोटो चित्रों को प्राप्त किया जा सकता है। विभेदन (Rsolution) की क्षमता के आधार पर इनका अलग-अलग उपयोग किया जाता है।

3. सूक्ष्म सर्वेक्षण (Micro Survey):-

             उच्च विभेदन (Resolution) तथा वृहत् मापनी (Large Scale) पर बने वायु फोटो चित्रों का सूक्ष्म तथा सामरिक सर्वेक्षणों में उपयोग किया जाता है। स्टीरियोमॉडल में देखने से इनकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। समस्या मूलक अध्ययनों, सूक्ष्म सर्वेक्षणों तथा क्षेत्रीय योजनाओं के लिये वृहत् मापनी पर बने फोटोग्राफ का उपयोग किया जाता है।

4. पुनरावृत उड़ानें (Repetitive Flights):-

                  पुनरावृत्ति उड़ानों के द्वारा दृश्य-क्षेत्र के अल्पकालीन परिवर्तिनों को समझने की सुविधा होती है।

5. दूर-दराज क्षेत्रों का सर्वेक्षण (Remote Arca Survey):-

                दूर-दराज के दुर्गम पर्वतीय, वन व मरुस्थलीय क्षेत्रों के सर्वेक्षण की सरलता पुनरावृत्तिक उड़ानों के द्वारा सम्पन्न की जाती है।

3. अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म (Space Based Plateform):-

                   अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म वायुमण्डल के प्रभाव से अछूते रहते हैं। इस प्रकार के प्लेटफार्म पृथ्वी के चारों ओर ध्रुवीय कक्ष में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं तथा एक निश्चित अन्तराल पर सम्पूर्ण पृथ्वी या पृथ्वी के किसी भाग को तय करते हैं। भूभाग को तय करना उपग्रह के मार्ग कक्ष पर निर्भर करता है। अन्तरिक्ष आधारित प्लेटफार्म के कारण ही हम असाधारण मात्रा से सुदूर संवेदन आँकड़ों को प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि सुदूर संवेदन अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बहुत लोकप्रिय हुआ है।

उपग्रह मिशन (Satellite Mission):-

             उपग्रह के संवेदक द्वारा नियमित रूप से रिकॉर्ड करने की क्षमता का निर्धारण गहन रूप में किया जाता है। यह उपग्रह परिक्रमा पथ (Orbit) के प्राचलों (Parameter) की विशेषताओं पर निर्भर करता है।

परिक्रमा पथ (Orbit):-

            जिस पथ से होकर उपग्रह पृथ्वी का चक्कर लगाता है उसे परिक्रमा पथ कहा जाता है। यह गोल या गोलाकार होता है। अलग-अलग उद्देश्यों के लिये अलग-अलग प्रकार के परिक्रमा पथ अपनाये जाते हैं। उद्देश्यों के आधार पर परिक्रमा पथ की विशेषतायें निम्न प्रकार से हैं-

(i) कक्षीय पथ की ऊँचाई (Orbital Attitude):-

             पृथ्वी के धरातल से उपग्रह के मध्य की दूरी (किमी०) को परिक्रमा पथ की ऊँचाई कहते हैं। पथ की ऊँचाई धरातल के दृश्य विस्तार (Coverage) एवं विभेदन (Resolution) को प्रभावित करता है। यदि उपग्रह पथ की ऊँचाई अधिक होगी तो धरातलीय विस्तार अधिक होगा लेकिन धरातलीय विभेदन कम होगा। इसके विपरीत कम ऊँचाई पथ पर धरातलीय विस्तार कम होगा लेकिन विभेदन (Resolution) अधिक होगा।

(ii) कक्षीय पथ का झुकाव कोण (Orbital Inclination Angle):-

            कक्षीय तल एवं भूमध्य रेखीय तल के मध्य के कोण को कक्षीय पथ का झुकाव कोण कहते हैं। झुकाव कोण, किसी आक्षांश रेखा पर संवेदक द्वारा देखे गये धरातलीय विस्तार (Field of View) को निर्धारित करता है। उदाहरण के लिये यदि उपग्रह पथ का झुकाव कोण 60° है तो यह पृथ्वी के धरातल पर 60° उ० तथा 60° द० के मध्य ही परिक्रमा करेगा। यदि कक्षीय पथ का कोण 60° से कम होगा तब यह धरातल के कम भाग को कवर करेगा। ध्रुवीय क्षेत्रों का अवलोकन इसके द्वारा नहीं हो सकेगा।

(iii) कक्षीय काल (Orbital Period):-

         कक्षीय काल से अभिप्राय यह है कि कोई उपग्रह पृथ्वी का एक चक्कर कितने समय में पूरा कर लेता है। उदाहरण के लिये यदि कोई ध्रुवकक्षीय उपग्रह 806 किमी० की ऊँचाई पर स्थिति है जो इसका कक्षीय भ्रमण काल 101 मिनट का होगा। चन्द्रमा का कक्षीय काल 27.3 दिन है। उपग्रह की गति का प्रभाव, प्राप्त की जा सकने वाली इमेज के प्रकारों पर परिलक्षित होता है।

(iv) पुनरावृत्ति चक्र (Repeat Cycle):-

          पुनरावृतिक चक्र दो क्रमिक काल के मध्य का समय है । पुनरावलोकन काल से अभिप्राय यह है कि एक ही स्थान की अलग-अलग दो दिनों में ली गई इमेज है। इसका निर्धारण उपग्रह संवेदक की Pointing Capability पर निर्भर करता है। Pointing क्षमता यह दर्शाता है कि कोई भी उपग्रह केवल नीचे के अलावा दाँये-बाँये, ऊपर-नीचे कितना घूम सकता है। आधुनिक उपग्रहों में इस प्रकार की क्षमतायें विकसित की गई हैं। यदि इस प्रकार की क्षमता उपग्रह संवेदक में हो तो पुनरावृत्ति काल कम-ज्यादा किया जा सकता है। 

कृत्रिम उपग्रह (Artificial Satellites):-

         अंतरिक्ष आधारित प्लेटफार्म के कृत्रिक उपग्रह सुदूर संवेदन का प्रमुख प्लेटफार्म है तो वायुमण्डल की दशाओं एवं भू-संसाधनों का ग्लोबीय स्तर पर लगातार प्रेक्षण एवं प्रबोधन (Monitor) करता है। पृथ्वी के गुरुत्वबल से बचने के लिये इन्हें 600 किमी० से अधिक ऊँचाई पर अलग-अलग कक्षों में निर्धारित किया जाता है। किसी उपग्रह की ऊँचाई, वेग तथा परिक्रमणकाल में परस्पर गहरा सम्बन्ध होता है तथा इन्हें उपग्रह छोड़ने से पूर्व निर्धारित किया जाता है। प्रत्येक उपग्रह का एक ग्रहपथ होता है जिसमें वह गति करता है। इसकी कक्षा (Orbit) पूर्व में ही निर्धारित की जाती है। सुदूर संवेदन मिशन में ग्रह पथ के आधार पर उपग्रहों के निम्नलिखित कक्षीय प्रकार प्रमुख है-

1. ध्रुव कक्षीय उपग्रह (Polar Orbit Satellite)

2. सूर्य तुल्यकालिक कक्षीय उपग्रह (Sun-syanchronous Orbit Satellite)

3. भू-स्थैतिक कक्षीय उपग्रह (Geostationary Orbit Satellite)

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न 1. प्लेटफार्म से क्या तात्पर्य है? इसके प्रकार की विवेचना करें।

(What do you mean by Platform? Discuss its types.)



Read More:

3. भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता / The Significance and Utility of Remote Sensing in Geography

3. भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता

(The Significance and Utility of Remote Sensing in Geography)


भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता⇒

                 भू-धरातलीय आंकड़ा अर्जित करना भू-अवलोकन का केन्द्रीय पहलू है। भू-अवलोकन का अभिप्राय है हमारे ग्रह (पृथ्वी) के भौतिक (Physical) रासायनिक (Chemical), जैविक (Biological) तथा ज्यामितिय (Geometrical) विशेषताओं के बारे में सूचनाओं को एकत्र करना। ये हमें प्राकृतिक (Natrual) तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के परिवर्तनों के स्तर एवं प्रबोधन (Monitor) या रिकार्ड करने में सहायता प्रदान करता है। इस प्रकार पृथ्वी अवलोकन के निम्नलिखित तीन उपयोग प्रमुख है:-

(i) मानचित्रण ( Mapping),

(ii) प्रबोधन (Monitoring) तथा

(iii) भविष्यवाणी (Forecasting)

           भू-अवलोकन हमें भू-धरातलीय आंकड़े प्रदान करता है। भूधरातलीय आंकड़े अर्जित करने को विकास चक्र का प्रथम बिन्दु के रूप में माना जा सकता है, जिसके अंतर्गत अवलोकन (Observing), विश्लेषण (Analysis), रूपरेखा (Designing) या योजना निर्माण (Planning), निर्माण (Contruction), विकास (Developing) इत्यादि को प्रमुखता से लिया जाता है। भू-धरातलीय आँकड़े सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व को निम्न रूप में देख सकते हैं-

(1) भू-सम्पत्ति सीमांकन (Land Record Demarcation):-

            एक भूमि प्रशासक जैसे की पटवारी, तहसीलदार, अमीन इत्यादि को राजस्व भूमि के अभिलेखों का रख-रखाव, भूमि सीमांकन भू-सम्पत्ति का निर्धारण इत्यादि की समय-समय पर सर्वेक्षण एवं अवलोकन की आवश्यकता होती है। भू-सम्पत्ति की सीमायें धरातलीय आकृतियों पर निर्भर करती हैं जिनको सर्वेक्षण एवं अवलोकन करके शुद्ध व दुरुस्त किया जाता है।

(2) सिविल इंजीनियरिंग कार्य (Civil Engineering Works):-

              सिविल इन्जीनियरिंग के क्षेत्र में सड़क, नहर, रेल लाइन, टेलीग्राफ लाइन, पावर लाइन, पावर हाउस, भवन निर्माण इत्यादि कई सिविल कार्यों के डिजाइन, दिगविन्यास तथा निर्धारण व समतलीकरण के लिये धरातलीय आकृति से संबंधित आंकड़ों की आवश्यकता होती है। इसके लिये निर्माण व्यय, मार्ग व्यय, इत्यादि खर्चों का आकलन धरातलीय उच्चावचन सर्वेक्षण व पुनः सर्वेक्षण के आधार पर किया जाता है। ऐसी स्थिति में धरातलीय सूचनाओं की अति शीघ्र आवश्यकता होती है।

(3) नगरीयकरण कार्य (Urbanization Works):-

               वर्तमान समय में नगरीकरण की प्रवृत्ति हमारे देश में तेजी से बढ़ रही है। नगरीय क्षेत्रों का अनियंत्रित विकास हो रहा है। एक नगर योजनाकार को नगरीय योजना (Planning) में अधिवास प्रतिरूपों, कार्यों, प्रकारों इत्यादि की पहचान की अति आवश्यकता होती है। विभिन्न कार्यों का निर्धारण करके नगर पालिकाओं व नगर निगमों का निर्धारण किया जाता है। आधारभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराने के लिए क्षेत्रों का चिन्हित कर योजनाओं की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार नगर योजनाकार पूर्ण योजना तैयार करने से पूर्व अतीत में घटित प्रभावों का प्रबोधन (Monitoring) करके नई योजना को मूर्त रूप देता है। इन सभी कार्यों में धरातलीय आंकड़ों की नितान्त आवश्यकता होती है।

(4) कृषि उत्पादन कार्य (Agricultural Production Works):-

            एक कृषि विज्ञानी (Agronomist) की कृषि फसलों के वितरण, क्षेत्र एवं उत्पादन में रुचि होती है जिससे वह भविष्यवाणी करता है। इसके लिये भूमि उपयोग के विभिन्न स्वरूपों का सर्वेक्षण एवं अवलोकन हेतु धरातलीय सूचनाओं की आवश्यकता है। इसी प्रकार मिट्टी के प्रकारों एवं वितरण को दर्शाने के लिये भी धरातलीय सर्वेक्षण की आवश्यकता होती है। मिट्टी के प्रकारों के अनुरूप फसलों के उत्पादन एवं वितरण के लिये कृषि वैज्ञानिकों को भू-आधारित अंकड़ों का प्रबोधन करना पड़ता है।

(5) वन संसाधनों का वितरण (Distribution of Forest Resourse):-

             किसी भी वनाधिकारी (Forester) को प्राकृतिक वनस्पति के वितरण एवं प्रकारों के उचित आकलन के लिये भू-धरातलीय आंकड़ों की नितान्त आवश्यकता महसूस की जाती है, जिससे वह प्रजाति क्रम से वन संसाधनों के आंकड़ों को प्रस्तुत कर वनीकरण एवं वन कटान की योजना तैयार करता है। इसी प्रकार वन विनाश, वनों में अग्नि, भूमि कटाव इत्यादि समस्याओं का भी आंकलन करने में भू-धरातल की सूचनाओं का उपयोग किया जाता है। भू आधारित सूचनाओं से सम्पूर्ण बायोमास का भी आकलन वन वैज्ञानिकों के द्वारा सरलता पूर्वक किया जाता है।

सुदूर संवेदन के महत्व

(6) पर्यावरणीय विश्लेषण (Enviromnental Analysis):-

             वर्तमान समय में कहीं भी पर्यावरण के नाम पर शोर मचाया जाता है। पर्यावरण विकास, संरक्षण एवं विनाश में  भू-धरातलीय सूचनायें अपना विशेष स्थान रखती हैं। इनका तीव्रगति से प्रबोधन की आवश्यकता महसूस की जाती है। ये आंकड़े हमें कहां से सरलता पूर्वक प्राप्त किये जा सकते हैं। यह हमारी आवश्यकता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य नये-नये आविष्कार कर विभिन्न माध्यमों से इनकी पूर्ति करता है।

        पर्यावरणविद हमेशा पर्यावरण प्रदूषण के प्रति चिन्तित रहते हैं। नगरों में नगरों के कूड़े डम्प करने के उपयुक्त स्थान का चयन, डम्प पदार्थों का आकार व प्रकारों के निर्धारण के लिए वायु, धूल, एवं अन्य प्रदूषणों का विचार करने के पश्चात् ही निर्धारण किया जाता है।

सुदूर संवेदन के महत्व

(7) जलवायु एवं मौसम की पूर्वानुमान (Climate and Weather Forecast):-

               जलवायु वैज्ञानिकों को जलवायु एवं मौसम संबंधी जानकारियों के लिये धरातलीय एवं वायुमण्डलीय सूचनाओं की अति आवश्यकता होती है। इसके लिए समुद्री तल के तापमान प्रतिरूप, समुद्रीय धाराओं का प्रतिरूप, हवा की दशा व गति तथा स्थलमण्डल एवं जलमण्डल के अंतर्क्रिया के प्रक्रियाओं के बारे में सूचनायें इत्यादि की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार बादलों की स्थिति, वर्षा, चक्रवात, तूफान, बादल फटना, बाढ़ इत्यादि की जानकार के लिए तथा मौसम संबंधी घटनाओं पर तुरन्त कार्यवाही करने के लिए आंकड़ों के प्रबोधन की आवश्यकता होती है, जिससे समस्याओं का अति शीघ्र निवारण किया जा सके। भू-धरातलीय आंकड़ों की उपलब्धता से उपरोक्त अध्ययनों का व्यावहारिक भी बनाया जाता है।

             उपरोक्त कुछ उदाहरण यह दर्शाते हैं कि हमारा भू-अवलोकन किसी लक्ष्य (Object), दृश्य (Scene) तथा घटना (Phenomena) में रुचि रखता है जो अलग-अलग घरातलीय विस्तार लिये होते हैं। इतना ही नहीं हम किसी लक्ष्य के अलग-अलग पहलुओं, विभिन्न स्तरों के विवरणों, विभिन्न अन्तरालों तथा विभिन्न पुनर्रावृतिक दरों में भी अपनी रुचि रखता हैं। इन्हीं आवश्यकताओं के अनुरूप हम भू-अवलोकन की विभिन्न विधियों एवं तकनीकियों का विस्तृत रूप से उपयोग करते हैं। उच्च-स्तरीय समस्याओं का समाधान भू-अवलोकन से प्राप्त आंकड़ों के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। किसी क्षेत्र के सतत आर्थिक विकास में भू-आधारित आंकड़े अपना विशेष स्थान रखते हैं।

         भू-अवलोकन में सुदूर संवेदन तकनीकि का विशेष महत्व है। जैसे कोई भूमि एवं जल प्रबन्धक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साक्षात्कार द्वारा या प्रतिचयन प्रयोगशाला में विश्लेषण द्वारा सूचनाओं को एकत्र करते हैं, उसी प्रकार भू-अवलोकन के अन्तर्गत किसी भू-सर्वेक्षण के लिये कैमरा एवं स्कैनर की सहायता से वायु सर्वेक्षण किया जाता है। इसी प्रकार विस्तृत दृश्य अवलोकन के लिये भू-संसाधन उपग्रह या किसी अन्य उपग्रह पथ आधारित अन्तरिक्ष प्लेटफार्म का उपयोग किया जाता है। मौसम पूर्वानुमान के लिये मिटियोरालाजिक उपग्रह का उपयोग किया जाता है क्योंकि उपग्रह अन्तरिक्ष में लगभग 36000 किमी० की दूरी से धरातलीय सूचनाओं को प्रदान करते हैं।

जी. आई. एस. के उपयोग (Application of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली को कई क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है जिसमें निम्नलिखित प्रमुख है:-

(i) कृषि विकास के क्षेत्र में (In the field of Agricultural Development)

(ii) धरातलीय मूल्यांकन के विश्लेषण के लिये (Land Evaluation Analysis)

(iii) वनस्पति क्षेत्रों के परिवर्तन पहचान के लिये (Change Detection of Vegetation Areas)

(iv) वन कटाव का विश्लेषण तथा उससे संबंधित पर्यावरणीय आपदा विश्लेषण (Analysis of Deforstation and Associated Environmental Hazards)

(v) प्राकृतिक वनस्पति के प्रबोधन के लिये (Monitoring Vegetation Health)

(vi) भूमि ह्रास के प्रबन्धन के लिये वनस्पति आवरण का मानचित्रण करना (Mapping Percentage Vegetation Cover for the Management of Land Degradation)

(vii) बेकार मृदा का मानचित्रण करना (Waste Land Mapping)

(viii) मृदा संसाधन का मानचित्रण करना (Soil Resource Mapping)

(ix) भूमिगत जल के संभावित मानचित्रण के लिये (Ground Water Potential Mapping)

(x) भूगर्भिक एवं खनिज विदोहन के लिए (Geological and Mineral Exploration)

(xi) पिघलते बर्फ के निस्तारण की भविष्यवाणी (Snow-melt runoff forecasting)

(xii) वनों की आग प्रबोधन (Forest fire Minitoring)

(xiii) समुद्रीय उत्पादकता इत्यादि का प्रबोधन (Monitoring of Ocean Productivity)

प्रश्न प्रारूप

प्रश्न  भूगोल में सुदूर संवेदन के महत्व एवं उपयोगिता का वर्णन करें।

(Describe the significance and utility of remote sensing in Geography.)



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