उत्तर- संरचनावाद मानता है कि समाज के भीतर सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाएँ हैं और वे व्यक्तिगत अभिन्न व सोच की बातें करते हैं। इसलिए संरचनावाद चीजों के व्यक्तिगत अभिनय व सोच की बात के व्यक्तिगत उद्देश्य और व्याख्या पर केन्द्रित नहीं है बल्कि भौतिक और प्रतीकात्मक सरंचनाओं पर केन्द्रित है। जो सामाजिक व्यवहार में एक मॉडल की तरह कार्य करता है। संरचनाएँ सामाजिक दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
एटकेन और वेलेंटाइन में (2006) संरचनावाद को निम्न रूप में परिभाषित किया गया हैं-
“मानव भूगोल के लिए एक सैद्धान्तिक दृष्टिकोण जिसे एक धारणा से दर्शाया गया है कि मानव व्यवहार के सतह पैटर्न को समझने के लिए मानव, कार्यों को उत्पन्न करने या आकार देने वाली संरचनाओं को समझना आवश्यक है।”
संरचना सिद्धान्त के मुख्य समर्थक ब्रिटश समाजशास्त्री एंथनी गिंडेस और फ्रांसीसी समाजशास्त्री पियरे वोर्डियों हैं। गिडेंस के अनुरूप संरचना का निर्माण एक पहल में नहीं होता-संरचना एक सतत प्रवाह है, एक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उत्पन्न होती है। यही कारण है कि वह संरचनावाद के आधार पर संरचना को पसंद करते हैं। संरचनात्मक सिद्धान्त समाज को मानवीय गतिविधि से स्वतंत्र नहीं बल्कि मानव गतिविधि के उत्पाद के रूप में भी नहीं देखता है। यह संरचना की द्वंद्व (gidden) के संरचना सिद्धान्त में एक केन्द्रीय बिन्दु है।
हम कह सकते हैं कि संरचना प्रथाओं के पुनरुत्पादन के माध्यम और परिणाम दोनों हैं। संरचनात्मक सिद्धान्त में यह महत्वपूर्ण है कि गतिशील प्रक्रिया के माध्यम से संरचनाएँ कैसे हो रही हैं। एक और अंतर यह है कि संरचनात्मक सिद्धान्त के दृष्टिकोण से संरचनाओं में स्वयं शक्ति नहीं होती है। मुख्य संवैधानिक शक्ति मानव व्यक्ति की एजेंसी को सौंपी जाती है।
बेने वेरलेन (2009) ने उसे निम्नानुसार रखा है- “संरचना और सामाजिक अभ्यास का संबंध दोहरी है जिसका अर्थ है कि सामाजिक प्रथाएँ सामाजिक संरचनाओं का संदर्भ देती है और सामाजिक संरचनाएँ पहले किए गए प्रथाओं और सामाजिक कार्यों का परिणाम है।”
एक और संरचनावादी विचारक जीन पिरगेट हैं जिसने बच्चों के संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक विकास के सिद्धान्त के माध्यम से उनके मनोवैज्ञानिक संरचनावाद के बारे में विचारों को समझाया। उन्होंने कहा कि ज्ञान एकत्र करने की प्रक्रिया में विभिन्न चरणों और संरचनाओं के लिए होते हैं, ज्ञान के विकास में प्रत्येक चरण में अपनी विशेषताओं और प्रणालियों की आवश्यकताएँ होती हैं लेकिन ज्ञान में स्वयं भी संरचनाएँ होती हैं।
संरचनात्मकता के विचार का कई क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकता है। उन क्षेत्रों में से एक इतिहास है। संरचनावादियों का मानना है कि पूरे इतिहास में उनके कई कार्यक्रम हुए हैं जिन्होंने इतिहास को आकार दिया है जैसा कि आजकल हम जानते हैं। संरचनात्मक घटनाओं का परिणाम कुल इतिहास में होता है, एक इतिहास जो हर किसी के लिए मायने रखता है। वे अलग संदर्भों के बीच भेद नहीं करते हैं। यह भेद आमतौर पर पोस्ट-स्ट्रक्चरल वाद के लिए होता है।
संरचनावाद भूगोल के भीतर के दृष्टिकोण जो इस तथ्य को इंगित करता है कि मानव व्यवहार के सतह पैटर्न को समझने के लिए विश्वास मानव कार्यों को उत्पन्न करने या आकार देने वाली संरचनाओं के बारे में ज्ञान का होना जरूरी है।
उदाहरणार्थ नीदरलैण्ड में एक निश्चित क्षेत्र अपने क्षेत्र में नए लोगों को आकर्षित करना चाहता है। फिर उन्हें पहले के विशिष्ट क्षेत्र को स्थानान्तरित करने के लिए लोगों के अन्तर्निहित पैटर्न और उद्देश्यों पर व्यापक शोध होना चाहिए। उसके बाद यह क्षेत्र उन लोगों को अपने क्षेत्र की ओर आकर्षित करने में सशक्त कदम उठा सकता है अन्यथा अपने क्षेत्र में कई नए लोगों को आकर्षित करना लगभग असंभव है। यह उदाहरण दिखाता है कि मानव व्यवहार के उद्देश्यों के बारे में स्पष्ट ज्ञान का होना कितना महत्वपूर्ण है। केवल अगर हमारे पास वह ज्ञान है तो हम मानव व्यवहार को प्रभावित करने में सक्षम होंगे।
1960 के दशक के आरंभ तक एक आंदोलन के रूप में संरचनावाद अपने आप आ रहा था और कुछ लोगों का मानना था कि यह मानव जीवन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करता है जो सभी विषय को गले लगाएगा। रोलैंड वार्थेस और जैक्स डेरिका ने उस बात पर ध्यान केन्द्रित किया कि साहित्य में संरचनावाद कैसे लागू किया जा सकता है।
आज संरचना वक्ता उत्तर संरचनावाद और विघटन जैसे दृष्टिकोण से कम लोकप्रिय है। उसके कई कारण हैं- संरचनात्मक्ता की अक्सर अनैतिक होने और व्यक्तिगत लोगों की कार्य करने की क्षमता पर निर्धारक संरचनात्मक ताकतों के पक्ष में आलोचना करने में की गई है।
1960 और 1970 के राजनीतिक अशांति और विशेष रूप से यही 1968 के (छात्र विद्रोह) ने अकादमिक को प्रभावित करना शुरू किया। सत्ता और राजनीतिक संघर्ष के मुद्दे लोगों के ध्यान के केन्द्र में चले गए।
1980 के दशक में विद्रोह उसकी क्रिस्टलीय तार्किक संरचना के बजाय भाषा की मौखिक स्पष्टता पर जोर लोकप्रिय हो गया। सदी के अंत तक संरचनावाद को विचार के ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्कूल के रूप में देखा गया था लेकिन संरचनात्मकता के बजाय यह आंदोलन पर विशेष ध्यान दिया।
बिहार भारत का एक राज्य है जिसकी राजधानी पटना है। बिहार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत और पाली भाषा के शब्द “विहार” से हुई जिसका अर्थ है निवास अर्थात प्राचीन काल में यहाँ बौद्ध भिक्षुओं का निवास हुआ करता था इसीलिए इसे विहार (बिहार) कहा गया।
➤ बिहार तीन बार खण्डित हुआ है। 1912 में पहली बार बंगाल से अलग हुआ। 1936 में उड़ीसा से तथा 15 नवम्बर 2000 में झारखण्ड से अलग हुआ।
➤ बिहार का कुल क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किमी० है।
➤ बिहार क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का 13 वां सबसे बड़ा राज्य है।
➤ बिहार की कुल जनसँख्या 104,099,452 है।
➤ बिहार जनसंख्या की दृष्टि से देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है।
➤ चौहदी: उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में झारखण्ड है।
बिहार का भौगोलिक परिचय
बिहार का भौगोलिक परिचय
अक्षांशीय विस्तार
24° 20′ 10″ से 27° 31′ 15″ उत्तरी अक्षांश
देशांतरीय विस्तार
83° 19′ 50″ से 88° 17′ 40″ पूर्वी देशांतर
आकृति
आयताकार
क्षेत्रफल
94163 वर्ग किमी० (देश के कुल क्षेत्रफल का 2.86%)
लंबाई (उत्तर से दक्षिण)
345 किमी०
लंबाई (पूर्व से पश्चिम)
483 किमी०
समुद्र तल से औसत ऊंचाई
173 फीट (53 मी०)
सीमाएं
उत्तर में नेपाल (7 जिला), दक्षिण में झारखण्ड (9 जिला), पूर्व में पश्चिम बंगाल (3 जिला), पश्चिम में उत्तर प्रदेश (7 जिला)
जलवायु
मानसूनी
सर्वाधिक तापमान वाला जिला
गया (41ºC)
सर्वाधिक ठंडा जिला
गया
औसत वर्षा
1050 मिमी0
वन क्षेत्र
6.6%
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जिला
पश्चिमी चंपारण
क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा जिला
शिवहर
सर्वाधिक वर्षा वाला जिला
किशनगंज
सबसे कम वर्षा वाला जिला
औरंगाबाद
सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना
गंडक परियोजना
बिहार राज्य से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
बिहार राज्य से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
बंगाल से बिहार को अलग किया गया
1 अप्रैल 1912
बिहार से उड़ीसा को अलग किया गया
1 अप्रैल 1936
बिहार से झारखण्ड को अलग किया गया
15 नवम्बर 2000
राजधानी
पटना
उच्च न्यायालय
पटना
राजकीय भाषा
हिंदी
द्वितीय राजकीय भाषा
उर्दू
राजकीय पशु
बैल
राजकीय पक्षी
गोरैया
राजकीय पुष्प
गेंदा फूल
राजकीय वृक्ष
पीपल
राजकीय चिन्ह
बोधि वृक्ष
राजकीय मछली
मांगुर
राज्य का महापर्व
छठ पूजा
राजनितिक परिचय
राजनितिक परिचय
लोक सभा सदस्यों की संख्या
40
लोक सभा में अनुसूचित जाति की आरक्षित सीटें
6 (गोपालगंज, हाजीपुर, समस्तीपुर, जमुई, गया तथा सासाराम)
Q. बिहार में ग्रामीण बस्तियों के प्रतिरूप की व्याख्या कीजिए।
वह अधिवासीय क्षेत्र जहाँ की 2/3 जनसंख्या प्राथमिक उत्पादन गतिविधि में संलग्न हो, वैसे बस्ती को ग्रामीण बस्ती कहते हैं। ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप के अन्तर्गत ग्रामीण बस्तियों के आकृतियों का अध्ययन किया जाता है।
प्रतिरूप का निर्धारण मकानों एवं मार्गों की स्थिति और उनका क्रमिक व्यवस्था के आधार पर सुनिश्चित किया जाता है।
ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप के भौगोलिक कारक
ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप पर दो भौगोलिक कारकों का प्रभाव पड़ता है।:-
(1) भौतिक कारक और
(ii) सांस्कृतिक कारक।
भौतिक कारक के अन्तर्गत कुंआ, तालाब, पोखर, (कच्चा मिट्टी) टीले, भूमि का ढाल, सीढ़ीनुमा, ढाल की आकृति, भूमिगत जलस्तर, दलदली भूमि इत्यादि प्रमुख हैं। जबकि सांस्कृतिक कारक के अन्तर्गत ऐतिहासिक घटना क्रम, सड़क एवं गलियों के नियोजित एवं अनियोजित प्रारूप, खेतों का प्रतिरूप, ग्रामीण धार्मिक संस्थाएँ, जातिय संरचना इत्यादि को शामिल करते है।
ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव से गुजरने वाली सड़के एवं गलियाँ ग्रामीण बस्तियों के आतंरिक विन्यास के ढाँचे को सुनिश्चित करते है। भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बिहार में ग्रामीण बस्तियों के निम्नलिखित प्रतिरूप पाये जाते हैं-
(1) रेखीय प्रतिरूप या रीबन प्रतिरुप:-
किसी सड़क या नदी या नहर के किनारे-2 बसे हुए मकानों की बस्तियाँ रेखीय ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप का निर्माण करती है। अगर गाँव से सड़क गुजर रहा हो तो ग्रामीण बस्ती के लोग अपने घर का द्वार सड़क या गली की ओर बनाते हैं। जबकि कोई नहर या नदी के किनारे रेखीय प्रतिरूप का विकास हुआ तो लोग अपने घर के दरवाजे जलाशय के विपरीत दिशा में बनाते हैं। अरबल जिला के अवगिल्ला गाँव नहर के किनारे विकसित हुआ है जो रेखीय प्रतिरूप का एक अच्छा उदाहरण है।
चित्र: रेखीय प्रतिरूप
⇒ गहमर UP और बिहार के सीमा पर भारत का सबसे बड़ा गाँव है।
(2) अरीय त्रिज्या प्रतिरूप:-
अरीय त्रिज्या प्रतिरूप के गाँवों में कई ओर से सड़क मार्ग गाँवों में आकर मिलते हैं।
चित्र: अरीय त्रिज्या प्रतिरूप
मुख्य सड़कें आपस में पतली-2 गलियों से जुड़े रहते है। मकान और घर गलियों एवं सड़कों के किनारे बने होते हैं। बिहार के मैदानी क्षेत्रों में ऐसा ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप के अनेक उदा० मिलते है।
(3) तारा प्रतिरूप:-
यह अरील त्रिज्या प्रतिरूप का विकसित स्वरूप है। जैसे:- अरीय प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती के लोग जब मुख्य सड़कों के किनारे घर बना लेते हैं तो तारा प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती का विकास होता है।
चित्र: तारा पतिरूप
तारा प्रतिरूप का उदाहरण कोशी नदी घाटी में अधिक देखने को मिलती है।
(4) वृताकार प्रतिरूप:-
जब किसी ग्रामीण बस्ती का विकास किसी तालाब या पुरानी हवेली या खण्डहर या धार्मिक स्थल या जमींनदार के घर के चारों ओर घर बन जाते हैं तो वृताकार प्रतिरूप का विकास होता है।
उदा० – लखिसराय के बेला गाँव
चित्र: वृताकार प्रतिरूप
(5) त्रिभुजाकार प्रतिरूप:-
सड़कों के त्रिमुहानी पर या नदियों के संगम पर त्रिभुजाकार प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती विकसित होते हैं। इसका उदाहरण गया, औरंगाबाद, नवादा, बांका जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में देखा जा सकता है।
चित्र: त्रिभुजाकार प्रतिरूप
(6) L प्रतिरूप:-
जब सड़के एक-दूसरे से समकोण पर मिलती है और वहाँ ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपना अधिवासीय घर केवल दो सड़क के किनारे बना लेते हैं तो L-आकार के प्रतिरूप का विकास होता है।
उदा०- बख्तियारपुर
चित्र:- L-प्रतिरूप
(7) अनाकार प्रतिरूप
ऐसे बस्तियों का निर्माण साधारणत: मार्गों के निर्माण के पूर्व होता है। ऐसे बस्तियों का कोई आकार नहीं होता है। बिहार में ऐसे अधिवासीप प्रतिरूप का उदा० सबसे ज्यादा मिलता है।
उपरोक्त प्रतिरूप के अलावे बिहार में कई अन्य प्रतिरूप के बस्ती मिलते हैं। जैसे- तीर प्रतिरुप, T-आकार के प्रतिरूप, अर्द्धवृताकार प्रतिरूप इत्यादि महत्वपूर्ण है। ग्रामीण बस्तियों के प्रतिरूप के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण प्रतिरूप के विकास में भौगोलिक कारकों का योगदान सबसे अधिक होता है।
Q.1 बिहार में जनजातियों की मुख्य समस्याओं एवं उसके निवारण की व्याख्या कीजिए।
Q.2 बिहार की आदिवासी जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं एवं उनके पिछड़ेपन के आधारभूत कारकों के बारे में लिखिए।
Q.3 बिहार की जनजातियों की समस्याओं एवं समाधान की व्याख्या कीजिए।
जनजाति प्राय: आदिवासी, वनवासी, सरल समाज, आदिम समाज, अनुसूचित जनजाति इत्यादि के नाम से जाने जाते हैं। यह एक ऐसा मानवीय समूह है जो दूर दराज के क्षेत्रों में एकांकी जीवन जीता है। वर्तमम बिहार में जनजातियों की कुल जनसंख्या मात्र 1 % है। बिहार के अधिकांश जनजातीय समाज नवगठित झारखण्ड राज्य में चले गये हैं।
वर्तमान बिहार में संथाल परगणा से आये हुए कुछ संथाली जनजाति के लोग सहरसा, पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर, मंगेर, कटिहार इत्यादि जिलों में निवास करते हैं। बिहार के तराई क्षेत्रों में थारू जनजाति के लोग निवास करते हैं। इसी तरह कैमूर क्षेत्र में खैरवार खैरवार जनजाति के लोग पाये जाते हैं। जनजाति की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित है:-
जनजातियों की विशेषताएँ
(1) मध्य भारत में मिलने वाले जनजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति के हैं जबकि हिमालय प्रदेश में निवास करने वाले जनजाति मंगोलायड प्रजाति के है।
(2) ये क्रमशः ऑस्ट्रिक भाषा और तिब्बती-चीनी भाषा का प्रयोग करते हैं।
(3) ये एकांकी जीवन जीते है। इनका निवास स्थान प्रायः घने जंगल, पर्वत, पहाड़, पठार और नदी घाटी क्षेत्र में देखने को मिलता है।
(4) इनका समाज टोटम के आधार पर गोत्र में विभक्त होता है।
(5) ये गोत्र बहिर्विवाही होते हैं। इनके समाज में वधू मूल्य की प्रथा पायी जाती है।
(6) धर्म के दृष्टिकोण से ये आत्मावादी, प्रकृतिवादी, जीववादी और बोंगावादी होते हैं। जादू-टोना में अधिक विश्वास करते हैं।
(7) इसमें विनिमय का कार्य वस्तु विनिमय और उत्सवी विनिमय के रूप में होता है।
(8) समाज में नातेदारी व्यवस्था की भूमिका अधिक होती है।
(9) इनका स्वतंत्र और विशिष्ट जनजातीय पहचान होती है। ये राज्यविहीन के उदाहरण है।
जनजातीय समस्याओं के कारण
स्वीकृत बिहार के जनजातीय समाज कई समस्याओं से ग्रसित है जिसके लिए कई कारण जिम्मेदार माने जाते हैं:-
(1) औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण
(2) जलवायु परिर्वतन
(3) सामाजिक सांस्कृतिक सम्पर्क
(4) कनीय कानून एवं नीतियाँ
(5) जनजातीय समाज में व्याप्त निरक्षरता
(6) आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था
(7) प्रशासनिक राजनीतिक एवं माफियाओं गठजोड़
(8) परम्परागत जनाजातीय संस्कृति
(9) गैर जनजातीय समाज के प्रति गलत नजरिया
उपरोक्त कारणों के चलते जनजातियों निम्मलिखित समस्याओं का अभ्युदय हुआ है-
(1) वातावरणीय समस्या
(2) सामाजिक समस्या
(3) सांस्कृतिक समस्या
(4) आर्थिक समस्या
(5) राजनैतिक समस्या
(6) जैविक समस्या
(7) मनोवैज्ञानिक समस्या
(1) वातावरणीय समस्या:-
जनजातीय समाज प्राय: कठोर एवं प्रतिकूल वातावरण में निवास करती है। ऐसे क्षेत्रों में पहुंच पाना आसान नहीं होता है जिसके कारण जनजातीय क्षेत्रों में परिवहन साधनों का विकास नहीं हो सका है। प्रति इकाई विकास की लागत अधिक आती है। विकास के लिए यहाँ उच्च तकनीक आवश्यकता पड़ती है, इसलिए यहाँ प्रति इकाई लाभ की प्राप्ति सीमित होती है। जनजातिय समाज वनों को काटकर झूम कृषि करते हैं। इसलिए उनके क्षेत्रों में वनीय ह्रास की समस्या उत्पन्न हुई है।
कृषि के लिए भूमिगत जल दोहन के कारण भूमिगत जल स्तर गिरता जा रहा है। औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण सतही जल प्रदूषण के शिकार है। वैश्विक तापन के कारण अनेक क्षेत्रों में भूमि तापन की समस्या उत्पन्न हो रही है। उनके क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक सम्पदा पाये जाते हैं जिसका राष्ट्रीय स्तर पर दोहन किये जाने के कारण भूमि अपरदन की समस्या और प्राकृतिक संपदा ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है। बड़े-बड़े उद्योग एवं बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना के कारण विस्थापन एवं पुनर्वास की गंभीर समस्याएं देखी जा सकती है।
(2) सामाजिक समस्याएँ:-
जनजातीय समाज आज कई समस्याओं से ग्रसित है। जैसे- इनमें संयुक्त परिवार की परम्परा टूट रही है। परिवार में बूढ़े एवं बुजुर्गो की सम्मान घट रही है। बधूमूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा प्रचलन प्रारंभ हो चुका है। मुण्डा, उराँव, हो, संथाल में जनसंख्या वृद्धि की दर काफी तीव्र है जबकि बंजारन समाज की समस्या ह्रास की ओर अग्रसर है। इनके समाज में मध्यपान से समस्या काफी गंभीर है। साक्षरता का स्तर काफी निम्न है। महिला साक्षरता 3% से भी कम है। इनके समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ भी स्थायी रूप से घर बना चुकी है। जिनमें वेश्यावृति की समस्या, भिश्वावृति की समस्या प्रमुरख है।
(3) सांस्कृतिक समस्याएँ:-
वेरियर एल्विन महोदय ने कहा था कि जनजातीय संस्कृति धीरे-2 विलुप्त होते जा रही है। इसका तात्पर्य है कि जनजातीय समाज अपने संस्कृति का परित्याग कर दूसरे की संस्कृति को अपनाने लगे हैं। इनके समाज में गैर जनजातीय धार्मिक संस्थान स्थायी रूप से निवास करते हुए धार्मान्तरण का कार्य करते हैं जिससे साम्प्रदायिक महौल का निर्माण हुआ है।
गैर जनजातीय समाज के कुछ लोग उनके क्षेत्र में जाकर नक्सलवाद की समस्या को जन्म दिया है। उनके समाज में धार्मिक एवं जादूई पम्परा की गहरी जड़े है। इसलिए ये ज्यादा अंधविश्वासी, जादूटोना, मुण्डाखेट जैसे परम्पराओं में विश्वास करते है। गैर जनजातीय भाषा को अपनाये जाने के कारण द्विभाषावाद की समस्या उत्पन्न हुई, जनजातीय नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, वास्तुकला इत्यादि की वास्तविक पहचान न किये जाने के कारण ये पतन की ओर है।
(4) आर्थिक समस्याएँ:-
भूमि हरण, ऋग्रस्ता, बन्धुआ मजदूरी इत्यादि की इनमें गंभीर समस्याएँ है। गैर-जनजातीय समाज की तरह इनके समाज में भी गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या मौजूद है। जनजातीय क्षेत्रों में चलने वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों में इनकी भागीदारी बहुत कम है। जनजातीय समाज के द्वारा उत्पन्न किये गये उत्पादों का सही तरीके से विपणन का कार्य नहीं होने के कारण उन्हें वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता है। गैर जनजातीय समाज उनके आर्थिक शोषण में लगा हुआ है। इसलिए गैर जनजातीय समाज को वे ‘दिकू’ से संबोधित करते हैं।
(5) राजनीतिक समस्याएँ:-
नवीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण परम्परागत जनजातीय परिषद, बुजुर्ग परिषद, युवा गृह इत्यादि विलुप्त होते जा रहे हैं और उसके स्थान पर जटिल राजनीतिक व्यवस्था की जड़े गहरी होती जा रही है। जटिल राजनीतिक व्यवस्था उनके समझ से परे हैं। न्यायपालिका उन्हें न्याय देने में सक्षम नहीं हो पाती है। प्रशासनिक तंत्र में लगे हुए लोग उनके रक्षक कम भक्षक ज्यादा है। उनके समाजों में भी क्षेत्रवाद, नये राज्य, आरक्षण जैसे राजनीतिक मुद्दों को लेकर अक्सर आंदोलित होते रहते हैं।
(6) जैविक समस्याएँ:-
जनजातीय समाज मे कुपोषण एवं प्रोटीन अल्पता की गंभीर समस्याएँ हैं। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के प्रति ज्ञानाभाव के कारण उनमें कई गंभीर संक्रामक बीमारियाँ, सफाई, पेयजल इत्यादि से संबंधित समस्याएँ पायी जाती हैं। वनों से खाद्य- पदार्थों के संग्रहण एवं शिकार पर रोक, झूम कृषि पर रोक, परम्परागत तकनीक इत्यादि के कारण खाद्यान्न संकट की समस्या उत्पन्न हुई है। बाल मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर काफी उच्च है।
(7) मनोवैज्ञानिक समस्याएँ:-
जनजातीय समाज जहाँ उपरोक्त समस्याओं से पीड़ित है वहीं गैर जनजातीय समाज के द्वारा किये जा रहे विकास को देखकर वह भौंचक है। उनमें गंभीर अवसाद (Depression) की समस्या देखी जा सकती है। इसी अवसाद का परिणाम है कि वे अन्य समाजों को शक की दृष्टि से देखते है।
जनजातीय समस्याओं का निवारण
जनजातीय समस्यायों के निवारण हेतु प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही सतत प्रयास किये जाते रहे हैं। जैसे:- 1954 ई० में जनजातीय विकास प्रखण्ड का गठन किया गया था जिसका उद्देश्य था- जनजातीय प्रदेश के विकास को और तीव्र करन।
चौथी पंचवर्षीय योजना में जनजातीय उपयोजना चलाया गया जिसका उद्देश्य निम्नलिखित है:- (1) पारिवारिक लाभ की योजना को प्रारंभ कर लोगों को निर्धनता रेखा के ऊपर उठाना। इस उद्देश्य के आपूर्ति हेतु कुकुट पालन (मुर्गा, बतख), सुअर पालन, पशुपालन, सब्जी एवं फल कृषि, कुटीर उद्योग, उद्योग के लिए ब्याज मुक्त ऋण की व्यवस्या और उसपर भी 80% सब्सीडी दी गयी।
(2) उनके आर्थिक-सामाजिक वातावरणीय परिस्थितियों में सुधार लाना। उनकी भूमि की वापसी, साहुकारों के ऋण जनजाल से बचाना, प्रदूषित देशी शराब के सेवन पर प्रतिबंध और वन संरक्षण ये संबंधित कार्यक्रम चलाये गये।
(3) प्राथमिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, महिला साक्षरता इत्यादि को बढ़ावा देकर जनजातीय क्षेत्रों में मानवीय संसाधनों का विकास करना।
(4) वैसे जनजातीय समाज जो जनसंख्या ह्रास की समस्या से ग्रसित है उन्हें संरक्षण प्रदान करना।
पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान जनजातीय समाज को जनजातीय प्रादेशिक योजना के तहत शामिल किया गया। छठी पंचवर्षीय योजना में ‘मारजिनल एरिया डेवलपमेन्ट एजेन्सी’ की स्थापना की गई। साथ समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) का अंग बनाया गया।
सातवी पंचवर्षीय योजना के दौरान जवाहर रोजगार योजना, इंदिरा आवास योजना के माध्यम से उन्हें लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया।
जनजातीय प्रदेशों में कई कल्याणकारी कार्यक्रम भी चलाये जा रहे हैं। साक्षरता विकास के लिए संथाल परगणा में विशेष कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जनजातीय बाजारों की स्थापना की जा रही है। स्कूल एवं कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृति प्रदान की जाती है। रोजगार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई है। जनजातीय समस्याओं पर अनुसंधान करने के लिए राँची में जनजातीय अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की गई है।
गैर सरकारी प्रयास भी किये जा रहे हैं। जैसे ‘टाटा ग्रुप’ और ‘सेल’ जैसे संस्थाओं ने शिक्षा, रोजगार एवं खेलकूद को बढ़ावा दे रहा है। कई NGO एवं धार्मिक मिशनरियों इनके क्षेत्रों में आकर शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रही है।
निष्कर्ष
इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि जनजातीय समाज जहाँ कई समस्याओं से पीड़ित है वहीं उन समस्याओं पर कार्यक्रम चलाकर चतुर्दिक प्रहार किया जा रहा है ताकि उन्हें समस्याओं से मुक्त किया जा सके।