Archives July 2022

19. Effect of Ocean Currents (महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)

19. Effect of Ocean Currents

(महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)


Effect of Ocean Currents (महासागरीय जल धाराओं का प्रभाव)

Effect of Ocean Currents

महासागरीय जलधाराओं का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ता है जो निम्नलिखित है-

(i) मौसमी दशाओं पर प्रभाव- महासागरीय धाराएँ जिन तटीय भागों से होकर गुजरती है, वहाँ की मौसम संबंधी दशाओं में पर्याप्त संशोधन करती है। इसका प्रभाव सबसे अधिक तटीय भागों के तापक्रम पर होता है। यह प्रभाव लाभदायक एवं हानिकारक दोनों प्रकार का हो सकता है। गर्म जलधारायें जब ठंडे भागों में पहुँचती है तो वहाँ का तापमान कम नहीं होने देती है। या सर्दियों में उन्हें अपेक्षाकृत गर्म रखती है।

          उत्तर-पश्चिमी यूरोप के तटीय देशों की आदर्श जलवायु का राज गल्फस्ट्रीम का बढ़ा भाग उत्तरी अटलांटिक धारा ही है। सर्दियों में इन तटीय देशों (ग्रेट ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, हॉलैंड आदि) का तापक्रम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। परंतु यही गल्फस्ट्रीम धारा यू.एस.ए.के तटीय भागों में ग्रीष्म काल में गर्म लहर(Heat Waves) को जन्म देकर तापक्रम को अचानक ऊँचा कर देती है जिसके कारण मौसम कष्टदायक हो जाता है। शरदकाल में भी पूर्वी यू.एस.ए. गल्फस्ट्रीम से लाभ नहीं उठा पाता, क्योंकि इस समय हवाएँ स्थल से जल की ओर चलती है।

(ii) ऊष्मा संतुलन पर प्रभाव- गर्म जलधाराएँ उष्णकटिबंधीय उच्च तापक्रम को उच्च अक्षांशों की ओर ले जाकर तापमान के वितरण में समानता लाने का प्रयास करती है। इस तरह पृथ्वी के क्षैतिज ऊष्मा संतुलन को स्थापित करने में गर्म जलधाराएँ पर्याप्त मदद करती है, क्योंकि निम्न अक्षांशों की अतिरिक्त ऊष्मा को उच्च अक्षांशों की ओर स्थानांतरित करती है।

(iii) हिमपात की स्थिति पर प्रभाव- इसके विपरीत ठंडी जलधाराएँ जहाँ से गुजरती है, वहाँ का तापक्रम अत्यंत नीचा कर देती है, जिसके कारण हिमपात की स्थिति आ जाती है। क्यूराइल, लैबराडोर, फॉकलैंड की ठंडी धाराएँ प्रभावित क्षेत्र में भारी हिमपात के लिए पूर्णतया जिम्मेदार है।

(iv) वर्षा पर प्रभाव एवं मरुस्थलों का विकास- गर्म धाराओं के ऊपर चलने वाले हवाएँ नमी धारण कर लेती है तथा प्रभावित क्षेत्रों को वर्षा प्रदान करती है। उदाहरण के लिए उत्तर-पश्चिमी यूरोप के तटीय भागों में उत्तरी अटलांटिक धारा तथा जापान के पूर्वी भाग में क्यूरोशियो धारा के कारण वर्षा होती है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट की वर्षा कुछ अंश तक गर्म धारा के कारण होती है। 

               इसके विपरीत ठंडी जलधाराएँ वर्षा रोकती है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कालाहारी तथा दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर अटाकामा मरुस्थलों के विकास में क्रमशः बेंगुएला तथा पेरू (हंबोल्ट) की ठंडी धाराओं का हाथ है। 

(v) कोहरा/कुहरा(Fog) का उत्पन्न होना- गर्म तथा ठंडी धाराओं के मिलन स्थल पर कोहरा उत्पन्न होता है जो जलयानों के लिए खतरनाक होता है। न्यूफाउलैंड के पास लैबराडोर ठंडी धारा तथा गल्फस्ट्रीम गर्म धारा के मिलने से ताप व्यतिक्रम (Inversion of Temperature) होने से घना कुहरा पड़ता है। इसी तरह जापान के पास क्यूराइल(ओयाशियो) ठंडी धारा तथा क्यूरोशियो गर्म जलधारा के मिलने से भी उत्पन्न होता है।

(vi) मत्स्य उद्योग/समुद्री बैंकों पर प्रभाव- जलधाराएँ मछलियों के जीवित रहने के लिए आवश्यक तत्व, ऑक्सीजन, भोजन को वितरित करने का कार्य करती है। धाराओं द्वारा प्लैंकटन नामक और घास का लाया जाना मछलियों के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है।

          गल्फस्ट्रीम धारा द्वारा ययह प्लैंकटन न्यूफाउंडलैंड तथा उत्तर पश्चिमी यूरोप तट पर पहुँचाया जाता है जिसके कारण वहाँ पर मत्स्य उद्योग अत्यधिक विकसित हो गया है। परंतु पेरू तट पर एलनीनो धारा के कारण प्लैंकटन  अदृश्य हो जाने पर मछलियाँ मर जाती है और इस उद्योग को क्षति उठानी पड़ती है।

         शीत क्षेत्रों में पैदा होने वाली खाद्य मछलियाँ ठंडी धाराओं के साथ गर्म प्रदेशों में आ जाती है। गर्म और ठंडी धाराएँ भी मिलकर विभिन्न प्रकार की मछलियों को जन्म देती है।

(vii) समुद्री मार्ग व्यापार पर प्रभाव-  महासागरीय धाराएँ जलमार्गों को निश्चित करती है, जिसके सहारे व्यापारिक जलयानों का परिवहन किया जाता है। परंतु धाराओं का यह प्रभाव प्राचीनकाल में अधिक था क्योंकि वर्तमान समय में शक्ति चालित जहाज हवा तथा धाराओं की दिशा का परवाह नहीं करते। 

              जहाँ पर गर्म एवं ठंडी धाराएँ मिलती है वहाँ पर कुहरा पड़ता है जो कि सामुद्रिक जहाजों के परिवहन में बाधा उत्पन्न करती है। जैसे न्यूफाउंडलैंड तथा जापान के तट के पास इसी तरह के कुहरे के कारण जलयानों को अपार क्षति उठानी पड़ती है। ठंडी धाराओं द्वारा बड़ी-बड़ी हिम शिलाएँ निम्न अक्षांशों की ओर लायी जाती है जिनसे टकराने के कारण जलयान क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। गर्म धाराओं के कारण ठंडे स्थानों के बंदरगाह खुले रहते हैं।

निष्कर्ष: 

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि महासागरीय जल धाराओं का मानव वातावरण एवं उनकी आर्थिक क्रियाकलापों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।


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18. Difference Between Current and Tides / महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर

18. Difference Between Current and Tides

(महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर)



Difference Between Current and Tides

महासागरीय जल धारा और ज्वार में अंतर⇒

         महासागरों एवं समुद्र का जल कभी शांत नहीं रहता। इनमें हमेशा विभिन्न प्रकार के गतियाँ होती रहती है। इन गतियों को मुख्यतः तीन भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वार-भाटा

(ii) जलधारा और

(iii) लहर

       इन सभी गतिओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ज्वार-भाटा माना जाता है, क्योंकि यह ऐसी गति है जिससे महासागर का संपूर्ण जल ऊपर से नीचे तक प्रभावित होता है। सागरीय गतियों में जलधाराएँ सर्वाधिक शक्तिशाली होती है क्योंकि इनके द्वारा सागरीय जल हजारों किलोमीटर तक वहा लिया जाता है।

महासागरीय जलधारा और ज्वार में अंतर

        महासागरीय जलधारा और ज्वार में अंतर निम्नलिखित आधार पर स्पष्ट कर रहे हैं-

(1) परिभाषा के आधार पर-

        महासागरीय नितल का ऊपरी जल एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने की गति को जलधारा कहते हैं। जबकि सूर्य तथा चंद्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा नीचे बैठने को ज्वार-भाटा कहा जाता है।

(2) उत्पत्ति के आधार पर अंतर-

         महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति पृथ्वी की घूर्णन गति, गुरुत्वाकर्षण बल, वायु की दिशा, वायुदाब, तापमान आदि द्वारा होती है। जबकि ज्वार की उत्पत्ति चंद्रमा तथा सूर्य के आकर्षण बलों द्वारा होती है। 

(3) गति के आधार पर अंतर-

    समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। जबकि ज्वार में लंबवत गति होती है। 

(4) समय के आधार पर अंतर-

       सागरीय जलधाराएँ सालोंभर गतिशील रहती है। जबकि ज्वार दिन एवं महीने के निश्चित समय अंतराल के बाद आते हैं।

(5) तापमान के आधार पर अंतर-

      महासागरीय धाराएँ तापमान के आधार पर दो प्रकार की होती है-

(i) गर्म जलधारा और

(ii) ठंडी जलधारा। जबकि ज्वार के साथ ऐसी बात नहीं है।

(6) जल एवं ऊष्मा के वितरण के आधार पर अंतर-

       महासागरीय जलधाराओं के द्वारा जल एवं ऊष्मा का महासागरों में क्षैतिज एवं लंबवत वितरण किया जाता है। जबकि ज्वार के कारण महासागरों में जल का स्थानांतरण नहीं होता बल्कि दोलन क्रिया द्वारा होती है। ज्वार के द्वारा ऊष्मा स्थानांतरण भी नहीं होता है। 

(7) जलवायु के प्रभाव के आधार पर अंतर-

      महासागरीय जलधाराएँ समुद्र तटीय भागों की जलवायु को प्रभावित कर वहाँ के तापमान या तो बढ़ा देती है या घटा देती है। जबकि ज्वार का जलवायु पर कोई अंतर नहीं पड़ता।

(8) प्रवाह के आधार पर अंतर-

      महासागरीय जलधाराएँ नदी के समान प्रवाहित होती है। जबकि ज्वार में जल का स्तर ऊपर उठता है।

(9) आर्द्रता ग्रहण करने के आधार पर अंतर-

     महासागरीय गर्म जल धाराएँ अपने ऊपर आर्द्रता के साथ चलती है। जबकि ज्वार अपने ऊपर आर्द्रता के साथ नहीं उठती है।

ज्वार भाटा के प्रभाव

      ज्वार-भाटा महासागरीय जल की एक ऐसी गति है जिसका प्रभाव मानव तथा पर्यावरण दोनों पर पड़ता है। यह ज्ञात है कि समुद्रों की अपेक्षा तटवर्ती क्षेत्रों में ज्वार का प्रभाव अधिक पड़ता है। ज्वार-भाटे का प्रभाव अन्य कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ता है। जैसे:-

(1) जलयानों के आगमन पर प्रभाव-

       समुद्रों में जलयानो के आगमन पर ज्वार-भाटे के प्रभाव को देखते हुए ज्वार-भाटे के समय और उससे उत्पन्न लहरों की ऊँचाइयों का पूर्वानुमान अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

(2) कचड़े के निस्तारण में सहायक-

       समुद्रों के तट पर स्थित महानगरों से निकलने वाले कचड़े को प्रायः सागर जल में डाल दिया जाता है जिससे पर्यावरण प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। ज्वार-भाटा द्वारा इन कचड़ों को बहाकर दूर समुद्र में पहुँचा दिया जाता है। इस प्रकार कचड़े के निस्तारण में ज्वार-भाटा से बड़ी सहायता मिलती है। ज्वारीय तरंगों से बंदरगाहों में जमा होने वाले मलवे की सफाई होती रहती है। किंतु कहीं-कहीं ज्वारीय तरंगों के द्वारा पोताश्रयों एवं पत्तनों में भारी मात्रा में मलवे का निक्षेपण किया जाता है जिसे साफ करने के लिए काफी धन खर्च करना पड़ता है।

(3) मत्स्य उद्योग पर प्रभाव-

      ज्वार-भाटा मत्स्य उद्योग को भी प्रभावित करता है। ज्वारीय तरंगे विभिन्न प्रकार के प्लैंकटन के वितरण द्वारा मछलियों के लिए भोजन की आपूर्ति करने में सहायक होती है जिनसे उनकी संख्या में वृद्धि होती है। अनेकों तटों पर ज्वार-भाटा के फलस्वरुप विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे समुद्री जीव, शंख सीप तथा अनेक ऐसे पदार्थ बिखेर दिए जाते हैं। इन्हें चुनकर लोग अपना जीविकोपार्जन करते हैं।

(4) बंदरगाहों पर प्रभाव-

       ज्वार-भाटे से सर्वाधिक लाभ संसार के उन बड़े-बड़े बंदरगाहों को होता है जो समुद्र से कुछ दूर नदियों के किनारे बनाए गए हैं। कोलकाता, लंदन एवं अन्य ऐसे बंदरगाह तक बड़े मालवाही पोतों को ज्वार के समय जल स्तर ऊँचा होने पर पहुँचाया जाता है। ज्वारों के अभाव में ऐसे जहाजों को दूर समुद्र में खड़ा रहना पड़ता है तथा माल की ढुलाई में काफी व्यय पड़ता है।

(5) विद्युत उत्पादन में सहायक-

        ज्वारीय तरंगों की ऊँचाई का लाभ उठाते हुए आधुनिक तकनीकी के अनुप्रयोग द्वारा विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। इनमें कोई संदेह नहीं कि कुछ तटों पर ज्वारीय तरंगों से विद्युत उत्पादन की विशाल संभावनायें पाई जाती है। किंतु इस दिशा में अभी सीमित प्रयास किए गए हैं। आशा की जाती है कि भविष्य में ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों की उपलब्धता क्षीण हो जाने पर समुद्र के तट पर बिजली उत्पन्न करने के लिए बड़ी संख्या में विद्युत शक्ति केंद्रों की स्थापना की जाएगी

(6) तटों के आकार-प्रकार पर प्रभाव-

      ज्वार-भाटा का तटों के आकार-प्रकार पर भी प्रभाव पड़ता है। ज्वारीय धाराएँ एवं तरंगे अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण क्रियाओं द्वारा तटों के स्वरूप परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान करती है।

निष्कर्ष:-

       उपर्युक्त तथ्यों के विवरण से स्पष्ट होता है कि ज्वार-भाटा का प्रभाव जलयानों के आवागमन, कचड़े की सफाई, मत्स्य उद्योग, बंदरगाह, विद्युत उत्पादन, तटों के आकार-प्रकार एवं पर्यावरण पर पड़ता है।



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17. Theories related to the origin of the coral reef / प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

17. Theories related to the origin of the coral reef

(प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत)


Theories related to the origin of the coral reef 

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत⇒

             प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं-

(1) अवतलन का सिद्धांत 

(2) स्थायी स्थल का सिद्धांत 

(3) हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

1. अवतलन का सिद्धांत

      अवतलन सिद्धांत को 1837 ई० में चार्ल्स डार्विन महोदय ने मार्शल द्वीप समूह के बिकनी द्वीप के संदर्भ में प्रस्तुत किया। कालांतर में अमेरिकी भूगोलवेत्ता 1883 में डाना, डेविस(1928), मोनार्ड(1964) इत्यादि ने सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण प्रस्तुत किया। 

        अवतलन के सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में प्रवाल जीवों का विकास किनारे पर तटीय प्रवाल के रूप में होता है। लेकिन जब किसी कारणवश भूगर्भिक हलचल के कारण तटीय क्षेत्रों का धँसान प्रारंभ हो जाता है तो पॉलिप भोजन ग्रहण करने हेतु ऊपर की ओर विकसित होना शुरू हो जाते हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने लगती है। फलत: तटीय प्रवाल भित्ति अवरोधक प्रवाल भित्ति का निर्माण होता है। अंततः जब संपूर्ण भाग का धँसान क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहीं कहीं पर  प्रवाल भित्ति रिंग के रूप में दिखाई देने लगते हैं जिसे वलयाकार प्रवाल भित्ति कहते हैं। 

        स्पष्ट है कि प्रवाल भित्तियों का विकास डार्विन के अनुसार क्रमिक रूप से होता है।सबसे पहले तटीय प्रवाल भित्ति ,उसके बाद अवरोधक प्रवाल भित्ति और अंत में वलयाकार प्रवाल भित्ति का विकास होता है। इसलिए अवतलन सिद्धांत को एक “उद्द्विदकासीय सिद्धांत” माना जाता है।
Theories related to the origin

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत प्रमाण

डाना, डेविस, मोनार्ड एवं स्वयं डार्विन महोदय ने अवतलन सिद्धांत प्रमाणित करने हेतु कई प्रमाण प्रस्तुत किए। डेविस महोदय ने अपना प्रमाण “कोरल रीफ प्रॉब्लम” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।

जैसे :-

(i) डार्विन ने कहा कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहीं पर विकसित हो रहे हैं जहाँ पर द्वीप का क्रमिक रूप से धँसान हो रहा है। इसे बिकनी द्वीप के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है।

(ii) अवतलन/धँसान के कारण प्रवाल भित्ति की मोटाई और लैगून की गहराई में लगातार वृद्धि होती है लेकिन धँसान की क्रिया मंद होती है जबकि उससे तेज गति में प्रवाल का विकास होता है।

(iii) प्रवाल भितियों में अलग-अलग काल में निर्मित प्रवाल भित्तियों का स्तर पाया जाता है। जो अवतलन के पक्ष में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। सोनार नामक यंत्र से जब हवाई द्वीप का अध्ययन किया गया तो वहाँ 330 मीटर गहराई तक अवतलन का प्रमाण मिला।

(iv) बिकनी और फुनाफूटी पर 700 मीटर गहराई कुएँ की खुदाई कर अवतलन का प्रमाण ढूंढा गया।

(vi) जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रवाल भित्तियों का निर्माण अवतलन से हुआ है तो प्रारंभ में यह अंदाज लगाया गया कि अवतलन वाले क्षेत्रों में पेट्रोलियम का संचित भंडार होना चाहिए। इसी अंदाज प्रवाली द्वीपों पर तेल कुओं की खुदाई की गई तो वहाँ से खनिज तेल का प्रमाण मिला।

आलोचना/दोष

(i) सोलोमन द्वीप और पलाऊ द्वीप मिलने वाले प्रवाल भित्तियों की व्याख्या अवतलन सिद्धांत से नहीं की जा सकती है।

(ii) डार्विन ने यह नहीं बताया कि समुद्री किनारों का अवतलन क्यों कब और कैसे हुआ।

(iii) कई ऐसे प्रवाल भित्ति है जिनका निर्माण धँसान वाले क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्थान वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर।

(iv) यदि यह मान लिया जाए कि प्रवाल भित्तियों का क्रमिक विकास अवतलन से हो रहा है तो अब तक सभी प्रवाल भित्तियों को विलुप्त हो जाना चाहिए था।

(v) अवतलन सिद्धांत में बताया गया है कि प्रवाल भित्तियों का विकास क्रमिक रूप से होता है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में एक ही स्थान पर एक ही प्रकार का प्रवाल भित्ति मिलना चाहिए। लेकिन कई क्षेत्र हैं जहाँ पर अनेकों प्रकार के प्रवाल भित्ति का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष:

      उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अवतलन सिद्धांत कुछ प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति की सटीक व्याख्या करता है। वहीं कुछ प्रवाल भित्ति के संदर्भ में इसके द्वारा सटीक व्याख्या नहीं होती है। फिर भी प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति की दिशा में किया गया प्रथम सैद्धांतिक कार्य के रूप में इसे मान्यता प्राप्त है।

2. स्थायी स्थल का सिद्धांत (Non Subsideence Theory)

      डार्विन के द्वारा प्रतिपादित अवतलन के सिद्धांत का खंडन करते हुए 1880 ई० में जॉनमर्रे ने प्रवाल भित्तियों के उत्पत्ति की व्याख्या करने हेतु स्थायी स्थल का सिद्धांत प्रस्तुत किया। मर्रे के अनुसार “प्रवाल भित्ति वैसे स्थानों पर मिलते हैं जहाँ पर अवतलन का कोई प्रमाण नहीं है। वे कहते हैं कि प्रवाली भित्ति समुद्र में वहीं पर विकसित होते है जहाँ पर स्थायी रूप से छिछला समुद्र या चबूतरा या डूबा हुआ द्वीप मिलते है। उनपर ही ये प्रवाली जीव विकसित होना प्रारंभ करते हैं ताकि समुद्री जल में लटके खाद्य पदार्थों का ग्रहण कर सके। ज्यों-ज्यों प्रवाली  जीवों की संख्या बढती जाती है, त्यों-त्यों प्रवाल भिति की मोटाई भी बढ़ती जाती है और अंततः समुद्रतल से ऊपर आकर वलयाकार प्रवाल भित्त्ति का निर्माण करते हैं।” प्रवाल प्रारंभ में लगभग तट से सटे सिकसित होने का प्रयास करते है लेकिन मृत प्रवाल के चुना पत्थर घुलने से लैगून की गहराई कम होती है तथा ज्यों-ज्यों प्रवाल की मोटाई बढ़ती है, त्यों -त्यों लैगून की गहराई भी घटती जाती है।

सिद्धांत के पक्ष प्रमाण

(1) मर्रे के अनुसार प्रवाल भित्ति की अधिकतम मोटाई 180 फीट तक होती है क्योंकि इसी गहराई तक अधिकतर चबूतरे समुद्र में डूबे हुए मिलते है। हिन्द और प्रशान्त महासागर में अनेक चतूबरों का प्रमाण मिलता है।

(2) मर्रे के सिद्धांत के पक्ष में लीकाण्टे, स्लूटर और सैम्पर जैसे भूगोलवेताओं ने भी इस सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण इक्कठे किये हैं-

          इन विद्वानों के अनुसार प्रवाली जीवों के शरीर से प्राप्त चुनापत्थर के घुलने  से आरंभ में छिछले लैगून का विकास होता है लेकिन कालांतर में प्रवाल भित्ति की मोटाई बढ़ने के करण लैगून गहरा होता जाता है।

आलोचना

1. स्थायी स्थल सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना लैगून की गहराई को लेकर है क्योंकि प्रवाल भित्ति की मोटाई बढ़ने से लैगून की की गहराई बढ़ती है बढ़ती है न कि घटती।

2. मर्रे के अनुसार अधिकतर समुद्री चबूतरे 180 फीट गहराई पर मिलते है। परन्तु ऐसा सर्वत्र होना असंभव है। कुछ विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया है कि अगर कोई उसकी चबूतरा कम गहराई वाला मिलता है तो क्या उस पर प्रवाल का विकास नहीं हो सकेगा।

3. मर्रे के अनुसार प्रवालों के शरीर से प्राप्त चुनापत्थर जल में घुलननशील होते हैं। अगर इस तथ्य को मान लिया जाय तो सभी प्रवाल भिति जल में घुलकर विलुप्त हो जायेंगें। लेकिन ऐसा नही हो रहा है।

निष्कर्ष :

      यह कहा जाता है कि यह एक ऐसा सिद्धांत/परिकल्पना है जो वैज्ञानिक एवं तार्किक विश्लेषण से काफी दूर है।

3.  हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

      हिमानी नियंत्रण सिद्धांत को अमेरिकी भूगोलवेता रेगिनॉल्ड डेली ने 1915 ई० में प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत को उन्होंने हवाई द्वीप के प्रवाल भित्तियों के अध्ययन करने के बाद प्रस्तुत किया था। यह सिद्धांत स्थिर स्थल सिद्धांत का विकलित स्वरूप है। हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार विश्व के सभी प्रवाल भित्तियों का निर्माण प्लिस्टोसीन कल्प में हुए हिमानीयुग के दौरान और उसके बाद हुआ है।

         हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार प्लिस्टोसिन कल्प में जब हिमयुग आया तो समुद्र का जल स्तर 76 मी० तक नीचे चला गया और सभी समुद्री प्रवाल समुद्री तल के ऊपर आ गये तथा अधिक शीत वातावरण के कारण प्रवाल जीवित न रह सके। लेकिन कुछ प्रवाल जीवित रहे। समुद्र के जलस्तर नीचे गिरने के कारण तरंगों के द्वारा जगह-जगह पर किये गए अपरदन से कई समुद्री चबूतरों का विकास हुआ। जब हिमयुग समाप्त होने लगा तो समुद्र का जल स्तर भी बढ़ने लगा तथा समुद्र मे जो प्रवाली जीव बच गये थे वे नये चबूतरों पर आकर भोजन ग्रहण करने हेतु नया उपनिवेश स्थापित करने लगे। उसके बाद ज्यों-ज्यों समुद्र का तल बढ़ा त्यों-त्यों प्रवाल की भी मोटाई बढ़ने लगी।

       हिमानी नियंत्रण सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में लैगून की गहराई कम थी। लेकिन बाद में समुद्र में जल स्तर बढ़ने के करण लैगून की गहराई में बढोत्तरी हुई।

      इस तरह स्पष्ट होता है कि डेली महोदय ने प्रवाल भित्तियों की उत्पत्ति के संबंध में एक वैज्ञानिक एवं तार्किक सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत की सबसे  बड़ी विशेषता यह है कि- 

1. प्रवाल भित्तियों के विकास की क्रिया को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा।

2. इस सिद्धांत से प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने के साथ-2 लैगून की गहराई भी बढ़ती है। इसका भी व्याख्या होता है। 

प्रमाण

  • प्रवाल भितियों में कई जगह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। 
  • डेली ने अपने सिद्धांत में बताया कि प्रवाल भित्तियों के ऊपरी तल चपटे होते हैं, जो कि अध्ययन से ऐसा प्रमाणित हो चुका है।
  • लैगून की गहराई की उन्होंने प्रवाल भित्तियों के बढ़ते मोटाई से नहीं जोड़ा है बल्कि समुद्र के बढ़ते हुए जलस्तर से जोड़ा है जो एक सटीक तर्क है।

आलोचना

  • डेली के अनुसार समुद्र तल 76 मी० तक नीचे चला गया था। लेकिन अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि समुद्र के जलस्तर में इससे भी अधिक गिरावट आई थी।
  • समुद्र के जलस्तर गिरने के बाद समुद्र के तरंगों के द्वारा अपदन से नये चबूतरों का विकास हुआ होगा। इन नये चबूतरों पर कीचड़ भी पाये गये होंगें तो ऐसे में कीचड़युक्त चबूतरे पर पुन, प्रवाल कैसे विकसित हो सकते हैं।
  • डेविस महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा कि पूरे विश्व का समुद्री जलस्तर एक समान ऊपर उठा है। ऐसे में बली लैगून की गहराई एक समान होना चाहिए लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।
  • डेली के अनुसार हिमयुग में 76 मी० की गहराई पर चबूतरों का विकास हुआ था। इसका तात्पर्य है कि प्रवाल भित्तियों की मोटाई 76 मी० तक ही होना चाहिए। लेकिन विकनी द्वीप जैसे अनेक द्वीप है जो 180 मी० से अधिक गहरे है।

एक के बाद एक दो सिद्धांतों की तुलना करना एक नजर में देखें-

निष्कर्ष

        उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कोई भी एक सिद्धांत प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। अत: अलग-अलग स्थानों पर विकसित प्रवास भित्तियों की व्याख्या अलग-अलग सिद्धांतों से की जा सकती है। अगर ऐसा संभव नहीं है तो सभी सिद्धांतों को मिलाकर एक एकीकृत सिद्धांत प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


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16. Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)

16. Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)


Coral Reaf (प्रवाल भित्ति)Coral Reaf

          समुद्र में कई प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं। उनमें से एक जीव का नाम पॉलिप है जिसके शरीर से चूना पत्थर चट्टानों का स्राव होता है। इसे मूँगा भी कहते हैं। यह झूंडों में अधिवासित होने की प्रवृत्ति रखता है। ये समुद्र के नितल पर भोजन की तलाश में इधर-उधर घूमते रहते हैं। ये भोजन की तलाश में छिछले समुद्री भाग पर जमा होने लगते हैं और भोजन ग्रहण करने के लिए एक-दूसरे पर चढ़ने लगते हैं जिसके कारण सबसे नीचे स्थित पॉलिप दबाव क्रिया के कारण मरने लगते हैं। 

       पॉलिप के मृत शरीर और उनके शरीर से निकले चूनापत्थर का निक्षेपण धीरे-धीरे छिछले समुद्री भूपटल पर जमा होने लगता है। घोंघा या मोलस्का, ब्रायोजोआ, कोरामेनिफेरा एवं अन्य हाइड्रोजोआ जैसे जीवों से प्राप्त पदार्थ चूना पत्थर के चट्टानों को जोड़ देते हैं जिसके कारण छिछले समुद्री भागों में गुंबदाकार या एक दीवाल के समान निक्षेपित स्थलाकृति बनती है, जिसे प्रवाल भित्ति कहते हैं।

प्रवाल भित्ति की विशेषताएँ

(1) प्रवाल भित्ति एक प्रकार के समुद्री जीवों के मरने एवं उनके निक्षेपण से निर्मित स्थलाकृति है।

(2) प्रवाल भित्ति का विकास विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर 35°N से 35°S अक्षांश के बीच होता है।

(3) उपयुक्त अक्षांशों में ही प्रवाल भित्ति का विकास छिछले सागरीय क्षेत्र में तथा तटीय भाग से थोड़ा दूर होती है।

(4) प्रवाल भित्ति प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तट पर विकसित होते हैं।

(5) प्रवाल भित्ति का आकार एक दीवार के समान या गुंबदाकार होता है।

(6) प्रवाल भित्ति और तट के बीच छिछले सागर मिलते हैं, जिसे लैगून कहते हैं।

भौगोलिक कारक/उपयुक्त परिस्थितिययाँ

(1) प्रवाल भित्ति के विकास हेतु 20 से 21℃ के बीच तापमान होना चाहिए। इसके लिए आदर्श वार्षिक तापमान 20℃ माना जाता है।

(2) प्रवाल भित्ति के विकास हेतु आदर्श गहराई 45 से 55 मीटर मानी जाती है क्योंकि इसी गहराई तक सूर्य की किरणें पहुंचती है। विभिन्न प्रकार के प्लैंकटन का विकास होता है।

(3) प्रवाल वहीं पर विकसित होते हैं जहां पर चूर मात्रा में प्लैंकटन मिलते हैं। प्रवाली जीव न तो अत्याधिक लवणता वाले और न ही अत्यधिक स्वच्छ जल में विकसित होते हैं इनके विकास हेतु 27 से 30 ‰ लवणता उपयुक्त मानी जाती है।

(4) प्रवाली जीवों के लिए कीचड़युक्त जल भी हानिकारक होता है। यही कारण है कि ये महाद्वीपों के किनारे से सटे विकसित नहीं होते बल्कि कुछ दूरी पर विकसित होते हैं।

(5) प्रवाल भित्ति का विकास तीव्र महाद्वीपीय ढालों पर नहीं होता क्योंकि उन ढालों पर न तो प्लैंकटन  स्थिर रह पाते हैं और न ही स्वयं पॉलिप झुंडो में अधिवास कर सकते हैं।

(6) प्रवाली जीवों का विकास प्राय: महाद्वीपों के पूर्वी तट पर होता है क्योंकि महाद्वीपों के पूर्वी तट पर विषुवतीय गर्म जलधारा का प्रभाव होता है जबकि पश्चिमी तट पर ठंडी समुद्री जलधारा के कारण ये विकसित नहीं हो पाते हैं।

(7) प्रवाल भित्तियों के विकास को प्रचलित हवा भी प्रभावित करती है। जैसे उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों के पूर्वी तट पर वाणिज्य हवा समुद्र से स्थल की ओर चढ़ती है जबकि पश्चिमी तट पर स्थल से समुद्र की ओर उतरती है। इसी तरह की घटना दक्षिणी गोलार्ध में भी होती है। पूर्वी तटीय भागों में वाणिज्य हवा के द्वारा प्लैंकटन को दूर-दूर से लाकर तटीय भागों में जमा कर दिया जाता है जबकि पश्चिमी तट में वाणिज्यिक हवा तट से दूर ले जाने की प्रवृत्ति रखते हैं।

         उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रवाल भित्ति विभिन्न प्रकार के भौगोलिक परिस्थितियों की देन है।

प्रवाल भित्ति के प्रकार (Types of Coral Reaf)

         महासागरों में मिलने वाली प्रवाल भित्तियों को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया गया है-

I आकृति तथा उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण

      आकृति तथा उत्पत्ति के आधार पर भित्तियों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है, जो निम्नलिखित हैं:-

(1) तटीय प्रवाल भित्ति (Fringing Coral Reaf)

(2) अवरोधक प्रवाल भित्ति (Barrier Coral Reaf)

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति (Atolls)

(1) तटीय प्रवाल भित्ति 

       तटीय प्रवाल भित्ति प्रायः तट के समानांतर विकसित होता है। इस प्रकार के प्रवाल भित्ति की मोटाई 50 से 55 मीटर तक होता है। लैगून अत्यंत छिछला होता है। लैगून की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक होती है। ऐसे लैगून को Boot Channel कहते हैं। लैगून के सतह पर मृत पॉलिप इधर-उधर बिखरे पाए जाते हैं। तटीय प्रवाल भित्ति में तट के किनारे वाले प्रवाल भित्ति का ढाल मंद होता है जबकि समुद्र की ओर वाला ढाल तीव्र होता है। अंडमान निकोबार और अमेरिका के फ्लोरिडा तट पर तटीय प्रवाल भित्ति पाए जाते हैं।

(2) अवरोधक प्रवाल भित्ति 

        अवरोधक प्रवाल का विकास के तट समानांतर होता है लेकिन तटीय प्रवालों की तुलना में यह निम्न संदर्भों में भिन्न होता है। जैसे –

(i) इनमें प्रवाल भित्ति की मोटाई 55 मीटर से अधिक होता है। आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर मिलने वाला ग्रेट बैरियर रीफ की मोटाई 180 मीटर तक है। 

(ii) इसमें लैगून की गहराई भी अधिक होती है और अवरोधक प्रवाल भित्ति के द्वारा विकसित लैगून की गहराई 60 मीटर तक होती है। 

(iii) अवरोधक प्रवाल भित्ति के दोनों ढाल तटीय प्रवाल भित्ति की तुलना में अधिक होता है। सामान्यत: स्थल भाग की ओर वाला ढाल 15° से 20° और समुद्र की ओर वाला ढाल 45° तक होता है। ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड के पूर्वी तट पर विश्व की सबसे लंबी अवरोधक प्रवाल भित्ति पाई जाती है जिसकी लंबाई 1920 किलोमीटर और मोटाई 180 मीटर, न्यूनतम चौड़ाई 16 किलोमीटर, अधिकतम चौड़ाई 144 किलोमीटर है। यह तट से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित है। अवरोधक प्रवाल भित्ति का प्रमाण न्यूकैलेडोनियन द्वीप समूह के पास भी मिलता है।

(3) वलयाकार प्रवाल भित्ति

       एटॉल प्रवाल भित्ति का विकास ज्वालामुखी द्वीपों के चारों ओर होता है। जब प्रवाल भित्ति धीरे-धीरे विकसित होकर समुद्र तल से ऊपर आ जाते हैं तो प्रवाल द्वीप का निर्माण करते हैं। वलयाकार/एटॉल प्रवाल भित्ति में मोटाई, लैगून की गहराई और ढाल तटीय और अवरोधक प्रवाल भित्ति की तुलना में अधिक होता है। वलयाकार प्रवाल भित्ति भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे –

(i) वैसा वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में लैगून दिखता हो। जैसे : लक्ष्यद्वीप।

(ii) वैसा वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में लैगून एवं छोटे-छोटे द्वीप दोनों मिलते हो। प्रशांत महासागर के अधिकतर प्रवाल भित्ति इसी प्रकार के हैं। 

(iii) वैसा प्रवाल भित्ति  जिसके मध्य में लैगून का अभाव हो। जैसे : हवाई द्वीप।

II स्थिति के आधार पर वर्गीकरण

          स्थिति के आधार पर वर्गीकरण स्थिति के आधार पर प्रवाल भित्तियों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया गया है-

1. उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियाँ (Tropical Coral Reefs):

      उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियों का अक्षांशीय विस्तार 25° उत्तरी अक्षांश से 25° दक्षिणी अक्षांश तक पाया जाता है। इन अक्षांशों के मध्य प्रवालों के लिए आवश्यक भौतिक दशाएँ आसानी से उपलब्ध होती रहती है। प्रशान्त महासागर, अटलांटिक महासागर तथा हिन्द महासागर में महाद्वीपों तथा छोटे-छोटे द्वीपों के निकट प्रवाल भित्ति अधिकता में पायी जाती है। महाद्वीपों के पूर्वी भाग में जहाँ उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र स्थित है, प्रवाल जीव अपनी भित्तियों की रचना करने में अधिक सफल होते हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में प्रायः ठण्डी धाराओं के बहने के कारण समुद्र के जल के तापमान में कमी आ जाती है तथा प्रवाल जीव मर जाते हैं।

     इसके विपरीत महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में गर्म धाराओं के बहने से प्रवालों का प्रमुख भोजन कैल्शियम अर्थात् चूना अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है, जिसके कारण प्रवाल जीव अपने विकास में उन्नतोत्तर वृद्धि करते रहते हैं। प्रवाल जीवों के लिए अत्यधिक तापमान हानिकारक होता है। इसलिए भूमध्य रेखा तथा इसके आस-पास प्रवाल जीव नहीं पाये जाते हैं। प्रशान्त महासागर के पश्चिमी तथा मध्य भाग में प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं। इन भागों में स्थित ज्वालामुखियों पर भी प्रवाल जीव अपनी भित्ति का निर्माण आरम्भ कर देते हैं। उष्ण कटिबंधीय प्रवाल भित्तियाँ भूगर्भ में होने वाली विभिन्न प्रकार की गतियों में भी उत्पन्न हो जाती हैं। महासागरीय धरातल भूगर्भ की गतियों के कारण 100 फीट तक ऊंचे उठ जाते हैं। कहीं-कहीं यह 400 फीट तक ऊंचा उठ गया है जिसे अपनी अलग-अलग परिस्थिति के कारण विभिन्न नामों से जाना जाता है।

2. सीमान्त प्रदेशीय प्रवाल भित्तियाँ (Marginal Belt Coral Reefs):

     सीमान्त प्रदेशीय प्रवाल भित्तियों का अक्षांशीय विकास 25° उत्तरी अक्षांश से 30° दक्षिणी अक्षांश तक विस्तृत है। लेकिन ये प्रवाल भित्तियाँ प्राचीन समय में पायी जाती थी। प्लीस्टोसीन हिमयुग में समुद्र के जल की सतह नीची हो जाने के कारण विकासोन्मुखी प्रवाल भित्तियों के प्रवाल अपनी जान गंवा बैठे। इनके साथ-साथ प्रवाल भित्तियाँ भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई। वर्तमान समय में ये प्रवाल भित्तियाँ बहुत पुराने टापू के रूप में पाई जाती है। इनमें से अनेक प्रवाल भित्तियाँ महासागरों में जल की सतह से कुछ ही नीचे काफी बड़े-बड़े चबूतरे के रूप में दिखलाई देती है। उदाहरण के लिए बरमूदा, बहामा तथा हवाई द्वीप आदि चबूतरे स्पष्ट रूप से दिखलाई देते हैं। किसी समय जब समुद्र के पानी का तल बढ़ जाता है तो प्रवाल जीव इन चबूतरों पर अपनी भित्तियों का निर्माण करना प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रकार की प्रवाल भित्तियाँ कम संख्या में मिलती हैं। उदाहरण के लिए छोटी एण्डीलीज की प्रवाल भित्तियाँ आदि।

प्रवाल भित्ति के उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

        प्रवाल भित्ति की उत्पत्ति के संबंध में तीन प्रमुख सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं-

(1) अवतलन का सिद्धांत 

(2) स्थायी स्थल का सिद्धांत 

(3) हिमानी नियंत्रण का सिद्धांत

 अवतलन का सिद्धांत 

     अवतलन सिद्धांत को 1837 ई० में चार्ल्स डार्विन महोदय ने मार्शल द्वीप समूह के बिकनी द्वीप के संदर्भ में प्रस्तुत किया। कालांतर में अमेरिकी भूगोलवेत्ता 1883 में डाना, डेविस(1928), मोनार्ड(1964) इत्यादि ने सिद्धांत का समर्थन करते हुए कई प्रमाण प्रस्तुत किया।

         अवतलन के सिद्धांत के अनुसार प्रारंभ में प्रवाल जीवों का विकास किनारे पर तटीय प्रवाल के रूप में होता है। लेकिन जब किसी कारणवश भूगर्भिक हलचल के कारण तटीय क्षेत्रों का धँसान प्रारंभ हो जाता है तो पॉलिप भोजन ग्रहण करने हेतु ऊपर की ओर विकसित होना शुरू हो जाते हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे प्रवाल भित्तियों की मोटाई बढ़ने लगती है। फलत: तटीय प्रवाल भित्ति अवरोधक प्रवाल भित्ति का निर्माण होता है। अंततः जब संपूर्ण भाग का धँसान क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहीं कहीं पर  प्रवाल भित्ति रिंग के रूप में दिखाई देने लगते हैं जिसे वलयाकार प्रवाल भित्ति कहते हैं। 

        स्पष्ट है कि प्रवाल भित्तियों का विकास डार्विन के अनुसार क्रमिक रूप से होता है।सबसे पहले तटीय प्रवाल भित्ति ,उसके बाद अवरोधक प्रवाल भित्ति और अंत में वलयाकार प्रवाल भित्ति का विकास होता है। इसलिए अवतलन सिद्धांत को एक “उद्द्विदकासीय सिद्धांत” माना जाता है।

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत प्रमाण

        डाना, डेविस, मोनार्ड एवं स्वयं डार्विन महोदय ने अवतलन सिद्धांत प्रमाणित करने हेतु कई प्रमाण प्रस्तुत किए। डेविस महोदय ने अपना प्रमाण “कोरल रीफ प्रॉब्लम” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।

जैसे :-

(i) डार्विन ने कहा कि वलयाकार प्रवाल भित्ति वहीं पर विकसित हो रहे हैं जहाँ पर द्वीप का क्रमिक रूप से धँसान हो रहा है। इसे बिकनी द्वीप के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है। 

(ii) अवतलन/धँसान के कारण प्रवाल भित्ति की मोटाई और लैगून की गहराई में लगातार वृद्धि होती है लेकिन धँसान की क्रिया मंद होती है जबकि उससे तेज गति में प्रवाल का विकास होता है।

(iii) प्रवाल भितियों में अलग-अलग काल में निर्मित प्रवाल भित्तियों का स्तर पाया जाता है। जो अवतलन के पक्ष में सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। सोनार नामक यंत्र से जब हवाई द्वीप का अध्ययन किया गया तो वहाँ 330 मीटर गहराई तक अवतलन का प्रमाण मिला।

(iv) बिकनी और फुनाफूटी पर 700 मीटर गहराई कुएँ की खुदाई कर अवतलन का प्रमाण ढूंढा गया।

(vi) जब यह स्पष्ट हुआ कि प्रवाल भित्तियों का निर्माण अवतलन से हुआ है तो प्रारंभ में यह अंदाज लगाया गया कि अवतलन वाले क्षेत्रों में पेट्रोलियम का संचित भंडार होना चाहिए। इसी अंदाज प्रवाली द्वीपों पर तेल कुओं की खुदाई की गई तो वहाँ से खनिज तेल का प्रमाण मिला।

आलोचना/दोष

(i) सोलोमन द्वीप और पलाऊ द्वीप मिलने वाले प्रवाल भित्तियों की व्याख्या अवतलन सिद्धांत से नहीं की जा सकती है। 

(ii) डार्विन ने यह नहीं बताया कि समुद्री किनारों का अवतलन क्यों कब और कैसे हुआ। 

(iii) कई ऐसे प्रवाल भित्ति है जिनका निर्माण धँसान वाले क्षेत्र में नहीं बल्कि उत्थान वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर। 

(iv) यदि यह मान लिया जाए कि प्रवाल भित्तियों का क्रमिक विकास अवतलन से हो रहा है तो अब तक सभी प्रवाल भित्तियों को विलुप्त हो जाना चाहिए था। 

(v) अवतलन सिद्धांत में बताया गया है कि प्रवाल भित्तियों का विकास क्रमिक रूप से होता है। इसका तात्पर्य है कि एक समय में एक ही स्थान पर एक ही प्रकार का प्रवाल भित्ति मिलना चाहिए। लेकिन कई क्षेत्र हैं जहाँ पर अनेकों प्रकार के प्रवाल भित्ति का प्रमाण मिलता है।

निष्कर्ष :

       उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अन्तः सागरीय रूपों में प्रवाल भित्तियों का अलग विशिष्ट महत्व है। यद्यपि अवरोधक तथा वलयाकार प्रवाल भित्तियों के निर्माण की समस्या अत्यन्त जटिल है। इसके संबंध में अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मतों का प्रतिपादन किया है लेकिन आज भी डार्विन तथा डाना के अवतलन सिद्धांत को अधिक महत्वपूर्ण माना है।


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15. Tides / ज्वार भाटा

15. Tides (ज्वार भाटा)


ज्वार भाटा (Tides)⇒

            समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पाई जाती है। जैसे- लहर, जलधारा, ज्वार-भाटा। सर्वप्रथम मर्रे महोदय ने ज्वार-भाटा को परिभाषित करते हुए कहा- “सूर्य और चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण समुद्री तल के नियमित रूप से ऊपर उठने और नीचे बैठने की क्रिया को ज्वार-भाटा कहते हैं।” मर्रे की इस परिभाषा से यह स्पष्ट नहीं होता है कि एक दिन में समुद्री तल कितनी बार ऊपर उठता है और कितनी बार नीचे गिरता है। अतः इस समस्या को मारमर महोदय ने अपनी परिभाषा में दूर करते हुए कहा “समुद्र का जल प्रतिदिन दो बार ऊपर उठता है और दो बार नीचे गिरता है तथा आकर्षण के फलस्वरूप समुद्र तल के ऊपर उठने तथा आगे बढ़ने को ज्वार तथा समुद्री तल के नीचे उतरने और पीछे की ओर हटने को भाटा कहते है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि नियमित रूप से समुद्री जल का ऊपर उठना और नीचे बैठना ही ज्वार भाटा कहलाता है।

        ज्वार-भाटा के संबंध में मानव प्राचीन काल से ही जानने को उत्सुक रहा है। सर्वप्रथम हेरोडोटस एवं पीथियस ने ज्वार-भाटा का संबंध चंद्रमा से बताया था। उसके बाद में रोमन भूगोलवेत्ता प्लिनी ने ज्वार-भाटा का विस्तृत अध्ययन किया। 17वीं शताब्दी में न्यूटन महोदय ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति का न केवल खोज किया बल्कि ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के संबंध में 1667 ई० में संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसी तरह 1755 ई० में लाप्लास ने गतिक सिद्धांत, 1833 ई० में विलियम वेवेल के प्रगामी तरंग सिद्धांत और आगे चलकर हैरिस महोदय ने 1928 ई०  दोलन सिद्धांत या स्थायी तरंग सिद्धांत प्रस्तुत किया।

ज्वार-भाटा की विशेषता

             ज्वार-भाटा सागरीय जल की लंबवत गति है। जिसकी पहचान केवल तट पर ही की जा सकती है। ज्वार-भाटा को तटीय भागों में नियमित रूप से प्रतिदिन देखा जा सकता है। समुद्र के किनारे किसी एक स्थान पर कोई व्यक्ति खड़ा है तो उसे 24 घंटे में दो बार समुद्र का जल ऊपर उठते हुए और दो बार नीचे बैठते हुए प्रतीत होता है। ज्वार-भाटा की उत्पत्ति पर पृथ्वी के घूर्णन गति और चंद्रमा के परिभ्रमण गति का प्रभाव पड़ता है। दो ज्वार या दो भाटा के बीच समय अंतराल नियत होता है। जैसे एक ज्वार अगर आज समुद्र के किनारे 10:00 बजे सुबह आई हो तो अगले दिन ज्वार ठीक 10:00 बजे नहीं आएंगे बल्कि 52 मिनट देर से आती है। दो क्रमबद्ध ज्वार के बीच 26 मिनट का अंतर होता है जबकि दो क्रमबद्ध ज्वार और भाटा के बीच 13 मिनट का अंतर होता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति में क्रमश: घूर्णन एवं परिभ्रमण गति से उत्पन्न देशांतरीय विषमता है। अतः इसी विषमता के कारण किसी भी देशांतर पर 24 घंटे के बाद जो ज्वार-भाटा आता है, वह 52 मिनट की देरी से आता है और यह देर होने का क्रम 27 दिन तक चलता रहता है। पृथ्वी पर एक समय में दो विपरीत देशांतरों पर आकर्षण बल के कारण ज्वार उत्पन्न होता है और ठीक उसी समय समकोणिक देशांतर पर भाटा उत्पन्न होता है।

ज्वार उत्पादक शक्तियॉं

        ज्वार उत्पन्न करने वाले शक्तियों में सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान है। सर्वप्रथम न्यूटन महोदय ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष में स्थित सभी ग्रह, नक्षत्र एवं तारे गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है तथा एक-दूसरे को आकर्षित कर रहे हैं। न्यूटन अपने गुरुत्वाकर्षण का नियम ने बताया है कि “दो पिंडों के बीच में आकर्षण शक्ति उनके द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती एवं दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है।” अर्थात जो पिण्ड जितना बड़ा होगा उसका आकर्षण शक्ति भी उतना ही अधिक होगा। इसके साथ ही जो पिंड जितना नजदीक होगा उसका भी आकर्षण बल उतना अधिक होगा। अतः इसी कारण से पृथ्वी पर सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव अधिक रहता है क्योंकि चंद्रमा सूर्य की तुलना में कम द्रव्यमान भले ही रखता है लेकिन सूर्य की तुलना में पृथ्वी से काफी नजदीक है। 

        चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी के व्यास का 1/3 भाग है। यह पृथ्वी का परिक्रमा लगभग 27 दिन में कर लेता है। चंद्रमा और पृथ्वी के केंद्र के बीच की दूरी 3.84 लाख किलोमीटर है। लेकिन दोनों के सतह के बीच की दूरी 3.776 लाख किलोमीटर है। इससे स्पष्ट है कि चंद्रमा के सामने पृथ्वी की धरातलीय सतह वाले भाग के ठीक पीछे से चंद्रमा का धरातल 3.904 किलोमीटर दूर रहता है। पृथ्वी का वह भाग जो चंद्रमा के सामने पड़ता है, चंद्रमा के आकर्षण शक्ति से सर्वाधिक प्रभावित होता है। जबकि पीछे वाला भाग चंद्रमा की आकर्षण शक्ति से सबसे कम प्रभावित होता है। चंद्रमा के सामने वाला पृथ्वी का समुद्री जल चंद्रमा की ओर खींचा जाता है और ज्वार की स्थिति उत्पन्न करता है। जबकि ठीक उसके विपरीत वाले भाग में अपसारी के कारण भी ज्वार की स्थिति उत्पन्न होती है। चंद्रमा के सामने और उसके विपरीत भागों के बीच समकोण पर आकर्षण बल के कम प्रभाव के कारण जल का सतह नीचा ही रह जाता है। जिसके कारण वहाँ भाटा की स्थिति उत्पन्न होती है।

        चंद्रमा की परिक्रमण दिशा और पृथ्वी की घूर्णन दिशा एक समान है तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा कर रही है। जब पृथ्वी 24 घंटे के घूर्णन गति के बाद पुनः चंद्रमा के सामने आती है तो चंद्रमा अपने परिक्रमण पथ पर 52 मिनट आगे बढ़ जाता है। फलत: पृथ्वी की नियत देशांतर को चंद्रमा के सम्मुख आने में 52 मिनट की देरी हो जाती है। इसी देर होने के कारण एक देशांतर पर ज्वार 24 घंटे के बाद 52 मिनट के देर से आती है।

ज्वार के प्रकार

        समुद्रीवेत्ताओं ने ज्वार के कई प्रकार बताया है। जैसे-

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)

(2) लघु ज्वार

(3) दैनिक ज्वार

(4) मिश्रित ज्वार

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)- यह पूर्णमासी (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन आता है क्योंकि इन दोनों दिनों में सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी तीनों एक सीधी रेखा में स्थित होते हैं। इस स्थिति को यूति-वियुति (Syzygy) कहा जाता है। पूर्णिमा के दिन वियुति (Opposition) कहते  हैं। जबकि अमावस्या के दिन यूति (Conjuction) की स्थिति उत्पन्न होती है।

      अमावस्या एवं पूर्णिमा के दिन सूर्य और चंद्रमा एक सीधी में होते हैं जिसके कारण समुद्री जल पर दोनों क्षेत्रों के आकर्षण बल कार्य करते हैं जिसके कारण प्रतिदिन आने वाले सामान्य ज्वार की तुलना में 20% अधिक जल ऊपर उठ जाता है। इसे ही “दीर्घ ज्वार” कहते हैं।

(2) लघु ज्वार-  प्रत्येक महीने शुक्ल  एवं कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी के रात में सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक-दूसरे के समकोण की स्थिति में होते हैं जिसके कारण दोनों के आकर्षण बल का प्रभाव एक साथ नहीं पड़ पाता है जिसके कारण एक देशांतर पर आने वाला प्रतिदिन के समान ज्वार की तुलना में 20% कमी जल ऊपर उठ पाता है। इसीलिए इसे लघु ज्वार करते हैं।

(3) दैनिक ज्वार- किसी स्थान पर एक दिन में आने वाले एक ज्वार और एक भाटा को दैनिक ज्वार कहते हैं। दैनिक ज्वार ही है जो 24 घंटे के बाद अगले दिन 52 मिनट देर से आती है। मैक्सिको की खाड़ी, फिलीपींस और आलास्का के तट पर आने वाले दैनिक ज्वार को देखा जा सकता है। 

अर्द्ध दैनिक ज्वार (Semi Daily Tides)- कई स्थानों पर 24 घंटे में दो बार ज्वार और दो बार भाटा आता है। एक बार आने के बाद 12 घंटे 26 मिनट बाद आने वाली ज्वार को अर्द्ध दैनिक ज्वार कहते हैं।

(4) मिश्रित ज्वार- दैनिक ज्वार और अर्द्ध दैनिक ज्वार को मिश्चित ज्वार कहते हैं। किसी भी स्थान पर भिन्न ऊंचाई वाले ज्वार को भी मिश्रित ज्वार कहते हैं।

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)- 

      जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे निकट (3.54 किमी०) होती है तो उसे उपभू (Perigean) और जब सबसे दूर (4.07 किमी०) में स्थित होती है तो उसे अपभू (Apogean) कहते हैं। 

        उपभू की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को उपभू ज्वार (Perigean Tides) और अपभू (Apogean Tides) की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को अपभू कहते हैं।

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)- ज्वार चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण उत्पन्न होती है। एक चंद्रमास में चंद्रमा कर्क रेखा, मकर रेखा और भूमध्य रेखा के सम्मुख बारी-बारी से आती है। जब चंद्रमा कर्क एवं मकर रेखा पर होती है तो उस वक्त उत्पन्न ज्वार  को अयनवृत्तीय ज्वार (मध्य अक्षांशीय ज्वार) कहते हैं लेकिन जब चंद्रमा विषुवत रेखा पर होती है तो उस स्थिति में उत्पन्न ज्वार को विषुवतीय ज्वार (भूमध्यरेखीय ज्वार )कहते हैं।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत 

       ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित प्रक्रिया को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतिकरण करने का प्रयास किया है। उन सिद्धांतों में प्रमुख सिद्धांत है:-

(i) संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)- न्यूटन

(ii) प्रगामी तरंग सिद्धांत (Progressive Wave Theory)- विलियम वेवेल

(iii) स्थायी तरंग सिद्धांत (Stationary Wave Theory)-  हैरिस

(iv) नहर सिद्धान्त- एयरी

(v) गतिक सिद्धान्त- लाप्लास

    उपरोक्त सिद्धान्तों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत संतुलन का सिद्धांत को माना जा रहा है जिनकी व्याख्या नीचे की जा रही है।

संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)

         संतुलन सिद्धांत के प्रस्तुतकर्ता सर आइजक न्यूटन रहे हैं। इन्होंने 1687 ई० में गुरुत्वाकर्षण के आधार पर संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। न्यूटन ने बताया कि विभिन्न आकाशीय पिंड एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। ये आकर्षण बल आकाशीय पिंडों के द्रव्यमान के गुणनफल पर और दूरी के वर्ग पर निर्भर करते हैं। इसे प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का प्रतिपादन किया।  

जहाँ,  F = आकर्षण बल

G = एक नियतांक

m1 = पृथ्वी का द्रव्यमान

m2 = चन्द्रमा का द्रव्यमान

r = दोनों आकाशीय पिण्डों के बीच की दूरी

        इस नियम के अनुसार न्यूटन ने बताया कि सूर्य एवं चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ही समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। कालांतर में लाप्लास महोदय ने इस सिद्धांत को और विकसित करने का प्रयास किया। लाप्लास के अनुसार ज्वार चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों के कारण उत्पन्न होती है। उन्होंने बताया कि जब कोई पिंड वृत्ताकार पथ पर गतिशील होती है तो आकर्षण शक्ति के विरुद्ध अपकेंद्रीय बल का जन्म होता है ताकि आकर्षण बल एवं अपकेंद्रीय बल के कारण संतुलन की स्थिति बना रहे।

       न्यूटन एवं लाप्लास दोनों ने बताया कि सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव पृथ्वी पर अधिक पड़ता है क्योंकि सूर्य की तुलना में चन्द्रमा काफी निकट है। चंद्रमा के ठीक सामने वाला पृथ्वी का भाग केंद्र की अपेक्षा 6400 किलोमीटर चंद्रमा के निकट होता है। जबकि इसके विपरीत वाला भाग चंद्रमा से 12800 किलोमीटर अधिक को दूर होता है जिसके कारण चंद्रमा के सम्मुख वाले पृथ्वी के भाग पर अधिक आकर्षण बल कार्य करता है जबकि ठीक उसके विपरीत आकर्षण बल का प्रभाव नगण्य होता है। विपरीत भाग में आकर्षण बल को संतुलित करने हेतु अपकेंद्रीय बल लगने लगता है। इन दोनों बलों के कारण ही समुद्री जल में उछाल आती है।जिससे ज्वार उत्पन्न होता है। 

आलोचना-     

       कई समुद्रवेत्ताओं ने इस सिद्धांत को दो आधारों पर आलोचना किया है। 

(1) पृथ्वी के धरातल पर अगर केवल जल ही होता तो इस सिद्धांत के क्रियाशील होने की संभावना थी परंतु, पृथ्वी के धरातल पर जल एवं स्थल का वितरण काफी असमान है। यहाँ ज्वार चंद्रमा की आकर्षण बल के कारण एक ही देशांतर पर एक ही बार ज्वार उत्पन्न नहीं होता है। 

(2) सागर की गहराई सागर की नितलीय उच्चावच, चक्रवात और चंद्रमा की कलाएँ इत्यादि का ज्वार-भाटा की उत्पत्ति में कोई उल्लेख नहीं किया है। 

(3) इस नियम के अनुसार प्रतिदिन एक देशांतर पर निश्चित अंतराल पर दो बार ज्वार और दो बार भाटा आना चाहिए। लेकिन इंग्लिश चैनल में एक दिन में चार बार ज्वार और चार बार भाटा आती है। इसके कारणों का भी स्पष्टीकरण न्यूटन ने नहीं किया है। 

(4) चंद्रमा के आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी की एक ही देशांतर पर एक समान रूप से पड़नी चाहिए थी और एक देशांतर पर जल का उत्थान भी एक समान होनी चाहिए था। लेकिन सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता। जैसे- उत्तरी अमेरिका के तट पर अवस्थित फंडी की खाड़ी में विश्व के सबसे ऊँचा ज्वार उत्पन्न होता है। यहाँ 15 से 18 मीटर तक जल में उछाल आता है जबकि ठीक उसी देशांतर पर इतनी ऊँची-ऊँची ज्वारें नहीं आती। 

निष्कर्ष:-  इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि न्यूटन के द्वारा प्रतिपादित संतुलन सिद्धांत की कई सीमाएँ हैं। इसके बावजूद ज्वार-भाटा के उत्पत्ति की व्याख्या करने वाला सबसे मान्य सिद्धांत है।


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