Category BA SEMESTER/PAPER IV

16. The Reserve, Production and Distribution of Petroleum in the world (विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण)

16. The Reserve, Production and Distribution of Petroleum in the world

(विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण)



प्रश्न प्रारूप

Q. Describe the reserve, production and distribution of Petroleum in the world.

(विश्व में पेट्रोलियम के भंडार, उत्पादन एवं वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- पेट्रोलियम एक महत्त्वपूर्ण शक्ति का साधन है। इसका स्थान शक्ति के साधनों में कोयला के बाद है। यह केवल शक्ति का साधन ही नहीं अपितु कई उद्योगों का कच्चा माल भी है। वर्तमान युग में इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है। अतः इसकी कीमत हमेशा बढ़ रही है।

   अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में पेट्रोलियम का कुल भण्डार 110 अरब मैट्रिक टन तेल की संचित राशि बताई गई है। इस राशि का तीन-चौथाई अर्थात् 76% भाग केवल एशिया महादेश में संचित है। इसमें दक्षिण-पश्चिम एशिया में विश्व के कुल भंडार का 66% भाग है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10%, लैटिन अमेरिका में 8%, अफ्रिका में 3%, पूर्वी एशिया में 4% तथा शेष 9% अन्य देशों में पाया जाता है। संसार के कुछ महत्त्वपूर्ण उत्पादक देश इस प्रकार हैं-

क्रम उत्पादक देश उत्पादन प्रतिशत
1. मध्य पूर्व 54.4 %
2. संयुक्त राज्य अमेरिका 15.5 %
3. पूर्वी यूरोपीय देश 14.6 %
4. लैटिन अमेरिका 14.5 %
5. अन्य देश 10.0 %
6. कुल विश्व 100.00 %

      Statistical year book-1991, संयुक्त राष्ट्र संघ, के अनुसार विश्व के प्रमुख देशों के उत्पादन तथा भंडार दिखाए गए हैं। इन देशों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार यह तालिका स्पष्ट करता है कि किस देश में तेल का उत्पादन तथा भंडार क्या है-

देश संचित भंडार (करोड़ टन में) विश्व के कुल भंडार का % कुल उत्पान करोड़ टन में) विश्व में कुल उत्पादन का %
सोवियत रूस 3080 2.8 61.5 23.2
संयुक्त राज्य अमेरिका 397 3.6 46.2 16.2
सऊदी अरब 2280 20.4 36.4 12.3
मेक्सिको 690 6.3 15.6 5.4
चीन 275 2.5 13.1 4.7
ईरान 780 7.1 9.8 3.7
वेनेज्वेला 105 1.00 10.6 3.4
इराक 410 3.7 8.3 3.0
कुवैत 880 8.0 7.6 2.6
इंडोनेशिया 675 6.1 7.2 2.5
संयुक्त अरब अमिरात 440 4.0 6.8 2.4
लीबिया 3.8 2.8 5.2 2.0
अन्य देश शेष  शेष  शेष  शेष
कुल विश्व 11000 100% 290.00 100%

     उपरोक्त तालिका से यह स्पष्ट होता है कि सोवियत रूप विश्व में पेट्रोलियम के उत्पादन में सबसे आगे है। केवल उत्पादन में ही नहीं अपितु संचित राशि में भी अग्रगण्य है। ऊपर से महत्त्वपूर्ण पाँच देश विश्व के पेट्रोलियम के उत्पादन के 85% भाग सोवियत रूस, U.S.A. सउदी अरब, मेक्सिको, ईरान, इराक आदि देशों से होता है। इस प्रकार ये देश तेल के उत्पादन में सर्वोपरि हैं।

1. सोवियत संघ-

     सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। उत्पादन तथा संचित भंडार दोनों दृष्टिकोणों से इसका स्थान विश्व में प्रथम है। सोवियत रूस के तीन क्षेत्रों में इसका विशेष उत्पादन होता है, जो निम्नलिखित हैं-

(i) वोल्गा-यूराल क्षेत्र- सोवियत रूस के कुल उत्पादन का 75% यहीं से होता है। इसके प्रमुख केन्द्र पर्म, उफा, कुडसेव आदि प्रमुख हैं।

(ii) बाकू क्षेत्र- इस प्रदेश को काकेशश क्षेत्र भी कहते हैं। इसके मुख्य प्रदेश बाकू, माखघकला, प्रोजनी, माइकोप, रशुका, कोसाहागिल आदि है।

(iii) अन्य क्षेत्र- इस प्रदेश में कई छोटे-छोटे तेल क्षेत्र आते हैं। इनमें एम्बा, तुर्कमेनिस्तान, कुंभदाग, चेलेकिन, पेचोरा, फरगन, साईबेरिया, सखालिन आदि सम्मिलित हैं।

2. संयुक्त राज्य अमेरिका-

    यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ 4 लाख से अधिक तेल के कुएँ हैं। यह विश्व का सबसे अधिक तेल की खपत करता है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्न हैं-

(i) अप्लेशियन क्षेत्र।

(ii) लीमा-इडियाना क्षेत्र।

(iii) मध्यवर्ती क्षेत्र।

(iv) खाड़ी क्षेत्र।

(v) कैलिफोर्निया क्षेत्र।

3. सऊदी अरब-

    यह देश संचित राशि की दृष्टि से दूसरा तथा उत्पादन की दृष्टि से विश्व का तीसरा बड़ा देश है। यहाँ का तेल भंडार विश्व का 20% तथा उत्पादन 12-3% है। यहाँ तेल का क्षेत्र 3 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र धावर, अवकेक, ऐनदार, शेदगम, हरद, दम्मान, सफानियाँ कार्डिक, अबूसफा, फथीली आदि हैं। यहाँ से तेल रास तनुरा तेलशोधक कारखाने में भेजा जाता है। यहाँ से कच्चा तेल साफ होने के लिए भूमध्यसागर के तट पर हैको को भी भेजा जाता है। यह विश्व का बड़ा तेल उत्पादक देश बन सकता है।

4. ईरान-

    ईरान में कुल तेल का भंडार 65 अरब टन है। यह पूरे विश्व के भंडार का 7.8 प्रतिशत है। ईरान का वार्षिक तेल उत्पादन 30 अरब टन है। इसके मुख्य तेल कूप अजागरी, मस्जिदे सुलेमान, हफ्तेकेल, खानक्वीन, नफ्त खनाह, लाली, गुलखरी, बीबी हाकीमेह, करंज आदि हैं।

5. इराक-

    इसका भंडार 4.7 अरब टन तथा उत्पादन 10 करोड़ टन है। किरकुक तथा बसरा दो बड़े तेल क्षेत्र हैं। इसके अन्य तेल कूप नफ्तखनाह, वुटमाह तथा मइला है। यहाँ से तेल तेल पाइप द्वारा त्रिपोली तथा बनियास को भेजा जाता है।

6. कुवैत-

    इस छोटे देश के पास विश्व का 10% तेल का भंडार है। यहाँ का सबसे बड़ा तेल प्रदेश बुरधान का पहाड़ी-प्रदेश है। इसका वार्षिक उत्पादन 9 करोड़ टन है। यहाँ लगभग 105 तेल कूप हैं।

7. मध्यपूर्व के अन्य क्षेत्र-

    यहाँ के अन्य तेल उत्पादक देश संयुक्त अब अमिरात, ओमान, कतार आदि हैं। इन सभी देशों में प्रत्येक का उत्पादन एक करोड़ टन वार्षिक से अधिक है।

8. वेनेज्वेला-

     दक्षिणी अमेरिका में यह देश काफी महत्त्वपूर्ण है। कैरेबियन सागर के दक्षिण में यह क्षेत्र में स्थित है। यहाँ के तीन क्षेत्रों के उत्पादन होता है। यह इस प्रकार हैं-

(i) माराकैवो बेसिन

(ii) ओरिनिको बेसिन

(iii) आपुरो बेसिन।

      इस देश का वार्षिक उत्पादन 10 करोड़ टन है। यहाँ के कुल उत्पादन का 90% भाग निर्यात कर दिया जाता है।

9. भारत- भात का अभी कुल उत्पादन 5 करोड़ टन हो गया है। यहाँ भी तीन क्षेत्रों में उत्पादन होता है-

(i) असम क्षेत्र में डिगबोई।

(ii) गुजरात-अंकलेश्व क्षेत्र।

(iii) मुम्बई उच्च प्रदेश।

10. अन्य क्षेत्र- इनके अलावे एशिया में बर्मा, चीन, दक्षिणी अफ्रिका, अल्जिरिया, इन्डोनेशिया आदि से तेल का उत्पाद होता है।

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world (विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)



प्रश्न प्ररूप

Q. Discuss the chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world.

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताओं तथा वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- बगानी या बगाती या रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है जो मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही की जाती है। इस प्रकार की कृषि में कोई एक ही फसल उत्पन्न की जाती है। यह फसल भी मुख्य रूप से बाजारों में बिक्री के लिए की जाती है। इन फसलों में रबड़, चाय, कहवा, गन्ना, केला, नारियल आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार की कृषि को एक फसली (One-crop Mono-Culture) की खेती कहते हैं। कुछ विद्वान गन्ने को भी बगानी फसल मानते हैं किन्तु वास्तव में गन्ना बगानी फसल नहीं है।

बगानी कृषि के क्षेत्र-

(i) पश्चिमी द्वीप समूह में क्यूबा, जमाइका, पोर्टिरिको, आदि

(ii) मध्य अमेरिका में होण्डुरस, ग्वाटेमाला त्तथा कोस्टारिका

(iii) पश्चिमी अफ्रिका के गिनीतट, घाना आदि।

(iv) दक्षिण अफ्रिका में नेटाल आदि

(व) दक्षिणी एशिया में द० भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इन्डोनेशिया आदि।

(vi) आस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड क्षेत्र।

       इस प्रकार की रोपण (Plantation) कृषि में मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों की पूँजी तथा प्रबंध क्षमता लगी हुई है। इस प्रकार की कृषि में मूल निवासी लोग श्रमिकों का काम करते हैं। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में फसलों के उत्पादन में बहुत से प्रक्रम (Processes) ऐसे होते हैं जिनके लिए बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। इस कृषि की विधियाँ बहुत ही दक्षतापूर्ण और वैज्ञानिक होती हैं। इसकी फसलों के लिए वैज्ञानिक प्रणाली तथा सावधानी बरती जाती है। इसके पौधे काफी नाजुक होते हैं।

     रोपण (Plantation) कृषि में उन फसलों का उत्पादन होता है जिसके पदार्थों के माँग पिछले दो शताब्दियों में नगरीय संस्कृति के विकास के साथ-साथ बढ़ती गई है। आज की वर्तमान आधुनिक दुनिया में पेय पदार्थों का महत्व बहुत बढ़ गया है। इनमें चाय, कॉफी, कोको काफी लोकप्रिय हो गए हैं। विश्व के उन्नत देशों में इन पदार्थों की काफी माँग है।

रोपण कृषि की विशेषताएँ-

     रोपण कृषि की कुछ मूलभूत विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) यह एक फसली (Mono culture) कृषि है। इसमें एक ही फसल के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, उच्च प्रबंध और वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।

(iii) इसकी फसलें केवल बिक्री द्वारा मुद्रा प्राप्त करने के लिए उत्पन्न की जाती है।

(iv) अधिकतर उत्पादन व्यापार के लिए होता है। स्थानीय क्षेत्रों में इसका उपभोग बहुत ही, कम होता है।

(v) इसके अन्तर्गत खेत (Holdings) बहुत विस्तृत तथा खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

(vi) इसमें मानव श्रम की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

(vii) इस कृषि पर बाजार-माँग की घट-बढ़ का और मूल्य में उतार-चढ़ाव का गहरा प्रभाव पड़ता है।

(viii) इस प्रकार की कृषि के लिए भारी पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि रख-रखावों,, प्रक्रिया तथा यातायात में काफी खर्च पड़ता है।

(ix) इस कृषि की फसलों में बीमारी लगने का काफी भय रहता है। अतः फसल के खराब होने से बहुत हानि होती है।

(x) इस कृषि का बाजार सम्पूर्ण विश्व के नगरों में फैला हुआ है। अतः ग्रह फसल नगरीय सभ्यता तथा संस्कृति का द्योतक है।

(xi) यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्रादायिणी फसल है।

     इस प्रकार की फसलों का उत्पादन प्रायः विकासशील या अविकसित क्षेत्रों में होता है। जैसे दक्षिणी अमेरिका, मध्य अफ्रिका, तथा दक्षिणी एशिया के अधिकतर देश या तो विकासशील हैं या अविकसित हैं, परन्तु इसका बाजार अधिकतर विकसित देशों के महानगरों में से है।

      इसका मुख्य खरीददार U.S.A., कनाडा तथा यूरोपीय महादेश के देश हैं। आस्ट्रेलिया भी इसका अच्छा बाजार है। इस प्रकार इसका उत्पादन उष्ण कटिबंधीय देशों में तथा इनकी बिक्री समशीतोष्ण तथा शीत प्रदेशों में है। उदाहरणस्वरूप विश्व में चाय का सबसे बड़ा निर्यातक भारत, श्रीलंका है। कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक ब्राजील है। परन्तु सबसे बड़ा आयातक U.S.A. तथा यूरोप के देश हैं।

विश्व में बगानी कृषि की फसलें तथा उनके क्षेत्र-

(1) रबड़- मौनसून एशिया में मलेशिया, इन्डोनेशिया, थाइलैंड, श्रीलंका, भारत, हिन्दचीन के देश- सिंगापुर, फिलीपीन, अफ्रिका- गिनी तट के देश घाना, नाइजीरिया, आइवरी कोस्ट आदि तया दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील। 

(2) चाय- मौनसून एशिया में चीन, भारत, श्रीलंका, जापान, बंगलादेश, इन्डोनेशिया, मलेशिया आदि पश्चिमी एशिया में ईरान, दक्षिणी रूस आदि, अफ्रिका में केन्या, जायरे, जाम्बिया, तंजानियाँ आदि दक्षिणी अमेरिका में अर्जेन्टिना तथा ब्राजील।

(3) नारियल- दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देश- इन देशों के समुद्र तटीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के तटीय प्रदेश।

(4) कहवा- दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, वेनेज्वेला तथा पेरू, अफ्रिका में गिनी तट के देश-आइवरी कोस्ट, घाना, अंगोला, उगाण्डा, एथियोपिया, जैसे आदि तथा मौनसून एशिया में भारत, हिन्दचीन आदि।

(5) केला- मौनसून एशिया में भारत, फिलीपिन, हिन्देशिया, मलेशिया, सिंगापुर और अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के भूमध्यरेखीय प्रदेश शामिल है।

(6) मसालें- मौनसून एशिया में भारत, श्रीलंका, मलेशिया तथा तंजानियाँ आदि। तंजानियाँ में जंजीवार द्वीप लौंग के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(7) कोको- इसका सबसे बड़ा उत्पादक अफ्रिका महादेश है। इसमें अप वोल्टा, घाना, नाजीरिया आदि हैं। कोको का कुछ उत्पादन दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील में भी होता है।

15. The Dairy farming in the world (विश्व में दुग्ध व्यवसाय)

15. The Dairy farming in the world

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the dairy farming in the world.

(विश्व में दुग्ध व्यवसाय का वर्णन करें।)

उत्तर- दूध पशुपालन विश्व के प्रत्येक देश में कुछ-न-कुछ होता है परन्तु कुछ भागों में यह व्यवसाय व्यापारिक स्तर पर किया जाता है। इन प्रदेशों में बड़े पैमाने पर पशुचारा तथा उनको खिलाने लायक अनाजों का उत्पादन होता है। आधुनिक समय में तीव्रगामी परिवहन तथा प्रशीतलन विधि से यह उद्योग और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। दुग्ध पशुपालन की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) इस प्रकार की कृषि में दुधारु पशुओं का विशेष महत्त्व होता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, प्रचुर श्रम तथा मवेशियों के रखने की वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग होता है।

(iii) कार्य के आकार एवं उपयोग में भिन्नता होती है।

(iv) दूध एवं दूध सामग्रियों का वितरण सापेक्ष दूरी के अनुसार होता है। ताजा दूध निकट के नगरों में तथा मक्खन एवं पनीर दूर के नगरों से प्राप्त किया जाता है।

(v) इस उद्योग में कुछ देशों ने विशेषीकरण प्राप्त कर लिया है।

(vi) इस उद्योग का विकास कम जनसंख्या वाले देशों में हुआ है।

(vii) यह व्यवसाय विश्व के समशीतोष्ण क्षेत्र में ही अधिक विकसित है।

विश्व में दुग्ध उत्पादन

       दूध की प्राप्ति गाय, भैंस, भेड़ तथा बकरी से होती है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1988 में विश्व भर में कुल 53 करोड़ टन दूध का उत्पादन था। विश्व भर में कुल दूध उत्पादन में पिछले तीन दशकों में आश्चर्यजनक रूप से लगभग दोगुना से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है। 30 साल बाद अर्थात 2018 में कुल दुग्ध उत्पादन 84.3 करोड़ टन हो गया है। साधारण शब्दों में कहें तो तीन दशक के भीतर कुल दूध उत्पादन में लगभग 60 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।

    दूध का उत्पादन विश्व में निम्नलिखित क्षेत्रों से होता है।

विश्व में शीर्ष 10 दुग्ध उत्पादक देश (2019)

क्रम  देश उत्पादन (प्रतिशत में)
1. भारत 21
2. अमेरिका 11
3. पाकिस्तान  06
4. ब्राजील 04
5. चीन  04
6. रूस  04
7. जर्मनी 04
8. तुर्की 03
9. फ्रांस 03
10. न्यूजीलैंड 02

प्रमुख क्षेत्र

    विश्व में पशुपालन के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-

(1) उत्तरी अमेरिका का U.S.A. तथा कनाडा का मध्य पूर्वी भाग।

(2) पश्चिमी यूरोप का उत्तरी भाग, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, डेनमार्क, ग्रेट ब्रिटेन तथा U.S.S.R का पश्चिमी भाग।

(3) दक्षिणी अमेरिका के अर्जेन्टाइना

(4) आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड

(5) गौण क्षेत्र पश्चिमी U.S.A., मध्य चिली, द० अफ्रीका तथा पूर्वी जापान।

(1) उत्तरी अमेरिका:

     दूध कृषि व्यवसाय U.S.A. तथा कनाडा में विकसित हैं। यहाँ के सभी बड़े नगरों के पास ताजे दूध के लिए यह किया जाता है। इसका सबसे अधिक केन्द्रीकरण U.S.A. के मक्का पट्टी के उत्तर ग्रेट लेक्स तथा सेंट लारेंस प्रदेश में हुआ है। यह घनी शहरी आबादी के पास स्थित है, जहाँ दूध, मक्खन एवं पनीर की बड़ी माँग है। यहाँ भी अनुकूल जलवायु तथा पहाड़ी प्रदेश अन्य कृषि के लिए अनुपयुक्त हैं। यहाँ क्यूवेक एवं ओण्टोरियो में लगभग 4000 से अधिक पनीर बनाने के कारखाने हैं। कनाडा से पनीर ब्रिटेन भेजा जाता है।

    U.S.A. में दूध उत्पादक क्षेत्र अटलांटिक तट से लेकर प० में मिसौरी नदी तक फैला है। न्यू इंगलैंड स्टेट, पेन्सिलवानिया, न्यूयार्क एवं विस्कौन्सिन राज्यों में दूध उत्पादन अधिक होता है। यहाँ दूध उत्पादन के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं-

(i) ऊँची-नीची पहाड़ी भूमि पर पशु-चरण होता है।

(ii) ग्रीष्मकालीन वर्षा तथा कम गर्मी से घासें उगती है।

(iii) निकट की मक्का पट्टी से मकई से साइलेज बनाने की सुविधा।

(iv) निकट के बंदगाह से दूध पदार्थों के निर्यात की सुविधा

(v) समशीतोष्ण जलवायु के कारण दूध खराब नहीं होता है।

(vi) मशीनों का विभिन्न कार्यों में प्रयोग।

(vii) अच्छी नस्लों की जर्सी, गार्न से, आयर शायर आदि से अधिक दूध की प्राप्ति।

(viii) यातायात तथा शीतलन विधि की सुविधा।

     दूध तथा मक्खन के उत्पादन में U.S.A. का स्थान विश्व में रूस के बाद दूसरा तथा पनीर के उत्पादन में प्रथम है। इसने 1981 में विश्व का 15-6% दूध तथा मक्खन एवं 21-3% पनीर का उत्पादन किया।

(2) पश्चिम यूरोपीय प्रदेश:

    यह प्रदेश अच्छी मिट्टी एवं नम जलवायु के मुलायम घासों के लिये प्रसिद्ध है। यह दूध उत्पादन के लिए आदर्श है। यहाँ के दूध क्षेत्र प० फ्रांस, हॉलैंड, डेनमार्क, स्वेडन, ब्रिटेन तथा रूस तक फैला है।

    हॉलैंड में विशाल मैदान, नम जलवायु, उपजाऊ घास तथा उच्च गायों से अधिक दूध मिलता है। हॉलैंड का एडाम पनीर विश्व विख्यात है। डेनमार्क विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। समस्त डेनमार्क एक गऊशाला है। यहाँ दूध की नदी बहती है। यहाँ के लोगों की यह मुख्य पेशा है। यहाँ के दूध विकास के निम्न कारण हैं-

(i) यहाँ खनिजों का अभाव है।

(ii) जलवायु नम एवं अनुकूल।

(iii) छोटे-छोटे खेतों में घास

(iv) खेती के स्थान पर घासों का उत्पादन

(v) यहाँ दुग्ध शालाएँ लगभग 8000 से अधिक सहकारी समितियाँ द्वारा संचालित।

(vi) यहाँ 80% मक्खन तथा 10% पनीर

(viii) गाएँ उत्तम नस्ल की है।

        आधुनिक युग में पशुपालन वैज्ञानिक तरीकों से व्यावसायिक आधार पर हो रहा है। उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र, ब्राजील का पठारी भाग और अर्जेण्टीना में विस्तृत पम्पास घास स्थल, वेनेजुएला का लानोस घास स्थल, दक्षिणी अफ्रीका का वेल्ड क्षेत्र, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड की शीतोष्ण घास भूमि, कैस्पियन सागर के पूर्व तथा अरल सागर के उत्तर के विस्तृत भाग व्यापारिक पशुपालन के उल्लेखनीय क्षेत्र हैं।

     व्यापारिक पशुपालन उद्योग पूर्णतया प्राकृतिक चरागाहों पर आश्रित नहीं है। विस्तृत क्षेत्रों में चारे की फसलों और पौष्टिक घासों की खेती की जाती है। पशुओं को सुख-सुविधा सम्पन्न बाड़ों में रखकर खिलाया-पिलाया जाता है। विशेष नस्ल के पशु पाले जाते हैं, जिनकी दूध या मांस उत्पादन क्षमता अत्यधिक होती है। पशुओं के प्रजनन, नस्ल सुधार, रोगों की रोकथाम तथा बीमार पशुओं के इलाज, आदि की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। पशुओं को बड़े-बड़े बाड़ों में रखा जाता है।

      डेनमार्क तथा न्यूजीलैण्ड में बड़े पैमाने पर दुग्ध व्यवसाय होता है। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में भेड़ ऊन तथा मांस के लिए व्यापारिक स्तर पर पाली जाती हैं। व्यापारिक पशुचारण में लोगों को प्रवास नहीं करना पड़ता है। वे एक ही स्थान पर हते हैं। चारे की फसलों की खेती तथा दूध और मांस से संसाधित पदार्थ बनाने के लिए मशीनों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इन संसाधित पदार्थों का बाजा अन्तर्राष्ट्रीय है।

       भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत (Weber’s theory of industrial localization)

1. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत 

(Weber’s theory of industrial localization)


बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत

प्रश्न प्रारूप 

1. औद्योगिक स्थानीयकरण सिद्धांत की चर्चा करें। 

2. बेबर के औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धत की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करें तथा वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता की चर्चा करें। 

औद्योगिक अवस्थिति का सिद्धांत

                     उद्योगों के स्थानीयकरण पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इनमें कच्चा माल, बाजार, परिवहन, श्रमिक, तकनीकी उपलब्धता, ऊर्जा और अन्य संरचनात्मक सुविधाएँ प्रमुख हैं। सभी उद्योगों पर इन सभी कारकों का एक समान प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी असमानता को देखते हुए कई भूगोल‌वेताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने उद्योगों के स्थानीयकरण की प्रवृति को सैद्धांतिक रूप देने का प्रयास किया है। इनमें से बेबर, हुबर, लॉश, फेटर, हौर्टलीन तथा स्मिथ का सिद्धांत प्रमुख हैं। इनमें से बेबर का सिद्धांत सबसे पुराना है। इस सिद्धांत को बेबर ने 1909 में दक्षिणी जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्रों का अध्ययन कर प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:- 

मान्यताएँ :- 

         बेबर ने बताया कि मेरा सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ-

(1) एकाकी प्रदेश होगा तथा वह संपूर्ण प्रदेश एक ही प्रशासन के अन्तर्गत होगा।

(2) सम्पूर्ण प्रदेश में एक ही जलवायु, एक ही संस्‌कृति और एक समान जनसंख्या उपलब्ध हो या सम्पूर्ण प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एक समान हो।  

(3) एक समय में एक ही उद्योग की स्थानीयकरण का विश्लेषण किया जाता हो। 

(4) कच्ची सामाग्री के स्रोत और इसकी भौगोलिक अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो। 

(5) बाजार की अवस्थिति का पूर्ण ज्ञान हो।

(6) श्रम उपलब्धता निश्चित हो तथा उसकी पूरी जानकारी हो।

(7) परिवहन लागत भार और दूरी के सापेक्ष में वास्तविक वृद्धि हो।

सिद्धांत / परिकल्पना

        बेबर के अनुसार औद्योगिक स्थानीकरण सिद्धांत को न्यूतम परिवहन लागत का सिद्धांत कहते है। बेबर के अनुसार “न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान ही न्यूनतम उत्पादन लागत वाला स्थान होता है और न्यूनतम लागत वला स्थान ही उद्योगों की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान होता है।”

      बेबर ने दूसरा परिकल्पना भी प्रस्तुत किया है। जैसे- “सस्ता श्रम और संरचनात्मक सुविधाएं इत्यादि उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान से विचलित करता है।” अर्थात न्यूनतम  श्रम लागत और संरचनात्मक सुविधाएं उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

स्थानीयकरण का मॉडल

             ऊपर वर्णित मान्यताओं और परिकल्पनाओं के संदर्भ में बेबर ने प्रयोगों के स्थानीयकरण की दो परिस्थितियाँ बतायी है-

(1) प्रथम स्थिति में एक ही कच्चे माल पर उद्योग आधारित होता है। 

(2) दूसरी परिस्थिति में एक से अधिक कच्चे माल पर उद्योग आधारित होते हैं।

I. पहली दश एक बाजार और एक कच्चा माल (R1) 

                       एक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का स्थानीयकरण की तीन प्रवृति होती हैं-

(1) वैसा उद्योग जिसका कच्चा माल सर्वत्र उपलब्ध है। ऐसी स्थिति है। उद्योगों की स्थापना बजार के केन्द्र में होती है, क्योंकि वहाँ पर परिवहन लागत नगण्य होता है। जैसे- जूता मरम्मत उद्योग, छाता मरम्मत उद्योग।   (2) दूसरी परिस्थिति के अनुसार कच्चा माल अशुद्ध हो तथा स्थानीय हो तो वैसी स्थिति में उद्योगों की स्थापना माल के केन्द्र में होती है क्योंकि परिष्कृत समान की दुलाई कच्चे माल की दुलाई के तुलना में परिवहन लागत कम होता है। जैसे:- चीनी उद्योग।

नोट:- यहाँ अशुद्ध का तात्पर्य वजन ह्रास वाले उद्योग से है।

(3) तीसरी परिस्थिति के अनुसार वैसे उद्योग आते हैं जिनका कच्चा माल शुद्ध हो और स्थानीय तौर पर उपलब्ध हो। ऐसी उद्योगों की स्थापना बाजार क्षेत्र या कच्चे माल के क्षेत्र में किया जा सकता है। जैसे- वस्त्र उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग। 

II. दूसरी दशा:- एक बाजार तथा दो से अधिक कच्चा माल (R2)

              एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योग के लिए बेबर ने त्रिभुजाकार मॉडल प्रस्तुत किया है। वेबर ने कहा है कि कई ऐसे उद्योग हैं जिसमें एक से अधिक कच्चे माल का प्रयोग होता है। जैसे लौह-इस्पाल उद्योग में लौह अयस्क, चूना पत्थर, कोयला, मैंगनीज, क्रोमियम जैसे खनिजों का प्रयोग होता है।

           बेबर के अनुसार ऐसे उद्योगों का स्थानीयकरण सभी कच्चे माल से प्रभावित नहीं होता बल्कि कुछ ‌कच्चे माल उद्योगों के स्थानीयकरण को प्रभावित करते हैं। जैसे- लौह-इस्पात उद्योग को लौह अयस्क एवं कोयला,  सीमेन्ट उद्योग को चूना पत्थर एवं कोयला, एल्युमिनियम उद्योग को बॉक्साइट एवं विद्युत इत्यादि।

           एक से अधिक कच्चे माल पर आधारित उद्योगों की स्थानीयकरण की व्याख्या करने हेतु दो परिस्थिति की चर्चा किया है।- 

(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में 

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में

(1) वजन ह्रास उद्योग के संदर्भ में

           लौह-इस्पात उद्योग, सीमेन्ट उद्योग इत्यादि इसके अच्छे उदा० है। वजन द्वास उद्योग के अन्तर्गत सर्वाधिक अनुकूल स्थान दो कच्चे माल के बीच त्रिभुज के अन्तर्गत होता है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-बेबर के औद्योगिक

            उपरोक्त त्रिभुजाकार मॉडल सही अर्थों में लौह इस्पात उद्योग के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अधिकांश लौह इस्पात उद्योग का विकास इसी अवधारणा के अनुसार हुआ है। जमशेदपुर का कौह इस्पात केन्द्र इस मॉडल का एक अच्छा उदा० है।

          वेबर ने अपने त्रिभुजाकार मॉडल में बताया कि अगर उद्योग वजन ह्रास वाला है तो उसका स्थानीयकरण कच्चे माल के क्षेत्र से नजदीक होता है। जैसे-

(2) वजन वृद्धि उद्योग के संदर्भ में

            बेबर ने वजन वृद्धि वाले उद्योग के स्थानीयकरण का व्याख्या करते हुए बताया कि ऐसे उद्योगों का स्थानीयकारण भी त्रिभुजाकार मॉडल के अनुरूप ही होगा लेकिन ऐसे उद्योग नगर से नजदीक होते हैं। जैसे- बेकरी उद्योग, सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग, वस्त्र उद्योग। 

             बेबर ने स्वयं यह बताया है कि ऊपर वर्णित उद्योगों के स्थानीयकरण में दो कारणों से विचलन हो सकता-

(1) यदि किसी स्थान पर श्रमिक अत्यधिक सस्ते हो तो उस स्थिति में उद्योग न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान पर स्थापित न होकर न्यूनतम मजदूरी लागत वाला स्थान पर स्थापित होता है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला स्थान के निर्धारण हेतु उन्होंने Isodapane Line खींचा है। यह एक ऐसी काल्पनिक रेखा है जो उन सभी बिन्दुओं को मिलाती है जहाँ न्यूनतम परिवहन लागत केन्द्र से परिवहन लागत में समान वृद्धि होती है। जैसे-

बेबर के औद्योगिक

बेबर का Isodapane Line

            वह आइसोडापेन रेखा जिसपर न्यूनतम श्रम लागत आता है उसी स्थान पर उद्योगों की स्थापना की जाती है। न्यूनतम श्रमिक लागत वाला आइसोडापेन लाइन को Critical Isodapane Lime कहते हैं।     

             इसका सबसे अच्छा उदहारण USA में देखने को मिलता है। जैसे – USA में सूती वस्त्र उद्योग का विकास न्यू इंगलैण्ड क्षेत्र में हुआ लेकिन सस्ते श्रम के कारण यह उद्योग स्थानांतरित होकर टेक्सॉस एवं अल्वामा जैसे राज्यों में चला गया है। इसी तरह से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं साफ्टवेयर उद्योग सस्ते श्रम वाले क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं।
 
(2) बेबर के अनुसार संरचनात्मक सुविधाएँ भी उद्योगों के स्थानीयकरण को न्यूनतम परिवहन लागत वाले स्थानों से विचलित करते हैं। ये सुविधाएँ भारी उद्योगों को प्रभावित नहीं कर पाते हैं बल्कि छोटे एवं हल्के उद्योगों को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। खासकर फूटलूज उद्योग। जैसे – सौंदर्य प्रशाधन उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, माँग आधारित उद्योग, रेडिमेट गार्मेन्ट उद्योग इत्यादि। दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों में इस तरह के उद्योगों का विकास न्यूनतम परिवहन लागत के कारण नहीं बल्कि संरचनात्मक सुविधाओं के कारण हुआ है।

नोट: फुटलुज उद्योग – वैसा उद्योग जिसकी स्थापना कहीं भी की जा सकती है जहाँ संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध हो।

आलोचना

                 बेबर के द्वारा प्रस्तुत न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत के आलोचकों में हुबर, हॉटलीन फेटर, और स्मिथ अग्रणी है।

1. हुबर न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान न्यूनतम उत्पादन लागत का स्थान नहीं हो सकता क्योंकि उद्योगों के स्थानीयकरण को न केवल परिवहन प्रभावित करता है बल्कि तकनीकी लागत, श्रमिक लागत, ऊर्जा लागत इत्यादि का भी प्रभाव पड़ता है।

हूबर – दो से अधिक कच्चे माल का प्रयोग करने वाले उद्योगों का स्थानीयकरण त्रिभुज के अन्दर हो यह कोई जरूरी नहीं है। आज विश्व में अधिकांश इस्पात उद्योगों का विकास समुद्र के तटवर्ती क्षेत्र में हो रहा है न कि बेबर के त्रिभुजाकार मॉडल के अनुसार। 

            फेटर, हाटलीन और स्मिथ जैसे आचारपरक भूगोलवेताओं ने कहा है कि उद्योगों का स्थानीयकरण उपभोक्ताओं की इच्छा और क्रय क्षमता पर निर्भर करता है। हॉटलीन एवं फेटर ने मियामी बिच (USA) के पास विकसित आइसक्रीम उद्योगो का हवाला देते हुए यह बताया है कि यहाँ पर आइसक्रीम उद्योग विश्व का सर्वाधिक लागत वाला उद्योग है। फिर भी पर्यटकों के व्यवहार (मांग) के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ है।

            अनेक आलोचकों ने बेबर के मान्यता को ध्यान में रखकर आलोचना किया है। जैसे- वर्तमान समय में कोई प्रदेश एकाकी प्रदेश नहीं हो सकता है और न ही उसमें भौगोलिक समरूपता पायी जा सकती है। इसी तरह बढ़ते दूरी एवं भार के अनुसार परिवहन मूल्य (भाड़ा) में सापेक्षिक वृद्धि भी नहीं हो सकती है। 

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         इन आलोचनाओं के बावजूद बेबर के सिद्धांत का अपना महत्व है क्योंकि आज भी यह सिद्धांत चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, खाद्य सामाग्री उद्योग के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या करता है। कुछ भूगोलवेताओं का यह भी कहना है कि समुद्री तट के किनारे विकसित होने वाले इस्पात उद्योग वर्तमान समय में बेबर के सिद्धांत के अनुरूप ही हो रहा है। जैसे- भारत का विशाखापतनम, जापान कोबे, USA का बाल्कि मोर इसके अच्छे उदाहरण हैं। भारत का विशाखापतनम कारखाना, बेलाडीला और डॉलीराजहरा से लौह-अयस्क प्राप्त करता है। और कोयला  का आयात न्यूनतम परिवहन लागत के कारण विदेशों से ही किया जाता है। इस तरह विशाखापतनम न्यूनतम परिवहन लागत इस्पात का प्रमुख केन्द्र बना है।

निष्कर्ष : 

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ खामियों के बावजूद बेबर का न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत चिरसंवतकालीन सिद्धांत है। यह सिद्धांत सुती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योगो, लौह- इस्पात उद्योगों के स्थानीयकरण की सटीक व्याख्या कने में सक्षम है।

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