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23. Social Structure (सामाजिक संरचना)

Social Structure

(सामाजिक संरचना)



Q.- सामाजिक संरचना क्या है? सामाजिक संरचना की अवधारणा, विशेषताएँ एवं तत्त्व लिखिए।

Ans:- सामान्य व्यक्ति जिसे ढांचा कहता है, उसी को समाजशास्त्रीय संरचना कहता है। प्रत्येक भौतिक वस्तु की एक निश्चित संरचना होती है जिसका निर्माण विभिन्न इकाइयों के मिश्रण से होता है। ये निर्माणक इकाइयां सुव्यवस्थित रूप से परस्पर सम्बन्धित रहती हैं तथा इनमें स्थिरता पाई जाती है।

   संरचना के लिए आवश्यक होता है कि सभी इकाइयां सुनिश्चित स्थान पर रहते हुए अपनी-अपनी भूमिका का उचित निर्वाह करती रहें। जिस प्रकार शरीर का एक निश्चित ढांचा होता है ठीक उसी प्रकार समाज की भी संरचना होती है। मानव संरचना की भांति सामाजिक संरचना भी अनेक इकाइयों का मिश्रित रूप होती है।

    सामाजिक संरचना की विभिन्न इकाइयों में विभिन्न प्राथमिक व द्वितीयक समूह जैसे- परिवार, क्रीड़ा समूह, जाति, पड़ोस, सेना, व्यापारिक संगठन, औद्योगिक संस्थान, शिक्षण संस्थान, सामाजिक मूल्य, सामाजिक प्रतिमान, आदि को लिया जाता है।

    ये सभी समाज की इकाइयां व्यवस्थित रहते हुए तथा परस्पर सम्बन्धित होते हुए अपने-अपने सुनिश्चित स्थान पर रहते हुए अपने-अपने कार्यों को व्यवस्थित रूप से करती रहती हैं। तभी समाज का बाह्य स्वरूप दिखाई देता है, यही सामाजिक संरचना है।

    संक्षेप में सामाजिक संरचना (Social Structure) एक ऐसा शब्द है जो किसी समाज में व्यक्तियों और समूहों के बीच स्थापित संबंधों और संगठित पैटर्न को दर्शाता है। 

    यह समाज के विभिन्न हिस्सों, जैसे परिवार, स्कूल, धार्मिक संगठन, और सामाजिक क्लबों के बीच के संबंधों को संदर्भित करता है, जो समाज के सदस्यों को एक साथ बांधते हैं।

    सामाजिक संरचना समाज को एक ढांचा प्रदान करती है, जिसमें लोग अपने विभिन्न गुणों, रुचियों और व्यक्तिगत पहलुओं के आधार पर एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हैं। 

सामाजिक संरचना की अवधारणा:-

   सामाजिक संरचना की अवधारणा को विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाया है।

कार्ल मानहीम ने सामाजिक संरचना को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “सामाजिक संरचना परस्पर क्रिया करती हुई सामाजिक शक्तियों का जाल है, जिससे निरीक्षण और चिन्तन की विभिन्न प्रणालियों का जन्म होता है।”

    स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना का निर्माण सामाजिक शक्तियों के माध्यम से होता है। ये सामाजिक शक्तियां एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित रहती हुई कार्य करती रहती हैं तथा निरीक्षण एवं चिन्तन की पद्धतियों को जन्म देती रहती हैं।

मॉरिस जिन्सबर्ग के अनुसार, “सामाजिक संरचना का अध्ययन सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों अर्थात् समूह, समूहों के प्रकार, समितियों, संस्थाओं और इनके संकुलों से जिससे कि समाज का निर्माण होता है, से है।”

   इस परिभाषा से स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना का निर्माण उन विशिष्ट इकाइयों से होता है जिनसे कि समाज का निर्माण होता है।

जॉनसन के अनुसार, “किसी भी वस्तु की संरचना से हमारा आशय इसके भागों में सापेक्षिक रूप से पाए जाने वाले स्थायी अन्तः सम्बन्धों से होता है।”

रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “संस्था द्वारा परिभाषित और नियमित सम्बन्धों में लगे हुए व्यक्तियों की क्रमबद्धता ही सामाजिक संरचना है।”

टालकोट पारसन्स के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर सम्बन्धित संस्थाओं, एजेन्सियों, सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समाज में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण किए गए पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमवद्धता को कहते हैं।”

     इन विचारों से स्पष्ट है कि मात्र समाज की विभिन्न इकाइयों या तत्वों को जिनसे कि समाज का निर्माण होता है, सामाजिक संरचना के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि जब समाज की विभिन्न निर्माणक इकाइयों में एक निश्चित रूप में क्रमबद्धता होती है तभी सामाजिक संरचना कहा जाता है।

एस. एस. नैडेल के अनुसार, “सामाजिक संरचना विभिन्न अंगों की क्रमबद्धता को स्पष्ट करती है, यह तुलनात्मक रूप से स्थायी होती है, किन्तु इसका निर्माण करने वाले अंग परिवर्तनशील होते हैं।”

    इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि सामाजिक संरचना की प्रकृति तो स्थायी होती है, किन्तु सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाली इकाइयां चाहे कोई भी क्यों न हों, परिवर्तनशील प्रकृति की होती हैं या हो सकती हैं।

सामाजिक संरचना की विशेषताएँ

     सामाजिक संरचना की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं:

(1) समाज की बाह्य संरचना:-

    सामाजिक संरचना समाज के ढांचे से जानी जाती है। ढांचे के लिए आवश्यक निर्णायक इकाइयों में पाई जाने वाली क्रमबद्धता ही सामाजिक संरचना है। यद्यपि प्रत्येक समाज की संरचना में पर्याप्त समानता पाई जाती है, फिर भी वह दूसरे समाज से अलग अपनी पहचान बनाए रखता है। एक समाज दूसरे समाज से कुछ न कुछ बातों में भिन्न होता है जो व्यवहारों के प्रतिमानों के रूप में दिखाई देती है।

(2) विशिष्ट क्रमबद्धता:-

      पारसन्स ने परस्पर सम्बन्धित संस्थाओं और समितियों की विशिष्ट क्रमबद्धता को सामाजिक संरचना कहा है। सामाजिक संरचना में विभिन्न इकाइयां एक-दूसरे से जुड़कर एक ढांचा तैयार करती हैं। यही सामाजिक संरचना है। स्पष्ट है कि सामाजिक संरचनाएं इकाइयों में पाई जाने वाली विशिष्ट क्रमबद्धता ही है।

(3) तुलनात्मक रूप से स्थिर:-

     नैडेल का मानना है कि संरचना अपने निर्माण करने वाले अंगों से अधिक स्थायी होती है। अंग परिवर्तनशील होते हुए भी अपने में विद्यमान क्रमबद्धता की दृष्टि से स्थिर होते हैं। मानव में आयु के अनुसार परिवर्तन आता है। यह परिवर्तन उसके आचार-विचारों में भी होता है, किन्तु इन व्यक्तियों द्वारा निर्मित होने वाले समूह अधिक स्थिर होते हैं।

(4) अमूर्तता:-

     जब किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु द्वारा परिभाषित किया जाता है तो उसे सम्बन्ध कहा जाता है। जब ये सम्बन्ध जागरूक चेतनायुक्त प्राणियों के मध्य पारस्परिक रूप में पाए जाते हैं तब उन्हें सामाजिक सम्बन्ध कहा जाता है। इन्हें अमूर्त सम्बन्ध कहा जाता है। इन सम्बन्धों द्वारा बनने वाले समाज की संरचना अमूर्त होती है।

    राइट महोदय ने सामाजिक संरचना के अमूर्त पक्ष को महत्व दिया। पारसन्स ने सामाजिक संरचना की इकाइयों में सामाजिक प्रतिमानों को महत्वपूर्ण स्थान दिया। ये प्रतिमान अमूर्त एवं बाह्य होते हैं।

(5) खण्डात्मक विभाजन:-

      सामाजिक संरचना में खण्डात्मक विभाजन पाया जाता है। सामाजिक इकाइयों में अनेक उप संरचनाएं पाई जाती हैं। इसकी प्रत्येक इकाई में उप संरचनाएं होती हैं। धर्म, राजनीति, आर्थिक, पारिवारिक एवं सामाजिक संस्थाएं सामाजिक संरचनाओं की महत्वपूर्ण अंग होती हैं। ये सभी संस्थाएं अपनी व्यक्तिगत सामाजिक संरचनाएं रखती हैं।

(6) संघटन एवं विघटन:-

     सामाजिक संरचनाओं का आधार सामाजिक प्रतिमान होता है जो देशकाल एवं परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। पुराने मूल्यों का स्थान नवीन मूल्य ग्रहण करने लगते हैं। इससे समाज में पुराने मूल्यों के आधार पर विघटन प्रारम्भ हो जाता है। जबकि नवीन मूल्यों के आधार पर समाज की पुनर्रचना प्रारम्भ हो जाती है।

(7) सामाजिक प्रक्रियाएं:-

    सामाजिक संरचनाओं में सामाजिक प्रक्रियाओं का योगदान रहता है। सामाजिक प्रतिक्रियाओं द्वारा सामाजिक संरचनाओं का रूप निर्धारित होता है जबकि सामाजिक संरचनाएं इन प्रक्रियाओं का नियमन करती हैं।

(8) क्षेत्रीयता:-

    प्रत्येक संरचना अपना एक सामाजिक क्षेत्र रखती है। इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक, आदि संस्थाओं को वहां की भौगोलिक दशाएं प्रभावित करती हैं।

सामाजिक संरचना के तत्व

   सामाजिक संरचना का निर्माण समितियों एवं संस्थाओं के आधार पर होता है। सामाजिक संरचना के तत्व निम्नांकित हैं:-

(1) नियमात्मक प्रणाली:-

     प्रत्येक समाज की व्यवस्था वास्तविक व्यवहारों पर नियन्त्रण करती है। जिन नियमों द्वारा नियन्त्रण होता है, उन्हें ही नियमात्मक प्रणाली के अन्तर्गत जाना जाता है। समाज द्वारा स्वीकृत एवं मान्य मूल्यों के आधार पर ही व्यक्ति अपनी भूमिका अदा करता है। सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था इन्हीं मूल्यों एवं नियमों पर आधारित है।

(2) पद व्यवस्था:-

    सामाजिक संरचना में व्यक्तियों की स्थिति उनके व्यक्तिगत गुण तथा किसी विशिष्टता के आधार पर होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर उनका पद सृजन होता है। व्यक्ति अपनी क्षमताओं के आधार पर इनमें परिवर्तन भी करता रहता है। व्यक्ति एक साथ कई प्रकार के सम्बन्धों में बंधा रहता है यथा पिता, पति, मित्र, अधिकारी, आदि। यह व्यवस्था सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण तत्व हैं।

(3) अनुशासित व्यवस्था:-

     यह व्यवस्था समूह के व्यक्तियों के कार्यों का मूल्यांकन कर उचित एवं अनुचित की मान्यता प्रदान करती है। सामाजिक संरचना के भाग एवं उपभाग सभी एक दूसरे से सम्बन्धित आदर्शों एवं मूल्यों के कारण होते हैं। समाज में इस व्यवस्था के कारण ही पुरस्कार एवं दण्ड व्यवस्था का प्रावधान है।

(4) अपेक्षाओं की व्यवस्था:-

     प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों के पारस्परिक प्रति उत्तरों का पूर्वानुमान लगाकर ही व्यवहारों का सन्तुलित नियमन होता है। मानव अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करता रहता है जिससे सामाजिक संरचना का स्वरूप निर्धारित होता है और कर्तव्य पालन से ही व्यवहारों के प्रति उत्तरों को निश्चित एवं नियमित किया जाता है।

(5) क्रिया व्यवस्था:-

     सामाजिक संरचना के लिए एक क्रिया व्यवस्था अत्यावश्यक होती है। इस क्रिया व्यवस्था में सामाजिक क्रियाओं का विशिष्ट स्वरूप पाया जाता है। किसी व्यक्ति द्वारा समाज के लिए किया गया कार्य सामाजिक क्रिया कहलाता है। इसके लिए कर्ता, उसकी प्रेरणा और उस क्रिया की पृष्ठभूमि या सन्दर्भ का होना आवश्यक होता है। समाज की क्रियाशीलता का प्रमुख कारण क्रिया व्यवस्था है जिसे जीवन्त रखने के लिए सामाजिक संरचना सर्वदा प्रयत्नशील रहती है। क्रिया व्यवस्था सामाजिक संरचना को गतिशील बनाती है।

23. Environmental laws (पर्यावरण कानून)

Environmental laws

(पर्यावरण कानून)



      पर्यावरण कानून पानी की गुणवत्ता, वायु गुणवत्ता, लुप्तप्राय वन्य प्राणी, और कई अन्य पर्यावरणीय कारकों से संबंधित कानूनों और विनियमों का एक संग्रह है।

⇒ पर्यावरण कानून कई कानूनों और विनियमों को शामिल करता है, लेकिन वे सभी पर्यावरण के लिए खतरों को कम करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए मानव – प्रकृति की बातचीत को विनियमित करने के एक सामान्य लक्ष्य की दिशा में काम करते हैं।

⇒ जैसा कि हम कल्पना कर सकते हैं कि पर्यावरण कानून व्यापक है क्योंकि प्राकृतिक पर्यावरण में कई पहलू शामिल हैं। इसका मतलब है कि पर्यावरण कानून में हम जिस हवा में सांस लेते हैं, जिस प्राकृतिक संसाधनों पर हम निर्भर करते हैं, पेड़-पौधों और जीवों के लिए जो इस दुनिया को हमारे साथ साझा करते हैं, सब कुछ ध्यान में रखना जरूरी है।

   संक्षेप में पर्यावरण कानून वे नियम और विनियम हैं जो पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के लिए बनाए गए हैं। ये कानून पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत् विकास को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

⇒ पर्यावरण के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग की आवश्यकता भारत के संवैधानिक ढांचे और भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं में भी परिलक्षित होती है।

⇒ भाग IV क (अनुच्छेद 51A- मौलिक कर्तव्य) के तहत भारतीय संविधान भारत के प्रत्येक नागरिकों पर वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और जीवित प्राणियों के लिए करुणा रखने का कर्तव्य रखता है।  

⇒ इसके अलावा भारत के संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 48A- राज्य की नीति निदेशक तत्व) के तहत यह प्रावधान किया गया है कि राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

⇒ भारत की आजादी से पहले भी कई पर्यावरण संरक्षण कानून मौजूद थे। हालांकि, एक अच्छी तरह से विकसित ढांचे को लागू करने के लिए वास्तविक जोर मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (स्टॉकहोम, 1972) के बाद ही आया।  

⇒ स्टॉकहोम (स्वीडन) सम्मेलन के बाद, पर्यावरण से संबंधित मुद्दों की देखभाल के लिए एक नियामक निकाय की स्थापना के लिए 1972 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के भीतर पर्यावरण नीति और योजना के लिए राष्ट्रीय परिषद की स्थापना की गई थी। यह परिषद बाद में एक पूर्ण विकसित पर्यावरण और वन मंत्रालय के रूप में विकसित हुई।

⇒ पर्यावरण और वन मंत्रालय की स्थापना 1985 में हुई थी, जो आज पर्यावरण संरक्षण को विनियमित करने और सुनिश्चित करने के लिए देश में सर्वोच्च प्रशासनिक निकाय है और इसके लिए कानूनी और नियामक ढांचा तैयार करता है।

⇒ 1970 के दशक से, कई पर्यावरण कानून बनाए गए हैं।

⇒ पर्यावरण और वन मंत्रालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अर्थात् केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) मिलकर इस क्षेत्र के नियामक और प्रशासनिक कोर बनाते हैं।

पर्यावरण से संबंधित अन्य कानून

⇒ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972

⇒ जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974

⇒ वन संरक्षण अधिनियम, 1980

⇒ वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981

⇒ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986

⇒ सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम, 1991

⇒ ओजोन – क्षयकारी पदार्थ (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000

⇒ जैविक विविधता अधिनियम, 2002

⇒ राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010

⇒ तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2011

उद्देश्य

1. पर्यावरण संरक्षण:-

    पर्यावरण कानूनों का उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण करना है।

2. प्रदूषण नियंत्रण:-

   पर्यावरण कानून प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए बनाए गए हैं।

3. सतत विकास:-

    पर्यावरण कानून सतत विकास को बढ़ावा देने और पर्यावरणीय संसाधनों के संरक्षण के लिए बनाए गए हैं।

लाभ

1. पर्यावरण कानून पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण में मदद करते हैं।

2. पर्यावरण कानून जन स्वास्थ्य की रक्षा में मदद करते हैं।

3. पर्यावरण कानून आर्थिक लाभ प्रदान कर सकते हैं, जैसे कि पर्यावरण पर्यटन और हरित प्रौद्योगिकी के विकास के माध्यम से।

चुनौतियाँ

1. अनुपालन:-

   पर्यावरण कानूनों का अनुपालन एक बड़ी चुनौती हो सकती है, खासकर छोटे और मध्यम आकार के उद्योगों के लिए।

2. जागरूकता:-

    पर्यावरण कानूनों के बारे में जागरूकता का अभाव एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

3. वित्तपोषण:-

    पर्यावरण कानूनों के कार्यान्वयन और अनुपालन के लिए वित्तपोषण भी एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

निष्कर्ष:

     निष्कर्षत: भारत में पर्यावरण कानून न केवल देश के मूलभूत कानूनों द्वारा संरक्षित है, बल्कि मानवाधिकार नीतियों में भी शामिल है। प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक मानवाधिकार प्रदूषण-मुक्त वातावरण में रहना है, क्योंकि स्वच्छ पर्यावरण बनाना मानव समाज के लिए आवश्यक है।

      लोगों को सार्वजनिक निकायों, राज्य एवं संघीय प्रशासनों के लिए विकास प्रक्रियाओं के नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों को पहचानना अति आवश्यक है।

     पर्यावरण कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए क्योंकि ये नागरिकों को स्वच्छता को प्राथमिकता देने और प्रदूषण से निपटने के लिए प्रोत्साहित करने का एक प्रभावी साधन हैं।

     हालाँकि, पूरे समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्व के बिना केवल पर्यावरण कानून ही पर्याप्त नहीं हैं।

22. Sewage disposal (मलजल निपटान)

Sewage disposal

(मलजल निपटान)

 

     मलजल निपटान (Sewage disposal) का हिंदी अर्थ है मलजल का निस्तारण या अपशिष्ट जल का निपटान अर्थात सीवेज का निपटान (Sewage disposal) का मतलब सीवेज (मलजल) को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से वातावरण में वापस छोड़ने या उसका फिर से उपयोग करने की प्रक्रिया से है।

Sewage disposal

    इसमें सीवेज को इकट्ठा करना, उसको साफ करना और फिर उसे प्राकृतिक जल स्रोतों में छोड़ना या कृषि कार्य, औद्योगिक या अन्य उपयोगों के लिए पुन: उपयोग करना शामिल है।

सीवेज प्रबंधन की प्रमुख अवस्थाएँ:

Major Stages of Sewage Management

1. संग्रहण (Collection):-

     सीवेज का संग्रहण अपशिष्ट जल प्रबंधन की पहली अवस्था है। घरों, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों, अस्पतालों तथा औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को विभिन्न सीवर लाइनों और नालियों के माध्यम से एकत्र किया जाता है।

      इस प्रक्रिया का उद्देश्य सीवेज को व्यवस्थित रूप से एक स्थान पर एकत्र करना तथा उसे खुले में फैलने से रोकना है। उचित संग्रहण से जल एवं पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।

2. परिवहन (Transportation):-

     संग्रहित किए गए सीवेज को सीवर नेटवर्क के माध्यम से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (Sewage Treatment Plant) तक पहुँचाया जाता है। इसके लिए भूमिगत पाइपलाइनों, मुख्य सीवर लाइनों तथा आवश्यकता पड़ने पर पंपिंग स्टेशनों का उपयोग किया जाता है।

     परिवहन की उचित व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि अपशिष्ट जल बिना रिसाव या रुकावट के उपचार संयंत्र तक पहुँचे और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्या उत्पन्न न हो।

3. उपचार (Treatment):-

     सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में पहुँचने के बाद अपशिष्ट जल को विभिन्न उपचार प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है। इन प्रक्रियाओं का मुख्य उद्देश्य सीवेज में मौजूद ठोस पदार्थ, जैविक प्रदूषक, रासायनिक पदार्थ तथा अन्य हानिकारक तत्वों को कम या हटाना होता है।

      उपचार के बाद जल की गुणवत्ता में सुधार होता है और उसे सुरक्षित निपटान या पुनः उपयोग के योग्य बनाया जा सकता है। उपचार सामान्यतः विभिन्न चरणों में किया जाता है।

4. निपटान या पुनः उपयोग (Disposal or Reuse):-

     उपचारित सीवेज का उचित निपटान या पुनः उपयोग सीवेज प्रबंधन की महत्वपूर्ण अवस्था है। उपचार के बाद प्राप्त जल को निर्धारित मानकों के अनुसार नदियों, झीलों या समुद्र जैसे प्राकृतिक जल निकायों में छोड़ा जा सकता है।

     इसके अतिरिक्त, उपचारित जल का उपयोग सिंचाई, औद्योगिक प्रक्रियाओं, बागवानी तथा अन्य गैर-पेय उद्देश्यों में भी किया जा सकता है। इससे जल संसाधनों पर दबाव कम करने में सहायता मिलती है।

5. उप-उत्पाद (By-products):-

      सीवेज उपचार की विभिन्न प्रक्रियाओं के दौरान कीचड़ (Sludge) सहित कई उप-उत्पाद उत्पन्न होते हैं। इनमें सीवेज से अलग किए गए ठोस और जैविक पदार्थ शामिल हो सकते हैं। इन उप-उत्पादों का उचित उपचार, सुरक्षित भंडारण और निपटान आवश्यक होता है।

       उचित प्रबंधन के अभाव में स्लज दुर्गंध, मिट्टी तथा जल प्रदूषण जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है। इसलिए सीवेज उपचार के साथ इसके उप-उत्पादों का सुरक्षित प्रबंधन भी आवश्यक है।

सीवेज निपटान एवं उपचार के प्रमुख तरीके:

     उचित सीवेज निपटान जल जनित बीमारियों के प्रसार को रोकने में मदद करता है। सीवेज में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को हटाकर, सीवेज निपटान सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने का काम करता है।

2. पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection):-

   सीवेज निपटान जल निकायों और मिट्टी को प्रदूषण से बचाने में मदद करता है। इस प्रकार सीवेज का सुरक्षित निपटान पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाता है।

3. सौंदर्य और मनोरंजक मूल्य (Beauty and Recreation Value):-

   उचित सीवेज निपटान जल निकायों के सौंदर्य और मनोरंजक मूल्य को बनाए रखने में मदद करता है।

4. संसाधनों का पुन: उपयोग (Resource Reuse):-

    उपचारित सीवेज का पुन: उपयोग पानी और अन्य संसाधनों की कमी को कम करने में मदद करता है।

चुनौतियाँ (Challenges):

1. बुनियादी ढांचा (Infrastructure):-

   पुराना या अपर्याप्त सीवेज बुनियादी ढांचा ओवरफ्लो और प्रदूषण का कारण बन सकता है। इसीलिए बुनियादी ढांचा का समय-समय पर निगरानी रखना काफी जरुरी है।

2. वित्तपोषण (Financing):-

    सीवेज निपटान प्रणालियों के लिए बुनियादी ढांचे और रख-रखाव में महत्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता होती है। अत: सरकार को इसके लिए पर्याप्त वित्तपोषण करना चाहिए।

3. जन जागरूकता (Public Awareness):-

   उचित सीवेज निपटान के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण कदम है। इसमें सरकारें, कई सामाजिक संस्थाएं तथा जन सहयोग की सक्रीय भागीदारी जरुरी है।

निष्कर्ष (Coclusion):

   इस प्रकार उचित सीवेज निपटान जन स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीवन की गुणवत्ता की रक्षा के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

21. Cleaning of rivers (नदियों की सफाई)

Cleaning of rivers

(नदियों की सफाई)


Cleaning of rivers

    नदियों की सफाई (Cleaning of rivers) एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसे भारत में विशेष रूप से गंगा नदी की सफाई के संदर्भ में देखा जाता है।

   नदियों की सफाई के लिए अनेकों प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें मोटे तौर पर सरकारी, सामुदायिक और व्यक्तिगत प्रयास शामिल हैं। नमामि गंगे कार्यक्रम जैसी राष्ट्रीय योजनाएँ, नदियों को प्रदूषण से बचाने और उनके पुनर्जीवन पर केंद्रित हैं।

    व्यक्तिगत स्तर पर, लोग नदियों में कचरा न डालकर, जल संरक्षण करके और पेड़-पौधे लगाकर नदियों को साफ रखने में योगदान कर सकते हैं।

नदियों की सफाई हेतु प्रमुख प्रयास:

Major Initiatives for River Cleaning

1. सरकारी प्रयास/Government Initiatives:

       भारत में नदियों की सुरक्षा और स्वच्छता के लिए सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

(i) गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan):-

       गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan) भारत सरकार द्वारा 1985 में शुरू की गई एक महत्त्वपूर्ण नदी संरक्षण योजना थी। इसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी में बढ़ते जल प्रदूषण को नियंत्रित करना तथा जल की गुणवत्ता में सुधार करना था। योजना के अंतर्गत घरेलू एवं औद्योगिक सीवेज को नदी में सीधे गिरने से रोकने, सीवेज उपचार संयंत्रों की स्थापना, घाटों के विकास तथा जन-जागरूकता जैसे उपाय किए गए।

      इसका एक प्रमुख उद्देश्य गंगा के जलीय एवं नदीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण और पुनर्जीवन भी था। आगे चलकर इस योजना का विस्तार अन्य नदियों तक किया गया और बाद में नमामि गंगे कार्यक्रम के माध्यम से गंगा संरक्षण के प्रयासों को व्यापक रूप दिया गया।

(ii) नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme):-

      नमामि गंगे कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा गंगा नदी के प्रदूषण में प्रभावी कमी, संरक्षण तथा पुनरुद्धार के उद्देश्य से शुरू किया गया एक प्रमुख समेकित नदी संरक्षण कार्यक्रम है। इसे वर्ष 2014 में 20,000 करोड़ रुपए के बजट के साथ वर्ष 2021 तक की अवधि के लिये लॉन्च किया गया था।

⇒ इसके अंतर्गत सीवेज उपचार अवसंरचना, नदी-तट विकास, नदी की सतह की सफाई, जैव-विविधता संरक्षण, वनीकरण, औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी तथा जन-जागरूकता जैसे कार्य किए जाते हैं।

⇒ कार्यक्रम के दूसरे चरण नमामि गंगे मिशन-II को जनवरी 2022 में ₹22,500 करोड़ के अतिरिक्त परिव्यय के साथ 31 मार्च 2026 तक स्वीकृति दी गई। इस प्रकार दोनों चरणों का कुल स्वीकृत परिव्यय ₹42,500 करोड़ रहा।

मुख्य उद्देश्य: गंगा को “निर्मल” (प्रदूषणमुक्त) और “अविरल” (निरंतर प्रवाहयुक्त) बनाना तथा इसके पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करना है।

(iii) राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना / National River Conservation Plan (NRCP):-

     राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश में नदियों के प्रदूषण को कम करना और पानी की गुणवत्ता में सुधार करना है।

⇒ यह योजना गंगा नदी बेसिन को छोड़कर, देश की अन्य प्रमुख नदियों के प्रदूषणग्रस्त हिस्सों पर केंद्रित है।

⇒ NRCP के तहत, राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।

(iv) सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP):-

   नदियों में प्रदूषण को कम करने के लिए एसटीपी का निर्माण किया गया है, जो सीवेज को साफ करके नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करते हैं।

(v) औद्योगिक अपशिष्ट उपचार/ Industrial Waste Treatment:-

   उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करने के लिए नियम बनाए गए हैं। अर्थात औद्योगिक अपशिष्ट उपचार, औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाले दूषित पानी को साफ करने की प्रक्रिया है ताकि इसे पर्यावरण में सुरक्षित रूप से छोड़ा जा सके या पुन: उपयोग किया जा सके।

⇒ इसमें विभिन्न प्रकार की भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

 2. समुदायिक प्रयास/Community Effort:

     नदियों की सफाई एक महत्वपूर्ण सामुदायिक प्रयास है जिसमें स्थानीय लोगों, गैर सरकारी संगठनों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों को मिलकर काम करना होता है। यह प्रयास नदियों के प्रदूषण को कम करने, जल की गुणवत्ता में सुधार करने और समुदायों के लिए स्वच्छ जल सुनिश्चित करने में काफी मदद करता है। 

(i) स्वयंसेवी सफाई अभियान/ Voluntary Cleanliness Campaign:-

    इसके तहत लोग नदियों से कचरा उठाते हैं और जागरूकता फैलाते हैं।

(ii) जल संरक्षण अभियान /Water Conservation Campaign:-

       इसके तहत नदियों, तालाबों एवं जलस्रोतों को स्वच्छ और सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न संरक्षण कार्य किए जाते हैं। लोगों को जल बचाने, प्रदूषण रोकने, वर्षा जल संचयन तथा जलस्रोतों के पुनर्जीवन के प्रति जागरूक किया जाता है।

3. व्यक्तिगत प्रयास/Individual Effort:

   नदियों की साफ-सफाई के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी कई प्रयास किए जा सकते हैं। जिसमें मुख्य रूप से इधर-उधर कचरा न फैलाना, पेड़-पौधे लगाना, जल संरक्षण का पालन करना, जागरूकता फैलाना और सफाई अभियानों में बढ़-चढ़कर भाग लेना शामिल है। 

(i) कचरा न फैलाना/ Do Not Litter:-

     नदियों में कचरा न डालकर हम प्रदूषण को कम कर सकते हैं।

(ii) पेड़ लगाना / Plant Trees:-

     पेड़-पौधे लगाने से मिट्टी का कटाव कम होता है और नदियों में गाद जमा होने से रोका जा सकता है।

(iii) जल संरक्षण का पालन करना/ Practice Water Conservation:-

    पानी का सीमित उपयोग करके हम नदियों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं।

(iv) जागरूकता फैलाना/ Spread Awareness:-

    नदियों के महत्व के बारे में दूसरों को जागरूक करना अर्थात् नदियों को साफ रखने के लिए हम सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा।

(v) सफाई अभियान/ Cleanliness Drive:-

      नदी के किनारे या आस-पास के क्षेत्रों में सफाई अभियान में हमेशा बढ़ चढ़ कर भाग लेना चाहिए। सभी छात्रों को अपने स्कूल, कॉलेज या समुदाय को भी किसी जल निकाय को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता हैं। 

निष्कर्ष (Conclusion):

    इस प्रकार निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि नदियों की सफाई करना एक जटिल समस्या है, इसके लिए सभी जनता के सहयोग और प्रभावी प्रयासों की आवश्यकता है। सरकार, औद्योगिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और आम जनता को मिलकर काम करना होगा ताकि हमारी नदियाँ साफ और स्वस्थ हो सकें।

10. Population Composition, Growth, Density and Distribution (World) / जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण (विश्व)

Population Composition, Growth, Density and Distribution (World)

जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण (विश्व)



       विश्व की जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण एक जटिल विषय है जो भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारकों से प्रभावित होता है। जनसंख्या संरचना में उम्र, लिंग, जातीयता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे कारक शामिल हैं। जनसंख्या वृद्धि जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास जैसे कारकों से प्रभावित होती है। जनसंख्या घनत्व प्रति इकाई क्षेत्र में लोगों की संख्या को दर्शाता है जबकि जनसंख्या वितरण से तात्पर्य है कि पृथ्वी की सतह पर लोग कैसे फैले हुए हैं।

Population Composition

जनसंख्या संरचना

    जनसंख्या संरचना से तात्पर्य जनसंख्या के विभिन्न घटकों जैसे आयु, लिंग, जातीयता, शिक्षा, व्यवसाय, आदि के आधार पर जनसंख्या का विभाजन है। यह जनसंख्या की गुणात्मक विशेषताओं को दर्शाता है और इससे किसी क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिशीलता को समझने में काफी मदद होती है।
     विश्व की जनसंख्या संरचना के कुछ प्रमुख तत्व इस प्रकार हैं:-
1. आयु संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न आयु समूहों के लोगों का अनुपात को आयु संरचना कहा जाता है।

⇒ यह जनसंख्या की वृद्धि दर, विकास दर और भविष्य की संभावनाओं को समझने में मदद करता है।

⇒ उदाहरण के लिए, युवा जनसंख्या वाले देशों में उच्च जन्म दर और तीव्र जनसंख्या वृद्धि की संभावना होती है, जबकि वृद्ध जनसंख्या वाले देशों में धीमी वृद्धि या जनसंख्या में कमी हो सकती है। 

2. लिंग संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात को लिंग संरचना कहा जाता है।

⇒ यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों से प्रभावित होता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कुछ देशों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक हो सकती है, जबकि अन्य में इसके विपरीत हो सकता है। 

3. जातीय संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न जातीय समूहों का अनुपात को जातीय संरचना कहा जाता है।

⇒ यह सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कुछ देशों में एक ही जातीय समूह के लोग अधिक संख्या में हो सकते हैं, जबकि अन्य में कई जातीय समूहों का मिश्रण हो सकता है।

4. शिक्षा:

⇒ किसी जनसंख्या में शिक्षित और अशिक्षित लोगों का अनुपात।

⇒ यह जनसंख्या की साक्षरता दर, कौशल स्तर और आर्थिक विकास को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, उच्च साक्षरता दर वाले देशों में बेहतर स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति की संभावना होती है।

5. व्यवसाय:

⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों का अनुपात।

⇒ यह जनसंख्या की आर्थिक गतिविधियों, कौशल स्तर और जीवन स्तर को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कृषि प्रधान देशों में अधिकांश लोग कृषि कार्यों में लगे हो सकते हैं, जबकि औद्योगिक देशों में औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में अधिक लोग काम करते हैं। 

जनसंख्या संरचना का महत्व:

⇒ यह किसी देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

⇒ यह सरकारों और नीति निर्माताओं को जनसंख्या से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को बनाने में मदद करती है।

⇒ यह जनसंख्या की वृद्धि दर, विकास दर और भविष्य की संभावनाओं का अनुमान लगाने में मदद करती है।

⇒ यह व्यवसायों को अपने उत्पादों और सेवाओं को लक्षित करने में मदद करता है।

जनसंख्या वृद्धि

    जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है किसी क्षेत्र में लोगों की संख्या में समय के साथ होने वाली वृद्धि। यह वृद्धि जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास जैसे कारकों से प्रभावित होती है। 

     कृषि की शुरुआत के पूर्व जन्म दर एवं मृत्यु दर में लगभग संतुलन था, फलस्वरूप जनसंख्या लगभग स्थिर थी। कृषि के विकास के साथ खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बढ़ने पर जन्म दर मृत्यु दर की तुलना में अधिक होने लगी, फलस्वरूप लम्बे समय तक जनसंख्या में धीरे-धीरे वृद्धि होती रही। परन्तु औद्योगिक क्रांति के पश्चात खाद्यान्न उत्पादन में तीव्र वृद्धि एवं चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार के साथ जनसंख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होने लगी। पिछले कुछ दशकों में यह वृद्धि विस्फोटक रूप धारण कर चुकी है।

विश्व जनसँख्या में वृद्धि
वर्ष जनसँख्या
1 ई० 2 करोड़
1000 30 करोड़
1650 50 करोड़
1850 100 करोड़
1930 200 करोड़
1960 300 करोड़
1975 400 करोड़
1987 500 करोड़
1999 600 करोड़
2011 700 करोड़
2022 800 करोड़

⇒ पिछली एक शताब्दी में U.S.A की जनसंख्या में 350 प्रतिशत वृद्धि हुई है जबकि भारत में यह वृद्धि 257 प्रतिशत है।

⇒ पिछले 37 वर्षों में विश्व की जनसंख्या दुगुनी हो गई है।

⇒ वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर के अनुसार फ्रांस, जापान, अमेरिका, भारत एवं कीनिया की जनसंख्या क्रमशः 178, 124, 102, 33 एवं 18 वर्षों में दुगुनी हो जाएगी।

⇒ 1950 ई. के पूर्व विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर विकासशील देशों की जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में अधिक थी, परन्तु 1950 के पश्चात् विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक हो गई है।

⇒ इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में विश्व की कुल जनसंख्या 6 अरब हो गई। मात्र एक शताब्दी में ही यह 1.6 अरब से चार गुनी बढ़ गई। हम प्रतिवर्ष आठ करोड़ व्यक्ति जोड़ रहे हैं। वास्वत में गत 500 वर्षों में मानव जनसंख्या में दस गुने से अधिक की वृद्धि हुई है।

⇒ आज जनसंख्या की सर्वाधिक वृद्धि अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के कुछ भागों में हो रही है, जहां मृत्यु दर तेजी से घटी है जबकि जन्म दर काफी ऊंची है।

⇒ विश्व के दस सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में संसार की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। इन दस देशों में से छः देश एशिया महाद्वीप में स्थित हैं। विश्व के प्रत्येक पांच व्यक्तियों में से एक व्यक्ति चीन में निवास करता है तथा प्रत्येक छः में से एक भारत में। भारत में एक हेक्टेयर कृषि भूमि पर 5 व्यक्ति, चीन में 12 व्यक्ति और संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.5 व्यक्ति आश्रित हैं।

⇒ वास्तविक अर्थों में, विश्व की लगभग आधी जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत क्षेत्र पर ही संकेंद्रित है, जबकि कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत भाग लगभग निर्जन है।

⇒ वर्तमान समय में विश्व में जनसंख्या वृद्धि दर 1% है। विकसित देशों में से विकासशील देशों में भी वृद्धि दर कम हो रही है। अनुमान है कि विश्व की जनसंख्या 2022 में 8 अरब तथा वर्ष 2037 में 9 अरब तक पहुंच जाएगी। 

⇒ अफ्रीका की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर (2.5 प्रतिशत) आज विश्व के प्रमुख देशों में सबसे अधिक है। अफ्रीका की सबसे अधिक आबादी वाले देश नाइजीरिया में जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक दर 2.4 प्रतिशत है।

⇒ नाइजीरिया की वर्तमान जनसंख्या 22 करोड़ है जो इस दर से अगले 25 वर्षों से कम समय में ही दोगुनी हो जायेगी।

⇒ दक्षिण अमेरिका, एशिया, ओशिनिया और उत्तरी अमेरिका में औसत वार्षिक वृद्धि दर 1 से 2 प्रतिशत के बीच है। इसके विपरीत यूरोप में वृद्धि दर न्यूनतम अर्थात 0.2 प्रतिशत ही है।

⇒ रूस और यूक्रेन, दोनों ही सीआईएस (स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रमंडल) के सदस्य हैं, प्राकृतिक जनसंख्या परिवर्तन के मामले में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। दोनों देशों में जन्म दर कम है और मृत्यु दर अधिक है, जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या वृद्धि धीमी है या नकारात्मक है। इसके अतिरिक्त, यूक्रेन में रूस के साथ युद्ध के कारण जनसंख्या में भारी गिरावट आई है, जिसमें शरणार्थी संकट और मृत्यु दर शामिल है। 

      जनसंख्या वृद्धि दर की दृष्टि से संपूर्ण विश्व को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-

(i) अत्यधिक वृद्धि दर:-

     इसके अंतर्गत वे देश आते है, जहां वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 3% से भी अधिक है। विश्व में अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि दर वाले देशों में, कुछ अफ्रीकी देश सबसे आगे हैं, जैसे कि नाइजर, अंगोला, बेनिन और युगांडा इसके अलावा, सीरिया भी इस सूची में शामिल है। इन देशों में जन्म दर मृत्यु दर से काफी अधिक है, और मृत्यु दर में भी कमी आई है, जिससे जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। 2100 तक, दुनिया की एक तिहाई आबादी अफ्रीकी हो सकती है।

(ii) अधिक वृद्धि दर:-

    इस वर्ग के देशों में जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक गति 2% से 3% के बीच है। इसके अंतर्गत मध्य अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, द. पू. एशिया सहित एशिया के अनेक देश आते हैं, जैसे: बांग्लादेश।

(iii) मध्यम वृद्धि दर:-

    विश्व के मध्यम जनसंख्या वृद्धि दर वाले देशों में मुख्य रूप से वे देश शामिल हैं जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर 1% से 2% के बीच है। इन देशों में आमतौर पर विकासशील देश शामिल होते हैं, जहाँ जन्म दर अधिक होती है, लेकिन मृत्यु दर में भी सुधार हो रहा है, जिससे जनसंख्या में वृद्धि होती है।, जैसे:

उदाहरण के लिए, कुछ मध्यम जनसंख्या वृद्धि दर वाले देश हैं: 

⇒ अफ्रीका: नाइजीरिया, इथियोपिया, तंजानिया।

⇒ एशिया: भारत, पाकिस्तान, इंडोनेशिया।

⇒ मध्य पूर्व: सऊदी अरब, ईरान।

⇒ लैटिन अमेरिका: मेक्सिको, ब्राजील।

(iv) न्यून वृद्धि दर:-

     इस वर्ग के देशों में जनसंख्या वृद्धि दर 1% से भी कम है। इसके अंतर्गत अधिकांश विकसित देश आते हैं। कुछ विकसित देशों में जनसंख्या में स्थायित्व आ चुका है एवं जनसंख्या ह्रास की प्रवृत्ति है, जैसे: अमेरिका- 0.5%, जापान- (-०.4%)।

जनसंख्या घनत्व

⇒ जनसंख्या घनत्व का अर्थ सामान्यतः किसी क्षेत्र में प्रति वर्ग किलोमीटर या प्रति मील अथवा प्रति हेक्टेयर में निवास करने वाली जनसंख्या से लगाया जाता है।

⇒ जनसंख्या घनत्व एक निश्चित भू-भाग के संपूर्ण क्षेत्र एवं कुल जनसंख्या का अनुपात है।

⇒ जनसंख्या घनत्व के अध्ययन से हमे यह किसी क्षेत्र विशेष जनसंख्या भार, जनाधिक्य एवं जनाभाव, अनुकूलतम जनसंख्या आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

⇒ जनसंख्या घनत्व की संकल्पना का उपयोग 1837 में हेनरी ड्यूटी द्वारा आयरलैंड में किया गया था।

⇒ जनसँख्या घनत्व से मनुष्य एवं भूमि के निरन्तर बदलते सम्बन्धों को बताया जा सकता है किन्तु कम बसे एवं अधिक संसाधन वाले रूस, संयुक्त राज्य, ब्राजील जैसे देशों में यह वृद्धि उत्साहजनक मानी जाती है, जबकि चीन, भारत, जापान, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया जैसे सीमित संसाधनों वाले एवं अत्यधिक जनसंख्या वाले देशों में यह वृद्धि निराशाजनक एवं अभिशाप भी मानी जाती है।

      जनसंख्या घनत्व निम्नलिखित प्रकार का होता है:-

(1) गणितीय घनत्व:-

     यह वास्तविक घनत्व भी कहलाता है। किसी क्षेत्र की जनसंख्या और वहाँ के क्षेत्रफल के अनुपात को गणितीय घनत्व कहा जाता है। यह मानव एवं भूमि अनुपात भी कहलाता है। इसे निम्नांकित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है-

गणितीय घनत्व = कुल जनसंख्या / कुल क्षेत्रफल

(2) कृषि घनत्व:-

     यह घनत्व किसी प्रदेश की कृषिगत भूमि एवं उस क्षेत्र में निवास करने वाली कृषि जनसंख्या के अनुपात से प्राप्त होता है। इसका सूत्र निम्न है-

कृषि घनत्व = कृषक जनसंख्या / कृषिगत भूमि का क्षेत्रफल

   कृषि जनसंख्या में वयस्क कृषक तथा कृषि श्रमिक तथा उनके परिवार सम्मिलित होते हैं।
(3) आर्थिक घनत्व:-

    यह घनत्व किसी प्रदेश के आर्थिक संसाधनों की उत्पादन क्षमता एवं वहाँ की जनसंख्या अनुपात से प्राप्त होता है, जैसे-

आर्थिक घनत्व = प्रदेश की जनसंख्या / प्रदेश के संसाधनों की उत्पादन क्षमता

  आर्थिक घनत्व निकालना थोड़ा जटिल होता है क्योंकि आर्थिक संसाधनों का मूल्यांकन करना आसान कार्य नहीं है।

(4) कायिकी घनत्व:-

    इसे कुल क्षेत्रफल के स्थान पर कुल कृषि भूमि से जनसंख्या को विभाजित करके प्राप्त किया जाता है।

कायिकी घनत्व = देश की कुल जनसंख्या/देश की कुल कृषि योग्य भूमि

(5) पौष्टिक घनत्व:-

    इस घनत्व से कृषि भूमि की भार वहन क्षमता ज्ञात होती है। इस घनत्व को भोज्य फसलों के उत्पादक क्षेत्र के क्षेत्रफल तथा उस क्षेत्र में पायी जाने वाली समस्त जनसंख्या के अनुपात से ज्ञात किया जाता है।

पौष्टिक घनत्व = कुल जनसंख्या / खाद्यान्न फसलों के अन्तर्गत क्षेत्र

(6) अधिवासीय घनत्व:-

    यदि कुल क्षेत्रफल के स्थान पर कुल मानव अधिवासीय क्षेत्र जनसंख्या को विभाजित किया जाय तो इसे अधिवासीय घनत्व कहा जाता है।

(7) नगरीय तथा ग्रामीण घनत्व:-

      नगरीय क्षेत्र की प्रति इकाई और ग्रामीण प्रति इकाई में जितने व्यक्ति निवास करते हैं, इसे नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या घनत्व कहते है।

विश्व की जनसंख्या का घनत्व (Density of Population of the World):-
     विश्व में जिस प्रकार अधिकांश देशों की कुल जनसंख्या में बहुत अधिक अन्तर है, उसी भाँति देशो के जनसंख्या घनत्व में जमीन-आसमान का अन्तर पाया जाता है।

       जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से विश्व को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(1) सबसे अधिक घनत्व वाले देश (प्रदेश):-

     जहाँ का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक है, ऐसे देश इसके अन्तर्गत आते है। विकासशील देशों के कृषि, औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्रों में एवं विकसित देशों में औद्योगिक एवं व्यापारिक केन्द्रों (नगर) में सभी स्थानों पर आबादी घनी पायी जाती है। दक्षिणी व द.-पू. एशिया की नदी घाटियों एवं उपजाऊ मैदानों में तथा पश्चिमी यूरोप की औद्योगिक पेटी में एवं संयुक्त राज्य का मध्यवर्ती व पूर्वी औद्योगिक प्रदेश सभी में जनसंख्या का घनत्व बहुत ही अधिक है।

(2) घने बसे प्रदेश:-

     इनका घनत्व 200 से 400 मनुष्य प्रति वर्ग किमी० है। इस भाग में भारत, यूरोप और चीन के कृषि-प्रधान क्षेत्र है जिनके बीच-बीच में औद्योगिक क्षेत्रों की पेटियाँ मिलती है, अतः कई भागो में स्थानीय घनत्व 400 मनुष्य से भी अधिक का हो जाता है। उपयुक्त जलवायु, पर्याप्त जलवृष्टि तथा उपजाऊ भूमि के कारण घनत्व अधिक मिलता है।

(3) मध्यम घनत्व वाले प्रदेश:-

     इनमें प्रति वर्ग किमी 50 से 250 मनुष्य तक पाये जाते है। ऐसे भागो में मिसीसिपी नदी का मैदान और उसके संलग्न उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, अधिकांश पूर्वी यूरोप के देश, मुख्य चीन के उत्तरी-पश्चिमी तथा हिन्दचीन के पूर्वी और भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग विशेष रूप से सम्मिलित किये जाते है। इनमे वर्षा की मात्रा कम होने पर सिचाई की जाती है और उपयुक्त क्षेत्रों में खेती की जाती है।

(4) कम घनत्व वाले प्रदेश:-

     इनका प्रति वर्ग किमी घनत्व 5 से 50 होता है। जिन क्षेत्रों में घास के मैदान पाये जाते है, वहाँ पशुपालन अथवा अनुकूल स्थिति में सिंचित कृषि की जाती है। एशिया, अफ्रीका एवं उत्तरी व दक्षिणी घास के मैदानों में ऐसी ही स्थिति है।

(5) जनविहीन प्रदेश:-

     अत्यधिक ठण्डे एवं बर्फ से ढंके ध्रुवीय व उपधुवीय प्रदेश, घने वनों से ढंके प्रदेश, ऊँचे पर्वत, पठारी भाग, उष्ण व शीतोष्ण मरुस्थल विश्व के प्रायः जनशून्य प्रदेश है। यहाँ पर दूर-दूर इनी-गिनी झोपड़ियाँ पायी जाती है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व 2 से भी कम पाया जाता है।

विश्व में जनसंख्या वितरण

    विश्व में जनसंख्या के वितरण पर भौतिक (जलवायु, स्थलाकृति, मिट्टी, खनिज आदि), सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय कारकों का प्रभाव पड़ा है।

⇒ विश्व की 60 प्रतिशत जनसंख्या 200 मीटर से कम एवं 80 प्रतिशत जनसंख्या 500 मीटर से कम ऊँचाई वाले भागों में निवास करती है।

⇒ उष्ण मरुस्थलों में विरल जनसंख्या का प्रमुख कारण निम्न वर्षा है न कि उच्च तापमान।

⇒ विश्व की कुल जनसंख्या का 90 प्रतिशत भाग उत्तरी गोलार्द्ध में एवं 10% दक्षिणी गोलार्द्ध में निवास करता है।
⇒ एशिया में 20° से 40° उत्तरी अक्षांश के बीच विश्व की 50% से भी अधिक जनसंख्या निवास करती है। इसी प्रकार यूरोप में 40° से 60° अक्षांश के बीच विश्व की 30% जनसंख्या निवास करती है।

⇒  60° अक्षांश के उत्तर विश्व की मात्र 1 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

⇒ विश्व की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या 5 प्रतिशत से भी कम भू-भाग पर निवास करती है।

⇒ विश्व की 75 प्रतिशत जनसंख्या समुद्री तट से 1000 कि.मी. से कम दूरी पर एवं 66 प्रतिशत जनसंख्या समुदी तट से 500 कि.मी. से कम दूरी पर बसी हुई है।

⇒ विश्व का लगभग एक-तिहाई भाग शीत एवं शुष्कता के कारण मानव अधिवास के अनुपयुक्त है। इस प्रकार महाद्वीपों के कुल क्षेत्रफल का 55 से 60 प्रतिशत भाग अधिवास योग्य या एक्यूमीन (Ecumene) है।

⇒ कठोर जलवायु के कारण अंटार्कटिका महाद्वीप जनशून्य है एवं ग्रीनलैंड में जनसंख्या का घनत्व 1 व्यक्ति प्रति 50 वर्ग कि.मी. है।

⇒ इसी प्रकार अलास्का, आस्ट्रेलियाई मरुस्थल एवं अमेजन बेसिन में जनसंख्या का घनत्व क्रमशः 1 व्यक्ति प्रति 3 वर्ग कि.मी., 2.5 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. एवं 2 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है।

⇒ दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में उपयुक्त जलवायु एवं उपजाऊ मिट्टी के कारण सघन जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ चीन की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या समुद्र तटीय क्षेत्रों एवं निम्न नदी घाटियों में निवास करती है, क्योंकि इन क्षेत्रों की जलवायु एवं मृदा कृषि कार्य के लिए उपयुक्त है। ⇒ मरुस्थलीय जलवायु के बावजूद नील घाटी एवं राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में काफी सघन जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ जावा द्वीप पर ज्वालामखी लावा द्वारा निर्मित उपजाऊ मिट्टी के कारण सघन जनसंख्या पाई जाती है, जबकि सुमात्रा द्वीप पर अपक्षयण (Leached) एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण जनसंख्या की सघनता कम है।

⇒ अनुपयुक्त भौतिक परिस्थितियों के बावजूद एण्डीज पर्वत के चुकाईकामाटा (तांबा खनन), कनाडा के यूरेनियम सिटी (यूरेनियम खनन); पश्चिमी आस्ट्रेलिया एवं दक्षिण अफ्रीका के मरुस्थलीय क्षेत्र (स्वर्ण खनन) के कुछ भागों में सघन जनसंख्या पाई जाती है।

      जनसंख्या वितरण की दृष्टि से विश्व को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

1. सघन जनसंख्या के प्रदेश (Densly Populated Region):-

      इसके अंतर्गत विश्व के 5 प्रदेश आते हैं, जिनमें जनसंख्या का औसत घनत्त्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से भी अधिक है:

(i) पूर्वी एशियाः चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग।

(ii) दक्षिणी एशियाः भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश नेपाल।

(iii) दक्षिण-पूर्वी एशिया

(iv) उत्तर-पश्चिमी यूरोपः ब्रिटेन, जर्मनी, हालैंड, बेल्जियम, लक्समबर्ग, फ्रांस, आयरलैंड, डेनमार्क, स्पेन, इटली।

(v) पूर्वी-उत्तर अमेरिकाः उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण-पूर्वी कनाडा।

     उपरोक्त क्षेत्रों के अलावा मिस्त्र में नील नदी की घाटी में भी जनसंख्या का घनत्व अधिक है।

⇒ प्रथम तीन क्षेत्रों में विश्व की 58 प्रतिशत जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ जावा, ह्वांगहो का मैदान, चीन के पूर्वी तट, सिंगापुर, हांगकांग जैसे क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 1000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से भी अधिक है।

⇒ जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से मकाओ का विश्व में प्रथम स्थान है।

2. विरल जनसंख्या के प्रदेश (Sparsely Populated Region):-

     विश्व के 5 प्रदेश ऐसे हैं, जहाँ जनसंख्या का घनत्व 10 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से भी कम है। वास्तविकता यह है कि विश्व के 55 प्रतिशत भू-भाग पर मात्र 5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

(i) उच्च अक्षांशीय क्षेत्रः 60° अक्षांश से ऊपर विश्व की मात्र 1% जनसंख्या निवास करती है। आर्कटिक एवं अंटार्कटिक के अलावा उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग, ग्रीनलैंड एवं साइबेरिया इसके अंतर्गत आते हैं।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रः विश्व के सभी मरुस्थलों (उष्ण एवं शीतोष्ण) में जनसंख्या का घनत्व काफी कम है।

(iii) महाद्वीपीय जलवायु वाले आंतरिक प्रदेशः शुष्कता के कारण मध्य एशिया में जनसंख्या का घनत्व काफी कम है।

(iv) विषुवत रेखीय घने वनः इसके अंतर्गत अफ्रीका का कांगो बेसिन एवं द. अमेरिका का अमेजन बेसिन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपीय क्षेत्र सम्मिलित हैं। इस प्रदेश की उष्ण एवं आर्द्र जलवायु, घने जंगल, मच्छर एवं सीसी-सीसी (Tsi-Tsi) मक्खी का प्रकोप जनसंख्या के विकास में बाधक है।

(v) उच्च पर्वतीय क्षेत्रः पर्वतों पर ऊँचाई के अनुसार जनसंख्या विरल होती जाती है। हिमालय, आल्पस, रॉकी एवं एण्डीज के पर्वतीय भागों में 2500 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भाग निर्जन हैं।

3. सामान्य जनसंख्या के प्रदेशः-

     ये प्रदेश उपरोक्त दोनों प्रदेशों के मध्य स्थित हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियाँ न ही अधिक अनुकूल हैं और न ही प्रतिकूल।

     खनिजों के विदोहन के लिए विश्व के कई प्रतिकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विकास किया गया है। उदाहरण के लिए स्वीडन के गैलीवारा (लौह अयस्क), कनाडा के यूकन घाना (सोना), अलास्का के यूकनपोर्ट (सोना), साइबेरिया (सोना, तेल, प्राकृतिक गैस) आदि।

    उष्ण कटिबंध के प्रतिकूल जलवायु के कारण अनेक बस्तियां समुद्र तल से 2000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर बसी हुई हैं। जैसे अदीस अबाबा (इथियोपिया), कम्पाला (युगांडा), क्योटो (इक्वेडोर), नैरोबी (कीनिया), ऊटी (भारत) एवं कैण्डी (श्रीलंका)।

बोलीविया की राजधानी ला-पाज (La Paz): विश्व में सर्वाधिक ऊंचाई पर बसा हुआ नगर है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 3640 मीटर है।

निष्कर्ष:

    निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि जनसंख्या वितरण, घनत्व, वृद्धि और संरचना का अध्ययन महत्वपूर्ण है ताकि हम जनसंख्या के रुझानों को समझ सकें और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए योजना बना सकें। यह समझना कि जनसंख्या कैसे वितरित की जाती है और कैसे बदलती है, नीति निर्माताओं को संसाधनों का आवंटन करने और स्थायी विकास को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।
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