16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप

16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप



रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Projection)⇒

⇒ किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वेच्छा के अनुसार छाटे गये सिद्धांतों पर निर्मित प्रक्षेप को रूढ़ प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप पर समस्त संसार की मानचित्र बनायी जाती है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप इतना संशोधित प्रक्षेप है कि इसे न तो शंकु, न बेलनाकार, न खमध्य प्रक्षेप के वर्ग में रखते हैं। अत: यह पूर्णतः गणितीय विधि पर आधारित है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:-

(1) मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सिनुस्वायडल प्रक्षेप

(1) मॉलवीड प्रक्षेप  (Mollweide’s Projection)

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप का निर्माण 1805 ई० में जर्मन मानचित्रकार ब्रेडन मॉलवीड ने किया था।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण पाया जाता है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण उत्पन्न करने के लिए दो प्रकार के संशोधन किये जाते हैं:

(i) मॉलवीड प्रक्षेप में 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा को एक वृत्त मानते हुए दिखाया जाता है जिसका अर्द्धव्यास (त्रिज्या) √2 x R होता है।

(ii) भूमध्यरेखा की लम्बाई केन्द्रीय मध्याहन रेखा की दुगनी होती है अर्थात् प्रक्षेप में बनाये गये वृत्त के अर्द्धव्यास का चार गुणा (4 x√2 x R) के बराबर भूमध्यरेखा होती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप पृथ्वी के वास्तविक अर्द्धव्यास को भी घटाकर निर्मित होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत्त सरल और समान्तर रेखाओं की तरह होते हैं। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होती जाती है।

⇒ 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा केन्द्रीय मध्याहन रेखा होती है। यही रेखा एक सरल देशान्तर रेखा होती है। जबकि शेष देशान्तर देखा दीर्घवृताकार होती है।

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा अक्षांश को समकोण पर काटती है, शेष देशान्तर रेखा अक्षांश को तिरछी काटती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी रहती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा से पूरब या पश्चिम की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटते जाती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप विश्व मानचित्र बनाने हेतु, फसलों के उत्पादन दिखाने हेतु उपयोगी होता है। अत: यह संसार के वितरण मानचित्र बनाने के लिए सबसे उपयोगी है।

रूढ़ प्रक्षेप

मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सैन्सन-फ्लैम्स्टीड या सिनुस्वायडल प्रक्षेप (Sanson-Flamsteed or Sinusoidal Projection)

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप का निर्माण 1650 ई० में निकोलस सैन्सन ने किया तथा बाद में जॉन फ्लैम्स्टीड ने इसमें संशोधन किया।

⇒ इसीलिए इसे सैन्सन-फ्लैम्स्टीड प्रक्षेप कहते है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप वास्तव में शंक्क्वाकार प्रक्षेप या बोन प्रक्षेप का एक भाग है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर क्षेत्रफल शुद्ध होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 2πR के बराबर रखा जाता है। इसलिए भूमध्यरेखा पर लम्बाई शुद्ध होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर भूमध्यरेखा की लम्बाई πR के बराबर होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना में Sine Curve (ज्या वक्र) का प्रयोग होता है। इसलिए इसे ज्यावक्रीय या सिनुस्वायडल प्रक्षेप भी कहते हैं।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखायें सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होते हैं।

⇒ विषुवत रेखा मानक अक्षांश रेखा का कार्य करता है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक लम्बवत एवं सरल रेखा होती है। लेकिन शेष सभी देशान्तर रेखाएँ मिश्रित वक्र होती है।

⇒ लेकिन एक ही अक्षांश रेखा पर दो देशान्तर रेखा के बीच की दूरी नियत रहती हैं। 

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा विषुवतीय अक्षांश को समकोण पर काटती है और शेष को तिरछे काटती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर मापनी शुद्ध होती है लेकिन अन्य देशान्तर रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर सीमावर्ती भागो में आकृति काफी विकृत हो जाती है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप वैसे महाद्वीपों के लिए उपयोगी है जो विषुवत रेखा के दोनों ओर स्थित है। जैसे- अफ्रीका, द० अमेरिका।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1:250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 30० हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) भूमध्य रेखा की लम्बाई = 2πR

= 2× 22/7 × 1″

= 6.28″

(iii) केन्द्रीय मध्याह्न रेखा की लम्बाई = 2πR/2

= 6.28″/2

= 3.14″

रूढ़ प्रक्षेप

सिनुस्वायडल प्रक्षेप

         उपरोक्त  चित्र A के अनुसार 1″ का अर्द्धव्यास लेकर वृत्त के चतुर्थांश ABO की रचना करते हैं। OB रेखा के O बिन्दु पर 30० के अन्तराल पर कोण बनाती हुई OC तथा OD रेखायें खींचते हैं।

    फिर BC की चापीय दूरी से O बिन्दु से एक चाप लगाते हैं जो OC तथा OD कोणिक रेखाओं को क्रमशः E तथा F बिन्दुओं पर काटता है। E तथा F बिन्दुओं से OA रेखा पर EE’ तथा FF’ लम्ब डालते हैं (अर्थात् OB के समान्तर रेखा खींचते हैं)। यही क्षैतिज दूरियाँ प्रक्षेप में सम्बन्धित अक्षांशों पर देशान्तरों के मध्य की दूरी को प्रकट करेंगी।

   अब चित्र B के अनुसार 6.28″ लम्बी क्षैतिज रेखा खींचते हैं जो भूमध्यरेखा कहलाती है। इस रेखा को BC की चापीय दूरी 2πR x Interval/360 से 360/ 30 = 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।

   तत्पश्चात् इस रेखा के मध्यवर्ती बिंदु से ऊपर तथा नीचे दोनों ओर NS लम्ब डालते हैं, जिसकी लम्बाई भमध्यरेखा की आधी होती है। अर्थात् NS रेखा पर BC की चापीय दूरी से भूमध्यरेखा के ऊपर तथा नीचे तीन-तीन चिह्न अंकित करते हैं तथा इन चिन्हों से भूमध्यरेखा के समान्तर रेखायें खींचते हैं। ये समान्तर रेखायें क्रमशः 30० तथा 60० उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्त होंगे और N व S बिन्दु क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव होंगे।

     देशान्तर रेखायें बनाने के लिए 30° तथा 60० उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्तों पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दायें-बायें दोनों ओर क्रमशः EE’ एवं FF’ दूरी से छः छः चिह्न लगाते हैं।

     तदुपरान्त अक्षांश वृत्तों पर अंकित समान देशान्तरीय मान वाले इन चिन्हों को ध्रुवों (N तथा S बिन्दुओं) से फ्रेंच कर्व द्वारा मिला कर देशान्तर रेखाओं की रचना पूर्ण करते हैं। चित्र की भांति केन्द्रीय मध्याह्न रेखा को 0° की देशान्तर मान कर शेष देशान्तर रेखाओं पर उनके अंशों में मान अंकित करते हैं।



Read More:

15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना (Comparison Between Mercator’s and Gall Projection)

15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना



मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना⇒

मर्केटर प्रक्षेप  गॉल प्रक्षेप 
(1) मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr होती है। (1) गॉल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 45° अक्षांश के बराबर होती है।
(2) मर्केटर प्रक्षेप में ध्रुव को नहीं दिखाया जा सकता। (2) गॉल प्रक्षेप में ध्रुव को दिखाया जा सकता है।
(3) मर्केटर प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत केन्द्र पर होता है। (3) गॉल प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत विषुवत रेखा के ठीक  180० पर होता है।
(4) इसमें आकृति और दिशा शुद्ध होता है। (4) गॉल प्रक्षेप में आकृति, दिशा और क्षेत्रफल तीनों अशुद्ध होती है।
(5) सभी देशान्तर रेखाएँ Great Circle होती है। (5) इसमें यह गुण नहीं होता है।
(6) मर्केटर में रम्ब लाइन खींचा जाता है। (6) गॉल में रम्ब लाइन नहीं खींचा जाता है।
(7) मर्केटर प्रक्षेप नौसंचालन के लिए उपयुक्त है। (7) गॉल प्रक्षेप राजनीतिक मानचित्र के लिए उपयुक्त है।

मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप


Read More:

14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)

14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)



गॉल प्रक्षेप⇒

⇒ गॉल एक संशोधित बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ इसे गॉल का त्रिविम प्रक्षेप भी कहते हैं क्योंकि इसमें प्रकाश के स्रोत विषुवत रेखा के ठीक 180० पर रहता है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में समतल कागज का खोखला बेलन इस प्रकार रखा जाता है कि ग्लोब के 45ºN और 45°S अक्षांश को एक साथ काटता है। अतः इसमें भूमध्यरेखा की लम्बाई पृथ्वी की 45º अक्षांश रेखा के बराबर बनायी जाती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान, सीधी एवं समानान्तर होती है।

⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45º अक्षांश वृत्त के लम्बाई (2πR Cos45०) के बराबर होती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी बढती है, लेकिन मर्केटर प्रक्षेप के तुलना में कम बढ़ती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45° अक्षांश रेखा के बराबर होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ सीधी और समानान्तर होती हैं।

⇒ देशान्तर और अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समकोण पर काटती है।

⇒ केवल 45ºN से 45ºS अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ 45º अक्षांश से विषुवत रेखा की ओर जाने पर मापनी छोटी और ध्रुव की ओर जाने पर मापनी बढ़ी हुई होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर आकृति, क्षेत्रफल और दिशा तीनों अशुद्ध होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र या दीवारी मानचित्र का निर्माण विशेष तौर पर किया जाता है।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक गॉल्स प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1 : 250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 15० हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई = 2πR Cos45०

= 2× 22/7 × 1″ x 0.71

= 4.46″

(iii) Interval Distance (अन्तरालीय दूरी)

= 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई x Interval ÷ 360

= 4.46″ x 15 ÷ 360

= 4.46″ / 24

= .186″

     RF के अनुसार Reduce Radius (RR) = 1″ पर वृत्त NESQ खींचा। केन्द्र O से EQ पर क्रमशः 15°, 30°, 45°, 60°, 75° के कोण बनाती हुई रेखाएं खींची। 45° की रेखा तथा परिधि के कटाव बिन्दु से ध्रुवीय अक्ष से समानान्तर रेखा खींची। सभी अक्षांशों व परिधि व कटान बिन्दु से E को मिलाया। ये रेखाएं अथवा इनके बढ़ाये हुए भाग जहाँ अक्ष के समानांतर खींची गई रेखा से मिलते हैं वह विषुवत रेखा से अक्षांशों की दूरी हुई।

    अतः विषुव अक्ष EQ को आगे बढ़ाया तथा 45° की रेखा पर अन्तरालीय दूरी (.186″) के अनुसार इस पर 24 भाग काट लिए। बिन्दुओं से विषुवत रेखा पर लम्बवत रेखाएं खींचा तथा पूर्व निर्मित रेखा पर प्राप्त कटान बिन्दुओं से विषुवत रेखा के समानान्तर रेखाएं खींचीं जो अक्षांश रेखाएं हैं। इस प्रकार रेखा-जाल तैयार हो जायेगा।

गॉल प्रक्षेप

गॉल प्रक्षेप



Read More:

13. Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)

13. Mercator’s Projection

(मर्केटर प्रक्षेप)



Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)⇒

⇒ मर्केटर एक बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में आकृति शुद्ध होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप को यथाकृतिक प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप की खोज गिरारडस मर्केटर नामक फ्रेंच मानचित्रकार ने किया।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप का सर्वाधिक प्रयोग नौसंचालन में होता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में बनायी गई भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr या पृथ्वी के वास्तविक परिधि के समतुल्य होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर खींची गई अक्षांश रेखा सीधी, सामानान्तर और लम्बाई में बराबर होती है। 

⇒ देशान्तर रेखाएँ सीधी, परस्पर बराबर और समान्तर होती है तथा दो देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी बराबर होती है।

⇒ देशान्तर रेखा और अक्षांश रेखा एक-दूसरे को समकोण पर काटती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखा की दूरी बढ़ते जाती है। इसीलिए इस प्रक्षेप में आकृति शुद्ध होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्यरेखा पर मापनी शुद्ध होती है क्योंकि इस प्रक्षेप में भूमध्यरेखा पृथ्वी के परिधि के बराबर होती है।

⇒ अन्य अक्षांश रेखाओं पर मापनी बढ़ी हुई होती हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर ध्रुव अनन्त पर होता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में शुद्ध दिशा का गुण पाया जाता है। इसीलिए इसका प्रयोग नौसंचालन में करते हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर क्षेत्रफल अशुद्ध होता क्योंकि भूमध्यरेखा से दूर जाने पर मापनी का मान बढ़ता जाता है।

⇒ अगर मर्केटर प्रक्षेप पर ऐसी सरल रेखा खींची जाए जो समस्त अक्षांश रेखाओं को एक नियत कोण पर काटे तो ऐसी सरल रेखा को Rhumb Lime (रम्ब लाईन) या  Loxodrome Line (लोग्जोड्रम) कहते हैं।

 

 

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ मर्केटर प्रक्षेप में Rhumb Lime (एकदिश नौपथ) होती है क्योंकि सभी देशान्तर रेखाएँ अक्षांश रेखा को एक नियत कोण पर काटती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र का निर्माण किया जाता है। इसका प्रयोग नौवहन, पवन की दिशा एवं महासागरीय जलधाराओं को प्रदर्शन में किया जाता है।

⇒ इस प्रक्षेप पर संसार का दीवारी मानचित्र (Wall Map) अधिक बनाया जाता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप दो बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम दूरी को उन बिन्दुओं से होकर जाने वाले वृहत वृत्त (Great circle) के सहारे ज्ञात करते हैं।

⇒ मर्केटर पर Great circle का आकार वक्राकार होता है।

⇒ Great circle उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण की ओर मुड़ा होता है।

Mercator's Projection


Read More:

12. Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)

Zenithal Projection

(खमध्य प्रक्षेप)

Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)⇒

⇒ Zenithal प्रक्षेप में ग्लोब को किसी एक बिन्दु पर समतल कागज स्पर्श करते हुए कल्पना करके भूग्रिड प्रक्षेपित किया जाता है।

⇒ समतल कागज ग्लोब को जिस बिन्दु पर स्पर्श करता है उस बिन्दु को प्रक्षेप केन्द्र (Projection Point) कहते हैं।

⇒ ग्लोब में जिस बिन्दु पर प्रकाश स्थित होता है, उस बिन्दु को नेत्र स्थान या उत्पत्ति बिन्दु कहते हैं।

⇒ Zenithal प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखाएँ संकेन्द्रीय होती है तथा सभी देशान्तर रेखाएँ केन्द्र से निकलने वाली एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ Zenithal प्रक्षेप पर पृथ्वी के केवल आधे भाग को प्रदर्शित किया जा सकता है।

⇒ नेत्र की स्थिति के आधार पर और प्रक्षेपण तल या समतल कागज के स्थिति के आधार पर इस प्रक्षेप को दो भागों में बाँटते हैं।

Zenithal Projection

Zenithal Projection

(1) नेत्र की स्थिति या प्रकाश स्रोत की स्थिति के आधार पर

          नेत्र की स्थिति के आधार पर पुन: इस प्रक्षेप को तीन भागों में बाँटते हैं।

(i) Gnomonic Porojection (केन्द्रक या नोमॉनिक प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रकाश का स्रोत ग्लोब के केन्द्र में होता है।

⇒ 60º-90° अक्षांश के बीच के क्षेत्र को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है।

⇒ अर्थात ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे आर्कटिक और अण्टार्कटिका का प्रदर्शन के लिए उपयोगी है।

(ii) Stereographic Porojection (त्रिविम प्रक्षेप)

⇒ Stereographic प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत ग्लोब के परिधि पर स्थित माना जाता है।

⇒ यह एक ऐसा प्रक्षेप है जिनमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा दोनों को दिखाया जाता है।

⇒ चूँकि इसमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा का प्रदर्शन साथ-2 होता है। इसलिए इस प्रक्षेप को त्रिविम प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ त्रिविम प्रक्षेप किसी भी गोलार्द्ध के फसलों के उत्पादन को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी मानी जाती है।

(iii) Orthographic Porojection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

⇒ लम्बकोणीय प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत अनन्त पर होता है। यह प्रक्षेप गोलीय मानचित्र के लिए तथा आकाश में तारों की स्थिति के प्रदर्शन हेतु उपयुक्त माना जाता है।

(2) प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर (Zenithal Projection)

         प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर Zenithal Projection तीन प्रकार के होते हैं-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ Polar Zenithal Projection में समतल कागज ध्रुव को स्पर्श करते हुए रखा जाता है।

⇒ इस प्रक्षेप में ध्रुव को केन्द्र मानकर समान दूरी के अन्तर पर संकेन्द्रीय अक्षांश वृत खीचे जाते हैं।

⇒ यह प्रक्षेप आर्कटिक क्षेत्रों एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में नौसंचालन के लिए उपयोगी माना जाता है।

⇒ इसमें ध्रुव को एक बिन्दु के रूप में प्रकट किया जाता है।

⇒ प्रत्येक देशान्तर पर मापनी शुद्ध होता है।

⇒ ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जाने पर अक्षांश पर मापनी अशुद्ध होने लगती है।

⇒ Polar Zenithal Projection समदूरस्थ का गुण होता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को विषुवत रेखा से स्पर्श करते हुए खींचा जाता है।

⇒ भूमध्यरेखीय क्षेत्र के वायुमार्ग और नौसंचालन से संबंधित मानचित्रों के लिए उपयोग है।

(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को 60° अक्षांश रेखा से स्पर्श करते हुए रखा जाता है। अर्थात इसमें स्पर्शी बिन्दु विषुवत रेखा एवं ध्रुव के मध्य स्थित माना जाता है।

नोट: लैम्बर्ट महोदय ने ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप में गणितीय विधि से संशोधन कर एक ऐसा प्रक्षेप बनाया जिसमें समक्षेत्रफल का गुण था। ऐस प्रक्षेप को लैम्बर्ट प्रक्षेप भी कहते हैं। इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र बनाने हेतु उपयोगी माना जाता है।

       इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर भूमध्य रेखा पर मापनी घटने लगती है लेकिन अक्षांश रेखा पर मापनी का मान बढ़ने लगती है। इसीलिए यह एक समक्षेत्र प्रक्षेप कहलाता है।

ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप

(Polar Zenithal Equidistant Projection)

     ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप एक Zenithal/Azimuthal प्रक्षेप है, जिसमें प्रक्षेपण तल को पृथ्वी के किसी एक ध्रुव (उत्तरी या दक्षिणी) पर स्पर्श करता हुआ माना जाता है। इस प्रक्षेप में ध्रुव केंद्र का कार्य करता है। सभी अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर समान दूरी पर बनाए गए सकेंद्र (Concentric) वृत्त होते हैं, जबकि देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली सरल सीधी रेखाओं के रूप में समान कोणीय अंतराल पर अंकित की जाती हैं।

   इस प्रक्षेप द्वारा एक समय में केवल एक ही गोलार्ध (उत्तरी अथवा दक्षिणी) का प्रदर्शन किया जा सकता है। इसकी विशेषता यह है कि केंद्र (ध्रुव) से सभी स्थानों की दूरी सही (Equidistant) रहती है, इसलिए ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है। इस प्रक्षेप के निर्माण की गणितीय विधि एवं आलेखी (Graphical) विधि मूलतः समान होती हैं।

उदाहरण-

उत्तरी गोलार्ध के लिए एक ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप का निर्माण कीजिए।

मापनी (Scale): 1 : 200,000,000,

रेखान्तराल (Interval): 30°, 

प्रदर्शित क्षेत्र: उत्तरी गोलार्ध (0° से 90° उत्तरी अक्षांश)

प्रक्षेप निर्माण की विधि (Method of Construction):-

     According to the given scale:

(1) Radius of the Globe (R):

R = 635,000,000/200,000,000

   = 3.17 cm

(2) Length of the Arc for 30° Latitude:

Arc Length = 2πR×30∘/360∘

(3) Radius of the 0° Latitude (Equator) in the Projection (90° Arc):

   Since the distance from the North Pole to the Equator is 90°,

r = 2πR×90∘/360∘

r =

Thus, the radius of the projection (Equator) is 4.98 cm.

Polar Zenithal Equidistant Projection

      ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप के निर्माण के लिए सबसे पहले AB तथा CD नामक दो परस्पर लम्बवत् (Perpendicular) सरल रेखाएँ खींची जाती हैं, जो N बिंदु पर एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करती हैं। N बिंदु प्रक्षेप में उत्तरी ध्रुव (North Pole) को प्रदर्शित करता है।

    इसके बाद NB रेखा पर 1.66 सेमी की समान दूरी पर क्रमशः E, F तथा B बिंदु अंकित किए जाते हैं। अब N को केंद्र मानकर NE, NF तथा NB त्रिज्याओं से तीन संकेन्द्र (Concentric) वृत्त बनाए जाते हैं। ये वृत्त क्रमशः 60° उत्तरी अक्षांश, 30° उत्तरी अक्षांश तथा 0° (भूमध्य रेखा) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार प्रक्षेप की कुल त्रिज्या (NB) 4.98 सेमी होती है।

    इसके पश्चात N बिंदु पर चाँदे (Protractor) की सहायता से 30° के अंतराल पर कुल 12 विकिरणीय (Radial) सरल रेखाएँ खींची जाती हैं। ये रेखाएँ प्रक्षेप में 30° के अंतराल पर देशांतर रेखाओं को प्रदर्शित करती हैं। अंत में सभी अक्षांश वृत्तों एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण किया जाता।

पहचान (Identification):-

1. अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर बनाए गए संकेन्द्र वृत्त होते हैं तथा इनके बीच की दूरी समान रहती है।

2. देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली विकिरणीय सरल रेखाएँ होती हैं, जो समान कोणीय अंतराल पर स्थित रहती हैं।

3. सभी अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।

4. इस प्रक्षेप में ध्रुव एक बिंदु के रूप में प्रदर्शित होता है।

गुणधर्म (Properties):-

1. अक्षांश वृत्तों को वास्तविक दूरी पर अंकित करने के कारण प्रत्येक देशांतर रेखा पर मापनी (Scale) शुद्ध रहती है।

2. ध्रुव के निकट विकृति न्यूनतम तथा भूमध्य रेखा की ओर अधिकतम होती है।

3. यह प्रक्षेप ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

4. अक्षांश वृत्तों को वास्तविक दूरी पर प्रदर्शित किया जाता है, इसलिए प्रत्येक देशांतर रेखा पर मापनी (Scale) शुद्ध रहती है।

5. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर मापनी में क्रमिक वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, 75° अक्षांश पर लगभग 1.2%, 60° अक्षांश पर लगभग 4.5% तथा 45° अक्षांश पर लगभग 11.0% मापनी बढ़ जाती है। इससे स्पष्ट है कि भूमध्य रेखा की ओर विकृति (Distortion) क्रमशः बढ़ती जाती है।

6. यह यथाकृतिक (Orthomorphic/Conformal) प्रक्षेप नहीं है, फिर भी 90° से 60° उत्तरी अक्षांश के मध्य क्षेत्रों की आकृति अपेक्षाकृत शुद्ध रहती है। 60° अक्षांश से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर क्षेत्रों की आकृति पूर्व–पश्चिम दिशा में लंबी (Elongated) दिखाई देने लगती है।

7. इस प्रक्षेप में क्षेत्रफल (Area) वास्तविक रूप में प्रदर्शित नहीं होता, परंतु ध्रुव (केंद्र) से विभिन्न स्थानों की दूरी तथा दिशा (Distance and Direction) सही रहती है।

8. इस प्रक्षेप में अधिकतम केवल एक गोलार्ध (ग्लोब का आधा भाग) ही प्रदर्शित किया जा सकता है।

उपयोग (Uses):-

   ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप मुख्यतः आर्कटिक एवं अंटार्कटिक क्षेत्रों के सामान्य उद्देश्य वाले मानचित्रों के निर्माण में उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त ध्रुवीय अन्वेषण (Polar Exploration), ध्रुवीय नौवहन (Polar Navigation), विमानन मार्गों (Air Routes) तथा ध्रुवीय वैज्ञानिक अध्ययनों से संबंधित मानचित्रों के निर्माण में भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ध्रुव से दूरी (Distance) और दिशा (Direction) सही रहती है, इसलिए यह ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

Polar Zenithal Equal-Area Projection

ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप

परिचय (Introduction):

   ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप (Polar Zenithal Equal-Area Projection) एक समक्षेत्र (Equal-Area) अथवा असंदर्श (Non-Conformal) प्रक्षेप है, जिसमें मानचित्र पर प्रदर्शित क्षेत्रों का क्षेत्रफल वास्तविक अनुपात में बना रहता है।

    इस प्रक्षेप का विकास सर्वप्रथम प्रसिद्ध मानचित्रकार जे. एच. लैम्बर्ट (J. H. Lambert) ने किया था। इसी कारण इसे लैम्बर्ट का ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप (Lambert’s Polar Zenithal Equal-Area Projection) भी कहा जाता है।

   इस प्रक्षेप में प्रक्षेपण तल को ध्रुव पर स्पर्श करता हुआ माना जाता है तथा इसका निर्माण अपेक्षाकृत सरल होता है। यह विशेष रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

उदाहरण (Example)-

1 : 200,000,000 की मापनी पर उत्तरी गोलार्ध का ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप बनाइए। प्रक्षेप में देशान्तर एवं अक्षांश का अंतराल 30° रखा जाए।

आलेखी विधि (Graphical Method)-

     दिए गए पैमाने के अनुसार पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास (R) निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है-

R = 635000000/200000000

=3.17 सेमी

    इसके लिए सबसे पहले 3.17 सेमी त्रिज्या लेकर वृत्त का एक चतुर्थांश (Quadrant) बनाया जाता है। चतुर्थांश की त्रिज्या पर 30° एवं 60° के कोण अंकित कर संबंधित बिंदुओं को वृत्त के दूसरे सिरे से मिलाया जाता है, जिससे आवश्यक जीवाएँ (Chords) प्राप्त होती हैं।

    अब दो परस्पर लम्बवत् रेखाएँ EF तथा GH खींची जाती हैं, जो N बिंदु पर एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं। N बिंदु प्रक्षेप में उत्तरी ध्रुव का प्रतिनिधित्व करता है।

   इसके पश्चात N को केंद्र मानकर तथा प्राप्त जीवाओं AB, AC एवं AD को त्रिज्या मानते हुए तीन संकेन्द्र वृत्त बनाए जाते हैं। ये क्रमशः भूमध्य रेखा (0°), 30° उत्तर तथा 60° उत्तर अक्षांश को प्रदर्शित करते हैं।

   अंत में N बिंदु पर चाँदे (Protractor) की सहायता से 30° के अंतराल पर कुल 12 विकिरणीय सरल रेखाएँ खींची जाती हैं। ये रेखाएँ देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके बाद सभी अक्षांश वृत्तों एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण किया जाता।

पहचान (Identification):-

1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर बनाए गए संकेन्द्र (Concentric) वृत्त होते हैं।

2. देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली विकिरणीय (Radial) सरल रेखाएँ होती हैं, जो समान कोणीय अंतराल पर स्थित रहती हैं।

3. सभी अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।

4. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर अक्षांश वृत्तों के बीच की दूरी क्रमशः कम होती जाती है, जो इस प्रक्षेप की प्रमुख पहचान है।

गुणधर्म (Properties):-

1. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर देशांतर रेखाओं की मापनी (Scale) धीरे-धीरे घटती जाती है, किंतु 60° से 90° अक्षांश के मध्य यह परिवर्तन बहुत कम होता है।

2. जहाँ देशांतर रेखाओं की मापनी घटती है, वहीं अक्षांश वृत्तों की मापनी समान अनुपात में बढ़ती है। इस संतुलन के कारण पूरे प्रक्षेप में क्षेत्रफल (Area) वास्तविक बना रहता है, इसलिए इसे समक्षेत्र प्रक्षेप (Equal-Area Projection) कहा जाता है।

3. इस प्रक्षेप में केवल एक गोलार्ध (उत्तरी या दक्षिणी) का ही मानचित्र बनाया जा सकता है।

4. अन्य खमध्य (Zenithal) प्रक्षेपों की भाँति ध्रुव से सभी दिशाएँ (Directions) सही प्रदर्शित होती हैं।

5. ध्रुवीय क्षेत्रों की आकृति अपेक्षाकृत शुद्ध रहती है, जबकि भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर आकृतियों में विकृति (Distortion) धीरे-धीरे बढ़ने लगती है।

उपयोग (Uses):-

    ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप मुख्यतः ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र (Distribution Maps) बनाने में प्रयुक्त होता है।

   चूँकि इसमें क्षेत्रफल वास्तविक (Equal Area) रहता है तथा ध्रुवीय भागों की आकृति भी लगभग शुद्ध रहती है, इसलिए इसका उपयोग जलवायु, वनस्पति, हिमावरण, जनसंख्या वितरण, प्राकृतिक संसाधनों के वितरण तथा अन्य विषयगत (Thematic) मानचित्रों के निर्माण में व्यापक रूप से किया जाता है।

    यह प्रक्षेप ध्रुवीय अनुसंधान एवं भौगोलिक विश्लेषण के लिए भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है।



Read More:

error: