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17. The application of G.P.S. (जी.पी.एस. के उपयोग)

The application of G.P.S.

(जी.पी.एस. के उपयोग)


The application of G.P.S.

(जी.पी.एस. के उपयोग)⇒

      विश्व स्थिति प्रणाली एक बहु-उद्देश्यीय प्रणाली है। यह तकनीक आर्थिक रूप से मितव्ययी तथा स्थिति निर्धारण में दुरुस्त है। इसमें अन्य विषय को विचारने की क्षमता है। जी.पी.एस. का उपयोग प्रत्येक मौसम में किसी भी समय निरन्तर रूप से किया जा सकता है। ज्योडेसी (Geodesy), सर्वेक्षण (Surveying), नौसंचालन (Navigation) तथा कई अन्य क्षेत्रों में जी.पी.एस. अपार सम्भावनाओं का पता लगाता है।

            विभिन्न सर्वेक्षण की विधियों का अलग-अलग उद्देश्यों के लिये इसमें प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह विभिन्न सूचनाओं एवं अनेक प्रकार की जानकारियों को एक प्रणाली में संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है जिसे संगठित प्रणाली (Integrated System) कहते हैं। जी.पी.एस. की विभिन्न अवलोकन विधियाँ वास्तविक स्थिति (Absolute Positioning), सापेक्षिक स्थिति (Relative Positioning) इत्यादि हैं।

        जी.पी.एस. निर्देशांक प्रणाली एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) दोनों मानचित्रों की सहायता से नौसंचालन सुविधायें प्राप्त की जा सकती हैं। वर्तमान समय में तेजी से भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं सुदूर संवेदनअध्ययनों में जी.पी.एस. साधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। विस्तृत गुणात्मक सूचनाओं को एकत्र करने सुदूर संवेदन से प्राप्त आँकड़ों के भू-सत्यापन के लिये जी.पी.एस. रिसीवर का उपयोग अति तेजी से बढ़ रहा है।

         विभिन्न उद्देश्यों के लिये सर्वेक्षण की अलग-अलग विधियाँ प्रयोग की जाती है। अवलोकन विधि के दौरान जी.पी.एस. रिसीवर को स्टेटिक, आभासी-काइनेमेटिक तथा काइनेमेटिक मोड में प्रयोग किया जाता है। इन अलग-अलग मोड के विवरण तथा परिणाम का जी.पी.एस. सर्वेक्षण, भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा सम्पन्न किया गया है जिनको तिन रूप में समझाया जा सकता है-

स्टेटिक मोड (Static Mode):-

          स्टेटिक मोड को स्थिर विधि कहते हैं। इसे सापेक्षिक स्टेटिक मोड भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक स्थानों पर एक साथ निरन्तर 3 से 4 घंटे से अवलोकन किया जाता है तथा आँकड़ों की प्रक्रिया के पश्चात् निर्देशांक ज्ञात किये जाते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने देश के विभिन्न भागों में जी.पी.एस. तकनीक से सर्वेक्षण कर ज्योडेटिक नियंत्रण बिन्दुओं को स्थापित किया है। अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा अण्डमान निकोबार द्वीप में नियंत्रण बिन्दु स्थापित किये गये हैं। पुन: IRS-IC उपग्रह को इस तकनीक से जोड़ने के लिये हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल तथा महाराष्ट्र में भू-नियंत्रण बिन्दुओं को निर्धारित किया गया है।

          अवलोकन से प्राप्त परिणामों को स्टेटिक मोड में लिया गया है तथा परिणाम शुद्ध पाये गये हैं। इन परिणामों की शुद्धता 5PPm या इससे भी ऊपर है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि जी.पी.एस. आर्थिक दृष्टि से भी काफी उपयुक्त है तथा साधारण विधियों से 3 गुना तीव्र है।

The application of G

आभासी काईनेमेटिक मोड (Pseudo Kinematic Mode):-

        आभासी काइनेटिक मोड के अन्तर्गत रौवर रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रत्येक स्टेशन पर अवलोकन करने में कम से कम समय 4 से 8 मिनट लगता है। इस क्रिया को लगभग एक घंटे से भी अधिक समय तक लगातार करते रहते हैं।

        ठीक इसके विपरीत एक दूसरा रिसीवर भी किसी अन्य सेवक स्टेशन पर प्रयोग किया जाता है जिसको पूर्व से ही ज्ञात स्टेशन पर निश्चित कर दिया जाता है। फिल्ड स्टेशन में गणनाओं का अवलोकन बार-बार करने से उपग्रह ज्यामिति परिवर्तन स्वरूप को भी ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार से अनिश्चित अवस्था (Amleiguity) परिणामों का समाधान होता है। आभासी-काइनेमिटिक सर्वेक्षण से पूर्व निश्चित स्टेशन (Fixed Station) से एक आधार रेखा की आवश्यकता होती है जिससे उस क्षेत्र की स्थिति निर्धारण किया जा सके। स्थिर सापेक्षिक मोड से एक घंटे का जी.पी.एस. अवलोकन करना आवश्यक है।

काइनेमेटिक मोड (Kinematic Mode):-

        सर्वेक्षण कार्य में इस विधि का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया जाता है। किसी ज्ञात स्टेशन या आधार स्टेशन पर स्टेशनरी रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। घुमाने वाले रिसीवरों द्वारा 4 से अधिक उपग्रहों से निरन्तर सिंगनल लॉक (Signal Lock) होता रहता है। कुछ रिसीवर अवलोकन बिन्दुओं के मध्य घूमते रहते हैं।

            भू-मापन की प्रक्रिया के बाद एकल आवृत्ति (Single Frequency) जी. पी. एस. में एक अवलोकन का उपयोग किया जाता है। X, Y Z प्रणाली के निर्देशांक व अक्षांश, देशान्तर तथा ऊँचाइयों की गणना की जाती है जो किसी भी स्टेशन के स्थिर निर्देशांक होते हैं। अक्षांश तथा देशान्तर को समतल आयताकार प्रणाली में परिवर्तित किया जाता है जो कि ट्रैवर्स मर्केटर प्रक्षेप (Traverse Marcater Projection-TMP) में निर्मित होते हैं।

1. जी. पी. एस. का विश्व व्यापी उपयोग (Global Use of G.P.S)

(i) नौसंचालन (Navigation):-

      सभी के वायुयानों तथा पानी के जहाजों में मार्ग नौसंचालन के लिये जी.पी.एस. का उपयोग किया जा सकता है। इसमें शुद्धता का विशेष महत्व नहीं है। लगभग 100 मी० तक की शुद्धता भी इस प्रयोग को प्रभावित नहीं करती है।

(ii) सर्वेक्षण (Surveying):-

         जी.पी.एस. विश्व स्तरीय उपयोग के ज्योडेसी के लिये एक शक्तिशाली साधन है। पृथ्वी के परिभ्रमण तथा प्लेट विवर्तन जैसे ग्लोबल भू-गतिशील घटनाओं से प्रबोधन के लिये अति दूर आधार रेखा इन्टरफरोमेटरी (Very Long Baselining Interferomatry-VLBI) तथा उपग्रह लेजर रेन्डिंग (Satellite Laser Ranging-SLR) तकनीकियों का उपयोग किया जाता है। जी.पी.एस इन तकनीकियों का स्थान ले रहा है तथा इनको बदलने का भी कार्य कर रहा है। इसका उपयोग भी प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है तथा परम्परागत तकनीक धीरे-धीरे सिमट रही हैं ज्योडेटिक समस्याओं के लिये जी.पी.एस. अति प्रभावशाली समाधान प्रस्तुत करता है।

(iii) समय तथा दूर संचार (Timing and Communication):-

        उपग्रह प्रणाली के एक अन्तर्गत सही समय को दर्शाने वाली घड़ी जी.पी.एस. के विश्व स्तर पर प्रयोग को दर्शाता है। पूरे विश्व में समय को शुद्ध रूप से निर्धारित किया जा सकता है। उच्च शुद्ध समय के कई उपयोग हैं जैसे कि भूकम्प तरंगों का प्रबोधन (Monitoring) तथा अन्य भू-भौतिकीय मापन। किसी ज्ञात स्टेशन पर केवल एक उपग्रह से ही जी. पी. एस. रिसीवर 0.1 माइक्रोसेकंड तक शुद्ध समय को प्रदर्शित करता है। कई अन्य परिष्कृत तकनीकियों के आ जाने से अब मोनोसेकंड के गुना शुद्ध समय को दर्शाया जा सकता है।

2. जी.पी.एस. का क्षेत्रीय उपयोग (Regional Uses of GPS):-

          संसाधनों के प्रबोधन, यातायात प्रबन्धन, संरचनात्मक प्रबोधन तथा कई प्रकार के स्वचलन कार्यों में जी.पी.एस. का उपयोग सफलता पूर्वक किया जा सकता है। नौसंचालन में एस.ए. (SA) का उपयोग किया जा सकता है। यह तकनीक हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण के लिये भी उपयोग हो रही है।

प्रश्न प्रारूप

Q. जी.पी.एस. के उपयोग पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the application of G.P.S.)



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10. Projection / प्रक्षेप

10. Projection / प्रक्षेप



Projection / प्रक्षेप ⇒

             गोलाकार पृथ्वी (Spherical Earth) के किसी भूभाग को समतल सतह पर ज्यामितीय विधियों के द्वारा प्रदर्शित करने की विधि को प्रक्षेप कहते हैं। वृहत मापनी पर बने मानचित्र, यथाआकृतिक प्रक्षेप (Orthographic Projection) पर निर्मित होते हैं जबकि प्रायः वायु फोटोचित्र केंद्रीय प्रक्षेप (Central Projection) पर निर्मित होते हैं।

           यथाआकृतिक प्रक्षेप में किसी भी भाग की वही आकृति आती है जो उस क्षेत्र की ग्लोब पर है परन्तु केंद्रीय प्र में ऐसा प्रत्येक भाग में संभव नहीं है। ऊर्ध्वाधर वायु फोटोग्राममिति की आदर्श दशा यह हो सकती है यदि वायु फोटोग्राफी किया जाने वाला धरातल समतल तथा क्षैतिज रूप से समतल हो तो वायु फोटोचित्र ज्यामितीय रूप से वैसे ही होते हैं जैसे कि उस क्षेत्र के मानचित्र परन्तु प्रत्येक भूभाग में ऐसा संभव नहीं है। इसलिए कैमरा अक्ष के झुकाव (Tilt) तथा की धरातल की उच्चावचन विभिन्नताओं के कारण वायु फोटोचित्र ज्यामितीय रूप से उस क्षेत्र के मानचित्रों की तुलना में भिन्न होते हैं।

             वायु फोटोबिम्ब निर्वचन में प्रयोग की जाने वाली ज्यामितीय विधियों के आधार पर वायु फोटोबिम्ब के प्रक्षेपों के निम्न तीन प्रकार हैं-

प्रक्षेपों के प्रकार (Types of Projection)

1. समानान्तर प्रक्षेप (Parallel Projection)

2. लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

3. प्रक्षेप (Central Projection)

1. समानान्तर प्रक्षेप (Parallel Projection):-

       इस प्रक्षेप में प्रक्षेपित किरणें, समानान्तर होती हैं। निम्न दिये गये उदाहरण में ABC त्रिभुज को LL रेखा पर प्रक्षेपित किया है जिसका प्रक्षेपण त्रिभुज abc है। चित्र से स्पष्ट है कि प्रक्षेपित किरण Aa Bb, Cc एक दूसरे के समानान्तर हैं।

Projection

Geometry of Photograph

2. लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection):-

        इस दिशा में त्रिभुज ABC की किरणों को LL रेखा पर प्रक्षेपित किया गया है। (चित्र B) त्रिभुज की सभी किरणें LL रेखा पर समकोण बनाती हैं। यह समानान्तर प्रक्षेप की एक दशा है। एक निश्चित मापक पर बने मानचित्र लम्बकोणीय प्रक्षेप पर होते हैं।

           इस प्रक्षेप का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें दूरियाँ, कोण तथा क्षेत्र सभी किसी लक्ष्य के उच्चावचन अंतरों से स्वतंत्र होते हैं।

3. केंद्रीय प्रक्षेप (Central Projection):-

              उपर के चित्र C में केंद्रीय प्रक्षेप को दर्शाया गया है। इस प्रक्षेप में त्रिभुज ABC की सभी प्रक्षेपित किरणें Aa, Bb तथा Cc एक बिन्दु 0 से गुजरती है जिसको प्रक्षेप केंद्र (Projection Centre) या संदर्श केंद्र (Perspective Centre) कहते हैं। लेंस प्रणाली द्वारा (जिसे O बिन्दु माना गया है) प्रक्षेपित बिम्ब को केंद्रीय प्रक्षेप के रूप में पेश किया गया है। संदर्श केंद्र एवं लक्ष्य (Object) के मध्य का तल (Plane) पोजिटिव तल (Positive Plane) है। लेंस को एक संदर्श केंद्र के रूप में लिया गया है। सामान्यतः वायु कैमरों में दो संदर्श केंद्र होते हैं-

(i) बाह्य (External) संदर्श केंद्र तथा

(ii) आन्तरिक (Internal) संदर्श केंद्र

प्रधान दूरी (Principal Distance)-

         आंतरिक संदर्श केंद्र (Internal Perspective Centre) से फोटो तल की लम्बवत दूरी को प्रधान दूरी कहते हैं। फोटोतल पर लम्बवत दूरी का आधार प्रधान बिन्दु (Principal point) कहलाता है।

फिडूसियल निशान (Fiducial Mark)-

         उत्तम श्रेणी के समायोजित कैमरे द्वारा खींचे गये फोटोचित्रों के चारों किनारों के मध्य या विकर्ण रूप में चारों किनारों पर ‘V’ आकार के निशान लगे होते हैं जिन्हें फिडूसियल निशान (Fiducial Marks) कहते हैं। इनको सूचक चिह्न (Index Mark) भी कहते हैं। इनकी संख्या 4 होती है। ये कैमरे लेंस के साथ स्थाई रूप से कटे रहते हैं जो निगेटिव पर विम्ब बनाते हैं। ये बिम्ब फोटोग्राफ पर अंकित हो जाते हैं। इनके द्वारा प्रधान बिन्दु का निर्धारण किया जाता है।

प्रधान बिन्दु (Principal Point)-

          फोटोचित्र पर चारों फिडूसियल निशानों के प्रतिच्छेदन (Intersection) बिन्दु को प्रधान बिन्दु कहते हैं। इनके द्वारा फोटोचित्र आन्तरिक दिविन्यास (Orientation) आवश्यकता की पूर्ति की जाती है।

साहुल बिन्दु (Plumb Point)-

        संदर्श केंद्र से सीधे नीचे की ओर खड़ी उर्ध्वाधर रेखा जब फोटो तल पर मिलती है तो इस बिन्दु को साहुल बिन्दु कहते हैं।

टिल्ट (झुकाव/Tilt)- टिल्ट का अर्थ है झुकाव। कैमरे के ऑप्टिकल (Optical Axis) तथा साहुल रेखा (Plumb Line) के मध्य जो कोण बनता है उसे झुकाव अथवा झुकाव कोण कहते हैं।

        इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि यह धरातल तल (Ground Plane) तथा फोटो तल (Photo Plane) के मध्य का कोण झुकाव कोण है। इसे निम्न चित्र में समझाया गया है। खड़े रूप में कैमरा अक्ष के विचलन कोण को कोण कहते हैं।

टिल्ट (झुकाव

Tilt

           इस प्रकार झुकाव के दो प्रमुख घटक (Components) है। पहला उड़ान दिशा X अक्ष की तथा दूसरा उड़ान दिशा के खड़े रूप में Y की ओर। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि झुकाव को दो दिशाओं की ओर निर्धारित किया जाता है।

(i) पहला घटक ‘Y’ अक्ष के बारे में है। जब झुकाव उड़ान दिशा (X अक्ष) की ओर है तो इसे अनुदैर्ध्य (Lontigudinal) या ‘X’ झुकाव या अग्र (Fore) या प्रवण (Apt) टिप (Tip) झुकाव कहा जाता है। इसे  Φ(फाई Phi) के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

(ii) दूसरा घटक ‘X’ अक्ष के बारे में है। जब झुकाव ‘Y’ दिशा की ओर खड़े रूप में होता है तो उसे पार्श्विक झुकाव (Lateral Tilt) या ‘Y’ झुकाव या साधारण कहा जाता है। इसे ω (ओमेगा Omega) के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

नादिर बिन्दु (Nadir Point)-

           नीचे के चित्रों में संदर्श विन्दु 0 से एक खड़ी रेखा ON पर बिन्दु ‘n’ पर मिलती है जिसे फोटो अधोबिन्दु (Nadir Point) कहते हैं तथा भूमि पर बिन्दु ‘N’ भूमि अधोबिन्दु (Nadir Point) कहलाता है।

नादिर बिन्दु

Photo Nadir Point

फिडूसियल केंद्र (Fiducial Centre)-

      फोटो तल पर संदर्श बिन्दु (O) से साहुल रेखा का पाद या आधार (p) प्रधान बिन्दु (Principal Point) कहलाता है। इस प्रकार संदर्श बिन्दु (O) तथा प्रधान बिन्दु (p) के मध्य की खड़ी दूरी प्रधान दूरी (Principal Distance) कहलाती है।

प्रधान दूरी (Principal Distance)-

         जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि फोटोग्राफ में प्रधान बिन्दु की स्थिति का निर्धारण फिडूसियल चिह्नों के प्रतिच्छेदन बिन्दु से की जाती है। फिडूसियल अक्ष के प्रतिच्छेदन बिन्दु को फिडूसियल केंद्र भी कहते हैं।

फोटो झुकाव के कारण (Reasons for Photo Tilt)

        विभिन्न दिशाओं में झुकाव होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

1. वायुमण्डलीय दशा (Atmoshperic Conditions)

2. पायलेट की गलती के कारण (Human Error of the Pilot)

3. कैमरे की त्रुटि के कारण (Imperfection of Camera)

           टिल्ट अथवा झुकाव के प्रभाव से फोटो बिम्ब विकृत हो जाता है।

दोलन (Swing)-

       दोलन फोटोतल पर मापा जाने वाला एक कोण है जो कि उड़ान दिशा की ओर फिडूशियल अक्ष तथा वास्तविक उड़ान रेखा के मध्य में बनता है। इस कोण को λ(कापा Kappa) द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।

प्रक्षेप

Swing

समकेंद्र (Isocentre)-

      झुकाव के कोण का अर्द्ध विभाजन फोटो तल के समकेंद्र पर प्रतिच्छेदन करता है जिसे फोटो समकेंद्र (Photo Isocentre) कहते हैं। जब यह अर्द्ध विभाजक भूमि तल पर मिलता है तो इसे भूमि समकेंद्र (Ground Isocentre) कहते हैं। इन बिन्दुओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यदि धरातल समतल होता है तो इन बिन्दुओं पर कोण शुद्ध होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. प्रक्षेप से क्या आशय है? इसके प्रकार की विवेचना करें।

(What do you mean Projection? Discuss its types.)



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14. भू-सन्दर्भ / The Geo-Referencing System

14. भू-सन्दर्भ

(The Geo-Referencing System)


भू-सन्दर्भ⇒

          धरातलीय सूचनाओं को नियंत्रित रूप से संचालित करने की नितान्त आवश्यकत होती है जिससे धरातलीय दूरियाँ, बसाव स्थिति एवं दिशा एक-दूसरे से सम्बन्धित रह सके। इसके लिए धरातलीय सन्दर्भ प्रणाली (Geo-Reference System) को स्थापित करने की आवश्यकता होती है। जैसा कि ज्ञात है कि सभी धरातलीय सूचनायें मानचित्रों में दर्शाई जाती हैं। मानचित्र का मुख्य कार्य वास्तविक संसार की आकृतियों को उनकी बसाव स्थिति के अनुरूप दर्शाना होता है। भौगोलिक बसाव स्थिति को ही भू-सन्दर्भित (Geo-Referencing System) प्रणाली कहते हैं। मानचित्र ज्यामितीय विशेषतायें लिए हुये होते हैं।

           सुदूर संवेदन से प्राप्त घरातलीय सूचनाओं के प्रतिविम्ब बिना प्रक्षेपों के होते हैं। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता है कि सुदूर संवेदन से प्राप्त प्रतिविम्बों में मानचित्र जैसी ज्यामितीय विशेषतायें होती हैं। सभी सुदूर संवेदन उत्पादों को धरातलीय बसाव स्थितियों के अनुरूप व्यवस्थित करना अति आवश्यक होता है। भौगोलिक बसाव स्थिति को निर्देशांकों Coordinated) की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है।

       “किसी निश्चित निर्देशांक प्रणाली की रूपरेखा के अनुरूप वास्तविक संसार की आकृतियों को दर्शाना भू-सन्दर्भ प्रणाली कहलाती है।”

         दूसरे शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है कि- “अव्यवस्थित सुदूर संवेदन आँकड़ों को भू-धरातलीय (Geo-Spatial) आँकड़ों में परिवर्तन करना ही भू-सन्दर्भ प्रणाली कहलाती है।”

         यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि धरातलीय सन्दर्भ प्रणाली (Spatial Reference System) एवं भौगोलिक सन्दर्भ प्रणाली (Geo-graphical Reference System) दोनों एक ही हैं जिन्हें साधारण रूप से Geo-Referencing कहा जाता है। ये दोनों ही धरातलीय मापन से सम्बन्धित हैं।

भू-सन्दर्भ प्रणाली के उद्देश्य

           सुदूर संवेदन द्वारा ली गई इमेज में किसी पिक्सल की स्थिति तथा उसी पिक्सल तत्व की धरातल पर वास्तविक स्थिति के अनुपातिक सम्बन्ध को स्थापित करना ही भू-सन्दर्भ प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य है।

          दूसरे शब्दों में भू-सन्दर्भ का उद्देश्य धरातलीय आकृतियों को उनकी बसाव स्थिति के अनुरूप दर्शाने के लिए एक ऐसी रूप रेखा तैयार की जाती है जिस प्रारूप के अन्तर्गत वास्तविक संसार की आकृतियों का उचित मापन (Measurement), संग्रहण (Recording), परिकलन (Computition), तथा विश्लेषण (Analysis) किया जा सके।

भू-सन्दर्भ की संकल्पना (Concept of Geo-Referencing)

           वास्तव में यदि व्यवहारिक रूप से देखा जाय तो भू-सन्दर्भ एक ऐसी संकल्पना एवं तकनीकि है जो पृथ्वी के गोलाकार असमतल धरातल को समतल मानचित्र पर सफलतापूर्वक मापन कर परिवर्तित करता है। यह निर्देशांक प्रणाली के द्वारा ही सम्भव है। इसके द्वारा आकृतियों का उचित मापन एवं दृश्याँकन अति सुगम हो जाता है।

             यद्यपि मानचित्र भी धरातलीय सूचनाओं का आधार है परन्तु मानचित्र आँकड़ों की अपेक्षा भिन्न सूचनायें रखते है। भू-सन्दर्भ की विशेषताओं के कारण ही यह अन्य सूचना एकत्र करने वाली प्रणालियों से भिन्न है। पृथ्वी की भौतिक आकृति को गणितीय विधियों के द्वारा समतल सतह पर प्रदर्शित करने की संकल्पना का अनुमान ज्योड़ (Geiod) एवं गोलाभ (Ellipsoid) परिभाषा से लगाया जा सकता है जो कि भू-सन्दर्भ प्रणाली की संकल्पना का मूलाधार है।

              प्रायः सुदूर संवेदन आँकड़ों से तैयार की गई इमेज की DN मानों में लिया जाता है। DN मान बिना किसी सूचना या नाम चिप्पी के होते हैं जो धरातल के विभेदन (Resolution) का एक लघु रूप होता है। प्रत्येक DN मान की एक ज्यामितीय स्थिति होती है। ज्यामिमितय सम्बन्ध से अभिप्राय है कि घरातल के बिन्दुओं तथा इमेज बिन्दुओं के मध्य समानुपातिक सम्बन्ध होना। किसी पिक्सल की स्थिति को धरातल की स्थिति में परिवर्तित किया जा सकता है। धरातल की स्थिति को 3D निर्देशांक प्रणाली (3D Co-ordinate system) में या मानचित्र प्रक्षेप में 2D निर्देशांक प्रणाली (2D Co-ordinate System) के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

          इस प्रकार किसी भी बिम्ब (Image) को भू-सन्दर्भित करने से दो समस्याओं का हल एक साथ निकाला जा सकता है-

(i) जिस आकृति की विम्ब (Image) में पहचान की जानी है उसके मानचित्र के निर्देशांक प्राप्त किये जा सकते हैं।

(ii) सुदूर संवेदन बिम्बों के ज्यामितीय विकारों (Distortions) को तभी शुद्ध किया जा सकता है जब उसके किसी पिक्सल को मानचित्र के निर्देशांकों के अनुरूप ढाल दें। इस प्रकार के निर्देशांक रुपान्तरण को भू-सन्दर्भित (Geo-Referencing) कहा जाता है। सुदूर संवेदन एवं जी.आई.एस. में किसी भी रास्टर आधारित भौगोलिक डाटा प्रक्रिया का यह सबसे पहला कदम होता है, तभी डाटा शुद्ध सन्दर्भित माना जाता है।

भू-सन्दर्भ के उपागम (Approaches of Geo-Referencing)

          रास्टर आधारित आँकड़ों के प्रक्रियन (Process) में निम्न दो प्रमुख उपागमों के द्वारा किसी बिम्ब को भू-सन्दर्भित किया जाता है-

(i) बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण (Image to Map Rectification)

(ii) बिम्ब से बिम्ब में पंजीकरण (Image to Image Rectification)

(i) बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण-

            किसी बिम्ब को, मानचित्र निर्देशांक प्रणाली में परिवर्तित करने या शुद्ध करने की प्रक्रिया को बिम्ब का मानचित्र में शुद्धीकरण कहलाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि रास्टर बिम्ब में पंक्ति व कॉलम निर्देशांकों को मानचित्र के X व Y निर्देशांकों में रूपान्तरण किया जाता है। बिम्ब को निम्न दो अन्तर सम्बन्धित परिचालन प्रक्रिया के अन्तर्गत शुद्ध किया जाता है-

(a) Spatial Interpolation by Co-ordinate Transformation

(b) Attribute Interpolation by Resampling

(ii) बिम्ब का विम्ब से पंजीकरण-

         इसका अभिप्राय यह है कि शुद्ध किये गये बिम्ब से किसी नये विम्ब को शुद्ध करना है। पूर्व में जो बिम्ब मानचित्र निर्देशांक की सहायता से शुद्ध किया गया है उसकी सहायता से अशुद्ध बिम्ब को शुद्ध की जाने वाली प्रक्रिया बिम्ब में पंजीकरण कहलाता है। जी.आई.एस. में सामान्यतः एक रास्टर बिम्ब से दूसरे रास्टर बिम्ब में पंजीकरण किया जाता है।

भू-सन्दर्भ की प्रक्रिया (Process of Geo-Referencing)

              सुदूर संवेदन एवं जी.आई.एस. में रास्टर डाटा को किसी निश्चित मानचित्र निर्देशांक प्रणाली में भू- सन्दर्भित करना अति आवश्यक होता है। मूलरुप से रास्टर डाटा का भू-सन्दर्भित करना रास्टर सतह (layer) की संकल्पना है। रास्टर बिम्ब को X (Horizental) एवं Y (Vertical) लघु ग्रीड सेलों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। किसी भी डाटा सेल की स्थिति पंक्ति एवं कॉलम के द्वारा सन्दर्भित होती है। सेल का न्यूनतम आकार मापन की सूक्ष्म इकाई होती है। किसी भी सेल की स्थिति उसकी पंक्ति संख्या एवं कॉलम संख्या से पहचानी जा सकती है। पंक्ति का प्रारम्भ धनात्मक दिशा नीचे की ओर एवं कॉलम दाहिने ओर को इशारा करते हैं।

भू-सन्दर्भ

प्रश्न प्रारूप

Q. भू-सन्दर्भ प्रणाली पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Geo-referencing System.)



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18. सुदूर संवेदन के उपयोग

18. सुदूर संवेदन के उपयोग

(The Applications of Remote Sensing)


सुदूर संवेदन के उपयोग

               धरातलीय सूचनाओं को प्राप्त करने के परम्परागत विधियाँ अधिक समय व्यय करने वाली होती है तथा इन पर मानव शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है। इसलिये सुदूर संवेदन तकनीक की तुलना में परम्परागत विधियों का उपयोग समय की दृष्टि से त्वरित नहीं लगता है। मानचित्र समय के साथ पुराने हो रहे हैं परन्तु बिना मानचित्र के सुदूर संवेदन अध्ययन का आधार तैयार नहीं किया जा सकता है। सुदूर संवेदन के कई उपयोग है। प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक तत्वों के अलग-अलग अध्ययनों में इसकी अग्रणी भूमिका रही है।

      प्राकृतिक तत्वों में सबसे प्रमुख मौसम दशाओं का विश्लेषण तथा भविष्यवाणी (Weather Analysis and Forcasting), हिम जल प्रवाह (Snow Melt Run off), बाढ़ (Floods), भू-स्खलन (Landslides), प्राकृतिक आपदायें (Natural Disasters), भू-आकृतिक तथा भूवैज्ञानिक मानचित्रण (Geomorphological and Geological Mapping), प्राकृतिक वनस्पति मानचित्रण (Natural Vegetation Mapping), मृदा वर्गीकरण (Soil Classification), बेकार भूमि का सीमांकन (Waste Land Delineation), महासागर उत्पादकता (Ocean Productivity), जैव विविधता (Biodiversity), संसाधनों का सर्वेक्षण (Resource Surveys) इत्यादि है।

      इसी प्रकार सांस्कृतिक तत्वों में भूमि उपयोग (Land Use), दावानल पहचान (Forest Fire Detection), कृषि प्रकार (Types of Agriculture), फसल तालिका (Crop Inventory), सिंचाई जल प्रबन्ध (Irrigation Water management), बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना (Multi-Purpose River Vally Projects), नगर स्व-प्रसार (Urban Sprow), प्रदूषण की समस्या (Pollution Problems), खनिजों की खोज (Mineral Exploration) इत्यादि कई अध्ययनों में सुदूर संवेदन का उपयोग किया जाता है।

          प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के अध्ययन के अलावा आजकल अनेक देशों में राष्ट्रीय प्रतिरक्षा (National Defence) के क्षेत्र में दूरदर्शन का प्रयोग किया जा रहा है। उपग्रहीय प्रतिबिम्बों एवं वायु फोटोग्राफ की सहायता से शत्रु की सेना की गतिविधियों को पहचाना जा सकता है। इस तकनीक के द्वारा सेना के जमाव, शस्त्रशाला, सैनिक किलाबन्दी एवं मार्गों के निर्माण आदि का सरलतापूर्वक प्रबोधन हो सकता है।

भूविज्ञान (Geology)

         भूविज्ञान के अन्तर्गत शैल प्रकारों, संरचनाओं, भूआकृतियों तथा अन्तःस्थलीय भाग का अध्ययन किया जाता है जिनका सम्बन्ध, प्राकृतिक प्रक्रियाओं एवं शक्तियों से रहा है तथा जो पृथ्वी के धरातल पर आवश्यक परिवर्तन करने में अपनी अग्रणी भूमिका निभाते हैं। यह सभी जानते हैं कि खनिजों एवं हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज एवं विदोहन ने समाज में लोगों के जीवन स्तर को उठाया है। पेट्रोलियम से यातायात साधनों के संचालन के लिये गैस एवं तेल की पूर्ति होती है। चूने का पत्थर सीमेंट एवं चूने के भट्टों को कच्चे माल की पूर्ति करता है।

        संगमरमर तथा ग्रेनाईट की खानों से भवन निर्माण की सामग्री उपलब्ध होती है। इसी प्रकार पोटाश से खाद, कोयले से ऊर्जा, बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों से जेवरात, तथा तांबा, जिंक तथा कई प्रकार के खनिज विभिन्न उपयोगों में काम आते हैं। केवल पृथ्वी के सुदूर संवेदन तकनीक भूगर्भिक अध्ययन तक ही सीमित नहीं है बल्कि दूसरे ग्रहों एवं चंद्रमा की बनावट व संरचनाओं के परीक्षण में भी इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा रहा है।

        सम्भावित आपदाओं जैसे कि ज्वालामुखी, भूकम्प, भूस्खलन आदि अध्ययनों में भूविज्ञान को सम्मिलित किया जाता है। इसी प्रकार निर्माण एवं इन्जीनिरिंग से सम्बन्धित भू-तकनीक अध्ययनों में भूविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि अन्य प्राकृतिक तत्वों का अध्ययन करने से पूर्व सुदूर संवेदन से भूगर्भिक संरचनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

         सुदूर संवेदन, धरातलीय संरचनाओं चट्टानों की बनावटों के बारे में सूचनाओं को एकत्र करने के साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। बहु-स्पैक्ट्रल आँकड़े, चट्टानों की बनावट, शैल विन्यास आदि के बारे में विश्वसनीय सूचनायें प्रदान कर सकते हैं जो स्पैक्ट्रल परावर्तन पर आधारित है। रडार, धरातलीय उच्चावचन तथा ऊबड़-खाबड़ घरातल की जानकारी प्रस्तुत करता है जो कि अत्यधिक उपयुक्त है।

      सुदूर संवेदन केवल भूविज्ञान के उपयोगों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका उपयोग खदान क्षेत्रों में पहुंचने के लिये मार्ग योजना बनाने, भू-सुधार प्रबोधन (Monitoring) तथा आधार मानचित्रों के निर्माण जिन पर भूगर्भिक आँकड़ों को अध्यारोपित किया जाता है। संक्षेप में भूविज्ञान में सुदूर संवेदन के उपयोगों का प्रकार निम्न है:-

(i) भूगर्भिक मानचित्रण (Geological Mapping) करना

(ii) धरातलीय निक्षेपणों (Surficial Deposits) का अध्ययन करना

(iii) रेत एवं कंकड़-पत्थरों का विदोहन (Sand and Gravel Exploitation) करना

(iv) खनिजों के विदोहन (Mineral Exploitation) में सहायक

(v) हाइड्रोकार्बन की खोज करना

(vi) पर्यावरणीय भूविज्ञान का अध्ययन

(vii) अवसाद मानचित्रण एवं प्रबोधन करना

(viii) प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक घटनाओं का मानचित्रण एवं प्रबोधन करना

(ix) भू-आपदाओं का मानचित्रण करना

भूगर्भिक मानचित्रण:-

            वायु फोटो विश्लेषण तथा उपग्रहीय आँकड़ों एवं विम्बों की सहायता से भूगर्भिक एवं धरातलीय पदार्थों की पहचान का मूल्यांकन किया जा सकता है। यहाँ पर संक्षिप्त में सुदूर संवेदन का भूगर्भिक मानचित्रण में उपयोग को समझाया गया है। 1940 के पश्चात् वायु फोटोग्राफ का उपयोग भूगर्भिक मानचित्र के क्षेत्र में विस्तृत रूप से बढ़ा है तथा 1960 के पश्चात् उपग्रहीय आँकड़ों एवं बिम्बों की उपलब्धता से क्षेत्रीय विश्लेषण में सुदूर संवेदन की राहनीय भूमिका है। आज कोई भी भूगर्भिक अध्ययन ऐसा नहीं है जिसमें सुदूर संवेदन उत्पादों का उपयोग न किया जा रहा हो।

         भूगर्भिक मानचित्रों के अन्तर्गत भूआकारों, शैल प्रकारों तथा शैल संरचनाओं (वलन, भ्रंश, विभंग व रेखीय आकृतियाँ) का विश्लेषण एवं मानचित्रण किया जाता है जिनका एक से उपयुक्त धरातलीय सम्बन्ध होता है। भूगर्भिक मानचित्रण क्रियायें खनिज संसाधनों विदोहन में अहं भूमिका निभाते हैं। वायु फोटोचित्रों एवं सुदूर संवेदन प्रतिबिम्बों में धरातलीय आकृतियों की व्याख्या खनिज संसाधनों के सम्भावित क्षेत्रों का पता लगाने में सूचनायें प्रदान करते हैं।

       भूगर्भिक अध्ययनों के लिये प्रायः बहुअवस्था युक्त प्रतिविम्ब विश्लेषण की आवश्यकता है। इसके लिये 1:250,000 से 1:1,000,000 मापक पर बने उपग्रहीय प्रतिबिम्बों का विश्लेषण किया जाता है। तत्पश्चात् उच्च ऊँचाई वाले वायु 1:60,000 से 1:30,000 वायु फोटोचित्रों की व्याख्या की जाती है। विस्तृत सूक्ष्म स्तर पर अध्ययन के लिए 1:20,000 मापक पर निर्मित वायु फोटो चित्रों का स्टीरियोस्कोप पर विश्लेषण कर मानचित्रण किया जाता है।

लघुमापक मानचित्रण (Small Scale Mapping):-

        लघु मापक मानचित्रण का उपयोग मुख्यतः रेखीय आकृतियों के विश्लेषण के लिये जाता है। इसके अन्तर्गत लिनियामेंट (Lineament) क्षेत्रीय रेखीय आकृतियाँ (भ्रंश) जो क्षेत्रीय आकार की आकृतियों के कारण होती है जैसे कि कोई नदी, कगार, पर्वत श्रृंखला, भ्रंश, विभंग इत्यादि। इन रेखीय आकृतियों को धरातलीय आकृतियों के विन्यास क्रम से पहचाना जाता है। प्रमुख रेखीय आकृतियाँ कुछ किमी० से कई सौ किमी० तक लम्बी होती है।

      उदाहारण के लिये अमेरिका में सान एनड्रीयस भ्रंश की लम्बाई 1000 किमी० तक है। आकृतियों के विश्लेषण एवं मानचित्रण में खनिज संसाधनों एवं भू-जलीय संसाधनों की भी खोज की जा सकती है। अधिकतर खनिज संसाधन रेखीय आकृतियों के साथ-साथ पायी है।

         रेखीय आकृतियों को कई कारक प्रभावित करते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारक रेखीय आकृति एवं प्रदीप्त स्रोत (Illumination Source) में आपसी कोणीय सम्बन्ध है। सामान्यत: वे रेखीय आकृतियाँ जो प्रदीप्त स्रोत के समानान्तर क्रम में होती हैं, उन्हें पहचाना नहीं जा सकता है। जिन आकृतियों का क्रम प्रदीप्त स्रोत के विपरीत होता है उसको पहचानना एवं मानचित्रण करना सरल होता है। सामान्यतः मध्यम निम्न प्रदीप्त कोण सूक्ष्म धरातलीय रेखीय आकृतियों के संसूचन के लिये अधिक उपयुक्त होता है। प्रायः निम्न सूर्य कोणीय फोटोग्राफी शीतकाल में की जाती है।

           अधिकतर भूगर्भशास्त्रियों का मत है कि खनिज संसाधनों के विदोहन तथा भूगर्भिक शैलों के मानचित्रण के लिये 1.6 तथा 2.2 माईक्रोमीटर स्पेक्ट्रल बैंड पर परावर्तन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इन बैंडों को फोटोग्राफ नहीं किया सकता है लेकिन लेंण्डसैट थिमेटिक पेपर तथा वायुआधारित इमेजिंग स्पैक्ट्रोमीटर के संवेदक द्वारा संसूचित किया जा सकता है। इसी प्रकार तापीय अवरक्त स्पेक्ट्रल भाग का बहु-संकीर्ण बैंड, शैल, एवं खनिज प्रकारों में कई भिन्नतायें दर्शाता है।

      तेल एवं खनिज संसाधनों की खोज में भूगर्भिक मानचित्रण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संरचनात्मक तथा शैल ईकाइयों का निर्धारण एवं मानचित्रण कर भूगर्भशास्त्री इन संसाधनों की सही स्थिति व उपयुक्तता बता सकते हैं जिससे उनके विदोहन का लक्ष्य रखा जाता है। इसी प्रकार शैल इकाइयों का मानचित्रण, इन्जीनियरिंग, निर्माण, खनन कार्यों, अन्य तकनीक कार्यों, भूमि उपयोग तथा अधिवासीय योजनाओ में यह तकनीकि अति सहायक होती है।

मृदा मानचित्रण (Soil Mapping):-

           किसी क्षेत्र का विस्तृत मृदा सर्वेक्षण उस क्षेत्र के संसाधन सूचनाओं का प्रारम्भ स्रोत होता है। भूमि उपयोग योजनाओं में इनका बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। विभिन्न भूमि उपयोगों में मिट्टी की उपयुक्तता की जानकारी भूमि के गलत उपयोग तथा पर्यावरण ह्रास को रोकने में सहायता करता है। भूमि योजनाओं में यह एक प्रभावशाली यंत्र की भाँति कार्य करता है। इसके लिये मिट्टी संसाधनों से सम्बन्धित आवश्यक तथ्यों के आँकड़े उपलब्ध किये जाते हैं। सर्वप्रथम मिट्टी के प्रकारों की एक सूची तैयार की जाती है तथा उनका मानचित्रण करना आवश्यक होता है।

          अनुभवी वैज्ञानिकों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा विस्तृत मृदा सर्वेक्षण किया जाता है। वायु फोटोचित्रों की सहायता से क्षेत्र परिभ्रमण किया जाता है तथा अलग-अलग मृदा इकाईयों का सीमांकन किया जाता है। मिट्टी की अलग-अलग इकाईयों के निर्धारण के लिये कई मिट्टी परिच्छेदिकाओं का निरीक्षण एवं परीक्षण किया जाता है। प्रारम्भ में मृदा मानचित्रण के लिये 1/15,000 से 1/40,000 मापक का प्रयोग किया जाता था परन्तु वर्तमान समय में सुदूर संवेदन आँकड़ों की उपलब्धता से मिट्टियों के सम्बन्ध में कई प्रकार की जानकारी प्राप्त की जाती है।

       फसलों की उत्पादक सम्भावना के निर्धारण के लिये मिट्टी की आर्द्रता का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी की ऊपरी परत (1-2 मी०) में जल कणों की उपलब्धता आर्द्रता को दर्शाती है जो प्रायः वायुमण्डल में जलवाष्प बनकर उड़ जाती है। यदि मिट्टी की आर्द्रता का सर्वेक्षण समय रहते करा दिया जाय तो फसलों को सूखे की स्थिति से बचाने का प्रयास किया जा सकता है तथा किसानों को सतर्क किया जा सकता है।

       इतना ही नहीं मिट्टी की आर्द्रता की जानकारी से बाढ़ की जानकारी भी दी जा सकती है। अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की पानी सोखने की मात्रा अलग-अलग होती है। मिट्टी की संतृप्तता के आधार पर जलस्राव का अनुमान लगाकर बाढ़ से पूर्व अगाह किया जा सकता है। जहाँ भी वन कटान, खनन, कृषि या मानवीय क्रिया-कलाप हैं वहां पर जल के तीव्र बहाव, वाष्पीकरण दर तथा मिट्टी अपरदन को रोकने के लिये भविष्यवाणी की जा सकती है।

          सुदूर संवेदन विस्तृत भू-भाग के मृदा आर्द्रता की माप कर सकता है। रडार एक ऐसा प्रभावशाली संवेदक है जो धरातलीय आर्द्रता का गुणात्मक तथा मात्रात्मक मापन करता है। मृदा आर्द्रता के द्वारा रडार पृष्ठ प्रकीर्णन प्रभावित होता है। बहुकालिक रडार बिम्ब लम्बे समय के आर्द्रता अन्तर को दर्शाते हैं। इस प्रकार रडार ही एक ऐसा सुदूर संवेदन संवेदक है जो मृदा की डाईलैक्ट्रिक नियतांक को बताता है। यह नियतांक मिट्टी में पानी की मात्रा की परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।

जलविज्ञान

           जलविज्ञान पृथ्वी के धरातलीय जल का अध्ययन है चाहे यह जल धरातल पर बह रहा हो, बर्फ व हिम के रूप में जमा हो या मिट्टी के द्वारा धारण किया हो। जलविज्ञान सुदूर संवेदन के कई अन्य उपयोगों से सम्बन्धित है। उदाहरण के लिये वनीकरण, कृषि तथा भूमि आवरण इत्यादि। इन उपयोगों में जलविज्ञान एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अधिकतर जलविज्ञान प्रक्रियायें गतिशील हैं। यह गतिशीलता केवल वर्ष के अन्तराल पर ही नहीं बल्कि मौसम के अनुरूप भी है जिसको स्वतंन्त्र रूप से अवलोकन करने की आवश्यकता होती है।

         सुदूर संवेदन एक ऐसी तकनीक है जो जलविज्ञान के तथ्यों की गतिशलता एवं धरातलीय वितरण का सहदर्शी (Synoptic) दृश्य प्रस्तुत करता है। सक्रिय संवेदक क्षमताओं के द्वारा रडार ने जलविज्ञान के अध्ययनों में नये आयाम प्रस्तुत किये हैं। रडार के द्वारा बादलों युक्त दशाओं या मौसम तथा रात के अंधेरे में भी धरातलीय संसाधनों का संसूचन किया जा सकता है। सुदूर संवेदन द्वारा जलविज्ञान के उपयोगों के कुछ उदाहरण निम्न रूप से सम्मिलित किये गये हैं—

(i) जल प्लवित भूमि का मानचित्रण एवं प्रबोधन (Wetland Mapping and Monitoring)

(ii) हिमाच्छादित क्षेत्रों का प्रबोधन (Snow Cover Monitering)

(iii) हिम की मोटाई का मापन (Measuring Snow Thickness)

(iv) हिम-जल समविस्तार का निर्धारण (Determining Snow-Water Equivalent)

(v) नदी तथा झील, बर्फ का प्रबोधन (River, lake & Monitering)

(vi) बाढ़ मानचित्रण तथा प्रशोधन (Flood mapping and Snow Monitering)

(vii) हिमानी गतिशीलता का प्रबोधन (Glacial Dynamics Monitering)

(viii) नदी/डेल्टा परिवर्तनशीलता का संसूचन (River/Delta Change Detection)

(ix) अपवाह तन्त्र मानचित्रण तथा जलगाम मॉडलिंग (Drainage Basin Mapping and Watershed modelling)

(x) सिंचित नहर रिसाव का संसूचन (Irrigation Canal Leakage Detection)

(xi) सिंचित कार्यक्रम (Irrigation Scheduling)

बाढ़ क्षेत्रों का निर्धारण एवं मानचित्रण (Flood Zone Delineation and Mapping)

           बाढ़ जलीय चक्र का एक प्राकृतिक तथ्य है। बाढ़ का सम्बन्ध मौसम दशाओं पर निर्भर करता है। अत्यधिक वर्षा के कारण अत्यधिक धरातलीय जल प्रवाह से नदियों का जल स्तर बढ़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप बाद का जल तटबंधों को तोड़कर आस-पास के क्षेत्र में फैल जाता है। इसके कारण धन-जन की हानि, पशुओं की हानि, अधिवासों का ध्वस्त होना, मिट्टी कटाव, भूमि क्षरण इत्यादि कई नुकसान उठाने पड़ते हैं। इतना ही नहीं नदियों में बाढ़ के कारण कई बाँध प्राकृतिक रूप से बनते एवं टूटते हैं। कई मनुष्य निर्मित बांध टूट जाते हैं तथा हिमानी क्षेत्रों में हिम तथा बर्फ के पिघलने से पुनः बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो तुरन्त निदान चाहती है।

       सुदूर संवेदन तकनीक का उपयोग क्षेत्रों के प्रबोधन तथा विस्तार जानकारी के लिये किया जाता है। यह एक ऐसा साधन है जो अतिशीघ्र बाढ़ क्षेत्रों का निर्धारण, बाढ़ की बढ़ती व घटती प्रवृत्ति, नुकसान, प्रभावित क्षेत्र इत्यादि की जानकारी में प्रभावी भूमिका निभाता है। भौगोलिक सूचना प्रणाली में उपग्रहीय आँकड़ों का विश्लेषण कर जल प्लावित क्षेत्र की गणना, नुकसान, बाढ़ सम्भावित क्षेत्र तथा बाढ़ आने की पूर्व सूचना दी जा सकती है।

      इस प्रकार हम देखते हैं कि कई उपयोगकर्ताओं जैसे कि बाढ़ नियंत्रक संस्था, जल-विद्युत कम्पनी, संरक्षण संस्था, नगर नियोजक, आपतकालीन आधारित विभाग तथा जीवन बीमा विभाग द्वारा सुदूर संवेदन आँकड़ों का उपयोग किया जाता है। बाढ़ युक्त मैदान के मानचित्रण करने में पूर्व सरिता मार्गों तथा नदी विसर्प अति महत्वपूर्ण होते हैं। इनका निर्धारण सुदूर संवेदन उत्पादों के अवलोकन एवं विश्लेषण से लगाया जाता है जो बाद नियंत्रण योजना में अति सहायक होते हैं।

भूमि उपयोग मानचित्रण

          प्राकृतिक रूप से भूमि अलग-अलग तत्वों के अन्तर्गत होती है जैसे कि प्राकृतिक इनस्पति, जल, मरुस्थल, घास के मैदान, दलदल इत्यादि प्राकृतिक विशेषताओं के अनुरूप मनुष्य ने इसे आर्थिक क्रियाओं के अनुसार अलग-अलग उपयोगों में प्रयोग किया है। जैसे कि कृषि, वनीकरण, आवास, उद्योग, सड़क इत्यादि। प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक उपयोगों में लाई गई भूमि को सुदूर संवेदन तकनीक के द्वारा संसूचन किया जाता है। वे किसी भी उपयोग की मात्रा, विस्तार तथा वृद्धि एवं ह्रास क्रम को बहुत आसानी से अंकित कर सकते हैं। भूमि उपयोग या भूमि आवरण अध्ययन प्रायः बहु अन्तरविषयी होते हैं। सुदूर संवेदन का उपयोग निम्न विषयों में सफलतापूर्वक किया जाता है-

(i) प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्ध (Natural Resource Management)

(ii) प्राकृतिक वनस्पती प्रकारों के सर्वेक्षण (Surveys for Types of Natural Vegetation)

(iii) जंगली जानवरों के निवास संरक्षण (Wildlife Habital Protection)

(iv) नगरीय विस्तार अनाधिकृति कब्जा (Urban Expention/Encroachment)

(v) आपदा प्रबन्धन तथा मानचित्रण (Disaster Management and Mapping)

नगरों का अव्यवस्थित प्रसार (Urban Sprawl)

        जैसा कि सभी जानते हैं कि संसार की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। नगरों का तेजी से वृद्धि एवं प्रसार हो रहा है तथा अर्थव्यवस्था कृषि आधारित प्रणली से दूर हट है। नगरों के अव्यवस्थित विकास तथा अनियंत्रित प्रसार ने उपजाऊ कृषि भूमि एवं वन भूमियों पर अनाधिकृत कब्जा बढ़ा दिया है। नगरों की वृद्धि का प्रमुख कारण औद्योगिक विकास है जिसका किसी भी क्षेत्र के पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस प्रकार सुदूर संवेदन अध्ययनों से ग्रामीणों से नगरों में भूमि उपयोग परिवर्तनों के प्रबोधन से जनसंख्या का अनुमान लगाया जा सकता है। योजनाकार नगरों के अनियंत्रित प्रसार की दिशा का अनुमान लगा सकता है। पर्यावरण की दृष्टि से सबसे संवेदनशील आपदा क्षेत्रों का अनुमान लगाया जाता है।

         सुदूर संवेदन के द्वारा अलग-अलग कालों के अलग-अलग प्रकार के आँकड़े उपलब्ध होते हैं जिनके द्वारा नगरीय क्षेत्रों का तथा इनके खण्डों का मानचित्रण किया जा सकता है। बहु-कालिक आँकड़ों के विश्लेषण से नगरीय भूमि उपयोग परिवर्तन का अनुमान लगाया जा सकता है। वायुफोटोचित्रों के द्वारा नगरीय क्षेत्रों का मानचित्रण किया जाता है। इस प्रकार के मानचित्र नगर नियोजकों की सहायता प्रदान करते हैं।

समुद्री अनुप्रयोग (Ocean Application)

            समुद्रों से हमें कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। समुद्र महत्वपूर्ण भोजन एवं जीव-भौतिक संसाधनों की पूर्ति करते हैं। इनसे समुद्रीय यातायात किया जाता है जो सबसे सरल एवं सुविधाजनक है। मौसम प्रणाली के निर्माण तथा कार्बनडाई ऑक्साईड संग्रह में समुद्रों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रकार मछलियों के भण्डार केन्द्रों का अनुमान लगाने, जहाजों के मार्गों की जानकारी, मौसम तथा जलवायु दशाओं के परिवर्तनशीलता, तूफान की जानकारी इत्यादि के लिये समुद्री गतियों का अध्ययन करना अति आवश्यक है। तूफानों की पूर्व जानकारी से समुद्रतटीय क्षेत्रों में अधिवासों को बचाया जा सकता है।

           समुद्र तटीय क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। समुद्री तट रेखा के आर्थिक विकास तथा बदलते भूमि उपयोग के लिये उत्तरदायी होती है। यद्यपि समुद्री तट अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न होते हैं। उपयुक्त समुद्र तटों के पास संसार की 600 जनसंख्या निवास करती है। समुद्री तट मानवीय क्रियाकलापों के लिये अति महत्वपूर्ण है। कई सरकारी संस्थायें जो यहाँ मानवीय क्रियाकलापों के प्रमाण से सम्बन्धित है उनको विचित्र परिवर्तनों जैसे कि तटीय अपरदन, प्राकृतिक जन्तुओं का ह्रास, नगरीकरण, प्रवाही तथा समुद्र की ओर प्रदूषण इत्यादि को नये रूप में प्रबोधन (Moniter) करने की आवश्यकता है।

            अधिकतर समुद्री गतिशीलता तथा उनके प्रभावों का मानचित्रण एवं प्रबोधन सुदूर तकनीक के द्वारा आसानी से किया जा सकता है। सुदूर संवेदन आँकड़ों का प्रयोग कर समुद्र के सतह का तापमान तथा मछलियों के सम्भावित बाहुल्य क्षेत्रों की नित्य रूप से सूचनायें प्राप्त हो सकती है। नोवा- ए.वी.एच.आर. इस प्रकार के अनुप्रयोग कर रहा है। इसी प्रकार आई.आर.एस.पी.3 मॉस वी आँकड़ों की सहायता से समुद्र में निलंबित अवसाद, पीले वर्णक (Yellow Pegment) और क्लोरोफिल की मात्रा का निर्धारण, समुद्रतटीय क्षेत्र विशेषकर छोटे बन्दरगाहों का प्रबन्ध और आई. आर.एस.(सी.) के आँकड़ों से तटीय क्षेत्रों के विकास का अध्ययन किया जा रहा है।

             सुदूर संवेदन के विभिन्न वर्तमान समुद्रीय अनुप्रयोग निम्न रूप में दिये गये हैं-

1. समुद्रीय प्रतिरूपों की पहचान (Ocean Pattern Identification)

2. धारायें एवं प्रादेशिक संचारण प्रतिरूप (Currents and Regional Circulation Pattern) का अध्ययन

3. लहरें, भंवर, उथला जल भाग (Waves, Eddies, Shallow Water) की गतियों का अवलोकन

4. तूफान की भविष्यवाणी ( Storm Forecasting) करना

5. हवा तथा लहरों की जानकारी देना

6. मछलियों के भण्डार तथा समुद्री जीवों का मूल्यांकन करना

7. जल के तापमान का प्रबोधन (Water Temperature Monitoring) करना

8. जल-विशेषताओं (Water Quality) का अवलोकन करना

9. समुद्रीय उत्पादकता (Ocean Productivity) का अनुमान लगाना

10. तेल प्रसार (Oil Spill) की जानकारी प्राप्त करना

11. जहाजरानी (Shipping) के क्षेत्र में प्रयोग

12. समुद्री परिवहन (Ocean Transport) में सहायक

13. ज्वारीय प्रभाव (Tidal Effects) का अवलोकन

14. समुद्र तटीय आकृतियों का मानचित्रण (Mapping of Shoreline Features)

15. समुद्रीय वनस्पति मानचित्रण (Coastal Vegetation Mapping)

वानिकी (Forestry)

          वन सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है जो भोजन, निवास, जंगली जीव, ईंधन तथा कई वन उत्पाद प्रदान करते हैं। वनों के संरक्षण का मुख्य मुद्दा यह है कि प्राकृतिक एवं मानवीय क्रियाओं के कारण प्राकृतिक वनस्पति आवरण में बहुत कमी आ रही है। आग तथा बीमारी प्राकृतिक कारणों में प्रमुख है। इसी प्रकार कटान, जलाना, अनाधिकृत कब्जा तथा भूमि उपयोग परिवर्तन आदि कई मानवीय कारक है जो जंगलों के ह्रास के लिये उत्तरदायी है।

          प्रायः यह देखा जाता है कि मनुष्य जंगलों को केवल उत्पादन के लिये समझता है न कि स्वयं जंगलों के लिये। व्यापारिक विदोहन से अधिक वनों के क्षेत्रफल एवं आवरण में कमी की समस्या कई व्यापारिक कारणों से भी पैदा हुई है। इनमें सबसे प्रमुख हैं वनों को काट कर कृषि भूमि तथा चरागाहों में परिवर्तित कर देना तथा नगरीयकरण के कारण भूमि उपयोग में भारी परिवर्तन होना। दून घाटी में इस प्रकार के उदाहरण देखने को मिलते हैं।

       सूखा पड़ना भी एक कारण है जो लोगों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वनों का रास्ता दिखाता है । इनके अतिरिक्त मरुस्थलीय अतिक्रमण, भूमिगत जल में कमी, आग लगना तथा प्राकृतिक आपदायें (जैसे तूफान, लू, भूकम्प) इत्यादि कई ऐसे कारण हैं जो सीधे वनों के ह्रास के लिये जिम्मेदार है। प्रश्न यह उठता है कि इन विनाशकारी तत्वों की जानकारी व प्रबोधन कैसे किया जाय जिससे इन समस्याओं का तुरन्त समाधान किया जा सके। वनों के ह्रास से कई पर्यावरणीय समस्यायें भी उत्पन्न हुई हैं। जंगलों के धुँए से पूरा वायुमण्डल प्रदूषित होता है और वायुमण्डल में कार्बनडाई आक्साइड गैस की मात्रा बढ़ती है।

         सर्वप्रथम आवश्यकता इन समस्याओं के प्रबोधन की है तत्पश्चात् उनके प्रबन्धन की योजना बनाने की। ऐसी स्थिति के लिये त्वरित एवं उपयुक्त साधन सुदूर संवेदन है जो इस प्रकार के परिवर्तनों की जानकारी हमें देता है। वानिकी के अन्तर्गत सुदूर संवेदन के प्रमुख उपयोग निम्न है-

1. वन आवरण का मानचित्रण (Forest Cover Mapping)

2. वनस्पति घनत्व का मानचित्रण (Forest Density Mapping)

3. वन विभाग का मानचित्रण (Deforestation Mapping)

4. आग का निर्धारण तथा मानचित्रण (Forest Fire Identification Maping)

5. बायोमास आकलन (Biomass Estimation)

6. प्रजातियों का आकलन (Species Estimation)

7. वृद्धि स्टाक आकलन (Growing Stock Estimation)

वन विनाश एवं वनीकरण का मानचित्रण (Deforestion and Aforestation Mapping)

              बहुकालिक सुदूर संवेदन आँकड़े प्राकृतिक वनस्पति की परिवर्तनशीलता को दर्शाते हैं। पूर्व वर्षों के बिम्बों की तुलना वर्तमान बिम्बों से करने पर वनों के आकार एवं ह्रास के विस्तार को मापा जा सकता है। उच्च विभेदन वाले आँकड़े वनों के विलुप्त होने के विस्तृत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। सुदूर संवेदन युक्तियों ऐसे क्षेत्रों की भी सूचनायें प्रदान करते हैं जो प्रायः मनुष्य की पहुँच से बाहर होते हैं। कभी-कभी ऐसे क्षेत्र जहाँ पर अवैधानिक कटान निरन्तर जारी हो और उसकी कोई जानकारी न हो तो ऐसे क्षेत्रों के लिए सुदूर संवेदन आँकड़े प्रयोग किये जा सकते हैं।

प्रजातियों की पहचान एवं मानचित्रण (Species Identification and Mapping)

          सुदूर संवेदन एक ऐसा साधन है जो विभिन्न वन प्रकारों की पहचान एवं सीमांकन तीव्रता से कम समय में करता है। यद्यपि यही कार्य परम्परागत साधन से बहुत लम्बे समय में अपूर्ण रूप से किया जाता है। सुदूर संवेदन में आँकड़े अलग-अलग मापक पर उपलब्ध होते हैं जो स्थानीय एवं क्षेत्रीय माँग की पूर्ति करते हैं। वृहत मापनी पर प्रजातियों की पहचान बहुस्पेक्ट्रल हाईपरस्पैक्ट्ल या वायु फोटो आँकड़ों से की जा सकती है जबकि लघु मापनी पर प्रजातियों के आवरण एवं सीमांकन, रडार या बहुस्पैक्ट्रल आंकड़ा विश्लेषण से ज्ञात किया जा सकता है।

      इमेजरी एवं प्राप्त सूचनाओं को पुनः जी.आई.एस. में एकीकृत कर कई अन्य सूचनायें प्रजातियों के विषय में प्राप्त की जा सकती है। जी.आई.एस. पुनः कई प्रकार की सूचनायें भी प्रस्तुत करता है जैसे कि ढाल, सीमायें, सड़क, अधिवास इत्यादि। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग प्रति दो वर्ष के अन्तराल पर सम्पूर्ण भारत के लिये सुदूर संवेदन आँकड़ों की सहायता से वानिकी मानचित्र तैयार करता है।

वनों में आग का मानचित्रण (Forest Fire Mapping)

          जंगलों में आग बड़ी तीव्रता से फैलती है तथा अधिवासों, जंगली जीवों, लकड़ी पूर्ति कम करने तथा संरक्षित क्षेत्रों के विनाश के लिये उत्तरदायी है। आग के प्रसार के नियंत्रण की आवश्यकता के लिये पर्याप्त सूचनाओं की आवश्यकता होती है। किस प्रकार बचे हुये जंगलों को आग से बचाया जाय इसके लिये निदान ढूँढने की आवश्यकता होती है।

सुदूर संवेदन के उपयोग

वनों में आग का मानचित्रण

       सुदूर संवेदन का उपयोग वन क्षेत्रों के अग्नि के प्रबोधन तथा संसूचना के लिये किया जा सकता है। आगे लगने के बाद प्रजातियों में पुनः पुर्नवृद्धि होती है। इस तरह के अध्ययनों में सुदूर संवेदन एक निगरानी करने वाले की भाँति कार्य करता है तथा निरन्तर संवेदन सुविधायें प्रदान करता है। कभी-कभी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो मनुष्य की पहुँच से बाहर होते हैं। सुदूर संवेदन ऐसे क्षेत्रों की आग की जानकारी व प्रसार की सूचना सम्बन्धित लोगों तक पहुँचाता है। NOAA, AVHRR तापीय आँकड़े तथा GOES के जलवायु सम्बन्धी आँकड़े की सहायता से सक्रीय अग्नि प्रसार का निर्धारण किया जा सकता है जबकि ऑप्टीकल संवेदन, धुँए, धुन्ध या अँधेरे से छुप जाता है।

          सुदूर संवेदन आँकड़ों से जले भाग व जल रहे भाग के सम्बन्ध में अलग-अलग जानकारी प्राप्त होती है जिससे आग की दिशा व गति का पता लगाया जा सकता है। इस तकनीक से आग के बचाव तथा पहुँच वाले क्षेत्रों में निचले स्तर से योजना बनाने के लिये पर्याप्त सूचनायें प्राप्त होती हैं। इसे आग से लड़ने के लिये तार्किक सहायता प्राप्त होती है। आग लगने के एक वर्ष बाद किसी एकल विम्ब द्वारा प्रजातियों के पुनर्उत्पादन स्तर की जानकारी ली जा सकती है। इसी प्रकार बहुकालिक संवेदक द्वारा वनस्पति की वृद्धि का आकलन किया जा सकता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. सुदूर संवेदन के उपयोग पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the applications of remote sensing.)


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अध्याय-13 मौसम सम्बन्धी उपकरण

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-13 मौसम सम्बन्धी उपकरण

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. खाली जगहों को भरिए-

1. दैनिक तापमान में सेल्सियस पैमाने मापते हैं ।

2. शरीर का तापमान फारेनहाइट पैमाने में मापते हैं।

3. वायुदिशा दर्शक में तीर की पूँछ वायु चलने की दिशा में हो जाती है।

4. वर्षा की मात्रा रेनगेज से मापते हैं।

ii. मिलान कीजिए:-

                     उत्तर-

1. रेनगेज- वर्षा की मात्रा

2. विंडवेन- पवन की दिशा

3. थर्मामीटर- तापमान

iii. प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. दैनिक तापमान से क्या समझते हैं?

उत्तर- दिन-प्रतिदिन के अधिकतम और न्यूनतम तापमान को दैनिक तापमान कहते हैं।

2. सोचकर बताएँ कि किसी जगह पर दिन भर के तापमान में भिन्नता क्यों होती है?

उत्तर- किसी जगह पर दिन भर के तापमान में भिन्नता के कारण हैं सूर्य से मिलने वाला ताप। प्रात:काल में तापमान कम रहता है। जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाता है वैसे-वैसे तापमान बढ़ता जाता है। ठीक 2 बजे दिन में तापमान सर्वाधिक होता है।

    अब जैसे-जैसे सूर्य पश्चिम की ओर ढलते जाता है, वैसे-वैसे तापमान भी कमता जाता है। संध्या में वह सर्वाधिक कम हो जाता है। फिर जैसे-जैसे रात बीतती जाती है वैसे-वैसे तापमान कम होते जाता है। इस प्रकार सुबह चार बजे का तापमान न्यूनतम हो जाता है।

3. अधिकतम और न्यूनतम तापमान क्या होता है? किसी अखबार में देखकर आज का अधिकतम और न्यूनतम तापमान लिखिए।

उत्तर- किसी दिन के 24 घंटे के तापमान में जो आँकड़ा अधिकतम बताता है और जो आँकड़ा न्यूनतम बताता है वही उस दिन का अधिकतम और न्यूनतम तापमान होता है।

        आज बिहार के विभिन्न शहरों का तापमान निम्नलिखित रहा-

बिहार के विभिन्न शहरों का अधिकतम और न्यूनतम तापमान ºC में (26.12.2022)
पटना 25 13.4
गया 25.4 14
भागलपुर 24 15.2
पूर्णिया 25 14
बाल्मीकिनगर 24.6 12

4. मौसम संबंधी उपकरणों के नाम लिखिए तथा बताइए कि वे किस-किस काम आते हैं?

उत्तर- मौसम संबंधी उपकरणों के नाम निम्नलिखित हैं:-

⇒ थर्मामीटर- इससे अधिकतम और न्यूनतम तापमान मापा जाता है।

⇒ विंडबेन- इससे हवा की दिशा ज्ञात की जाती है। 

⇒ रेनगेज- इससे वर्षा की मात्रा मापी जाती है। 

5. मौसम केन्द्र पर दैनिक तापमान कैसे मापते हैं? लिखिए।

उत्तर- मौसम केन्द्र पर दैनिक तापमान मापने के लिए तापमापी अर्थात् थर्मामीटर नामक एक उपकरण रहता है। इस उपकरण को काँच की नली से बनाया जाता है। इसका आकार अंग्रेजी के ‘U’ अक्षर जैसा होता है। न्यूनतम ताप नली से लगी काँच की एक और धुंडी होती है, जिसमें पारा भरा रहता है।

    अधिकतम ताप वाली नली में अल्कोहल भरा होता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे पारा फैलता है और अधिकतम तापवाली नली का अल्कोहल ऊपर चढ़ता है।

     स्केल को देख कर पता करते हैं कि अभी का अधिकतम तापमान क्या है। तब ताप के बाद चुम्बक से पारा को नीचे कर लिया जाता है। फिर पारा ऊपर चढने लगता हैं न्यूनतम तापमान पर रूक जाता है। दिन विशेष का अधिकतम और न्यूनतम तापमान नोट कर लिया जाता है और रेकॉर्ड बुक में चढ़ा लिया जाता है। यह क्रिया प्रतिदिन दी जाती है।

6. हवा की दिशा किस उपकरण से पता की जाती है। चित्र बनाकर नाम लिखिए।

उत्तर- हवा की दिशा ‘विंडवेन’ नामक उपकरण से पता की जाती है।

मौसम सम्बन्धी उपकरण

मौसम सम्बन्धी उपकरण

7. वर्षा मापक यंत्र का चित्र बनाइए।

उत्तर- 

रेनगेज

रेनगेज

8. आपके यहाँ मौसम सम्बन्धी आँकड़े कहाँ एकत्र किये जाते हैं? पता कर के लिखिए।

उत्तर- हमारे राज्य बिहार में पटना अवस्थित वेधशाला में मौसम सम्बन्धी आँकड़े एकत्र किये जाते हैं।

क्रियाशीलन

1. पवन दिशा दर्शक बनाइए एवं उन तरीकों की सची बनाकर कक्षा में प्रकाशित कीजिए जिनसे हम हवा की दिशा का अनुमान लगा सकते है।

संकेत: छात्र स्वयं करें।



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