Archives June 2024

37. Positivism in Geography (भूगोल में प्रत्यक्षवाद)

Positivism in Geography

(भूगोल में प्रत्यक्षवाद)



प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल में प्रत्यक्षवाद की विवेचना करें।

(Discuss the Positivism in Geography.)

उत्तर- प्रत्यक्षवाद एक प्रकार का दार्शनिक आन्दोलन है। यह धर्म और परम्पराओं के विरुद्ध खड़ा हुआ सोच है। इसका वैज्ञानिक आधार और वैज्ञानिक विधि ज्ञान का स्रोत है। यह तथ्यों (आंकड़ों) और मूल्यों (सांस्कृतिक) में भेद व्यक्त करने वाला सोच है।

     ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) ने अध्यात्म (Metaphysics) और कोरे बुद्धिवाद को जाँच व अन्वेषण की एक निरर्थक शाखा बताया है। वह मानवता के विकास के लिए सामाजिककता को वैज्ञानिक धरातल पर स्थापित करने का पक्षपाती था।

     प्रत्यक्षवाद को अनुभववाद (Empiricism) भी कहते हैं। इस दार्शनिक सोच में ज्ञान का आधार तथ्य है। तथ्यों को प्रेक्षण (Observation) द्वारा अनुभव कर उनमें संबंधों पर आधारित ज्ञान प्रत्यक्षवाद का मुख्य उद्देश्य है। इसमें आनुभविक प्रश्नों का हल यथार्थ के दृष्टिकोण पर आधारित है। यथार्थ स्थिति के विषय में ‘तथ्य स्वयं साधन’ बनते हैं। (Facts Speak for Themselves)। विज्ञान का नाता भी वस्तुपरक तथ्यों से है।

    व्यक्तिपरकता (Subjective View Point) का इसमें कोई स्थान नहीं है। यथार्थ वही है जो प्रत्यक्ष में दिखता है। हमारी इन्द्रियाँ जो कुछ अनुभव कर रही हैं, वही ज्ञान है, वही वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वस्तुपरक, सत्य से पूर्ण बना और तटस्थ होता है। प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक एकता के हामी हैं। वे यथार्थ के बारे में सामान्यानुभावों, सामान्य वैज्ञानिक भाषा और प्रेक्षणों की पुनरावृत्ति को सुनिश्चित बनाने की विधि के विश्वासी हैं।

     वैज्ञानिक विधि इन्हीं लक्षणों के एकीकरण से बना व्यापक विज्ञान है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान का आपूर्ण तंत्र भौतिकी, रसायन, जीव, मनोविज्ञान व सामाजिक विज्ञानों के नियमों के अन्तर्गत तार्किक रूप से जुड़ा तंत्र है।

    अतएव प्रत्यक्षवाद-दर्शन एक प्रकार से आदर्शवाद का विरोधी है, क्योंकि आदर्शवाद केवल मानसिक अथवा बुद्धिपरक है। वह नियामक और नीतिपरक भी नहीं है।

     मानव-मूल्यों, विश्वास, आस्था, अभिवृत्ति, पूर्वाग्रह, पक्षपात, रीति-रिवाज, परम्परा, रुचि, लालित्य व सौन्दर्यपरक मूल्यों से जुड़े प्रश्नों व समस्याओं में प्रत्यक्षवादी शोध नहीं करता क्योंकि इनका निर्णय व्यक्तिवादिता से ग्रसित होता है। ये नैतिक मापदण्ड देश, काल, समाजों के साथ-साथ बदलते रहते हैं, और इनके बारे में निर्णय वैज्ञानिक आधारों पर सम्भव नहीं है।

    प्रत्यक्षवाद का दर्शन वस्तुपरक, निष्पक्षता, तटस्थता पर आधारित विज्ञान है। प्रत्यक्षवाद में व्याख्या व कथनों का आधार-

(i) आनुभविक अर्थात् प्रत्यक्ष अनुभवों (जो कुछ हमारे सामने दृश्य-जगत्) से जुड़ा होता है।

(ii) वह एकीकृत बनी वैज्ञानिक विधि है।

(iii) वह अनुभवजन्य वैज्ञानिक नियमों व सिद्धांतों से जुड़ा है।

(iv) वह नियामक, नीति संगत, नैतिकता से मुक्त स्वतंत्र प्रेक्षण है।

(v) वह अपरिवर्तनीय, शाश्वत वैज्ञानिक व्यवस्था है जिसमें वैज्ञानिक नियमों के विकास-क्रम की एकीकृत बनी लोकव्यापी पद्धति सम्मिलित है।

     ऐतिहासिक रूप से इसका उदय फ्रांस की क्रांति के उपरान्त हुआ, और ऑगस्त कॉप्टे ने इसे स्थापित किया। क्रांति से पूर्व प्रचलित बना यह निषेधवादी-दर्शन (Negative Philosophy) की प्रतिक्रिया स्वरूप जन्मा वैज्ञानिक प्रत्यक्षवादी सोच था। निषेधवादी दर्शन न तो रचनात्मक था, और न प्रयोगात्मक (Practical)। वह भावना-प्रधान था जो काल्पनिक विकल्पों द्वारा वर्तमान प्रश्नों के हल खोजने में डूबा था।

     अतः, निषेधवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षवाद एक प्रकार से खण्डन-मण्डनी वाद-विवादों से लैस हथियार सिद्ध हुआ। प्रत्यक्षवाद का आन्दोलन घिसे-पिटे निषिद्ध कर्मों व धार्मिक प्रपंचों के विरुद्ध खड़ा हुआ था।

    प्रत्यक्षवाद सामाजिक संबंधों को वैज्ञानिक धरातल पर उतरने में विश्वास व्यक्त करता है। वह सामाजिक-विज्ञान (Social Science) को भी प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति शाश्वत नियमों में ढालने का पक्षपाती था। कॉम्टे के अनुसार सामाजिक विकास तीन चरणों में घटित हुआ-

(i) ईश्वर मीमांसा (Theological) का पहला चरण जब मानव प्रत्येक घटना अथवा दृश्य को ईश्वरीय सत्ता व ईश्वरीय समझकर व्याख्या करता था,

(ii) दूसरे चरण में सामाजिक व्यवस्था का विकास तात्विक, बुद्धिपरक, अभौतिक (Metaphysical) विचारों द्वारा व्याख्या, और

(iii) तीसरे चरण में सामाजिक क्रियाओं व विकास के आधार के कार्य-कारण संबंध का जुड़ाव (Causal Connection)।

     मानव अपने निर्णयों को संबंधित कारणों के आधार पर सुनिश्चित बना कर अपनाता है। ऐसे कारकों की पहचान की जा सकती है। प्रत्यक्षवादी सोच अधिनायकवादी शासनों (Dictatorial Regimes) में विकसित सोच के विरुद्ध है।

    सन् 1930 में वियना (यूरोप) में ‘वियना-सर्किल’ की स्थापना हुई। वह तर्कसंगत प्रत्यक्षवादियों का समूह था। ये वैज्ञानिक उन सभी विचारों का विरोध करते थे जो आनुभविक रूप से परीक्षण नहीं किए जा सकते और जो नियंत्रित बनी पद्धतियों से नहीं खोजे जा सकते। नाजीवादी सोच (Nazism) को प्रत्यक्षवादी तर्कशून्य, पक्षपाती और हठधर्मितापूर्ण मानते थे।

   मानव भूगोल में किए गए प्रत्यक्षवादी सोच पर आधारित कार्यों की मार्क्सवादियों और यथार्थवादियों ने आलोचना की। ये कार्य ऐसे नियमों की खोज थे जो साधन सामग्री (Infrastructure) प्रक्रिया से नहीं जुड़े थे। वे अस्तित्वहीन ऐसे ढाँचे के नियम थे जो संसाधनों के ताम-झाम में बदलाव लाने में विश्वासी नहीं थे ।

    मानवतावादियों ने भी प्रत्यक्षवादी सोच की आलोचना की है क्योंकि उसमें मूल्यों व आदर्शों को कोई स्थान नहीं था। मानव जीवन उनके अभाव में अधूरा होता है। मार्क्सवादियों, व्यवहारवादियों और वैज्ञानिक प्रेक्षकों के अनुसार मूल्य विहीन, मात्रात्मक-गणितीयकरण व नियम-निरूपण एवं विवेचन सम्भव नहीं हैं। परन्तु, प्रत्यवादियों की मान्यता है कि प्रत्येक समस्या का तकनीकी हल संभव है और मूल्यविहीन शोध ही वैज्ञानिक है। परन्तु, व्यवहार में यह देखा गया है कि शोध कार्य अनेक स्थलों पर व्यक्तिनिष्ठता से प्रभावित बन जाता है।

     शोध विषय के चयन से लेकर दृश्य-वस्तुओं के वितरण व प्रारूपों की पहचान और निष्कर्ष-निर्धारण प्रक्रियाओं में कुछ न कुछ अंश में व्यक्तिनिष्ठता प्रवेश कर जाती है। जैसे ही परिणाम ज्ञात हो जाते हैं, मौजूदा वितरण के विवरण निर्णयकत्ताओं के सोच को प्रभावित करना आरम्भ कर देते हैं कि भावी वितरण कैसा होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक प्रक्रिया स्वयं ही यथार्थता का स्वरूप लेने लगी है। शोधकर्त्ता उदासीन और तटस्थ या वैज्ञानिक नहीं रह पाता।

     विज्ञानों में एकता भी आलोचना का पात्र है। सामाजिक वैज्ञानिकों में एकता का विकास सम्भव नहीं हो सका है। प्रत्येक विषय (समाज शास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान, भूगोल आदि) के अपने-अपने अलग सोच व अभिगम हैं जिनके आधार पर वस्तुओं-दृश्य-जगत् आदि का विश्लेषण करते देखे जाते हैं। वे यथार्थता को अपनी-अपनी पद्धतियों, विधियों, अभिगमों आदि द्वारा व्यक्त करते हैं।

     एक अत्यन्त संगीन आलोचना प्रत्यक्षवाद की इस तथ्य पर आधारित है कि प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों की प्रकृति ही एक जैसे नहीं हैं। दोनों अलग प्रकृति की वैज्ञानिक-शाखाएँ हैं। वे प्रायोगिक दृष्टि से समान नहीं हैं। उनकी प्रयोगात्मक प्रक्रियाएँ (Experimental Processes) अलग-अलग हैं। उनको एक समान कोटि की विधियों द्वारा नहीं पूरा कर सकते हैं।

    सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु का केन्द्र ‘मानव’ है जिसे ‘वस्तु’ मानकर पदार्थवत् आकलन नहीं कर सकते क्योंकि उसका नीजी सोच व बुद्धि-कौशल है। मानव-व्यवहार अन्य जीवों के व्यवहार से भी अलग हैं। उसकी कल्पनाएँ, धारणाएँ, अभिवृत्ति, रुचि, आस्था आदि को प्राकृतिक विज्ञानों के वस्तु-जगत् की भाषा में नहीं बदला जा सकता। अतएव-व्यवहार पर आधारित मानव भूगोल एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों के नियम-निरूपण में व्यक्तिनिष्ठता का घटक समाया रहता है।



Read More:-

36. Concept of Space in Geography (भूगोल में स्थान की विचारधारा)

Concept of Space in Geography

(भूगोल में स्थान की विचारधारा)



प्रश्न प्रारूप

Q. स्थानिक या क्षेत्रीय विज्ञान के रूप में भूगोल की व्याख्या कीजिए।

(Explain Geography as a Spatial or Regional Science.)

अथवा, भूगोल में स्थान की विचारधारा की विवेचना करें।

(Discuss the Concept of Space in Geography.)

उत्तर- भूगोल में क्षेत्र या स्थान (Space) और क्षेत्रीय संकल्पना (Spatial Concept) का केन्द्रीय स्थान है। क्षेत्र ठोस, तरल एवं गैसीय पदार्थों की ऐसी विलक्षण इकाई है जहाँ मानव एवं प्रकृति की क्रियाएँ घटित होती हैं। सामान्य भाषा में क्षेत्र से तात्पर्य भू-तल के किसी बिन्दु विशेष से क्षितिज तक वृत्ताकार आकृति में दिखाई देने वाले क्षेत्र से है। क्षितिज व आकाश मिलकर इसे सीमाबद्ध करते हैं।

     भूगोल में प्रयुक्त क्षेत्र शब्द व्यापक अर्थ रखता है। यह लघु या विस्तृत भी हो सकता है। यह भू-तल, वायुमण्डल, भूगर्भ या सागर में कहीं पर हो सकता है। यह आवश्यक नहीं कि वह सदैव क्षितिज तक ही फैला हो। भूगोल क्षेत्रों की विशेषतओं का ही अध्ययन करता है।

भूगोल में क्षेत्र (Space) की व्याख्या (Explanation of Space in Geography):-

      भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले क्षेत्र या स्थान (Space) का अर्थ ‘गृहीत स्थान’ (Occupied Space) से लिया जाता है। क्षेत्रों का सीधा सम्बन्ध भू-तल की ग्लोबीय स्थिति से होता है। यह दिशा, दूरी, विस्तार, व्यापकता या विरलता से प्रभावी रहा है। क्षेत्र विशेष के लक्षणों पर किसी काल विशेष या गतिशिल प्रक्रिया का भी परिणामी प्रभाव बना रहता है।

    अमेरिकन विद्वान प्रेस्टन जेम्स का मत है कि “भूगोलवेत्ता एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अवस्थिति, दूरी, दिशा, प्रसार व स्थानिक अनुक्रम के महत्त्व के बारे में प्रश्न पूछता है। वह सह-सामाजिकता, नवाचार, प्रसार घनत्व तथा सापेक्षिक स्थिति से जुड़ी अन्य समस्याओं का समाना करता है।”

       अरस्तू ने ‘वस्तुओं के अस्तित्व हेतु तार्किक दशा’ को क्षेत्र या स्थान कहा है (Space is the logical condition for existence of things)।

      सर आइजक न्यूटन  के अनुसार सभी स्थानिक संकल्पनाएँ मानव के चिन्तन से उद्भव होती हैं।

      भूगोल में हम जिन स्थानों का अध्ययन करते हैं वे विभेदशील (variable), गतिशील (dynamic) तथा परिवर्तनशील (changing) होने के कारण जटिल रूप से सम्बन्धित होते हैं। यदि स्थानों के मध्य पाये जाने वाले सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली सभी घटनाएँ या कारक तत्व स्वतंत्र बने रहते तो सम्भवतः भूगोल मात्र स्थानों का वर्णनात्मक ज्ञान कोष ही बन कर रह जाता।

       वर्तमान में यह मान लिया गया है कि जटिल घटनाओं एवं तथ्यों के मध्य भी अन्तर्सम्बन्ध मिलता है। यह मान लिया है कि जटिल घटनाओं एवं तथ्यों के मध्य भी अन्तर्सम्बन्ध मिलता है और विभिन्न स्थानों की ऐसी घटनाओं के मध्य सम्बद्धता है। स्थानों के मध्य अन्तर व विभिन्नता की सीमा के स्तर से क्षेत्रों का निर्माण होता है। भौगोलिक स्थान के स्थिति निर्धारण हेतु जटिल घटनाओं के स्तरीय अन्तर तथा विविध प्रकार की सूचनाओं की सहायता ली जाती है।

      जर्मन विद्वान काण्ट का मत है कि एक स्वतंत्र विषय के रूप में भूगोल का अस्तित्व स्थान (Space) से जुड़ा है। अंग्रेजी शब्द स्पेश या क्षेत्र (Space) का अर्थ है खाली जगह (empty place)। इसका तात्पर्य क्षेत्रीय आयाम (areal dimension) से लिया जाता है। यह भूखण्ड या क्षेत्र का बोध कराता है।

    डेविड हार्वे का मत है कि भूगोल का सम्पूर्ण दर्शन एवं व्यवहार ऐसी संकल्पनात्मक परिसीमाओं के विकास पर निर्भर करता है जिसमें वस्तुओं एवं घटनाओं के क्षेत्र में वितरण का लेखा-जोखा किया जा सके।

     वस्तुतः क्षेत्र (Space) एक भौतिक शास्त्रीय संकल्पना है। काण्ट के अनुसार क्षेत्र के अन्तर्गत द्रव्यों (Substances) के मध्य सम्बन्ध की व्यवस्था को शामिल किया जाता है तथा क्षेत्रीय विस्तार द्रव्यों द्वारा निःसृत सक्रिय शक्तियों की गहनता का मापन मात्र है।

        काण्ट ने स्थान (Space) की अवधारणा को साक्ष्य कहा जिसमें वस्तुओं के मध्य संबंधों की व्यवस्था है।

     हार्टशोर्न एवं हेटनर क्षेत्र को निरपेक्ष (absolute) माना। हार्टशोर्न के अनुसार, “क्षेत्र स्वयं कोई लक्षण (तत्व) नहीं है, यह तत्वों की बौद्धिक परिसीमा है; एक अमूर्त्त संकल्पना जिसका वास्तविक नहीं है। उसकी एक तत्व के रूप में अन्य तत्वों से न तुलना की जा सकती है, न ही साहचर्य मूलक संकल्पनाओं की व्यवस्था में वर्गीकृत किया जा सकता है जिससे इसके अन्य तत्वों से सम्बन्ध परक नियम बनाए जा सकें। क्षेत्र स्वयं अपने आन्तरिक तत्त्वों से मात्र इस अर्थ में जुड़ा है कि यह उन तत्वों को अमुक अमुक स्थलों पर समाहित करता है।”

     कार्ल साँवर का मत है कि “भूगोल का उत्तरदायित्व क्षेत्रीय अध्ययन है, क्योंकि विद्यालय का प्रत्येक छात्र यह जानता है कि भूगोल विभिन्न देशों के सम्बन्ध में सूचना देता है, किसी अन्य विषय ने क्षेत्रीय अध्ययन (Spatial study) का दावा नहीं किया है।”

     विल्हेलम फाल्ज लिखता है, “भूगोल का उद्देश्य एवं अद्वितीय महत्त्व यह है कि उससे हमें पृथ्वी के धरातल का ज्ञान होता है।”

      फ्रोबेल पेशेल तथा जरलैंड ने भूगोल को पृथ्वी का विज्ञान (Science of the Earth- Erdkunde) बताया है। भूगोल के अन्तर्गत विविध प्रकार के भौतिक एवं मानवीय तत्वों का अध्ययन क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में ही किया जाता है। किसी वस्तु का धरातल पर वितरण कहाँ-कहाँ और क्यों है? इसकी व्याख्या भूगोल के माध्यम से की जा सकती है। भूगोल अपनी मूल प्रकृति के अनुसार भू-तल से विलग (isolate) नहीं हो सकता। इसलिये भूगोल को भू-तल का क्षेत्र-विश्लेषण करने वाला विज्ञान मानना चाहिये। पृथ्वी तल भूगोल का मौलिक आधार है।

      अतः, महाद्वीप, देश, प्रदेश, क्षेत्र, जिला, ग्राम आदि इकाइयों का मूलाधार भूगोल ही है जो भूतल के किसी न किसी अंश को व्यक्त करते हैं। प्रदेश किसी न किसी भौतिक व सांस्कृतिक तत्व के वितरण को ग्रहण किए हुए होता है। वीडाल-डी-ला-ब्लाश का मत है कि “मनुष्य के लिए किसी क्षेत्र की समस्त परिस्थितियों की समष्टि सर्वोपरि होती है।” महान् खोज यात्राओं के युग के आरंभ में क्षेत्रीय विभिन्नताओं से संबंधित सामाजिक दशाओं के दृश्य ने भूगोलवेत्ताओं का ध्यान आकृष्ट किया है।

    ब्लाश ने लिखा है कि “एक देश की विशिष्ट प्रकृति की अभिव्यक्ति उसके पर्वतों, मरुस्थलों तथा नदियों की अपेक्षा उसके निवासियों, उनकी बस्तियों तथा मानव जनसंख्या के भौतिक तत्व से कहीं अधिक होती है।”

     विश्व के सम्पूर्ण ज्ञान के लिए क्षेत्रीय विधि (Regional Method) को भूगोल में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भूगोल की क्षेत्रीय विधि विश्व का सम्पूर्ण, शुद्ध तथा क्रमबद्ध ज्ञान प्रदान करके मानव उत्सुकता को संतुष्ट करने में समर्थ है। जिस प्रकार इतिहास काल (Time) का अतीत (Past) के संदर्भ अध्ययन करता है, उसी प्रकार भूगोल घटनाओं या तत्वों के स्थानों के संदर्भ में अध्ययन करता है।

    विश्व के प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रसार से सम्बन्धित मानव शिक्षा में भूगोल के महत्व को किसी प्रकार कम नहीं आंकना चाहिए, परन्तु भूगोल को संसार का अध्ययन संकुचित क्षेत्रों के संदर्भ में ही करना चाहिए, जिनमें वस्तुओं में पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध हों। क्या भूगोलवेत्ता ही क्षेत्रीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति होता है? निश्चय ही यह सत्य है कि अनेक गैर-भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय ज्ञान में योगदान देने के इच्छुक रहते हैं।

       राल्फ ब्राउन द्वारा यू० एस० ए० के अटलांटिक तट का 1810 में किया गया अध्ययन इस बात का साक्षी है कि विश्व में केवल व्यावसायिक भूगोलवेत्ता ही इसके लिए समर्थ नहीं हैं। परन्तु, गैर-भूगोलवेत्ता या विद्वानों द्वारा एकत्रित सामग्री की विश्वसनीयता की जाँच यदि क्षेत्रीय अध्ययन के रूप में कर ली जाय तो भौगोलिक ज्ञान का महत्व और भी बढ़ जाता है। भूगोल में ऐसी तमाम सामग्री समाविष्ट कर ली गई है जो प्राचीन अन्वेषकों, यात्रियों व साहित्यकारों ने दी है। हेटनर का मत है कि यदि भूगोलवेत्ता और गैर-भूगोलवेत्ता दोनों एक साथ क्षेत्र का वर्णन करें तो भूगोल तथा क्षेत्र का अध्ययन सशक्त होगा।

     एक प्रादेशिक भूगोलवेत्ता का कार्य क्षेत्र का संश्लिष्ट वर्णन प्रस्तुत करना होता है। उसका कार्य कलाकार (Artist) से भिन्न होता है। यद्यपि भूगोलवेत्ता की विधि की प्रकृति फोटो ग्राफिक है जिसमें व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं का योगदान लघुत्तम होता है। भूगोलवेत्ता दृश्य घटनाओं के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या क्षेत्र की सम्पूर्ण तस्वीर को लेकर करता है जो गैर-भूगोलवेत्ता के लिए संभव नहीं है। कोई प्रशिक्षिति भूगोलवेत्ता ही किसी क्षेत्र का वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय वर्णन प्रस्तुत कर सकता है।

      भूगोलवेत्ता कुछ-कुछ कलाकार, मानचित्रकार, साहित्यकार व वैज्ञानिक भी होता है। उसके द्वारा खींचा गया किसी क्षेत्र का चित्र-कलाकार के चित्र से कई अर्थों में भिन्न होता है। वह संकेतों व विरंजक चित्रों से क्षेत्रीय सूचनाओं को आँखों के समक्ष दिखाने में समर्थ होता है।

     एम० मार्टे ने यह स्वीकार किया था कि “भूगोल मूलतः वितरण का विज्ञान है” (Geography is the Science of Distribution)। उसने इस दृष्टिकोण पर सर्वाधिक बल दिया और भूगोल को ‘वस्तुओं के कहाँ? का अध्ययन बताया। यदि वितरण का अध्ययन, भूगोल की प्रकृति का मूल है तो इसे भूगोल प्रतीत होना चाहिए जिससे कि इसकी अन्य विज्ञानों से पहचान हो सके। जब वनस्पति शास्त्री पौधों के वितरण को निर्धारित करता है, तथा समाजशास्त्री जनसंख्या के वितरण को दर्शाता है तो वह भी भूगोलवेत्ता हो जाता है अथवा कम से कम वह भी भूगोल के क्षेत्र में कार्य करने लगता है।

     मिशोटे का तर्क है कि इनमें से प्रत्येक अपने विज्ञान के दृष्टिकोण से विशिष्ट प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करता है, भूगोल के दृष्टिकोण से नहीं। हेटनर ने स्पष्ट किया कि ‘वितरण वस्तुओं का गुण है।’ (Distribution is the attribute of things)। वर्गीकृत विज्ञान घटनाओं पर बल देता है। जिनका वह वितरण अध्ययन करता है, भूगोल क्षेत्रों पर बल देता है जिसके तत्वों में विविधताएँ होती हैं। भूगोल की वितरण-विज्ञान की संकल्पना के सम्बन्ध में कार्ले सॉवर का मत है कि भूगोल कहाँ (where) का विज्ञान है। भूगोलवेत्ता सदैव यह जानने का प्रयास करता है कि उसकी दृश्य घटनाएँ कहाँ हैं? कहाँ? का अध्ययन भूगोल विषय का एक अंग है।

      हरमन लाटेन्साच का मत है कि भूगोल का अध्ययन क्षेत्र रूप के निरीक्षण से ही आरम्भ होता है। क्षेत्र में प्रवेश करते समय सर्वप्रथम भूगोलवेत्ता की दृष्टि पहाड़ियों, वनों, खेतों, ग्रामों व नगरों आदि की विभिन्नता पर ही जाती है। वास्तव में भूगोलवेत्ता भू-तल की मुखाकृति का आलोकन करके अलग-अलग क्षेत्रों में तथ्यों का वर्णन करता है।

     आइंस्टीन ने क्षेत्र (Space) को काल से विलग नहीं माना है। वे देश-काल (Space-time) के संदर्भ में भूगोल को देखते थे। क्षेत्र (Space) एवं काल (Time) एक-दूसरे के परिपूरक हैं। वे विलग नहीं किए जा सकते हैं। प्रत्येक कालावधि में क्षेत्रीय आयाम (गुण-धर्म) बदल जाता है अर्थात् प्रत्येक क्षेत्रीय इकाई की विशेषतायें काल-क्रमानुसार भिन्न होती है। इस प्रकार (Space) अन्तराल (Gap) नहीं अन्तर्सम्बन्धों का पुंज है।

    शेफर (Schaefer F) ने निरपेक्ष क्षेत्र (Absolute Space) के स्थान पर सापेक्ष्य क्षेत्र (Relatives Space) को अपनाने पर बल दिया है। इसीलिए वर्तमान वैज्ञानिकतावादी युग में विभिन्न सांख्यिकीय एवं ज्यामितिक संकल्पनाओं का उपयोग करते हुए विभिन्न तत्वों के क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या विश्लेषण के आधार पर क्षेत्रीय प्रतिरूप एवं प्रक्रियाओं के विवेचन पर बल दिया जाता है।



Read More:-

35. Development of Modern Indian Geography: Prospects, Problems and Future (आधुनिक भारतीय भूगोल का विकास: संभावनाएँ, समस्याएँ और भविष्य)

Development of Modern Indian Geography: Prospects, Problems and Future

(आधुनिक भारतीय भूगोल का विकास: संभावनाएँ, समस्याएँ और भविष्य)



प्रश्न प्रारूप

Q. भारत में भूगोल के अध्यापन के विकास एवं प्रगति की समीक्षात्मक विवेचना कीजिए।

(Critically examine the development and progress in teaching of Geography in India.)

अथवा, आधुनिक भारतीय भूगोल के विकास की संभावना, समस्याएँ एवं भविष्य की विवेचना करें।

(Discuss the possibilities, problems and future of development of modern Indian geography.)

उत्तर- आधुनिक भारत में भूगोल की शिक्षा का विकास पर्याप्त विलम्ब से हुआ है। यहाँ ब्रिटिश शासन द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्कूल स्तर पर भूगोल का अध्यापन कार्य आरम्भ किया गया। तत्कालीन भारत में सन् 1920 में लाहौर में स्नातक स्तर पर भूगोल विषय की शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। उसके बाद 1924 में अलीगढ़ तथा पटना विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर भूगोल का शिक्षण प्रारम्भ हुआ।

      सन् 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में स्नातकोतर स्तर पर भूगोल का पठन-पाठन प्रारम्भ हुआ। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1941, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 1949 से स्नातकोत्तर स्तर पर भूगोल की शिक्षा दी जाती थी। आधुनिक भारत के भूगोल के विकास में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी उस समय जुड़ी जब 1938 में ‘इण्डियन साइंस कांग्रेस’ (Indian Science Congress) के रजत जयन्ती अधिवेशन में भूगोल को एक अलग खण्ड के रूप में स्वीकार किया गया।

    भारत में 1950 से पूर्व स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षण शोध की सुविधाएँ अलीगढ़, मद्रास, कलकत्ता, बनारस, इलाहाबाद (प्रयागराज), हैदराबाद, लुधियाना तथा पटना विश्वविद्यालयों में उपलब्ध थीं। स्नातक स्तर पर आगरा, कलकत्ता, बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई), बड़ौदा, मैसूर, हैदराबाद, राँची, वाराणसी, इलाहाबाद, नागपुर, उदयपुर, जोधपुर, गुवाहाटी आदि स्थानों पर भूगोल की शिक्षा प्राप्त की जा सकती थी।

     1950 से पूर्व तक भारत में भूगोल की उच्च शिक्षा के विकास में धीमी गति के पीछे रहने के निम्न कारण थे-

(i) ब्रिटेन में भूगोल की उच्च शिक्षा देर से प्रारम्भ हुई। भारत में 1947 तक ब्रिटेन का अधिकार रहा है। इसलिए ब्रिटिश भारतीय शिक्षण संस्थानों में नियुक्त न हो सके।

(ii) भारत में भूगोल में उच्च शिक्षा हेतु भारतीय विद्वानों की कमी थी।

(iii) भूगोल शिक्षा के विकास हेतु प्रारम्भ में राष्ट्रीय नीति एवं पाठ्यक्रम का अभाव था।

     भारत में 1951 से 1960 के दशक में कर्नाटक (धारवाड़), पूना, उस्मानिया (हैदराबाद) राँची, बड़ौदा, सागर, गौहाटी, सिलीगुड़ी, भागलपुर, गोरखपुर, मैसूर और दिल्ली विश्वविद्यालयों में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हुए।

       1961-1970 की अवधि में दार्जिलिंग, बोधगया, जोधपुर, उदयपुर, रायपुर, ग्वालियर, जयपुर, कुरुक्षेत्र तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग खोले गए।

     1971 के बाद गढ़वाल, कुमायूँ (नैनीताल), जम्मू-काश्मीर (श्रीनगर), हिमाचल (शिमला), शिलाँग आदि में भूगोल के स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हुए। भारत में महाविद्यालय स्तर पर भूगोल की शिक्षा का प्रबन्ध स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तेजी से हुआ है। यहाँ सेन्ट जोन्स कालेज (आगरा), बलवन्त राजपूत कालेज (आगरा), डी० ए० वी कालेज (मुरादाबाद) में 1950 से पूर्व भूगोल की शिक्षा दी जाती थी।

      1951 से 1970 तक डी० एस० बिष्ट (नैनीताल), के० एन० राजकीय ज्ञानपुर, वार्ष्णेय अलीगढ़, धर्म समाज (अलीगढ़), वर्धमान (बिजनौर), किशेरी रमन (मथुरा), नागपुर महाविद्यालय (नागपुर), विदर्भ म० वि० अमरावती महाकौशल महाविद्यालय (जबलपुर), महारानी लक्ष्मीबाई कालेज (ग्वालियर), गर्वन्मेण्ट हमीदिया कालेज (भोपाल), पार्ले महाविद्यालय (बम्बई), मेरठ कालेज (मेरठ), एस०एस०वी० कॉलेज (हापुड़), डी० जे० (बड़ौत), डी० बी० एस० (देहरादून), डी० ए० वी०, (देहरादून), राजकीय रजा स्नातकोत्तर कालेज (रामपुर), टी० डी० एस० कालेज (जौनपुर), जे० वी० जैन (सहारनपुर), एम० एम० एच० (गाजियाबाद), माधव कालेज (उज्जैन), दयानन्द महाविद्यद्यालय अजमेर, इन्दौर तथा शोलापुर में स्नातकोत्तर विभाग स्थापित हो चुके थे।

    आरम्भ में भारत में भूगोल की शिक्षा उन विद्वानों द्वारा दी गई जो विदेशों से उच्च शिक्षा ग्रहण करके आते थे। आरम्भिक काल में भूगोल के कार्यों का सम्बन्ध भारतीय भौमिकीय सर्वेक्षण विभाग (Geological Survey of India-G.S.I), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (Indian Meteorological Department) तथा भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) से था। एन० सुब्रमण्यम, आई० आर० खान, एस० पी० चटर्जी, एच० एल० छिब्वर, आर० एन० दुबे, मोहम्मद सफी, रामलोचन सिंह, पी० दयाल, जार्ज कुरियन, एस० सी० चटर्जी, एस० एम० अली, एन० के० बोस, सी० डी० देशपाण्डे जैसे भूगोलविदों ने भारत में आधुनिक भूगोल की शुरुआत की है।

    आई० आर० खान ने लंदन से, एस० पी० चटर्जी ने लंदन से, एच० एल० छिब्बर ने लंदन से, आर० एन० दुबे ने पेरिस से, जार्ज कुरियन ने लंदन से, एस० सी० चटर्जी ने लंदन से तथा एस० एम० अली ने लंदन से पी-एच०डी० या डी० लिट् की डिग्री प्राप्त की थी। इन भूगोलविदों ने भूगोल का अनुसंधान निर्देशन भारतीय विश्वविद्यालयों में बड़ी लगन से किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय विश्वविद्यालयों में भूगोल के एम० ए० और पी-एच० डी० प्राप्त करने वाले विद्वान तैयार होने लगे जिन्होंने भूगोल को आगे बढ़ाने में सहयोग किया है।

      भारत में 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही शोध के विषयों, समस्याओं एवं चिन्तन पर अमेरिकन चिन्तन शैली का तेजी से प्रभाव बढ़ा है। भौगोलिक चिन्तन में नवीन तकनीक के प्रवेश के साथ नई पीढ़ी के स्नातकोत्तर एवं शोध में रत विद्यार्थियों में यहाँ के विशिष्ट परिवेश में उनका निरीक्षण कर व्याख्या प्रस्तुत करना और उनके समाधान के उपायों को बताने एवं समझाने की मनोवृत्ति का निरन्तर विकास हुआ है।

     भारत में अब नगरीय व ग्रामीण क्षेत्रों के विशिष्ट स्वरूपों एवं उनकी समस्याओं, भूमि के उपयोग व कृषि तकनीक के परिवर्तित स्वरूपों का विभिन्न स्तरीय व विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव संसाधन स्वरूप, प्रादेशिक नियोजन जैसे विषयों पर भौगोलिक शोध किए जा रहे हैं। 1975 से ही जनसंख्या समस्या और उसके समाधान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

    आधुनिक भारत में भूगोलवेत्ताओं के चिन्तन में कोई निजी दर्शन नहीं झलकता। काण्ट के भौगोलिक दर्शन के अनुसार यहाँ के भूगोल में काल एवं स्थान (Time and Space) के संदर्भ में परिघटनाओं का अध्ययन किया जाता है। भारत में 1980 के दशक के मध्य तक विगत दो दशकों में विभिन्न पक्षों पर शोध कार्य हुआ है। इसके विकास में अनेक सम्मेलनों, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं तथा अधिवेशनों का योगदान है।

     1960-70 का दशक भारतीय भूगोल के इतिहास का महत्वपूर्ण दशक है। इस अवधि में 1968 में नई दिल्ली में अन्तराष्ट्रीय भूगोल संगठन (I.G.U.) की 21 वीं कांग्रेस प्रो० एस० पी० चटर्जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इस दशक में लगभग 1000 शोध-पत्र प्रकाशित हुए, 30 शोध ग्रन्थ छपे और 6 शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। उत्तर भूगोल पत्रिका (गोरखपुर) तथा ‘भू-दर्शन’ (उदयपुर) का प्रकाशन इसी अवधि से प्रारम्भ हुआ है।

      इस दशक की अन्य उल्लेखनीय घटनाएँ निम्नांकित हैं-

(1) विश्वविद्यालय अनुदान द्वारा ग्रीष्मकालीन शिक्षण शिविर, संगोष्ठियाँ या कार्यशाला आयोजन हेतु अनुदान देना।

(2) अन्तराष्ट्रीय भूगोल कांग्रेस की देश में विभिन्न विश्वविद्यालयों में गोष्ठियों का आयोजन।

(3) यू० एन० ओ० तथा यूनेस्को द्वारा आयोजित संगोष्ठियाँ।

(4) योजना आयोग शुष्क क्षेत्र संस्थान (जोधपुर), नगर एवं ग्राम्य नियोजन संस्थान, आदि की स्थापना।

      भारत में भूगोल के विकास में संलग्न वैज्ञानिक संस्थान (Scientific Organisations Engaged in Development of Geography in India)

     भारत में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के अलावा कुछ वैज्ञानिक संस्थाएँ भी भूगोल के विकास में मदद करती हैं। ये संस्थाएँ हैं-

(1) राष्ट्रीय एटलस संस्थान, कलकत्ता।

(2) सर्वे आफ इण्डिया, देहरादून।

(3) भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, पूना।

(4) केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर।

(5) भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वे संस्थान, कलकत्ता।

(6) भारतीय जनगणना विभाग, दिल्ली।

(7) भारत का योजना आयोग, नई दिल्ली।

(8) भारत का मानव वैज्ञानिक सर्वे संस्थान।

(9) भारतीय सांख्यिकीय संस्थान।

(10) भारत का तकनीकी आर्थिक सर्वे विभाग।

(11) भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICSSR)।

(12) भारतीय सुदूर संवेदन अभिकरण (Indian Remote Sensing Agency)।

(13) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली (U.G.C)।

(14) भारतीय विज्ञान कांग्रेस (Indian Science Congress)।

   स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में ग्रेट ब्रिटेन के भूगोलवेत्ता एल० डी० स्टाम्प का प्रभाव रहा था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मोहम्मद सफी ने उनके निर्देशन में भूमि उपयोग पर कार्य किया। उनका यह कार्य Land Utilization in Eastern Uttar Pradesh-1960′ में छपा था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामलोचन सिंह ने नगरीय भूगोल एवं सागर विश्वविद्यालय में प्रो० सक्सेना ने ‘वैदिक भारत का भूगोल’ एवं बेचन दुबे ने ‘प्राचीन भारत’, एस० सी० बोस ने ‘दामोदर घाटी’ का अध्ययन किया। देश में 1980 तक 55 विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर स्तर पर भूगोल के पठन-पाठन तथा अनुसंधान की सुविधा उपलब्ध हो चुकी थी।

    वर्तमान दशक में भूगोल में देहरादून स्थित भारतीय फोटो निर्वचन संस्थान (IPI), राष्ट्रीय सुदूर संवेदन अभिकरण, हैदराबाद (NRSA) तथा भारतीय एटलस संस्थान, कलकत्ता अति आधुनिक तरीकों से भूगोल के अध्ययन-अध्यापन में सहायता कर रहे हैं।

      1970-80 के दशक में भूगोलवेत्ताओं द्वारा जो कार्य किए गए उससे राष्ट्र निर्माण में पर्याप्त मदद मिली है। लेकिन भारतीय भूगोल की सबसे बड़ी कमी यह रही है कि यहाँ भूगोल के शोध की समस्याओं एवं क्षेत्रों के नियोजन से सम्बन्धित प्रशासकीय दृष्टिकोण से नहीं जोड़ा गया है। आधुनिक भारतीय भूगोलवेत्ता भूगोल का सैद्धान्तिक विकास करने में अक्षम रहे हैं। मो० मुनीस रजा (Moonis Raza) का कथन है कि “भारत का भूगोल वृहदाकार जीव की तरह है जिसकी रीढ़ की हड्डी नहीं है।” 

     भारत में राष्ट्रीय स्तर पर भूगोल का कोई विकसित संस्थान नहीं है और न भूगोल के विकास की कोई राष्ट्रीय नीति है। यहाँ भूगोलवेत्ताओं को नियोजन में वह स्थान नहीं दिया गया है जैसा कि विकसित देशों में दिया जाता है।

    भारतीय राष्ट्रीय भूगोल परिषद्, वाराणसी की स्थापना 1940 में प्रो० एच० एल० मि द्वारा की गई थी। 1955 के बाद से प्रो० रामलोचन सिंह के निर्देशन में भूगोल की प्रतिष्ठित पत्रिका National Geographical Journal का प्रकाशन होता रहा है। यहाँ 1966 में पहली बार All India Seminar on Applied Geography आयोजिन किया गया। इसके बाद विकासशील देशों के नगरीय भूगोल पर सम्मेलन 1968 में तथा राष्ट्रीय भूगोल परिषद् का जयन्ती समारोह 1971 में आयोजित किए गए। 1978 में IGU के अन्तर्गत ग्रामीण अधिकार पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई थी। यहाँ मानसून एशिया के ग्रामीण अधिवासों पर 1971 में अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी भी सम्पन्न हुई।

   बम्बई भूगोल परिषद् भारत की ऐसी भूगोल परिषद् है जहाँ रॉयल ज्याग्राफिकल सोसायटी लंदन का कार्यालय था और जिसकी स्थापना 1832 में की गई। 1873 में इसे एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता से सम्बन्धित किया गया। 1963 से यह परिषद् नियमित रूप से चल रही है। भारतीय भूगोल परिषद्, मद्रास की स्थापना 1926 में की गई। यहाँ से Indian Geographical Journal पत्रिका प्रकाशित होती रही है।

     अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की भूगोल सोसायटी की स्थापना 1946 में की गई। यहाँ अनेक एशियाई तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भूगोल सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। यहाँ 1956 में पहला अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें खाद्य एवं जनसंख्या समस्या, शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों की समस्याएँ, नगरीय सर्वेक्षण, जल विद्युत निकास आदि विषयों पर 65 शोध पत्र पढ़े गए। इस सोसायटी द्वारा 1965 एवं 1966 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा भारत सरकार के विशेष आर्थिक सहयोग से नैनीताल में दो बार ग्रीष्मकालीन शिविरों का अयोजन किया गया। 1968 में मोहम्मद सफी ने यहाँ IGU की उत्तर भारत की एक बैठक बुलाई।

     भारत में भूगोल परिषदों का उत्साह अब समाप्त हो चुका है। यहाँ अधिकांश परिषद् विशेषीकरण (Specialisation) को प्रोत्साहन देकर भूगोल की नई प्रवृत्तियों का संवर्धन कर रही है। अल्पकाल में अनियमित होने वाली परिषदों की संख्या अधिक है। इसके पीछे संस्थापकों/संरक्षकों का देहावसान होना अथवा अवकाश ग्रहण के बाद प्रभावहीन हो जाना रहा है।

निष्कर्ष:-

   आधुनिक भारत में भूगोल की प्रगति एवं उसमें चिन्तन धारा को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत में भूगोल का अभी पूरी तरह से विकास नहीं हुआ है। इसका विकास थम-सा गया है। यहाँ भूगोल की शिक्षा के प्रति वह उत्साह नहीं दिखाई पड़ता है जो उत्साह स्वतंत्रता प्राप्ति के 20 वर्षों बाद तक रहा था। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में भूगोल को वह सरकारी स्थान नहीं मिल पाया है जो मिलना चाहिए था।

     अतः, भारतीय भूगोल के सम्बन्ध में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि भारतीय भूगोलवेत्ता व्यक्तिगत रूप से भूगोल के क्षेत्र में वास्तविक योगदान दे रहे हैं, फिर भी भूगोल की भारतीय विचारधारा का उभरना अभी शेष है।



Read More:-

error: