28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना



        मानव समाज के स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन का अध्ययन आर्थिक एवं सामाजिक भूगोल में अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु है। पृथ्वी सतह पर या उसके साथ विभिन्न मानव समाजों की होने वाली अन्तर्क्रिया ही स्थानिक व्यवस्था का आधार है। स्थानिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य इस स्थानिक व्यवस्था की संरचना और क्रियाविधि का परीक्षण करते हुए मानवीय गतिविधियों के स्थानिक प्रारूपों एवं प्रक्रियाओं को पहचानना है।

         मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थानिक प्रारूपों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है, यथा:

(i) अवस्थिति- जो पृथ्वी सतह पर बिन्दु के रूप में है।

(ii) अन्तर्क्रिया- जो संचरण की रेखाएँ हैं जिनके सहारे माल, मनुष्य, विचारों और सेवाओं का वहन होता है।

(iii) प्रदेश- जो पृथ्वी सतह के समरूपी विशेषता वाले स्वरूपी या कर्मोपलक्षी क्षेत्र हैं।

      इन प्रारूपों को जन्म देने वाली स्थानिक प्रक्रियाएँ बड़ी जटिल हैं जिन्हें स्थानिक अन्तर्क्रिया द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन स्थानिक अन्तर्क्रियाओं में माल और सेवाओं का प्रवाह, प्रवसन, अल्पकालीन संचरण (जैसे- खरीददारी, वासस्थल से कार्यस्थल तक की यात्रा), सामाजिक संचरण, सूचनाओं का प्रसरण, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

      इन प्रक्रियाओं के स्पष्टीकरण में मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषकर इस बात पर कि मानव व्यवहार उन माध्यमों से कैसे प्रभावित होता है। जिन माध्यमों से उसने अपने स्थान का अवबोध या प्रत्यक्षीकरण किया है। इस प्रकार के प्रारूप एवं प्रक्रियाएँ स्थानिक पर्यावरण में उत्पन्न होते हैं, जो बढ़ती दूरी के साथ घटते प्रभाव के कारण स्थानिक अन्तर्क्रिया को बाधित या नियंत्रित करते हैं, लेकिन जिस स्थान में मानव अपनी गतिविधियों को संचालित करता है, वह स्थान सापेक्षिक है, क्योंकि यह स्थान दूरियों पर आधारित है और दूरी सापेक्षिक होती है तथा निरन्तर परिवर्तनशील है।

        स्थानिक संगठन एक जटिल प्रक्रिया है। मानव प्रतिदिन अपने आवास स्थल से अपने कार्यस्थल को जाता है। यह कार्यस्थल खेत हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, कोई कारखाना या शिक्षण संस्थान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि हो सकता है। इस संचरण (Movement) के फलस्वरूप मार्गों का निर्माण होता है। इस प्रकार, मनुष्य के आवास एवं कार्यस्थल में पारस्परिक रूप से कर्मोपलक्षी अन्तर्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कृषि कार्य का क्षैतिज प्रसार अधिक होता है अतः ग्रामीण क्षेत्रों का स्थानिक संगठन ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित होता है। उद्योग या व्यापार केन्द्राधारित (Nodal) होते हैं। इन केन्द्रों पर मनुष्य का गमनागमन एक भिन्न प्रतिरूप को जन्म देता है। मार्ग संगम बिन्दुओं पर केन्द्रस्थलों (Central Places) की स्थापना होती है।

           केन्द्रस्थल तृतीयक क्रियाकलापों के केन्द्र होते हैं तथा भूवैन्यासिक संगठन में इनकी प्रमुख भूमिका होती है। गमनागमन के मार्ग पगडंडी, कच्ची सड़क, पक्की सड़क, राज्य मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, आदि स्तरों के होते हैं। इनके संगम बिन्दुओं पर स्थापित केन्द्र स्थल भी अपने कर्मोपलक्षी रूप में छोटे एवं बड़े होते हैं। इसे केन्द्र स्थलों का पदानुक्रम (Hierarchy) कहते हैं। यह स्थानिक संगठन की संरचना का आधार होता है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार किसी केन्द्र स्थल पर आता-जाता है। इसे उपभोक्ता व्यवहार कहते हैं।

           उपभोक्ता किसी केन्द्र स्थल के चयन का निर्णय मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से करता है। इसके साथ ही निवास या कार्यस्थल से केन्द्र स्थल की दूरी का प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार एवं गमनागमन प्रतिरूप पर पड़ता है। यह सार्वभौमिक प्रवृत्ति होती है कि मानव न्यूनतम श्रम (लागत) से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहता है। साथ ही बढ़ती दूरी के अनुरूप ही केन्द्र स्थलों का प्रभाव घटता भी जाता है। इस प्रकार स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन के मूल तत्व कार्यस्थल, गमनागमन, परिवहन मार्ग, अन्तर्सम्बन्ध, केन्द्र स्थल, पदानुक्रम, दूरी क्षय, आदि हैं।

     स्थानिक संगठन की संरचना गमनागमन की बारम्बारता, केन्द्र स्थल के पदानुक्रमीय वर्ग एवं इनके बीच होने वाली अन्योन्याश्रित प्रक्रिया से सम्बन्धित है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र स्थल कर्मोपलक्षी रूप से छोटे एवं बड़े होते हैं। केन्द्र स्थलों का पदानुक्रमीय महत्व गमनागमन प्रतिरूप एवं बारम्बारता को प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रत्येक केन्द्र स्थल के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है। केन्द्र स्थल सिद्धान्त के अनुसार ये कर्मोपलक्षी प्रदेश षटकोणीय होते हैं तथा न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ के सिद्धान्त का अनुपालन करते हैं। किसी भी क्षेत्र का स्थानिक संगठन वहाँ की भूमि के मूल्य से प्रभावित होता है।

      स्थानिक संगठन की प्रथम अवस्था में कोई गाँव या नगर दूरी पर स्थित होता है। धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने से उसका प्रमुख कार्यक्षेत्र नगर के मध्य में स्थित होता है तथा जनसंख्या का बहाव बाहर की तरफ बढ़ता जाता है। इससे संलग्न ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का उपयोग नगरीय कार्यों में होने लगता है, अतः इसका मूल्य बढ़ने लगता है। मानव अपनी बुद्धि चातुर्य के द्वारा परिवहन और संचार साधनों का विकास कर स्थानिक पर्यावरण को विशिष्टता प्रदान करता है।

        परिवहन और संचार साधनों के विकास द्वारा पृथ्वी सतह पर माल, सेवाओं, मनुष्यों और सूचनाओं के वहन में वृद्धि हुई है। समय और लागत दूरी को कम करके आपूर्ति एवं माँग के क्षेत्रों को समीप लाकर आर्थिक स्थानों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार दूरसंचार और शिक्षा द्वारा स्थान के सम्बन्ध में किए गए अवबोधों में विद्यमान अन्तरों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

     इस प्रकार भूवैन्यासिक संगठन के संकल्पना सूत्र से भौगोलिक चिन्तन को न केवल सुनिश्चित दिशा मिली वरन् भौगोलिक अध्ययन मात्र वर्णनात्मक न रहकर प्रक्रिया विश्लेषण, सामान्यीकरण तथा सिद्धान्त प्रतिपादन के सोपानों से बढ़ता हुआ भविष्य के प्रक्षेपण (Projection) तथा पुनर्गठन के स्तर तक पहुँच गया। सभी गुण किसी विषय के सही अर्थ में वैज्ञानिक होने के दावे को स्थापित करते हैं। स्वाभाविक है कि इस स्तर तक पहुँचने में परम्परागत मानचित्र विवेचन के साथ-साथ सशक्त सांख्यिकीय विश्लेषण एवं प्रक्रियात्मक विवेचन की विधि बड़े पैमाने पर अपनाई गई। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय आयामयुक्त व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण तथा समन्वित क्षेत्रीय विकास में अन्य विशेषज्ञों के साथ हाथ बंटाने में अधिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हुए।

प्रश्न प्रारूप

1. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना का संक्षिप्त में विवरण दीजिए।


27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।

27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।



     अमेरीका में स्कूल व कॉलेजों में भूगोल का अध्ययन मध्य उन्नीसवीं सदी में यूरोपियनों द्वारा प्रारम्भ किया गया। हार्वर्ड , डार्टमाउथ, याले, मेरी, कोलम्बिया, प्रिन्स्टन व पेंसिलवेनिया आदि विश्व विद्यालयों में गणितीय भौतिक व ऐतिहासिक भूगोल की शिक्षा वैसे 1795 से दी जाने लगी थी। आरनोल्ड गुयोट (Arnold Guyot) अमेरीका में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था।

     अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):-

        मानव भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान है। अमेरीका में सैम्पुल (E. C. Semple), हंटिंगटन (E. Huntington), बोमैन (I. Bowman), ग्रिफिथ टेलर (G. Tailor) जैसे दिग्गज मानव भूगोलवेत्ता हुए हैं। इन्होंने मानव भूगोल की परिभाषा दी व उसका विषय-क्षेत्र निर्धारित किया।

        सैम्पुल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक Influence of Geographical Environment सन् 1911 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वातावरण निश्चयवाद का कट्टर समर्थन करती थी। पुस्तक का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है:-

“मनुष्य का जन्म पृथ्वी से हुआ है और वह पृथ्वी का शिशु मात्र ही नहीं है, अर्थात् वह पृथ्वी की धूल का एक पुतला मात्र ही नहीं है वरन् पृथ्वी उसकी माता है, जिसने उसे मातृत्व दिया है, उसका लालन-पालन किया है, उसको भोजन दिया है, उसके कार्यों को नियत किया है, उसके विचारों को निर्देशित किया है, उसके सामने कठिनाइयाँ प्रस्तुत की हैं, जिससे उसका शरीर सुदृढ़ हुआ है तथा उसकी बुद्धि कुशाग्र हुई है।”

      हटिंगटन की प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Human Geography है। पुस्तक में हंटिंगटन ने मानव भूगोल की परिभाषा व विषय क्षेत्र निर्धारित करने का प्रयास किया है। साथ ही मानव भूगोल के अन्य पक्षों का भी वर्णन किया है। हंटिंगटन वातावरण निश्चयवाद के समर्थक थे।

   ग्रिफिथ टेलर को मानव भूगोल के क्षेत्र में नव-निश्चयवाद (Neo-Determinism) का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीसवीं सदी में भूगोल’ (Geography in the Twentieth Century) है।

(ii) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

        भौतिक भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ता डेविस (William Morris Davis) का नाम प्रसिद्ध है। डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना (Concept of Cycle of Erosion) का प्रतिपादन किया। यह संकल्पना काफी समय तक आदर्श मानी जाती रही। परन्तु पेंक ने इसकी भारी आलोचना की। फिर भी इस संकल्पना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। रोलिन सैलिसबरी, वेलेस स्टाउड भी उच्चकोटि के भौतिक भूगोलवेत्ता थे।

(iii) जलवायु विज्ञान (Climatology):-

      अमेरीका में जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख कार्य जलवायु के वर्गीकरण व जलवायु प्रदेशों के मानचित्र तैयार करने से सम्बन्धित रहा है। थार्नथ्वेट ने 1918 में कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु विभाजन की आलोचना की तथा नवीन जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में नए वैज्ञानिक यंत्रों से मदद ली गई।

(iv) स्थानीयकरण सिद्धान्त (Locational Theories):-

       कई अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने स्थानीयकरण सिद्धान्तों में योगदान किया है। सर्वप्रथम 1909 में व्हाइटवेक ने एक शोध पत्र के माध्यम बताया था कि चीनी मिट्टी बर्तनों के उद्योग के लिए मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता आवश्यक नहीं। वाल्डर टावर ने 1911 में औद्योगिक स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना की । हूवर ने वेबर के सिद्धान्त में संशोधन किया।

(v) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

          राजनीतिक भूगोल में भी अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रुचि प्रदर्शित की। स्कूलों व कॉलेजों में इसे स्थान दिया गया। जार्ज क्रेसी, प्रेस्टन ई. जेम्स, राबर्ट एस. प्लाट व ईसा बोमैन प्रमुख राजनीतिक भूगोलवेत्ता थे।

         ईसा बोमैन की पुस्तक The New World में विभिन्न देशों के आपसी राजनीतिक सम्बन्धों की चर्चा थी। डी. व्हिटलसी ने एक पुस्तक The Earth and State प्रकाशित कराई। वाल्केनबर्ग की पुस्तक Elements of Political Geography में राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र की व्याख्या की गई थी।

(vi) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

      कृषि भूगोल के क्षेत्र में अमेरीका में विशेष कार्य हुआ है। इस दिशा में सर्वप्रथम बरनर सी. फिंच और ओ. ई. वेकर ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1917 में इन्होंने ‘संसार का कृषि भूगोल’ एटलस प्रकाशित की। वेकर ने 1921 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि उत्पादन के अन्तर पर भौतिक कारकों के प्रभाव का महत्व’ लेख प्रकाशित किया।

1936 में व्हिटलसी ने संसार को कृषि प्रदेशों में विभक्त किया। कृषि व डेरी उद्योग से सम्बन्धित अनेक शोध कार्य किए गए।

(vii) नगरीय-भूगोल (Urban Geography):–

      मार्क जैफरसन (Mark Jafferson) प्रथम अमेरीकी-भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने नगरों की स्थिति (Location) व जनसंख्या पर कार्य किया। उनकी “प्रधान नगर नियम’ संकल्पना” (Law of Primate City, 1939) ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया। सी. डी. हैरिस तथा उल्मान ने अमरीकी नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण किया।

प्रश्न प्रारूप

1. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।


26. ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश 

26. ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश


ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश 

            उन्नीसवीं सदी के मध्य तक ब्रिटेन में भूगोल की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। काफी समय बाद स्कूलों व कालेजों में भूगोल का अध्ययन प्रारम्भ किया गया। इस अध्यापन में छात्रों को पर्वतों, नदियों, शहरों आदि के नामों की सूची ही रटायी जाती थी। उन्नीसवीं सदी के अन्त में ब्रिटेन में भूगोल का अध्यापन विश्वविद्यालय स्तर पर प्रारम्भ किया गया। तब से अब तक ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने भी भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया है। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में विशेष योगदान किया है, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

(i) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

         हेफोर्ड मेकिण्डर (Halford Mackinder) सर्वप्रमुख ब्रिटिश राजनीतिक भूगोलवेत्ता था। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’, लन्दन के समक्ष एक पत्र पढ़ा। यह ‘हृदय स्थल सिद्धान्त’ (Heart Land Theory) था। सिद्धान्त इस प्रकार था:

“जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, हृदय स्थल को नियन्त्रित करता है, जो हृदय स्थल पर शासन करता है, विश्वद्वीप को नियन्त्रित करता है, जो विश्वद्वीप पर शासन करता है, विश्व को नियन्त्रित करता है।”

          रिचर्ड हार्टशोन के अनुसार मेकिण्डर का यह सिद्धान्त, संसार की शक्ति का विश्लेषण था, जो वर्तमान में मानव की राजनीतिक शक्तियों के मूल्यांकन का सबसे बड़ा योगदान हो गया है।

 

ब्रिटिश भौगोलिक

हेफोर्ड मेकिण्डर

(ii) आर्थिक भूगोल (Economic Geography):-

          दोनों महायुद्धों के मध्य ब्रिटेन में आर्थिक भूगोल पर विशेष ध्यान दिया गया था। इसमें प्राकृतिक तथ्यों के संसाधनों व आर्थिक क्रियाओं पर प्रभाव का अध्ययन किया गया। 1949 में स्मिथ (W. Smith) ने ब्रिटेन का ‘आर्थिक भूगोल’ (Economic Geography) लिखा। चिशोम (Chisholm) ने ‘वाणिज्य भूगोल’ (Hand book of Commercial Geography) नामक पुस्तक लिखी। 1930 में स्टाम्प (L. D. Stamp) ने ब्रिटेन के भूमि उपयोग मानचित्र पर कार्य प्रारम्भ किया।

          हरबर्टसन ने 1905 में विश्व के प्रादेशिक व आर्थिक भूगोल के लिये आधार तैयार किया। उसने विश्व को पन्द्रह प्राकृतिक भागों में बांटा था।

(iii) मानव-प्रकृति अन्तर्क्रिया (Man-Nature Interaction):-

           उन्नीसवीं सदी के अन्त से प्रथम विश्वयुद्ध तक ब्रिटेन में मानव व प्रकृति के सम्बन्धों का अध्ययन मुख्य रूप से किया गया। उस समय ब्रिटेन में भूगोल का अर्थ केवल धरातल व मानव पर उसके प्रभावों के वर्णनों तक ही सीमित था। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने विश्व को प्राकृतिक प्रदेशों में बांटा तथा बताया कि प्रत्येक प्रदेश में मानव किस प्रकार वातावरण से प्रभावित होकर कार्य करता है। फोर्डे (Forde) ने मानव के जीवन व कार्यों पर वातावरण का प्रभाव प्रदर्शित करने के लिये एक पुस्तक Habitat, Economy and Society प्रकाशित की।

(iv) ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography):-

         प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में ऐतिहासिक भूगोल पर अच्छा कार्य हुआ है। मेकिण्डर ने ब्रिटेन में ऐतिहासिक भूगोल के लिये आधार तैयार किया। उसका मत था कि भूगोलवेत्ताओं को वर्तमान के साथ-साथ अतीत की भौगोलिक विशेषताओं का भी अध्ययन करना चाहिये, अन्यथा भूगोल समकालीन घटनाओं का वर्णन मात्र रह जायेगा। ऐतिहासिक भूगोल में जिन ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया, वे हैं—न्यूबेगिन (M. I. Newbegin), टेलर (E. G. R. Taylor), गिलबर्ट (E. W. Gilbert) व डार्बी (H. C. Darby)।

(v) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

           बीसवीं सदी के आगमन के साथ ही ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने कृषि भूगोल में रुचि लेनी प्रारम्भ कर दी थी । शोध कार्य प्रारम्भ कर दिये थे। परन्तु भूमि उपयोग सर्वेक्षण का कार्य 1920-30 के बाद प्रारम्भ किया गया। 1920 में स्टाम्प (L. D. Stamp) ने ब्रिटेन के भूमि उपयोग मानचित्र तैयार किये। स्टाम्प ने एक पुस्तक ‘ब्रिटेन की भूमि, इसका उपयोग व दुरुपयोग’ (The land of Britain, Its Use and Misuse) भी लिखी।

(vi) मात्रात्मक क्रान्ति (Quantitative Revolution):-

        पिछले 40-50 वर्षों में ब्रिटेन में मात्रात्मक क्षेत्र में, भूगोल को स्थापित किया गया है। हैगेट (Peter Haggett) तथा चोर्ले (Richard Chorley) ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। हैगेट ने सांख्यिकी विधियों का उपयोग, मानव व सामाजिक भूगोल (Human and Social Geography) के क्षेत्र में, मॉडल (Models) बनाने में किया। मात्रात्मक क्रान्ति यद्यपि अमेरिका से प्रारम्भ हुई, परन्तु ब्रिटेन में फैलते भी इसे देर न लगी। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने अपना ध्यान इस ओर केन्द्रित किया और मॉडलों व सांख्यिकी की सहायता से अध्ययन प्रारम्भ किया। ‘मानव भूगोल में मॉडल’ (Models is Human Geography), मानव भूगोल में ‘स्थानीकरण विश्लेषण’ (Locational Analysis in Human Geography) व ‘भौगोलिक शिक्षण की सीमाएं’ (Frontiers in Geographical Teachings) ऐसी ही कृतियां हैं।

       आज ब्रिटेन में ‘यथार्थवाद’ (Positivism or Realism) पर भी कार्य किया जा रहा है। इसमें उन पर जोर दिया जाता है जिनके सम्बन्ध में सही-सही निर्णय नहीं लिया जा सकता जैसे- मानव की व्यावहारिक समस्याओं (Practical ) पर ध्यान दिया जाता है। हंटिंगटन ने मानव भूगोल के तथ्यों को 5 तथा मानवीय आवश्यकताओं को 4 कोटियों में रखा है:

मानव भूगोल के तथ्य-

(i) पृथ्वी एक ग्लोब के रूप में,

(ii) भौम्याकार,

(iii) जलाशय,

(iv) मिट्टियां तथा खजिन पदार्थ,

(v) जलवायु।

मानवीय आवश्यकतायें-

(i) भौतिक आवश्यकताएं,

(ii) मुख्य व्यवसाय,

(iii) चातुर्थ और

(iv) उच्च आवश्यकताएं।

हटिंगटन के अनुसार-

(i) आबादी के घनत्व,

(ii) धन-धान्य तथा स्थिति,

(iii) एकाकीपन की मात्रा,

(iv) मानव झुकाव, साधन तथा उद्योग सम्बन्धी भिन्नता एवं

(v) स्फूर्ति की मात्रा पर भौगोलिक प्रभावों को स्पष्ट किया है।

          हटिंगटन ने आर्थिक तथा सामाजिक भूगोल पर भी कार्य किया है। वास्तव में भूगोल के क्षेत्र में इनका महान योगदान है। इनके भौगोलिक विचारधारा उसके सहयोगियों तथा मानव भूगोलवेत्ताओं के लिए प्रेरणा-स्रोत सिद्ध हुई है।


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25. हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

25. हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन


हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

हम्बोल्ट एवं रिटर

                     यद्यपि हम्बोल्ट तथा रिटर के विचारों में आधारभूत समानता (Similarity) थी, फिर भी दोनों के प्राकृतिक दर्शन (Philosophy of nature) में भिन्नता थी।

(1) हम्बोल्ट प्रकृति की एकता (Unity) में विश्वास करता था तथा वह कार्य-कारण के सम्बन्ध (Inherent causality) में भी विश्वास करता था।

       हम्बोल्ट ने स्वयं लिखा है कि मैंने पृथ्वी पर प्राकृतिक भू-दृश्यों को क्रमबद्ध करके प्रदेशों की सीमायें निर्धारित करने में ऐसा प्रयत्न किया है कि उन प्रदेशों के द्वारा कारण सम्बन्धों (Causal connecions) का स्पष्टीकरण हो जाता है। रिटर ने भी कारण-सम्बन्धों को तुलनात्मक विधि से निश्चित किया था। हम्बोल्ट के मतानुसार, प्रकृति के विभिन्न भू-दृश्यों के वर्गों (Groups of phenomena) में हमको आनुभविक नियमों (Empirical laws) को समझना चाहिये। परन्तु समस्त प्राकृतिक अध्ययन का सबसे ऊंचा लक्ष्य कारण-सम्बन्धों को खोजना होता है।

(2) परन्तु हम्बोल्ट के एकता तथ कारणत्व (causality) के विचार रिटर के विचारों से इस प्रकार भिन्न हैं कि रिटर के अध्ययन में मानव को केन्द्रीय स्थान (Anthropocentric attitude) देकर प्रकृति का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त रिटर में ईश्वरीय उद्देश्यवाद के विचारों (Teleological views) की प्रधानता थी। इस प्रकार हम्बोल्ट और रिटर में दार्शनिकता का भेद था। रिटर का दर्शन आदर्शवादी दार्शनिकों (Idealist philosophers) से मेल खाता था। परन्तु हम्बोल्ट की दार्शनिकता नितान्त आदर्शवादी नहीं थी।

(3) हम्बोल्ट तथा रिटर के कार्य-क्षेत्रों में भिन्नता थी। उनके अध्ययन के दृष्टिकोण अलग-अलग थे। हम्बोल्ट क्रमबद्ध अध्ययन को प्रधानता देता था, जबकि रिटर प्रादेशिक अध्ययन (Landerkunde) को प्रधानता देता था।

(4) समानता-

          रिटर ने अपने भाषणों में बतलाया था, कि प्रादेशिक अध्ययन (Landerkunde) में क्रमबद्ध अध्ययन का महत्व था, और उसने भूगोल की जो ग्रन्थमाला अर्डकुण्डे के नाम से प्रकाशित की थी उसका अन्तिम ग्रन्थ क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) था।

         हम्बोल्ट ने भी प्रादेशिक अध्ययन पर कुछ लेख प्रकाशित किये थे। परन्तु हम्बोल्ट ने प्रादेशिक भूगोल के विषय को अधिक विकसित नहीं किया, क्योंकि उसका लक्ष्य प्रादेशिक भूगोल नहीं था और उसने भौगोलिक ग्रन्थों में उसको कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया था।

(5) पूरकता- 

           इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रिटर और हम्बोल्ट दोनों का कार्य एक-दूसरे का पूरक (Complementary) था। हम्बोल्ट ने क्रमबद्ध भूगोल के अध्ययन की विधि बतलाई और उसका स्वरूप भी निश्चित किया था। उदाहरण के लिए, उसने जलवायु विज्ञान (Climatology) तथा वनस्पति भूगोल (Plant geography) पर ग्रन्थ लिखे थे। रिटर ने प्रादेशिक व्यक्तित्व (Regional individuality) के अध्ययन को अपने ग्रन्थ अर्डकुण्डे का आधार बनाया हुआ था, जिसके द्वारा प्रत्येक क्षेत्र के समस्त भौगोलिक तत्वों के विवेचन से उस क्षेत्र की पूर्णता (Totality) का वर्णन किया जाता था, अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र को एक सम्पूर्ण इकाई (Individual whole) के रूप में अध्ययन और वर्णित किया गया था। अतः उन दोनों ने मिलकर वर्तमान भूगोल (Modern geography) के कार्य को पूरा किया था।

          रिटर ने यूनिवर्सिटी में अध्यापन का कार्य किया था और विधितन्त्र (Methodology) पर बहुत से पत्र प्रकाशित किये थे। इसलिए आगे आने वाली पीढ़ियों पर हम्बोल्ट की अपेक्षा रिटर का अधिक प्रभाव पड़ा, क्योंकि हम्बोल्ट के लेख बहुत सी पत्रिकाओं में इधर-उधर बिखरे हुए थे और भूगोलवेत्ताओं को उनकी जानकारी अपेक्षाकृत कम थी।

         हम्बोल्ट और रिटर दोनों की मृत्यु 1859 में हुई थी। उसी वर्ष डार्विन (Darwin) का विकासवाद का सिद्धान्त, उसके द्वारा लिखी हुई पुस्तक ‘जीवधारियों के जातिवर्गों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) में प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार उनकी मृत्यु से भौगोलिक विकास के एक युग का अन्त हो गया था, और वैज्ञानिक तथा दार्शनिक विचारधारा में एक नये आन्दोलन का आरम्भ हो गया था।

       19वीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर मध्य तक की अर्द्धशताब्दी में आदर्शवाद ( Idealism) का बोलबाला रहा था। विज्ञान में ‘पदार्थवाद’ ने प्राकृतिक नियम (Natural law) और कारणत्व (Causality) पर विशेष बल दिया था। लगभग 10 वर्षों बाद पदार्थवाद का प्रभाव भौगोलिक विचारधारा पर भी होने लगा।

उष्मा बजट


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24. भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

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भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

भूगोल को परिभाषित

          भूगोल के लिए प्रयुक्त होने वाला अंग्रेजी शब्द ‘Geography’ यूनानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। Geo = पृथ्वी एवं (Graphy) वर्णन, जिसका अर्थ ‘पृथ्वी का वर्णन’ है। इस प्रकार भूगोल अर्थात ज्योग्रॉफी का सामान्य अर्थ है- पृथ्वी का वर्णन करना।

            भूगोल की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता का इतिहास तथा उतना ही नवीन है जितना कि दैनिक समाचार-पत्र। मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के साथ- साथ भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में भी विकास होता गया है। संक्षेप में कहा जा सकता “भूगोल पृथ्वी तल और उसके निवासियों का विज्ञान है।” (Geography is the Science of the earth’s surface and its inhabitants.) विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात के वर्षों में भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में आवश्यक विस्तार वैज्ञानीकरण और परिवर्तन तीव्र गति से हुआ है।

             विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई भूगोल की परिभाषायें निम्न प्रकार हैं-

1. शब्दकोष द्वारा परिभाषा- भूगोल पृथ्वी तल और पृथ्वी पर रहने वाले निवासियों का विज्ञान है।

2. मोंकहाउस द्वारा परिभाषा- भूगोल पृथ्वी तल का, उसकी क्षेत्रीय भिन्नता के साथ, मानवीय निवास के रूप में अध्ययन है।

3. हार्टशोर्न द्वारा परिभाषा- भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी के एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवर्तनशील स्वरूपों का वर्णन और उनकी व्याख्या ‘मानव के संसार’ के रूप में करता है। यह पृथ्वी तल के घटना दृश्यों के विविध परिवर्ती वितरणों और जटिल अंतर्संबंधों का विश्लेषण करता है और पृथ्वी तल के परिवर्ती स्वरूप की व्याख्या करके उसका शुद्ध क्रमबद्ध और परिमेय वर्णन करता है।

4. रिचथोफेन (Richthofen)- रिचथोफेन के मतानुसार भूगोल में पृथ्वी तल के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन उनकी समस्त विशेषताओं के अनुसार किया जाता है।

5. हेटनर (Hettner)- भूगोल क्षेत्रीय विज्ञान है जिसमें पृथ्वी तल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा स्थानिक संबंधों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।

6. हैगेट (Haggett)- भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वीतल पर मानव वातावरण के पारिस्थितिक तंत्र और प्रदेशों के स्थानिक तंत्र की संरचनाओं तथा पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन करता है।

7. हेरमेन- भूगोल विज्ञान में पृथ्वी के थल का अध्ययन उपत्यक (Genetic), कारणात्मक (Causal) और कार्यात्मक (Functional) दृष्टिकोणों से किया जाता है।

8. डूडले स्टाम्प (Dudley Stamp)- इनकी परिभाषा को तीन प्रकार से लिखा गया है:
(i) भूगोल में संसार का और उसके निवासियों का वर्णन होता है।

(ii) भूगोल में पृथ्वी का तथा मानव परिस्थितिकी का विज्ञान है।

(iii) भूगोल में पृथ्वीतल का वर्णन, क्षेत्रों की भिन्नताओं और सम्बन्धों के प्रसंग में किया जाता है।

9. काण्ट- भूगोल वह विज्ञान है जिसमें पृथ्वी के उस भाग का अध्ययन किया जाता है जो कि मानव का घर है। काण्ट भूगोल तथा खगोलकी को दो भिन्न विज्ञान मानते थे।

10. रिटर (Ritter)- भूगोल में पृथ्वी तल का अध्ययन किया जाता है जो कि मानव का निवास गृह है।

11. वूल्डरिज तथा ईस्ट द्वारा परिभाषा (Wooldridge and East)- भूगोल में भू-क्षेत्र तथा मानव का अध्ययन होता है। इन विद्वानों ने अपनी परिभाषा में तीन बातों को प्रधानता दी है-

(i) पृथ्वीतल (Earth’s Surface) का वैज्ञानिक अध्ययन,

(ii) पृथ्वीतल की विभिन्नताओं के आधार पर पृथ्वी के विभिन्न प्राकृतिक भाग जिनमें मानवीय क्रियाओं की विभिन्नताएं भी सम्मिलित रहती हैं और

(iii) तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध।

12. वर्तमान जर्मन भूगोलवेत्ता- वर्तमान जर्मन भूगोलवेत्ताओं के अनुसार, भूगेल वह विज्ञान है, जिसमें पृथ्वी के विभिन्न प्रदेशों ‘लैण्डशाफ्ट’ का अध्ययन होता है। इस प्रसंग में यह बात भली-भाँति समझ लेने की है कि जर्मन भाषा के शब्द ‘लैण्डशाफ्ट’ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘लैण्डस्केप’ से नहीं किया जा सकता है। अंग्रेजी शब्द ‘लैण्डस्केप’ का अर्थ हिन्दी भाषा में ‘दृश्यभूमि’ होता है, जिसमें प्राकृतिक दृश्यभूमि तथा सांस्कृतिक दृश्यभूमि दोनों ही समाविष्ट होते हैं।

           जबकि जर्मन शब्द ‘लैण्डशाफ्ट का प्रयोग दृश्यभूमि तथा प्रदेश दोनों अर्थों का वाचक है, जिसमें प्रदेश को विशेषताएँ और मानवीय क्रियाएँ भी सम्मिलित रहती हैं।

             भूगोल का अन्य भौतिक विज्ञानों से मनिष्ठ सम्बन्ध है। भूगोल की निम्नलिखित वस्तु है-

1. खगोल विज्ञान:-

        सौर मंडल, सूर्य की सीधी किरणों का उत्तरायण और दक्षिणायन होना, दिन-रात का होना और घटना बढ़ना, मौसम में परिवर्तन, चन्द्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का होना, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि के अध्ययन भूगोल तथा खगोल विज्ञान दोनों में होता है। अतः भूगोल तथा खगोल विज्ञान में बहुत निकट का सम्बन्ध है।

2. गणित:-

        भूगोल में प्रदेशों की अवस्थिति और भौमिकीय स्थिति आदि का अध्ययन किया जाता है और इनको अंशों व कलाओं द्वारा व्यक्त करते हैं। इसके अतिरिक्त उस प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रफल और प्रदेश की आकृति का भी भूगोल में अध्ययन किया जाता है, क्योंकि इन सभी तत्वों का प्रभाव मानवीय उन्नति पर होता है। उन तत्वों का अध्ययन गणित के अन्तर्गत होने से भूगोल का गणित के साथ सम्बन्ध रहता है।

       मानव की अर्थव्यवस्था जैसे-कृषि, निर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, वाणिज्य आदि में सेवा केन्द्रों तथा नगरों की अवस्थिति विश्लेषण में, मात्राकरण और योजनाकरण में गणित की क्रियाएँ सम्मिलित रहती हैं। अतः भूगोल और गणित के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

3. भौमिकी:-

      प्रदेशों की भू-आकृतियों का जैसे पर्वतों, मैदानों, घाटियों आदि का मानव की क्रियाओं और निवास से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक संसाधनों में खनिज पदार्थों का भी प्रमुख स्थान होता है। इसलिए भूगोल में इन दोनों तत्वों अर्थात् भूमि की रचना और भू-आकृति तथा शैलों और खनिज पदार्थों का विशिष्ट अध्ययन होता है। भू-आकृतियों, शैलों और खनिज पदार्थों का विशिष्ट अध्ययन भौमिकी का भी विषय है। इसलिये भौमिकी और भूगोल के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

4. ऋतु विज्ञान और जलवायु विज्ञान:-

           किसी क्षेत्र में मनुष्य के भोजन, वस्त्र, आवास आदि का क्या रूप होगा, वहाँ कौन सी फसलें उग सकेगा और कहाँ पर अधिक स्वास्थ्यपूर्ण तथा सुविधाजनक जीवन व्यतीत कर सकेगा- इन सब बातों को निश्चित करने में मुख्य भूमिका होती है।

            मनुष्य की दैनिक क्रियाओं को ऋतुएँ प्रभावित करती हैं। जलवायु जलवायु अनुरूप ही विभिन्न प्रदेशों की वनस्पति और जीव-जन्तु होते हैं। भूगोल के अध्ययन में ऋतु की जलवायु का विश्लेषण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भूगोल का अध्ययन ऋतु और जलवायु के बिना अधूरा ही माना जाएगा। अतः कहा जा सकता है कि भूगोल का ऋतु विज्ञान और जलवायु विज्ञान से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

5. मृत्तिका विज्ञान:-

            विश्व भर के मनुष्य अपना भोजन मिट्टी से ही पैदा करते हैं। सभी प्रकार की फसलें, सभी प्रकार के फल मिट्टी में ही पैदा होते हैं। माँसाहारी मनुष्य जिन पशुओं और पक्षियों के माँस का सेवन करते हैं वे पशु भी मिट्टी से उगने वाली घास और फलों से ही अपना भोजन ग्रहण करते हैं। अतः सभी मनुष्यों का भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से ही प्राप्त होता है। कम उपजाऊ मिट्टी को मनुष्य खाद आदि के प्रयोग से उपजाऊ बनाता है और कृषि फसलों में हेरफेर की पद्धति को अपना कर और अन्य प्रकारों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखता है।

           विभिन्न प्रकार की कृषि फसलों के लिए विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ या खाद की आवश्यकता होती है। भोजन सामग्री और कच्चा माल उत्पन्न करने वाली मिट्टियों का अध्ययन भूगोल का भी विषय है। अतः भूगोल और मृत्तिका विज्ञान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

6. भूगोल और जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान:-

            प्रमुख प्राकृतिक संसाधन जल का महत्व सिर्फ मनुष्य के पीने के लिए ही नहीं है, वरन् सिंचाई एवं विद्युत् पैदा करने के लिए भी जल एक अनिवार्य साधन है। किसी देश-प्रदेश के सिंचाई साधनों तथा जलशक्ति की समता और विकास का अध्ययन मानव भूगोल में होता है, इसलिये इसका सम्बन्ध जल विज्ञान से हैं। समुद्री तटों और समुद्री पत्तनों का महत्व, मछुआराओं तथा समुद्री परिवहन और व्यापार के लिये कितना है, यह सभी को ज्ञात हैं। बन्दरगाहों और समुद्री परिवहन पर ज्वार-भाटे और धाराओं का प्रभाव पड़ता है। चूँकि भूगोल में भी समुद्र ज्वार-भाटा, बन्दरगाहों आदि का अध्ययन किया जाता है। अतः भूगोल और जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

7. भूगोल और वनस्पति विज्ञान:-

              मानव जीवन में वनस्पति का महत्वपूर्ण स्थान है। वनों से केवल मकान बनाने की लकड़ी और जलाने का ईंधन ही नहीं मिलता, वरन् कल-कारखानों और उद्योगों के लिये कई प्रकार का कच्चा माल भी वनों से प्राप्त होता है। वन, बाढ़ और मिट्टी का कटाव रोकने में भी मदद करते हैं। प्राकृतिक वनस्पति का मानव जीवन से गहरा सम्बन्ध है। वनस्पतियों का अध्ययन भूगोल का मुख्य विषय है। अतः भूगोल और वनस्पति विज्ञान के बीच सम्बन्धों की घनिष्ठता को नकारा नहीं जा सकता।

8. भूगोल और जन्तु विज्ञान:-

            मनुष्य के जीवन में पशुओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पशुओं से मनुष्य को दूध, माँस, ऊन, चमड़ा आदि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं और पशुओं को खेती करने, सामान ढ़ोने तथा यात्रा करने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त कुत्ता इत्यादि पशुओं को मनुष्य स्वामीभक्त पशुओं के रूप में पालता है। इस प्रकार मानव सभ्यता के आदिकाल से ही मनुष्य और पशुओं के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। चूँकि भूगोल और जन्तु विज्ञान दोनों ही पशुओं का अध्ययन करते हैं, अतः इनके बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।


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