22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त




मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

मेकिण्डर

            1861 में जन्में मेकिण्डर ने ग्रेट ब्रिटेन में भूगोल की सुदृढ़ स्थापना की और अपने भौगोलिक विचारों से विश्व भूगोल को प्रभावित किया।

       मेकिण्डर अपने समय के बड़े प्रभावशाली भूगोलवेत्ता रहे हैं जिनका भूगोल एवं राजनीति में पूरा-पूरा दखल था। इस तरह भूगोल के व्यावहारिक पक्ष को क्रियान्वित करने में इनकी प्रमुख भूमिका रही है। इन्होंने न केवल विश्व मंच की घटनाओं के संचालन में भूगोल के ज्ञान की सार्थकता सिद्ध की वरन् यह भी उदाहरण प्रस्तुत किया कि कैसे भूगोलवेत्ता संसार की समस्याओं को सुलझाने में व्यावहारिक योगदान दे सकता है।

       इन्होंने भूगोल को इतिहास के शिकंजे से उबारा। ज्ञातव्य है कि पूर्व काल में वस्तुतः रिटर महोदय द्वारा भूगोल को इतिहास का विषय वस्तु बना दिया गया था। मेकिण्डर ने भूगोल के स्वंत्रत अस्तित्व का प्रतिपादन किया तथा सिद्ध किया कि भौगोलिक पृष्ठभूमि ही इतिहास को प्रभावित करती है।

      मेकिण्डर ने ऐतिहासिक भूगोल का गम्भीर अध्ययन करके 1902 में एक पुस्तक ‘ब्रिटेन और ब्रिटिश सागर’ प्रकाशित की थी। उसका यह ग्रंथ बहुत समय तक ब्रिटिश भूगोल का एक प्रथम वर्गीय श्रेष्ठ ग्रन्थ माना जाता रहा था। इस ग्रन्थ में ब्रिटिश भूगोल के मूल सिद्धांतों का संक्षिप्त रूप बड़े कौशल से दिया गया है। मेकिण्डर का यह ग्रन्थ उसके विस्तृत अध्ययन और गंभीर विचारों पर आधारित था, जिसमें इस पृष्ठभूमि से संबंधित ब्रिटेन के इतिहास की समीक्षा दी हुई थी।

       ऐतिहासिक भूगोल पर लिखे गये एक अन्य निबन्ध से मैकिण्डर को इतनी ख्याति प्राप्त हुई जिसकी कभी आशा नहीं थी। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’ की बैठक में एक निबन्ध पढ़ा जिसका शीर्षक था “इतिहास का भौगोलिक धुराग्र” (हृदय स्थल सिद्धान्त)। उस निबंध के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित थे।:-

(1) समुद्री (यात्राओं का) युग बीत चुका है, अब थल का कोई बड़ा भाग अन्वेषण द्वारा खोज निकालना शेष नहीं रहा है।

(2) भविष्य में, थल-शक्ति निर्णायक होगी, क्योंकि अब संसार के सभी भाग इतने समीपस्थ हो गये हैं कि महाशक्तियों के बीच होने वाली लड़ाई के विश्वव्यापी प्रभाव होंगे।

(3) सबसे बड़ा थल-खण्ड पुरानी दुनिया में है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों का सम्मिलित थलखण्ड ‘पुरानी दुनिया’ कहलाता है। इसके केन्द्रीय भाग का एक बड़ा भूराजनीतिक महत्व है। इसके हृदय भाग में महाद्वीपीय तथा आर्कटिक जल-प्रवाह वाला एक ऐसा विशाल क्षेत्र है, जो समुद्री शक्ति को पहुँच से पूर्णत: बाहर है। संक्षेपतः यह थल-खण्ड घास स्थल-स्टेपी तथा मरूस्थल है जो घुड़सवार और ऊँटसवार खानाबदोशों का निवास-स्थल रहा है तथा इन खानाबदोशों के आक्रमण सीमावर्ती स्थाई बस्तियों के देशों पर सारे इतिहास भर में लगातार होते रहे हैं।

(4) इस क्षेत्र के स्वरूप में बड़ी तेजी से आमूल परिवर्तन हो रहा है। महाद्वीप के आर-पार जाने वाले रेल मार्गों के निर्माण और उपनिवेशन के आधार पर वहाँ एक शक्ति का सृजन हो रहा है; और वह शक्ति, आन्तरिक मार्गों पर सत्ताधारी होने के कारण, संसार को केन्द्रीय युद्धनीतिक स्थिति को प्राप्त करती रही है।

(5) इस हृदय स्थल के बाहरी भाग में सीमावर्ती महाद्वीपीय राज्यों की एक आन्तरिक अर्द्ध रचनाकार पेटी और उसके परे एक बाहरी अर्द्ध चन्द्राकार पेटी है, जिसमें समुद्रपारीय (समुद्र के पार) शक्तियाँ ब्रिटेन, संयुक्त राज्य, जापान इत्यादि स्थित है।

(6) यदि शक्ति संतुलन इस घुराग्र-राज्य के अत्यधिक अनुकूल हो जाता है तो उसके परिणामस्वरूप उस शक्ति का प्रसार यूरोप-एशिया के सीमावर्ती थल-क्षेत्रों पर हो जायेगा, जिससे इस शक्ति को महासागरीय बेड़ों के निर्माण करने के लिये विस्तृत महाद्वीपीय साधनों का प्रयोग करने की छूट मिल जायेगी और तब संसार का साम्राज्य दृष्टिगोचर होगा। यदि जर्मनी अपनी मित्रता रूस के साथ कर ले तब ऐसा हो जायेगा।

(7) इस धमकी के विरूद्ध, समुद्रपारीय शक्तियों को अपने पुल-पदाधार सैन्य मोरचे फ्रांस, इटली, मिस्र, भारत और कोरिया में बनाये रखने चाहिये, जो धुराग्र मित्रों को अपनी थलीय शक्ति का विकास करने पर बाध्य करेंगे और उनको महासागरीय बेड़े रखने पर ध्यान केन्द्रित करने से रोकेंगे।

       मेकिण्डर की हृदय स्थल की विचारधारा का विकसित रूप उसी पुस्तक लोकतंत्रीय आदर्श और यथार्थता में प्रथम महायुद्ध के पश्चात 1919 में प्रकाशित हुआ था। उसने देखा कि उस युद्ध की उत्पत्ति इस कारण से हुई थी, कि जर्मनी ने रूसी हृदय-स्थल को संसार पर प्रभुत्व जमाने के लिए, प्रयोग करने का प्रयत्न किया था। क्योंकि उस थल-शक्ति ने मित्र राष्ट्रों के जहाजी बेड़ों को बाल्टिक सागर तथा काला सागर में आने से रोक दिया था, इसलिए मेकिण्डर ने अपने हृदय स्थल के क्षेत्र को बढ़ाकर उसमें पूर्वी यूरोप को भी सम्मिलित कर लिया था। यह उसका संसार द्वीप का सिद्धान्त था। उसने एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका के सम्मिलित महाद्वीप यूरेअफ्रेशिया को संसार-द्वीप का नाम दिया था।

         इस संसार द्वीप की विचारधारा में थलीय और समुद्री शक्तियों का तुलनात्मक-पूरक दृष्टिकोण रखा गया था।

      मेकिण्डर ने यह प्रस्ताव किया था कि जर्मनी और रूस के बीच एक स्वतंत्र राज्यों की पेटी बना दी जानी चाहिए। उसका प्रस्ताव यह भी था कि पेलेस्टाइन, सीरिया, मेसोपोटामिया, बोसफोरस, डारडेनलीज तथा बाल्टिक सागर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो जाना चाहिए, तथा भारत और चीन को हृदय स्थल के आक्रमण से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पुरानी दुनिया के केन्द्रीय भाग के इस ‘ह्रदय स्थल’ सिद्धान्त के भूराजनीतिक महत्व से मेकिण्डर को बड़ी ख्याति प्राप्त हुई।

         वायुयान-यात्रा की बहुत अधिक उन्नति हो जाने पर मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त का महत्व गिर गया है। इस वायुयान युग में मेकिण्डर द्वारा बतलाये गये हृदय स्थल के बजाय उत्तरी ध्रुव का महत्व बढ़ गया है। अब तो आर्कटिक क्षेत्र ही नया या आधुनिक हृदय स्थल बन गया हैं। इस वायुयान युग में उत्तरी ध्रुव की केन्द्रीय स्थिति है, जिसके चारों ओर यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका स्थिति हैं।

     आर्कटिक वृत के चारों ओर स्थित इस आधुनिक हृदय स्थल में केवल जर्मनी और यूरोपीय रूस ही नहीं, वरन् समस्त उत्तरीय यूरोप, सोवियत संघ, उत्तरी चीन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका का आन्तरिक भाग भी सम्मिलित है। इसमें दो महान् शक्तियाँ सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं। महासागरीय युग में इन राष्ट्रों के बीच विशाल महानगर थे, और नाविक शक्ति द्वारा दोनों एक-दूसरे की पहुँच से बाहर थे, परन्तु वायुयान युग में सोवियत संघ और उत्तरी अमेरिका दोनों उत्तरी ध्रुव के मार्ग से एक दूसरे के सम्मुख स्थित हो गये हैं।

       वर्तमान युग तो परमाणु-युग है, जिसमें प्रक्षेपास्त्रो और रॉकेटों के प्रयोग ने मेकिण्डर के हृदय स्थल (Heartland) सिद्धान्त का महत्व और भी कम कर दिया है।  

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

 

 


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21. भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान

21. भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान


भूगोल के विकास में विडाल डी-ला ब्लाश के योगदान

भूगोल के विकास में विडाल ड

            20वीं सदी के भूगोलवेत्ताओं में ब्लाश का नाम सर्वप्रथम आता है। इस महान विचारक ने सन् 1877 में इस महान कार्यक्षेत्र में कदम रखा था। भूगोल विषय पर पेरिस में अपने भाषण देना प्रारम्भ किया और यह कार्य अन्तिम समय तक चलता रहा। सन् 1898 में ब्लाश की नियुक्ति पेरिस के सार्वोनी विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के रूप में हुआ था।

    उन्होंने अपने प्रादेशिक अध्ययन पर अधिक जोर दिया जिसके अंदर किसी क्षेत्र के भौतिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक कारणों के प्रभावों का स्पष्टीकरण किया जाना आवश्यक था। ब्लाश ने सारे विश्व के प्रादेशिक भूगोल का वर्णन प्रस्तुत करने वाली ग्रन्थ माला ‘विश्व भूगोल’ की योजना बनाई थी। उसने पेरिस के निवास काल में भूगोल की महान सेवा करते हुए निम्नांकित कार्य किये-

1. सन् 1889 में यूरोप के राज्य और राष्ट्र नामक प्रथम पुस्तक प्रकाशित हुई।

2. सन् 1894 में यूरोप का एटलस प्रकाशित हुआ।

3. सन् 1891 में विभिन्न प्रदेशों में किए गये शोध कार्यों के प्रकाशन हेतु उसने औपनिवेशिक भूगोल के विज्ञान ‘दुबोइस’ के सहयोग से वार्षिक ग्रंथमाला, नामक भौगोलिक पत्रिका प्रकाशित की थी जिसमें अनेक लेख प्रकाशित हुए।

4. ब्लाश ने बिब्लियोग्राफी के प्रकाशन की भी व्यवस्था की थी।

5. सन् 1903 में ‘फ्रांस का भूगोल’ नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया था। यह भूगोल के अलावा साहित्य का उत्कृष्ट ग्रंथ माना गया।

6. सन् 1917 में उसके प्रारम्भिक अध्ययन तथा शोध कार्यों पर आधारित पूर्वी फ्रांस का भूगोल प्रकाशित हुआ।

7. ब्लाश ने मानव के भूगोल सिद्धांतों पर सामग्री की मार्लोनी के महान प्रयासों में से एकत्र कर लिया था। सन् 1921 में ब्लाश की मृत्यु के पश्चात उसकी पुस्तक मानव भूगोल के सिद्धान्त प्रकाशित करायी गयी।

8. ब्लाश साम्यवादी विचारधारा का प्रवर्तक था।

9. प्रादेशिक अध्ययन के अन्तर्गत किसी प्रदेश के भौतिक, आर्थिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रभावों को स्पष्ट करना ब्लाश ने आवश्यक माना था।

10. ब्लाश ने प्राकृतिक वातावरण तथा मानव के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन पर विशेष बल दिया।

भूगोल  में योगदान:-

          विडाल डी लॉ ब्लाश फ्रांसीसी भूगोल के संस्थापक माने जाते हैं। उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:-

        ब्लाश ने Annals में 1913 में भूगोल के विशिष्ट लक्षण पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने स्पष्टतः कहा कि भूगोलवेत्ता का स्थान प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों विज्ञानों में होना चाहिए। उसने भूगोल के निम्न छः लक्षण बताये-

(i) भूगोल में पार्थिव घटनाओं की एकता महत्वपूर्ण है। अतः इसमें विश्व की पार्थिव घटनाओं एवं उनकी प्रकृति की सकारण व्याख्या की जाती है। दूसरे अर्थों में, भौतिक कारक तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित होकर पार्थिव घटक का निर्माण करते हैं।

(ii) पार्थिव घटनाएँ विविधता रूपी योग एवं समायोजन में स्थित हैं। विभिन्न घटनाक्रमों में विकास एवं परिवर्तन इसी कारण होता है।

(iii) ऐसी यौगिक एवं सह-विविधताओं की स्थिति, उनका वर्णन एवं व्याख्या भूगोल में होती है।

(iv) भूगोल में परिवेश या वातावरण के विभिन्न तत्वों का मानव पर प्रभाव का अध्ययन होता है। इसमें विशेषतः जलवायु, धरातल, वनस्पति, आदि का प्रभाव महत्वपूर्ण है। इन सबसे मानव के सामंजस्य का अध्ययन भी भूगोल में समान रूप से महत्वपूर्ण है।

(v) भूगोल में ऐसी वैज्ञानिक विधियों की खोज करना है, जिसके द्वारा पार्थिव घटनाओं को परिभाषित कर उन्हें वर्गीकृत किया जा सके। यहाँ ब्लाश ने ऐसे नियमों एवं गणितीय आधार की कल्पना की जो कि भूतल की विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति को तथ्यात्मक आधार प्रदान कर सके। ब्रूंस पर भी ब्लाश के इस लक्षण का प्रभाव पड़ा एवं उसने पार्थिव घटनाओं को वर्गीकृत एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया।

(vi) भूगोल में मानव द्वारा भूतल पर लाये गये परिवर्तन एवं उसके महत्वपूर्ण कार्यों का सही-सही मूल्यांकन कर उनकी तर्कसंगत स्थिति निश्चित की जानी चाहिए।

        भूगोल के उपरोक्त लक्षणों की ऐसी व्यावहारिक व्याख्या वह सन् 1889 से लेकर जीवन पर्यन्त अपनी रचनाओं द्वारा करता रहा। ब्लाश के विचार प्रारंभ से ही परिपक्व एवं स्पष्ट रहे। उसने कांट की भांति दर्शन पर भी अधिक जोर दिया। उसने भौतिक, प्रादेशिक एवं मानव में से किसी एक पक्ष को भूगोल में कभी भी विशेष प्रबल नहीं माना। वह तीनों के समन्वित विकास का समर्थक रहा। अतः उसने पृथ्वी के विभिन्न प्रदेशों, उसकी घटनाओं एवं उन घटनाओं में मानव के योग की सम्यक व्याख्या को महत्वपूर्ण माना। भूगोल के वैज्ञानिक विकास के लिए उसने Annals में, स्वेस, स्टीन एवं अन्य कई भूगोल से संबंधित विज्ञानों के जर्मन एवं अंग्रेजी विद्वानों के लेखों और खोजों का फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद कराकर उन्हें प्रकाशित किया।

वातावरण मानव एवं सम्भावनाएँ:-

        ब्लाश ने भूगोल के अन्तर्गत भौतिक विश्व या प्रकृति जिसे उसने भौगोलिक वातावरण कहा, का अध्ययन एवं मानव का अध्ययन दोनों को अनिवार्य माना। भूतल पर पार्थिव अन्तः सम्बन्ध के रूप में पाये जाने वाले भौतिक एवं मानवीय तत्वों को स्वतंत्र रखकर उनकी सही-सही व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ प्राकृतिक परिवेश विविध स्तरीय सम्भावनाओं की ओर मानव आकर्षित करता है वहीं मानव स्वेच्छा से अपनी क्षमता एवं आवश्यकता के अनुसार इनको चुनता है। इस प्रकार ब्लाश ने अपने समय के नियतिवादी चिन्तन की पकड़ से अपने को मुक्त ही नहीं रखा वरन एक साहसी और निर्भीक अग्रणी की भाँति वह स्पष्टतः सम्भववाद की ओर भी आगे बढ़ता गया। इस प्रकार उसने ल्यूसिन फेब्रे का समर्थन किया। मानव प्राकृतिक क्रियाओं से सामंजस्य एवं सम्बन्धों में अपने को एकाकी नहीं पाता। ब्लाश ने स्पष्ट किया कि वह भूमि पर आवास के द्वारा अपने से राज्य, इकाई क्षेत्र या प्रदेश को स्वरूपित करता है। ऐसे स्वरूपों के विकास को समझने के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं तत्कालिक परिस्थितियों को भी समझना आवश्यक है। इसके द्वारा ही पूर्व की प्रवृत्ति की व्याख्या एवं भविष्य का पूर्वानुमान सम्भव है। संक्षेप में वह व्यावहारिक भूगोलवेत्ता रहा।

सम्भववादी नियम:-

        ब्लाश का चिन्तन प्रारम्भ से ही यही रहा कि मानव स्वयं एक क्रियाशील प्राणी है। वह अपने परिवेश का उपयोग स्वयं के अनुभव के आधार पर करता है। जैसा कि पूर्व में लिखा गया है, प्रकृति सम्भावनाएँ व्यक्त करती है और मानव अपनी क्षमता एवं आवश्यकतानुसार उनका उपयोग कर सकता है। मानव का प्रवाहित जल, कटावयुक्त मिट्टी, वृक्ष आदि परिवेश के कुछ तत्वों पर नियंत्रण नहीं है परंतु कुछ अन्यों पर उसका नियंत्रण है। उदाहरणार्थ, प्रत्येक सभ्यता काल में विशेष फसलों का प्रादुर्भाव होता रहा है, आज मानव ने इन फसलों के उपज क्षेत्र का इतना विस्तार कर दिया है जिसकी कल्पना भी नहीं थी। इस प्रकार आज यह पूर्व के प्रतिकूल प्रदेशों में भी इनकी कृषि कर रहा है। ब्लाश ने उदाहरण देकर इन्हें स्पष्ट किया है।

         ब्लाश लिखते हैं, “समस्त भौगोलिक प्रगति में प्रबल विचारधारा यदि है तो वह है सार्वभौमिक एकता” मानव भूगोल के गोचर पदार्थ अर्थात् मानव रचित दृश्य भूमि सार्वभौमिक एकता से सम्बन्धित है, जिसकी रचना स्वयं पृथ्वी के प्रत्येक भाग में भौतिक दशाओं के योग से हुई है। ब्लाश ने रेटजेल की भांति प्रकृति के आधिपत्य या नियंत्रणकारी प्रभाव को कहीं भी स्वीकार नहीं किया।

प्रदेशों की संकल्पना:-

         ब्लाश ने कभी भी प्रदेश का चहारदीवारी की भाँति सीमांकित नहीं माना। उसने उन विद्वानों की आलोचना की जो कि प्रदेश को Water tight compartment मानते हैं। उसने अन्ततः प्रदशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में संक्रमण अथवा परस्परव्यापी क्षेत्र से भी इन्कार नहीं किया। ऐसे प्रदेशों का अध्ययन ही उसने व्यावहारिक माना। एक प्रदेश में पार्थिव घटनाओं एवं कारकों की अन्त: निर्भरता की खोज करके उनकी अन्य प्रदेशों की ऐसी घटनाओं एवं कारकों से समता एवं विषमता के आधार पर अन्यों से तुलना की जानी चाहिए। एक प्रदेश के कारकों के प्राकृतिक परिवेश के साथ-साथ वहाँ के निवासियों की परम्पराएँ, तकनीकी कुशलता, अन्य आर्थिक और सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रभाव को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसे सहयोग से ही प्रदेश में स्वरूपित लक्षणों को उत्कृष्ट विधि से समझा जा सकता है। हम्बोल्ट ने भी इसे प्रकृति एवं मानव के अन्तः सम्बन्धों के रूप में स्वीकार किया।

प्रादेशिक अध्ययन:-

       ब्लाश ने किसी भी राजनैतिक इकाई में प्राकृतिक परिवेश की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता के अनुसार विकसित लघु इकाइयों या प्रदेशों का बहुत ही सुन्दर ढंग से या सजीव वर्णन प्रस्तुत कया है। उसने सर्वप्रथम 1889 में अपनी रचना में भूतल पर निर्मित एवं लघु स्वरूपीय क्षेत्रों में मानव एवं प्राकृतिक परिवेश की क्रियाओं के घनिष्ठ सम्बन्धों के अध्ययन एवं उनके विश्लेषण पर विशेष बल दिया। उसने ऐसे अध्ययन की आवश्यकता क्षेत्र के भौतिक, ऐतिहासिक एवं आर्थिक तथ्यों के विकास, उनके सम्बन्ध और अन्तः निर्भरता का स्वरूप एवं उसमें आने वाले परिवर्तन (गतिशीलता) को समझने के लिए आवश्यक माना। उसने स्वीकार किया कि प्रकृति एवं मानव निर्मित तथ्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। भूतल पर इन दोनों का सम्बन्ध इतना गहरा है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। यूरोप के राज्य एवं राष्ट्र ग्रन्थ में उसने बताया कि एक प्रदेश में रहने वाला समाज स्थानीय होता है। वह ग्रामीण होता है।

             ब्लाश के समय फ्रांस एवं अधिकांश यूरोप की व्यवस्था भिन्न थी। तब विशिष्ट नगर, औद्योगिक इकाइयाँ एवं गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का अभाव था। अधिकांश प्रदेशों की आबादी ग्रामीण थी। उसने समझाया कि यहाँ के निवासियों का भूमि से गहरा संबंध होता है। युद्ध, महामारी, अकाल, बाढ़, विद्रोह आदि के समय ही ऐसे प्रदेश में व्याप्त सामान्य लक्षण कुछ समय के लिए अदृश्य होते हैं जैसे कि स्वच्छ जल के तालाब में एकाएक तेज हिलोरों से थोड़े समय के लिए तली के लक्षण दीखने बन्द हो जाते हैं परन्तु प्रतिकूलता समाप्त होते ही पूर्व की सामाजिक व्यवस्था पुनः स्थापित होने लगती है। आगे चलकर उसने औद्योगिकरण के कारण सामाजिक व्यवस्था एवं ग्रामीण आत्मनिर्भरता व्यवस्था में आने वाले स्थाई परिवर्तनों का भी पूर्वानुमान लगाया। उसके अनुसार 1896 के बाद से ही फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था तेजी से शहरी बनने लगी है, इसके लिए सहायक तत्व मशीनें विकसित यातायात, कोयला एवं नवीन उद्योग रहे नवीन समाज में आत्मनिर्भरता, अन्तः निर्भरता में बदल गयी। ब्लाश के ऐसे सुन्दर निष्कर्ष तथ्यात्मक एवं सही-सही विश्लेषण एवं उसकी विलक्षण क्षमता के कारण ही सम्भव हो सके। क्षेत्रीय अध्ययन को ब्लाश ने ‘Annals ‘ के माध्यम से विशेष लेखों द्वारा उद्देश्यपूर्ण बनाने का प्रयास किया।

भौतिक वातावरण:-

          यद्यपि ब्लाश ने हम्बोल्ट, रिचथोफन एवं पेश्चल की भाँति भूतल के प्राकृतिक तत्वों का अलग से व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया फिर भी उसने इनके अध्ययन को भूगोल के विकास के हित में महत्वपूर्ण माना। अतः जब भी भौतिक भूगोल सम्बन्धी कोई मुख्य अथवा रचना उपलब्ध हुई उसने ‘Annals’ में विशेष स्थान दिया। इस प्रकार उसका दर्शन बहुमुखी एवं विस्तृत आधार वाला रहा। उसने कभी भी भूगोल को संकुचित क्षेत्र या उद्देश्य हेतु निर्धारित अथवा व्यवस्थित विज्ञान या सामाजिक विज्ञान का ही अंग वाला विज्ञान नहीं माना।

        उसने स्पष्टतः समझाया कि भौतिक वातावरण जिसका कि निर्माण भूतल के भौतिक तत्वों से होता है, के लक्षणों को समझे बिना उनके प्रभाव के स्तर को स्पष्ट नहीं किया जा सकता। किसी भी प्रदेश के अध्ययन में ऐसे भौतिक तत्वों के सम्मिलित प्रभाव को मानवीय तत्वों के साथ स्थान मिलना आवश्यक है। ऐसे सम्बन्धों के योग से एक मानव संस्कृति एवं सभ्यता के विकास के साथ-साथ उनकी गतिशीलता से अन्तःसम्बन्ध भी समझा जाना चाहिए।

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

20. भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान




भूगोल में फ्रेडरिक रेटजेल के योगदान 

फ्रेडरिक रेटजेल

            रेटजेल का जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ था। इनके पिता एक डयूक के मैनेजर थे। परिवार में कुल चार सदस्य थे। रेट्जेल ने सर्वप्रथम प्राणी विज्ञानी के रूप में हेडलबर्ग विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। बाद में (Jena) विश्वविद्यालय में चले गये।

        31 वर्ष की आयु में रेटजेल म्यूनिख के एक स्कूल में अध्यापक हो गये तथा 1886 तक वहीं रहे। उन्होंने म्यूनिख के नृजाति संग्रहालय में मोरिस वेगनर के साथ कार्य किया। यहीं वे प्रजातियों के आव्रजन से प्रभावित हुये। इस विचार ने उनके भौगोलिक दर्शन को प्रभावित किया। 1886 में रिचथोफेन के बर्लिन जाने के बाद रेटजेल लीपजिंग आये। यहाँ फिशर एवं हेटनर जैसे भूगोलविदों ने रेटजेल के निर्देशन में कार्य किया। रेटजेल मृत्यु पर्यन्त (1904) यहीं रहे।

         फ्रांस के मॉन्टपेलियर नगर में उसने प्रसिद्ध प्राणी-वैज्ञानिक चार्ल्स मार्टिन्स के साथ कार्य किया था। उस समय उसने एक पत्रिका में अपने कुछ लेख प्रकाशित किये थे जिनका शीर्षक ‘भूमध्यसागरीय तट से जीव वैज्ञानिक पत्र’ था। इन लेखों ने वैज्ञानिकों और सरकार का ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया था। उसने 1870 के युद्ध में सेवा की थी, जिसके बाद उसको पत्रकार बनाकर पूर्वी यूरोप के देशों में तथा इटली, संयुक्त राज्य, मैक्सिको और क्यूबा में भेजा गया था।

      अपनी इन यात्राओं में उसने भौगोलिक अध्ययन किये, और धीरे-धीरे प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन लिखने की कला में सिद्धहस्त हो गया। उसने कैलिफोर्निया, मैक्सिको और क्यूबा में ‘चीन से प्रवास’ के तथ्यों का अध्ययन किया था। ‘चीनी प्रवास’ पर उसने अपना शोध-प्रबन्ध लिखा था, जिस पर उसे शोध-डिग्री मिली थी।

      1878 में रेटजेल ने उत्तरी अमेरिका के भूगोल पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी। उसके विख्यात ग्रन्थ ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ का प्रथम खण्ड 1882 में और दूसरा खण्ड 1891 में प्रकाशित हुआ। यह एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय ग्रन्थ है, जिसके कारण रेटजेल को मानव भूगोल का जन्मदाता कहा जाता है।

         रेटजेल ने राजनीतिक भूगोल का भी गम्भीर अध्ययन किया था। उसने ‘राजनीतिक भूगोल ग्रन्थमाला’ का प्रथम खण्ड 1897 में, और दूसरा खण्ड 1903 में प्रकाशित किया था। इन ग्रन्थों के अलावा रेटजेल ने कुछ पुस्तकें सामान्य जनता की रूची के लिए भी लिखा थी। उसने भूविज्ञान, मानवजातिशास्त्र, जीवविज्ञान, भौतिक भूगोल तथा मानव समाजों पर बहुत से लेख लिखे थे।

       रेटजेल ने वातावरण तथा मानवीय तथ्यों एवं उनके पास्परिक सम्बन्धों का विश्लेषण किया था। उसने मानव एवं वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों में वातावरण के प्रभावों को महत्वपूर्ण बतलाया था, इसीलिए उसे ‘वातावरण निश्चयवाद‘ के सिद्धान्त का प्रतिपादक माना जाता है।

        रेटजेल ने ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के प्रथम खण्ड में डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त से मिलते-जुलते विचार व्यक्त किये थे। इन विचारों में उसने मानवीय समाजों के इतिहास पर भौगोलिक वातावरण के प्रभावों का दिग्दर्शन किया था। इस खण्ड में उसने ‘इतिहास पर भूगोल का अनुप्रयोग’ समझाया था। ‘एन्थ्रोपोज्योग्राफी’ के दूसरे खण्ड (1891) में सांस्कृतिक वातावरण जनसंख्या, मानवीय बस्तियाँ, जनसंख्याओं के प्रवास तथा सांस्कृतिक लक्षणों के वर्णन किये गये थे।

         रेटजेल ने भौतिक भूगोल के क्षेत्र में भी अनुसंधान किये थे तथा एक भौगोलिक ग्रन्थमाला का सम्पादन किया था। इस ग्रन्थमाला में प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं की वैज्ञानिक शोध प्रकाशित हुई थी। इस ग्रन्थमाला में हाइम की पुस्तक हिमनदी पर थी। हान की पुस्तक जलवायु विज्ञान पर थी और पैंक की पुस्तक भू-आकृति विज्ञान पर थी। रेटजेल की रूची भौतिक भूगोल में बहुत अधिक थी, इसी कारण अपने जीवन में आगे चलकर जब उसने मानव भूगोल का वर्णन किया, तब उसने वातावरण की शक्तियों को सदा ध्यान में रखा था।

       फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता ब्रूंज ने लिखा है, रेटजेल को पार्थिव सत्यता का बहुत ऊँचा ज्ञान था। वह पृथ्वी पर मानवीय तथ्यों को केवल एक दार्शनिक या इतिहासकार अथवा अर्थशास्त्री की दृष्टि से नहीं, वरन् भूगोलवेत्ता की दृष्टि से देखता था। उसने मानवीय तथ्यों से बहुत से विभिन्न सम्बन्धों को भौतिक तथ्यों के साथ परखा था- जिनमें भूमि की ऊँचाई, जलवायु, वनस्पति आदि भी थे। उसने पृथ्वी के गोले पर मानव समूहों को बसते हुए, जीवकोपार्जन करते हुए, और इतिहास का निर्माण करते हुए देखा था। उसकी दृष्टि एक सच्चे प्रकृतिवादी की दृष्टि थी।

         रेटजेल उन गिने-चुने विद्वानों में से थे जिन्होंने बहुमुखी प्रतिभा के आधार पर भूगोल की सेवा की। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल को विकसित किया एवं यह शीघ्र ही वैज्ञानिक स्वरूप लेकर पौधों से विशाल वटवृक्ष की भाँति चहुँदिशा में प्रसारित हो गया। सभी यूरोपीय भूगोलवेत्ताओं ने उसके बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों की सराहना की। वह जीव विज्ञान, भू-विज्ञान, मौसम विज्ञान, आदि विषयों के विद्वान रहे। उसने जीव विज्ञान पर लिखना प्रारम्भ किया और यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के भ्रमण के उपरान्त वह भी हम्बोल्ट की भाँति एक मँजे हुए भूगोलवेत्ता बन गये।

        रेटजेल ने अपनी पूर्व के अनुभवों का मानव भूगोल चिन्तन के विकास में लाभ उठाया। वह डार्विन क विकासवादी सिद्धान्त से बहुत प्रभावित हुए, इसी से उन्होंने भौतिक परिवेश, उसके तत्व एवं उसका मानव पर प्रभाव का बहुमुखी रूप में पता लगाया। उन्होंने पहली बार मानव भूगोल के लिए शब्द का प्रयोग किया। उसके अनुसार मानव भूगोल को भौतिक भूगोल की पृष्ठभूमि में ही सही-सही समझा जा सकता है। मानव भूगोल भू-मण्डल पर स्थल एवं भौतिक परिवेश से नियंत्रित मानवता के विस्तार एवं विवरण समझाता है। वास्तव में, उसने मानव भूगोल साथ-साथ कई विज्ञानों पर लिखा, इसी कारण रेटजेल को जर्मनी में मानव भूगोल के पिता होने का श्रेय प्राप्त है।

एन्थ्रोपोज्योग्राफी (मानव भूगोल):-

         रेटजेल रिटर के विचारों से विशेष रूप से प्रभावित हुआ और स्वयं उसने यह स्वीकार किया कि वह रिटर की अर्डकुंडे रचना को भूतल पर गतिशील विकास के सन्दर्भ में विकसित करना चाहता है। उसने पृथ्वी को एक इकाई के रूप में तो स्वीकार किया परन्तु उसका चिन्तन इस ग्रन्थ में निम्न दो बातों के आधार पर रिटर से भिन्न है:-

(i) उसने इसमें प्रादेशिक वर्णन के स्थान पर मानव भूगोल एवं परिवेश सम्बन्धी व्यवस्थित वर्णन प्रस्तुत किये।

(ii) उसने डार्विन के सिद्धान्त में विश्वास करते हुए मानव को विकास की अन्तिम कड़ी माना।

         अतः उसके इस ग्रन्थ में मानव वितरण के लिए उत्तरदायी कारक एवं प्राकृतिक परिवेश के तत्वों की व्याख्या सरल एवं स्पष्ट भाषा में की गयी है। अतः प्रथम खण्ड को ‘Application of geography to history भी कहा जाता है। उसके अनुसार भूतल पर हमारे कार्यकलापों के निर्धारण में परिवेश के निम्न चारों प्रभावी समूह महत्वपूर्ण हैं।

(i) शारीरिक प्रजातीय लक्षणों वाले प्रभाव,

(ii) मनोवैज्ञानिक प्रभाव,

(iii) जनसमूह की आर्थिक एवं सामाजिक गतिशीलता की न्यूनाधिकता के स्वरूप में फैली प्राकृतिक शाक्तियों के भौगोलिक प्रभाव, एवं

(iv) मानवता के वितरण एवं गतिशीलता को नियंत्रित एवं निर्धारित करने वाले प्रभाव।

           उपरोक्त चारों प्रभावों के कारकों का समूह ही प्राकृतिक परिवेश का प्रमुख आधार है। उसने मानव मन को भी प्राकृतिक परिवेश की उपज माना। उसने प्रथम ग्रन्थ में प्रायः कठोर निश्चयवाद का अनुसरण किया। उसके अनुसार, नियति द्वारा दी गई भूमि पर ही मानव को निवास करना चाहिए एवं उसे वहाँ विधना (प्राकृतिक परिवेश व भाग्य) के नियमों के अनुसार ही मौत का भी वरण करना चाहिये।

         उसने दूसरे खण्ड में मानव समुदाय के तात्कालिक विश्व वितरण की व्याख्या की। उसने भूतल के बसे हुए एवं निर्जन प्राय प्रदेशों के विस्तार को बताते हुए उनकी सीमा निश्चित की। रेटजल ने बताया कि बसी हुई दुनियाँ की सीमा पर बसे हुए बिखरे मानव समुदाय सभ्यता की चौकियाँ हैं। जलवायु के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताते हुए उसने प्राचीन सभ्यता-केन्द्रों के उद्भव एवं विकास का कारण भी इसे ही बताया। जल संसाधन असभ्य मानव के लिए प्रमुख बाधा थे परन्तु ज्योंहि मानव ने नौवहन सीख लिया यह बाधा उसके लिए महान राजमार्ग बन गया। 

         मानव एवं उसके विकास के लिए रेटजेल ने तीन कारणों को उत्तरदायी माना, यह है-

(i) (Lage Situation) स्थिति- यह स्थिति अन्य मानव समूहों के सन्दर्भ में है। 

(ii) Raum (Space) स्थान- क्षेत्र की सहसम्बद्धता, क्षेत्र की केन्द्रीयता एवं उनकी सीमावर्ती स्थिति इसके अंग हैं। ऐसा क्षेत्र जनसंख्या की अधिकता के साथ-साथ प्राकृतिक अथवा मानवीय बाघाएँ स्वीकार नहीं करता, एवं

(iii) Rahmen (limits) सीमाएँ- मानव समुदाय प्राकृतिक ढाँचे अथवा निर्धारित सीमा में विकसित होते हैं।

       संक्षेप में, रेटजेल के एन्थ्रोपोज्योग्राफी ग्रन्थ में निम्न तीन समस्याओं की ओर विशेष ध्यान दिया गया है:-

(i) भूतल पर मानव समूहों का वितरण-

       इसमें मानव के जातीय, राष्ट्रीय भाषा एवं धार्मिक स्तर विषयक वर्णन हैं जिन्हें समझने के लिए वांछित मानचित्र चाहिए। वर्तमान में यह सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूगोल का अभिन्न अंग माने गये हैं।

(ii) उपरोक्त वितरण किस प्रकार भौतिक परिवेश द्वारा प्रभावित है एवं उस पर निर्भर है।

(ii) मानव एवं उसके समाज पर भौतिक परिवेश का स्पष्ट प्रभाव। जैसे जलवायु एवं धरातल का प्रभाव।

           उसने इस प्रकार एन्थ्रोपोज्यॉग्राफी में सामान्यीकरण की प्रक्रिया को अपनाया। अपनी दूरदृष्टी के कारण उसने अपनी ग्रन्थ रचना में वारेनियस की भाँति कोई योजना नहीं बनायी। वह अपने अनुभवों के सहारे बढ़ता गया एवं ज्यों-ज्यों उसका कार्य आगे बढ़ा कई समस्याएँ उसके सम्मुख आयीं तो रेटजेल उनके निराकरण में तथा उससे सम्बन्धित विषय को समझने में लग गया।

       समुचित अध्ययन हेतु प्रदेशों एवं क्षेत्रों के अध्ययन के दर्शन को रेटजेल के साथ-साथ रिचथोफेन एवं हेटनर ने भी (ऐसे ही अध्ययन को) क्षेत्रीय अध्ययन के सिद्धान्तों को भूगोल का अनिवार्य अंग माना। वर्तमान में इस चिन्तन को विकसित करने का श्रेय हार्टशोर्न को है।

        रेटजेल की मानव भूगोल की धारणा की परिणति राजनीतिक भूगोल में हुई।  रेटजेल की राजनीतिक भूगोल नामक पुस्तक का प्रकाशन 1897 में हुआ था। वे राज्य को पृथ्वी की सतह पर एक विशिष्ट किस्म की भौगोलिक इकाई के रूप में देखते थे। वे राज्य की तुलना जैविक इकाई (जीवशास्त्र) से करते थे। उनके अनुसार राज्य वस्तुतः पृथ्वी पर मनुष्य द्वारा रचित एक संगठन होता है जिसमें जनसंख्या का निवास पाया जाता है।

         उनके अनुसार राज्य एक स्थानिक जीव की तरह है जो अपनी प्रकृति प्रदत्त सीमाओं तक प्रसार करता है। यदि उसके प्रसार को अवरोध नहीं मिलता तो वह अपनी प्राकृतिक सीमाओं को लांघ कर अपनी सीमा का विस्तार करता है। यह प्रवृत्ति विकसित मानव समूहों, बंजारों, चरवाहों, शिकारी समूहों आदि सभी में मिलती है। यहीं से लेवांसराम की सकल्पना का जन्म होता है।

          इस तरह रेटजेल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मानव भूगोल के प्रणेता थे। उन्हें नियतिवादी कहना गलत है। यह एक भ्रान्ति थी। भ्रांति का कारण जर्मन भाषा के उनके ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद था जिसमें मनुष्य एवं प्रकृति के सम्बन्ध के मापन पर जोर देने के कारण रेटजेल को प्रकृतिवादी कहा गया।

     चूँकि इनकी शिष्या कुमारी ऐलेन सेम्पुल ने आगे चलकर अति कठोर प्रकृतिवादी विचारधारा प्रस्तुत की अतः उनके गुरू के प्रकृतिवादी होने की धारणा अपने आप पुष्ट होती गई जब आधुनिक लेखकों ने उनके मूल योगदान को पढ़ा तो यह तथ्य स्पष्ट हुआ। रेटजेल ने लीपजिंग में एक भूगोल संस्था की भी स्थापना की थी जो शीघ्र अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की संस्था बनी।

       रेटजेल के समय में या तो भौतिक भूगोल का अधिक अध्ययन हो रहा था या मनुष्य का। मनुष्य के विकास को यंत्रवत् बतलाया गया था तथा मनुष्य का भौगोलिक स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं माना जाता था। रेटजेल ने इस अन्तर को पाटने का प्रयास किया। उनके कार्य भौतिक भूगोल एवं मनुष्य के अध्ययन के बीच की कड़ी है। वे प्रकृति के उन नियमों के अध्ययन को आवश्यक मानते थे जो पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं। उन्होंने मनुष्य को पृथ्वी की एक ईकाई के रूप में भूगोल में समाविष्ट किया। इस प्रयास से भूगोल पुर्नजीवित हो उठा।

24. वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली के एक-कोशिकीय एवं त्रि-कोशिकीय मॉडल

      24. वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली के एक-कोशिकीय एवं त्रि-कोशिकीय मॉडल


वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल

           वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:-

1. अन्तरिक्ष में पृथ्वी घूर्णन नहीं कर रही है।

2. पृथ्वी सतह का निर्माण एक समान पदार्थों से हुआ है।

3. पृथ्वी सतह द्वारा प्राप्त सौर विकिरण और बहिर्गामी दीर्घ तरंगी विकिरण में अक्षांशों के अनुसार विद्यमान भिन्नता के कारण उत्पन्न तापमान प्रवणता के कारण भूमध्य रेखा पर गर्म हवा और ध्रुवों पर ठण्डी हवा प्रवाहित होती है।

        उपरोक्त पूर्व मान्यताओं के आधार पर दोनों ही गोलाद्धों में वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का प्रतिरूप एक-कोशिकीय रूप में पाया जाता है। ध्रुवों पर उच्च वायुदाब एवं भूमध्यरेखा पर न्यून वायुदाब होने के कारण हवाओं का धरातलीय प्रवाह ध्रुवों से भूमध्यरेखा की ओर होता है।

         ध्रुवों से चलने वाली ये हवाएं जब भूमध्यरेखा पर पहुंचती हैं तो अभिसरण और संवहन के द्वारा ऊपर उठती हैं। ऊपर उठकर ये हवाएं क्षोभ सीमा के समीप पहुंचकर पुनः क्षैतिज रूप में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं। ऊपरी वायुमण्डल में चलने वाली ये हवाएं ध्रुवों पर पहुंचकर नीचे उतरती हैं। नीचे उतरकर ये हवाएं पुनः भूमध्यरेखा की तरफ प्रवाहित होती हैं। इस प्रकार वायुमंडल की सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय संचार पूर्ण होता है।

वायुमण्डलीय सामान्य

चित्र: वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का एक-कोशिकीय मॉडल

वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का त्रि-कोशिकीय मॉडल

         एक कोशिकीय मॉडल की पहली मान्यता को यदि हटा दें तो वायुमण्डलीय प्रणाली का संचार प्रतिरूप बिल्कुल ही बदल जाएगा। वास्तव में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण दोनों ही गोलाद्धों में वायुमण्डलीय संचार प्रणाली का त्रिकोशिकीय प्रतिरूप देखने को मिलता है। इन तीन संचार कोशिकाओं के नाम- हैडले कोशिका, फैरेल कोशिका तथा ध्रुवीय कोशिका हैं।

          इस त्रि-कोशिकीय मॉडल में भी भूमध्यरेखीय क्षेत्र पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है। सर्वाधिक ऊष्मा से युक्त यह तापीय न्यून (वायुमण्डल में उच्च वायुदाब वाला वह क्षेत्र जो सतही तापमान के कारण उत्पन्न होता है) क्षेत्र अन्तर उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र (Inter Tropical Convergence Zone) कहलाता है। इस क्षेत्र में दोनों ही गोलाद्धों के उपोष्ण कटिबन्ध से आने वाली हवाओं का अभिसरण होता है।

           अभिसरण और संवहन के कारण ये हवाएं भूमध्य रेखा पर ऊपर की ओर उठती है और 14 किमी० की ऊंचाई अर्थात् क्षोभ सीमा के समीप ये हवाएं क्षैतिज रूप में ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगती है। ऊपरी वायुमण्डल में प्रवाहित होने वाली इन हवाओं पर कोरिआलिस प्रभाव के कारण विक्षेपण उत्पन्न होता है और 30° अक्षांशों के समीप ये हवाएं अक्षांश रेखाओं के समानान्तर पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती है। यह अक्षांशीय प्रवाह उपोष्ण कटिबन्धीय जेट धारा (Subtropical Jet Stream) के नाम से जाना जाता है।

        इस अक्षांशीय प्रवाह के कारण ऊपरी वायुमण्डल में हवा का एकत्रीकरण होने लगता है। फलतः कुछ हवा अवतलित होकर धरातल पर उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र को जन्म देती है। इस उच्च वायुदाब कटिबन्ध से हवा अपसरित होकर भूमध्यरेखा एवं ध्रुवों की और प्रवाहित होने लगती है। भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली हवाएं भूमध्य रेखा पर पहुंच कर हैडले कोशिका को पूर्ण रूप प्रदान करती हैं।

          भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होने वाली यह हवा कोरिऑलिस प्रभाव के कारण विक्षेपित होकर उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवने (दायीं ओर विक्षेपण) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवनें (बायीं और विक्षेपण) कहलाती है। उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली धरातलीय पवनें भी कॉरिआलिस प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिमी पछुआ हवाएं (दायीं ओर विक्षेपण) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवने (बायीं ओर विक्षेपण) कहलाती हैं।

चित्र: वायुमण्डलीय सामान्य संचार प्रणाली का त्रि-कोशिकीय मॉडल

       दोनों ही गोलार्द्ध में 30 से 60° अक्षाशों के बीच ऊपरी वायुमण्डल में हवा सामान्यत ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती है। एक बार फिर कॉरिऑलिस प्रभाव के कारण इन हवाओं में विक्षेपण उत्पन्न होता है। फलतः ये हवाएं पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती हैं और दोनों ही गोलार्द्धों में 60º अक्षांश के समीप ध्रुवीय जेट धारा (Polar Jet Stream) का निर्माण करती हैं।

         पृथ्वी सतह पर 60° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के समीप उपोष्ण कटिबन्ध से प्रवाहित होने वाली पछुआ हवाएं ध्रुवों से आने वाली ठण्डी हवाओं से टकराती हैं। इस टकराव से वाताग्र के संक्रमण क्षेत्र में ठण्डी और घनी वायु गर्म एवं हल्की वायु को ऊपर की ओर उठा देती है। फलस्वरूप उपोष्ण कटिबन्धीय न्यून वायुदाब क्षेत्र की उत्पत्ति होती है। ऊपर उठती हुई यह वायु क्षोभ सीमा के समीप जब पहुंचती है तो इसमें से कुछ वायु पुनः फैरेल कोशिका में प्रवेश कर फैरेल कोशिका को पूर्ण करती है।

          ऊपर उठी हुई इस वायु का अधिकांश भाग ध्रुवीय आवर्त (Polar Vortex) (ध्रुवीय क्षेत्रों में ऊपरी वायुमण्डल में स्थित उच्च वायुदाब क्षेत्र। इस क्षेत्र में ऊपरी क्षोभमण्डल में प्रवाहित होने वाली वायु आवर्त के केन्द्र में प्रवेश करके अवरोहित होकर धरातल पर उच्च वायु दाब क्षेत्र को जन्म देती है।) में पहुंच जाता है जहां से वायु के अवरोहण से धरातल पर ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्र का जन्म होता है और इस प्रकार ध्रुवीय कोशिका पूर्ण होती है।


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23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?


एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina)

एलनिनो

          एल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है नवजात ईसा मसीह (Child Christ)। यह नाम इसको इसलिए दिया गया है, क्योंकि इस घटना का आगमन क्रिसमस के समय होता है।

       यह एक जलवायु सम्बन्धी (Weather phenomena) प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप हवा उल्टी दिशा में बहने लगती है। ऐसा प्रत्येक दो से सात वर्ष बाद होता है। इसके अन्तर्गत दक्षिण अमेरीका से एशिया की ओर प्रशान्त महासागर के ऊपर से बहने वाली हवाएं उलटकर एशिया से दक्षिण अमेरीका की ओर बहने लगती हैं।

         इस प्रकार एशिया में वर्षा पहुंचाने के बजाय ये हवाएं इस वर्षा को दक्षिण अमेरीका की ओर ले जाती हैं जिससे दक्षिण अमेरीका और उसके आस-पास के प्रशान्त महासागर में घनघोर वर्षा होने लगती है और वहां बाढ़ आ जाती है और दूसरी ओर एशिया के विभिन्न देश जैसे भारत, इण्डोनेशिया और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया में भी वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एल निनो के कारण दक्षिण एशिया का मानसून बुरी तरह प्रभावित होता है।

        एल निनो का कारण है, दक्षिण अमेरीका के पूर्वी प्रशान्त महासागर से लगे किनारों पर पानी का ठण्डे होने के स्थान पर गर्म हो जाना, जो मुख्यतः पेरू के किनारे समुद्र में होता है। यह गर्म जल धीरे-धीरे पश्चिम की ओर प्रशान्त महासागर में फैल जाता है।

        इस प्रकार जल के गर्म हो जाने के कारण दक्षिण प्रशान्त महासागर के ऊपर एक कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। (जहां पर अन्यथा जल के ठण्डे होने के कारण अधिक दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) तथा इस कम दबाव के क्षेत्र को सन्तुलित करने के लिए इण्डोनेशिया के पास एक अधिक दबाव का क्षेत्र (जहां पर अन्यथा एक कम दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) बन जाता है। इस प्रकार दबाव क्षेत्रों की अदला-बदली के कारण प्रशान्त महासागर के ऊपर बहने वाली हवाओं की दिशा उलट जाती है।

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल निनो की घटना इस दशक में पहले की तुलना में अधिक हो रही है और साथ ही इसकी तीव्रता भी पहले से अधिक है। इसका कारण वे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को मानते हैं। विश्व भर में बढ़ते प्रदूषण, ग्रीन हाउस प्रभाव और ओजोन परत की क्षति के कारण पृथ्वी की जलवायु में भारी परिवर्तन हो रहे हैं।

     एल निनो का एक चक्र समाप्त होने पर इसमें होने वाली घटनाओं के ठीक विपरीत एक और घटना होती है जिसे ‘ला निना’ (La Nina) कहा जाता है। ‘ला निना’ के समय प्रशान्त महासागर का जल पुनः ठण्डा हो जाता है। इस प्रकार ‘ला निना’, एल निनो के जलवायु पर होने वाले प्रभावों को विपरीत दिशा में मोड़ देता है और वातावरण में पुनः स्थिरता को स्थापित करता है।


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