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Chapter 01 India Location (भारत-स्थिति) | CLASS 11 Geography

Chapter 01 India Location

अध्याय 1- भारत-स्थिति

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

प्रश्न 1. बहुविकल्पीय प्रश्न

(i) निम्नलिखित में से कौन-सा अक्षांशीय विस्तार भारत की संपूर्ण भूमि के विस्तार के संदर्भ में प्रासंगिक है?

(क) 8° 4′ उत्तर से 35° 7′ उत्तर

(ख) 8° 4′ उत्तर से 35° 6′ उत्तर

(ग) 8° 4′ उत्तर से 37° 6′ उत्तर

(घ) 6° 45′ उत्तर से 37° 6′ उत्तर

उत्तर- (ग) 8° 4′ उत्तर से 37° 6′ उत्तर।

(ii) निम्नलिखित में से किस देश की भारत के साथ सबसे लंबी स्थलीय सीमा है?

(क) बांग्लादेश

(ख) पाकिस्तान

(ग) चीन

(घ) म्यांमार

उत्तर- (क) बांग्लादेश।

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से बड़ा है?

(ख) फ्रांस

(क) चीन

(ग) मिस्र

(घ) ईरान

उत्तर- (क) चीन।

(iv) निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?

(क) 69° 30′ पूर्व

(ख) 75° 30′ पूर्व

(ग) 82° 30′ पूर्व

(घ) 90° 30′ पूर्व

उत्तर- (ग) 82° 30′ पूर्व।

(v) अगर आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किस एक को आप पार नहीं करेंगे?

(क) यमुना

(ख) सिंधु

(ग) ब्रह्मपुत्र

(घ) गंगा

उत्तर- (ख) सिंधु।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?

उत्तर- हाँ, भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि देश के पूर्वी और पश्चिमी भागों के देशांतर में लगभग 30° का अंतर है। इससे दोनों भागों के स्थानीय समय में लगभग दो घंटे का अंतर होता है। कुछ देशों में अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक समय निर्धारित किए गए हैं। उदाहरणस्वरूप, संयुक्त राज्य अमेरिका में कई मानक समय क्षेत्र हैं।

(ii) भारत की लंबी तटरेखा के क्या प्रभाव हैं?

उत्तर- भारत की तटरेखा लगभग 7,516.6 किमी लंबी है। तीन ओर समुद्र से घिरे होने के कारण मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, विशाखापत्तनम, कोच्चि, कांडला और पारादीप जैसे बंदरगाह विकसित हुए हैं। इनसे समुद्री व्यापार, मत्स्य उत्पादन, पर्यटन तथा समुद्री संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा मिलता है।

(iii) भारत का देशांतरीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?

उत्तर- भारत 68°7′ पूर्व से 97°25′ पूर्व देशांतर तक फैला है। इस विस्तार से पूर्वी और पश्चिमी भागों के स्थानीय समय में लगभग दो घंटे का अंतर होता है। अरुणाचल प्रदेश में गुजरात की अपेक्षा सूर्योदय पहले होता है। इससे देश में समय और दैनिक गतिविधियों के क्षेत्रीय अंतर को समझने में सहायता मिलती है।

(iv) जबकि पूर्व में, उदाहरणतः नागालैंड में, सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती हैं?

उत्तर- भारत के विभिन्न स्थानों के स्थानीय समय में अंतर होता है, लेकिन पूरे देश में एकरूपता बनाए रखने के लिए 82°30′ पूर्वी देशांतर को मानक याम्योत्तर माना गया है। इसी के आधार पर भारतीय मानक समय निर्धारित होता है। इसलिए कोहिमा और नई दिल्ली की घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं।

प्रश्न 3. परिशिष्ट-I पर आधारित क्रियाकलाप (इस अभ्यास को समझाने व विद्यार्थियों से करवाने में अध्यापक सहायता कर सकते हैं)

(i) एक ग्राफ पेपर पर मध्य प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, गोवा, केरल तथा हरियाणा के जिलों की संख्या को आलेखित कीजिए। क्यों जिलों की संख्या का राज्यों के क्षेत्रफल से कोई संबंध है?

उत्तर- दिए गए राज्यों के जिलों की संख्या को परिशिष्ट-I में उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर ग्राफ पेपर पर दंड आलेख द्वारा प्रदर्शित कीजिए। सामान्यतः बड़े राज्यों में जिलों की संख्या अधिक हो सकती है, लेकिन इसका संबंध केवल क्षेत्रफल से नहीं होता। जनसंख्या, प्रशासनिक आवश्यकताएँ और क्षेत्रीय परिस्थितियाँ भी जिलों की संख्या को प्रभावित करती हैं।

(ii) उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा, राजस्थान तथा जम्मू और कश्मीर में से कौन-सा राज्य सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला और कौन-सा एक न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला है?

उत्तर- दिए गए राज्यों में पश्चिम बंगाल का जनसंख्या घनत्व सर्वाधिक है, जबकि अरुणाचल प्रदेश का जनसंख्या घनत्व न्यूनतम है। यह निष्कर्ष जनगणना 2011 के आँकड़ों पर आधारित है।

(iii) राज्य के क्षेत्रफल व जिलों की संख्या के बीच संबंध को ढूँढ़िए।

उत्तर- राज्य के क्षेत्रफल और जिलों की संख्या के बीच सामान्यतः कोई निश्चित अनुपात नहीं होता। जिलों की संख्या जनसंख्या, प्रशासनिक सुविधा, भौगोलिक परिस्थितियों और शासन की आवश्यकताओं पर भी निर्भर करती है।

(iv) तटीय सीमाओं से संलग्न राज्यों की पहचान कीजिए।

उत्तर- भारत के तटीय राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।

(v) पश्चिम से पूर्व की ओर स्थलीय सीमा वाले राज्यों का क्रम तैयार कीजिए।

उत्तर- भारत के पश्चिम से पूर्व की ओर स्थलीय सीमा वाले राज्यों का क्रम मानचित्र की सहायता से निर्धारित किया जा सकता है। इसमें पश्चिमी सीमा के राज्यों से आरंभ करके उत्तर-पश्चिम, उत्तरी, उत्तर-पूर्वी और पूर्वी सीमा के राज्यों को क्रमवार रखा जाता है।

प्रश्न 4. परिशिष्ट-II पर आधारित क्रियाकलाप (इस अभ्यास को समझाने व विद्यार्थियों से करवाने में अध्यापक सहायता कर सकते हैं)

(i) उन केंद्र शासित क्षेत्रों की सूची बनाइए जिनकी स्थिति तटीय है।

उत्तर- तटीय स्थिति वाले केंद्र शासित क्षेत्रों में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप, पुडुचेरी तथा दमन और दीव शामिल थे। वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली के साथ एक केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा है।

(ii) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा अंडमान व निकोबार द्वीप समूह के क्षेत्रफल और जनसंख्या में अंतर की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?

उत्तर- दिल्ली का क्षेत्रफल कम होने के बावजूद इसकी जनसंख्या बहुत अधिक है, क्योंकि यह देश की राजधानी और प्रमुख नगरीय केंद्र है। यहाँ रोजगार, शिक्षा, व्यापार और प्रशासनिक सुविधाएँ अधिक हैं। इसके विपरीत, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का क्षेत्रफल अधिक है, लेकिन द्वीपीय स्थिति, घने वन और सीमित आबादी वाले क्षेत्रों के कारण इसकी जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है।

(iii) एक ग्राफ पेपर पर दंड आलेख द्वारा केंद्र शासित क्षेत्रों के क्षेत्रफल व जनसंख्या को आलेखित कीजिए।

उत्तर- केंद्र शासित क्षेत्रों के क्षेत्रफल और जनसंख्या के आँकड़ों को परिशिष्ट-II से लेकर ग्राफ पेपर पर दंड आलेख बनाइए। क्षैतिज अक्ष पर केंद्र शासित क्षेत्रों के नाम तथा ऊर्ध्वाधर अक्ष पर क्षेत्रफल और जनसंख्या के आँकड़े प्रदर्शित कीजिए। दोनों के लिए अलग-अलग दंड आलेख बनाना अधिक स्पष्ट रहेगा।

Chapter 6 Geomorphic Processes (भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ) | BSEB CLASS 11 | बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, कक्षा 11

Chapter 6 Geomorphic Processes

अध्याय 6- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

BSEB CLASS 11 | बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, कक्षा 11

भाग-1: भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?

(क) निक्षेपण

(ख) ज्वालामुखीयता

(ग) पटल विरूपण

(घ) अपरदन

उत्तर- (घ) अपरदन 

(ii) जलयोजन प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है?

(क) ग्रेनाइट

(ख) क्वार्ट्ज

(ग) क्ले

(घ) लवण

उत्तर- (ग) क्ले 

(iii) मलबा अवधाव की घाटी बनती है-

(क) भूस्खलन

(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन

(ग) मंद प्रवाही वृहत् संचलन

(घ) अवतलन/धँसाव

उत्तर- (ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन

(iv) यू-आकार की घाटी बनती है-

(क) बाढ़ क्षेत्र में

(ख) चूना क्षेत्र में

(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में

(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

उत्तर- (घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

2. निम्नलिखित प्रफ़्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे?

उत्तर- अपक्षय एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर मृदा निर्माण में सहायता करती है। इससे पौधों को आवश्यक खनिज एवं पोषक तत्त्व प्राप्त होते हैं। मृदा की गहराई, संरचना तथा उर्वरता वनस्पतियों के विकास को प्रभावित करती है। वनस्पतियाँ विभिन्न जीव-जंतुओं को भोजन एवं आवास प्रदान करती हैं, जिससे जैव विविधता का विकास होता है।

    अपक्षय से निर्मित पदार्थ अपरदन एवं वृहत् संचलन जैसी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त, अपक्षय कुछ खनिजों, जैसे लौह, मैंगनीज तथा एल्युमिनियम अयस्कों के संकेन्द्रण एवं समृद्धिकरण में सहायक होता है। इस प्रकार अपक्षय मृदा निर्माण, वनस्पति विकास और पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) वृहत् संचलन, जो मंद, तीव्र एवं प्रत्यक्ष (Perceptible) हैं, वे क्या हैं? सूचीबद्ध कीजिए।

उत्तर- वृहत् संचलन (Mass Movement) के अंतर्गत चट्टानों, मृदा तथा मलवे का गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव से ढाल के सहारे नीचे की ओर खिसकना या प्रवाहित होना शामिल है। इसमें पदार्थों का स्थानांतरण होता है। वृहत् संचलन के लिए अपक्षय अनिवार्य नहीं है, हालाँकि अपक्षय इस प्रक्रिया को बढ़ावा देता है।

    वृहत् संचलन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं- असंबद्ध एवं कमजोर पदार्थ, तीव्र ढाल, खड़े भृगु, झुकी हुई शैल-परतें, पर्याप्त वर्षा, मूसलाधार वर्षा, वनस्पति का अभाव तथा झीलों, नदियों एवं जलाशयों से बड़ी मात्रा में जल का निष्कासन। भूकंप एवं विस्फोट भी वृहत् संचलन को उत्पन्न कर सकते हैं।

     वृहत् संचलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

1. मंद संचलन (Slow Movement)- मृदा विसर्पण (Soil Creep)।

2. तीव्र संचलन (Rapid Movement)- भूस्खलन (Landslide), शैलपात (Rockfall) तथा मलबा अवधाव (Debris Avalanche)।

3. प्रवाही संचलन (Flow Movement)- मृदा प्रवाह (Earthflow), मलबा प्रवाह (Debris Flow) तथा पंक प्रवाह (Mudflow)।

(iii) विभिन्न गतिशिल एवं शक्तिशाली बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य सम्पन करते हैं।

उत्तर- प्रमुख बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारक सूर्य से प्राप्त ऊर्जा तथा गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में कार्य करते हैं। विवर्तनिक शक्तियों द्वारा निर्मित ढाल इनके कार्य को प्रभावित करती है। ये कारक अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण जैसे प्रमुख कार्य संपन्न करते हैं, जिससे पृथ्वी की सतह पर विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण एवं परिवर्तन होता है।

(iv) क्या मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?

उत्तर- हाँ, मृदा निर्माण में अपक्षय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अपक्षय चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर मृदा निर्माण के लिए मूल पदार्थ उपलब्ध कराता है। मृदा निर्माण की प्रक्रिया जलवायु, मूल चट्टान, जीव-जंतुओं, स्थलाकृति तथा समय जैसे कारकों से प्रभावित होती है। इन कारकों की संयुक्त क्रिया से अपक्षय प्रावार का विकास होता है, जो मृदा निर्माण का मूल आधार बनता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) “हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है,” विवेचना कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी का धरातल दो विरोधात्मक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं- अंतर्जनित (Endogenic) तथा बहिर्जनिक (Exogenic) शक्तियों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। इसी कारण पृथ्वी का धरातल सदैव परिवर्तनशील बना रहता है।

1. अंतर्जनित शक्तियाँ (Endogenic Forces)- इन शक्तियों की उत्पत्ति पृथ्वी के आंतरिक भाग में होती है। ये धरातल पर उत्थान, अवतलन, वलन, भ्रंशन तथा ज्वालामुखीय क्रियाओं द्वारा विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण करती हैं। सामान्यतः इन्हें भू-आकृति निर्माणकारी शक्तियाँ माना जाता है।

2. बहिर्जनिक शक्तियाँ (Exogenic Forces)- ये शक्तियाँ सूर्य से प्राप्त ऊर्जा तथा गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में कार्य करती हैं। अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण इनके प्रमुख कार्य हैं। ये ऊँचे भागों का निम्नीकरण करती हैं तथा निचले क्षेत्रों में पदार्थों का निक्षेपण करके धरातल के उच्चावच को कम करने का प्रयास करती हैं। इस प्रक्रिया को क्रमस्थापन (Gradation) कहते हैं।

     इस प्रकार अंतर्जनित शक्तियाँ धरातल पर उच्चावच का निर्माण करती हैं, जबकि बहिर्जनिक शक्तियाँ उनका क्षरण एवं समतलीकरण करती हैं। इन दोनों शक्तियों की निरंतर पारस्परिक क्रिया से पृथ्वी पर पर्वत, पठार, मैदान तथा अन्य भू-आकृतियाँ विकसित होती हैं। यही कारण है कि पृथ्वी को इन विरोधात्मक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का खेल का मैदान कहा जाता है।

(ii) ‘बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए।

उत्तर- यह कथन सत्य है कि बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अंतिम ऊर्जा मुख्यतः सूर्य से प्राप्त करती हैं। तापमान तथा वर्षा दो प्रमुख जलवायवीय तत्त्व हैं, जो इन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। अपक्षय, वृहत् संचलन, अपरदन तथा परिवहन जैसी प्रक्रियाएँ अनाच्छादन (Denudation) के अंतर्गत आती हैं।

    सूर्य की गर्मी वायुमंडल में तापमान और वायुदाब के अंतर उत्पन्न करती है, जिससे पवन तथा जलचक्र जैसी प्रक्रियाएँ संचालित होती हैं। वर्षा, नदियाँ, हिमनद और पवन धरातल पर अपक्षय एवं अपरदन का कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त, सूर्य के प्रकाश और तापमान से प्रभावित वनस्पति का घनत्व, प्रकार तथा वितरण भी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

     हालाँकि, पदार्थों को ढाल के सहारे नीचे ले जाने में गुरुत्वाकर्षण भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार सूर्य से प्राप्त ऊर्जा तथा गुरुत्वाकर्षण के संयुक्त प्रभाव से बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ पृथ्वी के धरातल का निरंतर परिवर्तन करती रहती हैं।

(iii) क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं? यदि नहीं, तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या कीजिए।

उत्तर- नहीं, भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि परस्पर संबंधित हैं। ये दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ कार्य करती हैं और एक-दूसरे की गति को प्रभावित करती हैं।

1. भौतिक अपक्षय (Physical Weathering)-

     इस प्रक्रिया में तापमान में परिवर्तन, चट्टानों पर दबाव, पाला तथा लवणों के क्रिस्टलीकरण के कारण चट्टानें टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, दिन में गर्म होने और रात में ठंडा होने से चट्टानों में बार-बार प्रसार एवं संकुचन होता है, जिससे उनमें दरारें उत्पन्न हो सकती हैं।

2. रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering)-

    इस प्रक्रिया में जल, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य रासायनिक पदार्थों की क्रिया से चट्टानों के खनिजों की रासायनिक संरचना में परिवर्तन होता है। इसके प्रमुख प्रकार जलयोजन, ऑक्सीकरण, कार्बोनेटीकरण तथा विलयन हैं। उदाहरण के लिए, कार्बन डाइऑक्साइड युक्त जल चूना पत्थर को घोलकर कार्स्ट स्थलरूपों के निर्माण में सहायता करता है।

दोनों प्रक्रियाओं में संबंध: भौतिक अपक्षय चट्टानों को छोटे टुकड़ों में तोड़कर उनका सतही क्षेत्र बढ़ाता है, जिससे रासायनिक अपक्षय अधिक प्रभावी हो जाता है। दूसरी ओर, रासायनिक अपक्षय खनिजों को कमजोर करके चट्टानों के विघटन को आसान बनाता है। इस प्रकार दोनों प्रक्रियाएँ मिलकर अपक्षय की गति को बढ़ाती हैं।

(iv) आप किस प्रकार मृदा निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा निर्माण कारकों के बीच अन्तर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा निर्माण में दो महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?

उत्तर- मृदा निर्माण प्रक्रियाएँ एवं कारक: मृदा निर्माण प्रक्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं, जिनके माध्यम से मूल पदार्थ अपक्षय, पदार्थों के स्थानांतरण तथा जैविक क्रियाओं के प्रभाव से मृदा में परिवर्तित होते हैं। इसके विपरीत, मृदा निर्माण कारक वे परिस्थितियाँ हैं, जो इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। मृदा निर्माण के पाँच प्रमुख कारक जलवायु, स्थलाकृति, मूल पदार्थ, जैविक क्रियाएँ तथा समय हैं।

1. जलवायु की भूमिका (Role of Climate)-

     जलवायु मृदा निर्माण का महत्त्वपूर्ण सक्रिय कारक है। तापमान एवं वर्षा अपक्षय, रासायनिक क्रियाओं तथा मृदा में नमी की मात्रा को प्रभावित करते हैं। वर्षा से प्राप्त जल खनिजों को घोलने तथा रासायनिक पदार्थों के स्थानांतरण में सहायता करता है। तापमान में परिवर्तन भी चट्टानों के अपक्षय और जैविक गतिविधियों को प्रभावित करता है।

2. जैविक क्रियाओं की भूमिका (Role of Biological Activities)-

     वनस्पति, जीव-जंतु तथा सूक्ष्मजीव मृदा निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृत पौधों एवं जीवों के अवशेषों से ह्यूमस बनता है, जो मृदा की उर्वरता बढ़ाता है। राइजोबियम जीवाणु नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायता करते हैं। केंचुए, चींटियाँ तथा दीमक मृदा को उलट-पलटकर उसकी संरचना एवं वायु संचार को प्रभावित करते हैं।

    इस प्रकार जलवायु और जैविक क्रियाएँ मिलकर मृदा के विकास, संरचना तथा उर्वरता को प्रभावित करती हैं।

(iv) परियोजना कार्य (Project Work)

(i) अपने चतुर्दिक विद्यमान भू-आकृतिक/उच्चावच एवं पदार्थों के आधार पर जलवायु, सम्भव अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्त्वों और विशेषताओं को परखिए एवं अंकित कीजिए।

उत्तर- इस अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित जानकारियों एवं विशेषताओं को सूचीबद्ध करें परियोजना को स्वयं करें। इस अध्याय में पूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ दी गई हैं।

Chapter 5 Minerals and Rocks (खनिज एवं शैल) | CLASS 11

CHAPTER 5 MINERALS AND ROCKS

अध्याय 5- खनिज एवं शैल

CLASS 11

भाग–1: भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) ग्रेनाइट शैल के प्रमुख खनिज घटक कौन-से हैं?

(क) लोहा एवं निकिल

(ख) क्वार्ट्ज एवं फेल्डस्पार

(ग) लोहा एवं चाँदी

(घ) कैल्साइट एवं जिप्सम

उत्तर: (ख) क्वार्ट्ज एवं फेल्डस्पार

(ii) निम्न में से कौन सा कायांतरित शैलों का प्रमुख लक्षण है?

(क) परिवर्तनीय

(ख) क्रिस्टलीय

(ग) शांत

(घ) पल्ल्व न

उत्तर: (ख) क्रिस्टलीय

(iii) निम्न में से कौन सा एकमात्र तत्त्व वाला खनिज नहीं है?

(क) स्वर्ण

(ख) माइका

(ग) चाँदी

(घ) ग्रेफाइट

उत्तर: (ख) माइका

(iv) निम्न में से कौन सा कठोरतम खनिज है?

(क) टोपाज

(ख) क्वार्ट्ज

(ग) हीरा

(घ) फेल्डस्पर

उत्तर: (ग) हीरा

(v) निम्न में से कौन सी शैल अवसादी नहीं है?

(क) टायलाइट

(ख) ब्रेशिया

(ग) बोरैक्स

(घ) संगमरमर

उत्तर: (घ) संगमरमर

(vi) निम्नलिखित में कौन सा अवसादी शैल है?

(क) बलुआ पत्थर

(ख) अभ्रक

(ग) ग्रेनाइट

(घ) नीस

उत्तर: (क) बलुआ पत्थर

(vii) चट्टानों का टूटकर अपने स्थानों पर ही पड़े रहना कहलाता है?

(क) अपक्षय

(ख) अपरदन

(ग) अनाच्छादन

(घ) अनावृतिकरण

उत्तर: (क) अपक्षय

2.  निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) शैल से आप क्या समझते हैं? शैल के तीन प्रमुख वर्गों के नाम बताएँ।

उत्तर- पृथ्वी की पर्पटी मुख्यतः विभिन्न प्रकार की शैलों से बनी है। शैल का निर्माण एक या एक से अधिक खनिजों के मिलने से होता है। शैल कठोर या नरम तथा विभिन्न रंगों की हो सकती है। उदाहरण के लिए, ग्रेनाइट एक कठोर शैल है, जबकि सोपस्टोन अपेक्षाकृत नरम शैल है। शैलों में सामान्यतः क्वार्ट्ज एवं फेल्डस्पार जैसे खनिज पाए जाते हैं।

   निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर शैलों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है-

1. आग्नेय शैल (Igneous Rocks)- मैग्मा या लावा के ठंडा होकर ठोस बनने से इनका निर्माण होता है।

2. अवसादी शैल (Sedimentary Rocks)- चट्टानों के टूटे हुए अंशों, खनिज पदार्थों तथा जैविक अवशेषों के निक्षेपण, संघनन एवं संयोजन से इनका निर्माण होता है।

3. कायांतरित शैल (Metamorphic Rocks)- पहले से विद्यमान शैलों में ताप, दाब तथा रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव से परिवर्तन एवं पुनःक्रिस्टलीकरण होने पर इनका निर्माण होता है।

(ii) आग्नेय शैल क्या है? आग्नेय शैल के निर्माण पद्धति एवं उनके लक्षण बताएँ।

उत्तर- आग्नेय शैल (Igneous Rocks): आग्नेय शैलों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में स्थित मैग्मा तथा धरातल पर निकले लावा के ठंडा होकर ठोस बनने से होता है। जब मैग्मा अपनी ऊर्ध्वगामी गति के दौरान ठंडा होकर जम जाता है, तो आग्नेय शैल का निर्माण होता है। इन शैलों की बनावट मुख्यतः शीतलन की गति तथा खनिज कणों के आकार और व्यवस्था पर निर्भर करती है।

     निर्माण पद्धति एवं प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-

1. धीमी शीतलता- जब मैग्मा पृथ्वी के आंतरिक भाग में धीरे-धीरे ठंडा होता है, तो बड़े आकार के खनिज कणों का निर्माण होता है। उदाहरण—ग्रेनाइट।

2. तीव्र शीतलता- जब लावा धरातल पर तेजी से ठंडा होता है, तो छोटे आकार के खनिज कण बनते हैं। उदाहरण—बेसाल्ट।

3. मध्यम शीतलता- शीतलन की गति मध्यम होने पर खनिज कणों का आकार भी अपेक्षाकृत मध्यम हो सकता है।

4. कठोर एवं सघन संरचना- आग्नेय शैल सामान्यतः कठोर, सघन तथा क्रिस्टलीय होती हैं।

5. जीवाश्मों का अभाव- आग्नेय शैलों में सामान्यतः जीवाश्म नहीं पाए जाते, क्योंकि इनके निर्माण में अत्यधिक तापमान शामिल होता है।

उदाहरण- ग्रेनाइट, बेसाल्ट तथा ज्वालामुखीय ब्रेशिया आग्नेय शैलों के प्रमुख उदाहरण हैं।

(iii) अवसादी शैल का क्या अर्थ है? अवसादी शैलों के निर्माण की पद्धति बताइए।

उत्तर- अवसादी शैल (Sedimentary Rocks): अवसादी शब्द का अर्थ है- अवसादों का परतों के रूप में जमा होना। पृथ्वी की सतह पर उपस्थित चट्टानें अपक्षयकारी कारकों, जैसे तापमान में परिवर्तन, जल, पवन तथा हिमनद आदि के प्रभाव से टूटकर विभिन्न आकार के टुकड़ों में विभाजित हो जाती हैं। इन पदार्थों का नदियों, पवन, हिमनद तथा अन्य बहिर्जनित कारकों द्वारा परिवहन किया जाता है और उपयुक्त स्थानों पर निक्षेपण होता है।

    समय के साथ इन निक्षेपित पदार्थों पर दबाव पड़ता है, जिससे उनका संघनन होता है। खनिज पदार्थों के संयोजन एवं सीमेंटीकरण की प्रक्रिया द्वारा ये अवसाद ठोस शैलों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को शिलीभवन (Lithification) कहते हैं। इसी कारण बलुआ पत्थर तथा शेल जैसी अवसादी शैलों में प्रायः विभिन्न मोटाई वाली परतें दिखाई देती हैं।

उदाहरण- बलुआ पत्थर (Sandstone), शेल (Shale) तथा चूना पत्थर (Limestone)।

(iv) शैली चक्र के अनुसार प्रमुख प्रकार की शैलों के मध्य क्या संबंध होता है?

उत्तर- शैल चक्र एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें एक प्रकार की शैल दूसरे प्रकार की शैल में परिवर्तित हो सकती है। आग्नेय शैलों के अपक्षय एवं निक्षेपण से अवसादी शैलें बनती हैं। ताप और दाब के प्रभाव से आग्नेय तथा अवसादी शैलें कायांतरित शैलों में बदल सकती हैं। पिघलने और ठंडा होने से पुनः आग्नेय शैलें बनती हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) ‘खनिज’ शब्द को परिभाषित करें एवं प्रमुख प्रकार के खनिजों के नाम लिखें।

उत्तर- खनिज एक प्राकृतिक, अकार्बनिक ठोस पदार्थ है, जिसकी निश्चित रासायनिक संरचना तथा व्यवस्थित परमाण्विक संरचना होती है। अधिकांश खनिज दो या दो से अधिक तत्वों से मिलकर बनते हैं, जबकि कुछ खनिज, जैसे सल्फर, ताँबा, चाँदी, स्वर्ण तथा ग्रेफाइट, एक ही तत्व से निर्मित होते हैं। पृथ्वी की भूपर्पटी में अनेक प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। इनमें से कुछ खनिज शैल निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

    प्रमुख खनिज निम्नलिखित हैं-

1. फेल्डस्पार (Feldspar)- इसमें सिलिका, ऑक्सीजन, एल्यूमिनियम, सोडियम, पोटैशियम तथा कैल्शियम पाए जाते हैं। यह शैल निर्माण करने वाला प्रमुख खनिज है।

2. क्वार्ट्ज (Quartz)- यह मुख्यतः सिलिका से बना कठोर खनिज है। यह रेत तथा ग्रेनाइट का प्रमुख घटक है।

3. पाइरॉक्सीन (Pyroxene)- इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, लोहा तथा सिलिका पाए जाते हैं।

4. एम्फीबोल (Amphibole)- इसमें सिलिका, एल्यूमिनियम, कैल्शियम, लोहा तथा मैग्नीशियम पाए जाते हैं।

5. माइका (Mica)- इसमें पोटैशियम, एल्यूमिनियम, लोहा, मैग्नीशियम तथा सिलिका पाए जाते हैं।

खनिजों का अन्य वर्गीकरण-

6. धात्विक खनिज (Metallic Minerals)- इनमें लौह धातु, अलौह धातु तथा बहुमूल्य धातुएँ शामिल हैं। उदाहरण- लोहा, ताँबा, एल्यूमिनियम, सोना और चाँदी।

7. अधात्विक खनिज (Non-metallic Minerals)- इनमें धातुएँ प्राप्त नहीं होतीं। उदाहरण-गंधक, फॉस्फेट तथा नाइट्रेट।

       इस प्रकार खनिज पृथ्वी की शैलों के प्रमुख घटक हैं तथा औद्योगिक विकास, निर्माण कार्य और आर्थिक गतिविधियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

(ii) भूपृष्ठीय शैलों में प्रमुख प्रकार की शैलों की प्रकृति एवं उनकी उत्पत्ति की पद्धति का वर्णन करें। आप उनमें अन्तर स्थापित केसे करेंगे?

उत्तर- निर्माण पद्धति के आधार पर भूपृष्ठीय शैलों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है।

1. आग्नेय शैल (Igneous Rocks)- इनका निर्माण मैग्मा या लावा के ठंडा होकर ठोस बनने से होता है। इन्हें प्राथमिक शैल भी कहा जाता है। इनकी बनावट खनिज कणों के आकार एवं व्यवस्था पर निर्भर करती है। उदाहरण- ग्रेनाइट, बेसाल्ट तथा गैब्रो।

2. अवसादी शैल (Sedimentary Rocks)- इनका निर्माण अपक्षय से प्राप्त पदार्थों के परिवहन, निक्षेपण, संघनन तथा शिलीभवन से होता है। ये प्रायः परतों में पाई जाती हैं। निर्माण के आधार पर इन्हें यांत्रिक, जैविक तथा रासायनिक अवसादी शैलों में बाँटा जाता है। उदाहरण- बलुआ पत्थर, कोयला तथा सेंधा नमक।

3. कायांतरित शैल (Metamorphic Rocks)- इनका निर्माण पहले से विद्यमान शैलों में ताप, दाब तथा रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव से परिवर्तन होने पर होता है। इस प्रक्रिया में खनिजों का पुनःक्रिस्टलीकरण हो सकता है। उदाहरण- संगमरमर, स्लेट तथा नीस।

अंतर- आग्नेय शैल मैग्मा या लावा के ठंडा होने से, अवसादी शैल अवसादों के जमाव एवं शिलीभवन से तथा कायांतरित शैल पहले से विद्यमान शैलों में ताप एवं दाब के प्रभाव से बनती हैं। ये तीनों शैलें शैल चक्र के माध्यम से एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकती हैं।

(iii) कायांतरित चट्टान क्या है ? इनके प्रकार एवं निर्माण की पद्धति का वर्णन करें।

उत्तर- कायांतरित शैल (Metamorphic Rocks) वे शैल हैं, जिनका निर्माण पहले से विद्यमान आग्नेय या अवसादी शैलों में ताप, दाब तथा रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव से परिवर्तन होने पर होता है। इस प्रक्रिया में शैलों के खनिजों का पुनःक्रिस्टलीकरण तथा पुनर्गठन होता है।

    कायांतरण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

1. गतिशील कायांतरण (Dynamic Metamorphism): विवर्तनिक बलों एवं अत्यधिक दाब के कारण शैलों में टूट-फूट, विकृति तथा खनिजों का पुनर्गठन होता है।

2. संपर्क कायांतरण (Contact Metamorphism)- जब मैग्मा या लावा के संपर्क में आने से आसपास की शैलों का तापमान बढ़ता है, तो उनके खनिजों में परिवर्तन एवं पुनःक्रिस्टलीकरण होता है।

3. क्षेत्रीय कायांतरण (Regional Metamorphism)- विस्तृत क्षेत्रों में उच्च तापमान और दाब के प्रभाव से शैलों में परिवर्तन होता है। यह प्रक्रिया प्रायः पर्वत निर्माण एवं विवर्तनिक गतिविधियों से संबंधित होती है।

     कायांतरित शैलों में खनिजों का परतों या रेखाओं के रूप में व्यवस्थित होना पर्णन (Foliation) कहलाता है। हल्के एवं गहरे रंग के खनिजों की अलग-अलग पट्टियाँ बनने पर पट्टित संरचना (Banding) विकसित होती है।

     कायांतरित शैलों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है पर्णित तथा अपर्णित शैल। उदाहरण के लिए, स्लेट, शिस्ट और नीस पर्णित शैल हैं, जबकि संगमरमर तथा क्वार्टजाइट अपर्णित शैलों के उदाहरण हैं।

12. Best Mass Wasting & Mass Movement | वृहद् क्षरण एवं वृहद् संचलन

Mass Wasting & Mass Movement

वृहद् क्षरण एवं वृहद् संचलन

वृहद् संचलन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition):

    ढाल पर स्थित चट्टानों के टुकड़ों, मिट्टी तथा अन्य अपक्षयित पदार्थों का गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से नीचे की ओर खिसकना या गिरना वृहद् संचलन (Mass Movement) कहलाता है। जब ढाल पर स्थित अपक्षयित पदार्थ गुरुत्वाकर्षण के कारण अपने मूल स्थान से हटकर नीचे की ओर स्थानांतरित होते हैं, तो इस प्रक्रिया को वृहद् संचलन कहा जाता है। इसे कई पुस्तकों में वृहद् क्षरण (Mass Wasting) भी कहा जाता है।

    वृहद् संचलन में पदार्थों के स्थानांतरण का प्रमुख कारण गुरुत्वाकर्षण बल होता है। इसमें जल, वायु तथा हिमानी जैसे कारकों की सहायता आवश्यक नहीं होती, यद्यपि ये कारक इस प्रक्रिया को सुगम बना सकते हैं। यदि मलवे का स्थानांतरण मुख्य रूप से बहते हुए जल, वायु या हिमानी द्वारा होता है, तो उसे सामान्यतः वृहद् संचलन की श्रेणी में नहीं रखा जाता।

    इस प्रकार, वृहद् संचलन एक ऐसी भू-आकृतिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से ढालों पर स्थित मिट्टी, चट्टानों एवं अन्य पदार्थों का नीचे की ओर स्थानांतरण होता है।

वृहद् संचलन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Mass Movement)

    वृहद् संचलन की प्रक्रिया अनेक प्राकृतिक एवं भौतिक कारकों से प्रभावित होती है। इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं।

(i) चट्टान की ढाल (Slope of the Rock):-

    जब चट्टानें अधिक ढाल वाली भूमि पर स्थित होती हैं, तो गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से उनके नीचे की ओर खिसकने की संभावना बढ़ जाती है। सामान्यतः ढाल जितनी अधिक तीव्र होती है, वृहद् संचलन की संभावना उतनी ही अधिक हो सकती है।

(ii) चट्टान की ऊँचाई (Height of the Rock):-

   चट्टान या ढाल की ऊँचाई अधिक होने पर उसके नीचे की ओर खिसकने अथवा गिरने की संभावना बढ़ सकती है। विशेषकर तब, जब चट्टानें अस्थिर हों और उनके आधार को पर्याप्त सहारा प्राप्त न हो।

(iii) चट्टान का आधार (Base of the Rock):-

    जिस आधार पर कोई चट्टान स्थित होती है, उसके कमजोर होने से चट्टान की स्थिरता कम हो जाती है। आधार के कमजोर या कट जाने पर उसके ऊपर स्थित चट्टानें गुरुत्वाकर्षण बल के कारण तेजी से नीचे खिसक सकती हैं।

(iv) भूकंप एवं मानवीय गतिविधियाँ (Earthquakes and Human Activities)

    भूकंप के झटके चट्टानों एवं ढालों की स्थिरता को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार, सड़क निर्माण, खनन तथा ढालों की कटाई जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी वृहद् संचलन की संभावना बढ़ा सकती हैं।

(v) वनस्पति का विनाश (Destruction of Vegetation):-

    वनस्पति की जड़ें मिट्टी को बाँधने तथा ढालों को स्थिर बनाए रखने में सहायता करती हैं। जब वनस्पति नष्ट हो जाती है, तो मिट्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है और वृहद् संचलन की संभावना बढ़ जाती है। विशेष रूप से नग्न एवं वनस्पतिविहीन चट्टानी ढालों पर यह प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।

3. वृहद् संचलन के प्रमुख प्रकार (Major Types of Mass Movement):-

    वृहद् संचलन को गति एवं संचलन की प्रकृति के आधार पर मुख्यतः तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है।

(i) मंद संचलन (Slow Movements)

(ii) तीव्र संचलन (Rapid Movements)

(iii) भूस्खलन (Landslides)

Mass Wasting

(i) मंद संचलन (Slow Movements)

      मंद संचलन वह प्रक्रिया है, जिसमें ढाल पर स्थित मिट्टी एवं अन्य पदार्थ बहुत धीमी गति से गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नीचे की ओर खिसकते हैं। इस प्रकार के संचलन में पदार्थों का स्थानांतरण इतना धीमा होता है कि कई बार इसका प्रभाव लंबे समय के बाद स्पष्ट दिखाई देता है।

     मंद संचलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं।

(a) मृदा सर्पण (Soil Creep):-

     मृदा सर्पण वह प्रक्रिया है, जिसमें ढाल पर स्थित मिट्टी धीरे-धीरे गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नीचे की ओर खिसकती रहती है। इसमें मिट्टी के कणों का विस्थापन बहुत धीमी गति से होता है, इसलिए इसे सामान्यतः लंबे समय तक प्रत्यक्ष रूप से पहचानना कठिन होता है।

     मृदा सर्पण की प्रक्रिया में जल की उपस्थिति मिट्टी के कणों की गति को सुगम बना सकती है। पहाड़ी ढालों पर मिट्टी की धीमी गति के कारण पेड़, टेलीफोन के खंभे तथा अन्य ऊर्ध्वाधर वस्तुएँ धीरे-धीरे झुकने लगती हैं। कभी-कभी ढाल के सहारे मिट्टी के छोटे-छोटे टीले भी बन जाते हैं।

मृदा सर्पण की प्रमुख विशेषताएँ:

  • मिट्टी का संचलन अत्यंत धीमी गति से होता है।
  • यह मुख्यतः गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।
  • इसका प्रभाव लंबे समय के बाद स्पष्ट दिखाई देता है।
  • पेड़ों एवं खंभों का झुकना इसका प्रमुख संकेत है।

(b) टैलस सर्पण (Talus Creep):-

     टैलस का अर्थ है पहाड़ी ढालों के नीचे एकत्रित छोटे-बड़े चट्टानी टुकड़ों का ढेर। इन चट्टानी टुकड़ों को शैल-मलबा भी कहा जाता है।

     जब गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ऐसे चट्टानी टुकड़े धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकते हैं, तो इस प्रक्रिया को टैलस सर्पण (Talus Creep) कहते हैं।

    यह प्रक्रिया मुख्यतः उन पहाड़ी ढालों पर देखने को मिलती है, जहाँ चट्टानों के टूटने से पर्याप्त मात्रा में शैल-मलबा एकत्रित हो जाता है।

(c) शैल-हिमानी सर्पण (Rock-Glacier Creep):-

     शैल-हिमानी सर्पण ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शैल-मलबे तथा बर्फ से युक्त मिश्रित पदार्थ गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से मंद गति से ढाल के नीचे की ओर खिसकते हैं।

    यह प्रक्रिया विशेष रूप से ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है, जहाँ चट्टानी मलबे के बीच बर्फ मौजूद होती है। ऐसे मिश्रित पदार्थों का धीरे-धीरे नीचे की ओर संचलन शैल-हिमानी सर्पण कहलाता है।

(d) सॉलिफ्लक्शन (Solifluction):-

    सॉलिफ्लक्शन वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी या मृदा पदार्थ धीरे-धीरे ढाल के नीचे की ओर खिसकते हैं। यह प्रक्रिया प्रायः ठंडे एवं पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक देखी जाती है।

    इसमें मिट्टी जल से संतृप्त होने के कारण अपनी स्थिरता खोने लगती है और गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से धीरे-धीरे नीचे की ओर संचलित होती है। सॉलिफ्लक्शन में पदार्थों का प्रवाह किसी निश्चित मार्ग तक सीमित होना आवश्यक नहीं है।

(ii) तीव्र संचलन (Rapid Movements)

     तीव्र संचलन में मिट्टी, चट्टानी मलबा अथवा अन्य पदार्थ अपेक्षाकृत तेज गति से ढाल के नीचे की ओर गिरते या बहते हैं। इस प्रकार के संचलन में जल की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि जल मिट्टी एवं मलबे को संतृप्त करके उनकी स्थिरता कम कर देता है।

   तीव्र संचलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं।

(a) मृदा-प्रवाह (Soil Flow):-

    मृदा-प्रवाह वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से पहाड़ी ढाल पर नीचे की ओर बहने लगती है।

   जब मिट्टी में जल की मात्रा बढ़ जाती है, तो मिट्टी के कणों के बीच स्थिरता कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में मिट्टी एक प्रवाही पदार्थ की तरह ढाल के नीचे की ओर संचलित होती है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • मिट्टी में जल की मात्रा अधिक होती है।
  • गुरुत्वाकर्षण बल संचलन का प्रमुख कारण होता है।
  • मिट्टी ढाल के नीचे की ओर प्रवाहित होती है।

(b) कीचड़-प्रवाह (Mud Flow):-

      कीचड़-प्रवाह वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी एवं महीन पदार्थ कीचड़ के रूप में ढाल के नीचे की ओर तेजी से बहने लगते हैं। इसमें जल की मात्रा इतनी अधिक हो सकती है कि मिट्टी और अन्य महीन पदार्थ एक गतिशील मिश्रण का रूप ले लेते हैं।

    कीचड़-प्रवाह पर्वतीय क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण उत्पन्न हो सकता है। ज्वालामुखीय क्षेत्रों में ज्वालामुखीय राख, धूल एवं पाइरोक्लास्टिक पदार्थों के जल के साथ बहने से भी विनाशकारी कीचड़-प्रवाह की घटनाएँ हो सकती हैं।

    यह प्रक्रिया केवल आर्द्र क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में भी कभी-कभी तीव्र वर्षा के बाद कीचड़-प्रवाह देखने को मिलता है।

    वनस्पति के अभाव, तीव्र ढाल तथा अपरदन की अधिकता के कारण मिट्टी और चट्टानी मलबे का संचलन बढ़ सकता है। जब ये पदार्थ जल के संपर्क में आते हैं, तो उनका मिश्रण कीचड़-प्रवाह का रूप ले सकता है।

कीचड़-प्रवाह के प्रमुख प्रभाव:

  • ढाल के निचले भाग में बड़ी मात्रा में मलबा जमा हो सकता है।
  • पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं को क्षति पहुँच सकती है।
  • मानव बस्तियों एवं अन्य संरचनाओं को नुकसान हो सकता है।
  • सड़कें तथा परिवहन मार्ग अवरुद्ध हो सकते हैं।

(c) मलवा अवघाव (Debris Avalanche):-

    मलवा अवघाव वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी, चट्टानी टुकड़े एवं अन्य मलबा गुरुत्वाकर्षण बल के कारण अचानक तीव्र गति से पहाड़ी ढाल के नीचे की ओर खिसकता या गिरता है।

    इस प्रक्रिया में मलबे का संचलन बहुत तेजी से होता है। पदार्थ प्रायः बिना किसी स्पष्ट घूर्णन गति के ढाल के नीचे की ओर बढ़ते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • मलबे का संचलन अत्यधिक तीव्र होता है।
  • इसमें मिट्टी, चट्टानी टुकड़े तथा अन्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं।
  • यह अचानक घटित हो सकता है।
  • इसके कारण जान-माल एवं प्राकृतिक पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँच सकती है।

(iii) भूस्खलन (Landslides)

     भूस्खलन वृहद् संचलन का एक तीव्र रूप है, जिसमें चट्टानों, मिट्टी अथवा चट्टानी मलबे का बड़ा भाग गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ढाल के नीचे की ओर खिसकता या गिरता है।

    भूस्खलन विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों की तीव्र ढालों पर देखने को मिलता है। इसकी उत्पत्ति में गुरुत्वाकर्षण बल प्रमुख भूमिका निभाता है, जबकि भूकंप, भारी वर्षा, ढालों की कटाई तथा अन्य मानवीय गतिविधियाँ इसे उत्प्रेरित कर सकती हैं।

    भूस्खलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं।

(a) स्लंप (Slump):-

     स्लंप वह प्रक्रिया है, जिसमें मिट्टी या चट्टानी पदार्थ का एक भाग ढाल के नीचे की ओर खिसकते समय घूर्णन गति करता है। इसमें पदार्थ एक वक्राकार सतह के सहारे नीचे की ओर विस्थापित होता है।

    यह प्रक्रिया तब अधिक संभावित होती है, जब ढाल के पदार्थों की स्थिरता कम हो जाती है और गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से उनका संतुलन बिगड़ जाता है।

(b) मलवा-स्खलन (Debris Slide):-

      मलवा-स्खलन वह प्रक्रिया है, जिसमें चट्टानी टुकड़ों, मिट्टी तथा अन्य मलबे का एक भाग ढाल के सहारे नीचे की ओर खिसकता है।

      इसमें पदार्थ का संचलन मुख्यतः एक सतह के सहारे होता है। स्लंप की तुलना में इसमें घूर्णन गति प्रमुख विशेषता नहीं होती।

(c) शैल-स्खलन (Rock Slide):-

    शैल-स्खलन वह प्रक्रिया है, जिसमें चट्टानों का एक बड़ा भाग किसी ढाल या कमजोर सतह के सहारे नीचे की ओर खिसक जाता है।

    यह प्रक्रिया उन क्षेत्रों में हो सकती है, जहाँ चट्टानों में दरारें मौजूद हों अथवा उनकी संरचनात्मक स्थिरता कम हो। भूकंप, भारी वर्षा और चट्टानों के आधार के कमजोर होने से शैल-स्खलन की संभावना बढ़ सकती है।

वृहद् संचलन का महत्त्व (Significance of Mass Movement)

    वृहद् संचलन भू-दृश्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके माध्यम से ढालों पर स्थित चट्टानी पदार्थ एवं मिट्टी नीचे की ओर स्थानांतरित होते हैं। इससे पर्वतीय ढालों का स्वरूप बदलता है तथा निचले भागों में मलबे का जमाव होता है।

     हालाँकि, तीव्र वृहद् संचलन से कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। भूस्खलन, कीचड़-प्रवाह तथा मलवा अवघाव जैसी घटनाएँ मानव बस्तियों, सड़कों, कृषि भूमि एवं प्राकृतिक वनस्पति को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

    इसलिए वृहद् संचलन का अध्ययन भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) में विशेष महत्त्व रखता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

     वृहद् संचलन एक महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें गुरुत्वाकर्षण बल के कारण मिट्टी, चट्टानों तथा अन्य पदार्थों का ढाल के नीचे की ओर स्थानांतरण होता है। इसकी गति के आधार पर इसे मंद संचलन, तीव्र संचलन तथा भूस्खलन जैसे प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। इन प्रक्रियाओं का अध्ययन पर्वतीय ढालों की स्थिरता, भू-दृश्य के विकास तथा प्राकृतिक आपदाओं को समझने में सहायक है।

25. Best Geography as a Chorological and Ecological Science: Its Changing Nature and Development during the 19th Century / भूगोल का कोरोलॉजिकल एवं पारिस्थितिक विज्ञान के रूप में अध्ययन तथा 19वीं शताब्दी में इसकी बदलती प्रकृति और विकास

Geography as a Chorological and Ecological Science: Its Changing Nature and Development during the 19th Century

भूगोल का कोरोलॉजिकल एवं पारिस्थितिक विज्ञान के रूप में अध्ययन तथा 19वीं शताब्दी में इसकी बदलती प्रकृति और विकास

प्रस्तावना (Introduction):

       भूगोल एक गतिशील एवं व्यापक विषय है, जिसका स्वरूप समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। प्रारंभ में भूगोल का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी की सतह, विभिन्न स्थानों, नदियों, पर्वतों तथा देशों का वर्णन करना था। धीरे-धीरे इसका विकास एक वैज्ञानिक विषय के रूप में हुआ और इसमें प्राकृतिक तथा मानवीय घटनाओं के बीच संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन प्रारंभ हुआ।

      भूगोल को समझने के लिए दो महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण हैं- कोरोलॉजिकल विज्ञान (Chorological Science) और पारिस्थितिक विज्ञान (Ecological Science)। कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण विभिन्न भौगोलिक तत्त्वों के क्षेत्रीय वितरण तथा स्थानिक संबंधों पर बल देता है, जबकि पारिस्थितिक दृष्टिकोण मानव, जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करता है।

     19वीं शताब्दी में वैज्ञानिक खोजों, अन्वेषणों, प्राकृतिक विज्ञानों के विकास तथा नए भौगोलिक विचारों के कारण भूगोल की प्रकृति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इस काल में भूगोल ने वर्णनात्मक विषय से आगे बढ़कर वैज्ञानिक विश्लेषण, क्षेत्रीय अध्ययन और मानव-पर्यावरण संबंधों पर अधिक ध्यान देना प्रारंभ किया।

कोरोलॉजिकल विज्ञान के रूप में भूगोल

(Geography as a Chorological Science)

कोरोलॉजी का अर्थ (Meaning of Chorology):

     कोरोलॉजी शब्द का संबंध स्थानों और क्षेत्रों के अध्ययन से है। भूगोल में कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण का अर्थ पृथ्वी की सतह पर विभिन्न प्राकृतिक एवं मानवीय तत्त्वों के वितरण, उनके स्थानिक संबंधों तथा क्षेत्रीय भिन्नताओं का अध्ययन करना है।

     इस दृष्टिकोण के अनुसार, भूगोल का प्रमुख उद्देश्य यह समझना है कि विभिन्न भौगोलिक घटनाएँ कहाँ स्थित हैं, उनका वितरण किस प्रकार है और अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी विशेषताएँ क्यों भिन्न होती हैं।

     उदाहरण के लिए, भारत में मानसूनी वर्षा का वितरण, हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताएँ तथा गंगा के मैदान में जनसंख्या का घनत्व कोरोलॉजिकल अध्ययन के विषय हैं।

कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएँ

(Major Characteristics of the Chorological Approach)

(i) क्षेत्रीय अध्ययन (Regional Study): विभिन्न क्षेत्रों की प्राकृतिक एवं मानवीय विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(ii) स्थानिक वितरण (Spatial Distribution): भौगोलिक घटनाओं के वितरण और अवस्थिति को समझा जाता है।

(iii) क्षेत्रीय भिन्नता (Regional Variation): अलग-अलग क्षेत्रों की भौगोलिक विशेषताओं में पाए जाने वाले अंतर का विश्लेषण किया जाता है।

(iv) तत्त्वों के पारस्परिक संबंध (Interrelationships of Geographical Elements): किसी क्षेत्र में जलवायु, मिट्टी, वनस्पति, जनसंख्या तथा आर्थिक गतिविधियों के बीच संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(v) क्षेत्रीय संश्लेषण (Regional Synthesis): किसी क्षेत्र की विभिन्न विशेषताओं को एक साथ जोड़कर उसकी समग्र भौगोलिक पहचान को समझने का प्रयास किया जाता है।

कोरोलॉजिकल विचारधारा के प्रमुख विद्वान

(Major Scholars of Chorological Thought)

1. इमैनुएल कांट (Immanuel Kant):-

    इमैनुएल कांट ने ज्ञान के संगठन में स्थान और समय के महत्त्व को स्पष्ट किया। उनके विचारों में भूगोल को स्थानिक व्यवस्था से संबंधित ज्ञान के रूप में समझने का आधार मिलता है। उन्होंने भूगोल और इतिहास के अध्ययन के दृष्टिकोणों में अंतर पर भी बल दिया।

2. अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (Alexander von Humboldt):-

    हम्बोल्ट ने विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक घटनाओं के वितरण तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया। उन्होंने अवलोकन, मापन और तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से भौगोलिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

3. कार्ल रिटर (Carl Ritter):-

      कार्ल रिटर ने पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों और उनकी विशिष्टताओं के व्यवस्थित अध्ययन पर बल दिया। उनके दृष्टिकोण में क्षेत्रीय तुलना तथा प्राकृतिक पर्यावरण और मानव जीवन के बीच संबंध महत्त्वपूर्ण थे।

4. अल्फ्रेड हेटनर (Alfred Hettner):-

     अल्फ्रेड हेटनर ने भूगोल को क्षेत्रीय विभेदन (Areal Differentiation) और पृथ्वी की सतह पर विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्टताओं के अध्ययन से संबंधित विज्ञान के रूप में समझाया। उनके विचारों ने आधुनिक कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण को विशेष रूप से प्रभावित किया।

5. कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण का महत्त्व (Importance of the Chorological Approach)

     कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण भूगोल को केवल स्थानों के वर्णन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की विशेषताओं और उनके बीच संबंधों का विश्लेषण करने में सहायता करता है। इसके माध्यम से क्षेत्रीय नियोजन, संसाधन वितरण, जनसंख्या अध्ययन तथा प्राकृतिक और आर्थिक गतिविधियों की स्थानिक असमानताओं को समझा जा सकता है।

पारिस्थितिक विज्ञान के रूप में भूगोल

(Geography as an Ecological Science)

पारिस्थितिकी का अर्थ (Meaning of Ecology):-

     पारिस्थितिकी (Ecology) जीवों और उनके पर्यावरण के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। इसमें जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, जल, वायु, मिट्टी तथा ऊर्जा के बीच संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

    भूगोल में पारिस्थितिक दृष्टिकोण के अंतर्गत मानव और प्राकृतिक पर्यावरण के पारस्परिक संबंधों तथा उनके स्थानिक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। इसमें यह समझने का प्रयास किया जाता है कि पर्यावरण मानव गतिविधियों को किस प्रकार प्रभावित करता है और मानव अपनी गतिविधियों से पर्यावरण में किस प्रकार परिवर्तन लाता है।

पारिस्थितिक दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएँ

(Major Characteristics of the Ecological Approach)

(i) मानव-पर्यावरण संबंध (Human-Environment Relationship): मानव और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच पारस्परिक प्रभावों का अध्ययन।

(ii) जीव एवं पर्यावरण का संबंध (Organism-Environment Relationship): जीवों के जीवन और पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच संबंधों को समझना।

(iii) प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग (Use of Natural Resources): जल, भूमि, वन तथा अन्य संसाधनों के उपयोग और संरक्षण का अध्ययन।

(iv) पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance): प्राकृतिक तंत्रों के संतुलन और उनमें होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण।

(v) पर्यावरणीय परिवर्तन (Environmental Change): मानव गतिविधियों, प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन।

पारिस्थितिकी और भूगोल का संबंध

(Relationship Between Ecology and Geography)

     पारिस्थितिकी और भूगोल के बीच घनिष्ठ संबंध है। पारिस्थितिकी मुख्य रूप से जीवों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करती है, जबकि भूगोल इन संबंधों के स्थानिक वितरण और क्षेत्रीय विविधताओं पर भी ध्यान देता है।

    उदाहरण के लिए, किसी वन क्षेत्र में वनस्पति का प्रकार वर्षा, तापमान, मिट्टी और स्थलाकृति से प्रभावित होता है। इसी प्रकार मानव की कृषि, आवास तथा औद्योगिक गतिविधियाँ पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। इन संबंधों का भौगोलिक अध्ययन पारिस्थितिक दृष्टिकोण के अंतर्गत किया जा सकता है।

पारिस्थितिक दृष्टिकोण का महत्त्व

(Importance of the Ecological Approach)

     पारिस्थितिक दृष्टिकोण प्राकृतिक पर्यावरण और मानव गतिविधियों के बीच संबंधों को समझने में सहायक है। इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा सतत विकास से संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जा सकता है।

     यह दृष्टिकोण वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण, जल प्रदूषण, वनों की कटाई और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याओं के विश्लेषण में विशेष महत्त्व रखता है।

कोरोलॉजिकल एवं पारिस्थितिक दृष्टिकोण में अंतर (Difference Between Chorological and Ecological Approaches)

आधार (Basis) कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण (Chorological Approach) पारिस्थितिक दृष्टिकोण (Ecological Approach)
मुख्य विषय (Main Focus) क्षेत्रों और स्थानिक वितरण का अध्ययन जीवों और पर्यावरण के संबंधों का अध्ययन
प्रमुख उद्देश्य (Main Objective) क्षेत्रीय भिन्नताओं को समझना पारस्परिक पर्यावरणीय संबंधों को समझना
अध्ययन का आधार (Basis of Study) अवस्थिति, वितरण और क्षेत्रीय विशेषताएँ पर्यावरणीय अंतःक्रियाएँ और पारिस्थितिक प्रक्रियाएँ
प्रमुख प्रश्न (Key Question) विभिन्न घटनाएँ कहाँ और क्यों वितरित हैं? जीव और पर्यावरण एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं?
उदाहरण (Example) भारत में वर्षा का क्षेत्रीय वितरण वनस्पति और वर्षा के बीच संबंध

     दोनों दृष्टिकोण एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताओं को पूरी तरह समझने के लिए उसके स्थानिक वितरण और पारिस्थितिक संबंधों, दोनों का अध्ययन आवश्यक हो सकता है।

19वीं शताब्दी में भूगोल की बदलती प्रकृति

(Changing Nature of Geography during the 19th Century)

     19वीं शताब्दी भूगोल के विकास में एक महत्त्वपूर्ण काल था। इस अवधि में भूगोल ने वर्णनात्मक परंपरा से आगे बढ़कर वैज्ञानिक अवलोकन, मापन, क्षेत्रीय विश्लेषण और सैद्धांतिक व्याख्या की दिशा में प्रगति की।

अन्वेषण और भौगोलिक खोजों का विकास

(Development of Exploration and Geographical Discoveries)

    19वीं शताब्दी में विभिन्न क्षेत्रों के अन्वेषण और यात्राओं से भौगोलिक ज्ञान का विस्तार हुआ। पृथ्वी की सतह, पर्वतों, नदियों, महासागरों तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्राकृतिक विशेषताओं के बारे में नई जानकारियाँ प्राप्त हुईं।

    इन अन्वेषणों ने मानचित्र निर्माण, क्षेत्रीय तुलना और प्राकृतिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन को प्रोत्साहित किया।

वैज्ञानिक भूगोल का विकास

(Development of Scientific Geography)

        इस काल में भूगोल के अध्ययन में अवलोकन, मापन, वर्गीकरण तथा तुलनात्मक विधियों का महत्त्व बढ़ा। प्राकृतिक घटनाओं के वितरण और उनके बीच संबंधों को वैज्ञानिक ढंग से समझने का प्रयास किया गया।

      अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने प्राकृतिक घटनाओं के व्यवस्थित अध्ययन तथा उनके पारस्परिक संबंधों की व्याख्या में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कार्ल रिटर ने क्षेत्रीय अध्ययन और विभिन्न क्षेत्रों की तुलना को प्रोत्साहित किया।

आधुनिक भौतिक भूगोल का विकास

(Development of Modern Physical Geography)

      19वीं शताब्दी में भूविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, मौसम विज्ञान तथा अन्य प्राकृतिक विज्ञानों की प्रगति से भौतिक भूगोल को नई दिशा मिली। स्थलरूपों, जलवायु, वनस्पति और पृथ्वी की प्राकृतिक प्रक्रियाओं का अधिक व्यवस्थित अध्ययन होने लगा।

    इससे भूगोल में प्राकृतिक घटनाओं की उत्पत्ति, वितरण और विकास को समझने की वैज्ञानिक प्रवृत्ति मजबूत हुई।

डार्विन के विचारों का प्रभाव

(Influence of Darwin’s Ideas)

      चार्ल्स डार्विन ने 1859 में अपनी पुस्तक On the Origin of Species प्रकाशित की। प्राकृतिक चयन और जैविक विकास से संबंधित उनके विचारों ने जीव विज्ञान सहित अनेक विषयों में वैज्ञानिक बहस को प्रभावित किया।

     इन विचारों ने जीवों तथा पर्यावरण के संबंधों पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया। बाद के समय में पर्यावरण और मानव समाज के संबंधों की व्याख्या करने वाले कुछ भौगोलिक विचारों पर भी विकासवादी चिंतन का प्रभाव पड़ा।

    हालाँकि, डार्विन का जैविक विकास सिद्धांत और भूगोल में प्रयुक्त पर्यावरणीय व्याख्याएँ एक ही अवधारणा नहीं हैं।

पर्यावरण और मानव के संबंधों का अध्ययन

(Study of Human-Environment Relationships)

      19वीं शताब्दी में मानव जीवन और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच संबंधों को समझने में रुचि बढ़ी। जलवायु, स्थलाकृति, जल और प्राकृतिक संसाधनों के मानव जीवन तथा आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाने लगा।

    इसी बौद्धिक पृष्ठभूमि में पर्यावरणीय प्रभावों पर आधारित विभिन्न विचार विकसित हुए। बाद में पर्यावरणीय नियतिवाद (Environmental Determinism) तथा संभावनावाद (Possibilism) जैसे दृष्टिकोणों पर व्यापक चर्चा हुई। इन विचारधाराओं का विकास अलग-अलग समय और बौद्धिक परिस्थितियों में हुआ।

भूगोल का संस्थागत विकास

(Institutional Development of Geography)

     19वीं शताब्दी में विश्वविद्यालयों, भौगोलिक संस्थाओं तथा वैज्ञानिक समाजों के माध्यम से भूगोल के अध्ययन को संस्थागत आधार मिला। भूगोल को एक स्वतंत्र शैक्षणिक विषय के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया को गति मिली।

    1874 में जर्मनी के लाइपजिग विश्वविद्यालय में ऑस्कर पेशेल के स्थान पर फर्डिनेंड वॉन रिचथोफेन की नियुक्ति और 1876 में बर्लिन विश्वविद्यालय में भूगोल की अकादमिक परंपरा के विकास जैसी घटनाएँ भूगोल के संस्थागत विस्तार के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण थीं।

क्षेत्रीय भूगोल का विकास (Development of Regional Geography)

        19वीं शताब्दी में विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्टताओं, प्राकृतिक दशाओं तथा मानव गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन अधिक व्यवस्थित हुआ। भूगोलवेत्ताओं ने क्षेत्रीय विशेषताओं को एक साथ जोड़कर समझने का प्रयास किया।

       क्षेत्रीय भूगोल के इस विकास ने आगे चलकर क्षेत्रीय विभेदन और कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण को मजबूत आधार प्रदान किया।

    19वीं शताब्दी में भूगोल के विकास में प्रमुख विद्वानों का योगदान

(Contribution of Major Scholars to the Development of Geography in the 19th Century)

1. अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (Alexander von Humboldt):-

  अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट जर्मन भूगोलवेत्ता एवं प्रकृतिवादी थे, जिन्हें आधुनिक भौतिक भूगोल के प्रमुख संस्थापकों में गिना जाता है। उन्होंने जलवायु, वनस्पति, स्थलरूप तथा प्राकृतिक घटनाओं के पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन किया।

    उन्होंने अवलोकन, मापन और तुलनात्मक विश्लेषण के माध्यम से भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने समताप रेखाओं (Isotherms) के विकास एवं उपयोग को बढ़ावा दिया तथा ऊँचाई के अनुसार वनस्पति वितरण का अध्ययन किया।

    उनकी प्रमुख पुस्तकें Cosmos (1845–1862), Essay on the Geography of Plants (1807) और Views of Nature (1808) हैं।

2. कार्ल रिटर (Carl Ritter):-

       कार्ल रिटर जर्मन भूगोलवेत्ता थे, जिन्हें आधुनिक क्षेत्रीय भूगोल के संस्थापकों में गिना जाता है। उन्होंने भूगोल के अध्ययन में प्रादेशिक दृष्टिकोण को महत्त्व दिया तथा पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों की प्राकृतिक एवं मानवीय विशेषताओं के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया।

     उनका मानना था कि प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं, जिन्हें व्यवस्थित रूप से समझना आवश्यक है। उनकी प्रमुख पुस्तक Die Erdkunde (एर्डकुंडे) है, जिसका प्रकाशन 1817 में प्रारंभ हुआ। इस ग्रंथ में उन्होंने क्षेत्रीय अध्ययन के माध्यम से भूगोल को वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

3. फ्रेडरिक रैटजेल (Friedrich Ratzel):-

       फ्रेडरिक रैटजेल जर्मन भूगोलवेत्ता थे, जिन्हें मानव भूगोल तथा राजनीतिक भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने मानव और पर्यावरण के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया तथा पर्यावरणीय नियतिवाद (Environmental Determinism) के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

       उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Anthropogeographie (1882) में मानव जीवन पर भौगोलिक परिस्थितियों के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक Politische Geographie (1897) है, जिसमें उन्होंने राज्य, क्षेत्र और राजनीतिक शक्ति के बीच संबंधों का अध्ययन किया। उनके विचारों ने मानव भूगोल और राजनीतिक भूगोल के विकास को प्रभावित किया।

4. फर्डिनेंड वॉन रिचथोफेन (Ferdinand von Richthofen):-

       फर्डिनेंड वॉन रिचथोफेन ने क्षेत्रीय अध्ययन, भू-आकृतिक प्रक्रियाओं तथा भौगोलिक अनुसंधान के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने व्यवस्थित क्षेत्रीय अवलोकन और वैज्ञानिक विश्लेषण को प्रोत्साहित किया।

      उनके कार्यों ने भूगोल के संस्थागत तथा वैज्ञानिक विकास को आगे बढ़ाने में सहायता की।

19वीं शताब्दी में भूगोल के विकास की प्रमुख विशेषताएँ

(Major Characteristics of Geographical Development in the 19th Century)

    19वीं शताब्दी में भूगोल के विकास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:

✍️ वर्णनात्मक से वैज्ञानिक अध्ययन की ओर परिवर्तन (Transition from Descriptive to Scientific Study): भौगोलिक तथ्यों के विवरण के साथ वैज्ञानिक व्याख्या पर बल बढ़ा।

✍️ क्षेत्रीय अध्ययन का विस्तार (Expansion of Regional Studies): विभिन्न क्षेत्रों की विशेषताओं और उनके बीच अंतर का व्यवस्थित अध्ययन हुआ।

✍️ प्राकृतिक विज्ञानों से संबंध (Association with Natural Sciences): भूविज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा मौसम विज्ञान के साथ भूगोल का संबंध मजबूत हुआ।

✍️ मानव-पर्यावरण संबंधों पर ध्यान (Focus on Human-Environment Relationships): प्राकृतिक पर्यावरण और मानव गतिविधियों के पारस्परिक प्रभावों का अध्ययन बढ़ा।

✍️ वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग (Use of Scientific Methods): अवलोकन, मापन, तुलना और वर्गीकरण को महत्त्व मिला।

✍️ अकादमिक संस्थानों का विकास (Growth of Academic Institutions): विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थाओं में भूगोल का अध्ययन अधिक व्यवस्थित हुआ।

निष्कर्ष (Conclusion):- 

     भूगोल की प्रकृति को समझने में कोरोलॉजिकल और पारिस्थितिक दृष्टिकोणों का विशेष महत्त्व है। कोरोलॉजिकल दृष्टिकोण विभिन्न क्षेत्रों की विशेषताओं, स्थानिक वितरण तथा क्षेत्रीय भिन्नताओं पर बल देता है, जबकि पारिस्थितिक दृष्टिकोण जीवों, मानव और प्राकृतिक पर्यावरण के पारस्परिक संबंधों को समझने में सहायता करता है।

      19वीं शताब्दी में वैज्ञानिक खोजों, प्राकृतिक विज्ञानों की प्रगति तथा हम्बोल्ट, रिटर और रैटजेल जैसे विद्वानों के योगदान से भूगोल की प्रकृति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। भूगोल का विकास वर्णनात्मक अध्ययन से आगे बढ़कर वैज्ञानिक विश्लेषण, क्षेत्रीय संश्लेषण और मानव-पर्यावरण संबंधों के अध्ययन की दिशा में हुआ।

    इस प्रकार 19वीं शताब्दी ने आधुनिक भूगोल के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण आधार तैयार किया और भूगोल को एक व्यवस्थित, वैज्ञानिक तथा व्यापक शैक्षणिक विषय के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया।

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