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अध्याय-1 हमारा सौरमंडल

बिहार बोर्ड वर्ग-6 Geography Solution

अध्याय-1 हमारा सौरमंडल


अध्याय-1 हमारा सौरमंडल

अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें-

(i) राशियों की कुल संख्या कितनी है?

(क) 5

(ग) 8

(ख) 12

(घ) 27

उत्तर- (ख) 12

(ii) सूर्य की आकृति कैसी है?

(क) गोल

(ख) चिपटी

(ग) वर्गाकार

(घ) आयताकार

उत्तर- (क) गोल

(ii) सौर परिवार का मुखिया कौन है?

(क) पृथ्वी

(ख) चन्द्रमा

(ग) सूर्य

(घ) नक्षत्र

उत्तर- (ग) सूर्य

(iv) ग्रहों की कुल कितनी संख्या है?

(क) 8

(ख) 9

(ग) 12

(घ) 27

उत्तर- (क) 8

(v) सप्तर्षि कितने तारों का समूह है?

(क) 27

(ख) 8

(ग) 12

(घ) 7

उत्तर- (घ) 7

2. खाली जगहों को भरिए-

(i) पृथ्वी एक नक्षत्र को 14 दिनों में पार करती है।

(ii) विषुवत रेखा पर ध्रुवतारा क्षितिज पर दिखाई पड़ता है।

(iii) मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच क्षुद्रग्रह पाए जाते हैं।

(iv) वृहस्पति के 63 उपग्रह हैं।

(v) सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक लगभग 8 मिनट में पहुँचता है।

3. निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

(i) सूर्य से दूरी के अनुसार विभिन्न ग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर- सूर्य से दूरी के अनुसार बुध, ग्रह, शुक्र ग्रह, पृथ्वी ग्रह, मंगल ग्रह, वृहस्पति ग्रह, शनि ग्रह, यूरेनस, नेप्ट्यून हैं।

(ii) सूर्य से सबसे नजदीकी ग्रह क्या नाम है?
उत्तर- बुध सूर्य के सबसे नजदीकी ग्रह है।

(iii) सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह कौन है?
उत्तर- सौर मंडल का सबसे बड़ा वृहस्पति ग्रह है।

(iv) पृथ्वी के निकटवर्ती ग्रह कौन-कौन हैं?
उत्तर- पृथ्वी के सबसे नजदीक सूर्य और चन्द्रमा हैं।

(v) उस ग्रह का क्या नाम है जिसके चारों ओर छल्ले पाये जाते हैं?
उत्तर- उस ग्रह का नाम शनि है जिसके चारों ओर छल्ले पाये जाते हैं।

(vi) सौर मंडल का कौन-सा ग्रह आपको सबसे अलग लगा और क्यों?
उत्तर- सौर मंडल का पृथ्वी ग्रह हमें सबसे अलग लगता है क्योंकि यही वह ग्रह है जहाँ जीवन मिलता है। यहाँ जल एवं जीवन के लिए आवश्यक गैसें मौजूद हैं और अंतरिक्ष से देखने पर यह नीली दिखाई देती है। यही है हमारी पृथ्वी जिस पर हम रहते हैं।

(vii) पृथ्वी के उपग्रह का क्या नाम है? का क्या नाम है?
उत्तर- पृथ्वी के उपग्रह का नाम चाँद है।

(viii) वे कौन-कौन से ग्रह हैं जो पृथ्वी के घूमने की विपरीत दिशा में घूमते हैं?
उत्तर- शुक्र तथा अरुण ग्रह जो पृथ्वी के घूमने की विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(ix) आकाशगंगा क्या है?

उत्तर- आकाशगंगा लाखों तारों का एक समूह है।

4. अकाशीय पिण्ड एवं दी गई विशेषताओं का मिलान कीजिए-

                          उत्तर-

(i) बुध- (ग) सबसे छोटा ग्रह

(ii) पृथ्वी- (घ) नीला ग्रह

(iii) चन्द्रमा- (ख) पृथ्वी का उपग्रह

(iv) उल्कापिंड- (ड़) सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले पत्थरों के छोटे टुकड़े

(v) आकाशगंगा- (च) लाखों तारों का समूह

(vi) ब्रह्माण्ड- (क) लाखों आकाश गंगा का समूह

5. आपस में चर्चा कीजिए एवं लिखिए।

(i) कई तारे सूर्य से बड़े हैं फिर भी छोटे क्यों दिखाई देते हैं?
उत्तर- कई तारे सूर्य से बड़े हैं फिर भी छोटे दिखाई देते हैं क्योंकि यह पृथ्वी से काफी दूर हैं।

(ii) तारे आकाश में ही हैं फिर भी दिन में क्यों नहीं दिखाई देते?
उत्तर- तारे आकाश में ही हैं फिर भी दिन में सूर्य की रोशनी के कारण हमें दिखाई नहीं देते हैं।

(iii) चन्द्रमा तारों से छोटा है फिर भी हमें बड़ा क्यों दिखाई देता है?
उत्तर- चन्द्रमा तारों से छोटा है फिर भी हमें बड़ा दिखाई देता है क्योंकि पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी कम होने के कारण वह हमें तारों से बड़ा दिखाई देता है।

(iv) अगर किसी आकाशीय पिण्ड में प्रकाश न हो तो क्या वह हमें नजर आएगा? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर- अगर किसी आकाशीय पिण्ड में प्रकाश न हो तो वह हमें दिखाई नहीं देगा क्योंकि हम प्रकाश के बिना किसी भी वस्तु को देख नहीं सकते हैं।

6. इनमें किन-किन अकाशीय पिंडों के नाम छुपे हैं-

हमारा सौरमंडल

उत्तर-

(i) बुध

(ii) शुक्र

(iii) पृथ्वी

(iv) मंगल

(v) वृहस्पति

(vi) शनि

(vii) अरुण

(viii) वरुण

(ix) टाइटन

(x) सिरस।

7. सौरमंडल का मॉडल/चित्र बनाकर कक्षा में प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-

हमारा सौरमंडल


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12. अजब-गजब

12. अजब-गजब


 अजब-गजब⇒

            इस देश में सब कुछ अजब-गजब हो रहा है। हमको तो लगता है कि यह देसे है अजब और गजब लोगों का।

         तो, हम कह रहे थे… कह कहाँ रहे थे। कहेंगे तो अब। देखिये जी, यहाँ नेता और जनता का संबंध वैसा है, जैसा दूध के साथ पानी का पगार के साथ घूस का। बाजार के साथ महँगाई का। आलू के साथ झुलसा रोग का…। अब ये एक-दूसरे से पूछकर तो अपना काम नहीं करेगा न।

          झुलसा रोग आलू से पूछकर आयेगा क्या? न महँगाई बाजार से पूछकर आया करेगी और न ही घूस पगार के बारे में पूछताछ करेगी। और पानी तो दूध का लंगोटिया यार है, फिर पूछने की क्या जरूरत है?

अजब-गजब

         लेकिन नहीं…नेतागिरी में ऐसा नहीं होता। आप वाले जनता से पूछकर ही हर्र-हुर्र कर रहे हैं। कहाँ झाडू मारना है कहाँ नहीं, जनता से ही पूछेंगे। जनता ने सरकार बनाने के लिए थोड़े न वोट दिया, वो तो सिर्फ राइट टू पूछने के वास्ते दिया था। सरकार बनाएँ कि नहीं, बड़ी कोठी तथा सुरक्षा लें कि नहीं, लाल बत्ती जलाएँ कि नहीं-सब काम केजरीवाल ने जनता से पूछकर ही किया न। जनता भी ‘पुछवाकर तृप्त। उधर, राहुल गांधी की सारी उमर मम्मी से पूछने में ही घिस रही है।

          गरीब के घर का खाना पचा लेंगे, लेकिन जब गरीब को अपने घर खाने पर बुलाना हो तो मम्मी से ही पूछेंगे। तो, प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी लेनी है कि नहीं, यह भी तो मम्मीजी से पूछकर ही तय करेंगे न। लेकिन सबका गुरु निकले नरेन्द्र भाई। गुरुई में तो उन्होंने अपने ‘गुरुओं’ का गुड़ गोबर का दिया। और पूछने के मामले में सबको पछाड़ डाला। इसलिए कि खुद ही जनता से पूछते हैं और खुदहि जवाब देते परन्तु मंच पर से पूछते जरूर हैं, ताकि जनता ये न बूझे कि पूछा नहीं…।

       तो, है न यह अजब-गजब? अब तो घोड़ा भी घास से पूछकर ही चरा करेगा। चोर कोतवाल से पूछेगा कि चोरी कर लें? और तो और, राजा प्रजा से पूछेगा कि हम भी थोड़ा-बहुत ‘अराजक’ हो लें-तुम्हारी तरह?

स्रोत: दे दे राम, दिला दे राम !, (विरेन्द्र नारायण झा)

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव

11. सकारात्मक विचारों का प्रभाव


सकारात्मक विचारों का प्रभाव⇒

           सकारात्मक विचारों का भी मन, मस्तिष्क, शरीर तथा समस्याओं के हल की दिशा में इतना अनुकूल प्रभाव पडता है कि वह चमत्कार जैसा ही लगता है। विधेयक विचार यदि ईश प्रार्थना से संयुक्त हो जाए तो यह दैवी शक्ति का प्रवाह बन जाता है, जिसमें चिंताएं, व्याकुलताएं, रोग, शोक, आधि- व्याधि सभी प्रवाहित हो जाते हैं।

              सकारात्मक विचार ईश प्रार्थना से संयुक्त हो या दृढ़ मनोबल से- दोनों का शुभ फल अवश्य मिलता है। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिट्ठर ने भी अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस ऑफ थेराप्यूटिक्स’ में लिखा है-‘मनोभावों में इतना सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ और कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिंतन द्वारा अपने को अशक्त, असमर्थ तथा रुग्ण बना सकता है।

सकारात्मक विचारों का प्र

             श्रीमती मर्टिल फिल्मोर प्रायः बीमार रहा करती थी। दवा खाते-खाते टूट चुकी थी। डॉक्टर भी अब और कुछ कर सकने में अपने को असक्षम समझ रहे थे। एक बार श्रीमती मर्टिल अपने पति चार्ल्स फिल्मोर के साथ एक आध्यात्मिक भाषण सुनने गई।

          भाषण के एक वाक्य को उसके मन ने दृढ़ता से पकड़ लिया ‘I am child of God and therefore I do not inherit sickness.’ ‘मैं ईश्वर की संतान हूं, अतः मुझमें कोई रोग नहीं।’ मन हमेशा इस बात की आवृत्ति करता रहता। इस बात पर उसे इतना अधिक विश्वास हो गया कि उसका जीवन बदल गया। वह स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती और पोषक (Positive) विचारों के द्वारा अपने में शक्ति भी भरती रहती। फलतः वह पूर्ण स्वस्थ हो गई।

             श्री कैस्के जन्म से पंगु था। वह चल नहीं सकता था। श्रीमती मर्टिल फिल्मोर से प्रेरित होकर वह ईश्वर विश्वास से अभिभूत हो पोषक विचारों को पोषित करने लगा। वह बारंबार इस विचार की आवृत्ति करता कि उस पर परमात्मा की असीम कृपा बरस रही है। प्रभु कृपा से अब वह स्वस्थ होता जा रहा है, उसके पैर अच्छे होते जा रहे हैं। उसके पैर सभी कार्य करने में सक्षम हो गए हैं, वह चल सकता है, दौड़ सकता है इत्यादि। फलतः वह भी स्वस्थ हुआ।

         प्रसिद्ध चिकित्सक हीलर अलबई क्लिक की पुरानी पेट पीड़ा मन की शुभ भावनाओं ने शांत कर दी।

        प्रसिद्ध चिकित्सक रिबेका ने मधुमेह (डायबिटिज) रोग को निर्मूल करने की दवा बताई ‘सकारात्मक विचार।’ रिबेका के शब्दों में, ‘इस रोग को निर्मूल करने की एकमात्र दवा है प्रेम और मन का सदा निश्चित और प्रसन्न रहना।’

      एलिस न्यूटन नाम की स्त्री पेट के कैंसर से बुरी तरह पीड़ित थी, उसका उदर फूला हुआ था। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। वह ईश प्रार्थना के साथ पोषक विचारों में जुट गई और अंततः रोगमुक्त हुई। भारत में तो ऐसे उदाहरण आए दिन देखने को मिलते हैं।

        अब तो यह स्पष्ट परिलक्षित हो गया कि शुभ और विधेयक विचारों की शुभ परिणति एवं अशुभ और निषेधात्मक विचारों के घातक परिणाम होते हैं।

        आप चिंतन की प्रक्रिया द्वारा प्रभु की शांति, निर्विकारिता, प्रज्ञावानतादि को निश्चय ही अपने में उभार सकते हैं। व्यक्ति का चिंतन उसके शरीर, स्वास्थ्य और क्रियाशक्ति पर आश्चर्यजनक ढंग से प्रभाव डालता है। चिंतन से अंतर्मन के साथ-साथ बाह्य जगत भी प्रभावित और परिवर्तित होता है। अतएव स्वसंकेत (ओटो सजेशन) द्वारा अपने भीतर स्थित ईश्वरीय गुणों को उभारें, प्रकट करें।

स्रोत: चिंता क्यों?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

10. नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?


नकारात्मक विचारों से कैसे उबरें?

                यह तो नकारात्मक विचारों का प्रभाव हुआ। अतः आप नकारात्मक विचारों को अपने पर हावी न होने दें। जब कभी आपको लगे कि आप पर नकारात्मक विचारों का आक्रमण हो रहा है, तब आप तत्काल सावधान हो जाएं। नकारात्मक विचारों को हटाने के एक-दो सुझाव प्रस्तुत हैं-

1. आप दो-चार गहरा श्वास लें और छोड़ें। इन श्वासों का अनुभव करें। तदुपरांत आंखें बंद कर लें और आते-जाते श्वासों को गहराई से अनुभव करें। श्वासों से भली प्रकार जुड़ जाएं। आपके मन की आंखों को धोखा देकर एक भी श्वास आने-जाने न पाए। आप सावधानीपूर्वक हर आते-जाते श्वास का अनुभव और आनंद लें। यदि कोई विचार आपको परेशान कर रहा हो तो आत्मविश्वास के साथ मन को आदेश दे, ऐ मन! चुप हो जाओ। शांत हो जाओ। अभी मैं आनन्द सरोवर में तैराकी कर रहा हूं। ॐ शांति! ॐ आनंद! ॐ प्रसन्नता! ॐ आह्लाद !

2. नकारात्मक भाव संवेग यथा-क्रोध, चिढ़, द्वेष, नफरत, क्षोभ, आक्रोश आदि पर नियंत्रण भी जरूरी है। आप सावधान रहें कि ये दुष्ट संवेग आपके भीतर प्रवेश न कर पाएं और यदि प्रवेश कर भी जाएं तो ठहर न पाएं। इसके लिए एक दो पहलू पर ध्यान दें। याद रखें, सभी व्यक्तियों की सोच, रूचि व आदतें भिन्न-भिन्न होती है। अतः जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करें। यदि आप उसकी सोच या आदतों पर अपने विचार थोपने का प्रयत्न करेंगे तो वह कुछ ऐसा कह सकता है, जिससे आप क्षुब्ध हो जाएं। अतः शांति और रिश्तों में मधुरता के लिए शांत मौन ही बेहतर है।

नकारात्मक विचारों से

3. दूसरों के अपशब्दों को नजर अंदाज करना सीखे, इससे व्यर्थ के कलह-अशांति से सहज ही बच जाएंगे।

4. जहां तर्क-वितर्क में बहसा-बहसी की संभावना हो रही हो तो वहां से कुछ समय के लिए हट जाएं, इससे नकारात्मक भाव-संवेगों से आपका बचाव हो सकेगा।

5. नकारात्मक भाव-संवेगों के उभार पर भी आप हिम्मत न हारें, इससे मुक्त होने के लिए आप अपने ध्यान को अन्यत्र लगाने का प्रयास करें। नाक से लम्बा श्वास लेकर झटके के साथ मुंह से श्वास फेंक दें। ऐसा आठ-दस बार करें।

6. जहां जाने से, जिसके साथ रहने से, जिसकी बात सुनने से तनाव बढ़ता हो, वहां से नम्रतापूर्वक दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमत्ता है।

7. याद रखें, दुख – तनाव अभाव में कम और स्वभाव में अधिक होता है। स्वभाव को विधेयक बनाएं और दुख-तनाव से मुक्ति पाएँ।

8. चिंता या तनाव के उद्रेक में किसी पुरानी और आनंददायक घटना या बात याद करें। ऐसा अनुभव करें, जैसे वह वर्तमान में ही घटित हो रही है। घटना इस तरह सिलसिलेवार याद करें कि चिंता-तनाव का मन में प्रवेश पाना असम्भव हो जाए।

9. तनाव का अहसास होते ही श्वासों के साथ प्रभु सुमिरण में लग जाएं। प्रभु की स्नेहिल छत्रछाया सदैव आपके सिर पर है, इसे बार-बार बोलें और इसका अनुभव करें। जैसे प्रह्लाद के सिर पर नरसिंह भगवान बड़े ही प्रेम और ममता से अपना हाथ फेरे थे, उसी तरह दयालु प्रेमिल प्रभु बड़े ही लाड़-दुलार से आपके सिर पर हाथ फेर रहे हैं, इसे अनुभव कर भावविभोर हो जाएं। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति भरा कोई भजन गुनगुनाने लगें।

कहा भी गया है-

महाविपत्तौ संसारे यः स्मरन्मधुसूदनम्।

विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शंकरः।।     देवी भा. पु. ९/४०/४१

             अर्थात् ‘जो पुरुष महाविपत्ति के अवसर पर भगवान का स्मरण करता है, उसके लिए वह विपत्ति संपत्ति हो जाती है, ऐसा शंकर जी का वचन है।’

स्रोत: चिंता क्यों ?

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव

9. नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव


नकारात्मक विचारों का दुष्प्रभाव⇒

            नकारात्मक विचारों का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका स्पष्ट रूप उजागर हुआ फ्रांस में मृत्युदंड पाए एक व्यक्ति पर इसका परीक्षण किया गया। उसे एक स्थान पर लिटाकर उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई। उसे सुनाकर कहा गया, तुम्हारे शरीर की नसों को काटकर इतना अधिक रक्तस्राव कराया। जाएगा कि स्वतः तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।

नकारात्मक विचारों

            किसी नुकीली वस्तु को हाथ की नसों पर इस तरह फेरा गया की लगे नसें काट डाली गई हैं, साथ ही शीतोष्ण जल की धारा को धीरे-धीरे हाथ के पास इस प्रकार गिराया जाने लगा कि लगे कि सारा शरीर खून से भींगकर लथ-पथ हो रहा हो। कहा जाने लगा-‘ओह! कितना अधिक रक्त स्राव हो रहा है। लग रहा है जैसे शरीर खून के ही सैलाब में पड़ा हुआ हो। संपूर्ण शरीर रक्त से लाल होता जा रहा है। हाय-हाय ! शरीर के चारों ओर खून ही खून दीख रहा है।’

            जैसे-जैसे इन बातों को दुहराया जाता, तदनुरूप चिंतन करते हुए कैदी की छटपटाहट भी बढ़ती जाती। कुछ देर बाद पुनः कहा गया, ‘ओह! शरीर का तो लगभग सारा खून निकल चुका है। चेहरा स्याह पड़ता जा रहा है। अब यह नहीं बच सकता। किसी हालत में नहीं बच सकता।’ इतना सुनना था कि सचमुच कैदी तड़पकर मर गया।

         आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि न व्यक्ति की नसें काटी गई थी, न खून बहा था। निषेधात्मक विचारों का मानव पर प्रभाव जानने के लिए बिना कुछ हुए ही उसे अहसास कराने का प्रयत्न किया गया था कि नसें काट डाली गई हैं और काफी मात्रा में खून बह रहा है। इसके लिए व्यक्ति को बार-बार झूठ ही कहा जा रहा था कि अत्यधिक खून बह जाने के कारण वह मरणासन्न होता जा रहा है। व्यक्ति ने इसे सत्य समझा और असका अंतस् निषेधात्मक विचारों से भरता गया। फलतः उसने दम तोड़ दिया।

स्रोत: चिंता क्यों

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