Category BA SEMESTER/PAPER IV

14. Measurement of Dispersion (प्रसरण / अपकिरण / विचलन / प्रकीर्णन / फैलाव का मापन)

Measurement of Dispersion

(प्रसरण का मापन)

Measurement of Dispersion

परिचय

     सांख्यिकी में केवल केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप (Mean, Median, Mode) से किसी आँकड़ा-समूह की पूर्ण जानकारी नहीं मिलती। दो अलग-अलग आँकड़ा-समूहों का औसत समान हो सकता है, परंतु उनके मानों का फैलाव (विचलन) अलग-अलग हो सकता है। आँकड़ों के इसी फैलाव या बिखराव को प्रसरण (Dispersion) कहा जाता है। अतः प्रसरण का मापन यह बताता है कि आँकड़े अपने केन्द्रीय मान (Mean, Median, Mode) से कितनी दूरी तक फैले हुए हैं।

सरल शब्दों में, प्रसरण का मापन आँकड़ों की अस्थिरता, विविधता तथा समानता/असमानता को मापने का साधन है।

✍️ Dispersion measures the extent to which the items vary from some central value.

✍️ Average deviation is known as dispersion.

✍️ Central value- Mean, Median, Mode

✍️ Dispersion is also known as scatter, spread or variation.

Example 

(i) 2, 4, 9

AM = Σx/n

     = 2+4+9/3

       = 15/3

       = 3

(ii)

Series A Series B Series C
100 98 1
100 99 2
100 100 3
100 101 4
100 102 490
= 500/5 = 100 500/5 = 100 500/5 = 100

       यह तालिका दर्शाती है कि तीनों श्रेणियों (Series A, B और C) का औसत (̄ = 100) समान है, लेकिन मानों का वितरण अलग-अलग है। Series A में कोई प्रसरण नहीं, Series B में कम प्रसरण, जबकि Series C में अत्यधिक प्रसरण है।

प्रसरण की परिभाषा

        कई विद्वानों ने अपकिरण को परिभाषित किया है जिनमें निम्न प्रमुख हैं :-

(1) बुक्स एवं डिक (B. C. Brooks and W. F. L. Dick) के अनुसार, “अपकिरण अथवा प्रसार, एक केन्द्रीय मूल्य के इर्द-गिर्द चर मूल्यों (variables) के विचरण अथवा बिखराव की सीमा है।”

(2) प्रो. किंग (W. I. King) के शब्दों में, “अपकिरण शब्द का प्रयोग यह स्पष्ट करने के लिए किया जाता है कि एक दिये गये समूह के पद-मूल्यों में भिन्नता है। दूसरे शब्दों में, उसके मूल्यों में एकरूपता का अभाव है। “

(3) प्रो. कॉनर (L. R. Connor) के अनुसार, “अपकिरण उस सीमा, जिस तक व्यक्तिगत पद विलित है, की एक माप है।”

क्रॉक्सटन और काउडेन के अनुसार-

      “प्रसरण वह माप है जो यह दर्शाता है कि किसी श्रृंखला के व्यक्तिगत मान औसत के चारों ओर किस सीमा तक बिखरे हुए हैं।

प्रसरण के मापन की आवश्यकता (महत्त्व)

    प्रसरण के मापन की आवश्यकता निम्न कारणों से होती है-

✍️ आँकड़ों की स्थिरता या अस्थिरता का ज्ञान

✍️ दो या अधिक श्रृंखलाओं की तुलना

✍️ औसत की विश्वसनीयता जाँचने हेतु

✍️ जोखिम (Risk) और अनिश्चितता के विश्लेषण में

✍️ नीति निर्माण, योजना तथा अनुसंधान में सहायता

✍️ आर्थिक, भौगोलिक एवं सामाजिक अध्ययनों में उपयोग

प्रसरण के मापन के प्रकार

   प्रसरण के मापन को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है-

1. निरपेक्ष माप (Absolute Measures)

2. सापेक्ष माप (Relative Measures)

(1) निरपेक्ष माप (Absolute Measure):-

     जब किसी श्रेणी के बिखराव की माप निरपेक्ष रूप में उस श्रेणी की इकाई में ही व्यक्त की जाती है तो वह अपकिरण की निरपेक्ष माप कहलाती है, जैसे कीमत रुपयो में, लम्बाई मीटर में, वजन किलोग्राम में व्यक्त किया जाता है। यदि यह कहा जाए कि श्रमिको के एक समूह की औसत मजदूरी ₹200 है तथा अपकिरण ₹ 15 है तो यह मद अपकिरण का निरपेक्ष माप कहलाएगा।

    अपकिरण के ऐसे मापों की तुलना तभी सम्भव होती है जब दो श्रेणियाँ एक जैसी हो तथा उन्हें एक जैसी इकाइयां, जैसे-किलोग्राम, रुपये आदि द्वारा प्रकट किया जाए। यदि वितरण दो अलग समंकों से सम्बन्धित है तथा इनकी इकाइयाँ भिन्न है है तो ये माप तुलना में सहायक नहीं होते।

(2) सापेक्ष माप (Relative Measure):-

      जैसा कि हमने अध्ययन किया कि अपकिरण के निरपेक्ष माप में यह दोष है कि इसमें विभिन्न श्रेणियों की इकाइयों अलग-अलग होने पर उनमें परस्पर तुलना सम्भव नहीं होती है। अतः इनके मापों को तुलना योग्य बनाने के लिए इनको सापेक्ष रूप में बदला जाता है। अपकिरण के निरपेक्ष माप को श्रेणी के माध्य भाग देने पर जो अनुपात आता है, उसे अकिरण की सापेक्ष माप कहते हैं।

      उदाहरण के लिए, यदि कहा जाए कि भारत में 27 प्रतिशत व्यक्ति निर्धनता रेखा से नीचे है तो यह सापेक्ष माप होगी। सापेक्ष माप को ज्ञात करने के लिए मध्य मूल्य को औसत से भाग कर दिया जाता है या उसका प्रतिशन ज्ञात किया जाता है। स्पष्ट है कि सापेक्ष माप समंक श्रेणी की इकाई में व्यक्त न होकर एक अनुपात या प्रतिशत के रूप में व्यक्त होती है। इसे अपकिरण गुणांक (Co-efficient of Dispersion) भी कहते है।

अपकिरण मापने की विधियाँ (Method of  Measuring Dispersion)

        अपकिरण मापने की विधियाँ इस प्रकार है-

Measures of Dispersion
Absolute Measure (Same unit) Relative Measure (Unit free)
1. Rane 1. Coefficient of Range
2. Quartile Deviation 2. Coefficient of Quartile Deviation
3. Mean Deviation 3. Coefficient of Mean Deviation
4. Standard Deviation 4. Coefficient of Standard Deviation
5. Variance 5. Coefficient of Variance

निष्कर्ष:

     प्रसरण का मापन सांख्यिकी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है। केवल औसत आँकड़ों की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर सकता, जब तक कि उसके साथ प्रसरण का अध्ययन न किया जाए।

    परास, चतुर्थक विचलन, औसत विचलन, परिवर्तन तथा मानक विचलन ये सभी प्रसरण के विभिन्न स्तरों को समझने में सहायक हैं। विशेष रूप से मानक विचलन और परिवर्तन गुणांक आधुनिक सांख्यिकीय विश्लेषण में सर्वाधिक उपयोगी माने जाते हैं।

    अतः किसी भी आँकड़ा-विश्लेषण को पूर्ण और विश्वसनीय बनाने के लिए प्रसरण के मापन का अध्ययन अनिवार्य है।



नोट: सिर्फ सांख्यिकीय माध्य का ज्ञान रखने वाले एक व्यक्ति ने सपरिवार नदी पार करने से पहले नदी की औसत गहराई और अपने परिवार की औसत ऊँचाई ज्ञात की।

    नदी की औसत गहराई 4 फीट तथा उसके परिका की औसत ऊँचाई 5 फीट थी। इस विश्वास के साथ सभी लोग नदी पार करने लगे, परन्तु एक स्थान पर नहीं की गहराई 10 फीट थी जहाँ वह परिवार डूब गया।

   यदि उस व्यक्ति ने नदी की अधिकतम गहराई और आने परिवार के सदस्यों की न्यूनतम ऊँचाई को गणना कर ली होती तो शायद यह कहावत सुनने को नहीं मिलती कि-

लेखा जोखा ज्यों का त्यों,

सारा कुनबा डूबा क्यों।

    वह व्यक्ति सपरिवार डूब गया क्योंकि उसे अपकिरण की माप की जानकारी नहीं थी। अपकिरण की माप से हमे इस बात की जानकारी मिलती है कि आंकड़े औसत से कितनी दूरी पर अवस्थित है।

     उपर्युक्त लघु-कथा यह स्पष्ट करती है कि विभिन्न पद-मूल्यों का माध्य में विचलन महत्वपूर्ण होता है। किसी देश में औसत आय अथवा सम्पति काफी अधिक हो सकती है, साथ ही वहाँ उसके वितरण में पर्याप्त असमानता के कारण अधिकांश जनसंख्या निर्धनता की सीमा के नीचे हो सकती है। इस प्रकार के विचलनों को मापना तथा उन्हें एक संख्या में व्यक्त करना आवश्यक होता है।

16. Scatter Diagram (स्कैटर आरेख)

Scatter Diagram

(स्कैटर आरेख)



Scatter Diagram

    सांख्यिकी (Statistics) में सहसंबंध (Correlation) का अर्थ दो चरों (Variables) के बीच संबंध की दिशा और मात्रा को समझना होता है। यह बताता है कि एक चर में परिवर्तन होने पर दूसरा चर किस प्रकार प्रभावित होता है।

    सहसंबंध के अध्ययन में स्कैटर आरेख (Scatter Diagram) एक अत्यंत सरल, दृश्यात्मक और प्रभावी विधि है, जिसके माध्यम से दो चरों के बीच संबंध को आसानी से समझा जा सकता है।

    स्कैटर आरेख को बिंदु आरेख भी कहा जाता है। इसमें दो चरों के मानों को ग्राफ पर बिंदुओं के रूप में दर्शाया जाता है। सामान्यतः स्वतंत्र चर (Independent Variable) को X-अक्ष पर और आश्रित चर (Dependent Variable) को Y-अक्ष पर अंकित किया जाता है।

    प्रत्येक युग्म (X, Y) को ग्राफ पर एक बिंदु (•) के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इन बिंदुओं के फैलाव और उनके झुकाव (Trend) से सहसंबंध की प्रकृति का अनुमान लगाया जाता है।

स्कैटर डायग्राम की परिभाषा

     स्कैटर डायग्राम वह आरेख है, जिसमें दो चरों से संबंधित आँकड़ों को ग्राफ पेपर पर बिंदुओं (Dots) के रूप में दर्शाया जाता है। एक चर को X-अक्ष (क्षैतिज अक्ष) पर तथा दूसरे चर को Y-अक्ष (ऊर्ध्वाधर अक्ष) पर रखा जाता है। दोनों चरों के मानों के युग्म (X, Y) को ग्राफ पर बिंदु के रूप में अंकित किया जाता है। इन बिंदुओं के फैलाव (Scatter) से यह ज्ञात होता है कि चरों के बीच किस प्रकार का सहसंबंध है।

स्कैटर डायग्राम की विशेषताएँ

    स्कैटर डायग्राम की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

✍️ यह सहसंबंध को समझने की सबसे सरल और प्रारंभिक विधि है।

✍️ इसमें जटिल गणनाओं की आवश्यकता नहीं होती।

✍️ यह केवल सहसंबंध की दिशा और प्रकृति बताता है, उसकी सटीक मात्रा नहीं।

✍️ यह शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

✍️ यह सकारात्मक, नकारात्मक और शून्य सहसंबंध को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

स्कैटर डायग्राम बनाने की विधि

    स्कैटर डायग्राम बनाने की प्रक्रिया को निम्न चरणों में समझा जा सकता है-

(i) आँकड़ों का चयन:-

    सबसे पहले दो चरों से संबंधित आँकड़ों का चयन किया जाता है, जैसे- वर्षा और फसल उत्पादन, तापमान और आर्द्रता, जनसंख्या और संसाधन आदि।

(ii) अक्षों का निर्धारण:-

   एक चर को X-अक्ष पर और दूसरे चर को Y-अक्ष पर रखा जाता है। सामान्यतः स्वतंत्र चर (Independent Variable) को X-अक्ष पर और आश्रित चर (Dependent Variable) को Y-अक्ष पर रखा जाता है।

(iii) पैमाने का चयन:-

    दोनों अक्षों पर उपयुक्त पैमाना (Scale) निर्धारित किया जाता है, जिससे सभी मान ग्राफ पर सही ढंग से दर्शाया जा सकें।

(iv) बिंदुओं का अंकन:-

   प्रत्येक युग्म मान (X, Y) को ग्राफ पर केवल एक बिंदु के रूप में न कि रेखा रूप में अंकित किया जाता है।

(v) बिंदुओं का अवलोकन:-

   अंकित बिंदुओं के फैलाव को देखकर सहसंबंध की दिशा और प्रकार का अनुमान लगाया जाता है।

स्कैटर डायग्राम के प्रकार

     स्कैटर आरेख / डायग्राम में बिंदुओं वितरण की स्थिति के आधार पर सहसंबंध को निम्न प्रकारों में समझा जा सकता है-

(i) सकारात्मक सहसंबंध (Positive Correlation)

    जब एक चर के बढ़ने पर दूसरा चर भी बढ़ता है, या एक चर के घटने पर दूसरा भी घटता है, तो उसे सकारात्मक सहसंबंध कहते हैं। स्कैटर डायग्राम में ऐसे बिंदु बाएँ से दाएँ ऊपर की ओर जाते हुए दिखाई देते हैं।

उदाहरण-

⇒ आय और उपभोग

⇒ वर्षा और कृषि उत्पादन

(ii) नकारात्मक सहसंबंध (Negative Correlation)

    जब एक चर के बढ़ने पर दूसरा चर घटता है, तो उसे नकारात्मक सहसंबंध कहते हैं। स्कैटर डायग्राम में बिंदु बाएँ से दाएँ नीचे की ओर ढलान बनाते हैं।

उदाहरण-

⇒ मूल्य और माँग

⇒ ऊँचाई और तापमान

(iii) शून्य सहसंबंध (Zero Correlation)

    जब दो चरों के बीच कोई निश्चित संबंध नहीं होता, तो उसे शून्य सहसंबंध कहते हैं। स्कैटर डायग्राम में बिंदु अनियमित रूप से बिखरे होते हैं।
उदाहरण-

⇒ जूते का साइज और बुद्धि

⇒ जन्म-तिथि और परीक्षा-अंक

स्कैटर डायग्राम के लाभ

✍️ यह सहसंबंध को सरल और दृश्य रूप में प्रस्तुत करता है।

✍️ यह प्रारंभिक विश्लेषण के लिए अत्यंत उपयोगी है।

✍️ इसे बनाना और समझना आसान है।

✍️ यह आँकड़ों में किसी भी असामान्यता (Outlier) को स्पष्ट दिखा देता है।

✍️ यह आगे की सांख्यिकीय विधियों (जैसे Karl Pearson सहसंबंध) के लिए आधार प्रदान करता है।

सीमाएँ

    स्कैटर डायग्राम की निम्नलिखित सीमाएँ है-

✍️ यह सहसंबंध की सटीक मात्रा नहीं बताता।

✍️ बड़े आँकड़ों में बिंदु आपस में मिल जाते हैं, जिससे स्पष्टता कम हो जाती है।

✍️ यह केवल दो चरों के बीच संबंध दर्शा सकता है।

✍️ व्यक्तिगत व्याख्या (Subjective Interpretation) पर अधिक निर्भर करता है।

भूगोल एवं अन्य विषयों में उपयोग

   स्कैटर डायग्राम का प्रयोग भूगोल, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, जनसंख्या अध्ययन, पर्यावरण अध्ययन आदि में व्यापक रूप से किया जाता है।

भूगोल में उपयोग जैसे-

  वर्षा और नदी प्रवाह, जनसंख्या घनत्व और संसाधन, तापमान और वनस्पति जैसे संबंधों को समझने के लिए स्कैटर डायग्राम अत्यंत उपयोगी है।

निष्कर्ष:

   अतः कहा जा सकता है कि सहसंबंध के अध्ययन में स्कैटर डायग्राम एक सरल, प्रभावी और उपयोगी ग्राफिकल विधि है। यह दो चरों के बीच संबंध की दिशा और प्रकृति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

    यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी प्रारंभिक विश्लेषण और शोध के लिए इसका महत्व अत्यधिक है। सांख्यिकी और भूगोल के विद्यार्थियों के लिए स्कैटर डायग्राम सहसंबंध को समझने का एक मजबूत आधार प्रदान करता है।

Minor Course or MIC-4 / Population Geography (Theory) Questions Paper 2025

Minor Course or MIC-4

Population Geography (Theory)

Questions Paper 2025



(Patliputra University Patna)

Minor Course or MIC-4

Part A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2-20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) Population Geography is a branch of:

(a) Settlement Geography

(b) Cultural Geography

(c) Human Geography

(d) Physical Geography

जनसंख्या भूगोल की एक शाखा है।

(a) अधिवास भूगोल

(b) सांस्कृतिक भूगोल

(c) मानव भूगोल

(d) भौतिक भूगोल

(ii) Which one of the following continents has the highest growth rate of population?

(a) Africa

(b) South America

(c) Asia

(d) North America

निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में अधिकतम जनसंख्या वृद्धि दर है?

(a) अफ्रीका

(b) दक्षिण अमेरिका

(c) एशिया

(d) उत्तर अमेरिका

(iii) Which Ministry of Government of India looks after census operations in India?

(a) Ministry of Statistics and Programme

(b) Ministry of Education Implementation

(c) Ministry of Home Affairs

(d) Ministry of Finance

निम्नलिखित में से भारत सरकार का कौन-सा मंत्रालय देश में जनगणना कार्य का संचालन करता है?

(a) सांख्यिकीय एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय

(b) शिक्षा मंत्रालय

(c) गृह मंत्रालय

(d) वित्त मंत्रालय

(iv) Which state has lowest sex-ratio as per the census 2011?

(a) Maharashtra

(b) Rajasthan

(c) Punjab

(d) Haryana

2011 की जनगणना के अनुसार किस राज्य में लिंगानुपात सबसे कम है?

(a) महाराष्ट्र

(b) राजस्थान

(c) पंजाब

(d) हरियाणा

(v) Which one of the following is the important factor in rural-urban migration in India?

(a) Agricultural inefficiency

(b) Population growth

(c) Lock of basic services in rural areas

(d) Unemployment

निम्नलिखित में से कौन भारत में ग्रामीण-नगरीय प्रवास का महत्वपूर्ण कारक है?

(a) कृशि अक्षमता

(b) जनसंख्या वृद्धि

(c) ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सेवाओं का अभाव

(d) बेरोजगारी

(vi) An example of pull factor is:

(a) Employment

(b) Education

(c) Health

(d) Hunger

पुल फैक्टर का एक उदाहरण है:

(a) रोजगार

(b) शिक्षा

(c) स्वास्थ्य

(d) भूख

(vii) NPP stands for:

(a) National Provident Policy

(b) National Population policy

(c) National Poverty Protection

(d) All of these

एनपीपी का तात्पर्य है:

(a) राष्ट्रीय भविष्य निधि नीति

(b) राष्ट्रीय जनसंख्या नीति

(c) राष्ट्रीय गरीबी संरक्षण

(d) इनमें से सभी

(viii) The largest union territory of India in terms of population is:

(a) Delhi

(b) Chandigarh

(c) Pondicherry

(d) Lakshadweep

जनसंख्या की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा केन्द्रशासित प्रदेश है:

(a) दिल्ली

(b) चंडीगढ़

(c) पांडिचेरी

(d) लक्षद्वीप

(ix) According to the 2011 census, what is the sex-ratio in India?

(a) 927

(b) 933

(c) 936

(d) 943

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लिंगानुपात क्या है?

(a) 927

(b) 933

(c) 936

(d) 943

(x) The population of a metropolitan city is:

(a) More Than 10 lakh

(b) More Than 15 lakh

(c) More Than 40 lakh

(d) More Then 50 lakh

मेट्रोपोलिटन नगर की जनसंख्या होती है:

(a) 10 लाख से अधिक

(b) 15 लाख से अधिक

(c) 40 लाख से अधिक

(d) 50 लाख से अधिक

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [10×2-20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. What is population data?

जनसंख्या आँकड़ा क्या है?

3. Describe the sources of population data and the reliability of data.

जनसंख्या आँकड़ों के स्रोत एवं आँकड़ों को विश्वसनीयता का वर्णन कीजिए।

4. Describe optimal population.

अनुकूलतम जनसंख्या का वर्णन कीजिए।

5. What is fertility and mortality?

प्रजननशीलता एवं मृत्यु-दर क्या है?

6. What are the main causes of migration?

प्रवास के मुख्य कारण क्या हैं?

7. Discuss on the declining sex-ratio in India.

भारत में घटते लिंगानुपात पर चर्चा कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3×10=30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Describe the nature and scope of Population Geography.

जनसंख्या भूगोल की प्रकृति तथा विषय-क्षेत्र का वर्णन कीजिए।

9. Throw light on the present trends of international migration of human beings.

मानव समुदाय के अन्तर्राष्ट्रीय स्थानान्तरण की वर्तमान प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।

10. Write notes on the following:

निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए:

(i) Age-sex structure in the world

विश्व में आयु-लिंगानुपात संरचना

(ii) Aging population

वृद्ध जनसंख्या

11. Explain the occupational structure of population in India.

भारत में जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की व्याख्या कीजिए।

12. Write about the population policies and programmes in India.

भारत में जनसंख्या नीति एवं कार्यक्रमों के बारे लिखिए।

UG Regular Semester-IV Examination 2025 QUESTION PAPER, Patliputra University, Patna

UG Regular Semester-IV

Examination 2025



Patliputra University, Patna

UG Regular Semester-IV Examination 2025

(Session: 2023-27)

(MJC-5: MAJOR CORE COURSE) GEOGRAPHY

Paper Code: 410808

(Human Geography)

Time: Three Hours] [Maximum Marks: 70

Note : Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the sections as directed.

परीक्षार्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दें।

Section-A / खंड -अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

(i) Who has defined Human Geography as the study of relationship between human societies and earth’s surface?

(a) Ratzel

(b) Ellen C. Semple

(c) Blache

(d) Al-Idrisi

मानव भूगोल को मानव समाज और पृथ्वी की सतह के बीच सम्बन्धों के अध्ययन के रूप में किसने परिभाषित किया है?

(a) रैटजेल

(b) एलेन सी. सेम्पल

(c) ब्लाश

(d) अल-इदरीसी

(ii) Who coined the term ‘neo-determinism’?

(a) Griffith Taylor

(b) Ratzel

(c) Blache

(d) Christaller

‘नव-नियतिवाद’ शब्द किसने गढ़ा?

(a) ग्रिफिथ टेलर

(b) रैटजेल

(c) ब्लाश

(d) क्रिस्टालर

Which one of the following is not an approach in Human Geography?

(a) Areal differentiation

(b) Spatial organisation

(c) Quantitative revolution

(d) Exploration and description

निम्नलिखित में से कौन-सा मानव भूगोल का दृष्टिकोण नहीं है?

(a) क्षेत्रीय विभेदीकरण

(b) स्थानिक संगठन

(c) मात्रात्मक क्रांति

(d) अन्वेषण और विवरण

(iv) Which subject is called mother discipline?

(a) Geography

(b) Economics

(c) History

(d) Political Science

किस विषय को मातृ विषय कहा जाता है?

(a) भूगोल

(b) अर्थशास्त्र

(c) इतिहास

(d) राजनीति विज्ञान

(v) What is the average density of the world population?

(a) 31

(b) 35

(c) 38

(d) 54

विश्व की जनसंख्या का औसत घनत्व कितना है?

(a) 31

(b) 35

(c) 38

(d) 54

(vi) Which one of the following is not anarea of the sparse population?

(a) The Atacama

(b) Equatorial Region

(c) South-EastAsia

(d) Polar Regions

निम्नलिखित में से कौन विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र नहीं है?

(a) अटाकामा

(b) भूमध्यरेखीय प्रदेश

(c) दक्षिण-पूर्व एशिया

(d) ध्रुवीय प्रदेश

(vii) Which of the following is called as ‘Heart of the city’?

(a) Central Business District

(b) Zone of working men’s house

(c) The zone of better residence

(d) The commuter’s zone

निम्नलिखित में से किसे ‘शहर का हृदय’ कहा जाता है

(a) केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र

(b) कामकाजी पुरुषों के घर का क्षेत्र

(c) बेहतर निवास का क्षेत्र

(d) आवागमन क्षेत्र

Which among the following is the largest tribe of India?

(a) Bhils

(b) Santhals

(c) Gonds

(d) Nagas

निम्नलिखित में से भारत की सबसे बड़ी जनजाति कौन-सी है?

(a) भील

(b) संथाल

(c) गोंड

(d) नागा

(ix) Jarawa tribe is found here:

(a) Bihar

(b) Odisha

(c) Nagaland

(d) Andaman Islands

जरावा जनजाति कहाँ पायी जाती है?

(a) बिहार

(b) उड़ीसा

(c) नागालैंड

(d) अंडमान द्वीप

(x) The Central Place Theory was postulated by:

(a) C.D. Harris

(b) J. Gottman

(c) W. Christaller

(d) P. Geddes

केन्द्रीय स्थान सिद्धांत किसके द्वारा प्रतिपादित किया था?

(a) सी.डी. हैरिस गया

(b) जे. गॉटमैन

(c) डब्ल्यू. क्रिस्टालर

(d) पी.गेडे

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. Discuss the nature of Human Geography.

मानव भूगोल की प्रकृति का वर्णन कीजिए।

3. Describe the concept of Determinism.

निश्चयवाद की संकल्पना का वर्णन कीजिए।

4. Write two causes of uneven distribution of population in India.

भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के दो कारणों को लिखिए।

5. Define Races. Name major tribal groups of Bihar.

प्रजाति को परिभाषित कीजिए। बिहार के प्रमुख प्रजाति समूहों के नाम लिखिए। Discuss the problems of urbanisation in India.

भारत में नगरीकरण की समस्याओं की समीक्षा कीजिए।

What are the major types of settlements?

अधिवासों के प्रमुख प्रकार क्या है?

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note : Answer any three questions of the following. Each question carries 10 marks. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. What do you mean by Human Geography? Describe the branches of Human Geography.

मानव भूगोल से आपका क्या अभिप्राय है? इसकी मुख्य शाखाओं का वर्णन कीजिए।

9. Discuss the concept and main features of Malthusian theory of population.

माल्थस के जनसंख्या सिद्धान्त की अवधारणाओं तथा प्रमुख तत्वों की विवेचना कीजिए।

10. Describe characteristics and types of rural settlements.

ग्रामीण बस्तियों की विशेषताओं एवं प्रकारों का वर्णन कीजिए।

11. Give an account of the habitat, economy and social conditions of Santhals.

संथालों के निवास-स्थल, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक दशाओं का एक विवरण दीजिए।

12. Discuss in detail about the trends and pattern of urbanization in India.

भारत में शहरीकरण की प्रवृत्तियों और स्वरूप के बारे में विस्तार से चर्चा कीजिए।



UG (Regular) (Semester-IV) Examination, 2025

(Session: 2023-27)

(MJC-6: MAJOR CORE COURSE)

GEOGRAPHY

Paper Code: 410809

(Geography of India and Bihar)

Time: Three Hours] [Maximum Marks : 70

Note : Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

परीक्षार्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

Section-A / खंड -अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

(i) ‘Durand Line’ demarcated the Indian boundary with which of the following countries?

(a) Afghanistan

(b) Nepal

(c) Myanmar (Burma)

(d) Tibet

‘डूरंड रेखा’ निम्नलिखित में से किस देश के साथ भारतीय सीमा निर्धारित करती है?

(a) अफगानिस्तान

(b) नेपाल

(c) म्यांमार (बर्मा)

(d) तिब्बत

(ii) Which one of the following forms the real watershed of the peninsula?

(a) Anaimudi

(b) Pushpagiri

(c) Perumal Peak

(d) Western Ghats

निम्नलिखित में से कौन प्रायद्वीप का वास्तविक जलविभाजक बनाता है?

(a) अनाइमुडी

(b) पुष्पागिरी

(c) पेरुमल शिखर

(d) पश्चिमी घाट

(iii) EL-NINO is also called as:

(a) Hail

(b) Southern Oscillation

(c) Tornado

(d) Jet Stream

अल-नीनो को ऐसा भी कहा जाता है:

(a) ओला

(b) दक्षिणी दोलन

(c) बवंडर

(d) जेट धारा

(iv) Laterite soil is rich in:

(a) Phosphorus

(b) Calcium Cabonate

(c) Potassium

(d) Iron Oxide

लैटेराइट मिट्टी में समृद्धता होती है:

(a) फास्फोरस

(b) कैल्शियम कार्बोनेट

(c) पोटैशियम

(d) आयरन ऑक्साइड

(v) The percentage of forest cover in India is

(a) 8.5%

(b) 10.5%

(c) 19.51%

(d) 21.70%

भारत में वन क्षेत्र का प्रतिशत है:

(a) 8.5%

(b) 10.5%

(c) 19.51%

(d) 21.70%

Under which Five Year Plan the major steel plants in India were established?

(a) First

(b) Second

(c) Fourth

(d) Fifth

भारत में किस पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत प्रमुख इस्पात संयंत्रों को स्थापित किया गया था?

(a) प्रथम

(b) द्वितीय

(c) चतुर्थ

(d) पाँचवीं

(vii) India’s first Cotton Textile Industry was established in ——— 1854.

(a) Mumbai

(b) Ahmedabad

(c) Kolkata

(d) Coimbatore

भारत में प्रथम सूती वस्त्र उद्योग 1854 में स्थापित हुआ था।

(a) मुम्बई

(b) अहमदाबाद

(c) कोलकाता

(d) कोयम्बटूर

(viii) Which of the following State has the highest deposits of Tertiary coal in India?

(a) Jammu and Kashmir

(b) Gujarat

(c) Maharashtra

(d) Odisha

भारत में निम्नलिखित में से किस राज्य में तृतीयक कोयले का सर्वाधिक भंडार है?

(a) जम्मू और कश्मीर

(b) गुजरात

(c) महाराष्ट्र

(d) उड़ीसा

(ix) Which is the most populous district in Bihar?

(a) Begusarai

(b) Darbhanga

(c) Patna

(d) Gaya

बिहार का सबसे अधिक आबादी वाला जिला कौन-सा है?

(a) बेगूसराय

(b) दरभंगा

(c) पटना

(d) गया

(x) Which mountain range forms the northern border of Bihar?

(a) Aravalli Range

(b) Eastern Ghats

(c) Himalayas

(d) Vindhyan Range

कौन-सी पर्वत श्रृंखला बिहार की उत्तरी सीमा बनाती है?

(a) अरावली श्रेणी

(b) पूर्वी घाट

(c) हिमालय

(d) विन्ध्य श्रेणी

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note : Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. What are the five physiographic divisions of India?

भारत के पाँच भौतिक विभाग क्या हैं?

3. What are the major soil types found in India?

भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टी के प्रकार क्या है?

4. State any two characteristics of Indian Monsoon.

भारतीय मानसून की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिये।

5. Explain the problems faced by the Sugar Industry in India.

भारत में चीनी उद्योग के सामने आने वाली समस्याओं की व्याख्या कीजिये।

6. Give a brief summary of the rivers of South Bihar.

दक्षिण बिहार की नदियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

7. What are the main causes of floods in Bihar?

बिहार में बाढ़ के मुख्य कारण क्या हैं?

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note : Answer any three questions of the following. Each question carries 10 marks. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Devide India into physiographic divisions. Discuss any one in detail.

भारत को भौतिक विभागों में विभाजित कीजिये। किसी एक का विस्तार से वर्णन कीजिये।

9. What is natural vegetation? influencing What are the factors in vegelation? What are the types of vegetation in India?

प्राकृतिक वनस्पति क्या है? वनस्पति को प्रभावित करने वाले कारक क्या है? भारत में वनस्पति के प्रकार क्या है?

10. Write a reasoned account of trends of production and distribution of Iron and Steel Industry in India.

भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के उत्पादन तथा वितरण का युक्तियुक्त विवरण प्रस्तुत कीजिये।

11. Discuss the Cotton Textile Industry in India.

भारत में सूती वस्त्र उद्योग की समीक्षा कीजिये।

12. Explain the distributional pattern of population in Bihar.

बिहार में आबादी के वितरण प्रारूप का वर्णन कीजिये।




UG (Regular) (Semester-IV) Examination, 2025

(Session: 2023-27)

(MJC-7: MAJOR CORE COURSE)

GEOGRAPHY

Paper Code: 410810

(Statistical Methods in Geography)

Time: Three Hours] [Maximum Marks : 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from the following questions. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

1. निम्नलिखित प्रश्नों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

(i) Which of the following values is used as a summary measure for a sample, such as a sample mean?

(a) Population parameter

(b) Sample parameter

(c) Sample statistic

(d) Population mean

निम्नलिखित में से किस मूल्य को एक प्रतिदर्श के लिए सारांश माप के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि एक प्रतिदर्श माध्य?

(a) जनसंख्या प्राचल

(b) प्रतिदर्श प्राचल

(c) प्रतिदर्श सांख्यिकी

(d) जनसंख्या माध्य

(ii) The mean of the data : 4, 10, 5, 9, 12, is:

(a) 8

(b) 10

(c) 9

(d) 15

4, 10, 5, 9, 12 आँकड़ों का माध्य है:

(a) 8

(b) 10

(c) 9

(d) 15

(iii) The median of the data 13, 15, 16, 17, 19, 20 is:

(a) 30/2

(b) 31/2

(c) 33/2

(d) 35

13, 15, 16, 17, 19, 20 आँकड़ों की माध्यिका है

(a) 30/2

(b) 31/2

(c) 33/2

(d) 35/2

(iv) Construction of a cumulative frequency table is useful in determining the—-

(a) Mean

(b) Median

(c) Mode

(d) All the above three measures

संचयी बारंबारता सारणी का निर्माण…….. के निर्धारण में उपयोगी है।

(a) माध्य

(b) माध्यिका

(c) बहुलक

(d) उपरोक्त सभी

(v) The sum of deviations of a set of observations from their mean is always:

(a) Zero

(b) Negative

(c) Positive

(d) Undefined

प्रेक्षणों के एक समूह के उनके माध्य से विचलनों का योग सदैव होता है

(a) शून्य

(b) नकारात्मक

(c) सकारात्मक

(d) अपरिभाषित

(vi) Which of the following is not a measure of central tendency?

(a) Mean

(b) Median

(c) Mode

(d) Standard deviation

निम्नलिखित में से कौन-सा केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप नहीं है?

(a) माध्य

(b) माध्यिका

(c) बहुलक

(d) मानक विचलन

(vii) The number of a student in class is 100. This is an example of

(a) Discrete data

(b) Categorised data

(c) Continuous data

(d) Qualitative data

कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या 100 है। यह का उदाहरण है।

(a) असतत् आँकड़ा

(b) श्रेणीबद्ध आँकड़ा

(c) सतत् आँकड़ा

(d) गुणात्मक आँकड़ा

(viii) A survey in which information is collected from each and every individual of the population is known as:

(a) Sample survey

(b) Pilot survey

(c) Biased survey

(d) Census survey

एक सर्वेक्षण, जिसमें जनसंख्या के हरेक एवं प्रत्येक व्यक्ति से जानकारी एकत्रित की जाती है को जाना जाता है:

(a) नमूना सर्वेक्षण के रूप में

(b) पायलट सर्वेक्षण के रूप में

(c) पक्षपातपूर्ण सर्वेक्षण के रूप में

(d) जनगणना सर्वेक्षण के रूप में

(ix) The data which have already been collected by some one are:

(a) Secondary data

(b) Raw data

(c) Primary data

(d) Fictious data

वह आँकड़ा जो पहले से ही किसी के द्वारा एकत्रित किया है, वह है:

(a) द्वितीयक आँकड़ा

(b) कच्चा आँकड़ा

(c) प्राथमिक आँकड़ा

(d) काल्पनिक आँकड़ा

(x) The questionnaire survey method is used to collect:

(a) None of these

(b) Secondary data

(c) Primary data

(d) Qualitative variable

प्रश्नावली सर्वेक्षण पद्धति का उपयोग ………. एकत्र करने के लिए किया जाता है।

(a) इनमें से कोई नहीं

(b) द्वितीयक आँकड़ा

(c) प्राथमिक आँकड़ा

(d) गुणात्मक

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks.  [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।

2. List down three sources of primary data.

प्राथमिक आँकड़ों के तीन स्रोतों की सूची बनाइए।

3. Give five methods of collecting statistical data.

सांख्यिकीय आँकड़ों को एकत्रित करने की पाँच विधियाँ बताइए।

4. Discuss each:

प्रत्येक का वर्णन कीजिये:
(i) statistics

सांख्यिकीय

(ii) Mode

बहुलक

(iii) Median

माध्यिका

5. What is Co-efficient of Variation?

विचरण गुणांक क्या हैं?

6. Discuss the different types of levels of data measurement.

आँकड़ा मापन के स्तरों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिये।

7. What is Correlation?

सहसम्बन्ध क्या है?

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note : Answer any three questions of the following. Each question carries 10 marks. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Calculate ‘Median’ of the following data:

निम्नलिखित आँकड़ों की मदद से ‘माध्यिका’ की गणना कीजिये:

Rainfall (cms.)

वर्षा (से.मी.)

60-70 50-60  40-50 30-40 20-30
No. of  Stations

स्टेशनों की संख्या

40 50 60 30 10

9. What are measures of dispersion? Discuss the utility of these measures in geographical studies.

विचलन के मापक क्या हैं? भौगोलिक अध्ययनों में इन मापकों की उपयोगिता का वर्णन कीजिये।

10. Write a detailed note on Karl Pearson’s coefficient of correlation.

कार्ल पियर्सन के सहम्बन्ध गुणांक के बारे में विस्तार से टिप्पणी लिखिए।

11. Discuss different types of sampling.

प्रतिचयन के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिये।

12. Write notes on the following:

निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिये

(i) Significance of statistical methods in Geography

भूगोल में सांख्यिकीय विधियों का महत्त्व

(ii) Scale of measurement

माप का पैमाना

40. SCALES OF MEASUREMENT (मापन के पैमाने)

SCALES OF MEASUREMENT

(मापन के पैमाने)



      भौगोलिक आँकड़ों के मापन का तात्पर्य नियमों के अनुसार आँकड़ों का वर्गीकरण, विश्लेषण और मानचित्रण है। आँकड़ों में अन्तरनिहित समरूपता के आधार पर आँकड़ों का कई तरह से प्रदर्शन ही मापक कहा जाता है। सामान्यतया भौगोलिक आँकड़ों के मापन स्तर के 4 वर्ग हैं।

1. नामिक मापक (Nominal Scale):-

     इसे प्रतीक मापक कहा जा सकता है क्योंकि यह आँकड़ों की किसी उल्लेखनीय विशेषता के आधार पर उनका वर्णन नहीं करता है। केवल प्रतीक रूप में वर्गीकरण और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जैसे- पशुओं का गाय, बैल, भैंस, बकरी में विभाजन या यौनानुपात में स्त्री-पुरुष, मिट्टी विभाजन में दोमट, बलुई आदि नामिक मापक के उदाहरण है।

    इस मापक से आँकड़ों के वास्तविक मूल्य का बोध नहीं होता है, बल्कि उनके प्रतीकों का बोध होता है। भौगोलिक विश्लेषण में बहुलक (Mode) का प्रयोग इसके आधार पर किया जाता है।

2. क्रमसूचक मापक (Ordinal Scale):-

      इसके अन्तर्गत विभिन्न आँकड़ों को अधिकतम और न्यूनतम परिमाण के आधार पर आरोही अथवा अवरोही क्रमों में रखते हैं। इस तरह आँकड़ों में अन्तर का आधार उनकी मात्रा (Quantity) रहती है। जैसे आकार के आधार पर नगरों, गाँवों का वर्गीकरण, दुकानों की संख्या, खुलनशीलता के आधार पर वर्गीकरण, उत्पादन के अनुसार विभिन्न इकाइयों का वर्गीकरण इसके उदाहरण हैं।

   इस प्रकार के आँकड़ों के विश्लेषण में अनेक सांख्यिकीय विधियों, आरेख और मानचित्र उपयोगी हैं। जैसे नगरों या गाँवों के वितरण में क्रमशः आकार के अनुसार वर्गीकरण, उच्चावचन में अधिक ऊँचा, मध्यम या न्यून ऊँचा क्षेत्र आदि है।

3. अन्तराल मापक (Interval Scale):-

    अन्तराल मापन समान इकाई मापक के आधार पर आँकड़ों का वर्णन करता है। इसमें क्रमसूचक मापक के अनुसार आँकड़ों के बीच का अन्तराल परिवर्तनशील होता है। इससे असंख्य आँकड़ों को संक्षेप में व्यवस्थित कर लेते हैं और आँकड़ों का क्रम भी बना रहता है। जैसे- < 5, 5-10, 10-15, 15-20 आदि। इसमें 0 से 20 तक जितने भी प्रेक्षण हैं, सभी किसी भी अन्तराल वर्ग में रखे जा सकते हैं। इस पर माध्य, मानक विचलन, सहसम्बन्ध आदि अनेक सांख्यिकीय विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं।

4. आनुपातिक मापक (Ratio Scale):-

    आनुपातिक मापक का प्रयोग करके बड़ी संख्या में आँकड़ों को लघुतम रूप में व्यक्त कर सकते हैं। जैसे 10/100 को 1/10, 5/50, 2/20 आदि रूप में व्यक्त कर सकते हैं। अधिकांश भौगोलिक आँकड़े आनुपातिक मापक पर ही पाये जाते हैं।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

(i) नाममात्र पैमाना (Nominal Scale):-

     नाममात्र पैमाना मापन का सबसे सरल और प्रारंभिक पैमाना है। इसमें आँकड़ों को केवल नाम या श्रेणी के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें संख्याएँ केवल पहचान (Identification) के लिए होती हैं

✍️ न तो क्रम होता है और न ही परिमाण

✍️ गणितीय क्रियाएँ संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ भूमि उपयोग के प्रकार (कृषि, वन, बंजर)

✍️ मिट्टी के प्रकार

✍️ जलवायु के प्रकार

✍️ धर्म, भाषा, जाति

महत्व

     नाममात्र पैमाना भूगोल में वर्गीकरण और मानचित्रण के लिए उपयोगी है, जैसे- भूमि उपयोग मानचित्र।

(ii) क्रमिक पैमाना (Ordinal Scale):-

    क्रमिक पैमाने में आँकड़ों को क्रम या रैंक के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें क्रम (Order) होता है

✍️ परंतु दो मानों के बीच का अंतर ज्ञात नहीं होता

✍️ केवल तुलना संभव होती है

भूगोल में उदाहरण

✍️ जनसंख्या घनत्व: उच्च, मध्यम, निम्न

✍️ विकास स्तर: विकसित, विकासशील, अविकसित

✍️ नगरीय श्रेणीकरण

महत्व

     यह पैमाना भूगोल में क्षेत्रीय तुलना और स्तरीकरण (Ranking) के लिए अत्यंत उपयोगी है।

(iii) अंतराल पैमाना (Interval Scale):-

     अंतराल पैमाने में आँकड़ों के बीच समान अंतर होता है, परंतु पूर्ण शून्य (True Zero) नहीं होता।

विशेषताएँ

✍️ क्रम और अंतर दोनों मौजूद

✍️ शून्य केवल सांकेतिक होता है

✍️ गुणा और भाग संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ तापमान (सेल्सियस, फारेनहाइट)

✍️ तिथियाँ और वर्ष

✍️ ऊँचाई (समुद्र तल के सापेक्ष)

महत्व

    यह पैमाना भौतिक भूगोल में-

✍️ जलवायु विश्लेषण

✍️ तापमान प्रवृत्ति

✍️ समय आधारित अध्ययन के लिए उपयोगी है।

(iv) अनुपात पैमाना (Ratio Scale):- 

    अनुपात पैमाना मापन का सबसे उन्नत और पूर्ण पैमाना है। इसमें समान अंतर के साथ-साथ पूर्ण शून्य भी होता है।

विशेषताएँ

✍️ क्रम, अंतर और अनुपात तीनों मौजूद

✍️ सभी गणितीय क्रियाएँ संभव

✍️ सबसे विश्वसनीय पैमाना

भूगोल में उदाहरण- जनसंख्या, वर्षा की मात्रा, दूरी, क्षेत्रफल, उत्पादन

महत्व

     अनुपात पैमाना भूगोल में-

✍️ सांख्यिकीय विश्लेषण

✍️ मॉडल निर्माण

✍️ पूर्वानुमान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मापन के पैमानों का तुलनात्मक सार

पैमाना क्रम अंतर पूर्ण शून्य
नाममात्र
क्रमिक
अंतराल
अनुपात

भूगोल में मापन पैमानों का महत्व

✍️ भौगोलिक आँकड़ों की वैज्ञानिक व्याख्या

✍️ उपयुक्त सांख्यिकीय विधि का चयन

✍️ मानचित्रण एवं मॉडलिंग

✍️ क्षेत्रीय योजना और नीति निर्माण

✍️ शोध एवं परियोजना कार्य

निष्कर्ष 

       मापन के पैमाने भूगोल में सांख्यिकीय अध्ययन की आधारशिला हैं। ये आँकड़ों को अर्थपूर्ण, तुलनात्मक और विश्लेषण योग्य बनाते हैं। प्रत्येक पैमाने की अपनी सीमाएँ और उपयोगिता है। भूगोल के छात्र के लिए इन पैमानों की स्पष्ट समझ आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना सांख्यिकीय विश्लेषण अधूरा माना जाता है।

21. Fundamental Concepts in Human Geography (मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)

Fundamental Concepts in Human Geography

(मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)



अवधारणाएँ (Concepts):-

      अवधारणाएँ किसी भी विषय का एक महत्वपूर्ण अंग होती है, क्योंकि वे उस विषय को एक अलग पहचान देने का काम करती है। जबकि एक विषय की मौलिक अवधारणाएँ उस विषय में अध्ययन किए गए तथ्यों की प्रकृति और उन तथ्यों का अध्ययन करने हेतु अपनाए गए परिप्रेक्ष्य या दृष्टिकोण पर निर्भर करती है, क्योंकि पृथक् पृथक् विषय तथ्यों के पृथक् पृथक् समूहों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और पृथक पृथक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग करते है इसलिए उनके पास अवधारणाओं का उनका अपना विशिष्ट समूह होता है।

    मानव भूगोल की कुछ अवधारणाएँ तो अभिन्न अंग है जो मानव भूगोल की विशिष्ट प्रकृति को चरित्रित करने में उपयोगी है। इसी कारण इन्हें मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं के रूप में जाना जाता है। मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाएँ समय (काल), स्थान/जगह, अवस्थिति, स्थानिक वितरण, स्थानिक अंत: क्रिया और स्थानिक संगठन मानव भूगोल की अपनी मूल अवधारणाएँ है।

     जबकि दूसरी ओर समय (काल), समाज, संस्कृति, धारणा, व्यवहार, विकास और असमानता जैसी अवधारणाएँ व्युत्पन्न अवधारणाएँ है। अतः मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं का विस्तृत अध्ययन निम्न प्रकार है-

(1) मापक (Scale):-

    मानचित्र का मापक मानचित्र पर दूरी तथा धरातल पर वास्तविक दूरी का अनुपात है। जैसे मानचित्र पर 1 इंच धरातल पर 20 मील को प्रदर्शित कर सकता है। द्वितीय मापक का विश्लेषण किसी क्षेत्रीय इकाई के आकार के रूप में करता है जिस पर किसी समस्या का विश्लेषण किया जाता है, जैसे- देश, राज्य या जिला स्तर।

    तथ्य विषयक/ परिघटनात्मक मापक का मतलब उस आकार से है जिस पर भौगोलिक संरचनाएँ उपलब्ध है अथवा जिस पर भौगोलिक प्रक्रिया संसार में काम कर रही है। विद्वानों द्वारा अध्ययन किए गए तथ्य-विषयकों/परिघटना को सूक्ष्म, समष्टि या वृहत् स्तर पर देखा जा सकता है। यह स्थानीय, प्रादेशिक या वैश्विक स्तर पर भी उपलब्ध हो सकते है। जैसे- एक समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बोली स्थानीय स्तर पर मिलती है जबकि एक भाषा प्रादेशिक स्तर या वैश्विक स्तर पर मिलती है।

(2) समय/काल और जगह/स्थान (Time/Period and Place/Space):-

      समय तथा जगह दोनों पृथ्वी की सतह पर किसी भी वस्तु के अस्तित्व की दो मूलभूत वास्तविकताएँ है। काण्ट (1724-1804) का मत था कि समय (काल) और जगह स्थान मानव अनुभव की सम्पूर्ण परिधि को भरते है। मानव सहित समस्त कुछ समय (काल) और जगह स्थान के अन्तर्गत होता है।

   समय (काल) और जगह दोनों को रोजमर्रा के शब्दों के रूप में जाना जाता है, क्योंकि हम समस्त अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में समय एवं जगह सम्बन्धी तथ्यों का सामना करते हैं। फलस्वरूप, हम सभी को इन शब्दों के बारे में सामान्य समझ है। इसके बावजूद इन अवधारणाओं को परिभाषित करना मुश्किल है। समय के साथ दो लगातार घटित घटनाओं का पृथक्‌करण है। जबकि जगह को दो स्थानों के मध्य पृथक्‌करण के रूप में माना गया है।

     इतिहास समय (काल) के साथ सम्बन्धित है। इसी कारण इतिहासकार वास्तविकता के लौकिक या सामयिक आयाम से सम्बन्ध रखते है। वे मुख्य रूप से समाज के लौकिक या सामयिक क्रम विकास का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं। मानव इतिहास में अब तक जो कुछ घटित हुआ है, वह केवल विशिष्ट स्थानों पर हुआ है जबकि भूगोल का सम्बन्ध जगह से है। इसलिए भूगोलवेत्ता वास्तविकता के स्थानिक आयामों से सम्बन्ध रखते है। अतः भूगोल को एक क्षेत्र या स्थानिक विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया है।

      समय एवं जगह की अवधारणाओं की परस्पर अन्तनिर्भरता इतिहास और भूगोल के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध की वकालत करते है। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (485-428 ई. पू.) का मत है कि “सम्पूर्ण इतिहास को भौगोलिक रूप से देखना चाहिए और सम्पूर्ण भूगोल को ऐतिहासिक रूप से देखना चाहिए।”

(3) क्षेत्र, स्थान और प्रदेश (Area, Place and Region):-

     कई विद्वानों ने संसार को समझने हेतु क्षेत्र, स्थान एवं प्रदेश की अवधारणा को विकसित किया है। क्षेत्र शब्द सामान्यतः किसी स्थान के एक भाग या पृथ्वी की सतह के एक भाग के रूप में माना गया है जिसका एक निश्चित विस्तार एवं सीमा होती है, परन्तु यह किसी आकार का हो सकता है। यह एक सामान्य अवधारणा है, परन्तु इसकी कोई निश्चित अवस्थिति नहीं होती है।

    वहीं दूसरी ओर एक स्थान अपनी भौतिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं या कार्यों के रूप में विशिष्टता व विलक्षणता के कारण निश्चित या अनिश्चित सीमा का क्षेत्र है। किसी स्थान की भौतिक विशेषताओं में भू-आकृतियाँ, जलाशय, मिट्टी, तापमान, वर्षा, वायु, जीव एवं वनस्पति तथा जीवन आदि सम्मिलित है। जबकि सांस्कृतिक विशेषताओं में मानव अधिवास, कारखाने, अस्पताल, विद्यालय, रक्षा प्रतिष्ठान, सड़कें, रेलवे, भाषा, धर्म आदि सम्मिलित है।

(4) तंत्र (Mechanism):-

     तंत्र एक-दूसरे से अंतः परस्पर या एक-दूसरे से जुड़े तत्वों का समूह है या जुड़े हुए सिरों का समूह तंत्र है। पृथ्वी की सतह पर अवस्थित या वितरित तत्व स्थानिक तत्व है। परिवहन तंत्र स्थानिक तंत्र की व्यापक श्रेणी से सम्बन्धित है। जबकि जैविक प्रणाली, सामाजिक तंत्र, कार्यालय व्यवस्थान गैर-स्थानिक तंत्र के उत्तम उदाहरण है। भूगोल विशेषज्ञ अधिकतर स्थानिक तंत्र में ध्यान केन्द्रित रखते है।

     एक तंत्र एवं उसकी संयोजकता का प्रतीकात्मक प्रदर्शन रेखाचित्र के रूप में होता है। यह संधियों द्वारा जुड़े असंधियों या किनारों का एक समूह होता है। स्थानिक तंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व शीर्ष (Vertex) और छोर (edge or link) है। एक असंधि एक रेखाचित्र का एक अंतिम बिंदु या प्रतिच्छेदन बिंदु है। परिवहन तंत्र में असंधि (nodes) का उत्तम उदाहरण सड़क का चौराहा या परिवहन टर्मिनल है।

    मानव भूगोल के प्रमुख विद्वान मानव के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक तत्वों को पृथ्वी की सतह पर व्यवस्थित और संरचित करने के तरीकों के अध्ययन में रुचि लेते हैं। इनमें सड़क तंत्र, रेलवे तंत्र, बिजली तंत्र, संचार तंत्र, सामाजिक एवं संपर्क तंत्र आदि प्रमुख है।

(5) स्थानिक अंतः क्रिया (Spatial Interaction):

     स्थानिक अंतःक्रिया द्वारा पृथ्वी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसलिए एक स्थान के व्यक्ति दूसरे स्थान के व्यक्तियों से सम्पर्क एवं सम्बन्ध स्थापित करते हैं। गाँव से गाँव के मध्य, गाँव से शहरों के मध्य, शहरों का शहरों के मध्य और बन्दरगाह एवं आन्तरिक प्रदेशों के मध्य अन्त: क्रिया होती है। व्यक्ति वस्तुओं, सेवाओं, पैसा, सूचना और विचारों का संचार तथा आदान-प्रदान के कारण स्थानों के मध्य स्थापित अंतर्निर्भरता का सम्बन्ध स्थानिक अंत: क्रिया कहा जाता है।

(6) अवस्थिति एवं स्थानिक वितरण (Location and Spatial Distribution):-

     मानव भूगोल में भूगोलवेत्ता पृथ्वी पर स्थानों, परिघटनाओं की अवस्थिति एवं वितरण की व्याख्या करते हैं, जबकि मानव भूगोल में प्रयुक्त होने वाली अवस्थिति और वितरण की अवधारणा को जानने हेतु सर्वप्रथम स्थानिक, वितरण, अवस्थिति, परिघटना और परिमाण की अवधारणाओं को जानना होगा। गॉर्डन जे. फील्डिंग (1974) ने इन शब्दों की अवधारणाओं के मध्य अन्तर स्पष्ट किया है। स्थानिक शब्द इंगित करता है कि एक परिघटना पृथ्वी की सतह के एक हिस्से को अधिग्रहित करती है। जबकि वितरण एक-दूसरे से सम्बन्धित परिघटनाओं का संयोजन है और वितरण एक प्रकार की परिघटना की व्यवस्था है।

(7) पदानुक्रम और स्थानिक व्यवस्थापन (Hierarchy and Spatial Organisation):-

    पदानुक्रम (Hierarchy) आकार, कार्य या महत्व के किसी अन्य आधार पर वस्तुओं को क्रमबद्ध या श्रेणीबद्ध किया जाता है। स्थानिक शब्द में कल्पना की जाती है कि संसार का आकार, कार्यात्मक महत्व या भौगोलिक महत्व का पदानुक्रम में व्यवस्थित करता है। पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों और वस्तुओं की श्रेणी या क्रम को स्थानिक पदानुक्रम में रखा जाता है। जैसे भारत में बस्तियों का पदानुक्रम।

     जनसख्या के आधार पर भारत में बस्तियों सबसे बड़ी इकाई (महानगर) से लेकर सबसे छोटी इकाई (पल्ली गाँव) तक होती हैं। इसके अलावा भारत की जनगणना के आधार पर शहरी बस्तियों के पदानुक्रम में रखा गया है। स्थानिक पदानुक्रम का एक उत्तम उदाहरण प्रादेशिक पदानुक्रम है। एक प्रदेश समान श्रेणी के प्रदेशों के पदानुक्रम में एक नियत स्थान रखता है। जैसे भारत का सम्पूर्ण क्षेत्र 6 जल संसाधन प्रदेशों में बंटा है। प्रत्येक जल संसाधन प्रदेश में अनेक द्रोणियाँ है। एक द्रोणी कई जलग्रहण क्षेत्रों के मिलने से बनती है एक जलग्रहण क्षेत्र में कई उप-जलग्रहण क्षेत्र होते हैं। एक उप-जलग्रहण क्षेत्र कई वाटरशेड में विभाजित होते है।

    मानवीय बस्तियों का आकार मुख्यतः उनके मध्य अन्तः क्रिया का स्तर निर्धारित करता है। कम जनसंख्या वाली बस्तियों की तुलना में अधिक जनसंख्या वाली बस्तियों के मध्य से सम्बन्धित है। जबकि देहरादून दूरी के कारण दिल्ली के निकट है मुम्बई-देहरादून की तुलना में दिल्ली से अधिक दूर होने पर भी यहाँ स्थानिक पदानुक्रम की अवधारणा का प्रयोग देश के प्रशासन और विकास की योजना का निर्धारण होता है। जैसे-प्रशासनिक उद्देश्य हेतु देश राज्यों और जिलों में बाँट दिया जाता है।

(8) अन्तर्सम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Inter-relationship):-

   इसे पार्थिव एकता की संकल्पना के नाम से भी जाना जाता है। विश्व के सभी भौगोलिक तत्व चाहे वे प्राकृतिक हो या मानवीय एक-दूसरे से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्धित होते है और किसी भी तत्व का अकेले तथा स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। सभी तथ्य एक-दूसरे को प्रभावित करते है।

    अतः किसी प्रदेश का वास्तविक भृदृश्य वहाँ के सभी तथ्यों के मिले-जुले प्रभावों का परिणाम होता है। किसी प्रदेश में मानव जीवन के विवेचन के लिए वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अध्ययन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि मानव जीवन उनसे निश्चित रूप से सम्बन्धित तथा प्रभावित होता है। इसी कारण मानव भूगोल को “मानव पारिस्थितिकी” का अध्ययन माना जाता है।

    जर्मन विद्वान फ्रेडरिक रैटजेल ने “पार्थिव एकता के सिद्धान्त” को ही प्रमुखता प्रदान की थी। इनके अलावा ब्लाश, बूंश, डिमांजिया आदि भूगोलविदों ने भी ‘पार्थिव एकता या अन्तर्सम्बन्धों के सिद्धान्त’ को मानव भूगोल का प्रमुख सिद्धान्त माना है।

(9) कालिक परिवर्तन की संकल्पना (Concept of Temporal Change):-

    कालिक परिवर्तन की संकल्पना को ‘क्रियाशीलता का सिद्धान्त’ के नाम से भी जाना जाता है। विश्व में कोई तत्व पूर्णतः स्थायी नहीं है. क्योंकि यह दुनिया ही परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पर्यावरण के सभी तत्व चाहे वे प्राकृतिक हों या सास्कृतिक, जड़ हो या चेतन सभी परिवर्तनशील हैं। उनमें परिवर्तन की क्रिया निरन्तर क्रियाशील रहती है। बूंश के शब्दों में “हमसे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु परिवर्तित हो रही है, प्रत्येक वस्तु बढ़ रही है या घट रही है। वास्तव में कुछ भी बिना परिवर्तन के नहीं है।” प्रत्येक जीव अथवा वस्तु सभी अपनी उत्पत्ति से विनाश तक जीवन चक्र में परिवर्तित होती रहती है।

(10) सांस्कृतिक भूदृश्य की संकल्पना (Concept of Cultural Landscape):-

    किसी प्रदेश में भू-आकृत्तियों, वनस्पतियाँ, जलाशयों, मानव भूमि उपयोग तथा अन्य प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के सम्पूर्ण योग को भूदृश्य कहा जाता है। तत्वों की प्रकृति के अनुसार उन्हें प्राकृतिक भूदृश्य और सांस्कृतिक भूदृश्य में बाँटा जाता है। भूदृश्य की संकल्पना परम्परागत भूगोल का अभिन्न अंग रही है। जर्मन भाषा में भूदृश्य के समानार्थी ‘लैण्डशाफ्ट’ (Landschaft) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

    अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्ल सावर ने भूदृश्य की व्याख्या की है और उन्होंने कहा है कि सम्पूर्ण भूदृश्य में प्राकृतिक तत्वों के समुच्चयिक स्वरूप को प्राकृतिक भूदृश्य और मानवकृत तत्वों के समुच्चयक स्वरूप को सांस्कृतिक भूदृश्य कहा जा सकता है। मानव द्वारा निर्मित गृह, ग्राम, नगर, मार्ग, सड़क, खेत, बाग-बगीने, फसलें, कल-कारखाने, खेल के मैदान, पार्क आदि सांस्कृतिक भूदृश्य के प्रमुख घटक है।

(11) नियतिवाद की संकल्पना (Concept of Determinism):-

     भूगोल में मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधो का अध्ययन हेतु अनेक पद्धति एवं वैचारिक सम्प्रदाय का विकास हुआ। उनमें से एक विचार निश्चवादी के नाम से जाना जाता है। भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध तक निश्चयवादी विचार का प्रभाव बना रहा। निश्चयवादी विचार का तात्पर्य है- समय का इतिहास, सभ्यता, जीवनशैली, संस्कृति एवं राष्ट्र की सभी धारणाएँ पर्यावरण के द्वारा निर्धारित एवं संचालित होती है।

    भौतिक दशाओं के अनुसार ही मानव के शारीरिक गठन, उसके भोजन, वस्त्र, आवास आदि प्राथमिक आवश्यकताओं, व्यवसायी तथा सामाजिक व सांस्कृतिक क्रियाओं का निर्धारण होता है। इसमें प्रकृति की प्रबलता पर बल दिया है और मनुष्य को प्रकृति का दास माना है। जर्मन भूगोलवेत्ता रैटजेल इस विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। इस विद्यारधारा को पर्यावरणवाद या पर्यावरणीय नियतिवाद के नाम से भी जाना जाता है।

(12) सम्भववाद की संकल्पना (Concept of Possibilism):-

    ‘सम्भववाद’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता लुसियन फैबे (1922) ने किया था, लेकिन इसका प्रतिपादन इससे पूर्व विडाल डी ला ब्लाश के द्वारा किया जा चुका था। अधिकतर फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने मानव की स्वतन्त्रता और उसके कार्यों को बल दिया तथा नियतिवाद विचारधारा की कटु आलोचना की। ब्लाश के अनुसार, “प्राकृतिक वातावरण मानव को सम्भावनाएँ प्रदान करता है, उसके बदले में मानव अपनी आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा क्षमताओं के आधार पर उनका उपयोग करता है।” एक अन्य स्थान पर ब्लाश ने लिखा है, “प्रकृति असंख्य सम्भावनाएँ प्रदान करती है तथा इन सम्भावनाओं का उपयोग मानवीय छांट पर निर्भर करता है।”

(13) नवनिश्चयवाद की संकल्पना (Concept of Neodeterminism):-

    नवनिश्चयवाद, नियतिवाद की संशोधित विचारधारा है, जो व्यावहारिक जगत् के अधिक पास है। इसका प्रतिपादन अमेरिकन भूगोलवेत्ता ग्रिफ्थ टेलर ने किया। टेलर ने इस विचारधारा को ‘वैज्ञानिक निश्चयवाद’ तथा रुको और जाओ निश्चयवाद की संज्ञा दी। टेलर का मानना था कि न तो प्रकृति का मानव पर पूर्ण नियन्त्रण है और न ही मानव का प्रकृति पर। दोनों में एक सक्रिय क्रियात्मक अन्तर्सम्बंध है।

(14) व्यवहारपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Behavioural Geography):-

    यह मानव भूगोल की एक नवीन संकल्पना है। इस विचारधारा का प्रारम्भ अमेरिकन भूगोलवेत्ता विलियम किर्क द्वारा प्रकाशित लेख ‘Historical Geography and the Concept of Behavioural Environment’ के माध्यम से हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था।

    आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था। अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

(15) अतिवादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Radical Geography):-

    अतिवादी भूगोल को उग्र सुधारवाद या अमूल्य चुल परिवर्तनवादी क्रांतिकारी उपागम के नाम से जानते है। अतिवादी भूगोल का जन्म 1960-70 ई० के दशक में USA में हुआ। भूगोल में अतिवाद का उदय मात्रात्मक क्रांति और स्थानिक विश्लेषण के विरोध में हुआ। यह साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है लेकिन इसका उद‌य साम्यवादी या समाजवादी देशों में न होकर पूँजीवादी देश USA में हुआ है।

    अतिवादी भूगोल के विचारधारा को विकसित करने में अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय और वहाँ से प्रकाशित होने वाला पत्रिका ‘एंटीपोड’ का विशेष योगदान है। व्यक्तिगत रूप से डेविड हार्वे और जे.आर. पीट जैसे भूगोलवेताओं का योगदान रहा है। इस विचारधारा का विकास मूलतः पूर्व संस्थापित नियमो की नकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था जिसका केन्द्र बिन्दु मानव कल्याण से सम्बद्ध सामाजिक मूल्यों का प्रश्न है।

        निष्कर्षतः जा सकता है कि मात्रात्मक कांति, व्यावहारात्मक क्रांति,  प्रत्यक्षवादी दर्शन, भूगोल को मानवीय समस्याओं के समाधान से दूर रखकर इसके आधार को ही समाप्त कर रहे थे लेकिन अतिवादी भूगोल ने सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर भूगोल में नई दृष्टि का सूत्रपात्र किया।

(16) मानवतावादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Humanistic Geography):-

    मानवतावादी भूगोल प्रत्यक्षवाद के भी विरुद्ध है क्योंकि प्रत्यक्षवाद उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे आँखों से देखा जा सके। लेकिन मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम वैसे तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे मात्र अनुभव किया जा सके। ‘मानवतावादी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1976 में ‘तुआन’ ने किया था।

     मानववाद का सर्वप्रथम आरम्भ 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ब्लाश के नेतृत्व में फ्रांसीसी विद्वानों ने किया था। भौगोलिक अध्ययनों में मानवतावादी दृष्टिकोण का समावेश 1970 के दशक में प्रारम्भ हुआ। मानवतावादी विचारधारा भौगोलिक अध्ययनों में मानवीय जागरूकता, मानवीय चेतना तथा मानवीय क्रियात्मकता को केन्द्रीय एवं सक्रिय भूमिका प्रदान करती है। इस विचारधारा से अनुप्रेरित मानववादी भूगोल अपने भौगोलिक अध्ययनी में मानवीय अनुभवो, मानवीय मूल्यों के आकलन एवं मूल्यांकन की महत्व प्रदान करता है।

(17) कल्याणपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Welfare Geography):-

      मानव भूगोल की इस अभिनव प्रवृत्ति के अन्तर्गत विकसित इस विचारधारा ने मानव भूगोल की एक नवीन शाखा को उद्धृत किया है, जिसे परिवर्तनवादी भूगोल अथवा क्रान्तिकारी भूगोल की संज्ञा दी जा रही है। यद्यपि मानव कल्याणपरक भूगोल से सम्बन्धित अध्ययन सन् 1960 के बाद ही प्रारम्भ हो गये थे, किन्तु सन् 1971 में लन्दन में प्रकाशित ‘एरिया’ शोध पत्रिका में डेविड स्मिथ के क्रान्तिकारी भूगोल पर लेख प्रकाशित हुए। सन् 1977 में इससे सम्बन्धित दो पुस्तके प्रकाशित हुई।

    वर्तमान में मानव कल्याणपरक विचारधारा विकराल रूप लेती जा रही मानवीय समस्याओं, जैसे गरीबी, भुखमरी, अकाल, युद्ध, जाति-भेद, रंग-भेद, नैतिक मूल्यों में गिरावट, पर्यावरण प्रदूषण आदि से सम्बन्धित है। इसके अन्तर्गत हम समाज के कल्याण पर विभिन्न भौगोलिक नीतियों के सम्भावित प्रभावों का अध्ययन करते है। यह संकल्पना ‘सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय’ की अवधारणा पर आधारित है।

39. Relief and Slope Analysis / उच्चावच एवं ढाल विश्लेषण

Relief and Slope Analysis

(उच्चावच एवं ढाल विश्लेषण)



उच्चावच (Relief)

     धरातल के किसी भूभाग का सबसे अधिक तथा सबसे कम ऊँचाई में जो अन्तर होता है, वह उस भूभाग का उच्चावच (Relief) कहलाता है। उच्चावच कई विधियों द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे समुद्रतल स्थल की ऊँचाई (Spot height), समोच्च रेखायें (Contour lines), छाया (Shading) एवं रंग (Colouring)।

    “धरातलीय मानचित्र में Spot height किसी स्थान का समुद्रतल से ऊंचाई दिखता है। नीचे चित्र में Spot height, समोच्च रेखा द्वारा, छाया द्वारा तथा रंग द्वारा दिखाया गया है। यह रंग भारत के सर्वेक्षण विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त है। मैदानी भाग को हरा रंग से, अधिक ऊँचे भाग को भूरा, पठारी भाग को पीला तथा जलीय भाग को नीला रंग से प्रदर्शित किया जाता है।

    समोच्च रेखा द्वारा धरातल पर विद्यमान अनेक भूआकृतियों को दिखाया जाता है। यह समोच्च रेखा का मान, उसकी आकृति दो समोच्च रेखा के बीच की दूरी से पता चलता है कि धरातल पर कौन-सा पहाड़ी भाग है और कौन सा मैदानी भाग कहाँ झील है तो कहाँ जलप्रपात तो कहाँ पर घाटी है। अतः भू-आकृतियों को प्रदर्शित करने का यह उत्तम विधि है।

    समोच्च रेखा के माध्यम से धरातल की ढाल तथा उसकी दिशा की भी जानकारी होती है। किस स्थान की ढाल कैसी है, इसकी जानकारी भी समोच्च रेखा देती है। जहाँ समोच्च रेखा सटी-सटी रहती है, वहाँ की ढाल तीव्र होती है तथा जहाँ पर समोच्च रेखा दूर-दूर पर रहती है, वहाँ की ढाल कम रहती है।

     ऐसे तो हैश्यूर विधि (Hachure Method), ब्लॉक आरेख (Block diagram) द्वारा भी उच्चावच प्रदर्शित किया जाता है। परन्तु समोच्च रेखा सबसे अधिक उपयुक्त है। समोच्च रेखा द्वारा किसी क्षेत्र का प्रोफाइल (Profile) बनाया जाता है।

ढाल (Slope)

   मानचित्र (Map) में भूमि की ऊँचाई गहराई तथा पृथ्वी की सतह की सूक्ष्म स्थलाकृतियों (Details of topography) को मुख्यतः समोच्च रेखाओं (Contours lines) के द्वारा दिखलाया जाता है। इसीलिए समोच्च्च रेखाओं की आकृति (Shape) और पारस्परिक समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी (Relative distance) की सहायता से मानचित्र में विभिन्न स्थल रूपों (Land forms) को पहचाना जाता है।

     प्रत्येक स्थलरूप को दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं की एक निश्चित आकृति होती है और प्रत्येक में उनकी पारस्परिक दूरी भी विशेष प्रकार की होती है। उदाहरण स्वरूप एक गुम्बद (Dome), एक शंक्वाकार पहाड़ी (Conical hill) दोनों में समोच्च रेखायें लगभग गोलाकार (Round) होती है परन्तु इन स्थलरूपों में उनकी पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है।

     इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की समोच्च रेखायें एक-दूसरे के लगभग समानान्तर होती है। परन्तु उनकी पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है। जहाँ भूमि की ढाल अधिक होती है (जैसे एक कगार (Escarpment), वहाँ समोच्च रेखायें लगभग समानान्तर और एक-दूसरे के बहुत समीप होती है।

    दूसरी ओर जहाँ भूमि की ढाल बहुत कम होगी वहाँ भी समोच्च रेखायें लगभग समानान्तर परन्तु एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर पर होती है। इसी प्रकार सम ढाल (Regular slope), असमान ढाल (Irregular slope) सोपान ढाल (Terraced slope), नतोदर ढाल (Concave slope) तथा उन्नतोदर ढाल (Convex slope) इत्यादि में समोच्च रेखाओं की पारस्परिक दूरी अलग-अलग होती है।

     मानचित्र में स्थल रूपों को पहचानने तथा उनका वर्णन और व्याख्या करने के लिए समोच्च रेखाओं की आकृति तथा उनकी पारस्परिक दूरी का विश्लेषण करना आवश्यक है। मानचित्र के किन्हीं दो स्थानों के बीच की ढाल की गणना (Calculation) करने के लिए दो तथ्यों की आवश्यकता होती है-

(1) दोनों स्थानों के बीच की ऊँचाई का अन्तर (Difference of elevation), जिसे लम्बवत् अन्तर (Vertical interval) कहा जाता है।

(2) दोनों स्थानों के बीच की क्षैतिजीय दूरी (Horizontal distances) जिसे क्षैतिजीय अन्तर अथवा क्षैतिजीय तुल्यांक (Horizontal equivalent) कहा जाता है।

      मान लिया जाए कि एक पहाड़ी की चोटी A की ऊँचाई समुद्रतल से 3275 मीटर है और उसके नीचे स्थित नदी घाटी का निम्नतल (Bottom) B की ऊँचाई समुद्रतल से 2475 मीटर है। A और B बिन्दुओं के बीच की ढाल ज्ञात करना है।

      सबसे पहले A और B के बीच लम्बवत् अन्तर 3275-2475 = 800 मीटर हुआ। यदि मानचित्र में इन स्थानों की दूरी 8 सेन्टीमीटर है और मानचित्र का मापक 1 सेमी. = 5 किमी. है तो A और B की वास्तविक दूरी अर्थात् उनके बीच क्षैतिजीय दूरी 40 किमी. होगी।

     A और B स्थानों के बीच की ढाल को निम्नलिखित अनुपात से व्यक्त किया जा सकता है-

Relief and Slope Analysis

     यहाँ ध्यान देने की एक आवश्यक बात यह है कि ढाल व्यक्त करने वाले भिन्न में अंश (Numerator), हमेशा इकाई (Unit) में होता है और अंश (Numerator) तथा हर (Denominator) दोनों मापन की एक ही इकाई (Unit of measurement), होती है।

    उपरोक्त उदाहरण में ढाल व्यक्त करने वाला भिन्न है, जिसमें अंश (Numerator) ‘एक’ है और हर (Denominator) ‘पचास’ है। दोनों मापन की 50 एक ही इकाई ‘मीटर’ में है। इस सम्बंध को एक अनुपात (Ratio) के रूप में अर्थात् 1: 50 में व्यक्त किया जा सकता है।

    ढाल व्यक्त करने वाले भिन्न 1/50 अथवा अनुपात 1:50 से यह समझना चाहिए कि 50 मीटर की क्षैतिजीय दूरी पर भूमि पहले की अपेक्षा एक मीटर नीची हो जाती है। इस नियम का उल्लंघन करके ढाल को ‘फीट प्रति मील’ अथवा ‘सेंटीमीटर प्रति किलोमीटर’ में व्यक्त करने का प्रचलन सा हो गया है।

     जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि ढाल का क्षैतिज रेखा से कोणीय दूरी (Angular distance) अर्थात् अंशों (Degrees) में भी व्यक्त किया जाता है। उपरोक्त उदाहरण में वर्णित दो स्थानों को यदि चित्र में A और B मान लिया जाए तो AB रेखा की लम्बाई 2 मील है। A से AC लम्ब है जो A और B के बीच के लम्बवत् अन्तर अर्थात् 4750 फीट का प्रतिनिधित्व करती है। C पर AB, के बराबर और समानान्तर CB1 रेखा खींची गयी है तथा A और B के बीच के क्षैतिजीय दूरी है। CB को मिला दिया। यह AB से AB’ की झुकाव अर्थात् A और B के बीच की ढाल का प्रतिनिधित्व करती है।

     ABC एक समकोण त्रिभुज है, जिसका आधार AB 2 मील है तथा लम्ब AC = 4750 फीट है।

 

    अब साधारण tan टेबुल से जिस कोण का tan मान (Value) .4481 है, उसका मान Log Table द्वारा अंशों में निकाल लिया जा सकता है।

जैसे- .44981 का tan का मान 24°12′ होता है। अर्थात् AB की ढाल 24°12′ की हुई है।

44. Major tribal groups of India (भारत की प्रमुख जनजातीय समूह)

  44. Major tribal groups of India

(भारत की प्रमुख जनजातीय समूह) 



       जनजातियाँ मुख्यतः वह मानव समुदाय हैं जो कि एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सामान्य अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज यहाँ तक कि देवी-देवता भी अलग होते हैं। ये प्राय: प्रकृति पूजक होते हैं।

     भारत की जनजातियाँ देश के प्राय: सभी राज्यों में फैली हुई है। अलग-अलग राज्यों में इनके रीति-रिवाज और रहन सहन भी प्राय: अलग होते हैं। जनजातियाँ, भारतीय आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के संविधान में इसके लिए अनुसूचित जनजाति (ST) शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए इसके लिए कुछ विशेष प्रावधान लागू किए गए हैं।

     जनजाति, भारत के आदिवासियों के लिए इस्‍तेमाल होने वाला एक वैधानिक शब्द भी है तो दूसरी ओर, इन्हें अन्य कई नामों से भी जानते है जैसे- आदिवासी, आदिम-जाति, वनवासी, प्रागैतिहासिक, असभ्य जाति, असाक्षर, निरक्षर तथा कबीलाई समूह इत्यादि।

मुख्य प्रजातीय विभाजन:

     प्रजातीय विशेषताओं के आधार पर, गुहा (1935) का मानना है कि वे निम्नलिखित तीन प्रजातियों से संबंधित हैं।

(i) मोगोलोइड्स

      उत्तर एल्पाइन या मंगोलियन गोल सिर के होते हैं। इनके बाल सीधे और चपटे, चेहरा और जबड़ा नतोदर होता है। नाक पतली और संकरी, रंग हल्का पीला-सा खुमानी रंग का होता है। ये विशेषताएं भोटिया (मध्य हिमालय), वांचू (अरुणाचल प्रदेश), नागा (नागालैंड), खासी (मेघालय), आदि के बीच पाई जाती हैं।

(ii) प्रोटो ऑस्ट्रलॉयड्स

    इस प्रजाति का सिर लम्बा और उभरा हुआ होता है। बाल पूर्णतः घुंघराले और त्वचा का रंग गहरे काले से लेकर कत्थई तथा हल्का पीला होता है। जबड़े कुछ निकले हुए और नाक साधारण रूप से चौड़ी होती है। ये विशेषताएं गोंड (मध्य प्रदेश), मुंडा (छोटानागपुर), हो (झारखंड) आदि में पाई जाती है।

(iii) नेग्रिटो

      इस प्रजाति का रंग लाल चाकलेटी से लेकर काला कत्थई तक होता है। इनका डील-डौल नाटा (5 फुट से कम) होंठ काफी मोटे, नाक चौड़ी और चपटी होती है। इनके बाल चपटे, फीते के समान और घने होते हैं। वे आपस में लिपटकर गांठ का निर्माण करते हैं। इनमें जबड़े और दांत आगे निकले होते हैं। इस समय कुछ ही हजार नीग्रिटो जीवित हैं। उनमें अन्य जातियों के रक्त का मिश्रण हो गया है। ये विशेषताएं कादर (केरल), ओंगे (लिटिल अंडमान), जारवा (अंडमान द्वीप) आदि के बीच पाई जाती हैं।

जनजातियों का भौगोलिक वितरण

     वर्तमान समय में भी भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक जनजातियों के साथ-साथ संस्कृति का विविधीकरण भी देखने को मिलता है। सम्पूर्ण भारत में जनजातियों की वास्तविक स्थिति उनके भौगोलिक वितरण को समझकर आसानी से लिया जा सकता है।

     भौगोलिक आधार पर भारत की जनजातियों को विभिन्न भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(i) उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र:-

            उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय के तराई क्षेत्र, उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड तथा पूर्वोत्तर के सभी राज्य इस क्षेत्र में आते हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से बकरवाल, गुर्जर, थारू, बुक्सा, राजी, जौनसारी, शौका, भोटिया, गद्दी, किन्नौरी, गारो, खासी, जयंतिया इत्यादि जनजातियाँ निवास करती हैं।

(ii) मध्य क्षेत्र:-

        मध्य क्षेत्र प्रायद्वीपीय भारत के पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। मध्य प्रदेश, दक्षिण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि राज्य इस क्षेत्र में आते हैं जहाँ मुख्यतः भील, गोंड, रेड्डी, संथाल, हो, मुंडा, कोरवा, उरांव, कोल, बंजारा, मीणा, कोली आदि जनजातियाँ रहती हैं।

(iii) दक्षिण क्षेत्र:-

           दक्षिणी क्षेत्र के अंतर्गत कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्य आते हैं जहाँ मुख्य रूप से टोडा, कोरमा, गोंड, भील, कडार, इरुला आदि जनजातियाँ बसी हुई हैं।

(iv) द्वीपीय क्षेत्र:-

        द्वीपीय क्षेत्र में अंडमान एवं निकोबार की जनजातियाँ आती हैं। जहाँ मुख्य रूप से सेंटिनलीज, ओंग, जारवा, शोम्पेन इत्यादि।

भारत की जनजातीय जनसँख्या

       भारत में अनुसूचित जनजातियों (ST) की जनसँख्या 10.42 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 8.6% है। भारत में जनजातीय जनसंख्या अलग-अलग हिस्सों में फैली हुई है। देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कई इलाकों में आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं।

    भारत में अधिकतम जनजातीय जनसँख्या वाले पाँच राज्य है-

(i) मिजोरम (जनसंख्या का 94.4%)

(ii) लक्षद्वीप (94%)

(iii) नागालैंड (86.5%)

(iv) मेघालय (86.1%)

(v) अरुणाचल प्रदेश (68.79%)

      इसके अलावा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल में भी महत्वपूर्ण जनजातीय बस्तियाँ हैं। 

भारत में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियाँ

      भारत की सबसे अधिक ज्ञात जनजातियों में गोंड, भील, संथाल, मुंडा, गारो, खासी, अंगामी, भूटिया, चेंचू, कोडाबा और ग्रेट अंडमानी जनजातियाँ शामिल हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, इन सभी जनजातियों में, भील आदिवासी समूह,  भारत की सबसे बड़ी जनजाति है। यह देश की कुल अनुसूचित जनजातीय आबादी का करीब 38% है।

      नीचे राज्य और उनमें निवास करने वाले जनजातियों के समूहों के बारे में जानकारी दी जा रही है-

 राज्य  निवास करने वाली प्रमुख जनजातियाँ
झारखण्ड संथाल, असुर, बैगा, बन्जारा, बिरहोर, गोंड, हो, खरिया, खोंड, मुंडा, कोरवा, भूमिज, मल पहाडिय़ा, सोरिया पहाडिय़ा, बिझिया, चेरू लोहरा, उरांव, खरवार, कोल, भील।
बिहार  बैंगा, बंजारा, मुण्डा, भुइया, खोंड।
मध्य प्रदेश   भील, मिहाल, बिरहोर, गडावां, कमार, नट।
उड़ीसा बैगा, बंजारा, बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, मुन्डुप्पतू।
मेघालय  खासी, जयन्तिया, गारो।
अरुणाचल प्रदेश अबोर, अक्का, अपटामिस, बर्मास, डफला, गालोंग, गोम्बा, काम्पती, खोभा मिसमी, सिगंपो, सिरडुकपेन।
असम व नगालैंड बोडो, डिमसा गारो, खासी, कुकी, मिजो, मिकिर, नगा, अबोर, डाफला, मिशमिस, अपतनिस, सिंधो, अंगामी।
तमिलनाडु टोडा, कडार, इकला, कोटा, अडयान, अरनदान, कुट्टनायक, कोराग, कुरिचियान, मासेर, कुरुम्बा, कुरुमान, मुथुवान, पनियां, थुलया, मलयाली, इरावल्लन, कनिक्कर,मन्नान, उरासिल, विशावन, ईरुला।
कर्नाटक  गौडालू, हक्की, पिक्की, इरुगा, जेनु, कुरुव, मलाईकुड, भील, गोंड, टोडा, वर्ली, चेन्चू, कोया, अनार्दन, येरवा, होलेया, कोरमा।
आंध्र प्रदेश चेन्चू, कोचा, गुड़ावा, जटापा, कोंडा डोरस, कोंडा कपूर, कोंडा रेड्डी, खोंड, सुगेलिस, लम्बाडिस, येलडिस, येरुकुलास, भील, गोंड, कोलम, प्रधान, बाल्मिक।
छत्तीसगढ़ कोरकू, भील, बैगा, गोंड, अगरिया, भारिया, कोरबा, कोल, उरांव, प्रधान, नगेशिया, हल्वा, भतरा, माडिया, सहरिया, कमार, कंवर।
त्रिपुरा  लुशाई, माग, हलम, खशिया, भूटिया, मुंडा, संथाल, भील, जमनिया, रियांग, उचाई।
जम्मू-कश्मीर गुर्जर, भरवर वाल।
गुजरात कथोड़ी, सिद्दीस, कोलघा, कोटवलिया, पाधर, टोडिय़ा, बदाली, पटेलिया।
उत्तर प्रदेश बुक्सा, थारू, माहगीर, शोर्का, खरवार, थारू, राजी, जॉनसारी।
उत्तरांचल भोटिया, जौनसारी, राजी।
महाराष्ट्र  भील, गोंड, अगरिया, असुरा, भारिया, कोया, वर्ली, कोली, डुका बैगा, गडावास, कामर, खडिया, खोंडा, कोल, कोलम, कोर्कू, कोरबा, मुंडा, उरांव, प्रधान, बघरी।
पश्चिम बंगाल होस, कोरा, मुंडा, उरांव, भूमिज, संथाल, गेरो, लेप्चा, असुर, बैगा, बंजारा, भील, गोंड, बिरहोर, खोंड, कोरबा, लोहरा।
हिमाचल प्रदेश गद्दी, गुर्जर, लाहौल, लांबा, पंगवाला, किन्नौरी, बकरायल।
मणिपुर  कुकी, अंगामी, मिजो, पुरुम, सीमा।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह औंगी आरबा, उत्तरी सेन्टीनली, अंडमानी, निकोबारी, शोपन।
केरल  कडार, इरुला, मुथुवन, कनिक्कर, मलनकुरावन, मलरारायन, मलावेतन, मलायन, मन्नान, उल्लातन, यूराली, विशावन, अर्नादन, कहुर्नाकन, कोरागा, कोटा, कुरियियान,कुरुमान, पनियां, पुलायन, मल्लार, कुरुम्बा।
पंजाब गद्दी, स्वागंला, भोट।
राजस्थान मीणा, भील, गरसिया, सहरिया, सांसी, दमोर, मेव, रावत, मेरात, कोली।
सिक्किम लेपचा।

भारत की जनजातियों के प्रमुख समस्याएँ

        भारत की जनजातियों में आदिम विशेषताएं, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े समुदाय से संपर्क में संकोच और पिछड़ापन की प्रमुख मुद्दे है। परिणामस्वरूप, उन्हें अपने सम्पूर्ण जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

      भारत में जनजातीय समस्याएँ निम्नलिखित है:-

(i) सामाजिक समस्याएँ:-

      सामाजिक समस्याओं की बात की जाय तो ये आज भी सामाजिक संपर्क स्थापित करने में अपने-आप को सहज नहीं पाते हैं। इस कारण ये सामाजिक-सांस्कृतिक अलगाव, भूमि अलगाव, अस्पृश्यता की भावना महसूस करती हैं। 

(ii) धार्मिक समस्याएँ:-

      धार्मिक अलगाव भी जनजातियों की समस्याओं का एक बहुत बड़ा पहलू है। इन जनजातियों के प्राय: अपने अलग देवी-देवता होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में अन्य वर्गों द्वारा इनके प्रति छुआछूत का व्यवहार रखना। अगर हम थोड़ा पीछे जायें तो पाते हैं कि इन जनजातियों को अछूत तथा अनार्य मानकर समाज से बेदखल कर दिया जाता था, सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश तथा पवित्र स्थानों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। आज भी इनकी स्थिति ले-देकर यही है।

(iii) शैक्षिक समस्याएँ:-

        आज भी जनजातीय समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है जिससे ये आम बोलचाल की भाषा को समझ नहीं पाती हैं। सरकार की कौन-कौन सी योजनाएँ इनके लिये हैं इसकी जानकारी तक इनको नहीं हो पाती है जो इनके शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है। 2001 से 2011 तक, ST के लिए साक्षरता दर में 11.86 प्रतिशत अंक और पूरी आबादी के लिए 8.15 प्रतिशत अंक की वृद्धि देखने को मिला है।

(iv) स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ:-

         स्वास्थ्य सेवा के मामले में जनजातीय आबादी के बीच संदिग्ध मुद्दे हैं। सबसे कमजोर कड़ी अनुसूचित जनजातियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। अनुसूचित क्षेत्रों में काम करने के लिए इच्छुक, प्रशिक्षित और सुसज्जित स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की कमी जनजातीय आबादी को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण बाधा है। अनुसूचित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में डॉक्टरों, नर्सों, तकनीशियनों और प्रबंधकों के बीच कमी, रिक्तियाँ, अनुपस्थिति या उदासीनता है।

     स्वास्थ्य क्षेत्र में नीतियों को आकार देने, योजना बनाने या सेवाओं को लागू करने में अनुसूचित जनजातियों के लोगों या उनके प्रतिनिधियों की भागीदारी का लगभग पूर्ण अभाव, अनुसूचित क्षेत्रों में अनुचित तरीके से डिजाइन किए गए और खराब तरीके से संगठित और प्रबंधित स्वास्थ्य सेवा के कारणों में से एक है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) जैसे चिकित्सा बीमा कवरेज अनुसूचित क्षेत्रों में बहुत कम हैं। इसलिए, जनजातीय लोग भयावह और गंभीर बीमारियों के प्रति सुरक्षा के बिना रहते हैं। जनजातीय लोगों में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 44 से 74 के बीच होने का अनुमान है।

(v) आर्थिक समस्याएँ:-

       इनके आर्थिक रूप से पिछड़ेपन की बात की जाए तो इसमें प्रमुख समस्या गरीबी तथा ऋणग्रस्तता है। आज भी जनजातियों के समुदाय का एक बड़ा तबका ऐसा है जो दूसरों के घरों में काम कर अपना जीवनयापन कर रहा है। माँ-बाप आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं तथा पैसे के लिये उन्हें बड़े-बड़े व्यवसायियों या दलालों को बेच देते हैं। बच्चे या तो समाज के घृणित से घृणित कार्य को अपनाने हेतु विवश हो जाते हैं या तो उन्हें मानव तस्करी का सामना करना पड़ता है।

      रही बात लड़कियों की तो उन्हें अमूमन वेश्यावृत्ति जैसे घिनौने दलदल में धकेल दिया जाता है। दरअसल जनजातियों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से पिछड़ापन ही है जो उन्हें उनकी बाकी सुविधाओं से वंचित करता है।

(vi) तम्बाकू और शराब का सेवन:-

    एक्सा कमेटी रिपोर्ट 2014 के आंकड़ों से स्पष्ट पता चलता है कि 15 से 54 वर्ष की आयु के पुरुष काफी अधिक मात्रा में तम्बाकू का सेवन करते हैं, या तो धूम्रपान करते हैं या चबाते हैं। जनजातियों के लगभग 72 % और गैर-जनजातियों के 56 % लोगों में तम्बाकू का सेवन प्रचलित था।

    नशाखोरी ने इन आदिवासियों के पारिवारिक आर्थिक एवं सामाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है। प्रत्येक आदिवासी परिवार त्योहार, विवाह आदि उत्सवों पर खूब शराब, गांजा, भांग व अन्य नशीले पदार्थ का सेवन करते है। शराब पीने से उनकी आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो जाती है।

(vii) गरीबी और ऋणग्रस्तता:-

      अधिकांश जनजातियाँ गरीब हैं। जनजातियाँ अल्पविकसित तकनीक पर आधारित कई तरह के सरल व्यवसायों में संलग्न हैं। अधिकांश व्यवसाय प्राथमिक व्यवसाय हैं जैसे- शिकार करना, लकड़ी इकट्ठा करना और कृषि करना। 

     विभिन्न जनजातियों के 60 प्रतिशत से अधिक परिवार किसी न किसी रूप में ऋणग्रस्त हैं। जन्म, मृत्यु, विवाह, सामूहिक भोज जैसे अवसरों के लिए ली गई ऋण की राशि द्वारा जनजातीय लोग भारत की सांस्कृतिक धरोहर जनजातियाँ अपने दायित्वों को पूरा करते हैं। यद्यपि सरकार की विभिन्न संस्थाओं आई.टी.डी.ए., सहकारी समितियों, बैंकों व जनजातीय कल्याण विभाग द्वारा नाममात्र के ब्याज पर ऋण की सुविधा उपलब्ध कराई गई है किन्तु अशिक्षा, अज्ञानता के कारण जनजातीय लोग अपनी जनजाति या महाजनों से ही ऋण लेना पंसद करते हैं। ऋणग्रस्तता के लिए निम्न कारण उत्तरदायी हैं-

⇒ नई वन नीति के कारण वन सम्पदा के उपयोग से वंचित,

⇒ जनजातीय कृषि भूमि का छोटा आकार व अनुपजाऊ होना,

⇒ उत्पादित वस्तुओं का उचित मूल्य प्राप्त ना होना,

⇒ खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि होना,

⇒ मद्यपान व आय से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति,

⇒ ऋण लेने के लिए सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा स्थानीय महाजनों पर निर्भरता।

     ऋणग्रस्तता की समस्या के कारण जनजातीय समाज का निरंतर विघटन हो रहा है क्योंकि गरीबी के कारण उचित मात्रा में भोजन का अभाव अनेक रोगों को जन्म देता है। साथ ही चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव होने के कारण बच्चों को शिक्षा प्राप्त नहीं होती। बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और कृषि भूमि से बेदखल होने की समस्याएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं।

यातायात के साधनों का अभाव:-

     अधिकांश जनजातियाँ पहाड़ों, जंगलों और दूरवर्ती दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती हैं जहां उनका अन्य लोगों से सम्पर्क नहीं हो पाता क्योंकि आवागमन के साधनों का अभाव है। अतः उन्हें जीवनयापन के उचित अवसर उपलब्ध नहीं होते हैं।

वन सम्पदा पर रोक:-

     जनजातीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की वन सम्पदा जैसे कीमती लकड़ी, फल-फूल, जड़ी-बूटियाँ, चाय बागान आदि प्रचुरता में उपलब्ध हैं जिनके कारण अनेक उद्योगों का विकास हुआ किन्तु इसका दुष्प्रभाव दो रूपों में पड़ा। बाह्य लोगों जैसे व्यापारी, महाजन, ठेकेदार, प्रशासक, पुलिस अधिकारियों के साथ समायोजन व्यवहार की समस्या तथा इनकी गरीबी व अशिक्षा का लाभ उठाकर बाह्य लोगों द्वारा इनका शोषण किया गया।

प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर रोक:-

      ब्रिटिश शासन से पूर्व ये जनजातियां राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र इकाइयां थीं। वन खनिज संपदा पर इनका एकाधिकार था किन्तु अंग्रेजों द्वारा सम्पूर्ण देश में एक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर जनजातियों के अधिकार सीमित कर दिए गए और प्राकृतिक सम्पदा के उपभोग पर रोक लगा दी गई। नई प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था से संतुलन बनाने में जनजातीय समाज को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

धर्म परिवर्तन की समस्या:-

     ब्रिटिश शासनकाल में ही ईसाई मिशनरियों द्वारा उनके विकास, कल्याण के नाम पर आर्थिक प्रलोभन देकर उनका धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनाया गया जिसके फलस्वरूप अनेक आर्थिक व परसंस्कृति ग्रहण सम्बम्धी समस्याओं का विकास हुआ। मजूमदार तथा मदन के अनुसार भारतीय जनजातियों की अधिकांश समस्याएं उनके भौगोलिक पृथक्करण और नए सांस्कृतिक सम्पर्क का परिणाम हैं।

जनजातियों के उत्थान के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम

       भारतीय संविधान में जहाँ एक ओर अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है तो वहीं दूसरी ओर, अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध भी है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के अंतर्गत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे।    

      जनजातियों के उत्थान के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं-

शिक्षा

(i) एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) की स्थापना करके दूर-दराज के इलाकों में आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही है।

(ii) अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (पीएमएस) और राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप जैसी योजनाएँ चलाई जा रही हैं।

(iii) आदिवासी क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की जाती है।

आर्थिक विकास

(i) जनजातीय उत्पादन के विपणन को बढ़ावा दिया जाता है।

(ii) प्रधानमंत्री पीवीटीजी (Particularly Vulnerable Tribal Groups) विकास मिशन के तहत, कमजोर जनजातीय समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का काम किया जाता है।

सामुदायिक स्थिरता

(i) आदिवासी भूमि और संस्कृतियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।

(ii) आदिवासी उप-योजना क्षेत्रों में आश्रम स्कूलों की स्थापना की जाती है।

(iii) आदिवासी महिलाओं और लड़कियों में साक्षरता के स्तर में अंतर को कम करने का काम किया जाता है।

     इनके अलावा, ग्राम पंचायतों और लोकसभाओं, विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण का भी प्रावधान किया गया है। 

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India (भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)

44. Types of Soil, Distribution, Causes of Erosion and Methods for Conservation of India

(भारत की मृदा के प्रकार, वितरण, अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय)



            मृदा (मिट्टी) पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिये प्राकृतिक स्रोत के रूप में पोषक तत्त्व, जल एवं अन्य खनिज लवण प्रदान करती है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जीवांश का एक मिश्रण है जो लाखों वर्षों में निर्मित हुई है।

सामान्यतः मिट्टी की कई परतें होती हैं, जिसमें सबसे ऊपरी परत में छोटे मिट्टी के कण, सड़े-गले हुए पेड़-पौधों एवं जीवों के अवशेष होते हैं। यह परत फसलों की पैदावार के लिये बहुत उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण होती है।

इस तरह मृदा शैलों के अपक्षयण व विघटन से उत्पन्न भूपदार्थों, मलवा और विविध जैव सामग्रियों का सम्मिश्रण होती है, जो पृथ्वी की सतह (भू-पर्पटी की सतह) पर विकसित होती है।

दूसरी परत महीन कणों (जैसे-चिकनी मिट्टी) की होती है, जिसके नीचे विखंडित चट्टानें एवं मिट्टी का मिश्रण होता है तथा इसके नीचे अविखंडित सख्त चट्टानें होती हैं। यह कुछ सेमी. से लेकर कई मीटर तक हो सकती हैं।

पौधों की वृद्धि सामान्यतः 6.0-7.0 pH मान वाले मृदा में होती है। इसी pH मान के मध्य पौधे अपनी सारी क्रियाएँ करते हैं। अधिक अम्लीय अथवा क्षारीय मृदा पौधों के लिये हानिकारक होती है।

ह्यूमस, खनिज तत्व, जल एवं वायु मृदा के मुख्य घटक होते हैं। इन घटकों का संयोजन (अनुपात) मृदा के प्रकार को निर्धारित करता है।

मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile):- 

     धरातल के ऊपरी सतह से जब नीचे की ओर बढ़ते हैं तो आधारभूत शैल तक मृदा के संघटकों तथा रासायनिक भौतिक गुणों में क्रमशः परिवर्तन होता जाता है। इन परिवर्तनों के आधार पर समस्त मृदामंडल को विशिष्ट स्तरों (distinct layers) में बाँटा गया है। ये स्तर ‘मृदा संस्तर’ (soil horizons) कहलाते हैं।

     ये संस्तर मोटे तौर पर मृदा-सतह के समानांतर एवं क्षैतिज अवस्था में होते हैं। मृदा के वैसे लम्बवत् खण्ड (vertical section), जिसमें मृदा के समस्त संस्तर शामिल हों, ‘मृदा परिच्छेदिका’ कहलाते हैं। मृदा परिच्छेदिका को मुख्य रूप से तीन संस्तरों में विभाजित किया जाता है:-

(i) जैविक संस्तर,

(ii) खनिज संस्तर एवं

(iii) आधार शैल संस्तर।

(i) जैविक संस्तर (Organic horizons):-

     मृदा परिच्छेदिका का सबसे ऊपरी संस्तर जैविक संस्तर कहलाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अन्य संस्तरों की तुलना में इसमें जैविक पदार्थों की बहुलता होती है। इस संस्तर को दो भागों में बाँटा जाता है:-

(क) O1 संस्तर:-

    यह सबसे ऊपरी संस्तर है जिसमें जीवित जैविक पदार्थ (वनस्पति एवं जंतु) के अलावा अनपघटित एवं आंशिक रूप से अपघटित जैविक पदार्थों की बहुलता होती है।

(ख) O2 संस्तर:-

    यह O1 के नीचे पाया जाने वाला संस्तर है। इसमें भी जैविक पदार्थों की अधिकता होती है, लेकिन ये अपघटित एवं ह्यूमस रूप में पाए जाते हैं। इसी कारण, इसे ‘ह्यूमस संस्तर’ भी कहा जाता है।

(ii) खनिज संस्तर (Mineral horizons):-

      यह जैविक संस्तर के नीचे पाया जाता है। इस संस्तर को तीन भागों में बाँटा जाता है-A संस्तर, B संस्तर एवं C संस्तर।

(क) A संस्तर:-

    यह खनिज संस्तर का सबसे ऊपरी स्तर है। इसमें सिलिकेट, एल्युमिनियम, लौह अयस्क, क्ले आदि खनिजों के साथ अल्प मात्रा में अपघटित जैविक तत्व भी पाए जाते हैं। इस संस्तर से खनिज पदार्थों का नीचे की और स्थानांतरण या अपवहन होता है, अतः इसे ‘अपवहन मंडल’ (eluviation zone) भी कहा जाता है।

(ख) B संस्तर:-

     संस्तर A से अपवहित होते खनिज पदार्थ इस संस्तर में आकर विनिक्षेपित या जमा हो जाते हैं, अतः इस संस्तर को ‘विनिक्षेपण मंडल’ (illuviation zone) भी कहा जाता है।

(ग) C संस्तर:-

     इस संस्तर में आधार शैल के ऋतुक्षरित चट्टानी टुकड़े असंगठित रूप में पाए जाते हैं। इस संस्तर को ‘अद्योस्तर संस्तर’ (subsurface horizon) एवं ‘ग्ले परत’ भी कहा जाता है।

(iii) आधार शैल संस्तर (Parent rock horizons):-

       इसे ‘D’ या ‘R’ से संबोधित किया जाता है। ऋतुक्षरण का प्रभाव यहाँ नहीं पड़ता है। अतः आधारभूत चट्टान संगठित एवं दृढ़ रूप में पायी जाती है।

     उपर्युक्त वर्णित मृदा-परिच्छेदिका एक आदर्श मृदा परिच्छेदिका का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसी परिच्छेदिका का विकास अत्यंत लम्बी अवधि के बाद तब होता है, जब मृदा-निर्माण की प्रक्रिया अपने आधार शैल क्षेत्र में ही सम्पन्न होती है। एक आदर्श मृदा-परिच्छेदिका में निम्न विशेषताएँ पाई जाती हैं:-

(i) मृदा-परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर जैविक पदार्थों (जीवित पदार्थ, मृत-अनपघटित या अपघटित पदार्थ तथा ह्यूमस) की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(ii) ऊपर से नीचे जाने पर वायु की मात्रा क्रमशः घटती जाती है।

(iii) ऊपर से नीचे जाने पर खनिज पदार्थों की मात्रा एवं प्रकार में वृद्धि होती जाती है।

(iv) ऊपर से नीचे जाने पर जल की मात्रा में वृद्धि या हास की कोई निश्चित प्रवृत्ति (trend) नहीं पायी जाती है। किसी भी गहराई पर जल की मात्रा में ह्रास या वृद्धि हो सकती है।

Types of Soil

मृदा का प्रकार (Types of Soil)

     भारत एक विशाल देश है, जहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की मिट्टी के क्षेत्रीय वितरण में असमानता का मुख्य कारण वनस्पति, उच्चावच, तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता जैसे जलवायविक तत्त्वों में भिन्नता का होना है।

⇒ मिट्टी में पौधे एवं जंतु निरंतर सक्रिय रहते हैं, जिससे मिट्टी में परिवर्तन होता रहता है इसलिये मिट्टी को गतिशील कार्बनिक एवं खनिज पदार्थों का प्राकृतिक समुच्चय भी कहते हैं।

⇒ मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में उच्चावच, जनक सामग्री (चट्टानें), जलवायु, वनस्पति, समय इत्यादि हैं। मानवीय क्रियाएँ भी मृदा को प्रभावित करती हैं। भिन्न-भिन्न भौगोलिक वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पाई जाती है।जो निम्न हैं:-

1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):-

     जलोढ़ मृदा मूलतः हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपों से या सागर द्वारा पश्चगमन (पीछे हटने) के उपरांत छोड़े गए गाद से बनी है। इसे ‘काँप मृदा’ या ‘कछारी मिट्टी’ भी कहते हैं।

⇒ भारत के उत्तरी मैदान में जलोढ़ मृदा का सर्वाधिक विकास हुआ है। इसके अतिरिक्त, तटीय मैदान एवं प्रायद्वीपीय भारत के नदी बेसिन एवं डेल्टाई भागों में भी यह मृदा पाई जाती है।

⇒ इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर तक है। भारत में सबसे अधिक भू-भाग पर जलोढ़ मिट्टी ही पाई जाती है।

⇒ विभिन्न स्रोतों से प्राप्त अवसादों के निक्षेपण से इस मृदा का विकास होने के कारण अन्य मिट्टियों की अपेक्षा इसमें खनिज विविधता भी अधिक होती है, जो कृषि के लिये अधिक उपयोगी होती है। इस प्रकार की मृदा पर प्रायः गहन कृषि की जाती है।

⇒ इसमें पोटाश (सर्वाधिक मात्रा) एवं चूने की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है, जबकि फॉस्फोरस, नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की कमी होती है।

⇒ जलोढ़ मृदाएँ गठन में बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी (मृत्तिका दोमट) की प्रकृति की पाई जाती हैं।

बलुई दोमट मृदा की जलधारण क्षमता सबसे कम होती है, क्योंकि इसमें भारी मात्रा में रवे होते हैं जबकि चिकनी जलोढ़ मिट्टी में जल धारण की क्षमता सबसे अधिक होती है।

⇒ भारत में जलोढ़ मृदा के अधिकांश क्षेत्र का संबंध अर्द्ध शुष्क जलवायु प्रदेश से होने के कारण ही इनके ऊपर की परतों में क्षारीय तत्त्वों की अधिकता रहती है। इसका रंग हल्के धूसर से राख धूसर जैसा होता है जो निक्षेपण की गहराई, गठन व निर्माण में लगने वाली समयावधि पर निर्भर करता है।

⇒ सतलज-यमुना का मैदान, पंजाब, हरियाणा तथा ऊपरी गंगा के मैदान में प्राचीन जलोढ़ मिट्टी (बांगर) पाई जाती है। मध्य एवं निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ के कारण मृदा का नवीनीकरण होता है। इसे ‘नवीन जलोढ़ मृदा’ अथवा ‘खादर’ कहते हैं। गंगा के मैदानी भागों में इसकी गहराई लगभग 2,000 मीटर तक है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः गेहूँ, गन्ना, जौ, दालें, तिलहन और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जूट की फसलें उगाई जाती हैं।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः मृदा संस्तर (Soil Profile) नहीं पाया जाता है।

⇒ जलोढ़ मृदा को सामान्यतः 4 वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) भाबर,

(ii) तराई,

(iii) बांगर,

(iv) खादर

2. लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil):-

    यह भारत की दूसरी प्रमुख मृदा है, जिसका विकास दक्कन के पठार के पूर्वी तथा दक्षिणी भाग में कम वर्षा वाले उन क्षेत्रों में हुआ है, जहाँ रवेदार आग्नेय चट्टानें (ग्रेनाइट तथा नीस) पाई जाती हैं।

⇒ इसके अतिरिक्त पश्चिमी घाट के गिरिपद क्षेत्रों, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ भागों तथा मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी भागों में भी इस मृदा का विकास हुआ है।

⇒ प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश क्षेत्रों में इस मिट्टी का विकास होने के कारण इसे ‘मंडलीय मृदा’ भी कहते हैं।

⇒ लोहे के ऑक्साइड (मुख्यतः फेरिक ऑक्साइड) की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग लाल होता है।

⇒ इस मृदा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं ह्यूमस की कमी होती है। यह स्वभाव से अम्लीय प्रकृति की होती है।

⇒ महीन कण वाली लाल व पीली मृदाएँ सामान्यतः उर्वर होती हैं, जबकि मोटे कणों वाली मृदाएँ अनुर्वर होती हैं।

⇒ लाल मृदा ऊँची भूमियों पर बाजरा, मूंगफली और आलू की खेती के लिये उपयोगी है, जबकि निम्न भूमियों पर इसमें चावल, रागी, तंबाकू तथा सब्जियों आदि की खेती की जाती है।

3. काली/रेगुर मृदा (Black/Regur Soil):-

    इस मृदा का निर्माण दरारी उद्दभेदन से निकले लावा पदार्थों (बेसाल्ट चट्टान) के विखंडन से हुआ है।

⇒ यह भारत की तीसरी प्रमुख मृदा है। इसका सर्वाधिक विकास महाराष्ट्र के ‘दक्कन ट्रैप’ के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में हुआ है। इसके अलावा यह मध्य प्रदेश के मालवा पठार, गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप, कर्नाटक के बंगलूरू-मैसूर पठार, तमिलनाडु के कोयंबटूर पठार, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना के पठार और छोटानागपुर के राजमहल पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

⇒ यह मिट्टी कपास की खेती के लिये अधिक उपयोगी एवं विख्यात है, इसलिये इसे ‘काली कपासी मिट्टी’ या ‘रेगुर’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इसे ‘उष्ण कटिबंधीय चेरनोज़म’ व ‘ट्रॉपिकल ब्लैक अर्थ’ भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में इस मृदा को ‘करेल’ की संज्ञा दी जाती है। कपास के अतिरिक्त यह मृदा गन्ना, गेहूँ, प्याज और फलों की खेती करने के लिये अनुकूल है।

⇒ काली मृदा मृणमय, गहरी और अपारगम्य होने के कारण, गीली होने पर चिपचिपी हो जाती है तथा शुष्क होने पर इसमें बड़ी-बड़ी दरारें बन जाती हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी स्वतः जुताई हो गई है इसलिये इसे ‘स्वतः जुताई वाली मृदा’ के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ इस मृदा की जलधारण क्षमता अत्यधिक होती है, जिसके कारण सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। इसकी एक अन्य विशेषता यह है कि शुष्क ऋतु में भी यह मृदा अपने में नमी बनाए रखती है। यही कारण है कि शुष्क प्रदेशों में भी काली मृदा की उपस्थिति के कारण नमी आधारित फसलें उत्पादित की जाती हैं।

⇒ ह्यूमस, एल्युमीनियम एवं लोहा के टाइटेनीफेरस मैग्नेटाइट यौगिक की उपस्थिति के कारण ही इस मिट्टी का रंग ‘काला’ होता है।

⇒ इस मिट्टी में (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व जैव तत्त्वों की मात्रा कम) होती है तथा पोटाश, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम कार्बोनेट की पर्याप्त मात्रा) पाई जाती है।

4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil):-

     इस मृदा का विकास उन क्षेत्रों में होता है, जहाँ उच्च तापमान एवं भारी वर्षा होती है। अधिक वर्षा के कारण जल के साथ चूना और सिलिका का निक्षालन हो जाता है तथा लोहे के ऑक्साइड और एल्युमीनियम के यौगिक मृदा में शेष बचे रहते हैं।

⇒ यह साधारणतः लाल-भूरे रंग की होती है एवं मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के पर्वतों के गिरिपद क्षेत्रों में एक लंबी पट्टी के रूप में केरल (मालाबार प्रदेश), कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा के पठारी क्षेत्रों, राजमहल पहाड़ी क्षेत्रों, छोटानागपुर के पठार, असम के पहाड़ी क्षेत्रों एवं मेघालय के पठार में पाई जाती है।

⇒ उच्च तापमानों में आसानी से पनपने वाले जीवाणु, ह्यूमस की मात्रा को तीव्र गति से नष्ट या समाप्त कर देते हैं, जिसके कारण इसमें जैव पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और कैल्शियम की कमी होती है।

⇒ यह मृदा रबड़ और कॉफी की फसल के लिये सबसे अच्छी मानी जाती है।

⇒ इस मिट्टी में मुख्यतः चाय, कहवा, रबड़, सिनकोना, काजू, मोटे अनाजों एवं मसालों की कृषि की जाती है परंतु इसे कृषि के दृष्टिकोण से कम उपजाऊ मृदा की श्रेणी में रखते हैं।

⇒ यह मृदा सूखने के बाद बहुत कड़ी तथा पथरीली हो जाती है, इसलिये लैटेराइट मृदा का प्रयोग मकान निर्माण के प्रयोग में आने वाले ‘ईंटों’ के निर्माण में भी किया जाता है।

5. पर्वतीय मृदा (Hilly Soil):-

    हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी भाग तथा प्रायद्वीपीय भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा के निर्माण पर पर्वतीय पर्यावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। पर्वतीय पर्यावरण में परिवर्तन के अनुरूप मृदा की संरचना व संघटन में भी परिवर्तन होता है। घाटियों में प्रायः यह दुमटी तथा ऊपरी ढालों पर इनकी प्रकृति मोटे कणों वाली होती है; साथ ही ऊपरी ढालों की अपेक्षा निचली घाटियों में ये मृदाएँ अधिक उर्वर होती हैं।

⇒ पर्वतीय मृदा का विकास सामान्यतः पर्वतों के ढालों पर होता है तथा मृदा अपरदन की समस्या से प्रभावित होने के कारण यह पतली परतों के रूप में पाई जाती है। अतः साधारणतया यह अप्रौढ़ (Immature) मृदा है।

⇒ पर्वतीय मृदा अम्लीय प्रकृति की होती है, क्योंकि यहाँ जीवाश्मों की अधिकता होने के बावजूद भी जीवाश्मों का अपघटन नहीं हो पाता है। इसमें पोटाश, फॉस्फोरस एवं चूने की कमी होती है।

⇒ इस मृदा में गहराई कम होती है तथा यह संरध्रयुक्त होती है।

⇒ पहाड़ी ढालों पर विकसित होने के कारण यह मृदा बागानी कृषि, जैसे-चाय, कहवा, मसालों एवं फलों की खेती के लिये बहुत उपयोगी होती है।

6. शुष्क अथवा मरुस्थलीय मृदा (Arid or Desert Soil):-

    शुष्क मृदा का विकास अत्यधिक तापमान वाले शुष्क जलवायवीय क्षेत्रों में हुआ है। इन क्षेत्रों में नगण्य वर्षा व अत्यधिक वाष्पीकरण के कारण मृदा में कम नमी तथा कार्बनिक तत्त्वों की अल्पता होने से ह्यूमस का अभाव पाया जाता है। अतः इसे कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है।

⇒ यह मृदा देश की कुल मृदाओं का लगभग 4.32 प्रतिशत है।

⇒ पश्चिमी राजस्थान, द‌क्षिणी पंजाब, पश्चिमी हरियाणा व उत्तरी गुजरात के शुष्क प्रदेशों में यह मिट्टी पाई जाती है।

⇒ इस मृदा में रेत सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है। इसमें कैल्शियम, लोहा और फॉस्फोरस भी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं किंतु नाइट्रोजन एवं ह्यूमस का अभाव होता है, जिसके कारण यह संरचना के दृष्टिकोण से बलुई तथा प्रकृति के दृष्टिकोण से क्षारीय/लवणीय मृदा होती है, जो फसलों के लिये अनुपजाऊ होती है।

⇒ इस मृदा में सामान्यतः कम जल की आवश्यकता वाली फसलों को उगाया जाता है, जैसे-ज्वार, बाजरा, रागी, तिलहन आदि।

7. लवणीय मृदा (Saline Soil):-

    लवणीय मृदा का विकास शुष्क व अर्द्धशुष्क जलवायु तथा जलाक्रांत व अनूप क्षेत्रों में होता है। ये मृदा संरचना की दृष्टि से बलुई से लेकर दोमट तक हो सकती है। चूँकि इनमें लवणों की अधिकता होती है, अतः इनमें सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के अनुपात की अधिकता तथा नाइट्रोजन व चूने की अल्पता पाई जाती है।

⇒ लवणीय मृदा को कृषि के दृष्टिकोण से अनुर्वर मृदा के अंतर्गत रखा जाता है, साथ ही इनमें वनस्पतियों का अभाव भी पाया जाता है।

⇒ लवणीय मृदा का अधिकतर प्रसार पश्चिमी गुजरात, पूर्वी तट के डेल्टाओं व सुंदरबन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अलावा कच्छ के रन में भी लवणीय मृदा का प्रसार पाया जाता है, जिसके लिये दक्षिणी-पश्चिमी मानसून प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।

⇒ शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में गहन कृषि के कारण सिंचाई के अतिरेक से केशिकत्व क्रिया को बढ़ावा मिलता है, जिसमें मृदा के ऊपरी परत पर सोडियम, पोटैशियम एवं कैल्शियम के लवणों एवं क्षारों का जमाव होता है। फलतः मृदा न केवल लवणीय मृदा में परिवर्तित हो जाती है बल्कि इसकी उर्वरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

⇒ पंजाब व हरियाणा के क्षेत्रों में अतिरेक सिंचाई के कारण लवणीय मृदा के प्रसार में वृद्धि हो रही है। जिससे उपजाऊ जलोढ़ मृदा अनुर्वर मृदा में परिवर्तित होती जा रही है। यहाँ इस प्रकार की मृदा को रेह, ऊसर एवं कल्लर कहते हैं।

जिप्सम तथा पाइराइट का प्रयोग कर लवणीय मिट्टियों को कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

⇒ भारत के हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में नहरों के आस-पास लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी में अधिक तेजी से वृद्धि हुई है, जिसके कारण बंजर भूमि की समस्या उत्पन्न हुई है।

⇒ इस प्रकार की मृदाओं में बरसीम, धान, गन्ना, अमरूद, आँवला, फालसा तथा जामुन जैसी लवण प्रतिरोधी फसलें व फल वृक्ष लगाये जाते हैं।

8. पीट एवं जैव मृदा (Peat and Biotic Soil):-

    इस मृदा का निर्माण नदियों के द्वारा निर्मित डेल्टाई क्षेत्रों में जल का भराव होने के कारण हुआ है।

⇒ इस मृदा में भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन नगण्य होने के कारण अविघटित कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण मृदा की अम्लीयता भी अपेक्षाकृत अधिक हो जाती है। यह उच्च लवणीय मृदा है, लेकिन इसमें पोटाश तथा फॉस्फेट की कमी होती है।

⇒ ये अम्लीय स्वभाव की होती है तथा फेरस आयरन होने से प्रायः इनका रंग नीला होता है।

⇒ भारत में पीट मृदा वाले क्षेत्रों में ही ‘मैंग्रोव वनस्पति’ का अधिक विकास हुआ है।

⇒ यह भारत में मुख्यतः केरल के अलप्पुझा ज़िला, उत्तराखंड के अल्मोड़ा एवं सुंदरबन डेल्टा में पाई जाती है।

⇒ यह हल्की उर्वरता वाली फसलों हेतु उपयुक्त मृदा है।

⇒ उपयुक्त दशा में वनस्पति की संवृद्धि के कारण इसमें जीवाश्म के अंश एवं ह्यूमस अधिक मात्रा में पाये जाते हैं, जिस कारण यह मृदा गहरे काले रंग की होती है।

मृदा अवकर्षण (Degradation):-

      मृदा में उर्वरता के ह्रास को ही ‘मृदा अवकर्षण’ कहते हैं।

⇒ इसमें मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है तथा मृदा के दुरुपयोग एवं अपरदन के कारण मृदा की गहराई या परत की मोटाई कम हो जाती है।

⇒ मृदा अवकर्षण की दर भू-आकृतिक संरचना, पवनों की गति तथा वर्षा की मात्रा के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न भिन्न होती है।

मृदा अपरदन (Soil Erosion):-

     ‘मृदा अपरदन’ का तात्पर्य मृदा के ऊपरी संस्तरों का विनाश है। प्राकृतिक व मानवीय गतिविधियों से अपरदनात्मक प्रक्रियाओं द्वारा मृदा की ऊपरी परत का क्षरण होता है, जिसे ‘मृदा अपरदन’ की संज्ञा दी जाती है।

⇒ प्राकृतिक रूप से होने वाले मृदा अपरदन व मृदा निर्माण प्रक्रिया में एक प्रकार का संतुलन पाया जाता है किंतु मानवीय हस्तक्षेप द्वारा इस संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न होने से मृदा अपरदन की दर में वृद्धि होती है।

⇒ मृदा अपरदन के लिये उत्तरदायी अपरदनात्मक कारकों में परिवहित जल, प्रवाहित पवन, कृषि व पशुचारण की अवैज्ञानिक पद्धतियाँ, मानव बस्तियों का निर्माण, खनन व अन्य मानवीय गतिविधियों को शामिल किया जाता है।

मृदा अपरदन के कारण (Causes of Soil Erosion)

(i) निर्वनीकरणः-

     वन, पानी के बहाव तथा वायु की गति को कम करता है। वृक्षों की जड़ें मिट्टी को जकड़कर रखती हैं किंतु वृक्षों के अविवेकपूर्ण दोहन तथा कटाई से अपरदन की तीव्रता बढ़ती है।

(ii) अत्यधिक पशुचारणः-

     इससे मिट्टी का गठन ढीला हो जाता है। फलतः जलीय एवं वायु अपरदन तीव्र हो जाता है।

(iii) जलीय अपरदनः-

     जल द्वारा मिट्टी के घुलनशील पदार्थों को घुलाकर एक स्थान से दूसरे स्थान के लिये परिवहित करना जलीय अपरदन कहलाता है। जल के भार/चोट से उत्पन्न दबाव के कारण मिट्टी का स्थानांतरण ‘जलगति क्रिया’ कहलाती है। इसमें वर्षा की प्रमुख भूमिका होती है, क्योंकि अत्यधिक वर्षा वाले स्थानों में वर्षा के जल तथा बाढ़ से समस्याग्रस्त होने के बाद मृदा अपरदन की संभावना सर्वाधिक होती है।

(iv) वायु अपरदनः-

     तीव्र पवनों द्वारा सूक्ष्म कणों को अपने साथ उड़ाकर ले जाना ‘अपवहन’ कहलाता है। मृदा अपरदन चक्रवातों द्वारा भी होता है, जिसमें चक्रवात मिट्टी को उड़ाकर छोटे गर्त बना देते हैं।

     भारत में मई तथा जून माह में रबी की फसलों की कटाई के पश्चात् सतलुज-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान की उपजाऊ मिट्टी का भी पवन द्वारा पर्याप्त मात्रा में दोहन/अपरदन होता है।

(v) हिमानी अपरदनः-

      हिमालय में हिमरेखा के नीचे बहने वाले बर्फ तथा जल को हिमनद कहा जाता है। ये चट्टानों एवं मिट्टी को काटकर निचली घाटी में जमा कर देते हैं, जिन्हें ‘हिमोढ़’ कहते हैं।

(vi) झूम कृषिः-

     झूम कृषि के दौरान जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर कृषि करने के लिये वृक्षों का कटाव किया जाता है तो वनों के कटाव से अपरदन की दर में वृद्धि हो जाती है तथा मिट्टी के पोषक तत्त्व बह जाते हैं।

(vii) भूस्खलन अपरदनः-

     भूस्खलन अपरदन पहाड़ी सतह या पर्वतीय ढालै के नीचे धसने के कारण होता है। सामान्यतः भूस्खलन, ढालों पर कटाई, खुदाई या कमजोर भूगर्भ ढाल होने के कारण होता है।

मृदा संरक्षण के उपाय (Methods for Soil Conservation)

     मृदा संरक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है बल्कि उसमें सुधार की भी कोशिश की जाती है।

⇒ देश में मृदा अपरदन व उसके दुष्परिणामों पर नियंत्रण के लिये 1953 में ‘केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड’ का गठन किया गया जिसका कार्य राष्ट्रीय स्तर पर मृदा संरक्षण के कार्यक्रमों का संचालन करना है।

यांत्रिक उपाय (Engineering Method):-

⇒ मेड़बंदी के अंतर्गत बड़े-बड़े जोत के खेतों में मेड़ बनाकर जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है तथा वायु के तेज  प्रवाह से होने वाले अपरदन को रोकने में भी यह सहायक होता है।

⇒ मृदा समतलीकरण से जल के बहाव तथा वायु के तेज गति का प्रभाव कम पड़ता है।

⇒ सम्मोच्च रेखीय जुताई पहाड़ों के सबसे ऊँचे ढाल पर की जाती है। इस पद्धति में पहाड़ों से बहने वाले जल को रोकने के लिये समान ऊँचाई वाली रेखाओं से एक प्राकृतिक रूकावट बनाई जाती है, जिससे मृदा का संरक्षण होता है।

⇒ पत्थर के मेड़ चट्टान बांध के अंतर्गत पानी को तेजी से बहने से रोकने के लिये चट्टानों के द्वारा अवरोधक बनाए जाते हैं। चट्टानी बांध बनाने से नालियों की रक्षा होती है तथा मृदा का क्षय भी नहीं होता है।

⇒ बेसिन लिस्टिंग के अंतर्गत ढालों पर एक नियमित अंतराल के बाद लघु बेसिन या गर्त का निर्माण किया जाता है, जो जल प्रवाह को नियंत्रित रखने तथा जल को संरक्षित करने में सहायक होते हैं।

जैविक उपाय (Biological Method):-

     फसल चक्र के अंतर्गत अपरदन को कम करने वाली फसलों का अन्य फसल के साथ चक्रीकरण कर अपरदन को रोका जा सकता है। इससे मृदा की उर्वरता भी बढ़ती है।

⇒ पट्टीदार खेती के अंतर्गत इसमें बड़े जोतों के खेतों में पट्टी बनाकर जल प्रवाह के वेग को कम किया जाता है, जिससे मृदा अपरदन कम-से-कम हो।

⇒ पलवार या मल्चिंग के अंतर्गत खेतों में फसल अवशेष की 10-15 सेमी. पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जा सकता है। इससे मृदा का संस्तर सुरक्षित रहता है।

⇒ वर्मी कम्पोस्ट प्राचीन काल से ही किसानों का सबसे हितकारी प्रयोग रहा है क्योंकि यह पूरी तरह से केंचुए पर आधारित है। केंचुए को ‘किसानों का मित्र’ कहा जाता है। ये केंचुए मिट्टी में मौजूद घासफूस और अन्य खरपतवार को खाकर उन्हें खाद बनाते हैं तथा साथ ही मिट्टी को मुलायम और उपजाऊ भी बनाते हैं।

⇒ हरी एवं जैविक खाद के अंतर्गत मृदा संरक्षण को बनाए रखने के लिये खेत में हरी खाद का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाता है। परंपरागत रूप में प्रचलित उड़द, सैजी, सनई, कैंचा, मूंग, लोबिया आदि को खेत में बोया जाता है और खड़ी फसल के बीच खेत की जुताई की जाती है। इससे खेत में विभिन्न प्रकार के जैविक तत्त्वों का समावेश हो जाता है, जिससे फसलों की उत्पादकता बढ़ती है। सैजी और सनई की फसल का हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से सर्वाधिक मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त होता है।

⇒ कृषि वानिकी के अंतर्गत खेत के चारों तरफ मेड़ों पर दो या तीन पंक्तियों में एक निश्चित दूरी में फसलों के साथ वृक्षों को रोपित किया जाता है। इससे भी मृदा अपरदन को रोकने में सहायता मिलती है।

⇒ वृक्षों की जड़ें मृदा पदार्थों को बांधे रखती है, जो मृदा संरक्षण में सहायक है। अतः सरकार द्वारा सार्वजनिक मार्गों, नहरों, रेल पटरियों इत्यादि के दोनों ओर तीव्र गति से बढ़ने वाली प्रजातियों के वृक्षों को रेखीय पट्टियों के रूप में रोपित कर वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सामाजिक उपाय (Social Method):-

     अत्यधिक चराई से पहाड़ी ढालों की मृदा ढीली पड़ जाती है और पानी का बहाव इस ढीली मृदा को बड़ी आसानी से बहा ले जाती है। मृदा अपरदन को रोकने के लिये इन क्षेत्रों में नियोजित चराई से वनस्पति के आवरण को बचाया जा सकता है, जिससे मृदा संरक्षण में सकारात्मक सहयोग हो सके।

⇒ हमारे सामाजिक परिवेश में वृक्षों का कटाव व अत्यधिक दोहन भी मृदा अपरदन का एक कारक है। वनों के कटाव व दोहन का निम्नीकरण करके मृदा संरक्षण में सहयोग किया जा सकता है।

⇒ झूम खेती में जंगलों को काटकर व जलाकर खेती की जाती है, जिससे मृदा की बहुत हानि होती है। इस पर पूर्णतया रोक लगायी जानी चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण हो सके।

⇒ लोक सहभागिता के माध्यम से ग्राम पंचायतों से लेकर शहरों तक वृक्षारोपण के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। गैर सरकारी संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ना होगा व मृदा संरक्षण के प्रति सराहनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये, जिससे मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन मिल सके।

20. Human Geography: Definition, Nature and Scope (मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)

        Human Geography: Definition, Nature and Scope

(मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)



      मानव भूगोल मानव समाज और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन है। मानव भूगोल विज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी पर मानव तथ्यों के स्थानिक वितरण के साथ-साथ विभिन्न मानव समूहों और उनके पर्यावरण के बीच क्षेत्रीय कार्यात्मक अंतःक्रियाओं की जांच करती है। यह एक व्यापक अनुशासन है जिसमें कई तरह के विषय शामिल हैं, जैसे:-

 (i) जनसंख्या : मानव जनसंख्या का वितरण, वृद्धि और विशेषताएँ।

(ii) स्थान : स्थानों की भौतिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ।

(iii) संचलन : मानव प्रवास और गतिशीलता के पैटर्न।

(iv) अर्थव्यवस्था : आर्थिक गतिविधियों का स्थानिक वितरण।

(v) संस्कृति : मानव संस्कृतियों की विविधता और उनकी स्थानिक अभिव्यक्ति।

(vi) पर्यावरण : मानव समाज और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच अंतःक्रिया।

मानव भूगोल की परिभाषा

        मानव भूगोल, भूगोल की प्रमुख शाखा हैं जिसके अन्तर्गत मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक उसके पर्यावरण के साथ सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता हैं। मानव भूगोल की एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहु अनुमोदित परिभाषा है- “मानव एवं उसका प्राकृतिक पर्यावरण के साथ समायोजन का अध्ययन।”     

      किसी भी विषय को परिभाषित करना हमेशा मुश्किल होता है। ज्ञान के विस्तार और समाज की प्रगति के साथ समय के साथ विषय की अवधारणा बदलती रहती है। यहाँ कुछ भूगोलवेत्ताओं द्वारा व्यक्त मानव भूगोल की कुछ परिभाषाएँ दी गई हैं।

रैटजेल : “मानव भूगोल मानव समाज और पृथ्वी की सतह के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है”

एलेन सी. सेम्पल : “मानव भूगोल अशांत मनुष्य और अस्थिर पृथ्वी के बीच बदलते संबंधों का अध्ययन है”

विडाल डी ला ब्लाश : “मानव भूगोल पृथ्वी और मानव के बीच अंतर्संबंधों की एक नई अवधारणा प्रस्तुत करता है”

ई. हंटिंगटन : “मानव भूगोल को भौगोलिक वातावरण और मानव गतिविधियों और गुणों के बीच संबंधों की प्रकृति और वितरण के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है”

एच. डी. ब्लिज : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग कैसे स्थान बनाते हैं, हम स्थान और समाज को कैसे व्यवस्थित करते हैं, हम स्थानों और अंतरिक्ष में एक-दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते हैं, और हम अपने इलाके, क्षेत्र और दुनिया में दूसरों और खुद को कैसे समझ सकते हैं”

रुबेनस्टीन : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग और मानवीय गतिविधियाँ कहाँ और क्यों स्थित हैं”

मानव भूगोल की प्रकृति  

      मानव भूगोल की प्रकृति अत्यधिक जटिल एवं विस्तृत है। जीन ब्रुश के अनुसार जिस प्रकार अर्थशास्त्र का सम्बन्ध कीमतों से, भू-गर्भशास्त्र का सम्बन्ध चट्टानों से, वनस्पति शास्त्र का सम्बन्ध पौधों से है ठीक उसी प्रकार भूगोल का केन्द्र बिन्दु स्थान से है जिसमें कहाँ व क्यों जैसे प्रश्नों के उत्तरों का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल मानव को केन्द्रीय भूमिका का अध्ययन करता है। फ्रेडरिक रेटजेल, जिन्हें आधुनिक मानव भूगोल का संस्थापक कहा जाता है।

        उन्होंने मानव समाजों एवं पृथ्वी के धरातल के सम्बन्धों के संश्लेषणात्मक अध्ययन पर जोर दिया है। पृथ्वी पर जो भी मानव निर्मित दृश्य दिखाई देते हैं उन सबका अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत आता है। इसी कारण मानव भूगोल की प्रकृति में मानवीय क्रियाकलाप केन्द्रीय बिन्दु के रूप में रहते हैं। इस प्रकार मानवीय क्रियाकलापों के विकास (कब, क्यों, कैसे) को भौगोलिक दृष्टि से प्रस्तुत करना ही मानव भूगोल की प्रकृति को दर्शाता है।

      मानव भूगोल विभिन्न प्रदेशों के पारिस्थितिक समायोजन व क्षेत्र संगठन के अध्ययन पर केन्द्रित रहता है। पृथ्वी पर रहने वाले मानव के जैविक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के लिए वातावरण के उपयोग का अध्ययन व वातावरण में किए गए बदलाबों का अध्ययन मानव भूगोल का आधार है। सारांशत: यह कहा जा सकता है कि मानव भूगोल मानव व वातावरण के जटिल तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव को केन्द्रीय भूमिका के रूप में रखकर अध्ययन कस्ता है।

       मानव भूगोल की प्रकृति को समझने के लिए, निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए:-

(i) मानव भूगोल, भूगोल की एक प्रमुख शाखा है।

(ii) मानव भूगोल में, मानव और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है

(iii) मानव भूगोल में, मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(iv) मानव भूगोल में, मानव की गतिविधियों और पर्यावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

(v) मानव भूगोल में, मानव निर्मित चीज़ों का भी अध्ययन किया जाता है।

(vi) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(vii) मानव भूगोल में, मानव समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और जैविक विकास का अध्ययन किया जाता है।

(viii) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों को समझने के लिए, सामाजिक विज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन किया जाता है।

Human Geography

     इस प्रकार मानव भूगोल की प्रकृति यह है कि यह दोनों – सक्रिय मानव और अस्थिर पृथ्वी सतह की पारस्परिक क्रिया का अध्ययन करना है जहाँ भौतिक वातावरण में मानव के लिए अवसरों की सम्भावनाएँ प्रदान करने के साथ कई सीमाएँ हैं। और इसके जवाब में मानव प्राकृतिक वातावरण को संशोधित करता है और उस वातावरण में समायोजित होता है।

मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र

      मानव द्वारा अपने प्राकृतिक वातावरण के सहयोग से जीविकोपार्जन करने के क्रियाकलापों से लेकर उसकी उच्चतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किये गये सभी प्रयासों का अध्ययन मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अतर्गत ही आता है। अतः पृथ्वी पर जो भी दृश्य मानवीय क्रियाओं द्वारा निर्मित हैं, वे सभी मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता हैं।

    पृथ्वी तल पर मिलने वाले मानवीय तत्त्वों को समझने व उनकी व्याख्या करने के लिए मानव भूगोल के अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों का अध्ययन भी करना पड़ता है। मानव भूगोल के विषय क्षेत्र, उपक्षेत्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों से मानव भूगोल के सम्बन्धों को निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत किया गया है।

मानव भूगोल के क्षेत्र उप-क्षेत्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
सामाजिक भूगोल व्यवहारवादी भूगोल

सामाजिक कल्याण का भूगोल

सांस्कृतिक भूगोल

लिंग भूगोल

ऐतिहासिक भूगोल

चिकित्सा भूगोल

मनोविज्ञान

कल्याण

अर्थशास्त्र

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

महिला अध्ययन

इतिहास

महामारी विज्ञान

नगरीय भूगोल  नगरीय अध्ययन और नियोजन
राजनितिक भूगोल निर्वाचन भूगोल

सैन्य भूगोल

राजनीति विज्ञान

सैन्य विज्ञान

जनसँख्या भूगोल जनांकिकी
आवास भूगोल नगर/ग्रामीण नियोजन
आर्थिक भूगोल संसाधन भूगोल

कृषि भूगोल

उद्योग भूगोल

विपणन भूगोल

पर्यटन भूगोल

अन्तर्राष्ट्री व व्यापार का भूगोल

अर्थशास्त्र

संसाधन अर्थशास्त्र

कृषि विज्ञान

औद्योगिक अर्थशास्त्र

व्यावसायिक अर्थशास्त्र

वाणिज्य पर्यटन और यात्रा प्रबन्धन

अन्तर्राष्ट्री य व्यापार

 

18. The Industrial regions of the world (विश्व के औद्योगिक प्रदेश)

18. The Industrial regions of the world

(विश्व के औद्योगिक प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. What are the industrial regions of the world? Discuss the characteristics of each region.

(विश्व के औद्योगिक प्रदेश कौन-कौन हैं? प्रत्येक की विशेषताओं का वर्णन करें।)

उतर- औद्योगिक प्रदेश एक महत्त्वपूर्ण प्रदेश होता है। उसका समूचा स्वरूप ही उद्योगों पर निर्भर होता है। इस प्रकार औद्योगिक प्रदेश वह है जहाँ अधिकतर लोगों की जीविका का साधन उद्योग है। उस प्रदेश में मानव का मुख्य क्रियाकलाप उद्योगों से सम्बंधित होता है। ऐसे प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों में सम्बद्धता होती है। वह सम्पूर्ण प्रदेश उद्योगों से परिपूर्ण होता है। इन गुणों के विद्यमान रहने पर हम उसे औद्योगिक प्रदेश कह सकते हैं। इसी संदर्भ में किसी अर्थशास्त्री ने उद्योग के लिए 9 ‘M’ को महत्त्वपूर्ण माना है जो इस प्रकार है-
1. Money (मुद्रा)

2. Material (माल/सामग्री)

3. Man (मानव)

4. Market (बाजार)

5. Machinery (मशीनें)

6. Motive (शक्ति)

7. Management) (प्रबंधन)

8. Means of transport (यातायात के साधन)

9. Momentum of early start (पहले कारखाना खोलने से विकास की गति)।

      विश्व को उनकी औद्योगिक सम्बद्धता के आधार पर निम्नलिखित औद्योगिक प्रदेशों में बाँट सकते हैं-

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका का औद्योगिक प्रदेश

(2) कनाडा औद्योगिक प्रदेश

(3) ग्रेट ब्रिटेन का औद्योगिक प्रदेश

(4) जर्मनी औद्योगिक प्रदेश

(5) सोवियत रूस औद्योगिक प्रदेश

(6) जापान का औद्योगिक प्रदेश

(7) चीन का औद्योगिक प्रदेश

(8) भारत का औद्योगिक प्रदेश

(9) आस्ट्रेलिया का औद्योगिक प्रदेश

(10) दक्षिणी अफ्रिकी गणराज्य।

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका:-

     U.S.A. विश्व का सबसे विकसित औद्योगिक देश है। यहाँ अनेक वस्तुओं का उत्पादन होता है। अलग-अलग प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनती हैं। अतः यहाँ कई क्षेत्रों में औद्योगिक विकास हुआ है, जो इस प्रकार हैं-

(i) दक्षिणी न्यू इंग्लैंड प्रदेश

(ii) मध्य-अटलांटिक तटीय प्रदेश

(iii) पिट्सबर्ग-लेक एरी प्रदेश

(iv) डेट्रॉइट औद्योगिक प्रदेश

(v) महान झील औद्योगिक प्रदेश

(vi) दक्षिणी अप्लेशियन प्रदेश

(vii) पूर्वी टेक्सास प्रदेश

(viii) प्रशांत तटीय प्रदेश

(ix) राकी पर्वतीय प्रदेश

(x) मध्य न्यूयार्क क्षेत्र।

    लोहा-इस्पात उद्योग सबसे अधिक यहीं केन्द्रित है। दक्षिण-पूर्वी U.S.A में देश का 85% लोहा-इस्पात के कारखाने स्थित हैं। इसके कारण अन्य उद्योग भी यहाँ स्थापित हैं।

(2) कनाडा औद्योगिक प्रदेश:-

     उत्तरी अमेरिका में U.S.A. के बाद दूसरा सबसे विकसित औद्योगिक देश कनाडा है। यहाँ कच्चे माल की सुविधा तथा यातायात की सुगमता के कारण उद्योगों का विकास हुआ है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार है-

(i) ओण्टोरियो औद्योगिक प्रदेश

(ii) क्यूवेक,

(iii) समुद्री प्रान्तों का प्रदेश

(iv) ब्रिटिश कोलम्बिया,

(v) प्रेयरी प्रदेश का औद्योगिक प्रदेश।

    कनाडा में भी अलग-अलग प्रदेशों में औद्योगिक पट्टियों का विकास हुआ है। ओण्टोरियो प्रदेश में भारी उद्योगों के संयंत्र स्थापित हैं। समुद्री भाग में मत्स्य उद्योग औद्योगिक प्रदेश है।

(3) ग्रेट ब्रिटेन का औद्योगिक प्रदेश:-

     ग्रेट ब्रिटेन से ही विश्व में औद्योगिक क्रान्ति शुरू हुई। कुछ ही समय में वह एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक राष्ट्र बन गया। यहाँ के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार हैं-

(i) नार्थम्बरलैंड डरहम क्षेत्र

(ii) यार्क-डर्बी- नार्टिघमशायर प्रदेश

(iii) मिडलैंड औद्योगिक प्रदेश

(iv) साउथ वेल्स

(v) लंकाशायर

(vi) स्काटलैंड मध्यघाटी औद्योगिक प्रदेश।

       इस समय ग्रेट ब्रिटेन विभिन्न प्रकार के उद्योगों में पीछे हो गया है।

(4) जर्मनी के औद्योगिक प्रदेश:-

     जर्मनी विश्व के बड़े औद्योगिक देशों में से एक है। यहाँ भारी उद्योगों की स्थापना हुई है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश इस प्रकार हैं-

(i) बेस्टपफैलिया औद्योगिक प्रदेश

(ii) बवेरिया क्षेत्र

(iii) सार बेसिन क्षेत्र

(iv) सेक्सोनी क्षेत्र।

(5) सोवियत रूस के औद्योगिक प्रदेश:-

      यहाँ के बड़े भाग में उद्योगों का विकास हुआ है। इसके औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) यूक्रेन क्षेत्र

(ii) केन्द्रीय प्रदेश

(iii) यूराल प्रदेश

(iv) लेनिनग्राड

(v) मध्य वोल्गा

(vi) कृजवास प्रदेश

(vii) ट्रांस काकेशिया

(viii) एशियाई क्षेत्र

(ix) वैकाल झील क्षेत्र

(x) सुदूर पूर्वी क्षेत्र

(xi) क्रोशिया प्रदेश।

(6) जापान का औद्योगिक प्रदेश:-

        यहाँ के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) टोकियो-योकोहामा क्षेत्र

(ii) नागोया क्षेत्र

(iii) कोवे ओसाका क्षेत्र

(iv) नागासाकी क्षेत्र

(v) कमैसी प्रदेश

(vi) द० होकैडो क्षेत्र।

(7) चीन का औद्योगिक प्रदेश-

      यहाँ के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) उत्तरी-पूर्वी चीन क्षेत्र

(ii) पेकिंग प्रदेश

(iii) शंघाई-वुहान क्षेत्र

(iv) कैण्टन।

(8) भारत के औद्योगिक प्रदेश:-

      भारत के औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं-

(i) हुगलीघाटी औद्योगिक प्रदेश

(ii) दामोदर घाटी एवं स्वर्णरेखा घाटी औद्योगिक प्रदेश

(iii) मुम्बई-अहमदाबाद क्षेत्र

(iv) दक्षिण-भारत के औद्योगिक प्रदेश

(v) गंगा-यमुना की घाटी का औद्योगिक प्रदेश।

(9) आस्ट्रेलिया का औद्योगिक प्रदेश:-

      आस्ट्रेलिया में उद्योग का विकास हो हा है। यहाँ के औद्योगिक प्रदेश ये हैं-

(i) न्यूसाउथ वेल्स का औद्योगिक प्रदेश

(ii) न्यूजीलैंड का औद्योगिक प्रदेश।

(10) दक्षिण अफ्रिका के औद्योगिक प्रदेश:-

        दक्षिण अफ्रिका गणराज्य में कच्चे माल की प्राप्ति के काण उद्योगों का विकास हुआ है।

17. The Commercial Grain Farming in the world (विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि)

17. The Commercial Grain Farming in the world

(विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि)



प्रश्न प्रारूप

Q. Discuss the Commercial Grain Farming in the world.

(विश्व में व्यापारिक अन्न कृषि का वर्णन करें।)

उत्तर- जिस कृषि की उपजों को स्थानीय उपभोग के लिए नहीं बल्कि बाजारों में व्यापार के लिए प्रयोग किया जाता है, उसे व्यापारिक कृषि कहते हैं। इस प्रकार की कृषि से मुद्रा की प्राप्ति होती है। अतः इसे मुद्रादायिनी फसल भी कहते हैं। बाजारों में बेचकर इससे तुरन्त धन कमाया जाता है, इसी से इसे (Cash crop) या नकदी फसल भी कहा जाता है। इस प्रकार की फसल विश्व के अनेक क्षेत्र में उपजाई जाती है।

      वास्तव में इस प्रकार की कृषि अधिक आबादी के देशों में स्थानीय उपभोग के लिए की जाती है। दक्षिणी पूर्वी एशिया के देशों में व्यापारिक खाद्यान्न कृषि व्यापार के लिए नहीं बल्कि स्थानीय उपभोग के लिए की जाती है। अतः इस क्षेत्र में गेहूँ जीवन निर्वाहण कृषि है। परन्तु U.S.A., कनाडा आदि देशों में गेहूँ का उत्पादन व्यापार के लिए होता है, अतः यहाँ यह व्यापारिक कृषि के अन्तर्गत आता है।

विस्तीर्ण व्यापारिक खाद्यान्न कृषि की विशेषताएँ:

     इस प्रकार कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:

1. आधुनिक युग की कृषि:-

    व्यापारिक खाद्यान्न कृषि वास्तव में आधुनिक युग की देन है। यह मध्य आक्षांशों के आर्द्र एवं शुष्क प्रदेशों के बीच में की जाती है। ये क्षेत्र अत्यन्त ही विरल जनसंख्या वाले हैं। इनके अधिकांश जनसंख्या यूरोपीय किस्म की है।

2. एक ही फसल के उत्पादन पर बल:-

    प्रत्येक देश में या उसके उप प्रदेश में, केवल एक ही मुख्य फसल के उत्पादन पर बल दिया जाता है। वह फसल बाजार में बिक्री के लिए उत्पन्न की जाती है। जैसे- गेहूँ। इन प्रदेशों की सर्वप्रमुख फसल गेहूँ ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में एक पेटी में मक्का भी बोई जाती है। गेहूँ के अलावा जौ, जई और राई का थोड़ा-थोड़ा उत्पादन देशी या स्थानीय माँग पूर्ति के लिए किया जाता है। लगभग 70% से 80% कृषि भूमि पर गेहूँ का उत्पादन होता है।

3. मानव एवं पशुओं का कम प्रयोग:-

     मानव एवं कृषि पशुओं का प्रयोग कृषि में कम होता है। अधिकतम कार्य मशीनों से होता है।

4. बड़े-बड़े कृषि फार्म:-

     कृषि फार्म बड़े-बड़े होते हैं। U.S.A. एवं अर्जेन्टाइना में 300 एकड़ से 1000 एकड़ तक कृषि फार्म होते हैं। कृषि फार्म पर ही कृषक का निवास तथा मशीनों के रखने आदि की जगह होती है।

5. फसलों में विशेषीकरण:-

     यह केबल एक फसल का विशेषीकरण होता है। इस कृषि की मुख्य फसल गेहूँ है। बड़े पैमाने पर गेहूँ का उत्पादन होता है तथा विश्व के गेहूँ का कुल निर्यात इन्हीं देशों से होता है।

6. कृषि कार्य वैज्ञानिक ढंग से:-

     कृषि का प्रत्येक कार्य वैज्ञानिक ढंग से किया जाता है। उर्वरकों का पूर्ण प्रयोग होता है।

7. मैदानी भागों में कृषि:-

      यह कृषि विशाल समतल मैदानी प्रदेशों में की जाती है।

उत्पादन-

     FAO Production year book, 2011 के अनुसार विश्व में गेहूँ का कुल उत्पादन 5190 लाख मेट्रिक टन हुआ। नीचे के तालिका में कुछ प्रमुख देशों का उत्पादन इस प्रकार रहा-

विश्व में गेहूँ का उत्पादन, 2011

देश कुल उत्पादन लाख मेट्रिक टन में विश्व के कुल उत्पादन का %
चीन 951 18.32
U.S.S.R. 835 16.9
भारत 565 10.88
U.S.A. 605 11.66
फ्रांस 401 7.23
कनाडा 364 7.01
टर्की 275 5.30
पाकिस्तान 205 3.95
ब्रिटेन 195 3.76
जर्मनी 154 2.97
ऑस्ट्रेलिया 115 2.21
अन्य देश 525 10.11
कुल विश्व 5190 100%

विश्व वितरण-

    इस प्रकार की कृषि मध्य अक्षांशों में स्थित समशीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदानों में की जाती है। इसके क्षेत्र निम्नलिखित हैं-

1. सोवियत संघ में स्टेपी घास के मैदान:-

     गेहूँ के उत्पादन में U.S.S.R. का स्थान दूसरा है। यह विश्व का 14.5% गेहूँ उत्पन्न करता है। यहाँ गेहूँ के दो क्षेत्र हैं-

(i) शीतकालीन पट्टी- उत्तरी यूक्रेन प्रदेश में

(ii) बसन्त कालीन गेहूँ पट्टी- कैस्पियन सागर एवं कालासागर के आस-पास। यहाँ उपजाऊ मिट्टी, गर्मी में वर्षा तथा मशीनों का पूर्ण प्रयोग से यहाँ कृषि की जाती है।

2. उत्तरी अमेरिका में तथा कनाडा के प्रेयरी मैदान:-

    यहाँ विश्व का लगभग 10% गेहूँ उत्पादन होता है। यहाँ बड़े पैमाने पर मशीनों द्वारा गेहूँ की व्यापारिक कृषि होती है। यहाँ गेहूँ के 4 प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

(i) बसन्तकालीन गेहूँ क्षेत्र- प्रेयरीज के उत्तरी भाग में डेकोटा, मोण्टाना और मिन्नेसोटा में।

(ii) शीतकालीन गेहूँ क्षेत्र- कन्सास ओकलाहोमा, नेबास्का, टेस्सास।

(iii) कोलम्बिया पठार गेहूँ क्षेत्र

(iv) कैलिफोर्निया गेहूँ क्षेत्र

3. दक्षिणी अमेरिका अर्जेटिना का पम्पा प्रदेश:-

    इस प्रदेश में यूरुग्वे एवं पराग्वे नदी के डेल्टा प्रदेश में पम्पा नामक घास का विस्तृत मैदान है। इसमें गेहूँ की विस्तृत खेती की है। यहाँ से गेहूँ विदेशों को निर्यात होता है।

4. दक्षिणी पूर्वी अफ्रीका में वेल्ड नामक घास के मैदान:-

     यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रिका गणराज्य के द० पूर्वी भाग में स्थित है। यहाँ भी गेहूँ के उत्पादन के लिए लगभग सारी भौगोलिक परिस्थितियाँ उपलब्ध है। अतः यहाँ भी बड़े पैमाने प व्यापा के लिए गेहूँ की खेती की जाती है।

5. आस्ट्रेलिया में डार्लिंग डाउन्स का मैदान:-

       आस्ट्रेलिया के डाउन्स क्षेत्र में गेहूँ की काफी उपज होती है। यहाँ गेहूँ के उत्पादन के लिए समतल मैदानी भाग, उत्तम मिट्टी तथा वैज्ञानिक ढंग से कृषि की सुविधा प्राप्त है। यहाँ गेहूँ के दो क्षेत्र हैं:

(i) दक्षिणी पूर्वी भाग जो विक्टोरिया तथा न्यूसाउथ वेल्स में है,

(ii) भूमध्य सागरीय जलवायु के प्रदेश में, जो पश्चिमी आस्ट्रेलिया में स्थित है।

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