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22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत     

        मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सिद्धांतों में जेट स्ट्रीम सिद्धांत को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धांत का विकास तब हुआ जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जेट स्ट्रीम वायु की खोज की गई। जेट स्ट्रीम वायु की खोज करने का श्रेय अमेरिकी सैनिकों को जाता है। लेकिन जेट स्ट्रीम का वैज्ञानिक अध्ययन करने का श्रेय रॉक्सबी महोदय को जाता है।

       सर्वप्रथम एम.टी. यीन महोदय ने जेट स्ट्रीम को भारतीय मानसून से जोड़‌कर मानसून उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयास किया। पुन: कोटेश्वरम् महोदय ने उनके सिद्धांत में संशोधन प्रस्तुत करते हुए इसको प्रस्तुत किया। पुन: 1973 ई० में पूर्व सोवियत संघ के वैज्ञानिक और भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘MONEX’ अनुसंधान के द्वारा जेट स्ट्रीम सिद्धांत को पुष्ट करने का प्रयास किया। वर्तमान समय में भारतीय एवं अमेरिकी उपग्रह प्रणाली भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हैं।

‘जेट स्ट्रीम’ क्या है?

       जेट स्ट्रीम हवा ऊपरी वायुमण्डल में तीव्र गति से चलने वाली हवा है। इन हवाओं का संबंध पृथ्वी के धरातल पर बनने वाले वायुदाब परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों ने जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल के माध्यम से करने का प्रयास किया है।

          मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जेट हवा चार प्रकार की होती है:-

(1) ध्रुवीय रात्रि जेट हवा- इनका प्रभाव समताप मण्डल में होता है।

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा- इनका विस्तार 45º से 65º अक्षांशों के बीच होता है 

(3) उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा- इनका विस्तार 20º से 40º अक्षांशों के बीच होता है। यह भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं।

(4) उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट हवा- यह एक अस्थाई जेट स्ट्रीम है जो ग्रीष्म काल में दक्षिण एशिया के ऊपर बहती है। भारत में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के उद्भव में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

        उपरोक्त चार जेट हवाओं में से अंतिम दो जेट हवाओं का संबंध मानसून उत्पत्ति से है। एम. टी. यीन महोदय ने बताया कि उपोष्ण पछुवा जेट हवा जाड़े की ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से गुजरती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर होती है। इसलिए इसे ‘पछुवा जेट हवा’ भी कहते हैं।

मानसून उत्पत्ति का जेट

चित्र: पछुवा और पूर्वा जेट हवा

      पछुवा जेट हवा का तापमान कम होता है। ऐसी स्थिति में यह हवा नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है। नीचे बैठने की प्रवृति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप उच्च भार / उच्च वायुदाब के क्षेत्र में बदल जाता है। फलतः धरातल पर हवाएं स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है। ये हवाएँ ही “उत्तरी-पूर्वी मानसून” कहलाता है।

          ग्रीष्म ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है, क्योंकि एम. टी. यीन महोदय के अनुसार 15 मार्च के बाद से ही भारत के दक्षिणी भाग और श्रीलंका के जाफना प्रायद्वीप के ऊपर एक नवीन जेट स्ट्रीम वायु का जन्म होता है जिसे “उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा” कहते है। जैसे-2 सूर्य का उतरायण होता जाता है, वैसे-2 इस जेट हवा का विस्तार उत्तर की ओर होने लगता है। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है।

         पूर्वा जेट हवा के विकास होते ही उपोष्ण जेट हवा उत्तर की ओर खिसक कर चीन के तारिम बेसिन के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। पूर्वा जेट हवा के गर्म होने के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की हवा को ऊपर की ओर खींचने लगता है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर LP का निर्माण होता है। इसी LP को भरने के लिए अरब सागर से हवाएँ दौड़ती है और “दक्षिणी-पश्चिमी मानसून” को जन्म देती है।

       कोटेश्वरम महोदय ने इस सिद्धांत की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल से किया है। जैसे- उनके अनुसार 15 मार्च के बाद ही तिब्बत का पठार दो कारणों से गर्म होने लगती है-

चित्र: त्रि-कोशिकीय मॉडल

(i) 5000 m समुद्र तल से तिब्बत के पठार का ऊँचा होना। और

(ii) बर्फ के पिघलने से बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा का परित्याग।

       इन दो कारणों के चलते तिब्बत के पठार की धरातलीय हवाएँ लम्बवत रूप से ऊपर उठने लगती है और तिब्बत के पठार के ऊपर HP का निर्माण कर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न करती है। इस प्रतिचक्रवातीय केन्द्र से हवाएँ मूलतः उत्तर और दक्षिण दिशा की तरफ अग्रसारित होती है। उत्तर की ओर चलने वाली हवा चीन की जलवायु को प्रभावित करती है जबकि दक्षिण की ओर चलने वाली हवा भारत की जलवायु को प्रभावित करती है।

      दक्षिण की ओर चलने वाली हवा फेरल के नियमानुसार उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलना चाहिए। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप पर इसकी दिशा पूर्णतः पूरब से पश्चिम की ओर होती है। इसे ही उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा या पूर्वा जेट हवा कहते हैं। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है। जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ठण्डी धरातलीय हवा को ऊपर की ओर खींच लेती है जिसके कारण छोटे-2 चक्रवातों का आगमन होता है। पूर्वा जेट हवा अरब सागर के ऊपर ठण्डी होकर बैठने की प्रवृति रखती है, जिसके कारण समुद्री क्षेत्र HP में बदल जाते हैं और अरब सागर से हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलकर दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को जन्म देते हैं।

चित्र : पूर्वा जेट हवा से दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति

      पुन: कोटेश्वरम महोदय ने बताया कि ग्रीष्म ऋतु के बाद सूर्य ज्यों ही दक्षिणायन होने लगता है त्यों ही तिब्बत के पठार के ऊपर बनने वाला निम्न वायुदाब पेटी का विस्तार प्रायद्वीपीय भारत और हिन्द महासागर तक हो जाता है, जिसके कारण समुद्र और प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर प्रतिचक्रवात की स्थिति उत्पन्न होती है।

       इस प्रतिचक्रवात से पुन: हवाएं दो दिशाओं में चलती है जो हवाएँ उत्तर की ओर अग्रसारित होती है वही वायु फेरल का नियम अनुसरण करते हुए पछुवा जेट हवा को जन्म देती है। यही पछुवा जेट हवा ठण्डी होकर भारतीय उपमहाद्वीप पर बैठने लगती है जिससे घरातल पर HP का निर्माण होता है। पुन: हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है।

चित्र: पछुआ जेट हवा से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति

         MONEX अनुसंधान तथा उपग्रह से लिए गए मानचित्रों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में मानसून की अनिश्चितता तथा बाढ़ और सूखाड़ के लिए “पूर्वा जेट हवा” उत्तरदायी है। इसमें कहा गया है कि पूर्वा जेट हवा का विस्तार जब प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाता है तब भारत में मानसून सामान्य रहता है और जब इसका विस्तार शिवालिक पर्वत और मैदानी क्षेत्र तक ही रह जाता है तो भारत में अनावृष्टि की स्थिति उत्पन्न होती है।

आलोचना

       मानसून की उत्पत्ति का व्याख्या करने वाला यह सबसे आधुनिक एवं वैज्ञानिक सिद्धांत है। लेकिन इसकी उत्पत्ति के संबंध में अभी भी प्रश्नचिह्न उठाये जाते हैं। इस पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है कि इसका विस्तार कभी प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाती है और कभी इसका विस्तार शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र तक ही रह जाता है। ऐसा क्यों? अतः इन दिशा में और भी वैज्ञानिक अनुसंसाधन किए जाने की आवश्यकता है।

नोट: जेट स्टीम सिद्धांत के अनुसार, उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा से उ०-पूर्वी मानसून और उष्णकटिबंधीय पूर्वा जेट हवा से द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

⇒ सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा (ठण्डी) का आगमन होता है एवं HP का निर्माण करता है और उतरायण से उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा (गर्म) का आगमन होता है तथा LP का निर्माण करता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर क्रमश: उ०-पूर्वी मानसून तथा द०-प० मानसून को जन्म देती है।

जेट स्ट्रीम की विशेषताएँ-

⇒ जेट स्ट्रीम का संचरण ऊपरी क्षोभमंडल में 7.5 से 14 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक संकरी पट्टी के रूप में पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर होता है।

⇒ ये त्रिकोणीय पवनें होती हैं, जिनकी लंबाई कई हजार किलोमीटर, चौड़ाई सैकड़ों किलोमीटर तथा गहराई कुछ किलोमीटर तक होती है।

⇒ इनका विकास 20º अक्षांश से ध्रुवों तक होता है। जेट स्ट्रीम मौसम में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं शीतकाल में इनका वेग तथा विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

⇒ ग्रीष्मकाल में उत्तर की ओर खिसकने से इनके विस्तार में कमी आ जाती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि की व्याख्या हेतु प्रस्तावित अभिनव सिद्धांत की विवेचना करें।

2. मानसून की उत्पत्ति से संबंधित नवीन सिद्धांत की विवेचना करें।

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

 5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास


भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास           

             भूवैज्ञानिक संरचना का तात्पर्य चट्टानों के भूगर्भिक इतिहास से है। भूगर्भिक इतिहास के अंतर्गत समय के संदर्भ में चट्टानों के विकास तथा आन्तरिक एवं बाह्य भौगोलिक कारकों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। किसी भी भौगोलिक भूखण्ड के इतिहास का अध्ययन चट्टानों के आधार पर किया जाता है। जेम्स हटन ने यहाँ तक कहा था कि ”चट्टान पृथ्वी के इतिहास के पन्ने हैं।”

       भूवैज्ञानिकों ने अलग-2 विधियों का उपयोग कर भूगर्भिक संरचना का अध्ययन करने का प्रयास किया है। भारत के संदर्भ में सर्वप्रथम टी०एच० हॉलैण्ड महोदय ने अध्ययन करने का प्रयास किया। इन्होंने भारतीय भूगर्भिक चट्टानों का अध्ययन कर “इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया” (1904) नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। इन्होंने भारतीय चट्टानों को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया:-

(1) पुराण समूह की चट्टान- पठारी क्षेत्र (जीवाश्म नहीं)।

(2) द्रविड़ समूह की चट्टान- पठारी क्षेत्र (परन्तु परतदार/रूपांतरित)।

(3) आर्यन समूह की चट्टान- हिमालय, उत्तर भारत के मैदान ।

(4) नवीन समूह की चट्टान- डेल्टाई, तराई, नदी के किनारे।

         पुराण समूह की चट्टान में वैसे चट्टानों को रखा जिसमें किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है। इस प्रकार का चट्टान भारत के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। प्रो. कृष्णन महोदय ने इस प्रकार के चट्टानों को “आर्कियन समूह की चट्टान” से संबोधित किया है। टी० एच० हलैण्ड ने द्रविड़ समूह की चट्टान में वैसे चट्टान को रखा है जो पठारीय भारत में ही मिलते हैं लेकिन वे परतदार प्रकार के हैं। ये चट्टानें परतदार होने के बावजूद इस पर बाह्य एवं आन्तरिक कारकों का इतना जब‌दस्त प्रभाव पड़ा है कि यह पूर्णतः रूपान्तरित हो चुके हैं।

        टी० एच० हालैण्ड ने आर्यन समूह के चट्टानों में हिमालय पर्वतीय क्षेत्र एवं उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में मिलने वाले चट्टानों को शामिल किया है। जबकि नवीन समूह की चट्टानों में डेल्टाई, तटीय और नदियों के किनारों पर मिलने वाले चट्टानों को शामिल किया है।

आलोचना

        टी० एच० हॉलैण्ड के द्वारा प्रस्तुत भूगर्भिक संरचना के वर्गीकरण से कई आधारों पर आलोचना की जाती है। जैसे-

(1) इनके वर्गीकरण में कोई निश्चित समय सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है।

(2) कुछ विद्वानों ने नामाकरण पर ही आपति उठायी है क्योंकि उनके वर्गीकरण से औपनिवेशिक शासन की गन्ध आती है।

(3) टी० एच० हॉलैण्ड ने कहा है कि हमारा वर्गीकरण कार्बन डेटिंग पर आधारित है लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से यह साबित हो चुकी है कि कार्बन डेटिंग के द्वारा मात्र 5700+ 50 वर्ष तक के ही चट्टानों का उम्र ज्ञात किया जा सकता है। लेकिन भारत में इससे भी पुराने चट्टानों का प्रमाण मिलता है।

     उपरोक्त आलोचनाओं के परिपेक्ष्य में भारतीय एवं यूरोपीय भूगर्भशास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया है कि भारतीय चट्टानों के संरचनात्मक अध्ययन अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित किये गये पैमान के आधार पर किया जाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उसी पैमाना को स्वीकार किया गया है जो यूरोपीय वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित किया गया है। इस पैमाने के अनुसार भूगर्भिक काल को चार महाकल्प (Era) में बाँटा गया है। पुन: महाकल्प को काल/कल्प (Period) और काल को युग (Epoch) में बाँटा गया है।

      अन्तर्राष्ट्रीय पैमाना के अनुसार चारो महाकल्प इस प्रकार है:-

(1) आर्कियोजोइक

(2) पैलियोजोइक

(3) मीसोजोइक

(4) केनोजोइक

         आर्कियोजोइक को पूर्व प्राथमिक काल में, पैलियोजोइक को प्राथमिक काल में, मीसोजोइक को द्वितीयक काल में रखा गया है। लेकिन केनोजोइक को तृतीयक एवं चतुर्थक काल में बाँटा गया है। कुछ भूगर्भशास्त्री चतुर्थक काल नियोजोइक महाकल्प के रूप में स्वीकार करते हैं।

       प्रत्येक महाकल्प में विकसित भारतीय चट्टानों की संरचनात्मक विशेषता इस प्रकार से है-

(1) आर्कियोजोइक

            इसे पूर्व प्राथमिक काल में रखा गया है। इस काल को पुन: दो कल्प में बाँटा गया है-

(I) आर्कियन कल्प और

(II) प्री-कैम्बियन कल्प

(I) आर्कियन कल्प को अजैविक कल्प भी कहा जाता है।  इसमें पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर 2500 मिलियन वर्ष पूर्व तक के निर्मित चट्टानों को शामिल किया जाता है। ये वे चट्टानें हैं जो भारतीय उपमहाद्वीय के आधारशीला का निर्माण करते हैं। इसे “पैंजिया परिवार का चट्टान” भी कहा जाता है।

         यह वह चट्टान है जो कभी भी समुद्र के नीचे नहीं गया है। लम्बी अवधि तक स्थलखण्ड के रूप में रहने के कारण मे चट्टानें अपरदित एवं विलुपित हो चुकी है। भारत में यह चट्टान धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देता है बल्कि इसी चट्टान के ऊपर अन्य चट्टानों के विकास हुआ है।

भारत की भूगर्भिक

चित्र: आर्कियन क्रम की चट्टानें

(II) प्री-कैम्बियन कल्प

        प्री-कैम्बियन कल्प की चट्टानों की आयु 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 60 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित की गई है। इस कल्प को पुनः दो भाग में बाँटते है।

(A) अजैविक क्रम की चट्टानें-धारवाड़ चट्टान 

(B) जैविक क्रम की चट्टानें- कुप्पा, विन्ध्य

       अजैविक क्रम की चट्टानों में वैसे चट्टानों को शामिल करते हैं जो जीवाश्म रहित है। इसे भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान मानते हैं। इसे ‘धारवाड़ चट्टान’ के नाम से भी जानते हैं। इस प्रकार के चट्टान 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच बना है। यह धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसमें लोहा, मैंगनीज, यूरेनियम, सोना, जैसे, धात्विक खनिज मिलते हैं। इस प्रकार की चट्टानें कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, झारखण्ड एवं उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों में पायी जाती है।

           जबलपुर से नागपुर के बीच में स्थित सॉसर श्रेणी की चट्टान, गुजरात के चम्पानेर श्रेणी के चट्टान और हिमालय पर्वत के गर्भ में मिलने वाले कुमायूँ & लद्दाख श्रेणी की चट्टान इसी काम के माने जाते हैं।

चित्र: धारवाड़ क्रम की चट्टानें

           जैविक प्री-कैम्ब्रियन चट्टानों को पुन: दो भागों में बाँटा जाता है-

(i) कुडप्पा समूह चट्टान और

(1) विन्ध्यन समूह की चट्टान।

          कुडप्पा समूह की चट्टान का निर्माण 1500-1000 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ है। जबकि विन्ध्ययन समूह की चट्टान का निर्माण 1000 मिलियन वर्ष पूर्व से 600 मिलियन वर्ष पूर्व। ये दोनों समूह की चट्टानें चूना पत्थर चट्टान के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रकार के चट्टानों से सूक्ष्म एक कोशीय प्राणियों के जीवाश्म के प्रमाण मिलता है। पुन: विन्ध्यन प्रकार के चट्टानों के क्षेत्र में ज्वालामुखी क्रिया के कारण चट्टानों में रूपान्तरण देखा जा सकता है। कहीं-2 पर वलन (मोड़) का भी प्रमाण मिलता है।

चित्र : विन्ध्यन क्रम की चट्टानें

             ज्वालामुखी क्रिया और वलन क्रिया के कारण ही विन्ध्यन समूह के चट्टानों से नीलम, पन्ना, हीरा, टोपाज जैसे- रंगीन पत्थर मिलते हैं। कुडप्पा समूह की चट्टान भारत के पूर्वी घाट के समान्तर उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मिलते है। भारत में कुडप्पा समूह की चट्टानों में पापाघानी श्रेणी की चट्टान, चेयार श्रेणी की चट्टान, कृष्णा घाटी श्रेणी की चट्टान और नल्लामलई श्रेणी के चट्टानों को शामिल करते हैं। जबकि विन्ध्यन समूह के चट्टानों का विकास विन्ध्याचल पर्वत के अनुरूप हुआ है। इसका विस्तार प० M.P. से बिहार के रोहतास  जिला तक हुआ है।

चित्र: कुडप्पा क्रम की चट्टानें

(2) पैलियोजोइक

      पैलियोजोइक का काल 600 मिलियन वर्ष पूर्व से 225 मिलियन वर्ष पूर्व माना जाता है। इसे प्राथमिक काल के अन्तर्गत रखा गया है। इसे पुन: छ: कल्प में बाँटते हैं। जैसे :-

(i) कैम्ब्रियन

(ii) आर्डोविसियन

(iii) सिल्यूरियन 

(iv) डिवोनियन

(v) कार्बोनीफेरस

(vi) पर्मियन।

        कैम्ब्रियन कल्प की चट्टानें भारत में नहीं पायी जाती हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन माने जाते हैं। पुन: पाकिस्तान के सॉल्ट रॉक पर्वत कैम्ब्रियन कल्प का ही माना जाता है। पुन: आर्डोविसियन, सिल्यूरियन और डिवोनियन कल्प की चट्टानें भी प्रायद्वीपीय भारत तथा मैदानी भारत में नहीं पाये जाते हैं। लेकिन भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि उपरोक्त तीनों कल्प की चट्टानें हिमालय के गर्भ में मिल सकते हैं।

       कार्बोनीफेरस कल्प की चट्टानें भारत में कई क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे- दामोदर, सोन, वर्द्धा, महानदी और गोदावरी नदी घाटी  में मिलने वाले कोयला इसके सर्वोत्तम उदा० है।

चित्र: गोंडवाना क्रम की चट्टानें

          वस्तुतः कार्बोनीफेरस कल्प तक विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे पैन्जिया कहा जाता था। पैन्जिया का अधिकांश भाग ग्लोपोप्टेरिस नामक वनस्पति से ढका हुआ था। लेकिन इस कल्प में हुए भूसंचलन क्रिया के कारण कई क्षेत्रों में वलन एवं भ्रंशन की घटना हुई। इसी क्रम में प्राकृतिक वनस्पतियाँ धरातल के अन्दर दब गये। उस पर अत्याधिक दबाव एवं ताप के कारण ये रूपान्तरित होकर कोयला में तब्दील हो गये। जिन क्षेत्रों में चुना पत्थर युक्त चट्टान और वनस्पति एक साथ दब गए उन क्षेत्रों में खनिज तेल का निर्माण हुआ है।

          परमियन कल्प की संरचना भी कोयले के लिए प्रसिद्ध है। इसका प्रमाण उड़ीसा के तालचेर क्षेत्र से मिलता है। इस कल्प में हिमयुग का भी आगमन हुआ था। इस हिमयुग का प्रभाव महानदी और दामोदर नदी घाटी तक देखा जा सकता है क्योंकि हिमानी के अपरदन से निर्मित बोल्डर का प्रमाण इन क्षेत्रों में उपलब्ध है।

(3) मीसोजोइक

          मीसोजोइक की आयु 225 मिलियन वर्ष पूर्व से 70 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच निर्धारित किया गया है। इसे द्वितीयक काल के अंतर्गत रखा गया है। इसे पुन: तीन कल्प में बाँटते हैं:-

(i) ट्रायसिक

(ii) जुरासिक

(iii) क्रिटेशियस

         ट्रायसिक कल्प में भी चुना पत्थर चट्टानों का विकास हुआ है। इसका प्रमाण मध्य प्रदेश  तथा महाराष्ट्र के सीमा पर स्थित महादेव की पहाड़ी और पंचेत की पहाड़ी में मिलता है।

      जुरासिक कल्प में भारत में कई संरचनाओं का विकास हुआ है। जैसे- बिहार और झारखण्ड की सीमा पर स्थित राजमहल की पहाड़ी, मध्य प्रदेश में जबलपुर के पास संगमरमर चट्टान राजस्थान के मकराना क्षेत्र की संगमरमर की चट्टान जुरासिक कल्प में विकसित हुए हैं।

       किटेशियस कल्प की चट्टान भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी कल्प में हुए दरारी ज्वालामुखी क्रिया के कारण होने वाले लावा उद्गार से दक्कन के पठार का निर्माण हुआ है। लावा के ऋतुक्षरण से ही भारत में काली मिट्टी का विकास हुआ है। महाराष्ट्र का पठार, विदर्भ का पठार, तेलंगाना का पठार, गिर की पहाड़ी, कर्नाटक का पठार  तथा बंगलोर का पठार क्रिस्टेशियस कल्प में ही बना है। क्रिटेशियस कल्प में नर्मदा और ताप्ती की भ्रंश घाटी और ब्रह्मपुत्र रैम्प घाटी का निर्माण हुआ है। 

चित्र: दक्कन ट्रैप निक्षेप

(4) केनोजोइक

        केनोजोइक की आयु 70 मिलियन वर्ष पूर्व से अब तक निर्धारित किया गया है। इसे दो काल में वर्गीकृत करते हैं:-

(क) तृतीयक काल (Tertiary Period)

(ख) चतुर्थक काल (Quartanary Period)

         तृतीयक काल को पुन: पाँच कल्प में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(i) पैलियोसीन

(ii) इयोसीन,

(iii) ओलीगोसीन

(iv) मायोसीन और

(V) प्लायोसीन

          जबकि चतुर्थक काल को पुन: दो कल्प में बाँटते है:-

(i) प्लीस्टोसीन और

(ii) होलोसीन

         तृतीयक काल का समय 70 मिलियन वर्ष पूर्व से 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित किया गया है। इसे हिमालय निर्माण का काल भी कहा जाता है। इस काल में गोंडवाना भूमि के उत्तर की ओर खिसकने के कारण टेथिस सागर के मलवा के उत्थान से हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई है। हिमालय की तीन प्रमुख श्रेणियाँ है:-

(i) महान हिमालय- जिसका निर्माण ओलिगोसीन से मायोसीन कल्प के बीच हुआ है।

(ii) मध्य हिमालय-  इसका निर्माण मायोसीन और प्लायोसीन कल्प के बीच हुआ।

(iii) शिवालिक पर्वत- इसका निर्माण  प्लायोसीन के अंतिम काल और प्लीस्टोसीन कल्प के बीच हुआ है।

        तृतीयक काल की चट्टानें गुजरात के रण और कच्छ में, असम के बैरल की पहाड़ी में मिलते हैं। ये मूलत: पैलियोसीन कल्प के चट्टानें हैं।

चित्र: तृतीय/टर्शियरी चट्टानें

           स्फीति, लाहुली, नारीक्रम, गजक्रम की चट्टानें ओलिगोसीन कल्प की मानी जाती है। असम के सूरमा घाटी और उत्तराखण्ड के कसौली घाटी की चट्टानों मायोसीन कल्प के मिलते हैं। जबकि दिहांग नदी घाटी (A.P.) तमिलनाडु में रामेश्वरम के पास पाण्डिचेरी, केरल के कोबलम जिला, आन्ध्र प्रदेश के नेल्लूर और गोदावरी में प्लायोसीन कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं।

भारत की भूगर्भिक संरचना

चित्र: चतुर्थक काल की चट्टानें

        चतुर्थक काल की आयु 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व से अब तक निर्धारित किया गया है। प्लीस्टोसीन कल्प की आयु 2.5 मिलियन से 10 हजार वर्ष के पूर्व के बीच निर्धारित की गई है। होलोसीन की शुरुआत 10 हजार वर्ष पहले हुआ था और वर्तमान समय में चल रहा है।

 

      प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक पर्वत का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा मेघालय का पठार, राजमहल की पहाड़ी से टूटकर उ०-पूर्व की ओर चला गया। जिससे राजमहल गैप का निर्माण हुआ। प्लीस्टोसीन कल्प में चार बार (गुंज, मिंडल, रिस और वुर्म) हिमयुग का आगमन हुआ। इस कल्प में अरब सागर के उत्तरी भाग के उत्थान से थार मरुस्थल का निर्माण हुआ तथा उड़ीसा का चिल्का झील बना।

            होलोसीन कल्प की चट्टानों के निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। उत्तर-भारत के मैदानी क्षेत्रों में खादर मिट्टी का निर्माण, नदियों के मुहानों पर डेल्टा का निर्माण और तटीय क्षेत्रों में पुलिन का निर्माण आज भी जारी है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में लगभग सभी कल्प की चट्टानें पायी जाती है, जिसका प्रमाण भारत के अलग-2 क्षेत्रों में मिलती है। इस भूगर्भिक काल का प्रभाव भारत के संरचना, उच्चावच इत्यादि पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भूगर्भिक चट्टानों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

      मानसून अपनी अनिश्चितताओं के लिए प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रस्तुत किये गये हैं। लेकिन कोई भी सिद्धांत इसकी उत्पत्ति एवं विशेषताओं का पूर्ण व्याख्या करने में सक्षम नहीं हैं। फिर भी मानसून की उत्पत्ति के संबंध में निम्नलिखित चार सिद्धांतों पर विचार करते हैं:-

(1) तापीय सिद्धांत- एडमंड हैली, बेकर और डडले स्टाम्प

(2) विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत- फ्लोन

(3) जेट स्ट्रीम सिद्धांत- रॉक्सबी, एम.टी. यीन, कोटेश्वरम

(4) अलनीनो सिद्धांत- गिल्बर्ट वाकर

(1) तापीय सिद्धांत 

        तापीय सिद्धांत का प्रतिपादन ब्रिटिश मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा किया गया था। यह सिद्धांत पृथ्वी की वार्षिक गति या सूर्य के उतरायण एवं दक्षिणायण होने पर आधारित है। वस्तुतः पृथ्वी की वार्षिक गति के प्रभाव से सूर्य की किरणें जून महीने में कर्क रेखा पर लम्बवत चमकती है। अर्थात सूर्य के उतरायण होने से भारतीय उपमहाद्वीप पर ग्रीष्म ऋतु की स्थिति होती है। सूर्य के लम्बवत किरण के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र गर्म होने लगती है।

        धरातल के गर्म होने से वायु भी गर्म होकर ऊपर उठने लगती है जिससे सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाती है दूसरी ओर हिन्द महासागर में सूर्य की तिरछी किरण पड़ने के कारण वायु ठण्डी ही रह जाती है। जिससे समुद्र के ऊपर उच्च वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है। फलतः वायु H.P. से L.P. की ओर अग्रसारित होने लगती है। लेकिन फेरल के नियमानुसार अग्रसारित होने वाली वायु दायीं ओर मुड़कर द०-प० मानसून को जन्म देती है। यही मानसून भारतीय उपमहाद्वीप में अधिकांश वर्षा करने के लिए जिम्मेदार है।

मानसून उत्पत्ति

       तापीय सिद्धांत को मौसम वैज्ञानिकों ने थोड़ा परिमार्जित करते हुए प्रस्तुत किया है। जैसे सूर्य का उत्तरायण होते ही उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र LP में बदल जाती है जिससे उतरी गोलार्द्ध की वाणिज्यिक हवा विषुवत रेखा तक नहीं पहुँच पाती है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के सामने विषुवत रेखा पर अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का निर्माण नहीं कर पाती है। लेकिन दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने वाली वाणिज्यिक हवा विषुवत रेखा तक पहुँचने की प्रवृति रखती है।

         दक्षिणी गोलार्द्ध की वाणिज्यिक हवा को विषुवतीय क्षेत्र में जब कोई अवरोध नहीं मिलता है तो उत्तरी गोलार्द्ध में यह प्रविष्ट कर जाती है। पुन: इस हवा पर फेरल का नियम लागू होने लगता है जिसके कारण यह द०-प० से उ०-पू० की ओर चलने लगती है। इसे ही द०-पश्चिम मानसून की संज्ञा देते हैं।

चित्र: तापीय सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति

      शीत ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है। जैसे सूर्य दक्षिणायण हो जाती है तथा उसकी किरण मकर रेखा पर लम्बत गिरने लगती है। भारतीय उपमहाद्वीप की तुलना में समुद्र गर्म होकर L.P. का निर्माण करती है जबकि स्थल तिरछी किरण प्राप्त करने के कारण H.P. में बदल जाती है। फलत: वायु स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होते लगती है। इस पर फेरल का नियम लागू होने के कारण यह उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलने लगती है। इसकी एक शाखा बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

चित्र: तापीय सिद्धांत के अनुसार उ०-पू० मानसून की उत्पत्ति

नोट:-

⇒ तापीय सिद्धांत के अनुसार सूर्य के उतरायण होने से द०-प० मानसून और दक्षिणायण होने से उ०-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है। 

⇒ ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण से उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र LP और हिन्द महासागर में HP का निर्माण होता है। फलत: वायु HP से LP की ओर चलने लगती है जिससे द०-प० मानसून की उत्पति होती है।

⇒ जाड़े के दिनों में सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर HP और हिन्द महासागर में LP का निर्माण होता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर फेरल के नियम का अनुसरण करते हुए उ०-पूर्वी मानसून को जन्म देती है।

आलोचना 

      तापीय सिद्धांत के विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायण होने पर आधारित है। सूर्य का उतरायण एवं दक्षिणायण होना नियत है। जबकि मानसून आने और जाने की तिथि अनियमित है। यह इस सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना है। पुन: यह सिद्धांत भारत में अतिवृष्टि और अनावृष्टि की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। फिर भी मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या का सैद्धांतिकरण करने में एक सफल प्रयास था।

(2) विषुवतीय पछुवा हवा का सिद्धांत

       इस सिद्धांत का प्रतिपादक फ्लोन महोदय हैं। इनके अनुसार द०-प० मानसून मूलत: विषुवतीय पछुवा हवा का एक विकसित रूप है। उनके अनुसार विषुवतीय पछुआ हवा की उत्पत्ति ITCZ  से जुड़ी हुई है।

       इस सिद्धांत के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होते ही ITCZ उत्तर की तरफ खिसक जाती है। यहाँ तक कि ITCZ भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। ऐसी स्थिति में भारतीय उपमहाद्वीप के सामने विषुवत रेखा पर ITCZ का निर्माण नहीं होता है लेकिन अरब सागर और अफ्रीका महाद्वीप के ऊपर ITCZ का निर्माण होता है। ITCZ में दोनों गोलार्द्ध की मिलने वाली वाणिज्यिक हवा पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकर पश्चिम से पूरब की ओर चलने लगती है जिसे “विषुवतीय पछुवा हवा” कहते हैं। इसी हवा को भारतीय उपमहाद्वीप पर निर्मित निम्न वायुदाब क्षेत्र चुम्बक की तरह अपनी ओर खींचने की प्रवृत्ति रखती है जिससे द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

      विषुवतीय पछुवा हवा का सिद्धांत एक प्रकार का तापीय सिद्धांत ही है लेकिन कुछ मायने में यह सिद्धांत भिन्न भी है। जैसे- विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न वायुदाब के निर्माण का दो कारण उत्तरदायी माने जाते है:

(i) सूर्य का उत्तरायण होना

(ii) ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना

      यह सिद्धांत भारत में होने वाले अनावृष्टि और अतिवृष्टि की व्याख्या का भी प्रयास करती है। जैसे अगर ITCZ का विस्तार उत्तर में शिवालिक पर्वत तक हो जाता है तो उत्तर भारत में तीव्र वर्षा होने के कारण बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। लेकिन जब ITCZ प्रायद्वीपीय भारत तक ही सीमित रहता है तो उत्तर भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       यह सिद्धांत मानसून की अनिश्चितता को भी स्पष्ट करने का प्रयास करता है। जैसे- इस सिद्धांत के अनुसार ज्यों-2 ITCZ उत्तर की ओर अग्रसारित होता है त्यों-2 मानसून का आगमन होता है। जब किसी कारणवश ITCZ के खिसकाव में बाधा उत्पन्न होती है तब ही मानसून के आने में देरी होती है।

चित्र: विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति

आलोचना

(i) इस सिद्धांत को तापीय सिद्धांत का ही प्रतिलिपि माना जाता है।

(ii) यह सिद्धांत विषुवतीय रेखा या तापीय रेखा तथा ITCZ के निर्माण पर कोई प्रकाश नहीं डालता है।

(iii) चूंकि इन दोनों का निर्माण सूर्य की स्थिति पर निर्भर करती है और सूर्य की स्थिति (उतरायण या दक्षिणायण होना) नियत है। ऐसे में ITCZ का खिसकाव नियत होना चाहिए।

     अत: इस प्रकार इस सिद्धांत को भी अमान्य घोषित कर दिया गया है।


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8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

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12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

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20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

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30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

20. मानसून क्या है?

20. मानसून क्या है?


मानसून क्या है?

      मानसून अनिश्चितताओं से भरा एक मौसमी हवा है जिसका प्रभाव सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों पर सदियों से देखा जा सकता है। यूनानी भूगोलवेता हिप्पार्कस ने सबसे पहले मानसूनी हवा के संदर्भ में अनुमान लगाया था। लेकिन मानसून की खोज करने का श्रेय अरब भूगोलवेत्ता अलमसूदी को जाता है। मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम से हुआ है जिसका तात्पर्य है मौसम के अनुसार चलने वाली हवा।

    अनेक भूगोलवेत्ताओं ने मानसून को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें सर्वमान्य परिभाषा ब्रिटिश भूगोलवेता हेली के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इनके अनुसार “यह एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है।” जैसे:-

मानसून क्या है

(नोट: हैली– मानसून एक वृहत समुद्री स्थलीय समीर है, जो 6 माह सागर से स्थल की ओर तथा शेष 6 माह स्थल से सागर की ओर चलती है।

अरब भुगोलवेत्ताओं द्वारा- ऋतुवत वायु  की  दिशा में परिवर्तन को मानसून पवन कहा जाता है।)

मानसून का प्रकार

      भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए बताया है कि मानसून दो प्रकार के होते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण कटिबंधीय मानसून- इसका विस्तार भारत उप महाद्वीप, उ०-पू० ऑस्ट्रेलिया, द०-पू० ब्राजील, पूर्वी अफ्रीका इत्यादि में हुआ है।

(2) शीतोष्ण प्रदेश की मानसून – इसका विस्तार जापान, कोरिया, पूर्वी चीन इत्यादि में हुआ है।

     स्पष्ट है कि भारत का मानसून उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे पुन: दो भागों में बाँटा गया है:-

(1) दक्षिण-पश्चिम मानसून

(2) उत्तरी-पूर्वी मानसून

     दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून में अन्तर

(i) द०-पश्चिम मानसून को ‘ग्रीष्मकालीन मानसून’ तथा उ०-पूर्वी मानसून को ‘शीतकालीन मानसून’ कहा जाता है। 

(ii) द०-प० मानसून ही भारत का प्रमुख मानसून है जबकि उ०-पूर्वी मानसून को गौण मानसून कहते हैं।

(iii) द०-प० मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर वर्षा करती है।

(iv) द०-प० मानसून के कारण भारत में लगभग 80% वर्षा होती है जबकि शेष वर्षा उ०-पूर्वी० मानसून और पछुआ विक्षोभ के कारण होती है।

(v) द०-प० मानसून भारत के अधिकांश क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है जबकि उत्तरी-पूर्वी मानसून पूर्वी तटीय क्षेत्र एवं तमिलनाडु के सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है।

(vi) द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से की जा सकती है जबकि उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

(vii) द०-प० मानसून की उत्पत्ति में उष्ण-पूर्वा जेट हवा का जबकि उ०-पू० मानसून की उत्पति में उपोष्ण पछुवा जेट हवा का योगदान है।

मानसून की विशेषताएँ 

(i) भारतीय मानसून अपने अनिश्चिताओं के लिए विश्व विख्यात है, तभी तो इसे औपनिवेशिक काल में यह कहा जाता था कि भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलता है क्योंकि भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रवेश 15 मई से मानी जाती है और 15 नवम्बर तक वह लौट जाती है। अगर किसी कारणवश इसके आने और जाने की तिथि में गड़बड़ी होती है या इस काल में लगातार 15 दिन वर्षा नहीं होती है तो भारतीय किसानों के फसल बर्बाद हो जाते हैं।

      पुनः इस काल में कहीं अतिवृष्टि की समस्या उत्पन्न होती है तो बाढ़ के कारण फसलें बर्बाद हो जाती हैं। अगर मानसून सामान्य रहा तो भारतीय किसानों के घर अन्न से भर जाते है। यही कारण है कि यह कहा जाता है कि “भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलता है”

      औपनिवेशिक काल में यह भी कहा जाता था कि “भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट का निर्माता है।” क्योंकि जिस वर्ष मानसून सामान्य रहती है उस वर्ष केन्द्र सरकार के द्वारा भारतीय लोगों को अनेक प्रकार की रियायतें दी जाती है।

      दूसरी ओर जिस वर्ष मानसून असफल रहता है उस वर्ष भारत की जनता रियायतों से वंचित रह जाती है। वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगती है।

(ii) मौसम विशेष की हवा- मानसून मौसम विशेष की हवा है, क्योंकि द०-प० मानसून ग्रीष्म ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर चलती है जबकि उ०-पू० मानसून शीत ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर चलती है। ऐसा सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायण होने के कारण होता है।

(iii) मानसून के कारण भारत में मुख्यतः दो प्रकार की वर्षा होती हैं।-

(a) पर्वतीय वर्षा और

(b) चक्रवातीय वर्षा

       भारत में पर्वतीय वर्षा मुख्यतः हिमालय के दक्षिणी भाग, उ०-पूर्वी भारत, तराई क्षेत्र, प० घाट के पश्चिमी ढाल के सहारे होती है जबकि शेष भारत में उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के कारण वर्षण का कार्य होती है।

      भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात का आगमन तीन बार होती है।

       प्रथम- मानसून आगमन के पूर्व (अप्रैल-मई) में पहली बार चक्रवात का आगमन होता है। इस चक्रवात को प० बंगाल में कालवैशाखी, असम में नार्वेस्टर, बिहार में अंधड़, पंजाब-हरियाणा में तूफान कहा जाता है। दक्षिण भारत में इस चक्रवात के कारण हल्की वर्षा रिकॉर्ड की जाती है जिसे ‘आम्रवृष्टि’ या ‘फूलों की वर्षा’ कहते हैं।

      दूसरा- चक्रवात का आगमन मानसून के दौरान होता है। यही चक्रवात मानसूनी हवा को समुद्रतटीय क्षेत्र से खींचकर आन्तरिक भागों में ले जाती है।

     तीसरा- चक्रवात का आगमन मानसून के समापन के दौरान होता है, इसके कारण पूर्वी तटीय क्षेत्र एवं तमिलनाडु में वर्षण का कार्य होती है।

(iv) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यंत ही अनियमित है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में औसतन 85 cm वर्षा होती है। जबकि वर्षा के वितरण का अगर अध्ययन किया जाय तो पाते हैं कि मासिनराम में लगभग 1100 cm वर्षा होती है जबकि जम्मू और कश्मीर के लेह एवं लदाख क्षेत्र तथा राजस्थान के रामगढ़ नामक क्षेत्र पर 25 cm जल से भी कम वर्षा होती है।

(v) मानसून के आने और जाने की तिथि अनिश्चित है। जैसे 15 मई के बाद ही मानसून को सक्रिय हो जाना चाहिए। पुन: 1 जून को पहली बारिश केरल के तट पर करते हुए 12-13 जुलाई के बीच भारतीय सीमा को लांघकर पाकिस्तान में प्रवेश कर जाना चाहिए लेकिन इस निर्धारित तिथि के अनुसार शायद ही मानसून का आगमन होता है।

      इसी तरह 15 अक्टूबर के बाद से इसमें लौटने की प्रवृति विकसित होनी चाहिए। लेकिन कभी-2 बहुत पहले ही या निर्धारित तिथि के बाद पीछे की ओर हटती है।

(vi) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। जैसे- कभी-2 एक ही महीना में अत्याधिक वर्षा दर्ज की जाती है जिससे बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। पुन: कई महीनों तक शुष्कता की स्थिति बनी रहती है जिससे सुखाड़ की समस्या उत्पन्न होती है।

(vii) मानसून की विश्वसनीयता काफी संदिग्ध है क्योंकि जिन क्षेत्रों में वर्षा 200 cm से अधिक होती है। उन क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 90% मानसून की सक्रिय होने की संभावना होती है। जबकि जिन क्षेत्रों में 50 cm से कम वर्षा होती है उन क्षेत्रों में 80% मानसून न आने की संभावना होती है।

निष्कर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त है। यही विशेषतायें भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को व्यापक तौर पर (रूप में) प्रभावित करती है।


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31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

         भारत दक्षिण एशिया में अवस्थित एक विशालकाय देश है जिसका क्षेत्रफल 32,87,263 km है। इसका अक्षांशीय विस्तार 8°4’N से 37°6’N के बीच एवं देशान्तरीय विस्तार 68°7′ से 97°25′ के मध्य है। भारत एक उत्तरी गोलार्द्ध का देश है जो प्राचीन काल के गोंडवाना भूखण्ड के ऊपर अवस्थित है। भूगोलवेताओं ने भारत को भौगोलिक संरचना एवं उच्चावच के आधार पर मुख्यतः चार भौतिक इकाइयों में बांटा है। जैसे-

(1) उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

(2) उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र

(3) दक्षिण भारत का पठारी क्षेत्र

(4) तटीय मैदानी क्षेत्र एवं द्वीपीय क्षेत्र

भारत का तटीय

चित्र: भारत की भौतिक इकाई

      भारत के दक्षिणी भाग 1600 km समुद्र के अंदर प्रक्षेपित है जिसके तीन ओर जलीय विस्तार हैं जिसके कारण प्रायद्वीप का निर्माण हुआ है। भारत की मुख्य भूमि समुद्र के साथ 6100 km समुद्री सीमा का निर्माण करती है। अगर द्वीपों के सीमा को जोड़ दिया जाय तो भारत की कुल समुद्री सीमा की लम्बाई 7516.6 km हो जाता है। भारत के तटीय क्षेत्र को मोटे तौर पर इसे दो भागों में बाँट कर अध्ययन करते हैं:-
(A) पश्चिमी तटीय मैदान

(B) पूर्वी तटीय मैदान

(A) पश्चिमी तटीय मैदान

       इसका विस्तार गुजरात से कन्याकुमारी तक हुआ है। इसके पश्चिम में अरब सागर और पूरब में पश्चिमी घाट पर्वत है। इसकी औसत चौड़ाई 64kn है। कहीं-2 पर पश्चिमी घाट पर्वत के कारण काफी संकीर्ण हो चुका है। मुम्बई के पास इसकी चौडाई मात्र 10 km रह जाती है जबकि नर्मदा एवं ताप्ती के मध्य इसकी चौड़ाई 80km हो जाती है। इस मैदान को पुन: कई उपभागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते हैं।

जैसे :-

(i) गुजरात का मैदान

(ii) कोंकण तट / मैदान

(iii) कन्नड़ का मैदान

(iv) मालावार का मैदान

        गुजरात के तटीय मैदान को पुनः दो भागों में बाँटते हैं।

(a) कच्छ का मैदान

(b) काठियावाड़ का मैदान
        कच्छ का मैदान पुनः दो भागों में वर्गीकृत है:-

(i) छोटा रण ऑफ कच्छ

(ii) बड़ा रण ऑफ कच्छ

       यह क्षेत्र 6 माह तक जल प्लावित रहता है। समुद्री जल से नमक का निर्माण किया जाता है। यह क्षेत्र भूकम्प प्रभावित क्षेत्र है। जगह-2 पर भूकम्प से निर्मित वलन का प्रमाण मिलता है।

      काठियावाड़ का मैदान गुजरात के दक्षिणी भाग में स्थित है। इस मैदान के मध्य में गिर की पहाड़ी अवस्थित है। इस मैदान में लावा निक्षेपण का प्रमाण मिलता है।

       कोंकण तट का विस्तार उत्तर में दमन से गोवा तक हुआ है। यह काफी संकीर्ण तटीय मैदान है। मुम्बई कोंकण तट के किनारे ही अवस्थित है। कोंकण रेलवे का विकास इसी तट के सहारे किया गया है। मरमागाँव, न्वाशेवा जैसे प्रमुख वंदरगाह का विकास यहाँ किया गया है।

      कनन्नड़ का तट मुख्यतः कर्नाटक में अवस्थित है। पश्चिमी घाट के कारण यह अति संकीर्ण तटीय मैदान बन चुका है। इसी मैदान के पूरब में गरसोप्पा जलप्रपात अवस्थित है।

     मालाबार तट का विस्तार केरल राज्य में हुआ है। इसका उत्तरी सीमा मंगलोर से प्रारंभ होता है और अंत दक्षिण में कन्याकुमारी के पास होता है। यहाँ विशेष स्थलाकृति कयाल (पश्चजल स्थलाकृति) का विकास हुआ है।

     पश्चिमी तटीय मैदान की कुछ सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार से है। जैसे:-

(1) यह मैदान सीधा है।

(2) इस मैदान में जगह-2 पर बालू के टीले मिलते है।

(3) इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है।

(4) तेज गति से नदी के जल प्रवाह होने के कारण डेल्टा का अभाव मिलता है लेकिन नदियों का मुहाना ज्वार नद‌मुख का निर्माण करती है।

(5) यह मैदान पर्याप्त वर्षा ग्रहण करने के कारण सालों भर आर्द्र बनी रहती है।

(6) पश्चिमी तट पर कई प्राकृतिक पोताश्रय(बंदरगाह) का निर्माण हुआ है। जैसे- मुम्बई।

(7) गुजरात के तट पर उत्थान का प्रमाण मिलता है लेकिन कोंकण तट पर निमज्जन (धंसान) का प्रमाण मिलता है।

(B) पूर्वी तटीय मैदान

     यह मैदान पूर्वी घाट से लेकर बंगाल की खाड़ी के मध्य है। इसका दक्षिणी विस्तार कन्याकुमारी तक और उत्तरी विस्तार गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इसे उतरी सरकार और कोरोमंडल तट में बांटते हैं।

(नोट: कोरोमण्डल तट का विस्तार- तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश, उत्तरी सरकार का विस्तार- उड़ीसा)

       उत्तरी सरकार तट के मैदान को ‘उत्कल तट का मैदान’ भी कहते हैं।

पूर्वी तटीय मैदान की सम्मान्य विशेष‌ताएँ निम्नलिखित है।:-

(1) पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में यह काफी चौड़ा है।

(2) यह मैदान वक्राकार है।
(3) इस मैदान में नदियाँ बड़े-बड़े डेल्टा का निर्माण करती है।

(4) इस भाग में चिल्का, पुलीकट, कोलेरू जैसी झील मिलती है।

(5) कोरोमण्डल तट के पर निमज्जन का प्रमाण मिलता है।

(6) कोरोमण्डल तट के कावेरी डेल्टाई क्षेत्र अपनी उर्वरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

द्वीपीय समूह

      भारत के तटीय क्षेत्रों/मैदानों के नजदीक और उनसे दूर कई द्वीपों का विकास हुआ है। द्वीप एक ऐसी स्थलाकृति है जो जल के बीच में स्थित स्थल होता है। भारतीय द्वीपों का अध्ययन दो समूहों में बाँटकर करते है

(1) बंगाल की खाड़ी के द्वीप 

(2) अरब सागर के द्वीप

बंगाल की खाड़ी के द्वीप

      इसमें मुख्य द्वीप गंगा सागर द्वीप (गंगा नदी के मुहाना पर), न्यू मूर द्वीप (भारत), व्हीलर द्वीप (उड़ीसा), क्रोकोडाई द्वीप (मन्नार की खाड़ी में), हेयर द्वीप (तमिलनाडु), पम्बन द्वीप (तमिलनाडु) और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह है।

     बंगाल की खाड़ी में लगभग 572 द्वीप है। इनमें से अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सबसे प्रमुख है। इसमें द्वीपों की संख्या लगभग 300 है। इसका विस्तार लगभग 350 km तक हुआ है। केवल निकोबार में 19 द्वीप है। अण्डमान निकोबार द्वीप समूह असंगठित कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

       इसका निर्माण हिमालय पर्वत के निर्माण के दौरान संरक्षी सीमा के सहारे हुआ है।

    यहाँ बैरन और नारकोंडम जैसे ज्वालामुखी का भी प्रमाण मिलता है। इनमें से नारकोंडम मृत ज्वालामुखी का उदा० है जबकि बैरन प्रसुप्त ज्वालामुखी का उदाहरण है। यहाँ का इन्टरव्यू द्वीप और इंडरसन द्वीप चूना पत्थर से निर्मित है। अण्डमान द्वीप का सर्वोच्च चोटी माउण्ट सैडल (734m) और निकोबार की सर्वोच्च चोटी माउण्ट थुलीयर (642m) है। दक्षिण अण्डमान और लिटिल अंडमान के बीच में डंकन पैसेज अवस्थित है। भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु इंदिरा प्वाइंट निकोबार द्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है।

अरब सागर के द्वीप

     अरब सागर में तट से नजदीक और तट से दूर कई द्वीप मिलते हैं। जैसे- मूल द्वारिका (गुजरात), दीव (गुजरात), एलीफेण्टा द्वीप (महाराष्ट्र), अलियावेट, खलियाबेट द्वीप (नर्मदा नदी के मुहाना पर), जंजीरा द्वीप (महाराष्ट्र), हेनरी द्वीप, कैनेरी द्वीप, बुचर द्वीप (सभी महाराष्ट्र में), लक्ष्य द्वीप।

      अरब सागर में मिलने वाले द्वीपों में सबसे प्रमुख द्वीप लक्षद्वीप है। यह केरल से 280 km दूर पश्चिम में अवस्थित है। लक्षद्वीप प्रवाल भीति से निर्मित है। इसमें कुल 36 द्वीप है जिनमें से 11 द्वीप ही मानव बसाव के योग्य हैं। 11° चैनल लक्षद्वीप को दो भागों में बाँट देती है- उत्तर में अमिनी द्वीप और दक्षिण में कलानोरे द्वीप कहलाता है। मिनीकाय द्वीप लक्षद्वीप का सबसे दक्षिणी द्वीप है। एण्ड्रायट द्वीप लक्षद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप है। लक्षद्वीप की औसत ऊँचाई 9-11 मी० है।

निष्कर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत अपने भौतिक विशेषताओं एवं विविधताओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

प्रश्न प्रारूप 

1. भारत की भौतिक इकाइयों का नाम लिखिए तथा तटीय मैदान तथा भारतीय द्वीपों का वर्णन कीजिए।

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