Archives June 2024

9. Eco-Tourism (पारिस्थैतिक पर्यटन)

Eco-Tourism

(पारिस्थैतिक पर्यटन)



           यह दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- पारिस्थैतिकी और दूसरा- पर्यटन। पारिस्थैतिकी का तात्पर्य उस समस्त भौगोलिक तत्त्व से है जो धरातल पर या उसके चारों ओर जैविक एवं अजैविक घटकों के रूप में मौजूद है। पुनः पर्यटन का तात्पर्य स्वेच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर घूमना-फिरना है।

       सदियों से लोग सांस्कृतिक तत्वों को समझने हेतु पर्यटन का सहारा लेते रहे हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में पारिस्थैतिकी के प्रति दिलचस्पी रखने वाले लोग पारिस्थैतिक केन्द्र की ओर आकर्षित होने लगे हैं, जिसे “पारिस्थैतिकी पर्यटन” कहते हैं। भूगोल में पारिस्थैतिकी पर्यटन का विशेष महत्व है क्योंकि एक ओर कई पर्यटक स्थल अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से प्रदूषित हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए पारिस्थैतिक पर्यटन की आवश्यकता पड़ती है। पारिस्थैतिक पर्यटन के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों पर जोर दिया जाता है:-

(1) जैविक, अजैविक तथा सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण दिया जाता है।

(2) पारिस्थैतिकी पर्यटन (Eco-Tourism) स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध करने में सहायक होती है।

(3) पारिस्थैतिक पर्यटन सतत् विकास की अवधारणा के बढ़ावा देता है।

(4) पर्यटन में स्थानीय लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करता है।

(5) पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव की प्राथमिकता दी जाती है।

(6) इस प्रकार के पर्यटन में भौतिक वस्तुओं के कम से कम प्रयोग को बढ़ावा दिया जाता है।

(7) वनस्पति, जीव-जन्तु एवं विभिन्न प्रकार के भौगोलिक स्थलाकृति पारिस्थैतिक पर्यटन के केन्द्र बिन्दु होता है।

      कुछ देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पारिस्थैतिक पर्यटन विशेष योगदान दिया है। जैसे- कोस्टारिका, इक्वेडोर, मेडागास्कर तथा नेपाल इत्यादि। “पारिस्थैतिक पर्यटन संकल्पना” का उदय 1980 के दशक से माना जाता है। भारत में इस प्रकार के पर्यटन का तेजी से विकास हो रहा है। UNO ने वर्ष 2002 को पारिस्थैतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए “पारिस्थैतिकी पर्यटन अन्तरर्राष्ट्रीय वर्ष” की घोषणा की थी।

    भारत में पारिस्थैतिकी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई स्थानीय पहल किये जा रहे हैं:-

(1) जम्मू-कश्मीर सरकार ने लद्दाख के कई गाँवों में पर्यटकों के लिए स्थानीय घरों में रहने की व्यवस्था की है। इससे जो आमदनी होती है, उससे ग्रामीण विकस और पर्यावरण के संरक्षण पर खर्च की जाती है।

(2) नागालैण्ड में कोहिमा के पास एक स्थानीय संस्था के द्वारा पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास हेतु पर्यटकों को प्रशिक्षण देती है।

(3) केरल के पेरियार बाघ संरक्षित क्षेत्र में वन विभाग के अधिकारियों ने “इको- टूरिज्म योजना” का निर्माण कर लागू की है ताकि लोग नजदीक से बाघों की मुआयना करें तथा पर्यावरण को भी हानि नहीं पहुंचे।

(4) सिक्कीम खनचेनजोंगा जीव मण्डल संरक्षित क्षेत्र में लेवचा समुदाय के लोग “पारिस्थैतिकी पर्यटन समिति” चला रहे हैं जो लोगों के प्राकृ‌तिक वातावरण में प्रकृति के साथ रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

(5) पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के डेल्टा पर अवस्थित कुछ गाँव के लोगों में ने “वन्य जीव संरक्षण समाज” की स्थापना की है। यह समाज पारिस्थैतिक पर्यटन की दिशा में सराहनीय कार्य कर रही है।

(6) सरकार विज्ञापनों के मध्यम से पारिस्थैतिक पर्यटन के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ विज्ञापनों से देती है।

(7) राष्ट्रीय जैविक उद्यान, जैवमंडल, अभ्यारण, सफारी इत्यादि निर्माण का एक ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के इन घटकों को बचाने के लिए भी कई प्रयास किये जा रहे हैं। जैसे- पर्यटक स्थलों पर प्लास्टिक वस्तुओं के प्रयोग पर रोक, बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग, कचड़ा प्रबंधन केन्द्रों की स्थापना की जा रही है।

पारिस्थैतिक पर्यटन का प्रभाव

     पारिस्थैतिक पर्यटन के कारण दो प्रकार के प्रभाव देखे जा सकते हैं।

(A) सकारात्मक प्रभाव:-

(1) पारिस्थैतिक के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है।

(2) पारिस्थैतिक तत्वों का संरक्षण एवं उनका विकास हो रहा है।

(B) नकारात्मक प्रभाव:-

(1) ऐसे पर्यटन से पारिस्थैतिक तत्वों का व्यापारीकरण होने लगा है जिसके कारण स्थानीय लोगों के विस्थापन और मौलिक अधिकारों के हनन को बढ़ावा मिला है।

(2) पारिस्थैतिक पर्यटन नीतियों का निर्धारण तो ठीक से करती हैं लेकिन, उसे  धरातल पर आदर्श रूप में लागू नहीं कर पाती है जिसके कारण पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़‌ता है।

(3) पारिस्थैतिक केन्द्रों को अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से विभिन्न प्रकार के प्रदुषण की समस्या भी जन्म ले रही है।

(4) पारिस्थैतिक पर्यटन का बूरा प्रभाव जीव-जगत पर पड़ रहा है। जैसे- पशुओं को देखने के लिए, अनका चित्र उतारने के लिए उनसे छेड़-छाड़ करते हैं।

(5) पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास से अछूते एवं अप्रयुक्त जंगली, पहाड़ी भूमि का अतिक्रमण होने लगा है।

(6) इस तरह के पर्यटन से याता‌यात साधनों बेहताशा वृद्धि होती है जिसका स्पष्ट प्रभाव जैविक विविधता पर पड़‌ती है।

(7) जंगली जानवरों के व्यापार तथा तस्करी को बढ़ावा मिलता है।

(8) स्थानीय संस्कृति खतरे में पड़ जाती है।

(9) स्थानीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(10) पर्यटन स्थलों का सही तरीके से प्रबंधन न होने पर कई प्रकार के सामजिक और आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती है।

निष्कर्ष:

       इस तरह ऊपर के तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पारिस्थैतिक पर्यटन का उद्देश्य भले ही सकारात्मक है लेकिन, इसके कई नकारात्मक प्रभाव पड़े है। अत: इन नकारात्मक समस्याओं से निपटने हेतु ऐसी योजना और रणनीति की आवश्यकता है जो सतत् विकास (पर्यावरण को बिना हानि पहुँचाये) की अवधारणा को आदर्श रूप में लागू कर सके। यह उद्देश्य तभी हासिल हो सकेगा जब पारिस्थैतिक पर्यटन में स्थानीय सहभागिता को बढ़ाया जाएगा। प्रशिक्षित गाइड को उतारा जाएगा एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों को भली- भाँति लागू किया जायेगा।

8. Liberalization (उदारीकरण)

Liberalization

(उदारीकरण)



      भारत द्वारा वर्ष 1991 ई० में आर्थिक सुधार नीति के तहत उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्विकरण की नीति को अपनाया गया था। उदारीकरण की नीति मुख्यतः उद्योगों से जुड़े हुए थे। 1991 ई० के औद्योगिक नीति का मुख्य उद्देश्य दो थे-

(4) भारत का तेजी से आर्थिक विकास करना।

(2) अर्थव्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के योग्य बनाना।

    जब 1995 में WTO की स्थापना हुई तो भारतीय उदारीकरण को विशेष बल प्राप्त हुआ। भारत के द्वारा अपनायी गयी उदारीकरण की प्रक्रिया की मुख्य विशेषता निम्नलिखित हैं:-

(1) 1991 के औद्योगिक नीति में घोषणा की गई थी कि औद्योगिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोला जायेगा।

उद्योगों में सरकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप कम होगा और देश में प्रतिस्पर्द्धात्मक महौल बनाया जायेगा। इसी घोषणा का पालन करते हुए उदारीकरण के नीति को अपनाया गया।

(2) उदारीकरण नीति को अपनाते हुए सरकार ने सभी उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया लेकिन तीन उद्योगों के आरक्षित उद्योग घोषित किया। जैसे- नाभिकीय ऊर्जा, रेल तथा अन्तरिक्ष।

(3) उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया।

(4) प्रतिबंधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1991 में सुधार लाकर विदेशों से पूंजी लाने की सीमा को समाप्त कर दिया गया तथा देशी कंपनियों के अधिग्रहण तथा समावेशन पर से प्रतिबंध हटा दिये गये।

(5) आयात एवं निर्यात से जुड़े हुए प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया।

(6) विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया।

(7) सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया प्रारंभ की गई।

(8) कृषि को उद्योग का दर्जा देते हुए देश में संगठित कृषि तथा ठेका कृषि की शुरुआत की गई।

(9) श्रम कानून और कर संरचना में सुधार लाया गया।

उदारीकरण के प्रभाव

     उदारीकरण की उपयुक्त विशेषताओं के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर चतुर्दिक प्रभाव पड़ा है। प्रभाव को लेकर अर्थशास्त्रियों के मध्य दो तरह के विचार है:-

      प्रथम विचार इसका समर्थन करता है और दूसरा विचार इसका विरोध करता है। फिर भी, उदारीकरण के प्रभाव को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है-

(1) प्रत्याक्ष विदेशी निवेश में तेजी से वृद्धि हुई है। इसका अनुमान बढ़ते हुए विदेशी मुद्रा भण्डार से लगाया जा सकता है।

(2) अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि का अनुमान बढ़ते हुए शेयर बाजार के सूचकांक से लगाया जा सकता है।

(3) सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि 1990-91 ई० में GDP का विकास दर 4% था जो 2023-24 में बढकर 8.2% हो गई।

(4) मंदी का कम प्रभाव-

     पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है फिर भी, भारत की अर्थव्यवस्था का विकास  7.5% दर से हो रहा है।

(5) रोजगार में वृद्धि-

     उदारीकरण नीति के कारण देश में शिक्षित एवं अशिक्षित लोगों को नए-2 रोजगार के अवसर प्रदान हो रहे हैं।

(6) आधारभूत संरचना का विकास-

     देशी एवं विदेशी निवेश के कारण आधारभूत संरचनाओं का विकास तेजी से हो रहा है।

(7) प्रादेशिक असंतुलन में वृद्धि-

      देश का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है लेकिन, विकसित क्षेत्र और विकसित होने जा रहे हैं तथा पिछड़े क्षेत्र और पिछड़ते जा रहे हैं।

(8) कुटीर एवं लघु उद्योगों पर बूरा प्रभाव पड़ रहा है।

(9) मंहगाई पर नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रही है।

(10) विदेशों से उच्च तकनीक एवं आगमन बड़े पैमाने पर हो रहा है।

(11) आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में कमी आई है।

(12) कृषि क्षेत्र की उपेक्षा अभी जारी है।

(13) संगठित कृषि, ठेका कृषि और SEZ के कारण लगातार विवाद बढ़ते जा रहे है।

निष्कर्ष:

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि उदारीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ रहे हैं फिर भी, सकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक स्वरूप प्रदान करने में सक्षम हो रही है।

7. Nano Technology (नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)

Nano Technology

(नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)



प्रश्न प्रारूप

Q. नैनो टेक्नोलॉजी से आप क्या समझते है? उसके संभावित उद्योग पर विस्तार से चर्चा करें या प्रकाश डालें।

उत्तर- नैनो टेक्नोलॉजी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1974 ई० में जापानी विद्वान नोरियो तनीगुची ने किया था। लेकिन यह शब्द 1980 के आस-पास काफी लोकप्रिय हुआ। इस शब्दों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय एरिक ड्रेक्सलर को जाता है। क्योंकि डेक्सलर महोदय ने “इंजन ऑफ क्रिएशन नामक पुस्तक में ‘नैनो टेक’ शब्द का प्रयोग किया और कई संभावित एवं काल्पनिक उपयोग पर प्रकाश डाला।

        ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- नैनो और द्वितीय- टेक्नोलॉजी। नैनो एक ग्रीक शब्द है जिसका तात्पर्य बौना होता है। यहाँ पर नैनो शब्द नैनो मीटर (10-9 मी०) का संक्षिप्त भाग है। किसी भी एक इकाई (जैसे- 1m या 1 sec या 1g) का अरबवाँ हिस्सा ‘नैनो मीटर’ या नैनो सकेण्ड या ‘नैनो ग्राम’ कहलाता है। दूसरी ओर टेक्नोलोजी का तात्पर्य उस तकनीक या प्रौद्योगिकी से है, जिसके माध्यम से नवीन भौतिक उत्पादों को जन्म दिया जाता है।

       अतः नैनो टेननोलॉजी का तात्पर्य उस तकनीक से है जिसके माध्यम से हम नैनो स्तर के भौतिक उत्पादों का निर्माण कर सकते हैं। विश्व की सबसे प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका (Science) ने नैनो टेक्नोलोजी को वर्ष 2001 का तथा 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ा उपलब्धि माना है।

      वैज्ञानिकों के द्वारा नैनो स्तर पर ही सूक्ष्म निर्माण की दिशा में प्रयोग करने का कारण यह है कि जब स्कूल स्तर से सूक्ष्म स्तर की ओर जाते हैं तो पदार्थों के विशेषताओं में एक खास स्तर तक कोई परिवर्तन नहीं होता है लेकिन एक नियत स्तर के बाद गुणों में परिवर्तन होने लगता है। यह स्तर है- नैनो इकाई (10-9 इकाई)।

        दूसरे शब्दों में परमाणु का औसत का स्तर 10-9 मी० होता है। अतः कोई भी स्थूल पदार्थ जब परमाण्विक स्तर पर (10-9 मी०) अते हैं तो उनके गुण धर्म में परिवर्तन होने लगता है। इसी स्तर को मानकर किया जा रहा शोध एवं अनुसंधान कार्यों से संबंधित प्रक्रिया, निर्मित उत्पाद इत्यादि को नैनो टेक्नोलॉजी कहा जाता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के विकास होने से कई प्रकार के संभावित उपयोग किये जाने की संभावना है। जैसे-

(1) नैनो टेक्नोलोजी के प्रयोग के द्वारा विभिन्न यौगिक के बंधन संरचना को बदलकर और उन्हें आपस में मिलाकर एक नये पदार्थ का निर्माण किया जा सकता है। जैसे- प्रयोगशाला में कोयला को हीरे में परिवर्तन किया जा सकता है। इसी तरह हवा, धूल, और पानी के अणुओं को दुबारा समायोजन करके फुल, फल इत्यादि बनाया जा सकता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से दुनिया भर के लोगों को स्वस्थ्य, शिक्षित और प्रदूषण रहित वातावरण प्रदान किया जा सकता है। इसका समुचित विकास हो जाने पर टिकाऊ विकास, सुरक्षित तथा कुशल उत्पादों का निर्माण, दूर संचार, परिवहन, दवा, कृषि तथा उद्योगों हेतु किया जा सकता है। यह तकनीक उन सारे चीजों को संभव बना सकता है जो अभी कल्पना के स्तर पर है।

        जैसे- नैनो टेक्नोलोजी और बायोटेक्नोलोजी के संयोग से मानव को विलुप्त किया जा सकता है। गंतव्य स्थान पर कुछ सेकेण्ड में भेजा जा सकता है तथा उन्हें पुनः प्रकट किया जा सकता है। इच्छा के अनुसार किसी भी वस्तु के आकार को बदला जा सकता है तथा कम लागत में अच्छे गुणो वाले उत्पादों के निर्माण किया जा सकता है।

     वर्तमान समय में विश्व के अलग-2 देशों में नैनो टेक्नोलॉजी पर अनुसंधान का कार्य चल रहा है। यह टेक्नोलॉजी जहाँ एक ओर विकास की नवीन द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी ओर संभावित खतरे उत्पन्न करेंगे। जैसे- अगर किसी भी पदार्थ के कण को नैनो स्तर (10–9 मी०) पर विभाजित किया जाता है तो उसे पुनः विभक्त कर और नष्ट नहीं कि जा सकता है।

      नैनो कण मानव के शरीर में सांस के जरिये, गले के जरिये, त्वचा एवं इंजेक्शन के जरिये शरीर के कोशिका में पहुंचकर अनेक प्रकार के बीमारियाँ उत्पन्न कर सकती है। ये कण किसी जीव के अन्दर पहुंचकर किस तरह का व्यवहार करेंगें? यह अभी अज्ञात है।

        ये कण शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकते हैं। शरीर में इन्जाइम, प्रोटीन और DNA के निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण स्वरूप वैज्ञानिकों ने कार्बन पर आधारित एक कार्बन नैनो ट्यूब का निर्माण किया है। इसमें कार्बन-60 नामक समस्थानिक का प्रयोग किया गया है। यह समस्थानिक काफी रेडियो सक्रिय होता है। अगर कहीं पर कार्बन ट्यूब का प्रयोग किया जाता है तो वह उत्पाद रेडियो सक्रियता से कैसे बच सकता है।

     नैनो टेक्नोलॉजी से कई प्रकार के पर्यावरणीय संबंधी खतरे उत्पन्न हो सकते है। जैसे- पर्यावरण में नैनो पार्टिकिल के माध्यम/मौजूदगी से वायु, जल, अंतरीक्ष, मृदा इत्यादि प्रदूषित हो सकते हैं।

उपलब्धि

(1) कार्बन नैनो ट्यूबश (CNTs):-

     नैनो तकनीक से विकसित किया गया यह एक ऐसा निर्वात नली है जो शीशे के बजाए कार्बन अणुओं से बनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन के अणु काफी अभिक्रियाशील होते हैं। वे दूसरे पदार्थों के सम्पर्क में आकर उनके साथ किसी तरह के प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। अतः कार्बन ट्यूब का प्रयोग आदर्श कन्टेनर के रूप में किया जा सकता है। इनमें कोई पदार्थ भरकर इन्हें शीलबन्द कि जा सकता और उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है।

      CNTs को जोड़‌कर तार जैसी संरचना बनायी जा सकती है और कई पदार्थों का आसानी से परिवहन किया जा सकता है। शरीर के अन्दर किसी विशेष जगह पर केन्सर की दवा नैनो ट्यूबश के माध्यम से आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद अल्ट्रा वॉयलेट तरंग के जरिये उन नलिकाओं को तोड़‌कर दवा को सही स्थान पर फैलाया जा सकता है।

(2) प्रकाश अथवा कण माधारित पैनी टेक्नोलोजी:-

     यह ज्ञात है कि प्रकाश कण और तरंग दोनों की तरह व्यवहार करते हैं। अगर इस टेक्नोलॉजी की विकास हो जाता है तो इसके जरिये बिना तार के इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान संभव हो जायेगा। परमाणु के प्रत्येक इलेक्ट्रॉन को अपनी इच्छानुसार तोड़ा-मड़ोड़ा जा सकता है।

(3) नैनों क्रिस्टल:-

     ध्वनि तरंगों के साथ नैनो कण प्रतिक्रिया करना प्रारंभ कर देगी। नैनो- क्रिस्टल किसी दृश्यमान स्रोत को रंग बदलकर विलुप्त कर देगी। नैनो क्रिस्टल का प्रयोग गाड़ियों के विभिन्न पार्ट्स बनाने में किया जा सकेगा। इससे ऑटोमोबाइल क्षेत्र में नवीन क्रान्ति का युग प्रारंभ होने वाला है।

(4) DNA कम्प्यूटिंग:-

     DNA नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसी भी जीव के DNA में मनचाहा परिवर्तन करके नये-2 जीवों में विकास किया जा सकता है।

(5) क्वांटम नैनो टेक्नोलॉजी:-

      नैनो टेक्नोलॉजी वस्तुततः क्वांटम टेक्नोलॉजी ही है। इसके माध्यम से परमाणु के इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का नियंत्रण संभव हो जायेगा। इसी तरह से रेडिकल नैनो टेक्नोलॉजी, आण्विक नैनो टेक्नोलॉजी इत्यादि का भी विकास किया जा रहा है।

     विश्व के अलग-2 देशों में नैनो- टेक्नोलॉजी पर इसके संभावना को देखते हुए कई तरह के कार्यक्रम चल रहें है। भारत में इस पर अनुसंधान हैदराबाद तथा बंगलोर में किया जा रहा है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नैनो टेक्नोलॉजी भविष्य में जहाँ कई संभावित द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी और कई विसंगतियों को जन्म देगा। अतः इस तकनीक को सावधानी पूर्वक विकसित करने की आवश्यकता है।

6. Export Processing Zone (निर्यात संवर्धन क्षेत्र)- EPZ

Export Processing Zone

(निर्यात संवर्धन क्षेत्र-EPZ)



       विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात हेतु “निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र” का विकास किया गया है। EPZ की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य देश से निर्यातित वस्तुओं के लिए उपयुक्त वातवरण उत्पन्न करना है ताकि वे अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपना स्थान बना सके। EPZ स्थापना की संकल्पना चीन से ली गई है। निर्यात संवर्धन क्षेत्र 1981 ई० में निर्यातों उन्मुख योजना के रूप में शुरू की गई थी। आगे चलकर निर्यातों उन्नमुख इकाई योजना को निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र के रूप में बदला गया और पुनः निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र को आगे चलकर विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में बदलने की योजना है।

    EPZs के अन्तर्गत कई विशिष्ट सुविधाएँ और मानदण्डों को अपनाया गया है जैसे:-

(1) EPZ वाले क्षेत्र में सरकार के द्वारा निर्धारित मानदण्ड के अनुरूप ही उत्पादन का कार्य किया जा सकता है।
(2) उत्पादन हेतु कच्चे माल आप देशी एवं विदेशी दोनों स्रोतों से मंगाकर उपयोग कर सकते हैं।

(3) निर्यात के लिए बंदरगाह की सुविधा दी जाती है।

(4) परियोजनाओं के लिए बड़े-2 भूखण्ड सरकार उपलब्ध करवाती है ताकि वैसे स्थानों पर आधारभूत औद्योगिक ढाँचा खड़ा किया जा सके।

(5) EPZs में दक्ष व्यक्ति उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाता है।

(6) EPZs में निर्यातों-उन्मुख उत्पादन का कार्य किया जाता है।

       निर्यातोंन्मुख उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों के सह‌योग से अगस्त 1994 ई० में EPZs और Export Promotion/Processing Industrial Park (EPIP) योजना प्रारंभ की। ऐसी सुविधाओं के विकास हेतु राज्य सरकार को केन्द्र सरकार 75% अनुदान देती है वशर्ते उसका लागत 10 करोड़ रुपया से अधिक न हो।

     भारत में अब तक 8 EPZs की  स्थापना हो चुकी है। जैसे-

(1) कांडला- गुजरात

(2) सूरत- गुजरात 

(3) सान्ताक्रुज- मुम्बई

(4) कोची- केरल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(7) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(8) विशाखापत्तनम- आन्ध्रप्रदेश

      निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र का निर्माण निर्यात प्रोत्साहन हेतु एक प्रभावी घटक के रूप में स्थापित किया गया था। लेकिन निर्यात के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी। भारत का योगदान निर्यात क्षेत्र में लगातार घटता ही जा रहा है। जैसे- भारत सरकार के द्वारा जारी जून 2009 के आँकड़े बताते हैं कि निर्यात में 11% से अधिक की कमी आ चुकी है। EPZ निर्यात के लिए प्रभावी घटक नहीं बन सका। क्योंकि-

(1) EPZs के विविध प्रकार के नियंत्रणों और अनुमतियों के दौर से गुजरना पड़ता है।

(2) EPZs में अभी तक विश्व स्तरीय आधारभूत ढाँचा का विकास नहीं किया जा सका है।

(3) अस्थिर वित्तीय व्यवस्था से भी प्रभावित होते रहे हैं।

       उपरोक्त सीमाओं के बावजूद निर्यात को बढ़ावा देने के दिशा में उठाया गया एक सकरात्मक कदम था। आज चीन जैसा साम्यवादी देश EPZ का प्रयोग कर निर्यात को बढ़ावा दे सकता है तो भारत भी ऐसा क्यों नहीं कर सकता है?

नोट: वर्तमान में सभी आठ निर्यात संवर्द्धन/प्रसंस्करण क्षेत्र (ईपीजेड) कांडला तथा सूरत (गुजरात), सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोची (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), फाल्टा (पश्चिम बंगाल) और नोएडा (उत्तर प्रदेश) में स्थित हैं, को विशेष आर्थिक क्षेत्रों में परिवर्तित कर दिया गया है।

Export Processing Zone

5. Trade Balance and Trade Policy (व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)

Trade Balance and Trade Policy

(व्यापार संतुलन एवं व्यापार नीति)



      उत्पादों का उत्पादनकर्ताओं के द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की प्रक्रिया को व्यापार कहते हैं। व्यापार तृतीय क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। व्यापार का कार्य स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर सम्पन्न होते हैं। मोटे तौर पर व्यापार को दो भागों में बाँटते है।:-

(1) देशी व्यापार और

(2) विदेशी व्यापार।

       जब कोई उत्पाद विदेशों में भेजा जाता है तो उसे निर्यात कहते हैं और जब विदेशों से कोई वस्तु/उत्पाद देश में मंगायी जाती है तो उसे आयात कहते हैं। आयात एवं निर्यात के रूप में उत्पाद किसी वस्तु या सेवा के रूप में हो सकता है। आयात और निर्यात से संबंधित सभी आँकड़े बंदरगाहों एवं एयरपोर्ट पर रिकॉर्ड किये जाते हैं और उसका मौद्रिक मूल्य में तब्दील किये जाते हैं।

      व्यापार में प्रयुक्त होने वाले वस्तु जो हमें दिखाई देते हैं उन्हें दृश्य वस्तु कहते हैं। वस्तुओं को छोड़‌कर सेवा क्षेत्र जो कि हमें दिखाई नहीं देते हैं उसे अदृश्य मद कहते हैं। जब किसी देश के निर्यात और आयात की मौद्रिक मूल्य बराबार होता है तो उसे व्यापार संतुलन कहते हैं। जब निर्यात अधिक और आयात कम होता है तो उसे अनुकूल व्यापार कहते है। इसी तरह निर्यात कम हो और आयात ज्यादा हो तो उसे प्रतिकूल व्यापार कहते हैं।

     आजादी के पूर्व भारत में अनुकूल व्यापार की स्थिति थी जबकि आजादी के बाद से प्रतिकूल व्यापार की स्थिति रही है। संतुलित व्यापार एक आदर्श स्थिति है जिसे सभी राष्ट्र प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नीचे के तालिका में विदेशी व्यापार से संबंधित आँकड़े प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जैसे:-

वर्ष निर्यात (करोड़ रू० में) आयात (करोड़ रू० में) कुल व्यापार (करोड़ रू० में) व्यापार घाटा (करोड़ रू० में)
1950-51 606 608 1214 -2
1960-61 642 1122 1764 -480
1970-71 1535 1634 3169 -99
1980-81 6710 12549 19259 -99
1990-91 32558 43193 75751 -10635
2000-01 203571 230873 434444 -27302
2005-06 45798 630527 1085444 -175727

स्रोत- योजना 2008, जून-जुलाई

     ऊपर के तालिका से स्पष्ट है कि भारत में आजादी के बाद से कभी भी व्यापार संतुलन की स्थिति नहीं रही है। भारत सरकार व्यापार संतुलन की स्थिति प्राप्त करने के लिए समय-समय पर कई उपाय करती रही है। जैसे-

(1) मुद्रा का अवमूल्यन,

(2) मुद्रा के विनिमय पर नियंत्रण,

(3) मुद्रा के संकुचन एवं विस्तार,

(4) राजकोषीय घाटे से कम करना,

(5) निर्यात को बढ़ावा देने हेतु EPZ और SEZ की स्थापना,

(6) आयात पर नियंत्रण,

(7) पर्यटन का विकास,

(8) विदेशी ऋण एवं सहायता लेना,

(9) समय-2 पर व्यापार नीति की घोषणा।

व्यापार नीति

    भारतीय व्यापार विभिन्न प्रकार के अधिनियमों एवं नियमों के द्वारा निर्देशित होता है। भारत सरकार के पहली आयात-निर्यात नीति (Exim Policy/Trade Policy) अर्थात् एक्जिम नीति तत्कालीन वाणिज्य मंत्री श्री वी.पी. सिंह ने 12 अप्रैल, 1985 को घोषणा की। इस नीति की तीन प्रमुख विशेषता थी-

(1) औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भारतीय उद्योगों की कच्चे माल, उच्च तकनीकी, यंत्रों एवं पूँजी तक पहुँच सुनिश्चित करना था।

(2) उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं तकनीकी संवर्धन को बढ़ावा देना।

(3) भारतीय उद्योगों को उत्तरोत्तर (लगातार) अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनाना।

      वर्तमान समय में 31 अगस्त 2004 को घोषित आयात-निर्यात नीति के तहत विदेशी व्यापार संचालित हो रहा है। भारत सरकार भारत को विश्व स्तर पर एक प्रमुख निर्यातक देश के रूप में स्थापित करना चाहती है। अत: 2004 की व्यापार नीति में व्यापक दृष्टिकोण समाहित करते हुए “पंचवर्षीय (2004-09) नीति” की घोषणा की थी। इस नीति के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित थे-

(1) अगले 5 वर्षों में वस्तुगत व्यापार को बढ़ाकर दुगुना करना है।

(2) विदेशी व्यापार को आर्थिक विकास और रोजगार सृजन का प्रभावी हाथियार बनाया जायेगा।

(3) उपरोक्त उद्देश्यों के पूर्ति हेतु निमलिखित रणनीति पर कार्य की जायेगी-

(ⅰ) विभिन्न प्रकार के नियंत्रणों को समाप्त कर उद्योगपतियों और व्यापारियों की आन्तरिक उद्यमशीलता को प्रोत्साहित किया जायेगा।

(ii) विदेशी व्यापार से जुड़े सभी कार्यों को सरलीकृत किया जायेगा।

(iii) निर्यात लागत को कम किया जायेगा।

(iv) भारत को विनिर्माण, व्यापार और सेवाओं का वैश्विक केंद्र बनाया जयेगा।

(v) वैसे क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जायेगा जो ग्रामीण एवं अर्द्धनगरीय क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा दे सकेंगें।

(vii) देश के व्यापार को विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्द्धी बनाया जायेगा।

(viii) तकनीक, पूँजी और आधुनिक यंत्रों के आयात को बढ़ावा दिया जायेगा।

(ix) घरेलू व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों से मुक्त व्यापार समझौता एवं अधिमान्य व्यापार समझौता के द्वारा व्यापार घाटा पाटने का प्रयास होगा।

(x) व्यापार बोर्ड की भूमिका को पुनः परिभाषित की जायेगी।

(xi) देश की निर्यात रणनीति के निष्पादन में भारतीय दूतावासों की भूमिका सुनिश्चित की जायेगी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यमों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकेगा।

     ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में घोषित व्यापार नीति में कई उल्लेखनीय तथ्यों को शामिल किया गया है। वर्तमान समय में इन नीतियों का व्यापार पर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके पीछे मंदी का दौर/आर्थिक मंदी को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है। मंदी समाप्त होते ही भारतीय व्यापार पर इसका सारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

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