16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

(Difference between Raster and Vector Model)


रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर ⇒

            भौगोलिक सूचनाओं के प्रतिरूपण (Modeling) में धरातलीय आँकड़ा संरचना के लिए रास्टर तथा विक्टर विधियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक यह माना जाता था कि रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा सूचनायें एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा इसलिये समझा गया क्योंकि रास्टर विधि में संग्रहण तथा प्रतिविम्ब प्रक्रिया के लिये अत्यधिक कम्प्यूटर स्पेस तथा स्मृति की आवश्यकता होती थी जबकि विक्टर विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती थी।

         रास्टर विधि में कई धरातलीय विश्लेषण अति सरल होते हैं। आँकड़ों के परिचालन में इसमें कई प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होती हैं जैसे कि पोलीगन प्रतिच्छेदन या धरातलीय सामान्यीकरण से उत्पन्न समस्या इत्यादि। रास्टर विधि द्वारा निर्मित मानचित्र अच्छे व साफ नहीं होते हैं।

           इसके विपरीत विक्टर विधि में आँकड़ा आधार बहुत उत्तम तरीके से प्रबन्धित होता है। इसके द्वारा निर्मित मानचित्र अत्यधिक परिष्कृत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें धरातलीय विश्लेषण नितान्त कठिन होते हैं।

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल में अंतर

रास्टर आँकड़ा मॉडल

1. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक सरल (Simple) डाटा मॉडल है।

2. रास्टर मॉडल मुख्य रूप से बसाव स्थिति (Location) को केन्द्रित करता है। 

3. रास्टर आधारित जी.आई.एस. में उपग्रही सूचनाओं को सरलतापूर्वक कम्प्यूटर पर डाला जा सकता है।

4. रास्टर मॉडल धरातलीय शुद्धता को कम करता है। इसका अर्थ है कि रास्टर मॉडल अत्यन्त सामान्यीकरण दृश्य को प्रस्तुत करता।

5. रास्टर मॉडल आकृतियों एवं धरातल के मध्य Gradual Transition दर्शाता है। उदाहरण के लिये उच्चावन्वन के साथ मिट्टियों का वर्गीकरण।

6. रास्टर मॉडल बसाव स्थिति को कार्टेशन निर्देशांक प्रणाली में प्रदर्शित करता है।

7. रास्टर मॉडल में आँकड़ों को पंक्ति एवं कालम में संग्रह किया जाता है। लेकिन टोपोलोजीकल प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है।

8. इसमें प्रत्येक तत्व एक लक्ष्य (Object) के रूप में प्रदर्शित करता है।

9. रास्टर मॉडल में क्षेत्र या दूरियों की माप करना सरल होता है परन्तु किसी चर की माप करना अत्यन्त कठिन होता है।

10. रास्टर आँकड़ा मॉडल किसी प्रश्न का उत्तर आसानी से देता है जैसे कि भौगोलिक आकृति की बसाव स्थिति क्या है?

11. रास्टर मॉडल अत्यन्त जगह घेरता है, इसलिए आँकड़ों को सघन करके प्रयोग किया जाता है।

12. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक विक्टर की तुलना में तीव्र है।

13. रास्टर मॉडल का उपयोग धरातलीय विश्लेषण में बहुतायत में किया जाता है।

रास्टर एवं विक्टर मॉडल

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल

विक्टर आँकड़ा मॉडल

1. विक्टर मॉडल अत्यधिक जटिल आँकड़ा संरचनायुक्त मॉडल है।

2. विक्टर मॉडल भौगोलिक आकृतियों (Features) को केन्द्रित करता है?

3. विक्टर मॉडल में उपग्रह से उपलब्ध आँकड़ों को सरलता से कम्प्यूटर पर नहीं डाला जा सकता है।

4. विक्टर मॉडल किसी वस्तु या लक्ष्य की आकृति को अति शुद्धता से प्रदर्शित करता है।

5. विक्टर मॉडल में किसी वस्तु आकृति की सीमाओं को अति शुद्धता के साथ दर्शाया जाता है।

6. विक्टर मॉडल में बसाव स्थितियों को ‘x’ एवं ‘y’ निर्देशांकों प्रणाली की सहायता से दर्शाया जाता है।

7. इसमें टोपोलाजीकल प्रक्रिया अपनाई जाती है।

8. वास्तविक सांसारिक घटनाओं को जिनकी एक विशिष्ट बसाव स्थिति होती है को स्थैतिक बिन्दु, रेखा, सीमाओं एवं घिरे हुये क्षेत्र का शुद्ध अवलोकन करता है। अधिकतर लक्ष्यों के लिए विक्टर मॉडल अत्यधिक उपयुक्त है।

9. किसी भी क्षेत्र की दूरी एवं क्षेत्रफल ज्ञात करना आसान होता है।

10. विक्टर मॉडल में किसी भौगोलिक आकृति के बारे में क्या करना है। इस प्रकार के प्रश्नों का स्वयं हल निकाल लेता है।

11. विक्टर मॉडल में धरातलीय आँकड़ों के संग्रह के लिये अत्यन्त कम स्थान होता है।

12. विक्टर मॉडल तीव्रता के साथ शुद्धता को भी दर्शाता है।

13. विक्टर मॉडल का उपयोग अति उच्च श्रेणी के कार्टोग्राफी प्रदर्शन के लिए किया है जिसमें शुद्धता एवं स्पष्टता महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में क्या अंतर है?

(What is difference between Raster and Vector model.)



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अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज


अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुने।

1. इनमें रूपांतरित चट्टान कौन है?

(क) बेसाल्ट

(ख) चूना पत्थर

(ग) संगमरमर

(घ) ग्रेनाइट

उत्तर- (ग) संगमरमर

2. बेसाल्ट किस प्रकार की चट्टान है?

(क) अवसादी

(ख) आग्नेय

(ग) कायांतरित 

(घ) परतदार

उत्तर- (ख) आग्नेय

3. चट्टानों के रूपान्तरण में किसका योगदान होता है?

(क) तापमान

(ख) दबाव

(ग) रासायनिक द्रव्य

(घ) उपर्युक्त सभी 

उत्तर- (घ) उपर्युक्त सभी

ii. खाली जगहों को भरिए:

(क) जो चट्टान ज्वालामुखी से निकले लावा के ठंडा होने से बनती हैं वे आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं।

(ख) जिन चट्टानों में परत पायी जाती है उन्हें परतदार चट्टानें कहते है।

(ग) ज्वालामुखी से निकला गर्म पदार्थ लावा कहलाता है।

(घ) अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण चट्टानों के लक्षण बदल जाते हैं।

iii. सही मिलान कर लिखिए।

                     उत्तर

1. सेंधा नमक– अवसादी चट्टान

2. ग्रेनाइट– आग्नेय चट्टान

3. संगमरमर– रूपान्तरित चट्टान

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए?

(क) अपने घर में खनिज से बनी हुई चीजों की सूची बनाइए।
उत्तर- तराजू के पलड़े, आभूषण, सायकिल, हल का फाल, खुरपी, हसिया, पहँसुल, लालटेन।

(ख) छत की ढलाई में कौन-सा पत्थर इस्तेमाल होता है?
उत्तर- छत की ढलाई में पहाड़ों से काटकर निकाले गए पत्थरों को टुकड़े बना कर जिसे गिट्टी कहा जाता है, इस्तेमाल होता है। इन पत्थरों का रंग भूरा-स्लेटी होती है। ये आग्नेय चट्टान के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

(ग) उन खेलों की सूची बनाइए, जिनमें पत्थरों का इस्तेमाल होता हो।
उत्तर- पत्थरों से खेलने जाने वाले कोई अधिक खेल नहीं है। हाँ, ग्रामीण क्षेत्र के बीच पत्थर के टुकड़ों से एकट-दोकट तथा सरगोटिया खेलते हैं।

(घ) पत्थरों का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? सूची बनाइए।
उत्तर- पत्थरों का उपयोग पहले घर, महल, कोठी और किला बनाने में होता था। वाराणसी के प्राय: सभी प्राचीन भवन पत्थर के ही बने हैं। आज भी झारखंड में पत्थरों का उपयोग घर तथा चहार-दीवारी बनाने में होता है ‘वैसे आम तौर पर सड़क बनाने, मकानों की छत बनाने तथा फर्श को पक्का करने के लिए विभिन्न आकारों के पत्थरों का उपयोग होता है।

(ड़) पता करके लिखिए कि निम्न भवन किन-किन पत्थरों से बना है- 

⇒ रोहतास गढ़ का किला- बलुआ पत्थर

⇒ लाल किला (दिल्ली)- लाल बलुआ पत्थर

⇒ पत्थर की मस्जिद (पटना)- बलुआ पत्थर

⇒ विष्णुपद मन्दिर (गया)- काला बलुआ पत्थर

⇒ आगरा का किला- लाल बलुआ पत्थर

⇒ कुतुबमीनार (दिल्ली)- बलुआ पत्थर

⇒ विशला बुद्ध मूर्ति (गया)- काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

लाल बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

बलुआ पत्थर से निर्मित मूर्ति

(च) चट्टानों के प्रकार और उनकी बनावट के बारे में लिखिए।
उत्तर- चट्टानें मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं-

1. आग्नेय चट्टान

2. अवसादी चट्टान तथा

3. रूपांतरित चट्टान।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्दर जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।

अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

रूपांतरित चट्टान- कभी-कभी आग्नेय या परतदार चट्टानों में ताप और दाब की वृद्धि होती है तो इनके रूप और गुण दोनों में बदलाव आ जाता है। रूप में अंतर के कारण ही इन्हें रूपांतरित चट्टान कहते हैं। चूना-पत्थर अपना रूप बदलकर संगमरमर में बदल जाता है। इसी प्रकार ग्रेनाइट रूपांतरित होकर नाइस बन जाता है।

(छ) चट्टान किसे कहते है? उदहारण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – पृथ्वी की पर्पटी बनाने वाले खनिज पदार्थ के किसी भी प्राकृतिक पिंड को चट्टान या शैल करते हैं। शैल विभिन्न रंग, आकार एवं गठन की हो सकती है।

जैसे- आग्नेय चट्टान- ग्रेनाइट और बेसाल्ट।

अवसादी चट्टान- चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर।

रूपांतरित चट्टान- संगमरमर, नाइस।

(ज) चट्टानों का रूपांतरण कैसे होता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- किसी निश्चित दशाओं में एक प्रकार की शैल चक्रीय तरीके से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार एक शैल से दूसरे शैल में परिवर्तित होने की इस प्रक्रिया को शैल चक्र कहा जाता है।

              द्रवित मैग्मा ठंडा होकर ठोस आग्नेय शैल बन जाता हैं। ये आग्नेय चट्टान/शैल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होकर अवसादी चट्टान/शैल का निर्माण करते हैं। अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण ये आग्नेय एवं अवसादी शैल पुनः कायांतरित चट्टान/शैल में बदल जाते हैं। पुनः अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण कायांतरित शैल पिघलकर द्रवित मैग्मा बन जाता है। यह द्रवित मैग्मा पुनः ठंडा होकर आग्नेय चट्टान/शैल में परिवर्तित हो जाता है।

(झ) अवसादी चट्टान तथा आग्नेय चट्टानों में अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्दर जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।


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अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

i. सही विकल्प को चुनें।

1. निफे में होता है-

(क) सिलिका

(ख) मैग्नेशियम

(ग) लोहा

(घ) सोना

उत्तर- (ग) लोहा

2. भू-पर्पटी में ऊपरी हिस्सा कहलाता है-

(क) सियाल

(ख) सीमा

(ग) परत

(घ) मेंटल

उत्तर- (क) सियाल

3. क्रोड है।

(क) पृथ्वी की ऊपरी परत

(ख) पृथ्वी की निचली परत

(ग) खनिज तेल

(घ) ठोस पदार्थ

उत्तर- (ख) पृथ्वी की निचली परत

ii. खाली जगहों को भरिए।

1. भू-पर्पटी को सियाल/भू-पटल भी कहा जाता है।

2. पृथ्वी के अन्दर प्रति 32 मीटर की गहारई पर तापमान 1°C  बढ़ जाता है।

3. पृथ्वी के बीच की परत को सीमा/मेंटल कहा जाता है।

iii. मिलान कीजिए:

                          उत्तर-

1. भू-पर्पटी– खनिज पदार्थ

2. सीमा– सिलिका और मैग्नेशियम

3. सियाल– सिलिका और एल्यूमिनियम

4. निफे– पदार्थ की गाढ़ी अवस्था

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. पृथ्वी की तीनों परतों के नाम लिखिए।
उत्तर- पृथ्वी की तीनों परतों के नाम निम्नलिखित हैं:

(क) भूपर्पटी (Sial)

(ख) मेंटल (Sima) तथा

(ग) क्रोड (Nife)

2. पृथ्वी की कौन-सी परत पिघली अवस्था में रहती है? और क्यों?

उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत अर्थात क्रोड पिघली अवस्था में रहती है। इसकी पिघली अवस्था में रहने का कारण है कि यहाँ अत्यधिक ताप तथा भारी दाब रहता है। अत्यधिक ताप तथा भारी दाब के कारण इस भाग में पाई जाने वाली वस्तुएँ (निकेल तथा लोहा) पिघल जाती हैं और तरल अवस्था में बहती रहती है।

3. पृथ्वी की सबसे निचली परत में कौन-से तत्व अधिकता में पाये जाते हैं?

उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत में निकेल (Ni) तथा लोहा (Fe) तत्व अधिकता में पाये जाते हैं। लेकिन ये तत्व वहाँ ठोस अवस्था में नहीं, बल्कि तरल अवस्था में बहते रहते हैं। यह अवस्था पृथ्वी के अन्दर का ताप तथा भारी दाब के कारण हैं।

4. पाठ के आधार पर बताइए कि पृथ्वी को रत्नगर्भा क्यों कहा जाता है?

उत्तर- पृथ्वी को रत्नगर्भा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके अन्दर सोना से लेकर कोयला तथा हीरा तक बहुमूल्य खनिज पाये जाते हैं। पृथ्वी के गर्भ में खनिज तेल (किरासन, पेट्रोल, रसोई गैस), चाँदी, ताँबा, जस्ता लोहा आदि जितने बहुमूल्य खनिज हैं सब पृथ्वी के अन्दर से ही निकलते हैं। यहाँ तक कि हमारे पीने का पानी भी पृथ्वी में से या पर से ही मिलता है। इसी कारण से पृथ्वी को रत्नगर्भा कहा जाता है।

5. पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी क्यों महसूस होती है?

उत्तर- पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी इसलिये महसूस होती है क्योंकि वहाँ अत्यधिक दाब रहता है। जैसे-जैसे पृथ्वी की गहराई में जाते हैं, वैसे-वैसे दाब बढ़ता जाता है। इसी दाब के कारण ताप बढ़ता जाता है और हमें गर्मी महसूस होती है।



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13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS)


भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्य (Objectives of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. योजना तथा निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाना।

2. आंकड़ों के वितरण तथा संचालन के लिए सफल साधनों की पूर्ति करना।

 3. आँकड़ा भण्डार से अनावश्यक आंकड़ों को हटाना तथा पुनरावृत्ति को करना।

4. विभिन्न स्रोतों से एकत्रित सूचनाओं को संगठित करने की क्षमता रखना।

5. अति जटिल विश्लेषण करना।

6. भौगोलिक आँकड़ों के जटिल विश्लेषणों से नई-नई सूचनाओं करना।

              जब किसी भी योजना में भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाता है तो यह हमें निम्नलिखित जातीय प्रश्नों का उत्तर देता है।

बसाव स्थिति (Location):-

          कोई भी स्थान या वस्तु कहाँ स्थित है इसका जी.आई.एस. के विश्लेषण से आसानी से प्राप्त हो जाता है। चूंकि जी.आई.एस. में उपयोग किये गये आँकड़े भौगोलिक रूप से संदर्भित होते है इसलिए किसी भी लक्ष्य की उपयुक्त बसाव स्थिति का ज्ञान इसके द्वारा किया जा सकता है। यदि कहीं पर भी यह जानना चाहे कि यहाँ क्या है तो इसका भी उत्तर शीघ्र एवं सरलता से जी.आई.एस. से प्राप्त हो जाता है।

दशा (Condition):-

         दशा से अभिप्राय यह है कि कोई वस्तु कहीं पर किन कारणों से तथा किन दशाओं में स्थित है। यहाँ पर कार्य एवं कारण का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। किसी भी लक्ष्य या वस्तु के बसाव की स्थिति की पहचान जी.आई.एस. प्रक्रिया से की जा सकती है।

प्रवृत्ति (Trend):-

           प्रवृत्ति का अर्थ है चरों का परिवर्तन। कोई भी मानचित्र तत्व घटते हुए क्रम में है या बढ़ते हुए क्रम में, इसको पुष्टि जी.आई.एस. आसानी से देता है। यहाँ तक कि क्या परिवर्तन हो रहा है इसका भी उत्तर प्राप्त हो जाता है। कोई भी चर निम्न रूपों में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं-

(i) आकार में वृद्धि (Increase Size)

(ii) आकार में कमी तथा स्थान में परिवर्तन (Decreased size and changged position)

(iii) आकृति परिवर्तन (Change Shape)

प्रतिरूप (Pattern):-

           जी.आई.एस. के कार्यों में धरातलीय प्रतिरूप तथा अंतरसम्बन्ध महत्वपूर्ण विशेषतायें हैं। सभी मानचित्र आकृतियों में विभिन्न प्रकार के धरातलीय सम्बन्ध होते हैं। इनमें से कुछ सम्बन्धों को आँखों से आसनी से देखा जा सकता है जबकि अन्य को जानने के लिए जी.आई.एस. की आवश्यकता होती है। यहाँ समझने के लिए तीन प्रकार के सम्बन्धों को समझाया गया है-

(i) क्या किसी X आकृति में कोई प्रतिरूप है? आकृति X कुछ भी हो सकती है जैसे कि भूमि उपयोग, वनस्पति प्रकार, आवासीय विस्तार आदि। किसी साधारण मानचित्र में इनका प्रतिरूप देखा जा सकता है।

(ii) क्या X एवं Y में कोई सम्बन्ध है? हमारी आँखों यह बताने में सक्षम होती हैं कि X व Y में निकट का सम्बन्ध है या Y, X के अति निकट है। यह भी हो सकता है कि एक X से दूसरे X में Y की स्थिति में परिवर्तन एक प्रतिरूप में होता है। इन धरातलीय सम्बन्धों को समझने के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्यात्मक साहचर्य (Functional Association) को जानना अति आवश्यक है। उदाहरण के लिए यदि X व Y हमेशा साथ है तो इसका अर्थ है कि इनकी निकटता का कोई महत्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार की जानकारियों का ज्ञान जी.आई.एस. में ढूँढा जा सकता है।

(iii) क्या अन्य धरातलीय अथवा कार्यात्मक प्रतिरूप भी अस्तित्व में है? माना कोई Z प्रकार की आकृति सीमाओं की ओर स्थित है तथा पश्चिम से पूर्व की ओर आकार में बहती है। इसका बसाव प्रतिरूप टेढ़ा-मेढ़ा है। इसका कोई कार्यात्मक कारण होता है। जी.आई.एस. इसका उत्तर ढूंढ़ने में सहायता करता है।

मॉडलिंग (Modeling):-

         ‘मॉडल’ संसार तथा इसकी प्रक्रियाओं का प्रदर्शित रुपान्तरण है। मॉडल किसी सामान्य कथन बनाने के लिए आँकड़ों या विश्लेषण का सारांश प्रस्तुत करता है। ये मॉडल ऑकड़ों के कालोहाल को कम करने तथा सामान्यीकरण को बनाने में सहायता करते हैं। आज उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार के नवीन विश्लेषण को मॉडलिंग कहते हैं।

          यहाँ पर प्रश्न किया जा सकता है कि जी.आई.एस. में ऐसा क्या है जिससे यह तकनीक अत्यधिक प्रचलित हो रही है। इसका उत्तर सक्षिप्त में इस प्रकार दिया जा सकता है।

जी.आई.एस. के विशिष्ट तथ्य

                        ⇓⇓⇓⇓

⇒ सूचनाओं की पुनर्प्राप्ति (Retrevel of Information)

⇒ टोपोलोजिकल मॉडल (Topological Model)

⇒ नेटवर्क (Network)

⇒ अंशछादन(Overlay)

⇒ आँकड़ों का निर्गमन (Data Output)  

जी.आई.एस. कैसे कार्य करता है?

(How does GIS work?)

               यहाँ पर संक्षेप में उन बिन्दुओं को उद्धरित किया गया है जिनके अंतर्गत जी.आई.एस. कार्य करता है:-

1. विभिन्न स्रोतों से सूचनाओं को सम्बद्ध करना। 

2. आँकड़ों का अभिग्रहण (Capture) करना

3. ऑकड़ों को एकीकृत (Integration) करना

4. प्रक्षेपण तथा पंजीकरण (Projection and Registration) करना

5. आँकड़ों को ढाँचा (Data Structure) तैयार करना।

आँकड़ों का विश्लेषण (Data Analysis)

            इसके अंतर्गत मुख्यतः निम्न प्रकार से आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है:-

1. साधारण जाँच (Simple Query)

2. विशेष जाँच (Spacial Query)

3. एक परतीय संचालन (Single Layer Operation)

4. जोनिंग करना (Zoning)

         यहाँ जाँच शब्द से अभिप्राय है पूछताछ करना। इस प्रणाली में हम पूछताछ के माध्यम से सूचनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। विशेष पूछताछ निम्न प्रकार से की जाती है-

1. बहुपरतीय संचालन (Multi Layer Operation)

2. विशेष मॉडलिंग (Spacial Modeling)

3. धरातलीय विश्लेषण (Surfacial Analysis)

4. जाल विश्लेषण (Network Analysis)

5. बिन्दु प्रतिरूप विश्लेषण (Point Partem Analysis)

6. ग्रिड विश्लेषण (Grid Analysis)

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्व (Elements or Components of GIS):-

             जी.आई.एस. के प्रमुख तत्वों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:-

1. हार्डवेयर (Hardware)

2. सॉफ्टवेयर (Software)

3. आँकड़े (Data)

4. लाइफवेयर (Lifewate)

5. साँचागत संगठन (Infrastructural Organisation)

भौगोलिक सूचना प्रणाली

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्त्व

प्रश्न प्रारूप

Q. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना करें।

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS.)



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12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

(The Concept and Approaches of GIS)


जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम⇒

      जी.आई.एस. की प्रमुख संकल्पनायें इस प्रकार हैं:-

सी.पी.लो. एवं बलबर्ट के. (2005) ने जी.आई.एस. के निम्नलिखित संकल्पनायें एवं तकनीकी प्रस्तुत की हैं-

(i) आँकड़ों को उपार्जित एवं मॉडलिंग करना (Data Acquisition and Modeling)

(ii) भू-सन्दर्भित करना (Georeferencing)

(iii) आँकड़ा स्तर (Data Standard)

(iv) आँकड़ों का प्रक्रियन एवं विश्लेषण करना ( Data Processing / Analysis)

(v) कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर (Computer Hardware and Software)

(vi) व्यवहारिक उपयोग (Application)

(vii) जी.आई.एस. प्रणाली का विकास (G.I.S. System Development)

(viii) समस्या एवं समाधान (Problem and Solution)

             इसी प्रकार कई अन्य लेखकों ने जी.आई.एस. की संकल्पनायें निम्नलिखित रूप से दी है-

(i) आँकड़ा प्राप्त करना एवं उनको प्रस्तुत करना (Data Capture and Presentation

(ii) आँकड़ा प्रबन्धन जिसके अन्तर्गत संग्रहण एवं रख-रखाव सम्मिलित है। (Data Management)

(iii) आँकड़ों का विश्लेषण एवं परिचालन करना ( Data Analysis and Manipulation)

(iv) आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण (Data Presentation)

(v) मॉडलिंग करना (Modeling)

            कुछ अन्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. स्थान एवं घटना विशेष की संकल्पना:-

           जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि जी.आई.एस. भौगोलिक सूचनाओं को कम्प्यूटर पर एकीकृत करता है। प्रश्न उठता है कि ये भौगोलिक घटनायें कहाँ घटित हुई हैं? इनका धरातलीय प्रतिरूप किस प्रकार प्रतीत होता है? स्थान विशेष की संकल्पना इससे सम्बन्धित है। भूगोल एक वितरण का विज्ञान है। सूचनाओं व घटनाओं का घरातलीय वितरण प्रतिरूप प्रदर्शन करने में जी.आई.एस. सबसे अधिक उपयोगी तकनीक है। किसी वस्तु अथवा घटना का धरातलीय वितरण मानचित्र के द्वारा, जी.आई.एस. के अंतर्गत सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

2. मानचित्र बाहुलता (Map Quantities)

3. घनत्व विश्लेषण (Density Analysis)

4. सूचना से सूचना संकल्पना (Concept of Data in Data)

5. सहसम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Relationship)

6. परिवर्तनशीलता की संकल्पना (Concept of Change)

7. प्रतिरूपों की संकल्पना (Concept of Pattern)

8. प्रवृत्तियों की संकल्पना (Concept of Trend)

जी.आई.एस. के भौगोलिक उपागम

(Geographical Approach of GIS)

            भूगोल एक सांसारिक विज्ञान है तथा जी.आई.एस. एक सांसारिक विज्ञान के विश्लेषण की आधुनिकतम तकनीकी है। भूगोल एवं जी.आई.एस. दोनों ही पृथ्वी के धरातल की सूचनाओं के सम्बन्ध में उपयुक्त समझ उत्पन्न करते हैं। भौगोलिक ज्ञान का उपयोग मानव क्रियाकलापों को संचालित करने में सहायक होते हैं। यहीं से भौगोलिक उपागम का आरम्भ होता है। यहाँ भौगोलिक उपागम का आशय किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक नये तरीके की सोच विकसित करना है जो भौगोलिक सूचनाओं को एकीकृत एवं संगठित करती है जिससे पृथ्वी जैसे ग्रह के बारे में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके।

            भौगोलिक उपागम भौगोलिक ज्ञान को जागृत (Create) कर हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है। पृथ्वी का मापन (Measurement of Earth), आँकड़ों या सूचनाओं का व्यवस्थीकरण एवं विश्लेषण, विभिन्न प्रक्रियाओं का मॉडलिंग, अवयवों (Elements) में आपसी सम्बन्ध इत्यादि भौगोलिक ज्ञान के प्रमुख बिन्दु हैं जिनका अध्ययन भौगोलिक विश्लेषण के अंतर्गत कया जाता है। इतना ही नहीं भौगोलिक उपागम की विधियों हमें यह भी अनुमति प्रदान करती है कि किस प्रकार सांसारिक घटनाओं का डिजाइन योजनाबद्ध किया जा सकता है। भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण

(Steps of Geographical Approach)

1. Step 1- प्रश्न करना (Ask)

2. Step 2- उपार्जन करना (Acquire)

3. Step 3- परीक्षण करना (Examine)

4. Step 4- विश्लेषण करना (Analysis)

5. Step 5- कार्यान्वयन (Action)

Step 1 प्रश्न करना (Ask):-

              किसी भी भौगोलिक समस्या को उजागर करने से पूर्व प्रश्न उठता है कि जिस समस्या के समाधान या विश्लेषण किया जाना है या किया जा रहा है वह समस्या क्या है तथा वह भौगोलिक दृष्टि से कहाँ स्थित है? इस प्रकार के प्रश्न करने से सम्भवतः उसके उत्तर प्राप्त करने में सहायता मिल सके। यह भौगोलिक उपागम का प्रमुख कदम है। समस्या के बसाव स्थिति के अनुरूप विश्लेषण विधियों की रूपरेखा तैयार की जाती है।

Step 2-उपार्जन करना (Acquire):-

               समस्या या घटना के स्पष्टीकरण के पश्चात उसे सम्बन्धित उपयुक्त सूचनाओं की सूची निर्धारित की जाती है जिनकी विश्लेषणकर्ता को नितान्त आवश्यकता होती है। यह भी निश्चित किया जाता है कि अमुक सूचना प्राप्त की जा सकती है या जी.आई.एस. के अंतर्गत तैयार की जा सकती है। वास्तव में आंकड़ों के प्रकार एवं उनका भौगोलिक महत्त्व किसी समस्या के मूल में पहुँचने की कला व विधियों को भी स्पष्ट करने में सहायता करते हैं। यदि अध्ययन की विश्लेषण विधियाँ उच्च स्तर की हों तो वे समस्या के निदान में प्रयोग किये जाने वाले आंकड़ों की प्राप्ति में भी सहायक होते है।

             उत्कृष्ट अध्ययन विधियों के उपयोग के लिए आवश्यक है कि नये प्रकार के आकड़ों को उत्पन्न किया जाय। नये प्रकार की सूचनाओं को सूचीबद्ध करने के लिए भौगोलिक धरातलीय (Spatial) तथा अधरातलीय (Aspatial or Attribute) सूचनाओं की आवश्यकता होती है। इन सूचनाओं एवं आँकड़ों को तालिकाओं, नये प्रकार के मानचित्रों की परतों इत्यादि तरीकों से जीआईएस द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

Step3-परीक्षण करना (Examine):-

              आँकड़ों की प्राप्ति के पश्चात् अगला कदम है कि सूचनाओं या आँकड़े की उत्तमता को परखना। यह प्रयास किया जाता है कि प्राप्त किये गये आँकड़े हमारे अध्ययन के लिए अनुकूल है या नहीं। यदि उपयुक्त है तो उन्हें किस रूप में उपयोग किया जा सकता है।

           परीक्षण के अंतर्गत प्रत्यक्ष निरीक्षण, अन्वेषण (संगठित करने के तरीके), एक आँकड़ा सेट से दूसरे आँकड़ा सेट से सम्बन्ध, आँकड़ों को व्यवस्थित करने के विज्ञान के नियम (Topology) तथा आँकड़ों के प्राप्ति का स्रोत (Meta Data) इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

            कहने का अर्थ यह है कि सभी प्रकार के आँकड़ों की पुष्टि होने के पश्चात् उन्हें अध्ययन के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है।

Step 4- विश्लेषण करना (Analysis):-

              जीआईएस का अगला कदम, आँकड़ों अथवा सूचनाओं का परीक्षण या विश्लेषण की विधियों के आधार पर प्रक्रियन (Process) तथा व्याख्या (Analysis) करना होता है। परिणामों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है तथा परिणामों को देखकर यह तय किया जाता है कि सूचनायें जिनका प्रयोग किया गया है उपयोगी या वैधानिक है या नहीं। विभिन्न अवयवों (Parameters) के विश्लेषण करने में उपयोग की गई विधियाँ कितनी कारगर सिद्ध हुई हैं?

            इस प्रकार जी.आई.एस. मॉडलिंग की जाती है जिसके माध्यम से परिणामों के परिवर्तन सरल, शुद्ध एवं आसान बनाया जाता है, जो नये परिणाम प्रस्तुत करने में सहायक होते है कि रास्टर एवं विक्टर ऑकड़ा मॉडल इसी कदम के प्रतिफल हैं।

Step 5 कार्यान्वयन (Action):-

             भौगोलिक उपागम के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परिणामों का प्रस्तुतीकरण एवं कार्यान्वयन करना होता है। किसी भी समस्या के परिणामों की रिपोर्ट, मानचित्रों, तालिकाओं, चारों या इन्टरनेट या वेब अथवा अन्य मुद्रित माध्यमों से प्रयोगकर्ताओं के मध्य आदान-प्रदान की जा सकती हैं। किसी भी विश्लेषण के परिणामों की प्रस्तुतीकरण के उपयुक्त साधनों की नितान्त आवश्यकता होती है। यह देखा आता है कि कौन विधि परिणामों को उपयोगकर्ता तक पहुँचाने में अति सहयोगी हो सकती है। इसके लिए सभी तरह के Audio Visual विद्युतीकरण यंत्रों से समस्या के परिणामों को आंशिक एवं पूर्ण रूप से प्रस्तुत कर उस पर कार्यान्वयन किया जाता है। कार्यान्वयन करना तथा उपयोगकर्ता द्वारा परिणामों को उपयोग में लाना ही भौगोलिक उपागम की महत्वपूर्ण कड़ी है। परिणामों के द्वारा समस्या के निदान करना ही किसी योजना की सफलता मानी जाती है।

जी. आई. एस. की संकल्पना

            उपरोक्त परिभाषायें भौगोलिक सूचना प्रणाली के विषय वस्तु तथा क्रियाकलापों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। कभी-कभी इसे धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System) भी कहते हैं जो किसी भी स्थान विशेष पर स्थित आँकड़ों का संचालन करती है। इसी प्रकार का शब्द ‘अधरातलीय आँकड़ा’ (Aspatial Data) है। इसकी भी समान्तर रूप से लाक्षणिक आँकड़ों (Attribute Data) के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए वर्षा, तापमान, मिट्टी के रासायनिक गुण, जनसंख्या आँकड़ा इत्यादि। यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि धरातलीय आँकड़ों के संचालन के लिए कई प्रकार के तकनीक शब्द प्रयोग किये जाते हैं जिनमें कुछ इस प्रकार हैं-

(a) भू-सूचना प्रणाली (Geo-Information System-GIS)

(b) धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System-SIS)

(c) भूमि सूचना प्रणाली (Land Information System-LIS)

(d) बहु-उद्देशीय भू-आधारित प्रणाली (Multi-Purpose Cadastre-MPC)

       अंत में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “भौगोलिक सूचना प्रणाली एक कम्प्यूटर सहायता प्राप्त तंत्र है जो भौगोलिक संसार के विभिन्न पहलुओं से संबंधित आँकड़ों को एकत्र, संग्रह, विश्लेषण, परिचालन, प्रस्तुतीकरण तथा पुनर्प्रसारण करता है। यह किसी निर्णय पर पहुँचने का शक्तिशाली साधन या प्रणाली है।”

प्रश्न प्रारूप

Q. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम की विवेचना को

(Discuss the Concept and approaches of GIS.)



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