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1. Universe (ब्रह्माण्ड)

1. Universe (ब्रह्माण्ड)



ब्रह्माण्ड-

      सूक्ष्मतम अणुओं से लेकर विशालकाय आकाशगंगाओं (Galaxies) तक के सम्मिलित स्वरूप को ब्रह्माण्ड कहा जाता है। हमारी पृथ्वी इन्ही असंख्य आकाशगंगाओं में से एक दुग्धमेखला (Milkyway) नामक आकाशगंगा में स्थित है।

Universe

ब्रह्माण्ड से सम्बंधित प्रमुख अवधारणाएँ

1. प्लेटो (428- 348 ई० पू०)-

      यूनानी भूगोलवेत्ता प्लेटो ने सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड का नियमित अध्ययन कर भू-केन्द्रीत अवधारणा (Geocentric Concept) का प्रतिपादन किया था। इस अवधारणा के अनुसार, पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है तथा सूर्य व अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। ब्रह्माण्ड के संदर्भ में यह अवधारणा बहुत लम्बे समय तक बनी रही।

2. कॉपरनिकस (1543 ई०)-

     पोलैंड खगोलशास्त्री कॉपरनिकस ने अपनी हस्तलिखित पुस्तक में सूर्य केन्द्रित अवधारणा (Heliocentric Concept) के अन्तर्गत यह बताया कि, ब्रह्माण्ड के केन्द्र में पृथ्वी नहीं, अपितु सूर्य है। यद्यपि ब्रह्माण्ड सम्बंधी उनकी अवधारणा सौर परिवार तक ही सीमित थी, तथापि इस अवधारणा ने ब्रह्माण्ड के अध्ययन की दिशा ही बदल दी। इस सिद्धांत के अनुसार दैनिक गति में पृथ्वी अपने अक्ष पर तथा वार्षिक गति में सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है।

3. वाराहमिहिर (छठी शताब्दी ई०)-

      भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री कॉपरनिकस से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि, चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सम्बंधित प्रमुख सिद्धांत

1. महाविस्फोट सिद्धांत (Big Bang Theory)- जॉर्ज लैमेतेयर

2. साम्यावस्था सिद्धांत (Steady State Thoery)- थॉमस गोल्ड एवं हर्मन बांडी

आकाशगंगा Galaxy:-

    आकाशगंगा (Galaxy) तारों का एक विशाल पूँज है। ब्रह्माण्ड में लगभग 1011 आकाशगंगाएँ हैं। प्रत्येक आकाशगंगा में 1011 तारें हैं। तारों के अतिरिक्त आकाशगंगा में धूल (Dust) एवं गैसें (Gases) भी पायी जाती हैं। आकाशगंगा में 98% भाग तारों का तथा 2% भाग गैस, हैड्रॉन व धूल का होता है।

⇒ हमारी पृथ्वी दुग्धमेखला (Milky way) नामक आकाशगंगा में स्थित है। अन्य आकाशगंगाओं में वृहत मैग्लेनिक मेघ, लघु मैग्लेनिक मेघ, अर्सा माइनर सिस्टम, स्कल्पचर सिस्टम और ड्रेको सिस्टम हैं।

एंड्रोमेडा (Andromeda):-

    एण्डोमेड्रा सर्पिलाकार आकाशगंगा हमारी आकाश गंगा मिल्की वे से सबसे निकटतम स्थित है। यह पृथ्वी से 2.5 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर अवस्थित है। इसे देवयानी भी कहते हैं।

आकाशगंगा के प्रकार

       आकृति के आधार पर आकाशगंगाएँ तीन प्रकार की होती हैं:-

(i) अण्डाकार या दीर्घवृत्तीय (Eliptical)- M87

(ii) सर्पिलाकार (Spiral)- मिल्की वे (Milkyway) एवं एंड्रोमेंडा (Andromenda)

(iii) अनियमित आकार (Irregular)

प्रॉक्सिमा सेन्चुरी (Proxima Centauri):-

      यह सूर्य का सबसे निकटतम तारा है। यह सूर्य से 4.25 प्रकाश वर्ष दूर है।

साइरस या डॉगस्टार (Sirius or Dog Star):-

        यह रात में आकाश में दिखने वाला सर्वाधिक चमकीला तारा है। इसका द्रव्यमान सूर्य से दोगुना है। यह सौर मंडल से लगभग 8.6 प्रकाश वर्ष दूर है, जो प्रॉक्सिमा सेन्चुरी के बाद सबसे नजदीक का तारा है।

ध्रुव तारा (Pole Star or North Star):-

       यह पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर खड़े व्यक्ति के ठीक शिरोबिन्दु (Zenith) पर 431 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है लेकिन क्योंकि यह बहुत चमकदार है इसलिए आसानी से देखा जा सकता है।

प्रकाश वर्ष (Light Year):- 

         प्रकाश वर्ष, समय का नहीं बल्कि दूरी का मात्रक है। प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किमी. प्रति सेकेण्ड है। 1 वर्ष में सूर्य का प्रकाश जितनी दूरी तय करता है, वह एक प्रकाश वर्ष कहलाती है।

⇒ एक प्रकाश वर्ष 9.46×1012 किमी. के बराबर होता है।

पारसेक (Parsec):-

       यह दूरी मापन की सबसे बड़ी इकाई है, जिसका मान लगभग 3.26 प्रकाश वर्ष के बराबर होता है।

1 पारसेक = 3.26 प्रकाश वर्ष

तारों का रंग, तापमान एवं उम्र

⇒ तारों के रंग से उसके तापमान को ज्ञात किया जाता है।

⇒ तारों द्वारा मुक्त ऊष्मा के आधार पर उनकी उम्र ज्ञात की जा सकती है, जैसे-

नीला व सफेद – युवा (आद्य तारा)

नारंगी – प्रौढ़

लाल – वृद्ध

⇒ अंततः विस्फोट के बाद तारे की मृत्यु हो जाती है या वह ‘कृष्ण विवर’ (Black Hole) बन जाता है।

चंद्रशेखर सीमा (Chandrasekhar Limit)-

⇒ एस. चंद्रशेखर भारतीय मूल के अमेरिकी खगोल भौतिकविद् थे। जिन्होंने श्वेत वामन तारों के जीवन अवस्था के बारे में सिद्धांत प्रतिपादित किया।

⇒ इसके अनुसार, 1.44 सौर द्रव्यमान ही श्वेत वामन के द्रव्यमान की ऊपरी सीमा है। इसे ही ‘चंद्रशेखर सीमा’ कहते हैं।

⇒ एस. चंद्रशेखर को संयुक्त रूप से नाभिकीय खगोल भौतिकी में ‘डब्ल्यू. ए. फाउलर’ के साथ 1983 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star)

⇒ सुपरनोवा विस्फोट से बचे हुए केंद्रीय भाग, जो कि अत्यधिक घनत्व वाला होता है, से न्यूट्रॉन तारों का निर्माण होता है।

⇒ अधिक गति से चक्कर लगाने वाले न्यूट्रॉनों से बने तारों को ‘न्यूट्रान तारा’ कहते हैं।

⇒ न्यूट्रॉन तारे के सभी अंश न्यूट्रॉन के रूप में संगठित रहते हैं। यह तीव्र रेडियो तरंगें उत्सर्जित करते हैं।

⇒ न्यूट्रॉन तारे को ‘पल्सर’ भी कहा जाता है।

कृष्ण विवर (Black Hole)

⇒ कृष्ण विवर अंतरिक्ष में स्थित ऐसा स्थान है जहाँ गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि प्रकाश का परावर्तन या किसी भी वस्तु का वहाँ से पलायन नहीं हो सकता।

⇒ इसे दूरबीन से भी नहीं देखा जा सकता।

⇒ कृष्ण विवर की पुष्टि प्रकाश के अपने पथ के विचलन के द्वारा की जाती है।

⇒ कृष्ण विवर का निर्माण तब हो सकता है जब न्यूट्रॉन तारे में द्रव्यमान एक ही स्थान पर संकेद्रित हो जाए अथवा उसकी मृत्यु हो रही हो।

⇒ ब्लैक होल आकार में बड़ा या छोटा हो सकता है। छोटे ब्लैक होल एक परमाणु जितने छोटे हो सकते हैं लेकिन उनका द्रव्यमान बहुत अधिक होता है।

⇒ जिन तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तीन गुने से अधिक होता है, वे विघटित होकर अंततः कृष्ण विवर में परिणत हो जाते हैं।



ब्रह्माण्ड से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



1. ‘भूगोल का जनक’ किसे कहा जाता है?

[A] हेरोडोटस
[B] इरैटोस्थनीज
[C] एनेक्जीमेण्डर
[D] हिकैटियस

2. भूगोल को एक अलग अध्ययन शास्त्र के रूप में स्थापित करने का श्रेय निम्न में से किस विद्वान को है?

[A] इरैटोस्थनीज
[B] हेरोडोटस
[C] हिप्पार्कस
[D] हिकैटियस

3. भूगोल के लिए ‘ज्योग्रैफिका’ (Geographica) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?

[A] हिकैटियस
[B] इरैटोस्थनीज
[C] हेरोडोटस
[D] एनेक्जीमेण्डर

4. ‘ज्योग्राफी’ (Geography) के शाब्दिक अर्थ के आधार पर भूगोल की परिभाषा की गई है

[A] भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी के धरातल का अध्ययन करता है।
[B] भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी तथा मानव के अर्न्तसम्बन्धों का अध्ययन करता है।
[C] भूगोल वह विज्ञान है जो मानवीय एवं प्राकृतिक विषमता का अध्ययन करता है।
[D] इनमें से कोई नहीं।

5. ‘भूगोल पृथ्वी को केन्द्र मानकर अध्ययन करने वाला विज्ञान है’, किसने कहा था?

[A] टॉलमी
[B] काण्ट
[C] वारेनियस
[D] टेलर

6. ‘भूगोल भूतल का अध्ययन है’-किसने कहा था?

[A] टॉलमी
[B] काण्ट
[C] वारेनियस
[D] हम्बोल्ट

7. भौगोलिक विचारधाराओं में ‘नवनियतिवाद’ की विचारधारा का प्रवर्तक कौन है?

[A] फ्रेडरिक रैटजेल
[B] फेब्रे
[C] ग्रिफिथ टेलर
[D] विडाल-डि-ला-ब्लॉश

8. ‘वर्तमान भूत की कुंजी है’ कथन किस विद्वान का है?

[A] डटन
[B] डेविस
[C] जेम्स हट्टन
[D] वाल्टर पेंक

9. ‘स्थल रूप संरचना, प्रक्रम तथा अवस्था का प्रतिफल होता है’ कथन किसका है?

[A] वाल्टर पेंक
[B] डब्ल्यू० एम० डेविस
[C] एल० सी० किंग
[D] पेल्टियर

10. ‘यदि इतिहास’ कब का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करता है तो भूगोल ‘कहाँ’ (where) का वैज्ञानिक एवं तार्किक अध्ययन है’ कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान का है?

[A] कार्ल सावर
[B] एच० जे० मैकिण्डर
[C] एन० जे० स्पाइकमैन
[D] डी० एच० ह्निटिल्सी

11. भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) का जन्मदाता किसे माना जाता है?

[A] डेविस
[B] पेशेल
[C] हट्टन
[D] पेंक

12. ‘रूको और जाओ नियतिवाद’ (Stop and Go Determinism) की विचारधारा के प्रतिपादक कौन हैं?

[A] ए० जे० हरबर्टसन
[B] हार्टशोर्न
[C] जॉर्ज टैथम
[D] ग्रिफिथ टेलर

13. भूगोल को ‘मानव पारिस्थिातिकी’ के रूप में परिभाषित करने वाला विद्वान कौन है?

[A] विडाल डि-ला-ब्लॉश
[B] हेटनर
[C] जीन ब्रून्श
[D] एच० एच० बैरोज

 

14. गणितीय भूगोल का प्रारम्भकर्ता निम्न में से कौन है?

[A] थेल्स
[B] स्ट्रेबो
[C] टॉलमी
[D] थियोफ्रेस्टस

15. चूँकि मानव पृथ्वी पर निवास करता है, अतः पृथ्वी पर निर्भर है’ कथन किसका है?

[A] फैब्रे
[B] ब्लॉश
[C] सेम्पुल
[D] जीन ब्रून्श

16. ‘क्षेत्रीय भूगोल’ (Regional Geography) का पिता निम्न में से किस भूगोलवेत्ता को कहा जाता है?

[A] कार्ल रिटर
[B] फ्रेडरिक रैटजेल
[C] एच० जे० हरबर्टसन
[D] हम्बोल्ट

 

17. ‘मानव भूगोल का पिता’ निम्न में से किसको कहा जाता है?

[A] ब्लॉश
[B] कार्ल रिटर
[C] हम्बोल्ट
[D] जीन ब्रून्श

18. ‘मानव भूगोल अस्थायी पृथ्वी एवं चंचल मानव के पारस्परिक परिवर्तनशील सम्बन्धों का अध्ययन है।’ कथन किसका है?

[A] ब्लॉश
[B] कु० सेम्पुल
[C] हण्टिंगटन
[D] हम्बोल्ट

19. महाविस्फोट सिद्धान्त संबंधित है-

[A] ब्रह्माण्ड की उत्पति से
[B] महाद्वीपीय विस्थापन से
[C] हिमालय की उत्पत्ति से
[D] ज्वालामुखियों के विस्फोट से

20. ब्रह्मांड के अध्ययन को ……. के नाम से जाना जाता है।

[A] कॉस्मोलॉजी
[B] एस्ट्रोलॉजी
[C] सिस्मोलॉजी
[D] लिम्नोलॉजी

21. भारी ब्रह्मांडीय कणों का अध्ययन करने के लिए नासा द्वारा प्रक्षेपित किया जाने वाले बेलून-जनित उपकरण का क्या नाम है?

[A] सुपर लम्बा
[B] सुपर टाइगर
[C] सुपर लायन
[D] सुपर मामा

22. ‘बिग-बैंग सिद्धान्त’ निम्नलिखित के उद्भव की व्याख्या करता है:

[A] हिम युग
[B] स्तनधारी जीव
[C] ब्रह्माण्ड
[D] महासागर

23. 1948 में विकसित बिग बैंग सिद्धांत के लिए निम्न में से कौन सा एक वैकल्पिक सिद्धांत है, जो ये बताता है कि ब्रह्मांड परिवर्तित नहीं होता है भले ही इसमें समय के साथ विस्तार होता है?

[A] ऑसीलेटिंग यूनिवर्स
[B] स्टेडी स्टेट यूनिवर्स
[C] मिरर यूनिवर्स
[D] इटरनल इन्फ्ते शन

24. श्याम विवर (Black Hole)-

[A] पराबैंगनी किरणों को पार रक्त किरणों में बदल देता है।
[B] कोई भी विकिरण प्रवाहित नहीं करता।
[C] सारे विकिरण जो इसके पास से प्रवाहित होते है उनका अवशोषण करता है।
[D] एक काल्पनिक विचार है।

25. ‘ब्लैक होल’ की जानकारी सर्वप्रथम दी थी-

[A] मेघनाथ साहा ने
[B] हरमान बाण्डी ने
[C] एस. चन्द्रशेखर ने
[D] जे. वी. नार्लिकर ने

26. विज्ञान के किस क्षेत्र में आप ‘व्हाइट ड्वार्फ’ के बारे में सीखेंगे?

[A] कृषि
[B] खगोलशास्त्र
[C] जेनेटिक्स
[D] एन्थ्रोपोलॉजी

27. किसी तारे का रंग दर्शाता है-

[A] उसके ताप का
[B] उसकी पृथ्वी से दूरी
[C] उसकी ज्योति
[D] उसकी सूर्य से दूरी

28. तारे अपनी ऊर्जा प्राप्त करते हैं-

1. नाभिकीय संलयन से

2. गुरुत्वीय संकुचन से

3. रासायनिक अभिक्रिया से

4. नाभिकीय विखण्डन से

अपने उत्तर का चयन नीचे दिए गए कूट से कीजिए-

[A] 1, 2 एवं 3
[B] 1 एवं 2
[C] 1 एवं 4
[D] 2 एवं 4

29. तारे पूर्व से पश्चिम में किस कारण ज्यादा दिखते हैं?

[A] पूरा ब्रह्मांड, पूर्व से पश्चिम को घूम रहा है
[B] पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा कर रही है
[C] पृथ्वी, पूर्व से पश्चिम को घूम रही है
[D] पृथ्वी, पश्चिम से पूर्व को घूम रही है

30. ‘सुपरनोवा’ क्या है?

[A] पुच्छल तारा
[B] ग्रहिका
[C] विस्फोटी तारा/एक मृतप्राय तारा
[D] ब्लैक होल

31. पल्सर होते हैं-

[A] पृथ्वी की ओर जा रहे तारे
[B] पृथ्वी से दूर जा रहे तारे
[C] तेजी से घूमने वाले तारे
[D] उच्च तापमान वाले तारे

32. तारों के मध्य दूरी ज्ञात करने की इकाई है-

[A] कॉस्मिक किलोमीटर
[B] स्टीलर मील
[C] गैलेक्टिक इकाई
[D] प्रकाश वर्ष

33. तारामंडल ‘सप्त-ऋषि’ को पश्चिमी निवासी किस नाम से जानते हैं?

[A] सेवन मॉक
[B] अल्फा सेंटोरी
[C] बिग डिपर
[D] स्मॉल बियर

34. जिस तारा मण्डल के तारे ध्रुवतारे की ओर संकेत करते हैं वह है-

[A] मृग
[B] सप्तऋषि
[C] वृश्चिक
[D] वृष

35. हमारे अंतरिक्ष में कितने तारामंडल (Constellations) है?

[A] 88
[B] 87
[C] 89
[D] 90

36. ‘हेल-बॉप’ किसका नाम है?

[A] कार्टून चित्र
[B] पुच्छल तारा
[C] अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी
[D] एक खिलौना

37. खगोल-भौतिकी में बाह्य अंतरिक्ष में परिकल्पित होल को जहाँ से तारे और ऊर्जा निकलती है, क्या नाम दिया गया है?

[A] ब्लैक होल
[B] ओजोन होल
[C] एस्टिरॉपड बेल्ट
[D] वाइट होल

38. वह सीमा जिसके बाहर तारे आन्तरिक मृत्यु से ग्रसित होते हैं, कहलाती है-

[A] एडिंगटन सीमा
[B] चन्द्रशेखर सीमा
[C] हायल सीमा
[D] फाउलर सीमा

39. एक निक्षित आकृति में व्यवस्थित ताराओं का समूह कहलाता है-

[A] नक्षत्र
[B] आकाश गंगा
[C] एन्ड्रोमेडा
[D] सौर मण्डल

40. घटकों के बीच गुरुत्वाकर्षण द्वारा भारी मात्रा में एक साथ एकत्र हुए तारों, धूल और गैस को क्या कहते हैं?

[A] गुच्छा
[B] वायुमंडल
[C] मंदाकिनी (आकाशगंगा)
[D] सौर परिवार

41. हमारी आकाशगंगा की आकृति हैं-

[A] वृत्ताकार
[B] दीर्घवृत्ताकार
[C] स्पाइरल
[D] उपर्युक्त में से कोई नहीं

42. आकाश गंगा वर्गीकृत की गई है-

[A] विद्युत गैलेक्सी के रूप में
[B] सर्पाकार गैलेक्सी के रूप में
[C] अनियमित गैलेक्सी के रूप में
[D] गोलाकार गैलेक्सी के रूप में

43. आकाशगंगा मंदाकिनी सबसे पहले देखी थी-

[A] गैलीलियो ने
[B] मार्टेन श्मिट ने
[C] मार्कोनी ने
[D] न्यूटन ने

44. उस आकाशगंगा का नाम क्या है जिसमें पृथ्वी एक ग्रह है?

[A] एन्ड्रोमेडा
[B] अर्सा मेजर
[C] उर्सा माइनर
[D] दुग्ध-मेखला


45. हमारी आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा करने में सूर्य को समय लगता है-

[A] 10 करोड़ वर्ष
[B] 5 करोड़ वर्ष
[C] 20 करोड़ वर्ष
[D] 25 करोड़ वर्ष

46. 11 बिलियन वर्षों पूर्व अस्तित्व में होने वाली ए 1682 बी11 नामक आकाशगंगा का आकार क्या था?

[A] विक्षोभ डिस्क
[B] कुंडलीकार
[C] पतली डिस्क
[D] कोई विकल्प सही नहीं है

47. 11 बिलियन वर्षों पूर्व अस्तित्व में होने वाली सबसे प्राचीन कुंडलित आकाशगंगा का क्या नाम है?

[A] A1689 B01
[B] A1689 B10
[C] A1689 B20
[D] A1689 B11

12. Examples for man Made Disasters in India (भारत में मानव जनित आपदाओं का उदाहरण)

12. Examples for man Made Disasters in India

(भारत में मानव जनित आपदाओं का उदाहरण)



          भारत में मानवजनित आपदाओं को निम्न उदाहरण द्वारा देख सकते है।

(1) भोपाल गैस त्रासदी, 1984 (Bhopal Gas Tragedy)

       भोपाल में 2-3 दिसम्बर, सन् 1984 को हुई गैस दुर्घटना प्राणघातक गैसों के रख-रखाव में मनुष्य की असावधानी से उत्पन्न आपदापन्न प्रकोपों का ज्वलंत उदाहरण है। भोपाल स्थित अमेरिकन यूनियन कार्बाइड कारखाने के गैस संयंत्र से 2-3 दिसम्बर (1984) की शीत रात्रि में जहरीली मिक गैस (MIC= Methyle Iso-Cynate) के अचानक फूट निकलने के कारण वायु प्रदुषण की वृहत्तम दुर्घटना घट गयी। आधिकारिक सूचना के कारण इस प्रलयकारी गैस दुर्घटना के कारण कुछ घण्टों में ही 2500 व्यक्ति कालकवलित हो गये जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना से मरने वालों की संख्या 5000 से अधिक बतायी गयी है।

       भोपाल स्थित इस अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशी रसायन के निर्माण के लिए मिक गैस का उत्पादन किया जाता था तथा उसका भूमिगत कंटेनरों में भण्डारन किया जाता था। 2-3 दिसम्बर की रात में इन्हीं कंटेनरों से मिक गैस का अचानक रिसाव (लीकेज) प्रारम्भ हुआ तथा यह रिसाव 40 मिनट तक चलता रहा।

       प्रातः कालीन वायु के प्रभाव से यह जहरीली गैस पुराने भोपाल नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैल गयी तथा पलक झपकते हजारों लोगों को निगल गयी। इसके अलावा हजारों निवासी इस विषाक्त गैस से बुरी तरह प्रभावित हो गये एवं हजारों जानवरों ने प्राण त्याग दिये। इस गैस मे पेय जल, मिट्टियों, तालाबों तथा जलाशयों के जल को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया तथा गर्भस्थ शिशुओं (भ्रूणों), नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं आबाल-वृद्ध लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

     गैस त्रासदी के समय जन्मे बच्चों, जो बाद में मर गये, के जिगर में नीले धब्बे पड़ गये वे खाँसी तथा अस्थमा के रोगी हो गये तथा अधिकांश की आँखों की रोशनी चली गयी। भोपाल गैस त्रासदी को घटित हुए एक लम्बा समय बीत गया है परन्तु आज भी पुराने भोपाल के खांसते, आँख, मलते तथा लंगड़ाते लोग मानव-कृत जानलेवा आपदा की घटना को ताजा कर जाते हैं।

(2) चसनाला कोयला खदान आपदा, 1975 (Chasnala Coal Mine Disaster)

       झारखण्ड राज्य के धनबाद जिले में स्थित चसनाला कोयला खदान में 27 दिसम्बर, 1975 को एक हृदय विदारक (Heart Shaking) ऐसी आपदा घट गयी जिस कारण खदान में कार्यरत 372 लोगों की जान चली गयी। चसनाला की गहरी खदान में सैकड़ों खननकर्ता (Miners) कार्य कर ही रहे थे कि एक विस्फोट करने पर खादान के एक चैम्बर की छत अचानक भर भराकर गिर गया और उसमें 272 दबकर मर गए।

(3) संरचनात्मक विफलता (structural failure)

     संरचनात्मक विफलता के कई ऐसे उदाहरण हैं जो भवनों के उनके निर्माण के समय ही ध्वस्त होने को दर्शाते हैं। अर्थात् अपने निर्माण की अवस्था में ही कई भवन भरभरा कर ढह जाते हैं (गिर पड़ते हैं)। उदाहरण: अप्रैल 2013 में महाराष्ट्र के थाणे जिला में 7 मंजिला भवन जिसका बिना सरकारी अनुमति के गैरकानूनी रूप से निर्माण कराया जा रहा था, भरभरा कर गिर गया।

      इस दुर्घटना में 39 व्यक्ति मारे गये तथा 72 घायल हो गये। उस समय राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF– National Disaster Response Force) की टीम ने अतिरिक्त 25-30 लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जतायी थी। इसी तरह 2013 में ही महाराष्ट्र में संरचनात्मक विफलता की दुर्घटना सितम्बर महीने में घट गयी। मुम्बई में एक 4 मंजिला रिहायसी (Residential) भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गया, जिस कारण 61 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी।

(4) संरचनात्मक अग्निकांड दुर्घटना आपदा (Structural Fire accidents Disaster)

    विभिन्न उपयोगों वाले भवनों यथा प्राइवेट एवं पब्लिक सेक्टर के कार्यालय, सिनेमा हाल, शापिंग माल, रिहायसी तथा वाणिज्यिक काम्प्लेक्स, धार्मिक शिविर, कारखाना तथा मिल आदि में आग लगने से जानलेवा मानव जनित आपदायें उत्पन्न हो जाती हैं, जिनसे जान-माल की भारी क्षति होती है।

     भवनों में आगजनी की दुर्घटनायें प्रायः शार्ट-सर्किटिंग, मशीनों एवं उपकरणों में खराबी, पावर स्टेशनों का खराब अनुरक्षण (रख-रखाव Maintenance), खराब एवं पुरानी वायरिंग, तोड़-फोड़ (Sabotage), आतंकी हमला, लापरवाही, सुरक्षा मानकों तथा फायर फाइटिंग मैनुअल की नजर अन्दाजी (Avoidance), अग्निशामकों (Fire Extinguishers) का अभाव होने पर या खराब अनुरक्षण, अपर्याप्त फायरटेण्डर या इनका पूर्णतया अभाव, आग बुझाने में लगे लोगों का समुचित प्रशिक्षण न होना एवं प्रशिक्षित फायरमैन की पर्याप्त संख्या का अभाव, जल की खराब आपूर्ति आदि के कारण होती हैं।

      जून 1997 में उपहार सिनेमाहाल में आग की दुर्घटना का निम्न उदाहरण सुरक्षा के अनुपालन में मानवीय लापरवाही की कहानी कह देता है:

          ‘बार्डर फिल्म’ के प्रीमियर प्रदर्शन के समय नई दिल्ली में ग्रीन पार्क के निकट अवस्थित ‘उपहार सिनेमा हाल’ में 13 जून, 1977 को दिल को दहला देने वाली आपदापन्न भीषण अग्निकाण्ड की दुर्घटना घट गयी। सिनेमा हाल में फंसे 59 व्यक्तियों की घने धुंए में दम घुटने से मृत्यु हो गयी। आग लगने की घटना से भगदड़ (Stampede) मच गयी, जिसमें अफरा-तफरी में 103 लोग गम्भीर रूप से घायल हो गये। भवन के तहखाने (Basement) में लगे 1000 KVA के विद्युत ट्रान्सफार्मर में अचानक ब्लास्ट (घमाका) होने से अग्निकाण्ड की यह आपदा हुई थी।

      उल्लेखनीय है कि भवन का तहखाना केवल सीमित संख्या में कार पार्किंग के उपयोग के लिए था। अन्य किसी भी प्रकार का उपयोग वर्जित था। उस दिन अनुमन्य कार पार्किंग के नियम का उल्लंघन करके 36 कारों की पार्किंग की गयी थी। तहखाने में स्थित बिजली के ट्रांसफार्मर के अनुरक्षण (Maintenance) में लापरवाही बरती गयी थी।

      ट्रांसफार्मर में अचानक ब्लास्ट होने से लगी आग ने 20 कारों को अपने चपेट में ले लिया। परिणामस्वरूप आग की लपटें तथा धुएं तेजी से फैलने लगे। देखते-देखते आग तथा धुंआ 5-मंजिला भवन में फैल गया। अधिकांश पीड़ित व्यक्ति बालकनी में फंस गये थे, तथा बाहर निकलने के दरवाजे के बन्द होने के कारण वे बाहर नहीं जा सके। परिणामस्वरूप दम घुटने (Suffocation) के कारण 59 लोगों की मृत्यु हो गयी।

(5) शिवकाशी आतिशबाजी आपदा, भारत, 2012

      तमिलनाडु में शिवकाशी से 13 किमी. दूर मुदालीपट्टी की एक आतिशबाजी (Fireworks) फैक्टरी में 5 सितम्बर, 2012 को आतिशबाजी की एक हृदयविदारक त्रासदी घट गयी, जिसमें 38 श्रमिक (2 महिलायें तथा अधिकांश बच्चे) मृत्यु के शिकार हो गये।

      उल्लेखनीय है कि सामान्य रूप से तमिलनाडु और मुख्य रूप से शिवकाशी भारत में आतिशबाजी का सर्वाधिक निर्माता है। परन्तु अराजकता, सुरक्षा एवं बचाव के उपायों की उपेक्षा एवं अनुपालन करने में लापरवाही राज्य सरकार की उपेक्षा तथा श्रमिकों की लापरवाही के कारण आतिशबाजी तथा पटाखों की फैक्टरियों एवं गोदामों में आये दिन आगजनी तथा विस्फोटों की दुर्घटनायें होती रहती हैं, जिस कारण आतिशबाजी तथा पटाखा बनाने के काम में लगे श्रमिकों, जिनमें अधिकतर बच्चे होते हैं (यह नियम विरुद्ध है) से कई मौत के शिकार हो जाते हैं।

      तमिलनाडु में शिवकाशी और उसके आस-पास के क्षेत्रों में आतिशबाजी, पटाखा एवं दियासलाई बनाने की कई इकाइयां हैं। इनमें से कई गैरकानूनी हैं तथा गावों एवं निजी घरों में स्थापित हैं। इनमें काम करने वाले श्रमिक पटाखों के निर्माण में काम आने वाले विस्फोटकों तथा अन्य खतरनाक सामग्रियों को हैण्डिल करने के लिए अच्छी तरह प्रशिक्षित नहीं हैं। साथ ही साथ कच्चे पदार्थों खासकर विस्फोटकों (बारूद) तथा निर्मित पटाखों के उचित भण्डारन की समुचित व्यवस्था एवं सुविधाओं का अभाव है। इन सभी के कारण भारत, पाकिस्तान तथा बांगलादेश में आतिशबाजी से जानलेवा दुर्घटनायें तथा जनहानियाँ होती रहती हैं। विकसित देशों में भी सुरक्षा उपायों के बावजूद आतिशबाजी की दुर्घटनायें होती हैं।

     शिवकाशी में 5 सितम्बर, 2012 की आतिशबाजी की दुर्घटना श्रमिकों एवं फैक्टरी के मालिकों की लापरवाही के कारण विस्फोट होने से हुई थी। धमाका इतना प्रबल था कि फैक्टरी की 30 कंक्रीट छतें पटरा हो गयीं तथा 38 लोग कालकवलित हो गये। यह दुर्घटना आतिशबाजी की एक प्राइवेट ओम शक्ति फैक्टरी में घटी थी।

(6) उल्लेखनीय है कि प्रति 12वें वर्ष महाकुम्भ के पवित्र स्नान पर्व के समय  प्रयागराज में गंगा, यमुना एवं अदृश्य सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर विश्व का सबसे बड़ा जन समुदाय एकत्रित होता है जिसमें कई करोड़ श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं।

      सन् 2013 में महाकुम्भ स्नान पर्व के समय 10 फरवरी को लगभग 4 करोड़ श्रद्धालुओं का संगम की रेती पर जमघट लग गया परन्तु राज्य एवं केन्द्र की सरकारों ने इस भारी भीड़ का इतना सुनियोजित ढंग से प्रबन्धन किया कि विश्व समुदाय के सामने भीड़ प्रबन्धन का यह सफल मॉडल एक नजीर बन गया विश्व की कई लब्धप्रतिष्ठ शैक्षिक संस्थाओं ने इस महाकुम्भ के दौरान भीड़ प्रबन्धन की भारतीय विधि का अध्ययन करने के लिए अपनी-अपनी विशेषज्ञों की टोलियाँ इलाहाबाद भेजी थीं।

      भीड़-भगदड़ मुख्य रूप से अफवाह फैलने पर दहसत में लोगों के सम्बन्धित स्थान से भाग निकलने के प्रयास में होती है। भीड़-भगदड़ के स्थानों में पूजा स्थल, खेल-कूद स्थल, सिनेमा हाल, शापिंग माल, धार्मिक मेला, रेलवे स्टेशन, संकरे पुल, व्यापारिक केन्द्र व बाजार, धार्मिक एवं राजनीतिक सभायें आदि प्रमुख हैं। भीड़-भगदड़ के समय अधिकांश मौत दम घुटने (Suffocation) तथा सिर एवं सीने में चोट लगने से होती है।

      भगदड़ पूर्वकथनीय नहीं है। अर्थात् भारी भीड़ में भगदड़ की सम्भावना तो रहती है, परन्तु यह पता नहीं होता है कि कब भगदड़ मचेगी। अतः भगदड़ आपदा के प्रबन्धन का एकमात्र तरीका उसकी प्रायिकता (Probability) का आंकलन करना तथा विषम परिस्थितियों में भीड़ का प्रबन्धन करने के लिए पहले से सावधान रहना तथा सभी आवश्यक उपायों एवं साधनों को तैयार स्थिति में रखना है।


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11. Man-made disaster and its types (मानव जनित आपदा एवं उसके प्रकार)

11. Man-made disaster and its types
(मानव जनित आपदा एवं उसके प्रकार)



        मनुष्य के कार्यों, जो जानबूझ कर या अनजाने में किए जाँय तथा जिनसे जान-माल की भारी क्षति होती है, को मानवकृत (मानव जनित) आपदा कहते हैं। ऐसे इच्छित या अनिच्छित (Intentional or unintentional, deliberate indeliberate) कार्यों द्वारा जनित आपदाओं से मानव मृत्यु के अलावा सरकारी तथा निजी सम्पत्तियों को भारी हानि होती है। मानव जनित आपदा की इस परिभाषा का और अधिक विस्तरण किया जा सकता है:

      मनुष्य की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, इच्छित या अनिच्छित क्रियाओं, उसकी असावधानी, लापरवाही, अज्ञानता (Ignorance), गलती या मानव-निर्मित तंत्रों की विफलता के कारण उत्पन्न आपदाओं घटनाओं या दुर्घटनाओं (Accidents), जिनसे मानव के जान-माल की भारी क्षति होती है, को मानव जनित आपदा कहते हैं। निम्नलिखित कतिपय उदाहरणों द्वारा मानवकृत आपदाओं की अवधारणा को स्पष्ट किया जा सकता है:

(1) जानबूझकर/इच्छित कार्य (Deliberate and intentional acts):

⇒ द्वितीय विश्व युद्ध के समय सन् 1945 में अमेरिका सेना द्वारा जापान के हीरोशिमा एवं नागासाकी नगरों पर एटम बम गिराया जाना।

⇒ सन् 2001 में आतंकवादियों द्वारा 11 सितम्बर को संयुक्त राज्य के विश्व ट्रेड सेन्टर के दो टावरों तथा पेण्टागन पर हवाई जहाजों से हमला।

(2) लापरवाही के कार्य (Acts of negligence):

⇒ सन् 1986 में युक्रेन के चर्नोबिल स्थित परमाणु शक्ति संयन्त्र का मेल्टडाउन।

⇒ 3/4 दिसम्बर, 1984 को भारत की भोपाल गैस त्रासदी।

(3) अनिच्छित कार्य (Unintentional Act):

⇒ भूमण्डलीय ऊष्मण्न (Global Warming) तथा जलवायु परिर्वतन।

⇒ पर्यावरण प्रदूषण

⇒ तेज दर से मृदा अपरदन (Accelerated rate of soil erosion)

⇒ भीड़, भगदड़ (Crowd Stampede), यथा: भारत के मध्य प्रदेश के दतिया जिले में रतनगढ़ स्थित माता देवी मन्दिर में श्रद्धालुओं की लाखों की भीड़ में 13 अक्टूबर, 2013 को मची भगदड़ में 115 भक्तों की मृत्यु हो गयी। यह भगदड़ पुल टूटने की अफवाह तथा जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण हुई थी।

(4) लापरवाही तथा बदइन्तजामी (Negligence and Mishanding) के सम्मिलित कार्य:

⇒ रेल दुर्घटनायें

⇒ सड़क दुर्घटनायें

⇒ हवाई दुर्घटनायें

⇒ सागरों में जलयानों की दुर्घटनायें।

       मनुष्य के कुछ कार्य प्राकृतिक आपदाओं को तेज तथा प्रेरित करते हैं, यथा: विफलता, आकस्मिक बाढ़, जल भण्डार-प्रेरित भूकम्पीय घटनायें (Reservoir-induced seismic events), भूस्खलन (वनविनाश तथा सड़क निर्माण द्वारा), तीव्र मृदा अपरदन (Accelerated soil erosion) आदि।

मानवजनित आपदायें: प्रकारिकी

(Man-Made Disasters: Typology)

       उल्लेखनीय है कि मानवकृत आपदाओं को निश्चित वर्गों में विभाजित करने के लिए कोई निर्धारित मानक क्रिया नहीं है। इसेक बावजूद कुछ ने मानव जनित आपदाओं को विशद रूप में विभिन्न प्रकारों/वर्गों में विभाजित करने का प्रयास किया है, जो निम्न प्रकार हैं:

(1) प्रौद्योगिकीय आपदायें (Technological Disasters):

(i) औद्योगिक प्रकोप तथा आपदायें

⇒ खतरनाक तत्वों के प्रक्रमण तथा भण्डारन (Processing and storage) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

⇒ कच्चे पदार्थों के निष्कासन (Extraction) तथा खनन (Mining) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

⇒ खतरनाक वस्तुओं, यथाः पेट्रोकेमिकल्स, पटाखा आदि, का उत्पादन करने वाली इकाइयों की दुर्घटनायें, आदि।

(ii) संरचना की विफलता तथा आग लगना (Structural failure and fire)।

(iii) बिजली का अत्यधिक उपयोग तथा खतरनाक वस्तुओं का विस्फोट, यथा: पटाखों के भण्डार में विस्फोट सम्बन्धी दुर्घटनायें।

(iv) रेडियेशन सन्दूषण (Contamination)।

(v) खतरनाक जैविक पैथोजेन (वैक्टीरिया, वाइरस तथा परजीवी)।

(vi) रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल तथा परमाणु (CBRNS) तत्वों (Substances) से सम्बन्धित दुर्घटनायें आदि।

(2) परिवहन आपदायें (Transportation disasters):

(i) हवाई दुर्घटनायें

(ii) सड़क दुर्घटनायें

(iii) रेल दुर्घटनायें

(iv) स्पेस दुर्घटनायें

(v) तेलवाहक जलयानों से तेल का रिसाव तथा आयल स्लिक

(vi) समुद्री यात्रा की दुर्घटनायें

(3) सामाजिक आपदायें (Sociological Disasters):

(i) अपराध

(ii) लूट-मार

(iii) नागरिक उपद्रव (Civil disturbance)

⇒ धरना प्रदर्शन (Demonstration)

⇒ हड़ताल

⇒ दंगा-फसाद (Riots)

⇒ अपराधिक कार्य

⇒ सरकारी व्यवस्था की अवमानना

(4) आतंकवाद की आपदायें (Terrorism Disasters):

(i) राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद / अलगाववाद का आतंक

(ii) राष्ट्र-प्रायोजित आतंकवाद

(iii) धार्मिक आतंकवाद

(iv) वामपंथी आतंकवाद

(v) दक्षिणपंथी आतंकवाद

(vi) अराजकवादी (Anarchist) आतंकवाद

(Vii) साइबर आतंकवाद

(Viii) नार्को आतंकवाद

(5) भीड़ भगदड़ आपदा (Crowd Stampede disaster):

(i) धार्मिक मेला / स्नान/प्रार्थना / अनुष्ठान के समय भगदड़।

उदाहरण: महाकुंभ धार्मिक मेला/स्नान, 2013 (इलाहाबाद), मक्का में धार्मिक भीड़ भगदड़, प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में भगदड़ आदि।

(ii) स्पोर्ट्स आयोजनों के समय भगदड़।

(iii) राजनीतिक बड़ी सभाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के समय भगदड़।

(6) राजनीतिक एवं धार्मिक आपदायें:

(i) युद्ध, यथा: प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध।

(ii) गृह युद्ध (Civil Wars) यथा: रूसी गृह युद्ध- 1917 से 21, अमेरिकी गृह युद्ध- 1861 से 1865, द्वितीय सूडानी गृह युद्ध- 1562 से 1598, नाइजेरियन गृह युद्ध- 1967 से 1970 आदि।

(iii) धार्मिक युद्ध, यथा: फ्रेंच धार्मिक युद्ध- 1562 से 1598।

(iv) नीति सम्बन्धित आपदायें, यथा: युक्रेन में रूस की होमोलोडोर पॉलिसी के कारण विकट अकाल पड़ने से लगभग 1,000,000 लोग भुखमरी से मर गये चीन की लीप फारवर्ड पॉलिसी के कारण चीन के उत्तरी प्रान्तों में व्यापक भुखमरी से कई मिलियन लोग मौत के शिकार हो गये। भारत में सन् 1942 में बंगाल चावल अकाल से सम्बन्धित ब्रिटिश शासन की नीति के कारण लाखों लोग भुखमरी से मर गये।

(v) नरसंहार (Genocides), जहरखुरानी (Poisioning), नजरबन्दी शिविर (Concentration camps) की आपदायें।

(7) मानव-प्रेरित प्राकृतिक आपदायें (Man-Induced Natural Disasters):

(i) बांध विफलता बाढ़ (Dam Failure floods)।

(ii) जलभण्डार- प्रेरित भूकम्पीय घटनायें (RIS, Reservoir induced seismic events)।

(iii) तीव्र मृदा अपरदन तथा अवसादीकरण (Accelerated soil erosion and sedimentation)।

(iv) प्रदूषण एवं पर्यावरण अवनयन (Environmental Degradation)।

(v) भूमण्डलीय ऊष्मन/तापन तथा जलवायु परिवर्तन।

 प्रौद्योगिकीय एवं औद्योगिक आपदायें

Technological and Industrial disasters

        प्रौद्योगिकीय आपदाओं के अंतर्गत निम्न को शामिल किया जाता है:

(i) औद्योगिक दुर्घटना।

(ii) संरचनात्मक विफलता (भवनों का ध्वस्त होना)।

(iii) घरों, कारखानों, तथा भवनों में आग लगना।

(iv) विद्युत विफलता (Power failure) तथा बिजली संकट।

(v) खतरनाक वस्तुओं में विस्फोट (यथा पटाखा दुर्घटना)।

(vi) खतरनाक जैविक तत्वों के भण्डारण, रख-रखाव तथा उनके इस्तेमाल के समय जैव प्रयोगशालाओं तथा स्वास्थ्य केन्द्रों में दुर्घटनायें।

(viii) रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल तथा परमाणु ( CBRNs) तत्वों (Substances) से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

(viii) परमाणु शक्ति संयंत्रों में रियक्टरों का मेल्टडाउन तथा रेडियेशन का रिसाव।

औद्योगिक प्रकोप तथा आपदायें:-

       औद्योगिक अवस्थितियाँ (Sites), यथा कारखाने, मिल आदि, सदा दुर्घटना प्रकोप तथा आपदाओं के लिए सुभेद्य (Vulnerable) होती हैं। इन दुर्घटनाओं से मनुष्यों एवं पशुओं की मृत्यु हो जाती है, मानव सम्पत्ति तथा पर्यावरण को भारी क्षति होती है। ये औद्योगिक दुर्घटनायें मानव की असावधानी, लापरवाही तथा नासमझी के कारण ही होती हैं। उल्लेखनीय है कि औद्योगिक उत्पादनों में मशीनों द्वारा कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों (Steps) का संचालन मनुष्य द्वारा ही किया जाता है।

      अतः खनिजों के खनन (Mining), फैन्रीकेशन प्रक्रमण (Processing), भण्डारन (Storage), उत्पादित वस्तुओं के परिवहन तथा वितरण आदि सभी चरणों में मुनष्य का हाथ रहता है। अतः औद्योगिक उत्पादन, खतरनाक पैथोजेन की हैण्डलिंग तथा अन्य खतरनाक तत्वों एवं वस्तुओं के रख-रखाव एवं हैण्डलिंग के प्रत्येक चरण पर जोखिम एवं खतरे की सम्भावना बनी रहती है।

       औद्योगिक प्रकोपों एवं आपदाओं के कई कारक होते है जैसा कि नीचे दिया गया है:

⇒ पदार्थों की स्वयं खतरनाक तथा आपदापन्न प्रकृति, यथा: माइक्रोबायोलाजी प्रयोगशालाओं, अस्पतालों तथा औषधि निर्माण करने वाले कारखानों (Pharmaceutical factories) में पैथोजेन का उपयोग।

⇒ बिजली उत्पादन हेतु परमाणु शक्ति संयंत्रों में परमाणु खनिजों का उपयोग।

⇒ पटाखा निर्माण करने वाले कारखानों में विस्फोटकों (Explosives) का उपयोग।

⇒ मानक सुरक्षा एवं बचाव के उपायों का अभाव (खासकर रासायनिक कारखानों, परमाणु शक्ति संयंत्रों, पेट्रो-केमिकल इकाइयों, पाइपलाइन द्वारा प्राकृतिक गैस वितरण आदि में) आदि।

      इस प्रकार औद्योगिक आपदाओं के कारकों को निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

⇒ असावधानी के कारण सुरक्षा एवं बचाव के उपायों को नजर अन्दाज करना या जानबूझ कर इन उपायों का अनुपालन न करना।

⇒  बिजली की ढीली फिटिंग, परिणामस्वरूप शार्ट सर्किट होने से आग लगना।

⇒ आवस्थापना की सुविधाओं की विफलता (Failure of infrastructure Facilities)।

⇒ उपकरणों तथा मशीनों की हैण्डलिंग करते समय मानवीय भूल तथा गलतियां या जानबूझ कर आतंकियों द्वारा तोड़-फोड़ (Sabotage) तथा औद्योगिक कार्यों में व्यवधान करना।

⇒ अनिच्छित दुर्घटनायें आदि।

      निम्नलिखित खतरनाक प्रकोप तथा आपदाओं के क्षेत्र हैं, जिनपर अधिक ध्यान केन्द्रित करने तथा देख-भाल की आवश्यकता होती है:

⇒ औद्योगिक प्रतिष्ठान जहां पर अत्यन्त ज्वलनशील तथा विस्फोटक सामग्रियों का महत्वपूर्ण सामरिक उपकरणों के निर्माण करने में उपयोग किया जाता है।

⇒ परमाणु शक्ति, जलविद्युत एवं ताप शक्ति (Nuclear, hydel and thermal power) उत्पन्न करने के स्थान।

⇒ खाद्यान्नों में खनिजों के खनन में डायनामाइट द्वारा ऊपर स्थित चट्टानों को उड़ाने वाले स्थल।

खतरनाक सामग्रियों के स्थल, यथा: मिलिट्री प्रतिष्ठापन (Installation) स्थल, परमाणु भण्डारन स्थल तथा परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण स्थल,

⇒ खतरनाक सामग्रियों के परिवहन के मार्ग (सड़कें तथा रेल रोड),

⇒ कच्चे पदार्थों के प्राप्ति स्थल, यथा: खदानें (कोयला खदानें, लौह अयस्क खदानें आदि) आदि।

    रासायनिक कारखानों में खतरनाक रसायनों से सम्बन्धित दुर्घटनाओं, परमाणु शक्ति संयंत्रों की दुर्घटनाओं तथा रेडियेशन रिसाव, खदानों आदि की दुर्घटनाओं से सम्बन्धित औद्योगिक आपदाओं, जिनके द्वारा भारी जान-माल की क्षति हुई है, के कतिपय उदाहरणों द्वारा औद्योगिक आपदाओं के खतरों तथा उनसे होने वाली हानियों की व्यापकता को दर्शाया जा सकता है।

भोपाल गैस त्रासदी, 1984

(Bhopal Gas Tragedy)

 भोपाल गैस त्रासदी:

      भोपाल में 2-3 दिसम्बर, सन् 1984 को हुई गैस दुर्घटना प्राण घातक गैसों के रख-रखाव में मनुष्य की असावधानी से उत्पन्न आपदापन्न प्रकोपों का ज्वलंत उदाहरण है। भोपाल स्थित अमेरिकन यूनियन कार्बाइड कारखाने के गैस संयंत्र से 2-3 दिसम्बर (1984) की शीत रात्रि में जहरीली मिक गैस (MIC= Methyle Iso-Cynate) के अचानक फूट निकलने के कारण वायु प्रदुषण की वृहत्तम दुर्घटना घट गयी। आधिकारिक सूचना के कारण इस प्रलयकारी गैस दुर्घटना के कारण कुछ घण्टों में ही 2500 व्यक्ति कालकवलित हो गये जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना से मरने वालों की संख्या 5000 से अधिक बतायी गयी है।

     भोपाल स्थित इस अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कारखाने में कीटनाशी रसायन के निर्माण के लिए मिक गैस का उत्पादन किया जाता था तथा उसका भूमिगत कंटेनरों में भण्डारण किया जाता था। 2-3 दिसम्बर की रात में इन्हीं कंटेनरों से मिक गैस का अचानक रिसाव (लीकेज) प्रारम्भ हुआ तथा यह रिसाव 40 मिनट तक चलता रहा। प्रातः कालीन समीर के प्रभाव से यह जहरीली गैस पुराने भोपाल नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैल गयी तथा पलक झपकते हजारों लोगों को निगल गयी। इसके अलावा हजारों निवासी इस विषाक्त गैस से बुरी तरह प्रभावित हो गये एवं हजारों जानवरों ने प्राण त्याग दिये।

       इस गैस ने पेय जल, मिट्टियों, तालाबों तथा जलाशयों के जल को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया तथा गर्भस्थ शिशुओं (भ्रूणों), नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, बच्चों एवं अबला वृद्ध लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया।

संरचनात्मक विफलता तथा अग्निकांड आपदा

(Structural failure and fire disasters)

     यहां पर संरचना की विफलता का तात्पर्य है मानव-निर्मित स्थायी संरचनाओं, यथा बहुमंजिला भवन, शापिंग माल, सिनेमा हाल, स्पोर्ट्स स्टेडियम, रिहायसी बहुमंजिला एपार्टमेण्ट्स, पुल, फुट ओवर पुल, कार्यालय, शिक्षा भवन आदि का ध्वस्त होना।

     आगजनी का तात्पर्य मानव-निर्मित प्रतिष्ठानों, यथाः मल्टीप्लेक्स, सिनेमा हाल, कार्यालय रिहायसी भवन, शापिंग माल, औद्योगिक प्रतिष्ठान, शिक्षण भवन आदि में विभिन्न कारणों से आग लगने की दुर्घटनाओं से है।

       संरचनात्मक विफलता के फलस्वरूप मानव-निर्मित संरचनायें निम्न प्राकृतिक एवं मानव जनित कारकों द्वारा ध्वस्त होकर भरभरा कर गिर जाती हैं:

प्राकृतिक कारकः

(1) जलवायु की दशायें:

     अत्यधिक आर्द्रता; मेघ प्रस्फोट (Cloud Burst) तथा मूसलाधार वर्षा; वायुमण्डलीय तूफान, यथा: टारनैडो, चक्रवात (ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश में अक्टूबर, 2013 में फेलिन चक्रवात की घटना), टारनैडो, टाइफून आदि तथा इनसे उत्पन्न बाढ़। इन सबके कारण भवन तथा उनकी नींव (Foundation) कमजोर हो जाती हैं। ज्ञात रहे कि इन कारकों द्वारा मानव-निर्मित केवल लकड़ी, टिन तथा मिट्टी के बने भवन ही ध्वस्त होते हैं।

(2) भ्वाकृतिक दशायें (Geomorphological Conditions):

      धरातल, स्थलाकृति, धरातलीय ढाल, भूपदार्थों की मजबूती / शक्ति (Strength of geomaterials), अवस्थितियां (Locational sites, यथा: तटीय निम्न क्षेत्र, बाढ़ मैदान, तीव्र पहाड़ी ढाल, पर्वत आदि।

(3) भूकम्पीय घटनायें / दशायें (Seismicity):

       भूकम्प की दृष्टि से अधिक क्रियाशील क्षेत्र भवन निर्माण के लिए अत्यधिक सुभेद्य (Vulnerable) होते हैं। बहुमंजिली इमारतें भूकम्पीय झटकों से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। कमजोर धरातलीय क्षेत्रों में भूकम्प के साधारण झटकों से ही कमजोर भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर पड़ते है।

मानव-जनित कारकः

⇒ भवनों की खराब डिजाइन या स्थापत्य सम्बन्धी त्रुटि (Architectural flaw)।

⇒ भवन निर्माण की सामग्रियों, यथा- सीमेण्ट, रेत, लोहा, ईंट आदि की गुणवत्ता।

⇒ सुरक्षा एवं बचाव के उपायों का अनुपालन।

⇒ बिल्डिंग कोड।

⇒ भवनों का रख-रखाव (maintenance) या अनुरक्षण।

    संरचनात्मक विफलता के कई ऐसे उदाहरण हैं जो भवनों के उनके निर्माण के समय ही ध्वस्त होने को दर्शाते हैं। अर्थात् अपने निर्माण की अवस्था में ही कई भवन भरभरा कर ढह जाते हैं। उदाहरण: अप्रैल 2013 में महाराष्ट्र के थाणे जिला में 7 मंजिला भवन, जिसका बिना सरकारी अनुमति के गैरकानूनी रूप से निर्माण कराया जा रहा था, भरभरा कर गिर गया। इस दुर्घटना में 39 व्यक्ति मारे गये तथा 72 घायल हो गये।

     उस समय राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF- National Disaster Response Force) की टीम ने अतिरिक्त 25-30 लोगों के मलवे में दबे होने की आशंका जतायी थी।

    इसी तरह 2013 में ही महाराष्ट्र में संरचनात्मक विफलता की दुर्घटना सितम्बर महीने में घट गयी। मुम्बई में एक 4 मंजिला रिहायसी (Residential) भवन ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गया, जिस कारण 61 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी।

    सन् 2013 में ही बांगलादेश में एक 8 मंजिला वाणिज्यिक (Commercial) भवन अप्रैल में ध्वस्त (Collapse) होकर पटरा हो गया (Flattened) जिस कारण 397 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी तथा 2,500 लोगों को मामूली चोटें लगीं।

    भवनों, पुलों तथा अन्य स्थायी संरचनाओं (यथाः फुटओवर पुल, पैदल मार्ग, बांध, स्ट्रीट वायाडक्ट, टावर आदि) के ध्वस्त होने के प्रमुख कारकों में निम्न को सम्मिलित किया जाता है:

⇒ भवन निर्माण की त्रुटिपूर्ण खराब डिजाइन

⇒ स्थापत्य की त्रुटि (Architectural defects)

⇒ भवन निर्माण की खराब सामग्री

⇒ खराब कार्यकुशलता (Poor Workmanship)

⇒ सुरक्षा मानकों को नजरअन्दाज (Avoidance) करना

⇒ मानक भवन कोड का अनुपालन न करना

     सन् 1995 में दक्षिण कोरिया में खराब एवं त्रुटिपूर्ण भवन डिजाइन के कारण साउथ कोरियन माल का ‘सैम्यूंग डिपार्टमेण्टल स्टोर’ ध्वस्त हो गया, जिस कारण 500 लोगों की बेशकीमती जानें चली गयीं। हजारों लोग घायल हो गये। लगभग 900 ग्राहकों (Shoppers) को गम्भीर चोटें लगीं।

परमाणु रेडियेशन रिसाव आपदा

(Nuclear Radiation leaks disastes)

      परमाणु प्रकोप तथा आपदायें निम्न रूपों में जनित होती हैं:

⇒ युद्ध के समय परमाणु अस्त्रों के उपयोग द्वारा, यथाः द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना द्वारा जापान के नागासाकी एवं हीरोशिमा नगरों पर सन् 1945 में एटम बमों के गिराने से उत्पन्न भयानक आपदा।

⇒ परमाणु शक्ति संयंत्रों (Nuclear Power Plants); परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण स्थलों (Nuclear Wastes Disposal Sites); परमाणु अपशिष्टों के निस्तारण के समय; परमाणु अस्त्रों के अनुरक्षण (Maintenance) के समय रेडियेशन रिसाव द्वारा।

⇒ परमाणु पनडुब्बियों (Submarines) की दुर्घटनाओं के समय परमाणु तत्वों (Substances) के रिसाव द्वारा।

⇒ रक्षा उद्देश्यों के लिए परमाणु अस्त्रों के परिवहन एवं भण्डारण (Storage) के दौरान दुर्घटनायें होने पर परमाणु रेडियेशन के रिसाव द्वारा आदि।

     परमाणु शक्ति संयंत्रों के रियेक्टरों से रेडिएशन का रिसाव सम्बन्धित क्षेत्र के मानव सहित सभी जीवों के घातक तथा जानलेवा होता है। युक्रेन में चर्नोबिल परमाणु संयंत्र से सन् 1986 में तथा जापान के डयेची फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से सन् 2011 में रेडिएशन के व्यापक रिसाव की दो घटनायें विभिन्न उद्देश्यों हेतु एटामिक खनिजों (युरेनियम) के उपयोग से उत्पन्न खतरों की भयावहता तथा परिणाम को भलीभांति प्रदर्शित करती हैं।

     उल्लेखनीय है कि परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की उपयोगिता एवं उसकी त्रुटिरहित सुरक्षा को लेकर आम जनता सदा से आशंकित रही है। परमाणु वैज्ञानिकों एवं सरकारों द्वारा सदा से परमाणु ऊर्जा को सर्वाधिक सुरक्षित ऊर्जा संसाधन बताया जाता रहा है, परन्तु परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से रेडिएशन के रिसाव की सम्भवना सदैव बनी रहती है।

     एक प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक तथा पर्यावरणविद बेन्जामिन के. सोवाकूल के अनुसार विश्व परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में 99 दुर्घटनायें हुई हैं; सन् 1986 में चर्नोबिल परमाणु संयंत्र आपदा के बाद से 57 परमाणु दुर्घटनायें हो चुकी हैं, इनमें से 57 प्रतिशत दुर्घटनायें अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में हैं।

युद्ध विषाक्तन एवं नरसंहार आपदायें

(Wars, Poisoning and Genocide Disasters)

        निम्न कारणों के फलस्वरूप आन्तरिक वाह्य संघर्ष, गृहयुद्ध, विभिन्न आयाम (Dimension) के युद्ध, नरसंहार तथा सर्वनाश सम्बन्धी खतरनाक आपदायें उत्पन्न होती हैं:

⇒ परस्पर विरोधी धारायें (Conflicting Ideologies)

⇒ राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियाँ 

⇒ प्रतिद्वन्द्विता (Rivalaries)

⇒ शक्ति सर्वोच्चता (Power Supremacy)

⇒ धार्मिक प्रतिद्वन्द्विता तथा घृणा

⇒ क्षेत्रीय विस्तार की नीति

⇒ आर्थिक विषमता

⇒ संसाधनों को हड़पना (Grabing of resources)

⇒ राजनीतिक नीतियाँ 

⇒ क्रान्तियाँ आदि।

      दो देशों के बीच या विभिन्न देशों के समूहों के मध्य (प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध) संघर्ष एवं युद्ध के दौरान लाखों सेनानियों एवं नागरिकों की पिछले इतिहास में मृत्यु हो चुकी है।

    संघर्षों एवं युद्धों के कारण श्रृंखलाबद्ध समस्यायें पैदा हो जाती हैं, यथाः भारी संख्या में जनहानि (Human Casualties); बड़ी संख्या में शरणार्थी एवं बेघर लोग (Refugees and Homeless); अनाथ बच्चे एवं व्यक्ति; अपंग सैनिक एवं नागरिक; धार्मिक भावना/विद्वेष से प्रताड़ित लोग; खाद्य पदार्थों के अभाव का संकटः रोग तथा बीमारियाँ; महामारियाँ(Epidemics) एवं सर्वव्यापी रोग (Pandemics); जल की कमी; शरण शिविरों, स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं, मौलिक तथा आवश्यक सेवाओं का संकट आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तंत्रों का विघटन (Disruption); धार्मिक एवं जातीय (Ethnic) संघर्ष एवं घृणा आदि।


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10. What do you understand by Soil Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures. (मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)

10. What do you understand by Soil Pollution? Throw light on its classification, Causes, Effects and Control Measures.

(मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)



       जब मिट्टी में भौतिक और रासायनिक तत्व मिलकर मिट्टी को कृषि के दृष्टिकोण से अनुपयुक्त बना देते हैं अथवा उसका समुचित उपयोग नहीं हो पाता है तो वह मिट्टी प्रदूषित मानी जाती है। मिट्टी के प्रदूषित होते ही वृक्षों की जीवन शक्ति भी घट जाती।

     मृदा प्रदूण से फसलों का रूप- रंग, आकार, प्रारूप, उत्पादन सभी कुछ कुप्रभावित होना स्वाभविक ही है। मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता में ह्रास, खरपतवार में वृद्धि और कीटाणुनाशकों का अत्यधिक उपयोग भारत के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। खरपतवार नाशकों का उपयोग अवांछित वनस्पतियों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। जिससे मिट्टी को मिलने वाली जीवांश की मात्रा भी भविष्य में घट जाती है। कीटनाशक पदार्थ और औद्योगिक निसृति पदार्थों से बहुत से स्थानों की मिट्टियाँ अम्लीय अथवा क्षारीय हो गयी हैं जिससे वनस्पति जगत प्रत्यक्षतः प्रभवित हुआ है।

    रासायनिक प्रदूषण मृदा के सन्दर्भ में सबसे अधिक भयावह है। औद्योगिक अपशिष्ट मृदा में ऐस खनिज लवणों की मात्रा बढ़ा देते हैं जिससे कोई वनस्पति उगने ही नहीं पाती। साथ ही रासायनिक पदार्थ मृदा में उपस्थित सहजीवी जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं जिससे नाइट्रोजन यौगिकीकरण प्रभावित होता है। एक बार प्रयोग किये गये रसायन अनेक वर्षों तक मृदा में विद्यमान रहते हैं।

      मिट्टी की उपयोगिता और गुणवत्ता में ह्रास, मानवीय एवं प्राकृतिक क्रियाओं का सम्मिलित परिणाम है। यथा वनों का निरन्तर ह्रास, खनन, अनियन्त्रित पशुचारण, भू-क्षरण से बीहड़ भूमि (खड्ड भूमि) का उद्भव हुआ है।

     भारत के विशेष संदर्भ में भू-क्षरण, जलमग्नता (जलाक्रान्त) एवं ऊसर भूमि की समस्या उल्लेखनीय है- देश की कुल कृषि भूमि का 28 प्रतिशत क्षेत्र इन समस्याओं से ग्रसित हैं, वर्षा में औसतन 20 टन मिट्टी प्रति हेक्टेयर वह जाती है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष अनुमानत: 53.340 लाख टन मिट्टी का क्षरण हो रहा है यानि 2800 करोड़ रुपये का नुकसान है।

       इस प्रकार भू-क्षरण एक स्थायी नुकसान है। आज भी भारत की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। लगभग 70 प्रतिशत लोग तथा 45 प्रतिशत भूमि अप्रत्यक्षतः कृषि में लगी है। यदि इसमें कृषि, कृषक मजदूर, आलिया, व्यापारी, पल्लेदार आदि को भी जोड़ ले तो यह प्रतिशत लगभग 75 पहुँच जाता है। देश के 76 प्रतिशत लोग ग्रामों में रहते हैं, जिनका मुख्य उद्यम कृषि है।

      राष्ट्रीय आय का लगभग 33 प्रतिशत भाग कृषि से ही संबद्ध उत्पाद है। कृषि निर्यात व्यापार में 32 प्रतिशत का योगदान रखता है। यहाँ के प्रमुख बड़े उद्योग कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदंड कृषि और बोये गये 14 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में से लगभग 8 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र न्यूनाधिक रूप से भू-क्षरण से ग्रसित है। कृषि भूमि के 60 प्रतिशत भू-भाग को संरक्षण की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से जल एवं वायु दोनों के द्वारा मृदा अपरदन हो रहा है।

     जल भू-क्षरण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों- तिस्ता, हुगली, गण्डक, गंगा, यमुना और चम्बल नदियों के किनारे सर्वाधिक हो रहा है। योजना आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार महाराष्ट्र- 138.6, आन्ध्र प्रदेश- 90.9, कर्नाटक- 80.9 तथा गुजरात का 73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र अनुपजाऊ हो गया है। गहरे चम्बल के बीहड़ों से लगभग 18 लाख एकड़ भूमि अनुपयोगी हो चुकी है। इसमें से 6 लाख हेक्टेयर भूमि भिण्ड, मुरैना तथा ग्वालियर जिलों में आवास तक के लिये अनुपयुक्त हो गयी है।

       एक इंच मिट्टी को बनाने में प्रकृति को 100 से 500 वर्ष तक लग जाते हैं। नाली कटाव इस प्रकार भविष्य में भूमि उपजाऊ शक्ति, मृदा की किस्म, भूमि-जल स्तर, वनस्पति और कृषि को कुप्रभावित करेगा। गंगा-यमुना के उपजाऊ दोआब से नदियाँ धीरे-धीरे मैदानों में गहरी नालियाँ बनाकर मिट्टी की उर्वरा शक्ति का ह्रास कर रही हैं। दोआब में तीव्र सतही कटाव देखा जा सकता है।

     भारत का लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र भू-क्षरण से क्षतिग्रस्त हो गया है। इस समस्या से ग्रसित राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान तथा गुजरात हैं । चम्बल, यमुना, माही, साबरमती और उसकी सहायक नदियों के किनारे लगभग 50 से 60 लाख हेक्टेयर भूमि इससे प्रभावित हुई तथा चम्बल के प्रवाह क्षेत्र के 10 प्रतिशत गाँव उजड़ गये। आशंका है कि भारत कृषि भूमि का एक-तिहाई भाग अगले 20 वर्षों मे भू-भाग समस्या ग्रस्त हो जायेगा।

मृदा प्रदूषण के कारण

(Causes of Soil Pollution)

     जब मृदा अपने मूल स्वभाव वनस्पति जनन में अथवा कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त हो जाती है तो मृदा प्रदूषित कहलाती है। यहाँ मृदा की गुणवत्ता क्षय दो तरह से हो सकता है-

ऋणात्मक क्षय-

      इसमें मृदा के महत्त्वपूर्ण अंग खनिज जल में घुलकर अथवा जीवांश ग्रहणकर निकल जायें जिससे मृदा उपजाऊपन घट जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक कारकों से होती है।

धनात्मक क्षय-

      जब मृदा में कोई विजातीय तत्व मिलकर उसकी गुणवत्ता में अवनयन कर दें। यह मानवीय, नगरीय अथवा औद्योगिक क्रिया-कलाप के परिणामस्वरूप होता है। इस प्रकार प्रदूषण के कारकों को दो वृहद् वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

1. भौतिक कारक,

2. मानवीय कारक।

1. भौतिक कारक- जलवायु एवं भौगोलिक स्थिति में अनुरूप होता है। इसके अन्तर्गत-

(अ) भू-क्षरण,

(ब) जलमग्नता,

(स) कांस घास,

(द) उच्च तापमान।

(अ) भू-क्षरण- इसके दोनों सतही एव नालीदार कटाव में मृदा की ऊपरी परत का क्षरण हो जाता है। नालीदार कटाव से समस्त क्षेत्र “मृत भूमि” में बदल जाता है। जैसे- म. प्र. में चम्बल के बीहड़।

(ब) जलाक्रान्त (जलमग्नता)- जब भू-जल स्तर भू-सतह पर आ जाता है तो स्थायी दलदल हो जाता है और भूमि कृषि के अयोग्य हो जाती है। जैसे उ. प्र. के तराई क्षेत्र।

Soil Pollution

जललग्नता (Waterlogging)

(स) कांस घास- वे ऐसी घास है कि अपने सिवाय किसी और वनस्पति को पैदा नहीं होने देती, साथ ही इसका विस्तार भी तेजी से होता है। इसे उ.प्र. के महोबार जिले में देखा जा सकता है।

कांस घास

(द) अति तापमान- तापमान की न्यूनता तथा अधिकता मृदा में उपस्थित जीवाणुओं के लिए हानिकारक है जिससे उनकी क्रियाशीलता कम हो जाती है और मृदा कृषि के अयोग्य हो जाती है। राजस्थान के मरूस्थल से लगे क्षेत्र बाड़मेर, बीकानेर तथा जैसलमेर जिलों में यह देखा जा सकता है।

2. मानवीय कारक-

       वर्तमान में कृषि और उद्योग यन्त्रीकरण के आधिक्य से अधिकाधिक उत्पादन में लगे हैं। इसलिए कृषि में रासायनिक खादें, कीटानुनाशकों का उपयोग, अत्यधिक सिंचाई के कारण कृषि सह-उत्पादक बढ़ गये हैं। नगरीकरण, औद्योगिकरण, बढ़ती जनसंख्या, प्रति व्यक्ति अधिक उपयोग, व्यर्थ पदार्थ, आधुनिक रहन-सहन के कारण मृदा में अकार्बनिक विषैले यौगिक कीटनाशी एवं कवकनाशी तथा रेडियो सक्रिय अपशिष्ट, परिवहन के साधनों से निकला धुआँ, नगरों से निकले ठोस अपशिष्ट से मृदा प्रदूषित हो गयी है।

(i) कृषि कार्य-

     अवैज्ञानिक, सिंचाई, अत्यधिक जुताई, झूमिंग कृषि, अत्यधिक कीटनाशकों के उपयोग से रासायनिक खादों से मृदा प्रदूषित हो रही है।

(अ) रासायनिक खादों से मृदा अम्लीय अथवा क्षारीय होकर कालान्तर में अनुपयोगी हो जाती है।

(ब) कीटनाशकों के उपयोग से मृदा के मित्र जीव एवं बैक्टीरिया मर जाते हैं। कुछ कीटनाशक दीर्घकाल तक मृदा में रहने से समस्त पारिस्थितिक को कुप्रभावित करते हैं। आर्गेनाक्लोरीन वर्ग के कीटनाशकों का स्थायित्व काल लम्बा होता है। इनके नाम हैं- D.D.T. क्लोरेडेन, आर्सेनिक, यूरिया आदि।

(ii) औद्योगिक कार्य-

     औद्योगिक अपशिष्ट जैसे ताप विद्युत गृहों की राख (फ्लाईऐश), कोयले के कण, नाभिकीय कचरा, रासायनिक कचरा, औद्योगिक कचरा, किसी भी तरह का ठोस जिसका पुनर्चक्रीकरण न हो अथवा देर से हो, मृदा के लिए घातक होता है। औद्योगिक अपजल से मृदा प्रदूषित होती है।

(iii) नगरीय कार्य-

       परिवहन नगरीय अपशिष्ट एवं खनन उत्पाद, सह-उत्पाद तथा अपजल भी मृदा को प्रदूषित करते हैं। परिवहन के साधनों से निकली सल्फर डाइ-ऑक्साइड अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदायी है। सभी प्रदूषण अन्त में जल अथवा मृदा में मिलकर प्रदूषित करते हैं। नगरीय अपजल एवं वाहित मल से मृदा और जल सन्दूषित हो जाये तो ये तत्व मिट्टी की भौतिक दशा को भी बिगाड़ते हैं। वाहित मल-जल के कारण मिट्टी के रन्ध्र अवरूद्ध हो जाते हैं जिससे मृदा बेकार पड़ जाती है।

       खनन के सह उत्पादक तथा खनन अपजल से मृदा में धातुओं की अधिक मात्रा में संचित होने से भूमि प्रदूषित हो जाती हैं। कैडमियम, मरकरी तथा लैड ये तीनों भारी धातुएँ न पौधों के लिए आवश्यक हैं और न ही जानवरों के लिये अर्थात इनकी परिस्थितियों से न केवल मृदा प्रदूषित होती है, समस्त पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

      कुछ विषैली धातुएँ यथा- बेरीलियम, कोबाल्ट, निकिल, ताम्र, जिंक, एण्टीमनी, बिस्मथ आदि में मृदा भी जहरीली हो जाती हैं। तेल तथा प्राकृतिक गैस के उत्पादन के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में खारा जल निकलता है जो दूर-दूर तक फैल कर भूमि के अन्य जल स्त्रोतों को प्रदूषित करता है।

      संक्षेप में, खानों की खुदाई से मृदा प्रदूषण होना सामान्य बात है अथवा उत्खनन से मृदा अवनयन होता है। जैसे- उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में ईंटों के निर्माण के कारण भोगतीपुर पुखराया में भूमि अवनयन उल्लेखनीय है।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव

(Effects of Soil Pollution)

1. मृदा पर-

       मल-जल से सिंचाई करने पर मृदा में नाइट्रोजन तथा कार्बनिक पदार्थ में वृद्धि होती है किन्तु निरन्तर सिंचाई से मृदा का PH मान, रन्ध्राकाश धनायन अधिशोषण मृदा, पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्य मृदा तथा पौधों द्वारा अवशेषण होता है जो हानिकारक अवस्था में पहुँचती है। जिसमें कैडमियस युक्त जल सिंचाई के लिए अनुपयुक्त है। वाहित मल-जल से सिंचाई करने पर हरी पत्तीदार सब्जियों की और अन्य फसलों की उपज तो अच्छी होगी किन्तु भारी धातुओं के अवशोषण से ये उत्पाद मनुष्यों और पशुओं द्वारा प्रयोग करने पर अस्वास्थ्यजनक होगा। मैंगनीज की अधिक मात्रा पौधों में विषाक्तता के लिए जिम्मेदार है।

2. सतही जल पर-

       प्रदूषित मृदा से सतही तथा भूजल स्त्रोत प्रत्यक्ष प्रभावित होते हैं। अतः प्रदूषित मृदा से जल को भी प्रदूषित करने की धातुओं का आधिक्य तथा संदूषित जल पेय जल को प्रदूषित जल में बदल देगा।

3. भौम जल पर-

      भौम जल एवं प्रदूषण का निकट का संबंध है, जब मृदा प्रदूषित होती है तथा भौम जल में प्रदूषिकों की सान्द्रता 2 से 3 गुना तक हो जाती है। यदि यह क्षेत्र औद्योगिक या नगरीय हुआ तो कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, कॉपर, लौह, लेड, मैंगनीज तथा पारे की उपस्थिति से भौम जल इन धातुओं के प्रवेश से प्रदूषित हो जाता है।

4. वन स्थितियों पर-

       प्रदूषित मृदा जो भारी धातुओं से हुई है। मृदा में इन धातुओं की अधिक सान्द्रता से पौधों की वृद्धि रूक जाती है और कभी-कभी पौधे मर भी जाते हैं। लेड, जिंक, कैडमियम, और ताप की अधिकता से पौधे की वृद्धि इसलिए रूक जाती है क्योंकि पर्णहरित (Chlorophyll) घट जाता है। निम्नलिखित सारणी भी मृदा प्रदूषण के प्रभाव दिखाती है।

मृदा प्रदूषक स्त्रोत एवं वनस्पतियों पर ऋणात्मक प्रभाव
क्रम मृदा प्रदूषक तत्व स्त्रोत प्रभाव
1. कैडमियम (Cd) जिंक उत्पादन, मानव मल- जल, खनन उद्योग, बैटरी, कॉस्मेटिक उद्योग  पर्णरहित घट जाना, वृद्धि रूक जाना, पत्तियों की नसों के मध्य पीले सफेद धब्बे पड़ना।
2. जिंक (Zn) मल-जल एवं संदूषित जल पत्तियों के सिरे मुड़कर मृत होना, पर्णहरित घटना, वृद्धि रूकना, पत्तियाँ सफेद, बौने रूप में आना।
3. क्रोमियम (Cr) औद्योगिक अपजल, खनन तथा संदूषित जल से पत्तियाँ पीली पड़ जाना, प्रारम्भ में उत्पन्न पत्तियों में शुष्क मृत धब्बे पड़ना।
4. मैंगनीज (Mn) वाहित मल जल उपयोग एवं औद्योगिक अपजल से मुड़ी, मृत, पर्णहरित पत्तियाँ,  किनारे मृत युक्त पत्तियाँ।
5. कोबाल्ट (Co) इलेक्ट्रॉनिक उद्योग पतियों पर सफेद मृत धब्बे पड़ना, पत्तियों पर श्वेत मृत धब्बे, असामान्य वृद्धि।
6. निकिल (Ni)
7. मोलिब्डिनम (Mo) खनन से वृद्धि रूक जाना।

5. मानव स्वास्थ्य पर-

        मृदा प्रदूषण में जो धातुएँ अत्यन्त विषैली हैं साथ ही सहज उपलब्ध हैं उनमें बेरीलियम, कोबाल्ट, निकिल, ताम्र, जिंक, टिन, कैडमियम, पारा, लेड, एंटीमनी आदि हैं। मृदा की ऊपरी सतह पर औसतन 0.18 पी. पी. एम. (पार्टस पर मिलियन) कैडमियम पाया जाता है। प्रदूषण की स्थिति में यकृत तथा गुदों में यह जमा हो जाता है। जो गुर्दों में पथरी के लिए उत्तरदायी होता है। यह मटर, मूली, चौलाई आदि के माध्यम से शरीर में पहुंचता है।

      विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि तीसरी दुनिया में होने वाले ढेर सारे रोगों एवं अनपेक्षित मौतों के मूल में जहरीले कीटनाशकों की घातक भूमिका है। सीसा एवं आर्सेनिक संचयी विष हैं। सीसे के विष की अधिकता से उल्टी, शरीर पर एनीमिया जैसे रोग हो जाते हैं। मिट्टी में पहुँचने पर पौधे इसे अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेते है। जिससे फलियों पर इनका प्रभाव परिलक्षित होता है जैसे- सेम मटर आदि। पौधे जमीन से मोलिब्डिनम का अवशोषण करते हैं।

     संक्षेप में कह सकते हैं कि पौधों द्वारा विषैली धातुएँ अवशोषित की जाती हैं। इन पौधों को खाद्य में प्रयुक्त करने पर मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव होता है। उ. प्र., बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में कीटनाशकों से सामूहिक मौतें तक हो चुकी हैं।

6. पशुओं पर-

      मल जल संदूषित जल प्रयोग से पशुओं में अनेक रोग फैल जाना स्वाभाविक हैं। पोलीथिन में रखे खाद्य से पशुओं की मृत्यु सामान्य बात है। कृषि अपजल से सतही जल स्त्रोत प्रदूषित होते हैं जिससे जलीय जीवों में मृत्यु भी हो जाती है। कीटाणुनाशक से मृदा में मिले जीव (केंचुआ) जैसे अन्य मित्र जीव, बैक्टीरिया मृत हो जाते हैं। इस प्रकार प्रदूषण से जैव विविधता का ह्रास होता है।

मृदा प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

(Measures to control soil pollution)


1. भू-क्षरण हेतु वृक्षारोपण- बांध-बंधियां बनाना, समोच्च रेशा के समान्तर, जुताई, सिंचाई करने से भू-क्षरण रुकेगा जलवायु के अनुरूप वृक्षारोपण सबसे कारगर उपाय है।

2. नगरीय उपान्त क्षेत्र- ठोस अपशिष्ट से प्रदूषित हो रहे हैं। इनका वैज्ञानिक उपयोग हो।

3. उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के बाद किया जाये। जैविक खादों का अधिक उपयोग हो।

4. कीटनाशकों का सम उपयोग हो।

5. मल जल संयन्त्रों की स्थापना हो।

6. जैव प्रौद्योगिकी के प्रयोग से मृदा प्रदूषण रूक जाता है। बहुत से पौधे प्रदूषण को पी लेते हैं। पोलीथिन एवं कीटभक्षी का पता लग गया है। केंचुए मनुष्य के मित्र हैं। यह रबड़, प्लास्टिक, कांच एवं धातुओं को छोड़ सभी कार्बनिक गंदगी खाकर उर्वरक मृदा बनाता है।

7. गहरी जुताई से कांस भूमि की समस्या हल हो जाती है।

8. मृदा प्रदूषण उचित प्रबन्ध से हल हो सकती है।



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(जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके वर्गीकरण, कारण, प्रभाव तथा नियंत्रण के उपाय पर प्रकाश डालें।)


        जल प्रदूषण से आशय उसमें कोई रंग, गंध, स्वाद या जैविकीय परिवर्तन है जो मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है अर्थात् स्वच्छ जल रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, पारदर्शक, जीवाणु, विषाणु रहित होता है। जब इस मूलभूत गुणों में ऋणात्मक परिवर्तन हो जाते हैं, जो मानवीय सहनक्षमता से अधिक हो तो यह प्रदूषण के अन्तर्गत आ जाता है।

        दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जिसमें अशुद्धियाँ या खनिज इतनी अधिक मात्रा तक मिल गयी हों जो मानवीय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो गयी हो अथवा उनकी मात्रा इतनी कम हो जो पर्याप्त पोषक न दे सके तब जल को प्रदूषित कहा जा सकता है।   

गिलपिन के अनुसार, “जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में होने वाले परिवर्तन, जो मनुष्य तथा जलीय जीवों पर हानिकारक प्रभाव छोड़ते हैं।” जल प्रदूषण को अन्य ढंग से भी परिभाषित किया जा सकता है-

1. जल में अनावश्यक पदार्थों का अत्यधिक मात्रा में मिलना जिससे मनुष्य, जन्तु तथा जलीय जीव क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

2. जल के संघटन (Composition) में कोई विपरीत परिवर्तन होता है जिससे वह उस कार्य के अनुपयुक्त हो जाता है जिस कार्य के लिए प्राकृतिक अवस्था में उपयुक्त होता है।

       जल जीवन्त जगत की आत्मा है। इसके प्रदूषित होते ही समस्त प्राण संकटग्रस्त हो जायेंगे। जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ऐसा परिवर्तन जो उसके स्वरूप, गंध और स्वाद के कारण जन स्वास्थ्य, पशुओं, जल-जीवों तथा वाणिज्यिक, औद्योगिक तथा कृषि कार्यों के लिये हानिकारक हो। यह परिवर्तन जल में सीवर नलिका के मिलने, गैस तरल अथवा ठोस पदार्थों के मिलने से होता है।

      प्राकृतिक जल में किसी बाह्य घुलनशील अथवा अघुलनशील वस्तुओं के मिलने के साथ ही प्रदूषण प्रारम्भ हो जाता है। अर्थात् मानवीय हस्तक्षेप के कारण जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में ह्रास हो तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं। प्रायः रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, उदासीन, गुणवत्ता वाले जल में जब कोई मानवीय क्रियाओं के कारण विजातीय पदार्थ मिलते हैं तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं।

         जल में स्वतः शुद्धीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। जल में उपस्थित विभिन्न प्रकार के जलीय पौधे; जैसे- एल्गी (काई) सूर्य की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण द्वारा पानी में ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं जो जलीय जीव-जन्तुओं और जीवाणुओं के द्वारा अपघटन के कार्यों में प्रयुक्त ऑक्सीजन की क्षतिपूर्ति करते रहते हैं। ऑक्सीजन का उपयोग और उत्पादन में सन्तुलन होने से जल प्रदूषित होने से बचा रहता है किन्तु जब इस सीमा से अधिक विजातीय पदार्थ या कूड़ा-करकट जलागारों में पहुँचता है तो वायुजीवी जीवाणु द्विगुणित होकर पानी में घुलनशील और तैरते हुए कूड़े को हजम करते हुए पानी में घुलित ऑक्सीजन का उपयोग संश्लेषण द्वारा पानी में पुनः ऑक्सीजन घोल देते हैं। इस प्रकार से स्वतः शुद्धिकरण की प्रक्रिया चलती रहती है।

जल प्रदूषण के प्रकार

Kinds of Water Pollution

        विभिन्न आधारों पर इसे वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे- जल गुणवत्ता के आधार पर इसे तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(1) भौतिक प्रदूषण

(2) रासायनिक प्रदूषण

(3) जैविक प्रदूषण

(1) भौतिक प्रदूषण-

        इसमें जल में भौतिक गुणों में परिवर्तन होता है, जैसे रंग, स्वाद, पारदर्शिता (गंदलापन), गन्ध, विद्युत चालकता एवं सूक्ष्म जीव आदि।

(2) रासायनिक प्रदूषण-

       इसमें जल की अम्लीयता, क्षारीयता, घुलित ऑक्सीजन में परिवर्तित होती है। यह कार्बनिक प्रदूषकों या अकार्बनिक प्रदूषकों या दोनों द्वारा होता है। ये पतनशील और अपतनशील (Non-Biodegradable) दोनों हो सकते हैं। उदासीन अथवा पेय जल का pH मान 7 होता है। जैसे-जैसे यह मान घटता है जल की प्रकृति अम्लीय तथा pH मान बढ़ने पर क्षारीय हो जाती है। पेय जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 14.5 मिलीग्राम प्रति लीटर (शून्य डिग्री से. पर) से 7.5 मिली ग्राम प्रति लीटर (30°C पर) तक होती है।

         प्रदूषित जल में रासायनिक एवं जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (C.O.D. – Carbon Oxygen Demand और B.O. D. – Biological Oxygen Demand) बढ़ जाती है जो प्रदूषण की मात्रा का सूचक है। कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक ऑक्सीजन को C.O.D. कहते हैं। सूक्ष्म जीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक ऑक्सीजन को B.O.D. कहते हैं। प्रदूषित जल में ये मांगे बढ़ जाने से घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है।

(3) जैविक प्रदूषण- जीवाणु प्रदूषण को जैविक प्रदूषण कहते हैं जो मनुष्य, पालतू एवं जंगली पशुओं से उत्सर्जित पदार्थों के छोड़े जाने से होता है। जैविक प्रदूषित जल संदूषित होकर जीवों की आँतों में संक्रमित रोग जैसे- दस्त, उलटी (Vomiting), हैजा, आंत्र शोध आदि उत्पन्न करते हैं।

जल प्रदूषण के कारण

Causes of Water Pollution

         मुख्यतः जल प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा,

(2) मानवीय प्रक्रमों द्वारा।

(1) प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा-

         प्राकृतिक प्रक्रमों में सड़ी-गली वस्तुएँ, जीव-जन्तु, वनस्पति पदार्थ जल स्रोत में मिल जाते हैं, जिससे जल की प्रकृति प्रदूषित हो जाती है।

(2) मानवीय प्रक्रमों द्वारा जैसे-

(i) अपमार्जन-

       निवास स्थानों एवं अन्य स्थानों में बर्तन साफ करने में प्रयुक्त पाउडर, कीटाणुनाशक, फिनायल, डिटोल एवं अन्य नहाने में और कपड़े धोने में प्रयुक्त साबुन, अपमार्जक जल के साथ नालियों तथा नालों से होता हुआ तालाबों, झीलों तथा नदियों में पहुँचकर प्रदूषित करते हैं।

(ii) वाहित मल-

       नगरों तथा कस्बों के मकानों से निकला मल-मूत्र, कूड़ा-करकट आदि नालियों तथा नालों द्वारा नदियों, तालाबों और झीलों में डाल दिया जाता है जिसके फलस्वरूप जल प्रदूषित हो जाता है। दिल्ली में यमुना और भोपाल में छोटी झील का जल मानवीय उपयोग का नहीं रहा है। आगरा, कानपुर और पटना में भी यही हाल है।

(iii) कृषि उपयोगी पदार्थों का जल में मिलना-

        अधिक उपज लेने हेतु जब खेतों में कीटनाशी, कवकनाशी, खरपतवार नाशी तथा उर्वरक मिलाये जाते हैं तो इन पदार्थों का अधिकांश भाग मिट्टी में मिल जाता है, जो कि अंतत: बहकर नदी-नालों में पहुँच जाता है तथा कल-कारखानों से निकलने वाले जल में अनेक प्रकार की कार्बनिक तथा अकार्बनिक अशुद्धियाँ विद्यमान रहती हैं। यह जल नदियों में डाल दिया जाता है जिससे नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।

(iv) ईंधनों का जल में मिलना-

         भिन्न प्रकार के ईंधनों जैसे- कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के जलने से कई प्रकार की विषैली गैसें निकलती हैं जो वर्षा जल में घुलकर नदियों, तालाबों व झीलों में पहुँचकर जल को प्रदूषित करती हैं।

(v) रेडियोधर्मी पदार्थ-

        रेडियोधर्मी पदार्थ ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रक्रम में जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। उपरोक्त प्रक्रम से निकलने वाले विकिरण जल में घुल जाते हैं तथा प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके साथ-साथ समुद्री जल में भी नाभिकीय विस्फोट किये जाते हैं। इससे अनेक प्रकार के घातक विकिरण निकलते हैं जो कि जल को प्रदूषित करते हैं।

(vi) जल का शोधन करने में-

      अशुद्ध जल को शुद्ध जल बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के विषैले रासायनिक यौगिक मिलाये जाते हैं। यदि ये यौगिक अधिक मात्रा में मिला दिये जायें तो भी जल प्रदूषित हो जाता है।

जल प्रदूषण के प्रभाव 

Effect of Water Pollution

 1. पेड़-पौधों पर प्रभाव-

     यदि खेतों की सिंचाई प्रदूषित एवं संदूषित जल से की जाए तो पौधे संदूषित हो जाते हैं अर्थात् रोगग्रस्त हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप उनके विकास व वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यदि मनुष्य या जीव-जन्तु इन प्रदूषित पौधों को या इनके फलों को लें तो स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

2. जीव-जन्तुओं पर प्रभाव-

     यदि जल प्रदूषित होता है तो उसमें ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिसके फलस्वरूप उसमें पलने वाली मछलियाँ या अन्य जीव-जन्तुओं पर घातक प्रभाव पड़ता है तथा उनकी मृत्यु तक हो सकती है। जब नदी, तालाब आदि के जल में निलम्बित पदार्थ तली में बैठ जाते हैं तो शैवाल तथा जड़ वाले पौधे नष्ट हो जाते हैं।

3. पारिस्थितिक तत्व पर प्रभाव-

      चूँकि प्रदूषित जल के सेवन से पेड़-पौधे, जीवन-जन्तु, मनुष्य सभी कुप्रभावित होते हैं। अतः पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। इससे पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जैसे- वर्षा समय पर न होना, अधिक गर्मी या सर्दी का होना जिससे समस्त जल परितंत्र और जलचक्र प्रभावित हो जाता है। मध्य प्रदेश की न्यूनतम प्रदूषित नर्मदा नदी में रायसेन जिले की फैक्टरी से निकले रसायन युक्त जल के कारण विगत् वर्षों में मछलियाँ मरी थीं। म. प्र. की सबसे प्रदूषित नदी सोन है। उसके जल से वनों पर संकट उल्लेखनीय है।

4. मनुष्यों पर प्रभाव-

       यदि मनुष्य प्रदूषित जल का सेवन करता है तो वह विभिन्न प्रकार के रोगों; जैसे- हैजा, पेचिश, पीलिया, टायफाइड, पक्षाघात, पोलियो आदि से ग्रसित हो जाता है। विषैले धातुयुक्त जल के सेवन से हृदय, गुर्दा, फेफड़े, मस्तिष्क आदि के रोग हो जाते हैं। रेडियोधर्मी पदार्थों से कैंसर, अपंग सन्तानें उत्पन्न हो जाती हैं।

       जल में लोहा, मँगनीज, नाइट्रेट, आर्सेनिक, क्रोमियम, पारा, सीसा, फ्लोराइड, डी.डी.टी., एल्ड्रिन, डाइएल्ड्रिन, हेप्टाक्लीन, बी. एच. सी. और एंडोसल्फान आदि हानिकारक तत्व पहुँचने लगे हैं। इनके लगातार अधिक मात्रा में प्रयोग से चर्मरोग, हैजा, आंत्रशोध, टायफाइड, पीलिया, गैस्ट्रोएण्यइटिस, ब्लू बेबी रोग, अस्थि, गुर्दे, यकृतीय एवं स्नायुतन्त्रीय सम्बन्धित बीमारियाँ आदि प्रमुख रूप से पायी जा रही हैं। एक अनुमान के अनुसार अशुद्ध जल की वजह से 10,500 गाँवों में लगभग 1 करोड़ 22 लाख लोग आर्थराइटिस (जोड़ों का दर्द) नामक बीमारी से 5 करोड़ वयस्क एवं बच्चे अन्य जलजन्य बीमारियों से पीड़ित हैं।

       देश में प्रदूषित जल के सेवन से होने वाले रोगों के कारण 7 करोड़ 30 लाख जीवन नष्ट हो रहे हैं। बीमारियों के इलाज में 1600 करोड़ से भी अधिक रूपये खर्च हो रहे हैं। विश्वभर में अशुद्ध जल का सेवन करने वाले लगभग 18 प्रतिशत अर्थात् 1 अरब 10 करोड़ लोग हैं। इसी कारण विश्वभर में लगभग 62 प्रतिशत मौत प्रदूषित जल के सेवन से हो रही है।

       विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के अनुसार स्वच्छ जल उपलब्ध होने पर 50 प्रतिशत अतिसार एवं 90 प्रतिशत तक हैजा में कमी लायी जा सकती है। अर्थात् भारत में होने वाली दो-तिहाई बीमारियाँ प्रदूषित जल से होती हैं। पेय जल के साथ रोगवाहक बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ एवं कृमि मानव शरीर में पहुँचकर हैजा, टायफाइड, पेचिस, पीलिया, अतिसार, एक्जीमा, जियार्डियता, नारू, एकाकायलो, स्टोमियरा, सटाजिवाईडियोसिस, लेप्टोस्पाइरोसिस जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं।

5. घटते जल संसाधनों पर प्रभाव-

       औद्योगिक एवं नगरीय अपशिष्ट से आज कुमायूँ, हिमालय की सबसे बड़ी झील, ताल (नैनीताल) म. प्र. का भोपाल ताल सिकुड़ रहे हैं। छोटी झीलें व तालाब गाद जमाव से जल क्षेत्र घट रहा है। अकेले कर्नाटक में 25,000 झीलें में से अब मात्र 10,000 तक सिमट कर रह गयी हैं। उत्तरांचल में पर्यटन में प्रमुख स्थान रखने वाले नैनीताल की प्रसिद्ध साल्ट लेक जो 80 वर्ग किमी. में फैली थी, वर्तमान में आधी से भी कम रह गयी है।

       इसी प्रकार बंगलौर में 262 में से 181 तालाब सूख चुके हैं और मैसूर में 25 तालाब और झीलों में मात्र 10 हजार ही शेष बचे हैं। देश के अन्य स्थानों पर भी तालाबों, झीलों तथा अन्य वर्षा जल संग्रहकर्ता दयनीय स्थिति में हैं। पूरे देश में तालाबों, झीलों, पोखरों आदि की परम्परा को पुनर्जीवित करना बहुत आवश्यक है।

जल प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय

Control measures of water pollution

       भारत सरकार ने जल प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण कानून सन् 1974 में बनाया, किन्तु अशिक्षा, स्वार्थपरता, अनिवार्य आर्थिक विकास एवं जनसंख्या में वृद्धि के कारण जल प्रदूषित हुआ। रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, सस्ता सहज उपलब्ध जल प्रकृति के इस उपहार की प्राकृतिक गुणवत्ता संरक्षित करने के निम्नलिखित उपाय हैं:

1. प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण-

       प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों, उद्योगों पर कानून का कठोर नियंत्रण अनिवार्य है जो प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण को प्रदर्शित करते हैं अथवा औद्योगिक अपजल ओर अपशिष्ट बिना उपचार के नदियों और तालाबों में छोड़ते हैं। अतः प्रदूषण स्रोत पर ही नियंत्रण अपरिहार्य हो जाता है। जिस तरह एक उद्योगपति उपचार संयंत्रों में व्यय राशि को उत्पादित मूल्य में जोड़ता है और उद्योगपति उपचार पर व्यय नहीं करते वे बाजार में तुलनात्मक रूप में सस्ते दामों पर उत्पाद बेचता है। परिणामस्वरूप स्वार्थी उद्योगपति अधिक लाभ पा जाते हैं। अतः सभी पर कठोर नियंत्रण होना चाहिये। विगत दशकों में आर्थिक विकास को बहुत अधिक बल दिया गया है।

      अत: जब औद्योगिक कचड़ा एवं नगरीय संदूषित अपजल उपचार के बाद ही जलागारों में मिलाये जाने पर ध्यान देना होगा। समय-समय पर औद्योगिक अपजल का परीक्षण होना चाहिये। संदूषित जल में मैथागोनिक बैक्टीरिया से पेयजल स्रोतों को दूर रखने के लिये उपचारित जल में क्लोरिन मिला देनी चाहिये। वरना ये मुख्य नदी के जीव और वनस्पति की भी कुप्रभावित करेंगे।

2. जनमानस की जल प्रदूषण के प्रति जागरूकता पैदा करना-

     रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से जल प्रदूषित होने के कारण और उनके कुप्रभावों को विज्ञापित करते रहना चाहिए। प्राथमिक पाठशालाओं, विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में शोध परिचर्चा, संगोष्ठी, कार्यशालाओं एवं प्रदर्शनी के माध्यम से आगत पीढ़ी में जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए।

3. प्रदूषक जन्य कारकों से रक्षा-

      नगरीय क्षेत्रों में सघन जनसंख्या के सैप्टिक टैंकों से प्राप्त संदूषित जल के शोधन हेतु प्रति 6 मिलोमीटर पर उपचार केन्द्र हों, ताकि मल-जल उपचारित होने पर ही मुख्य जल स्रोतों से मिल सकें। यदि विभिन्न केन्द्र से थोड़ी मात्रा में अपजल मिलता है तो नदी स्वशुद्धकरण क्षमता के कारण थोड़ी दूर जाकर शुद्ध हो जाती है। यदि बड़ी मात्रा में नगरीय अपजल प्राप्त हुआ तो बड़ी नदियाँ भी प्रदूषित हो जाती हैं। जैसे बिहार में गंगा नदी के साथ हुआ। इसलिये बड़ी मात्रा में नगरीय क्षेत्रों में मल-जल शोधन केन्द्रों की स्थापना अनिवार्य है। नहीं तो गंगा जैसी नदयाँ भी जीवाणु प्रदूषित हो जाती हैं।

4. प्रदूषण निवारण हेतु नयी तकनीकी के विकास से-

       सीवेज वाटर को पेयजल में बदला जा सकता है। फायनेंशियल टाइम्स लन्दन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,  आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी मेमटेक ने एक पर्यटक नगर के समुद्र तट को साफ स्वच्छ कर दिया है और दावा किया है कि उसने जो माइक्रो फिल्ट्रेशन तकनीक विकसित की है, उससे मल कीचड़युक्त जल न केवल उद्योगों में पुनः काम में लिया जा सकेगा, वरन् उससे बाग-बगीचे भी सींचे जा सकेंगे और उसका पेयजल की तरह उपयोग भी हो सकेगा ही नहीं यह पेयजल उन सारे बैक्टीरिया और वायरस से मुक्त होगा, जो हम आज पानी के साथ पी रहे हैं। कीचड़ अलग निकलेगा, वह खेतों के लिए उपयोगी और उपजाऊ खाद देगा।

       उल्लेखनीय है कि ऐसी ही जल शुद्धिकरण प्रक्रिया से जापान में गोल्फ के मैदान और बाग-बगीचे कई वर्षों से सींचे जा रहे हैं। जापान में यह भी प्रयोग किया गया कि अपजल को घुमावदार रास्तों से लाकर नदी में या खेतों के मध्य में मिलने दिया जाये, जिससे प्रदूषण का 50 प्रतिशत भाग कम हो गया। इस विधि का प्रयोग सस्ता, सरल और सुगम है। इस प्रकार की योजनाएँ भागोल के छात्र स्थानीय परिवेश के अनुसार सरलता से सुझा सकते हैं।

        इसको क्रमशः तीव्र ढंग से किया जा सकता है।

(i) शुद्धिकरण क्षमता का उपयोग-

        घरेलू अपजल को घुमावदार लम्बे मार्गों से ले जाने पर धूप, हवा, मिट्टी, पेड़ पौधे, जीव-जन्तु भी जल को शुद्ध करते हैं। साथ ही प्रदूषण स्रोत से दूर जाने पर जल को स्वयं शुद्धिकरण क्षमता के कारण प्रदूषण घटते घटते समाप्त हो जाता है। अतः संदूषित जल को घुमावदार मार्गों से ले जाकर जलाशयों में छोड़ना चाहिये।

(ii) ऑक्सीजन ताल-

        मल जल की गन्दगी को शैवाल द्वारा खुले तालाबों में प्रविष्ट कराया जाता है। इन तालाबों को ऑक्सीकरण या निरीक्षण ताल कहते हैं। इन तालाबों में गन्दे जल को भरा जाता है जिससे ठोस निलम्बित कण बैठ जाते हैं। इन कृत्रिम तालाबा मे विषाक्त पदार्थों को रासायनिक विधि से तथा कार्बनिक पदार्थों को जीवाणुओं की क्रिया द्वारा विघटित कराते हैं। यह ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है। ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति कृत्रिम विधियों से की जाती है। इसमें हरे शैवालों का उपयोग होता है जो जल में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। यह कार्य जीवाणु और शैवाल की सहजीविता द्वारा सम्पन्न होता है।

(iii) शैवाल का पृथक्करण-

       जल में नीला थोथा (कापर सल्फेट) मिलाने से शैवाल नष्ट हो जाते हैं। सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में भी शैवाल की वृद्धि रूक जाती। अतः जल को सार्वजनिक उपयोग हेतु ढक कर रखा जाता है।

5. जल की किस्म का परीक्षण एवं पेय जल स्रोत का चयन-

        इस सन्दर्भ में भूगोल का विद्यार्थी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है। सतही जलागारों को पानी की किस्म के अनुसार अ, ब, स और द वर्गों में विभाजित कर सकते हैं ताकि उन जलागारों का अनुकूल उपयोग सम्भव हो सके। जल की किस्म का परीक्षण होने से वैज्ञानिक और स्थानीय जनता बचाव के साधन खोज सकती है। पेयजल स्थानों के चयन नदी की ऊपरी धारा से किये जाने चाहिए वृक्षारोपण जल प्रदूषण का एक प्रभावी उपाय है। पारिस्थितिक संतुलन में वृक्षों की भूमिका अहम् है। वनस्पतियों में काई से लेकर बड़े वृक्ष तक प्रदूषण मुक्ति में सहायता करते हैं।

       वैज्ञानिक प्रमाणित कर चुके हैं कि वायु, ध्वनि, मृदा और जल प्रदूषण को वृक्ष रोकते हैं, अन्य उपायों में कीटाणुनाशकों का न्यूनतम उपयोग, शहरों में सीवर की सुविधा और शैवाल जल के ऐसे पौधे हैं जो जल को शुद्ध रखन में सहायक होते हैं। ऐसे शैवालों को जल में बढ़ने देना चाहिये।

      प्रदूषण की रोकथाम के लिये नाभिकीय विखण्डन, मृत जीव-जन्तुओं को नदी में बहाने और धार्मिक उत्सवों में निस्त पूजा सामग्री को विसर्जित करने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिये। इसके साथ दो नगरों एवं कस्बों के मकानों से निकलने वाला मल-मूत्र तथा कूड़ा-करकट सड़, गल कर कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाता है जिसे खेतों में खाद के रूप में डालना अधिक हितकारी होगा। घरों, उद्योगों आदि से निकलने वाले अपमार्जन पदार्थ तथा विषैले पदार्थों को नदियों, तालाबों, झीलों आदि में डालने से पूर्व शुद्ध करना चाहिये। इस प्रकार जल प्रदूषण की रोकथाम हो सकती है। इस दिशा में शासन द्वारा कार्य प्रारम्भ किया गया है।

6. जैव नियंत्रकों की खोज-

        अभी हाल में ही आस्ट्रेलिया के डेविड वूर्ने ने नदी के पानी में रिफन्गोमोनास वंश के एक ऐसे जीवाणु की खोज की है जिससे तीव्र एन्जाइम्स बनते हैं। एक एन्जाइम्स जिसे माइक्रो सिस्टेम नाम दिया गया है, की आकृति बदलकर मारक क्षमता प्रदान करता है। आस्ट्रेलिया के लोग इस जीवाणु की उत्पत्ति प्रदूषित जल को साफ कराने हेतु कर रहे हैं।

       जैव प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत कछुआ प्रदूशित जल को साफ करने में भविष्य में उललेखनीय भूमिका निभाएँगे तथा चम्बल के कछुए प्रदूषित गंगा के जल को श्री शुद्ध करने के लिये भेजे जाने की योजना है क्योंकि कछुए पानी को साफ करते हैं। चम्बल का जल इन्हीं कछुओं के कारण शुद्ध रहता है।

7. अपशिष्ट उपचार (Waste Treatment)-

      प्रदूषित जल में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों के उपचार परम्परागत तरीके से काफी खर्चीले हैं। नीरी NEERI (नागपुर) के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो कम व्यय पर उच्च क्षमता रखती है, जैसे- घरेलू अथवा औद्योगिक अपशिष्ट को उथले तालाब में कुछ दिनों के लिये रखते हैं जिससे जीवाणु तेजी से कार्बनिक अपशिष्टों को नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार यह जल सिंचाई के लिए प्रयुक्त हो जाता है।



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