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2. एशिया का उच्चावच / Relief or Physiography of Asia

2. एशिया का उच्चावच 

(Relief or Physiography of Asia)


एशिया का उच्चावच⇒

                     विश्व का सबसे विशाल महाद्वीप एशिया पूर्वी गोलार्ध में स्थित है। भूमध्य रेखा से 10° दक्षिणी की ओर से लेकर 80° उत्तर की ओर स्थित होने के कारण यह दक्षिणी तथा उत्तरी दोनों गोलार्ध में अपनी भौगोलिक स्थिति लिए हुए है। एशिया महाद्वीप का अधिकांश भाग उत्तरी गोलार्ध में ही है। इस महाद्वीप की पूर्व से पश्चिम तक की स्थिति 25° पूर्वी देशांतर से लेकर 170° पश्चिमी देशांतर के बीच है। इस प्रकार एशिया महाद्वीप की स्थिति 90° अक्षांशों तथा 195° देशांतरों में है।
 
           इस महाद्वीप की उत्तर से दक्षिण की अधिकतम लंबाई 8580 किलोमीटर तथा पूरब से पश्चिम अधिकतम चौड़ाई 7720 किलोमीटर है। एशिया महाद्वीप का विस्तार 44030200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है। यह विशाल महाद्वीप तीन ओर से समुद्र से तथा एक ओर से स्थलखंड (यूरोप महाद्वीप) से घिरा हुआ है।
           
            एशिया महाद्वीप के उच्चावच को निम्नलिखित पाँच भागों में बाँट सकते हैं-
 
1. मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम
2. नदियों के मैदान
3. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार
4. उत्तर की निचली भूमि
5. द्वीप समूह मालाएँ
एशिया का उच्चावच

1. मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम

              विश्व का सबसे विशाल एशिया महाद्वीप अपनी धरातलीय विशेषताओं के कारण संसार के सभी महाद्वीपों से अलग है। एशिया के मध्य भाग में स्थित ये पर्वत श्रेणियाँ एशिया महाद्वीप के लगभग 20% भागों पर फैली हुई है। इसका विस्तार पश्चिम में टर्की से प्रारंभ होकर पूरब में चीन तथा उत्तर-पूर्व में बेरिंग सागर तक है। इसमें अनेक उच्च पर्वत एवं पठार सम्मिलित है। इस क्रम में पर्वत शिखरों की सामान्य ऊँचाई 1000 मीटर से लेकर 8848 मीटर तक है। एशिया के इस मध्यवर्ती पर्वत-पठार-क्रम का केंद्र पामीर की गाँठ है जो विश्व की छत कहलाती है।

  • पामीर की गाँठ से निकलने वाली पर्वत श्रेणियों का प्रथम क्रम पश्चिम की ओर फैली हुई है। इस क्रम के अंतर्गत निम्नलिखित पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – हिंदुकुश, एल्बुर्ज, गिलगिट, सुलेमान, किरथर, जैग्रोस पर्वत श्रेणियाँ, ईरान का पठार, पौंटिक श्रेणी, टॉरस श्रेणी, एशिया माइनर का पठार।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाली पर्वत श्रेणियों का दूसरा क्रम दक्षिण-पूरब की ओर फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है :
हिमालय पर्वत श्रेणी – हिमालय पर्वत श्रेणी पर संसार की सर्वोच्च पर्वत श्रेणी स्थित है। इसका सर्वोच्च पर्वत शिखर एवरेस्ट संसार का सबसे ऊँचा शिखर है जिसकी ऊँचाई 8848 मीटर है। हिमालय पर्वत श्रेणी की एक शाखा असम तथा म्यांमार होती हुई पूर्वी द्वीप समूह को चली गई है। असम में इसकी मुख्य पर्वत श्रेणियाँ नागा, गारो, खासी, जयंतिया तथा पटकोई है। म्यांमार में इसके मुख्य पर्वत श्रेणियाँ अराकानयोमा, पीगूयोमा और तनासरिमयोमा है।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाले पर्वत श्रेणियों का तीसरा क्रम पूरब की ओर फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – क्यूनलुन, बयानकारा, सिनलिंग, अलताइनतांग, नानशान, खिंगन, तिब्बत का पठार, काराकोरम।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाले पर्वत श्रेणियों का चौथा क्रम उत्तर-पूरब दिशा में फैला हुआ है। इस क्रम के अंतर्गत निम्न पर्वत एवं पठार सम्मिलित है – तियानशान, अल्टाई, यावलोनोय, स्टेनोवोय, बर्खोयानस्क, कोलिमा, अनादिर, कमचटका।
एशिया का उच्चावच
2. नदियों के मैदान
                         विभिन्न नदियों के छोटे-बड़े मैदान मिलकर एशिया महाद्वीप के विशाल धरातल का निर्माण करते हैं। यह मैदान अत्यंत उपजाऊ मृदा द्वारा निर्मित है। अनेक महत्वपूर्ण सभ्यताओं का विकास इन मैदानों में हुआ है। सिंधु घाटी एवं दजला-फरात बेसिन की सभ्यता एशिया की प्राचीन सभ्यताओं में से है जहाँ से इसका प्रचार संसार के अनेक देशों में हुआ है। ये एशिया महाद्वीप के सांस्कृतिक विकास केंद्र है। आज भी एशिया महाद्वीप की जनसंख्या का सबसे अधिक घनत्व इन्हीं मैदानों में मिलता है। पश्चिम से पूरब की ओर ये मैदान क्रमशः निम्न प्रकार है-
(i) दजला-फरात का मैदान – इस मैदान का विस्तार इराक में है। दजला-फरात के मैदान को मेसोपोटामिया का मैदान भी कहा जाता है।
(ii) सिंधु-गंगा का मैदान – इसका विस्तार भारत तथा पाकिस्तान में है। सिंधु तथा गंगा और इन नदियों की अनेक सहायक नदियों की उपजाऊ कॉंप मिट्टी से यह मैदान निर्मित हुआ है। सिंधु घाटी की सभ्यता का विकास एशिया के सिंधु तथा गंगा के मैदान में ही हुआ।
(iii) इरावदी का मैदान – इस मैदान का विस्तार में म्यांमार में है। इरावती का उपजाऊ मैदान कॉंप मिट्टी की सैकड़ों मीटर गहरी परतों द्वारा निर्मित है जो चावल की कृषि के लिए विश्वविख्यात है।
(iv) मीनाम का मैदान – इस मैदान का विस्तार थाईलैंड में है। यह कॉंप उपजाऊ मिट्टी का मैदान है जिसका विस्तार दक्षिण की ओर अधिक है।
(v) मीकांग का मैदान – मीकांग नदी ने हिंदचीन प्रायद्वीप पर उपजाऊ मैदान का निर्माण किया है। इस मैदान में कॉंप मिट्टी की अनेक परतें बिछी हुई है।
(vi) सिक्यांग का मैदान – यह मैदान दक्षिणी चीन में विस्तृत है। इस मैदान का विस्तार अधिक नहीं है।
(vii) यांगटिसीक्यांग का मैदान – यह मैदान मध्य चीन में है जिसका निर्माण यांगटिसीक्यांग तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा हुआ है। यह उपजाऊ कॉंप मिट्टी का बना है। इसका रेड बेसिन प्रसिद्ध मैदानी भाग है।
(viii) ह्वांगहो का मैदान – इसका निर्माण ह्वांगहो अथवा पीली नदी द्वारा लोयस के पठार से बहाकर लाई गई पीली मिट्टी से हुआ है। इसलिए इसे उत्तरी चीन का विशाल पीला मैदान भी कहते हैं।
3. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार
                                      एशिया के दक्षिण-पश्चिमी, दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी भाग में प्राचीन चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। इन प्राचीन चट्टानों का उद्भव पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ हुआ। इन प्राचीन पठारों को तीन भागों में बांटा गया है-
(i) अरब का प्रायद्वीपीय पठार – यह पठार एशिया के दक्षिणी-पश्चिमी भाग अरब प्रायद्वीप में स्थित है। अरब का प्रायद्वीपीय पठार कठोर प्राचीन चट्टानों द्वारा निर्मित गोंडवाना भूमि का एक भाग है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 2000 मीटर है। यह एक शुष्क मरुस्थलीय भाग है। शुष्कता के कारण ही यह अत्यंत रेतीला हो गया है।
(ii) भारत का प्रायद्वीपीय पठार – यह पठार भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है। अरब के प्रायद्वीपीय पठार की भांति यह भी प्राचीन चट्टानों से निर्मित गोंडवाना भूमि का अंश है जो कठोर रवेदार चट्टानों से बना है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 1400 मीटर है। पठार के उत्तरी भाग में विंध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत तथा मालवा का पठार प्रमुख श्रेणियां है जबकि पठार के दक्षिणी भाग में नीलगिरी तथा इलायची की पहाड़ियां प्रमुख श्रेणियां है।
(iii) हिन्दचीन का पठार – यह दक्षिणी-पूर्वी एशिया में फैला हुआ प्रायद्वीपीय पठार है जिसका अधिकांश भाग हिन्दचीन में स्थित है। यह कठोर चट्टानों से निर्मित है। इस पठार की सामान्य ऊँचाई 1200 मीटर है। इस पठार पर नदियों द्वारा क्षरण कार्य बहुत कम हुआ है इसलिए यह कम कटा-फटा पठार है।
4. उत्तर की निचली भूमि
                साइबेरिया के उत्तर की निचली भूमि त्रिभुजाकार मैदान के रूप में विस्तृत है। इस मैदान के उत्तर में आर्कटिक महासागर, पश्चिम में यूराल पर्वत तथा दक्षिण एवं पूरब में मध्यवर्ती पर्वत-पठार क्रम फैला हुआ है। यह निचला मैदान ओबी तथा लीना नदियों के बेसिनों से बना है। इस विस्तृत मैदान को एशिया के धरातल में पड़ने वाले अनेक मोड़ों का सामना करना पड़ा है। इस मैदान का ढाल उत्तर में आर्कटिक सागर की ओर है। इसका ढाल अत्यंत मंद होने के कारण इसकी उत्तरी भाग में जल भर जाता है और अनेक दलदल बन जाते हैं। इस मैदान की नदियों के मुहाने तथा निचले भागों में बर्फ जम जाने के कारण इन नदियों का जल अपवाह रुक जाता है। इससे अनेक दलदली क्षेत्र बन जाते हैं। यही कारण है कि इन क्षेत्रों की नदियों का कोई व्यापारिक महत्व नहीं है।
5. द्वीप समूह मालाएँ
               एशिया महाद्वीप के पूरब एवं दक्षिण-पूरब की ओर अनेक द्वीपसमूह एक विस्तृत पंक्ति में चाप की भांति फैले हुए हैं। ये द्वीप प्रशांत महासागर तथा हिंद महासागर में स्थित है जिसमें से प्रशांत महासागर में द्वीपों की बहुलता है। ये सभी पहाड़ी भाग के रूप में है जिनका निर्माण तृतीय कल्प की नवीन मोड़दर पर्वत श्रेणियों के साथ हुआ था। इन द्वीपों की चट्टानों में नवीन मोड़दार चट्टानें मिलती है।
             भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार यह नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों के उठे हुए भाग है जो समुद्र में डूबी हुई है। इन तीनों में पूर्वी एवं पश्चिमी समुद्र तटों पर संकरी मैदानी पट्टी मिलती है। इन द्वीपों की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ पर मिलने वाली ज्वालामुखी पर्वतों की अधिकता है। अनेक ज्वालामुखी पर्वत आज भी जागृत अवस्था में है। इस द्वीप समूह माला के प्रमुख द्वीप क्यूराइल, होकैडो, हांशू, क्यूशू, शिकोकू, ताइवान, लुजोन, मिडनाओ, समार, नेग्रोस, पलाबन, सैलीबीज, बोर्नियो, जावा, मदुरा, ईरियन, सिंगापुर इत्यादि है।
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया को उच्चावच इकाईयों में विभक्त कीजिए और उनमें से किसी एक का विशद विवरण दीजिए।
 अथवा
Q2.  एशिया को भौतिक  इकाईयों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना  किजिए।

1. एशिया की धरातल की संरचना (Asia : Surface Structure)

1. एशिया की धरातल की संरचना (Asia : Surface Structure)


एशिया की धरातल की संरचना⇒

For BA(Hons) Part-I, Paper-II 

                 धरातलीय संरचनाओं पर भू-गर्भ की प्राचीन चट्टानों के विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है। प्राचीन चट्टानों की बनाबट का अध्ययन धरातलीय संरचना के आधार पर किया जाता है। एशिया महाद्वीप में धरातलीय संरचना के अंतर्गत भी अनेक विशेषताएँ मिलती है। इस महाद्वीप में उपकल्प(Eozoic Era) की पुरातन चट्टानें से लेकर टर्शियरी युग की नवीनतम चट्टानें मिलती है। चट्टानों की विविधता के साथ-साथ चट्टानों के धरातलीय स्वरूप में भी अनेक विविधताएँ पायी जाती है।
         एशिया महाद्वीप में अनेक ऐसे स्थलखंड विद्यमान है जिनमें धरातलीय परिवर्तन भूगर्भिक हलचलों के कारण उत्पन्न हुए हैं जबकि महाद्वीप पर कुछ स्थलखंड ऐसे भी है जो इन भूगर्भिक हलचलों से प्रभावित नहीं होते हैं। कुछ स्थान पर अयनवृत्तीकरण के कारण चट्टानों का बाहरी रूप अवश्य परिवर्तित हो गया है लेकिन चट्टानों की आंतरिक बनावट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 
                  एशिया महाद्वीप की धरातलीय संरचना के बारे में विभिन्न भूतत्ववेताओं में मतभेद है फिर भी अधिकांश भूतत्ववेताओं ने एशिया को भूगर्भिक संरचना के आधार पर चार भागों में बाँटा है – 
(1) उत्तर के प्राचीन भूखंड 
(2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड 
(3) नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ 
(4) अवशेष भाग 
एशिया की धरातल की संरचना(1) उत्तर के प्राचीन भूखंड

                  उत्तर के प्राचीन भूखंडों का विस्तार एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में हुआ है। इस प्राचीन भूखंड में कैंब्रियन युग से पहले की कठोर चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। यह प्राचीन विशाल भूखंड पैंजिया स्थलखंड से अलग हुए विशाल भूखंड है। इन भूखंडों की चट्टानें बहुत कठोर है। इनमें से कुछ चट्टानों का रूप परिवर्तित भी हो गया है। इन भागों में आग्नेय चट्टानों की बहुलता है। मुख्य चट्टानें नाइस, शिष्ट, स्लेट तथा ग्रेनाइट है।

            उत्तर के प्राचीन भूखंड के अंतर्गत चार प्रमुख खंड आते हैं जिनमें एक भूखंड जिसका नाम रूसी चबूतरा है, एशिया महाद्वीप में न होकर यूरोप महाद्वीप में स्थित है लेकिन फिर भी इसका अध्ययन इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि इससे एशिया महाद्वीप की संरचना को समझने में सहायता मिलती है। यह एशिया की सीमा से लगा हुआ यूरोप के बाल्टिक सागर तक विस्तृत है, इसलिए इसे बाल्टिक शीट भी कहते हैं। उत्तर के प्राचीनतम भूखंडों के अंतर्गत निम्नलिखित भूखंड सम्मिलित किए जाते हैं –

(i) रुसी चबूतरा 
(ii) अंगारा भूमि 
(iii) चीनी मैसिफ
 (iv) सारडिनियन मैसिफ।
(2) दक्षिण के प्राचीन भूखण्ड
                 उत्तर के प्राचीन भूखंडों की भांति दक्षिण के प्राचीनतम भूखंड कठोर तथा प्राचीनतम चट्टानों द्वारा निर्मित है। यह प्राचीन भूखंड पैंजिया के टूटे हुए स्थल भूखंड है जिन्हें गोंडवाना भूमि के नाम से पुकारते हैं। विद्वानों के अनुसार यह गोंडवाना भूमि प्राचीन समय में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण एशिया तथा आस्ट्रेलिया के कुछ भाग में फैली हुई थी। कालांतर में महाद्वीप की रचना के समय इसके टुकड़े हो गए। एशिया महाद्वीप में भी इस गोंडवाना भूमि के दो प्रमुख भूखंड मिलते हैं जो निम्नलिखित है-
1. अरब प्रायद्वीप 
2. प्रायद्वीपीय भारत
             
          कैंब्रियन युग से पहले की चट्टानों द्वारा इन दोनों प्राचीन भूखंडों का निर्माण हुआ है। इन दोनों भूखंडों में आग्नेय तथा रूपांतरित चट्टानों का विस्तार पाया जाता है जिनमें नाइस, शिस्ट तथा बैसाल्ट चट्टानों की प्रधानता है।
(3) नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ
                नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ एशिया महाद्वीप के मध्य भाग में पाई जाती है। पृथ्वी की हलचलों के परिणामस्वरुप टर्शियरी युग में इन पर्वत श्रेणियों का विस्तार हुआ। मध्य जीवकल्प(Mesozoic Era) के अंतिम समय में इन मोड़दार पर्वत श्रेणियों का निर्माण प्रारंभ हो गया तथा तृतीय युग में इन श्रेणियों का विकास पूर्ण रूप से हो पाया। यह पर्वत श्रेणियाँ अनेक मोड़ों द्वारा निर्मित हुई है। इन पर्वत श्रेणियों की चट्टानों में समुद्री मलवा तथा जीव-जंतुओं के अवशेष पाए जाते हैं।
           इनकी उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि अत्यंत प्राचीन काल में उत्तर-पूरब एवं दक्षिण के प्राचीन स्थित भूखंडों के बीच एक विशाल भू-अभिनति(Geosyncline) था जो जिब्राल्टर से लेकर पूर्वी एशिया तक फैला हुआ था जिसको विद्वानों ने तेथिस सागर के नाम से पुकारा। इस सागर के बचे हुए भाग आज भी एशिया महाद्वीप के पश्चिमी एवं मध्य भागों में भूमध्सायगर, कैस्पियन सागर, काला सागर, अरब सागर आदि के रूप में स्थित है। यह सागर कुछ स्थानों पर अत्यंत गहरा था। 
              टेथिस सागर में उत्तर एवं दक्षिण के अनेक धरातलीय पदार्थ, मालवा तथा जीव-जन्तुओं के अवशेष करोड़ों वर्ष तक अपरदन द्वारा सागर की तलहटी में एकत्र होते रहे। इस जमाव क्रिया के फलस्वरुप समुद्र धरातल में अनेक परतें एक के ऊपर एक जमा होती रही। मुख्यतः परमियन काल से आदि नूतनकाल के पदार्थों की एक मोटी सागर की तली पर जमा हो गई। कालांतर में पृथ्वी की भूगतियों के कारण भूखंडों में हलचल उत्पन्न हो गई तथा उत्तर के प्राचीन भूखंड दक्षिण की ओर खिसके। दक्षिण का प्राचीन गोंडवाना भूखंड वह अपने ही स्थान पर स्थिर रहा। इससे दोनों भूखंडों के मध्य टेथिस सागर से जमा मलबे में अनेक मोड़ पड़ गए। जिन भागों में मलबे के परतें अधिक जमा थी और जहाँ भूखंडों का दबाव अधिक पड़ा,  उन क्षेत्रों में ऊँची पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई।
               टेथिस सागर की इस क्रिया के फलस्वरुप इन नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई। ये पर्वत श्रेणियां दक्षिण-पश्चिमी एशिया के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया के पूर्वी किनारे तक विस्तृत है। इनमें मुख्य पर्वत श्रेणियां हिमालय, एशिया माइनर, आरमीनिया, काराकोरम, नानशान, आराकानयोमा इत्यादि है। अन्य पर्वतों में हिंदूकुश, एल्बुर्ज, जैग्रोस, टॉरस, पॉन्टिक, आनातोलिया का पठार, सुलेमान किरथर इत्यादि है। यूरोप का अल्पाइन पर्वत श्रेणियां का निर्माण भी इसी काल में हुआ। इसलिए इन नवीन मोड़दार पर्वत श्रृंखलाओं को अल्पाइन पर्वत श्रेणियों के नाम से पुकारा जाता है।
(4) अवशेष भाग
              एशिया महाद्वीप के इस भाग के अंतर्गत उन संपूर्ण क्षेत्रों का वर्णन किया जाता है जो नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियों के मध्य तथा उत्तर एवं दक्षिण की खंड के मध्य स्थित है। यह क्षेत्र अवशेषी भाग के रूप में जाना जाता है। इस अवशेषी भाग में पाए जाने वाले की चट्टानों का निर्माण पुराजीव कल्प(Paleozoic Era) और मध्य जीवकल्प(Mesozoic Era) में हुआ था ।विद्वानों का मत है कि इन युगों में संपूर्ण पृथ्वी पर विश्वव्यापी हलचलें हुई थी। इन हालचलों की क्रिया के फलस्वरुप पृथ्वी के समस्त धरातल का कुछ भाग ऊपर उठ गया था तथा कुछ भाग नीचे धँस गया था। 
           डिवोनियन युग के अंतर्गत होने वाली कैलीडोनियन हलचलों के अंतर्गत एशिया के इस मध्य धरातलीय भाग में अनेक मोड़दार पर्वतों का निर्माण हुआ। इसके बाद परमियन युग के अंतर्गत होने वाली हरसीनियन हलचलों के परिणामस्वरुप अनेक मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति हुई। इन पर्वतों पर बाद में अपदन क्रिया के फलस्वरूप इनका बाहरी रूप काफी घिस गया। इससे अनेक पर्वत अवशिष्ट पर्वत एवं पठारों का रूप ग्रहण कर गए। चीन का पठार भी इस प्रकार का रूपांतरित पठार है। अपनदन की क्रिया लंबे समय तक होने के कारण अधिकांश पर्वतों ने घिसकर समतल मैदान का रूप ले लिया।
 
निष्कर्ष  :
           निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि एशिया महाद्वीप में धरातलीय संरचना के अंतर्गत भी अनेक विशेषताएँ मिलती है। यहाँ पूरातन चट्टानों से लेकर टर्शियरी युग की चट्टानें पाई जाती है। उत्तर के प्राचीन भूखंड, दक्षिण के प्राचीन भूखंड के साथ-साथ महाद्वीपों के मध्य भाग में नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियाँ देखने को मिलता है। इसके अलावा यहाँ अवशेषी भाग भी पाए जाते हैं।
 
प्रश्न प्रारूप 
Q1. एशिया को संरचनात्मक इकाईयों में विभक्त कीजिए और उसमें से किसी एक का विशद विवरण दीजिए। 
 अथवा 
Q2. एशिया की संरचना के प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए। 
अथवा  
Q3. एशिया की भू-रचना की विशेषताओं का वर्णन करें।

1. अफ्रीका की जलवायु / Climate of Africa

1. अफ्रीका की जलवायु / Climate of Africa


अफ्रीका की जलवायु⇒

For BA(Hons) Part-III

Paper-V

अफ्रीका महादेश का सामान्य परिचय : 

            अफ्रीका महाद्वीप विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है जिसका विस्तार  37°14′ उत्तरी अक्षांश से 34°50′ दक्षिणी अक्षांश एवं 17°33′ पश्चिमी देशांतर से 51°23′ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल 3343578 वर्ग किलोमीटर अर्थात पृथ्वी के कुल भूभाग का लगभग 20% भाग में है। अफ्रीका के उत्तर में भूमध्यसागर एवं यूरोप महाद्वीप, पश्चिम में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में दक्षिण महासागर तथा पूर्व में अरब सागर एवं हिंद महासागर हैं। पूर्व में स्वेज भूडमरूमध्य इसे एशिया से जोड़ता है तथा स्वेज नहर इसे एशिया से अलग करती है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य इसे उत्तर में यूरोप महाद्वीप से अलग करता है। इस महाद्वीप में विशाल मरुस्थल, अत्यन्त घने वन, विस्तृत घास के मैदान, बड़ी-बड़ी नदियाँ व झीलें तथा विचित्र जंगली जानवर हैं। मुख्य मध्याह्न रेखा (0°) अफ्रीका महाद्वीप के घाना देश की राजधानी अक्रा शहर से होकर गुजरती है। यहाँ सेरेनगेती और क्रुजर राष्ट्रीय उद्यान है तो जलप्रपात और वर्षावन भी हैं। एक ओर सहारा मरुस्थल है तो दूसरी ओर किलिमंजारो पर्वत भी है और सुषुप्त ज्वालामुखी भी है। युगांडा, तंजानिया और केन्या की सीमा पर स्थित विक्टोरिया झील अफ्रीका की सबसे बड़ी तथा सम्पूर्ण पृथ्वी पर मीठे पानी की दूसरी सबसे बड़ी झील है। यह झील दुनिया की सबसे लम्बी नदी नील के पानी का स्रोत भी है।
                  अफ्रीका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जिससे होकर पृथ्वी पर खींची गई तीनों प्रमुख काल्पनिक रेखाएँ (विषुवत रेखा, कर्क रेखा तथा मकर रेखा) गुजरती है।
जलवायु का अध्ययन करने का कारण
                 भौगोलिक अध्ययन में जलवायु का आधारभूत महत्व है क्योंकि इसका व्यापक प्रभाव सभी भौगोलिक तत्वों पर पड़ता है। प्रत्यक्ष रूप से जलवायु, वनस्पति एवं फसलों तथा अप्रत्यक्ष रूप से न केवल मिट्टी इत्यादि प्राकृतिक संसाधनों को बल्कि मानव की शारीरिक एवं मानसिक कार्यक्षमता के माध्यम से मानवीय संसाधनों को भी प्रभावित करती है। अफ्रीका महाद्वीपों के वर्तमान आर्थिक एवं मानवीय प्रारूप के विकास में जलवायु की प्राथमिक भूमिका है। इस महाद्वीपों के विशिष्ट संदर्भ में जलवायु के कारक एवं तत्वों तथा प्रादेशिक भिन्नता का अध्ययन अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
 
             अफ्रीकी महाद्वीपों के जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक अक्षांशीय स्थिति, प्रचलित वायु पेटियाँ एवं उनका मौसमी स्थानांतरण तथा पर्वत श्रेणियों की सापेक्षिक स्थिति एवं उसकी दिशा है। इसके अलावे तटवर्ती महासागरीय जल धाराएँ एवं धरातलीय ऊँचाई का भी स्थानीय प्रभाव पड़ता है। 
(1) अक्षांश की स्थिति :-
            अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश भाग उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में तथा कुछ भाग शीतोष्ण कटिबंध में पड़ता है। इस कारण यह महाद्वीप सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं। जैसा कि हमलोग जानते भी है कि निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों में सूर्यातप की मात्रा निरंतर अधिक होती है एवं इसमें मौसमी परिवर्तन भी नहीं के बराबर होती है। जैसे-जैसे हम लोग भूमध्य रेखा से दूर जाते हैं, सूर्यातप की मात्रा घटती जाती है। लेकिन अधिकतम सौरताप 20° अक्षांश के पास प्राप्त होता है जहाँ मेघच्छादन न्यूनतम रहता है। पश्चिमी तथा पूर्वी सहारा में 200 किलोग्राम कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर औसत वार्षिक सूर्यातप की प्राप्ति होती है जो विश्व में सर्वाधिक है। अफ्रीका के मरुस्थलीय भाग में 180 किलोग्राम कैलोरी और भूमध्य रेखीय प्रदेशों में जहाँ सालोंभर मेघच्छादन रहता है 120 किलोग्राम कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर औसत सूर्यातप की प्राप्ति होती है।
(2) प्रचलित वायु पेटियाँ :- 
                  अक्षांशीय स्थिति के अनुरूप अफ्रीका महाद्वीप में विषुवत रेखा के समीप निम्न वायुदाब की शांत पेटी मिलती है जिसे डोलड्रम अथवा अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) कहते हैं। इसके दोनों तरफ 30° अक्षांश के आसपास उच्च वायुदाब के उपोष्ण पेटी मिलता है मिलती है। उच्च वायुदाब की उपोष्ण पेटी मिलती है। उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से क्षेत्रों से व्यापारिक हवाएँ विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब की ओर पृथ्वी की दैनिक गति से प्रभावित होकर उत्तरी गोलार्ध में उ०- पू० तथा दक्षिणी गोलार्ध में द०-पू० दिशा से चलती है। अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश भाग इन्हीं व्यापारिक हवाओं की पेटी में पड़ता है। उत्तरी अफ्रीका को छोड़कर अन्य भागों में सागरीय हवाएँ हैं। इसी प्रकार उपोष्ण उच्च वायुदाब के क्षेत्र से ध्रुवों की ओर उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिम दिशा से प्रचलित पछुआ हवाएँ उप-ध्रुवीय निम्न वायुदाब के क्षेत्र की ओर चलती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय भाग व्यापारिक हवाओं तथा मध्य अक्षांश में स्थित भाग पछुआ हवाओं के प्रभाव क्षेत्र में पड़ते हैं। महाद्वीपों के 30° दक्षिणी अक्षांश के दक्षिणी भागों में पछुआ हवाओं से वर्षा होती है जबकि विश्वतरेखा के समीप स्थित प्रदेश में संवहनीय प्रक्रिया द्वारा वर्षा होती है।
(3) पर्वत श्रेणियों की सापेक्षिक स्थिति :- 
                  उच्च पर्वत नमीयुक्त सागरीय हवाओं को रोककर वायु अभिमुख प्रदेशों में वर्षा करातें हैं जबकि वायु विमुख ढाल एवं आंतरिक प्रदेश में सामान्यतः शुष्क हो जाते हैं। अफ्रीका में स्थित ड्रेकेन्स-बर्ग पर्वत के कारण पूर्वी तट पर अधिक वर्षा होती है परंतु आंतरिक भाग एवं पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। मलागासी के मध्य में पर्वत स्थित होने के कारण पूर्वी तट पर सारभर अधिक वर्षा होती है। उत्तरी अफ्रीका में एटलस पर्वत स्थायी हवाओं के समानांतर स्थित होने के कारण वर्षा को अधिक प्रभावित नहीं करता। अतः उच्च पर्वत इन महाद्वीपों में अवरोधक के रूप में वर्षा की मात्रा एवं उसके वितरण को प्रभावित करते है साथ ही कुछ क्षेत्रों में सागरीय प्रभाव को आंतरिक भागों में पहुँचने से भी रोकते है। 
(4) धरातलीय ऊँचाई :-
           उष्ण कटिबंध में निम्न क्षेत्रों से हिमाच्छादित उच्च शिखर तक तापमान में लंबवत परिवर्तन उसी प्रकार का होता है जैसा कि भूमध्य रेखा से ध्रूवों की ओर जाते समय अक्षांशीय स्थिति के अनुसार होता है। परंतु विभिन्न तत्वों में विशेषकर तापमान में यह परिवर्तन स्थानीय स्तर पर ही होता है। उष्ण कटिबंधीय स्थित होते हुए भी विस्तृत अफ्रीकी पठारों पर शीतोष्ण जलवायु पाई जाती है जो कि यूरोप निवासियों के लिए सर्वथा उपयुक्त है। 
(5) तटवर्ती महासागरीय जलधाराएँ :- 
                  दक्षिणी गोलार्ध में महासागरीय जलधाराओं का प्रतिरूप घड़ी की सुईयों के विपरीत है। जल धाराएँ अपने गुण के अनुसार अपने पास स्थित तटीय भागों के तापमान एवं वर्षा को प्रभावित करती है। उत्तरी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर कनारी एवं दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट के समानांतर बेंगुला की ठंडी जलधाराओं के प्रभाव से तापमान सामान्य से नीचे रहता है जबकि गिन्नी तट तथा पूर्वी तट पर भूमध्यरेखीय, मोजांबिक और आगुल्हास की गर्म जलधाराओं के कारण तापमान सामान्य से ऊपर रहता है।
              उपरोक्त दशाओं से स्पष्ट है कि अफ्रीका महाद्वीपों के सामुद्रिक वायु अभिमुख तटों पर प्रायः गर्म जलधाराएँ एवं वायु विमुख तटों पर ठंडी जलधाराएँ विद्यमान है। फलस्वरुप प्रमुख जलवायु कारकों के प्रभाव तिव्रतर हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त निम्न अक्षांश में जिन तटों पर ठंडी जलधाराएँ चलती है वहाँ घना कोहरा छाया रहता है। दो विपरीत गुणों वाले जलधाराओं के संगम स्थल पर भी घना कोहरा पाया जाता है। उच्च अक्षांशों में गर्म जलधाराएँ तापमान को सामान्य से ऊंचा रखती है जबकि ठंडी जलधाराएँ जलवायु को और कठोर बना देती है। परोक्ष रूप से जलधाराएँ चक्रवतों के पथ को भी निर्धारित करती है। 
 
अफ्रीका महाद्वीप के जलवायु का वर्गीकरण
                  उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जलवायु के विभिन्न तत्व और उनको प्रभावित करने वाले कारकों की प्रादेशिक विभिन्नता के परिणामस्वरूप अफ्रीका महाद्वीप में अनेक प्रकार की जलवायु पाई जाती है। अफ्रीका महाद्वीप की जलवायु के अध्ययन हेतु ट्रिवार्था द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण को अधिक उपयुक्त माना गया है क्योंकि केवल कुछ प्रधान जलवायु प्रकारों के कारण यह वर्गीकरण सरल होने के साथ ही सर्वमान्य है। इस वर्गीकरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आवश्यकतानुसार द्वितीय एवं तृतीय क्रम के उप-विभाजनों द्वारा इसे विस्तृत रूप दिया जा सकता है। यह वर्गीकरण उपलब्ध आँकड़ों पर आधारित है। ट्रिवार्था ने पृथ्वी की जलवायु को 13 वर्गों में विभाजित किया है जिसमें निम्नलिखित 8 प्रकार की जलवायु के क्षेत्र अफ्रीका महाद्वीप में पाए जाते हैं : –
 
1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Af, Am)
 
2. सवाना तुल्य जलवायु (Am)
 
3. स्टेपी तुल्य जलवायु (Bs)
 
4. मरुस्थलीय जलवायु (Bu)
 
5. भूमध्यसागरीय जलवायु (Cs)
 
6. मानसूनी जलवायु (Ca)
 
7. पश्चिमी यूरोपीय तुल्य जलवायु (Cb, Cc)
 
8. अविभाजित पर्वतीय जलवायु (H)
1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Af,Am):-
                   वर्ष पर्यंत उच्च तापमान एवं अधिक वर्षा इस जलवायु की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं। भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° या 10° अक्षाशों तक ही स्थित होने के कारण अफ्रीका का कांगो बेसिन इस जलवायु के प्रधान क्षेत्र। इसके अलावा मलागासी का पूर्वी भाग तथा गिनी तट पर भी यह जलवायु पाई जाती है।
                  वर्षा प्रमुख रूप से यहाँ संवहनीय होती है। प्रतिदिन तापमान में वृद्धि के साथ ही कुमुलस बादल दिखाई देते हैं और दोपहर बाद गरज एवं चमक के साथ मूसलाधार वर्षा होती है। भूमध्यरेखीय प्रदेशों में गरज के साथ आंधियाँ बहुत आती है जिनका औसत वर्ष में 75 से 105 दिन तक है। निरंतर मेघच्छादित आकाश तथा अविरल वर्षा के दिन मध्य अक्षांशीय प्रदेशों की अपेक्षा बहुत कम पाए जाते हैं। निम्न अक्षांशों में वायुमंडलीय व्यतिक्रम, जिनकी आवृत्ति अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) के समीप सर्वाधिक होती है, अधिक वर्षा से संबंधित होते हैं। चक्रवातीय वर्षा सापेक्षतया अधिक समय तक एक विस्तृत क्षेत्र में होती है जबकि संवहनीय वर्षा स्थानीय एवं दैनिक होती है।
 
2. सवाना/सूडान तुल्य जलवायु (Am):-
                  इसे उष्णकटिबंधीय आर्द्र शुष्क जलवायु भी कहा जाता है। निरंतर आर्द्र उष्ण कटिबंधीय जलवायु की तुलना में इन प्रदेशों में वर्षा कम होती है और विभिन्न महीनों में इसका वितरण असमान होता है। परिणामस्वरूप सघन वन के स्थान पर वृक्ष युक्त घास के मैदान पाए जाते हैं। सवाना नामक लंबी घास के आधार पर इसे सामान्यतया सवाना तुल्य जलवायु कहते हैं। भूमध्य रेखा की ओर महाद्वीपों के पश्चिमी तथा आंतरिक भागों में शुष्क जलवायु तथा पूर्वी भागों में उपोषण आर्द्र जलवायु के मध्य इस जलवायु के क्षेत्र पाए जाते हैं।
                  इस जलवायु के प्रदेश विषुवत रेखा के दोनों ओर सामान्यतया 5° या 10° से 15° या 20° अक्षांश के मध्य भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब एवं उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्रों के मध्य व्यापारिक हवाओं की पेटी में स्थित है। सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन होने के परिणामस्वरूप सूर्यातप वायुदाब और हवाओं की पेटियों के स्थानांतरित होने से इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण और डोलड्रम के प्रभाव में वर्षा होती है जबकि शीत ऋतु में व्यापारिक हवाओं तथा उपोष्ण प्रतिचक्रवातों के प्रभाव में मौसम शुष्क रहता है। ध्रूवों की ओर वर्षा की मात्रा क्रमशः कम होती जाती है। ध्रुवीय छोर पर शुष्क ऋतु अधिक लंबी एवं कठोर होती है।
                अफ्रीका में कांगो बेसिन की उत्तर में सूडान, दक्षिण में स्थित एक विस्तृत भू-भाग और हिंद महासागर तट पर मोजांबिक से लेकर उत्तर में सोमालिया तक का तटीय क्षेत्र, मालागासी का पश्चिमी भाग इस जलवायु के प्रदेश पाए जाते हैं। पूर्वी एवं दक्षिणी अफ्रीका में भी सवाना तुल्य जलवायु पाई जाती है परंतु उच्च पठारों में स्थित होने के कारण यहाँ तापमान कम हो जाता है।
 
3. स्टेपी तुल्य जलवायु (Bs) :- 
            इसे आर्द्र शुष्क जलवायु भी कहा जाता है। आर्द्र एवं शुष्क प्रदेशों के मध्य स्थित इस जलवायु के प्रदेश एक संक्रमण में मेखला सदृश्य है और सामान्यतया निम्न अक्षांशीय मरुस्थलों को उत्तर, पूर्व एवं दक्षिण से घेरे हुए मिलते हैं। उपोषण प्रतिचक्रवातों से संबंधित वायु समूहों के नीचे उतरने वाले उच्च वायुदाब प्रदेशों के किनारे पर स्थित होने के कारण यहाँ बर्ष में कुछ समय के लिए वर्षा ऋतु भी पाई जाती है। उत्तरी अफ्रीका में इस जलवायु की दो मेखलाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली हुई मिलती है। प्रथम सहारा के उत्तर भूमध्यसागरीय प्रदेशों के दक्षिण तथा द्वितीय सहारा के दक्षिण अटलांटिक महासागर में प्रशांत तट तक विस्तृत सूडान तुल्य जलवायु प्रदेशों के उत्तर। इसके अतिरिक्त दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका मैं दो पतली पेटी के रूप में इस जलवायु के प्रदेश पाए जाते हैं।
 
4. मरुस्थलीय जलवायु (Bu):- 
                    वार्षिक वर्षा की मात्रा से वाष्पीकरण की अधिकता शुष्क जलवायु की प्रमुख विशेषता है। 15° से 30° अक्षांशों के मध्य सामान्यतः महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर उपोष्ण प्रतिचक्रवातों के नीचे उतरते शुष्क वायु समूहों के क्षेत्र में इस जलवायु के प्रदेश पाए जाते हैं।
                 शुष्क जलवायु अफ्रीका महाद्वीप के दो विस्तृत भाग में पायी जाती है- पहला उत्तरी अफ्रीका के पश्चिमी तट से लाल सागर तक 5600 किलोमीटर लंबाई तथा लगभग 2004 किलोमीटर चौड़ाई में विस्तृत सहारा मरुस्थल दूसरा दक्षिण अफ्रीका में 8 लाख वर्ग किलोमीटर में विस्तृत कालाहारी मरुस्थल ।
                   यहाँ गर्मी के महीनों का औसत तापमान 27℃ से 35℃ के बीच रहता है परंतु दोपहर में सामान्यतया 41℃ से 43℃ तक तापमान पाया जाता है। उत्तरी सहारा में औसत उच्चतम एवं निम्नतम तापमान क्रमश 37℃ तथा 22℃ होता है। त्रिपोली से 40 किलोमीटर दक्षिण स्थित अजीजिया में विश्व का उच्चतम तापमान 58℃ अंकित किया गया है। शीत ऋतु में दिन का औसत तापमान 16℃ से 21℃ तथा रात्रि का 10℃ के आस-पास पाया जाता है।
 
5. भूमध्यसागरीय जलवायु (Cs) :-
                  इसे शुष्क ग्रीष्म एवं आर्द्र शीत ऋतु, युक्त उपोष्ण जलवायु भी कहा जाता है। शीत ऋतु में साधारण ठंड तथा वर्षा एवं उच्च तापमान युक्त शुष्क ग्रीष्म ऋतु, इस जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ है। यह जलवायु 30° से 40° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर पछुआ हवाओं की पेटी में पायी जाती है। उतरी अफ्रीका का भूमध्यसागरीय तटीय प्रदेश, दक्षिणी अफ्रीका गणराज्य का दक्षिणी-पश्चिमी छोर इस जलवायु के अंतर्गत आता है।
                     उपोष्ण उच्च वायुदाब के ध्रुवोन्मुख ढल पर स्थित होने के कारण तथा सूर्य की स्थिति के अनुसार वायु पेटियों में ऋत्विक स्थानांतरण के परिणामस्वरूप ग्रीष्म ऋतु में यह क्षेत्र उपोष्ण उच्च वायुदाब के प्रभाव में रहते हैं, अतः ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है। शीत ऋतु में पछुआ हवाओं तथा उनसे संबंधित चक्रवातों के प्रभाव में होने के कारण वर्षा होती है।
                    मध्य अक्षांशीय एवं समुद्रतटीय स्थिति के कारण यहाँ कड़ाके की सर्दी नहीं पड़ती है। शीत ऋतु में औसत तापमान 4° से० से 10° से० तथा ग्रीष्म ऋतु में 21°से० से 27° से० के मध्य रहता है। वार्षिक ताप परिसर 11° से 17° से० पाया जाता है। तटीय क्षेत्रों में आंतरिक भाग की अपेक्षा ताप परिसर कम पाया जाता है।
 
6. मानसूनी जलवायु (Ca) :- 
              इसे आर्द्र उपोष्ण जलवायु भी कहा जाता है। अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित ग्रीष्मकालीन वर्षा अर्थात ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्मी एवं प्रचुर वर्षा तथा शीत ऋतु में साधारण वर्षा ठंड एवं शुष्कता होता इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है।
              अफ्रीका महाद्वीप में यह जलवायु 25° से 40° अक्षांशों के मध्य पूर्वी तटों तथा समीपस्थ आंतरिक भागों में पाई जाती है। उष्णकटिबंधीय जलवायु एवं महाद्वीपीय कठोर शीत जलवायु के मध्य स्थित इन प्रदेशों की जलवायु दोनों से प्रभावित होती है। दक्षिण अफ्रीका गणराज का डरबन के पास स्थित हिंद महासागर तटीय क्षेत्र इस जलवायु के अंतर्गत आते हैं।
 
7. पश्चिमी यूरोपीय तुल्य जलवायु (Cb, Cc) :-
                 सामान्यतःयह जलवायु 40° से 60° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर पाई जाती है परंतु अफ्रीका में यह जलवायु 25° दक्षिणी अक्षांश से ही प्रारंभ हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण महाद्वीपों का दक्षिणी भाग संकरा एवं द्वीप के रूप में अवस्थित होना है।
 
8. अविभाजित पर्वतीय जलवायु (H) :-
                      वर्षा एवं तापमान की समरूपता नहीं वरन् ऊँचाई एवं अक्षांशीय स्थिति के अनुसार एक छोटे क्षेत्र में अनेक स्थानीय जलवायु की उपस्थिति जन्य विश्व स्तर पर मानचित्रण की समस्या ही इस जलवायु विभाग का आधार है। दिन एवं रात के तापमान में अधिक अंतर तथा ऊँचाई के साथ तापमान में अधिक अंतर तथा ऊँचाई के साथ तापमान में ह्रास इस जलवायु की प्रमुख विशेषता है। उच्च पर्वतीय प्रदेशों से संबंधित यह जलवायु पूर्वी अफ्रीका में अबीसीनिया पठार के उच्च भागों एवं विक्टोरिया झील के पश्चिम और पूर्व स्थित पर्वत चोटियों पर पाई जाती है। मध्य एवं पूर्वी अफ्रीका के कम उच्च पठारी भागों को अलग न रखकर सवाना तुल्य जलवायु के प्रदेशों में ही रखा गया है।
 
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