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47. Factor Influencing Agricultural Pattern (कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक)

Factor Influencing Agricultural Pattern

(कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक)



      कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारकों को मोटे तौर पर प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी कारकों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

     प्राकृतिक कारकों में जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति और जल की उपलब्धता शामिल हैं। 

    आर्थिक कारकों में बाजार की मांग, कीमतें, श्रम की उपलब्धता और ऋण तक पहुंच शामिल हैं।

     सामाजिक कारकों में भूमि स्वामित्व, सांस्कृतिक प्रथाएं और जनसंख्या घनत्व शामिल हैं।

    तकनीकी कारकों में सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक और बेहतर बीज का चयन शामिल हैं। 

कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक:

1. प्राकृतिक कारक:

(i) जलवायु:

    तापमान, प्रकाश, वर्षा और आर्द्रता जैसे जलवायु कारक फसल के विकास और उसके उपज को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं।

(ii) मिट्टी:

    मिट्टी की उर्वरता, बनावट और जल धारण करने की क्षमता फसल के प्रकार और उसके उपज को निर्धारित करती है।

(iii) स्थलाकृति:

    समतल भू-भाग, ऊँचाई और ढलान फसल के प्रकार और खेती के तरीकों को प्रभावित करते हैं।

(iv) जल की उपलब्धता:

   सिंचाई और वर्षा जल की उपलब्धता फसलों की सिंचाई और विकास के लिए आवश्यक है।

2. आर्थिक कारक:

(i) बाजार की माँग:

    फसलों की कीमतें और बाजार की मांग किसानों को यह तय करने में मदद करती है कि कौन सी फसलें उगाना है।

(ii) कीमतें:

    फसलों की कीमतें और इनपुट लागत (जैसे- उर्वरक, बीज, कीटनाशक) किसानों के मुनाफे को प्रभावित करती हैं जो कि फसल पैटर्न को प्रभावित करती हैं।

(iii) श्रम की उपलब्धता:

   श्रम की उपलब्धता और लागत कृषि कार्यों को प्रभावित करती है, जैसे कि बुवाई, निराई, कटाई इत्यादि।

(iv) ऋण तक पहुंच:

   किसानों को फसल उगाने के लिए काफी पूँजी की आवश्यकता होती है, और ऋण तक पहुंच उनके फसल पैटर्न को प्रभावित कर सकती है।

3. सामाजिक कारक:

(i) भूमि स्वामित्व:

     भूमि का स्वामित्व और आकार किसानों के फसल पैटर्न को प्रभावित करता है।

(ii) सांस्कृतिक प्रथाएं:

    कुछ क्षेत्रों में, विशिष्ट फसलें उगाने की सांस्कृतिक प्रथाएं होती हैं।

(iii) जनसंख्या घनत्व:

   अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में, गहन कृषि और अधिक फसल चक्रण की प्रवृत्ति होती है।

4. तकनीकी कारक:

(i) सिंचाई:

     सिंचाई की उपलब्धता फसलों के प्रकार और उपज को प्रभावित करती है।

(ii) उर्वरक और कीटनाशक:

    उर्वरक और कीटनाशकों का उचित मात्रा में उपयोग फसलों की उपज को बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन उनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान भी पहुंचा सकता है।

(iii) बेहतर बीज का चयन:    उच्च उपज और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के चयन का उपयोग फसलों की उपज को बढ़ाने में मदद करता है।

अन्य कारक:

⇒ सरकारी नीतियाँ:

    सरकार की नीतियाँ, जैसे कि कृषि सब्सिडी और न्यूनतम मूल्य समर्थन, किसानों के फसल पैटर्न को काफी प्रभावित कर सकती हैं।

⇒ परिवहन और संचार:

     परिवहन और संचार सुविधाओं की उपलब्धता फसलों के परिवहन और बाजार तक पहुंचने में काफी मदद करती है।

⇒ शिक्षा और प्रौद्योगिकी:

     शिक्षा और प्रौद्योगिकी का स्तर किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों और फसल पैटर्न को अपनाने में काफी मदद करता है। 

46. Indian Agricultural Policies (भारतीय कृषि नीतियाँ)

Indian Agricultural Policies

(भारतीय कृषि नीतियाँ)



स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार के प्रयास

            स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं:- 

⇒ भूमि सुधारों पर केन्द्रित प्रथम संविधान संशोधन।

⇒ जमींदारी प्रथा की समाप्ति, भूमि हदबंदी सीमा अधिनियम।

⇒ प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्राथमिकता।

⇒ भूदान और सर्वोदय आंदोलनों को प्रोत्साहन तथा।

⇒ भू-राजस्व वसूली के लिए उपयुक्त व्यवस्था तैयार करना।

⇒  खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने हेतु हरित क्रांति।

⇒ कृषि के लिए आवश्यक क्षेत्रों जैसे- सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक आदि में निवेश।

⇒ कृषकों को वित्तीय सहायता, कर राहत, सब्सिडी आदि के प्रावधान।

नई कृषि नीति:-

     कृषि विकास की कम दर के कारण एक नई कृषि नीति की आवश्यकता महसूस की गई क्योंकि 1990-91 से 1998-99 में खाद्यान्न उत्पादन की विकास दर मात्र 1.8 प्रतिशत थी जो कि जनसंख्या वृद्धि दर के बराबर थी।

      भारत सरकार ने 28 जुलाई 2000 को एक नई कृषि नीति की घोषणा की जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में 4% वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त करना है। 

   नई कृषि नीति में अपर्याप्त पूँजी, कृषि पदार्थों के संग्रहण तथा विपणन की समस्या को कृषि विकास की धीमी गति के लिए जिम्मेदार माना गया हैं।

कृषि क्षेत्र के विकास हेतु सरकार द्वारा किए गए हालिया प्रयास

⇒ 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की दिशा में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि पहल।

⇒ कृषि के व्यापक विकास हेतु 2007 में राष्ट्रीय कृषक नीति।

⇒ कृषि संबंधी जानकारी हेतु किसान कॉल सेंटर की सुविधाएँ।

⇒ खेती में वित्त संबंधी समस्या हेतु किसान क्रेडिट कार्ड, ऋण सुविधा, न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी पहल।

⇒ सिंचाई समस्याओं को हल करने हेतु ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’।

⇒ रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव को कम करने हेतु नीम कोटेड यूरिया।

⇒ जमीन की उर्वरता और जैव विविधता को संरक्षित करने हेतु जैविक खेती को बढ़ावा।

⇒ मृदा स्वास्थ्य एवं पोषण की जानकारी हेतु मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना।

⇒ कृषि में जोखिम न्यूनता हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना।

⇒ खाद्यान्नों के भंडारण और उनके प्रसंस्करण से जुड़ी ढांचागत विकास पर ध्यान।

⇒ कृषि उत्पादों के बेचने हेतु बड़ा बाजार ई- नाम  (e-NAM) अर्थात् राष्ट्रीय कृषि बाजार (National Agricultural Market) और APMC अर्थात् कृषि उपज मंडी समिति (Agricultural Produce Market Committee) कानून।

⇒ जलवायु परिवर्तन के अनुसार जैविक खेती को बढ़ावा, कृषि में नवचार, अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा।

⇒ कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने हेतु 2018 में कृषि निर्यात नीति।

⇒ फसल कटाई के बाद बुनियादी ढाँचा प्रबंधन एवं कृषि परिसंपत्तियों में निवेश हेतु कृषि अवसंरचना कोष का गठन।

भारतीय कृषि नीतियों के मुख्य घटक

(i) न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP):-

    सरकार द्वारा घोषित यह मूल्य, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करता है, जिससे उन्हें नुकसान से बचाया जा सके। 

    सरकार, कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न फसलों के लिए MSP (Minimum Support Price) निर्धारित करती है।

(ii) सिंचाई परियोजनाएँ:-

    सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से, विशेष रूप से सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

(iii) उर्वरक और बीज सब्सिडी:-

   सरकार द्वारा उर्वरकों और बीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी, किसानों को इनपुट लागत कम करने और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करती है। 

(iv) कृषि ऋण:-

    किसानों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराना, उन्हें निवेश करने और अपनी उपज बढ़ाने में मदद करता है।

(v) भूमि सुधार:-

    भूमि सुधारों के माध्यम से, भूमि का समान वितरण और जोत की अधिकतम सीमा तय की जाती है, जिससे किसानों को अपनी जमीन पर बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है। 

(vi) कृषि अनुसंधान और विकास:-

    सरकार कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश करती है, ताकि नई और बेहतर तकनीकों का विकास हो सके और किसानों को उनका लाभ मिल सके।

(vii) कृषि विपणन:-

    कृषि उपज के विपणन को बेहतर बनाने के लिए, सरकार भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण सुविधाओं में सुधार करती है। 

(viii) कृषि शिक्षा और विस्तार:-

    कृषि शिक्षा और विस्तार सेवाओं के माध्यम से, किसानों को नवीनतम तकनीकों और सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में जानकारी दी जाती है। 

(ix) कृषि निर्यात नीति:-

    निर्यात को बढ़ावा देने के लिए, सरकार कृषि उत्पादों के निर्यात को सरल और सुगम बनाने के लिए नीतियाँ बनाती है। 

(x) कृषि वानिकी नीति:-

    यह नीति जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए कृषि उत्पादकता को अधिकतम करके कृषि आजीविका में सुधार करने के लिए डिजाइन की गई है।

कृषि नीतियों का उद्देश्य:

            कृषि नीतियों का उद्देश्य निम्नलिखित है-

(i) कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि करना।

(ii) किसानों की आय में वृद्धि करना।

(iii) खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।

(iv) कृषि क्षेत्र में स्थिरता लाना।

(v) किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाना।

(vi) कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा करना।

चुनौतियाँ:

⇒ भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून पर अधिक निर्भर है, जिससे कभी सूखा और कभी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है।

⇒ छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक है, जिन्हें ऋण और अन्य संसाधनों तक पहुंचने में कठिनाई होती है।

⇒ कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का उपयोग अभी भी काफी सीमित है। 

⇒ कृषि उत्पादों के विपणन में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे भंडारण और परिवहन की कमी। 

45. White Revolution in India (भारत में श्वेत क्रांति)

White Revolution in India

(भारत में श्वेत क्रांति)



भारत में श्वेत क्रांति (White Revolution in India):-

     भारत की श्वेत क्रांति जिसे ‘ऑपरेशन फ्लड’ के नाम से भी जाना जाता है, वर्ष 1970 में शुरू की गई एक पहल थी जिसका मुख्य उद्देश्य दूध उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाना था।

     इस क्रांति का नेतृत्व डॉ० वर्गीज कुरियन ने किया था, जिन्हें ‘श्वेत क्रांति का जनक’ भी कहा जाता है।

    ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood) वह कार्यक्रम है जिसके कारण “श्वेत क्रांति” हुई। इसने पूरे भारत में उत्पादकों को 700 से अधिक कस्बों और शहरों में उपभोक्ताओं से जोड़ने वाला एक राष्ट्रीय दूध ग्रिड बनाया और मौसमी और क्षेत्रीय मूल्य भिन्नताओं को कम किया, जबकि यह सुनिश्चित किया कि बिचौलियों को खत्म करके उत्पादकों को लाभ का बड़ा हिस्सा मिले।

     ऑपरेशन फ्लड की नींव में गाँव के दूध उत्पादकों की सहकारी समितियाँ हैं, जो दूध खरीदती हैं और इनपुट और सेवाएँ प्रदान करती हैं, जिससे सभी सदस्यों को आधुनिक प्रबंधन और तकनीक उपलब्ध होती है।

श्वेत क्रांति का इतिहास (History of White Revolution)

     वर्ष 1964-1965 के दौरान भारत में सघन पशु विकास कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसमें देश में श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने के लिए पशुपालकों को उन्नत पशुपालन का पैकेज प्रदान किया गया था। बाद में, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने देश में श्वेत क्रांति की गति बढ़ाने के लिए “ऑपरेशन फ्लड” नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया।

   ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत 1970 में हुई थी और इसका उद्देश्य देश भर में दूध ग्रिड बनाना था। यह NDDB (भारतीय राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) द्वारा शुरू किया गया एक ग्रामीण विकास कार्यक्रम था।

    जब ऑपरेशन फ्लड को लागू किया गया था, तब डॉ. वर्गीस कुरियन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष थे। अपने शानदार प्रबंधन कौशल के साथ डॉ. कुरियन ने सहकारी समितियों को क्रांति हेतु सशक्त बनाने के लिए आगे बढ़ाया। इस प्रकार, उन्हें भारत की ‘श्वेत क्रांति का वास्तुकार’ माना जाता है।

    कई बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसमें भाग लिया और इस क्रांति को सशक्त बनाया जिसने भारत में ऑपरेशन फ्लड को श्वेत क्रांति में बदल दिया। गुजरात स्थित सहकारी संस्था अमूल-आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड ने ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

भारत में श्वेत क्रांति के उद्देश्य (Objectives of White Revolution in India)

      श्वेत क्रांति के उद्देश्य निम्नलिखित थे:-

⇒ दूध की खरीद, परिवहन और भंडारण का प्रबंधन शीतलन संयंत्रों में करना।

⇒ पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना।

⇒ सहकारी समितियों द्वारा विभिन्न दुग्ध उत्पादों का उत्पादन और विपणन करना

⇒ बेहतर मवेशी नस्लों (गाय और भैंस), स्वास्थ्य सेवाएँ, पशु चिकित्सा, कृत्रिम गर्भाधान सुविधाएँ और विस्तार सेवाएँ प्रदान करना।

⇒ सहकारी समितियों के विस्तृत नेटवर्क पर आधारित तकनीक के माध्यम से डेयरी उद्योग का प्रबंधन करना।

⇒ गांव के संग्रहण केंद्र पर दूध एकत्र करने के बाद उसे तुरंत दूध शीतलन केंद्र स्थित डेयरी संयंत्र में पहुँचाना।

⇒ शीतलन केन्द्रों का प्रबंधन उत्पादक सहकारी संघों द्वारा किया जाता है, ताकि उनसे कुछ दूरी पर रहने वाले उत्पादकों से दूध एकत्रित करने में सुविधा हो, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त की जा सके।

ऑपरेशन फ्लड का महत्व एवं विशेषताएँ (Importance and features of Operation Flood)

(i) दूध उत्पादन में वृद्धि (Increase in milk production):–

     इस क्रांति ने भारत के दूध उत्पादन को काफी हद तक बढ़ावा दिया, जिससे देश दुनिया भर में सबसे बड़े दूध उत्पादकों में से एक बन गया। इससे बड़ी आबादी को दूध और डेयरी उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई।

(ii) ग्रामीण विकास और रोजगार (Rural development and employment):-

     इस क्रांति ने लाखों छोटे पैमाने के डेयरी किसानों के लिए आय का एक स्थायी स्रोत प्रदान किया, जिससे ग्रामीण आर्थिक विकास हुआ और डेयरी क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा हुए।

(iii) डेयरी उत्पादों में आत्मनिर्भरता (Self-sufficiency in dairy products):-

     भारत दूध की कमी वाले देश से आत्मनिर्भर बन गया है, आयात पर निर्भरता कम हो गई है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो गई है।

(iv) बेहतर पोषण (Better Nutrition):–

     दूध और डेयरी उत्पादों की बढ़ती उपलब्धता ने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर पोषण में योगदान दिया, जिससे कुपोषण से निपटने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद मिली।

(v) महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment):–

      कई महिलाएं डेयरी फार्मिंग में सक्रिय रूप से शामिल थीं, और इस क्रांति ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया, घरेलू निर्णय लेने और सामुदायिक जीवन में उनकी भूमिका को बढ़ाया।

(vi) आर्थिक विकास (Economic development):-

       श्वेत क्रांति ने भारत की जीडीपी को बढ़ावा दिया, जिससे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को बल मिला।

(vii) सहकारी समितियों का गठन (Formation of co-operative societies):-

      श्वेत क्रांति के तहत, सहकारी समितियों का एक मजबूत नेटवर्क स्थापित किया गया, जिसने दूध के संग्रह, प्रसंस्करण और वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(viii) आधुनिक तकनीकों का उपयोग (Use of modern techniques):-

      श्वेत क्रांति ने डेयरी फार्मिंग में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया, जिससे दूध उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार हुआ।

(ix) किसानों को सशक्त बनाना (Empowering the farmers):-

    श्वेत क्रांति ने किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने और अपनी उपज को संसाधित करने के लिए सहकारी समितियों के माध्यम से संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया। 

भारत में श्वेत क्रांति के विभिन्न चरण (Different Phases of White Revolution in India)

     ऑपरेशन फ्लड तीन चरणों में शुरू किया गया था जिनकी चर्चा नीचे की गई है:- 

1. पहला चरण / First Phase (1970-1980):-

     पहला चरण 1970 से शुरू हुआ और 10 वर्षों तक यानि 1980 तक चला। इस चरण का वित्तपोषण विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से यूरोपीय संघ द्वारा दान किए गए मक्खन तेल और स्किम्ड मिल्क पाउडर की बिक्री से किया गया था। 

    कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए, पहले चरण के प्रारंभिक चरण में कुछ लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। ऐसा ही एक लक्ष्य था, लक्ष्यों को पूरा करने के लिए महानगरों में दूध की विपणन रणनीति में सुधार करना।

2. दूसरा चरण / Second Phase (1981-1985):-

      दूसरा चरण 1981 से 1985 तक पाँच वर्षों तक चला। इस चरण के दौरान, दूध शेडों की संख्या 18 से बढ़कर 136 हो गई, दूध की दुकानों का विस्तार लगभग 290 शहरी बाजारों तक किया गया, एक आत्मनिर्भर प्रणाली स्थापित की गई जिसमें 43,000 ग्रामीण सहकारी समितियों में फैले 4,250,000 दूध उत्पादक शामिल थे।

    घरेलू दूध पाउडर का उत्पादन वर्ष 1980 में 22,000 टन से बढ़कर 1989 तक 140,000 टन हो गया, और सहकारी समितियों द्वारा दूध के प्रत्यक्ष विपणन के कारण दूध की बिक्री में भी प्रतिदिन कई मिलियन लीटर की वृद्धि हुई। उत्पादन में सभी वृद्धि केवल ऑपरेशन फ्लड के तहत स्थापित डेयरियों की वजह से हुई। 

3. तीसरा चरण / Third Phase (1985-1996):-

      तीसरा चरण भी लगभग 10 वर्षों तक चला, यानी 1985-1996 तक। इस चरण ने डेयरी सहकारी समितियों को विस्तार करने में सक्षम बनाया और कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया। इसने दूध की बढ़ती मात्रा की खरीद और विपणन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया। 

     श्वेत क्रांति या ऑपरेशन फ्लड के अंत में 73,930 डेयरी सहकारी समितियां स्थापित की गईं, जिनसे 3.5 करोड़ से अधिक डेयरी किसान सदस्य जुड़े। वर्तमान में श्वेत क्रांति के कारण भारत में कई सौ सहकारी समितियां हैं जो बहुत कुशलता से काम कर रही हैं। इसलिए, यह क्रांति कई भारतीय गांवों की समृद्धि का कारण है।

(i) असमान विकास (Uneven Development):– भारत में श्वेत क्रांति के लाभ भारत के सभी क्षेत्रों में समान रूप से वितरित नहीं हुए। कुछ राज्यों में, विशेष रूप से उत्तर और पश्चिम में, महत्वपूर्ण प्रगति हुई, जबकि अन्य पिछड़ गए, जिसके कारण क्षेत्रीय असमानताएं पैदा हुईं।

(ii) पर्यावरणीय चिंताएं (Environmental concerns):– डेयरी फार्मिंग के तीव्र होने से अतिचारण, जल प्रदूषण और स्थानीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं, जिससे पारिस्थितिक स्थिरता संबंधी चिंताएं बढ़ गईं।

(iii) क्रॉस-ब्रीडिंग पर अत्यधिक जोर (Excessive emphasis on cross-breeding):– विदेशी मवेशियों की नस्लों के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग पर ध्यान देने से स्वदेशी मवेशियों की आबादी में गिरावट आई, जो स्थानीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त हैं और उन्हें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है।

(iv) अपर्याप्त बुनियादी ढांचा (Inadequate Infrastructure):– महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद, कई ग्रामीण क्षेत्रों में शीत भंडारण, परिवहन और पशु चिकित्सा सेवाओं के लिए बुनियादी ढांचा अपर्याप्त बना हुआ है, जिससे दूध उत्पादन और वितरण की पूरी क्षमता सीमित हो रही है।

(v) आर्थिक असमानताएँ (Economic inequalities):– भारत में श्वेत क्रांति ने कई छोटे और सीमांत किसानों को लाभ पहुँचाया, लेकिन इसने असमानताएँ भी पैदा कीं। अधिक संसाधनों वाले बड़े किसान छोटे किसानों की तुलना में अवसरों का अधिक प्रभावी ढंग से लाभ उठा सकते हैं।

(vi) सहकारी संरचनाओं पर निर्भरता (Dependence on co-operative structures):– भारत में श्वेत क्रांति की सफलता काफी हद तक सहकारी समितियों की दक्षता पर निर्भर थी।

(vii) कुछ क्षेत्रों में कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप ने उनके प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न की, जिससे कार्यक्रम का समग्र प्रभाव सीमित हो गया।

(viii) पशु कल्याण के मुद्दे (Animal welfare issues):- दूध उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने से पशु कल्याण के बारे में चिंताएं पैदा हुईं, डेयरी मवेशियों के लिए खराब रहने की स्थिति, अधिक दूध निकालना और अपर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल।

(ix) बाजार संतृप्ति (Market saturation):- कुछ क्षेत्रों में, दूध उत्पादन में तीव्र वृद्धि के कारण बाजार संतृप्ति हो गई, जिससे मूल्य में उतार-चढ़ाव और डेयरी किसानों के लिए आर्थिक अस्थिरता पैदा हो गई।

निष्कर्ष: इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्वेत क्रांति ने भारत के डेयरी उद्योग में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया, जिससे न केवल दूध उत्पादन में वृद्धि हुई, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में भी सुधार हुआ। 

21. Heat Island (उष्मा द्वीप)

Heat Island

(उष्मा द्वीप)



परिभाषा :-

          नगरीय क्षेत्र ऐसे स्थान होते हैं जिसका तापमान ग्रामीण क्षेत्रों के तापमान से प्राय: अधिक देखने को मिलता है। इस घटना को “नगरीय उष्मा द्वीप” कहा जाता है। यह मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों और नगरीय वातावरण में बड़े-बड़े बहुमंजिले इमारतों, सड़कों और अन्य सतहों द्वारा गर्मी को अवशोषित और धारण करने के कारण होता है।

नगरीय ऊष्मा द्वीप के मुख्य कारण:

          नगरीय ऊष्मा द्वीप के मुख्य कारण निम्नलिखित है-

(i) नगरीकरण:-

      नगरीकरण से पेड़-पौधे और हरियाली घटती है, जिससे प्राकृतिक शीतलन (छायांकन व वाष्पोत्सर्जन) कम हो जाता है। नगरों में बड़ी-बड़ी और ऊँचे इमारतों, सड़कों और अन्य पक्के सतहों की अधिकता होती है, जो सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती हैं और इसे धीरे-धीरे छोड़ती हैं जिससे शहरी वातावरण ग्रामीण वातावरण के अपेक्षा अधिक गर्म हो जाते है।

(ii) मानवीय गतिविधियाँ:-

      वाहन, एयर कंडीशनर और औद्योगिक गतिविधियाँ गर्मी उत्पन्न करती हैं, जो ग्रीनहाउस गैसों के कारण फंस जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरों में यातायात, एयर कंडीशनर, औद्योगिक गतिविधियाँ और ऊर्जा का अधिक उपयोग होता हैं।

(iii) हरियाली की कमी:

     नगरीय क्षेत्रों में पेड़ों और अन्य पौधों की कमी होती है, जो गर्मी को अवशोषित करने में मदद करते हैं।

(iv) ऊंची इमारतें:

       ये हवा की गति को कम करती हैं, जिससे गर्म हवा फंसी रहती है और उष्मा को रोक देती हैं जिससे तापमान और बढ़ जाता है।

(v) सतह का रंग:

         अंधेरी सतहें, जैसे कि कंक्रीट और एस्फाल्ट, सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित करती हैं।

नगरीय ऊष्मा द्वीप के प्रभाव

        नगरीय ऊष्मा द्वीप का प्रभाव नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों के तापमान के बीच अंतर में वृद्धि है। इसका मतलब है कि शहर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। यह प्रभाव मुख्य रूप से नगरीकरण के कारण होता है, जिसमें बहुमंजीले इमारतों, सड़कों और अन्य कठोर सतहों की वृद्धि होती है जो सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती हैं और फिर उसे उत्सर्जित करती हैं, जिससे शहर के तापमान में वृद्धि होती है।

     नगरीय ऊष्मा द्वीप के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित है-

(i) स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

    उच्च तापमान लोगों को बीमार कर सकता है, खासकर गर्मी के दिनों में लोगों के स्वास्थ्य पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

⇒ उच्च तापमान के कारण लू लगना, निर्जलीकरण, थकावट और गर्मी से संबंधित अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

⇒ श्वसन संबंधी समस्याओं में वृद्धि हो सकती है।

⇒ तापघात के कारण मृत्यु दर बढ़ सकती है।

(ii) पर्यावरण पर प्रभाव:-

⇒ वायु प्रदूषण: नगरीय ऊष्मा द्वीप ओजोन और अन्य प्रदूषकों के उत्पादन को बढ़ा सकता है, जिससे वायु की गुणवत्ता कम हो जाती है।

⇒जल प्रदूषण: शहरी जलमार्गों में तापमान में वृद्धि से पानी में जैव विविधता कम हो सकती है।

⇒ ऊर्जा की मांग में वृद्धि: एयर कंडीशनिंग और अन्य कूलिंग उपकरणों की मांग में वृद्धि के कारण ऊर्जा की खपत बढ़ती है, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है।

⇒ जलवायु परिवर्तन: नगरीय ऊष्मा द्वीप ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन को तेज कर सकता है।

(iii) आर्थिक प्रभाव:-

⇒ ऊर्जा की खपत में वृद्धि से बिजली की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

⇒ गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज पर खर्च बढ़ सकता है।

⇒ शहरीकरण के कारण बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च हो सकता है।

(iv) उच्च तापमान:-

   नगरीय क्षेत्रों में तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो सकता है, खासकर रात में क्योंकि पार्थिव विकिरण काफी अधिक उत्सर्जित होती है।

(v) ऊर्जा की अधिक खपत:-

    उच्च तापमान के कारण एयर कंडीशनिंग और अन्य ऊर्जा-संवर्धक उपकरणों की आवश्यकता अधिक हो जाती है जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा नगरों में उर्जा की खपत अधिक होती है।

(vi) वायु प्रदूषण:-

   नगरीय क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर भी अधिक हो सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

अन्य प्रभाव:-

⇒ नगरीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर बढ़ सकती है, जिससे जल की उपलब्धता कम हो सकती है।

⇒ नगरीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण गर्मी से संबंधित बीमारियों की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

⇒ नगरीय ऊष्मा द्वीप के कारण इमारतों और अन्य संरचनाओं पर तापीय तनाव बढ़ सकता है।

नगरीय ऊष्मा द्वीप को कम करने के उपाय:-

(i) हरियाली बढ़ाना:-

    पेड़ों और अन्य पौधों को लगाकर शहरी क्षेत्रों में हरियाली को बढ़ावा देना। पार्क, उद्यान और हरे रंग की छतें (ग्रीन रूफ) शहरों में तापमान कम करने में मदद करते हैं। पेड़ छाया प्रदान करते हैं, हवा का तापमान कम करते हैं और शहरी तापमान को कम करने में मदद करते हैं।

(ii) ऊष्मा-प्रतिरोधी सामग्री का उपयोग:-

     इमारतों और सड़कों के निर्माण में ऊष्मा-प्रतिरोधी सामग्री का उपयोग करना। हल्के रंग के फुटपाथ और सड़कें सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके और गर्मी को अवशोषित करके तापमान को कम करने में मदद करते हैं।

(iii) ऊर्जा दक्षता बढ़ाना:-

     ऊर्जा का उपयोग कम करना और ऊर्जा-संवर्धक उपकरणों का उपयोग करना। ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देकर शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की खपत कम हो सकती है, जिससे गर्मी का उत्सर्जन कम होगा. 

(iv) वाहन प्रदूषण कम करना:-

      लोगों को जागरूक करके वाहनों का उपयोग कम किया जा सकता है साथ ही कम प्रदूषण वाले वाहनों का उपयोग किया जा सकता है। सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करके निजी वाहनों की संख्या को कम किया जा सकता है, जिससे गर्मी का उत्सर्जन कम होगा।

(v) शैक्षिक कार्यक्रम:-

     शिक्षा के माध्यम से लोगों को नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव के बारे में जागरूक किया जा सकता है, जिससे वे अपनी ऊर्जा की खपत को कम कर सकते हैं और अधिक टिकाऊ जीवन शैली अपना सकते हैं।

(vi) डिजिटल ट्विन:-

    नगरीय ऊष्मा द्वीप के प्रभाव को मापने और भविष्यवाणी करने के लिए डिजिटल ट्विन का उपयोग किया जा सकता है, जिससे शहर के योजनाकारों को उचित निर्णय लेने में मदद मिलती है। 

भारत के नगरीय ऊष्मा द्वीप के संदर्भ में नासा का विश्लेषण:

(i) नासा के अनुसार, दिल्ली के शहरी भागों में नगरीय ऊष्मा द्वीप की घटनाएंँ अधिक हो रही हैं।

(ii) दिल्ली के आसपास के कृषि क्षेत्रों की तुलना में शहरी भागों का तापमान काफी अधिक है।

(iii) नासा के इकोसिस्टम स्पेसबोर्न थर्मल रेडियोमीटर एक्सपेरिमेंट (इकोस्ट्रेस) द्वारा ली गई तस्वीर ने दिल्ली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लाल धब्बे, साथ ही पड़ोसी शहरों जैसे- सोनीपत, पानीपत, जींद और भिवानी के आसपास छोटे लाल धब्बों का खुलासा किया है।

(iii) इकोस्ट्रेस रेडियोमीटर से युक्त उपकरण है जिसे नासा द्वारा 2018 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजा गया था।

(iv) इकोस्ट्रेस मुख्य रूप से पौधों के तापमान का आकलन करने के साथ-साथ उनकी जल की आवश्यकताओं और उन पर जलवायु के प्रभाव को जानने का कार्य करता है।

(v) इकोस्ट्रेस के आंँकड़ों में ये लाल धब्बे नगरीय ऊष्मा द्वीप के अधिक तापमान, जबकि शहरों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कम तापमान की घटनाओं का संकेत देते हैं।

नीतिगत उपाय:

     नगरीय उष्मा द्वीप (Urban Heat Island) प्रभाव को कम करने के लिए, नीतिगत उपाय के रूप में हरित क्षेत्र, ठंडी छतें और हल्के रंग के फुटपाथों को बढ़ावा देना, पेड़ लगाना, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करना, ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना और शहर की योजना में जलवायु को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष:

   इस प्रकार, उपर्युक्त प्रभावों को देखते हुए, उचित रणनीतियों के साथ उनका मुकाबला करना वर्तमान समय की मांग बन गया है। नीति निर्माताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में अवसरों को बढ़ाने के लिए कदम उठाकर अनियोजित विस्तार को कम करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और आगे के विस्तार की योजना बनानी चाहिए। 

नोट:

डिजिटल ट्विन:- डिजिटल ट्विन जिसे डिजिटल डुप्लिकेट भी कहा जाता है, किसी भौतिक वस्तु, प्रक्रिया अथवा प्रणाली का एक आभासी, डिजिटल प्रतिनिधित्व है।

     यह भौतिक दुनिया की वस्तु की नकल करता है और वास्तविक समय के डेटा के साथ अपडेट होता है तथा विभिन्न वातावरणों में इसके प्रदर्शन एवं व्यवहार का अनुकरण करने के लिए उपयोग किया जाता है।

BIHAR CET BEd Examination 2025 QUESTION BOOKLET PAPER

BIHAR CET BEd Examination 2025

QUESTION BOOKLET PAPER



Bihar BEd Exam QUESTION BOOKLET PAPER

       बिहार बैचलर ऑफ एजुकेशन कंबाइंड एंट्रेंस टेस्ट (बिहार बीएड सीईटी) 2025 की परीक्षा 28 मई को ऑफलाइन मोड में सम्पन्न हुआ। यह परीक्षा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (एलएनएमयू), दरभंगा द्वारा प्रत्येक वर्ष बिहार के विभिन्न परीक्षा केन्द्रों पर ली जाती है। दो वर्षीय बैचलर ऑफ एजुकेशन (बी.एड.) कार्यक्रम में प्रवेश के लिए इस एंट्रेंस टेस्ट का उद्देश्य बिहार के 350 से अधिक सरकारी और निजी कॉलेजों में लगभग 36,000 से अधिक सीटें भरना है।

      इस परीक्षा की पैटर्न और अंको की योजना जानने के लिए नीचे दी गई तालिका को ध्यानपूर्वक देखने से ही पता चलता है कि यह प्रश्न पत्र चार खंडों में विभाजित किया गया है, जिसमें 120 अंकों के लिए 120 बहुविकल्पीय प्रश्न शामिल हैं।


New Pattern of Bihar BEd Exam

Subjects Number of Questions Total Marks
General English Comprehension (Regular Mode)
Or General Sanskrit Comprehension (Shiksha Shastri)
15 15
General Hindi 15 15
Logical & Analytical Reasoning 25 25
Teaching-Learning Environment in Schools 25 25
General Awareness 40 40

Bihar B.Ed. Common Entrance Test (CET-BED)-2025 का QUESTION BOOKLET PAPER का पीडीएफ देखने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर क्लिक करें। 

CET BEd Examination 2025 QUESTION BOOKLET PAPER

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