1. Major Course / Geomorphology (Theory) Solved Questions Paper 2023

(Major Course or MJC-1)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023



(Patliputra University Patna)

Geomorphology

Part-A/भाग-अ
(Objective Type Questions)
(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: All questions are compulsory.
सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

1. Select the correct answer from the alternatives given below: [2×10=20]

दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

(i) Who propounded the ‘Nebular Hypothesis’ in the year 1796?
(a) Kant
(b) Roche
(c) Laplace
(d) Lockyer
‘निहारिका परिकल्पना’ को वर्ष 1796 में किसने प्रतिपादित किया?
(a) काण्ट
(b) रोशे
(c) लाप्लास
(d) लॉकियर
उत्तर – (c) लाप्लास

(ii) Lithosphere consists of:
(a) Crust and Core
(b) Mantle and Core
(c) Upper and Lower Mantle
(d) Crust and Upper Mantle
स्थलमंडल में सम्मिलित है:
(a) कस्ट और कोर
(b) मैण्टिल और कोर
(c) ऊपरी और निम्न मैण्टिल
(d) क्रस्ट और ऊपरी मैण्टिल
उत्तर – (d) क्रस्ट और ऊपरी मैण्टिल

(iii) The term ‘Isostasy’ was first used by:
(a) Airy
(b) Pratt
(c) Dutton
(d) Holmes
‘समस्थिति’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया :
(a) एयरी द्वारा
(b) प्राट द्वारा
(c) डटन द्वारा
(d) होम्स द्वारा
उत्तर – (c) डटन द्वारा

(iv) Which of the following was not a part of Gondwana Land?
(a) Asia
(b) Australia
(c) India
(d) Africa
निम्नलिखित में से कौन गोंडवाना भूमि का भाग नहीं।
(a) एशिया
(b) आस्ट्रेलिया
(c) भारत
(d) अफ्रीका
उत्तर – (a) एशिया

(v) Which of the following is a major tectonic plates of the earth?
(a) Nazca Plate
(b) Philippines Plate
(c) Arabian Plate
(d) Antarctica Plate
निम्नलिखित में से कौन-सी पृथ्वी की एक प्रमुख विवर्तनिक प्लेट है?
(a) नाज्का प्लेट
(b) फिलीपाइन प्लेट
(c) अरेबियन प्लेट
(d) अण्टार्कटिका प्लेट
उत्तर – (d) अण्टार्कटिका प्लेट

(vi) Mountain building on the surface of the earth is a result of:
(a) Endogenic Forces
(b) Exogenic Forces
(c) Gravitational Forces
(d) Magnetic Forces
पृथ्वी की सतह पर पर्वत निर्माण परिणाम है:
(a) अंतर्जात बल का
(b) बहिर्जात बल का
(c) गुरुत्वाकर्षण बल का
(d) चुम्बकीय बल का
उत्तर – (a) अंतर्जात बल का

(vii) What is the scale of earthquake intensity?
(a) Beaufort Scale
(b) Seismic Scale
(c) Secant Scale
(d) None of these
भूकंप की तीव्रता मापने का पैमाना क्या है?
(a) ब्यूफोर्ट पैमाना
(b) सिस्मिक पैमाना
(c) सिकेंट पैमाना
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर – (b) सिस्मिक पैमाना

(viii) Glacial erosion is responsible for the formation of the following:
(a) Sink holes
(b) Swallow holes
(c) Kames
(d) Cirque
हिमानी अपरदन निम्नलिखित के विन्यास के लिए उत्तरदायी है:
(a) घोल रन्ध्र
(b) विलय रन्ध्र
(c) केम
(d) हिमगहर या सर्क
उत्तर – (d) हिमगहर या सर्क

(ix) Which of the following is not an agent of weathering?
(a) Glacier
(b) Wind
(c) Soil
(d) River
निम्नलिखित में से कौन अपक्षय का प्रतिनिधि नहीं है?
(a) हिमानी
(b) पवन
(c) मृदा
(d) नदी
उत्तर – (c) मृदा

(x) The most abundant metal in the earth crust is:
(a) Sodium
(b) Aluminium
(c) Calcium
(d) Iron
पृथ्वी के क्रस्ट में सबसे प्रचुर मात्रा में धातु है
(a) सोडियम
(b) एल्युमीनियम
(c) कैल्शियम
(d) लोहा
उत्तर – (b) एल्युमीनियम

Part-B / भाग-ब
(Short Answer Type Questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any four questions out of six questions. Each question carries equal marks.
[5×4=20]
छः प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का है।

2. Explain the importance of the study of Geomorphology.
भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन के महत्त्व को समझाइए।

3. Define Isostasy. Who gave the theory of Isostasy?
समस्थिति को परिभाषित कीजिए। समस्थिति का सिद्धान्त किसने दिया?

4. What is the difference between the focus and epicenter of an earthquake?
भूकम्प के मूल एवं अधिकेन्द्र में क्या अंतर है?

5. What are two types of weathering?
अपक्षय के दो प्रकार क्या हैं?

6. What is a Karst Topography? What are the essential conditions for its formation?
कार्स्ट स्थलाकृति क्या है? इसके निर्माण के लिए आवश्यक दशाएं क्या हैं?

7. Define cycle of erosion according to Davis.
डेविस के अनुसार अपरदन चक्र की परिभाषा बताइए।

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions out of five questions. Each question carries equal marks. [10×3-30]

पाँच प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का हैं

8. Describe the internal structure of the earth in detail.
पृथ्वी की आंतरिक संरचना का विस्तार से वर्णन कीजिए।

9. Explain the views of Airy and Pratt regarding Isostasy.
समस्थिति के सम्बन्ध में एयरी तथा प्राट के मतों की व्याख्या कीजिए।

10. Critically examine the theory of Plate Tectonic.
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

11. Describe the different stages of mountain building according to Kober.
कोबर के अनुसार पर्वत निर्माण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



Part-B / भाग-ब
(Short Answer Type Questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any four questions out of six questions. Each question carries equal marks.
[5×4=20]
छः प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का है।

2. Explain the importance of the study of Geomorphology.
भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन के महत्त्व को समझाइए।

उत्तर- स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

महत्त्व

        विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

       डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

       कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

      चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

3. Define Isostasy. Who gave the theory of Isostasy?
समस्थिति को परिभाषित कीजिए। समस्थिति का सिद्धान्त किसने दिया?

उत्तर- समस्थिति अर्थात भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

       भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।
     डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।
               
        ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”
भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद
           भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-
(l) साहुल विधि
(ll) त्रिभुजीकरण विधि 
        यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-
(1) एयरी का मत
(2) प्रौट का मत
(3) हिस्कानेन का मत
(4) जौली का मत

4. What is the difference between the focus and epicenter of an earthquake?
भूकम्प के मूल एवं अधिकेन्द्र में क्या अंतर है?

उत्तर- भूकम्प के मूल- भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) अथवा भूकम्प के मूल कहते है।

अधिकेंद्र- भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

5. What are two types of weathering?
अपक्षय के दो प्रकार क्या हैं?

उत्तर- अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

           बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

           खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

     जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

6. What is a Karst Topography? What are the essential conditions for its formation?
कार्स्ट स्थलाकृति क्या है? इसके निर्माण के लिए आवश्यक दशाएं क्या हैं?

उत्तर- चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।          

           कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल अपरदन का सबसे प्रमुख दूत होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-
(i) जहाँ विलियन करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती है।
(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध(Joints) का विकास हुआ हो।
(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

7. Define cycle of erosion according to Davis.
डेविस के अनुसार अपरदन चक्र की परिभाषा बताइए।

उत्तर– डेविस का सामान्य अपरदन चक्र  

        डेविस का सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त भौगोलिक चक्र का सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस ने 1889 ई० में “Geographical Essay”नामक पुस्तक में अपरदन चक्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
                 
       डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धान्त को परिभाषित करते हुए कहा कि “अपरदन चक्र समय की वह अवधि है जिसके अंतर्गत एक उत्थित भूखण्ड अपरदन क्रिया द्वारा प्रभावित होकर एक आकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण करती है।”  

        डेविस ने बताया कि किसी समतल भूखण्ड के उत्थान के बाद उस पर तीन कारकों का प्रभाव पड़ता है-

(i) संरचना

(ii) प्रक्रम और

(iii) समय।

       इसी आधार पर डेविस ने यह परिकल्पना प्रस्तुत किया कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और समय का फलन होता है। इस परिकल्पना को डेविस का त्रिकट (Trio of Devis) के नाम से जानते है। 

            अपरदन  चक्र आर्द्र प्रदेश में, शुष्क प्रदेश में, चुना पत्थर प्रधान क्षेत्रो में, समुद्र तलीय क्षेत्र में,एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में सतत चलता रहता है। डेविस ने अपना सिद्धान्त आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल/नदी अपरदन का दूत होता है। बहता हुआ जल सम्पूर्ण प्रदेश को अपरदन क्रिया से प्रभावित करता है और प्रदेश में अपरदन चक्र को संचालित करता है। आर्द्र प्रदेश में अपरदन की क्रिया चक्रीय रूप से सक्रिय रहती है।

        डेविस ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया है। जैसे एक मानव जन्म के बाद युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से होकर गुजरते हुए अपने जीवन लीला को समाप्त करता है और पुनः जन्म लेता है ठीक उसी प्रकार से सामान्य अपरदन चक्र उपरोक्त तीनों अवस्थाओं से होकर गुजरती है। उन्होंने पुनर्जन्म को पुनरुत्थान से तुलना किया है। 

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions out of five questions. Each question carries equal marks. [10×3-30]

पाँच प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का हैं

8. Describe the internal structure of the earth in detail.
पृथ्वी की आंतरिक संरचना का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

9. Explain the views of Airy and Pratt regarding Isostasy.
समस्थिति के सम्बन्ध में एयरी तथा प्राट के मतों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- समस्थिति अर्थात भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

         भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।
        डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।
       
         ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”
भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद
              भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-
 (l) साहुल विधि
 (ll) त्रिभुजीकरण विधि 
           यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-
(1) एयरी का मत
(2) प्रौट का मत
(3) हिस्कानेन का मत
(4) जौली का मत
(1) एयरी का मत
        1859 ई० में एयरी ने अपना मत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार “भूपटल के प्रत्येक स्तम्भ का घनत्व समान है, जो भाग जितना ऊँचा है वह उसी अनुपात में भूगर्भ में घुसा हुआ है। अर्थात जो भाग अधिक ऊंचा है उसका अधिक भाग और जो भाग कम ऊँचा है उसका कम ही भाग भूगर्भ में घुसा हुआ है।”
      एयरी महोदय ने पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभों की तुलना जल में तैरते हुए हिमशीलाखंडों से किया है। उन्होंने अपने मत का व्याख्या करने हेतु आर्कमिडीज के सिद्धान्तों का सहारा लिया है। अर्कमिडीज के अनुसार “कोई भी तैरती हुई वस्तु अपनी मात्रा के समतुल्य द्रव्य को नीचे से हटा देती है”। हिम के संबंध में कहा कि “हिम जब पानी के ऊपर तैर रहा होता है तो उसका 1/9 भाग जल के ऊपर तथा शेष 8/9 भाग जल में डूबा रहता है।”
         धरातल के प्रत्येक भाग के लिए उसका 8 गुणा भाग धरातल के नीचे धंसा रहता है। इसे  सिद्ध करने के लिए एयरी ने एक प्रयोग के माध्यम से प्रदर्शित किया है। एयरी ने भूपटल के विभिन्न भागों की तुलना लौह धातु के छोटे-बड़े टुकड़ों से किया है। उन्होंने बताया कि जब लोहे के विभिन्न ऊँचाई वाले टुकड़े को द्रव में डुबोया जाता है तो जिस लोहे के टुकड़े की ऊँचाई अधिक होता है उसका उतना अधिक भाग द्रव में डूबा रहता है और जो लोहा का टुकड़ा कम ऊँचा रहता है उसका उतना ही कम भाग द्रव में डूबा रहता है।
Isostasy
आलोचना
          अगर एयरी के मत को सही मान लिया जाय तो इनके अनुसार जो भाग जितना ऊँचा होगा उसका उतना ही भाग धरातल के अंदर घुसा हुआ होगा। जैसे -अगर हिमालय की ऊँचाई को आधार बनाया जाय तो 2 लाख 70 हजार फीट गहरा जड़ होना चाहिए लेकिन दूसरी ओर यह भी ज्ञात है कि धरातल के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1°C तापमान बढ़ जाती है। इस प्रकार हिमालय की इतनी गहरी जड़ धरातल के अंदर अति उच्च तापमान के कारण यथावत नहीं रह सकती। अतः इनका विचार भ्रामक है।
          एयरी के मत का दूसरा आलोचना यह है कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभों का औसत घनत्व एक समान है जबकि भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न स्तम्भों का घनत्व अलग-अलग है।
निष्कर्ष:–
     
          एयरी के द्वारा भूसंतुलन के दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था। उनके मत को “Uniform Density with Varying Depthness” (एक समान घनत्व के साथ बदलता हुआ गहराई) नामक सिद्धांत से भी जानते है। दूसरी एयरी के मत से यह भी स्पष्ट हुआ कि पहाड़ों के जड़ें होते है। इस तरह एयरी के विचार में कुछ खामियों के बावजूद विशेष महत्व रखता है।
 प्रौट के मत
           प्रौट महोदय ने अपना विचार Royan Geography of Landform (1859 ई०) में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कल्याण एवं कल्याणपुर के बीच साहुल एवं त्रिभुजीकरण विधि से किये गए मापन के परिणाम में आये अंतर के संबंध में विचार प्रकट करते हुए कहा कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभो का घनत्व एक समान नहीं है बल्कि अलग-अलग है। जैसे- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व पठारी चट्टानों के घनत्व से कम है। पठारी चट्टानों का घनत्व मैदानी चट्टानों के घनत्व से कम है और मैदानी चट्टानों के घनत्व समुद्री भूपटल के घनत्व से कम है।
          प्रौट महोदय ने बताया कि पृथ्वी का सभी भू-स्तंभ एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है। उन्होंने ऊँचाई और घनत्व के बीच व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध  बताया अर्थात पृथ्वी के ऊपर स्थित भू-स्तंभ का घनत्व भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी भू-स्तंभ एक समान गहराई के साथ भूपृष्ठ में धँसे हुए है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित प्रयोग के माध्यम से पुष्टि करने का प्रयास किया है:–

चित्र: प्रौट का भू-संतुलन

         प्रौट अपने मत (Varying Density With Uniform Depth) कोउपरोक्त चित्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभ के घनत्व अलग-अलग है और चित्रानुसार ही एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे सभी भू-स्तंभ संतुलित है।                                       

आलोचना
        बहुत से विद्वानों ने प्रौट के विचारों का आलोचना करते हुए कहा कि इनका मत एयरी के मत का ही संशोधित रूप है। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि भूपटल के विभिन्न भू-स्तंभ उस तरह से नहीं है जैसा कि विभिन्न धातुओं का उदाहरण देकर प्रौट ने बताया है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद क्षतिपूर्ति रेखा और विभिन्न घनत्व के निर्मित भू-स्तंभ भूसंतुलन संकल्पना की सराहनीय कदम है। 

10. Critically examine the theory of Plate Tectonic.
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे-पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर नया विचार प्रस्तुत करता है।

      इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त  कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों का योगदान है। लेकिन हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया। 
प्लेटों का स्वभाव
       इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई 100 KM और न्यूनतम मोटाई 5 KM तथा औसत मोटाई 70 KM है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(a) अरेबियन प्लेट
(b) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(c) कोकस प्लेट
(d) नास्का प्लेट
(e) स्कोशिया प्लेट
(f) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
         स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
           इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है। इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं बांटी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
       संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
            महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है।
 प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
              इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे- पृथ्वी के घूर्णन गति, प्लवनशीलता बल, गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन, सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल, संवहन तरंग आदि।
                  इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे – निर्माणकारी गति की उत्पत्ति अपसरण सीमा के सहारे होती है, विनाशकारी गति की उत्पति अभिसारी सीमा के सहारे तथा संरक्षी गति संरक्षी सीमा के सहारे उत्पन्न होता है।
प्लेटों का क्रियाविधि
         उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-
इस सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण 
           
          प्लेट विवर्तनिकी के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है-
1. ज्वालामुखी– विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।
2. भूकम्प– भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।
3. सागर नितल प्रसार और पुराचुमकत्व– सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुमकत्व का गुण कम तथा पुराने चाट्टानों में चुमकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।
4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान  
           प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचालन, महाद्विपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुमकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।
आलोचना
        उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियां है। जैसे –  प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है, प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है?, हरसिनियन और कैलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है, बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता।   

         इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।

11. Describe the different stages of mountain building according to Kober.
कोबर के अनुसार पर्वत निर्माण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- कोबर महोदय ने मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के सम्बंध में भूसन्नति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इस संकल्पना के विकास का प्रथम प्रयास हॉल और डाना महोदय द्वारा किया गया, लेकिन एक सिद्धांत के रूप में इस संकल्पना का प्रतिपादन सर्वप्रथम हॉग महोदय द्वारा किया गया। कोबर ने वलित पर्वतों की उत्पत्ति के संबंध में भू-सन्नति सिद्धांत का प्रतिपादन किया। कोबर के अनुसार भूपटलीय चट्टानें लचीली होती है जब चट्टानों पर दबाव शक्ति कार्य करती है तो भूपटलीय चट्टानें मुड़कर भुसन्नति या मोड़दार पर्वत का निर्माण करती है। 

       भू-सन्नतियां लंबे, संकरे तथा उथले जलीय भाग होती है, जिनमें तलछटिय निक्षेप के साथ-साथ तली में धंसाव होता है। वर्तमान समय में प्राय: सभी विद्वानों की यह मान्यता है कि प्राचीन और नवीन वलित पर्वतों का आविर्भाव भू-सन्नतियाँ से हुआ है। जैसे- रॉकी भूसन्नति से रॉकी पर्वत, यूराल भू-सन्नति से यूराल पर्वत तथा टेथिस भू-सन्नति से महान हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ। भू-सन्नतियों का पर्वत निर्माण से संबंध होने के कारण कोबर ने इन्हें पर्वतों का पालना कहा है।

कोबर का भूसन्नति सिद्धांत

             वास्तव में उनका मुख्य उद्देश्य प्राचीन दृढ़ भूखंडों तथा भू-सन्नतियों में संबंध स्थापित करना था। इनका सिद्धांत संकुचन शक्ति पर आधारित है। पृथ्वी में संकुचन होने से उत्पन्न बल से अग्रदेशों में गति उत्पन्न होती है, जिससे प्रेरित होकर सम्पिडनात्मक बल के कारण भूसन्नति का मलवा वलीत होकर पर्वत का रूप धारण करता है। जहाँ पर आज पर्वत है, वहां पर पहले भू-सन्नतियां थी, जिन्हें कोबर ने पर्वत निर्माण स्थल बताया।  इन भू-सन्नतियों के चारों और प्राचीन दृढ़ भूखण्ड थे, जिन्हें क्रैटोजेन बताया है, कोबर के अनुसार भूसन्नतिया लंबे तथा चौड़े जलपूर्ण गर्त थी।

           प्रत्येक भूसन्नति के किनारे पर दृढ़ भूखंड होते हैं। जिन्हें कोबर ने अग्रदेश (Foreland) बताया।  इन दृढ़ भूखंडों के अपरदण से प्राप्त मलवा का नदियों द्वारा भूसन्नति में धीरे-धीरे जमा होता रहता है अवसादी जमाव के कारण भार में वृद्धि होने से भूसन्नति की तली में निरंतर धंसाव होता जाता है इसे अवतलन की क्रिया कहते हैं इन दोनों क्रियाओं के लंबे समय तक चलते रहने के कारण भूसन्नति की गहराई अत्यंत अधिक हो जाती है तथा अधिक मात्रा में मलबा का निक्षेप हो जाता है। 

      जब भूसन्नति भर जाती है तो पृथ्वी के संकुचन से उत्पन्न क्षैतिज संचलन के कारण भूसन्नति के दोनों अग्रदेश एक-दूसरे की ओर खिसकने लगते हैं। इसे पर्वत निर्माण की अवस्था कहते हैं। भूसन्नति के दोनों किनारों पर दो पर्वत श्रेणियों का निर्माण होता है जिन्हें कोबर ने ‘रेन्डकेटेन’  के नाम दिया है यदि संपीड़न का बल सामान्य होता है तो केवल किनारे वाले भाग ही वलित होते हैं तथा बीच का भाग वलन से अप्रभावित रहता है। इस अप्रभावित भाग कोबर ने स्वाशिनवर्ग की संंज्ञा प्रदान की है जिसे सामान्य रूप में मध्य पिंड (Median Mass) कहा जाता है जब संपीडन का बल सर्वाधिक सक्रिय होता है कभी-कभी वलन की ग्रीवा टूट कर दूसरे वलन पर चढ़ जाती है जिस कारण ग्रीवा खंड (Nappe) का निर्माण होता है।

        कोबर ने अपने विशिष्ट मध्य पिंड के आधार पर विश्व के वलीत पर्वतों की संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है टेथीस भूसन्नति के उत्तर में यूरोप का स्थल भाग तथा दक्षिण अफ्रीका का दृढ़ भूखण्ड था।  इन दोनों अग्रदेशों के आमने-सामने सरकने के कारण अल्पाइन पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। अफ्रीका के उत्तर की ओर सरखने के कारण बेटीक कार्डिलरा, पेरेनिज प्राविन्स श्रेणियां मुख्य आल्प्स, कार्पेथियंस, बाल्कन पर्वत तथा काकेशस का निर्माण हुआ। 

          हिमालय तथा कुनलुन के बीच तिब्बत का पठार।  इस तरह कोबर ने अपने सिद्धांत में मध्य पिंड की कल्पना करके पर्वतीकरण को उचित ढंग से समझाने का प्रयास किया है तथा मध्य पिंड की यह कल्पना कोबर के विशिष्ट पर्वत निर्माण स्थल की अच्छी तरह व्याख्या करती हैं। 

        हिमालय के निर्माण के विषय में कोबर ने बताया है कि पहले टेथिस सागर था जिसके उत्तर में अंगारालैंड तथा दक्षिण में गोंडवाना लैंड अग्रदेश के रूप में थे। इयोसीन युग में दोनों आमने-सामने सरकने लगे, जिस कारण टेथिस के दोनों किनारों पर तलछट के वलन पड़ने से उत्तर में कुनलुन पर्वत तथा दक्षिण में हिमालय की उत्तरी श्रेणी का निर्माण हुआ, दोनों के बीच तिब्बत का पठार मध्य पिंड के रूप में बच रहा। आगे चलकर मध्य हिमालय तथा लघु शिवालिक श्रेणियों का भी निर्माण हो गया।

आलोचना

        यद्दपि कोबर महोदय ने पर्वतों के निर्माण को भली-भांति समझाने का प्रयास किया तथापि उसके भुसन्नत्ति सिद्धान्त में कुछ दोष पाये जाते है, जिनका उल्लेख निम्नलिखित है।-

1. पर्वतों के निर्माण के लिये पृथ्वी के सिकुड़ने से पैदा होने वाले जिस बल का वर्णन कोबर ने किया है वह अपर्याप्त है।

2. कोबर के अनुसार भुसन्नत्ति के दोनों किनारे सरकते है जबकि स्वेस का मतानुसार भुसन्नति का एक ही किनारा सरकता है।

3. कोबर के सिद्धान्त से पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हुए पर्वतों (हिमालय,आल्पस) का स्पष्टीकरण तो हो जाता है, परन्तु उत्तर-दक्षिण दिशा में फैले पर्वतों (रॉकी, एंडिज) का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता है।


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1. Major Course (MJC-1)

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4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science

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41. Climate Classification of India by Stamp and Kendrew (स्टैम्प तथा केन्ड्रयू द्वारा भारत की जलवायु वर्गीकरण)

41. Climate Classification of India by Stamp and Kendrew

(स्टैम्प तथा केन्ड्रयू द्वारा भारत की जलवायु वर्गीकरण)


        प्रो० एल० डी० स्टैम्प तथा डब्लू. जी. केन्ड्रयू ने भारत को अनेक जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया। यह वर्गीकरण स्वेच्छाचारी तथा अवास्तविक है। स्टैम्प ने जनवरी के महीने के लिए 18०C की औसत तापमान की समताप रेखा का उपयोग देश को मोटे तौर पर दो जलवायु क्षेत्रों में विभाजित करने के लिए किया। जैसे-

(A) उपोष्ण जलवायु क्षेत्र उत्तर- उत्तर भारत में

(B) उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्र- दक्षिण भारत में।

         यह देखा जा सकता है कि 18०C की समताप रेखा कर्क रेखा के लगभग समांतर गुजरती है। इन दो जलवायु क्षेत्रों की वर्षा के आधार पर 11 क्षेत्र में विभाजित किया गया है।  जैसे-

(A) उपोष्ण महाद्वीपीय जलवायु

      उपोष्ण महाद्वीपीय जलवायु को पांच जलवायु क्षेत्र में बांटा है। जैसे-

(1) हिमालय क्षेत्र

(2) उत्तर-पश्चिम क्षेत्र

(3) शुष्क निम्न भूमि

(4) सामान्य मध्यम वर्षा का क्षेत्र

(5) परवर्ती क्षेत्र

(B) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु

        उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु को निम्नलिखित 6 भागों में वर्गीकृत किया है-

(1) अत्यधिक भारी वर्षा का क्षेत्र

(2) भारी वर्षा का क्षेत्र

(3) सामान्य (मध्यम) वर्षा के क्षेत्र

(4) कोंकण तट

(5) मालाबार तट

(6) तमिलनाडु क्षेत्रClimate Classification

(A) उपोष्ण महाद्वीपीय जलवायु

(1) हिमालय क्षेत्र:-

      यह जलवायु जम्मू तथा कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। इस जलवायु में ग्रीष्म ऋतु सुहावना तथा शीत ऋतु अत्यंत ठंड होती है। तापमान क्षेत्रीय वितरण (स्थलाकृति तथा ढाल) पर निर्भर करती है। 2500 मी० की ऊँचाई तक शीत ऋतु में औसत तापमान 4०C से 8०C के बीच होता है जबकि ग्रीष्म ऋतु में 12०C- 18०C के बीच होता है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण शीत ऋतु में वर्षा दर्ज किया जाता है। जाड़े के महीने में हिमपात तथा हिमवर्षा महान तथा लघु हिमालय की सामान्य विशेषता है।

(2) उत्तरी पश्चिमी भारत की जलवायु:-

       यह जलवायु समतल नदी के उत्तर-पश्चिम में पाई जाती है जहाँ शीत ऋतु में औसत तापमान लगभग 15०C होती है। जनवरी में तापमान कभी-कभी हिमांग के नीचे चला जाता है जबकि गर्मी में 45०C को पार कर जाता है और लू चलती है।

(3) उत्तर-पश्चिम भारत का शुष्क मैदान:-

        यह जलवायु राजस्थान, कच्छ तथा हरियाणा के दक्षिण-पश्चिम भाग में पाई जाती है। शीत ऋतु का तापमान 15०C से 25०C तथा मई तथा जून में तापमान कभी-कभी 47०C से भी अधिक हो जाता है औसत वार्षिक वर्षा 25 सेंटीमीटर से कम होती है।

(4) सामान्य (मध्यम) वर्षा का क्षेत्र:-

      यह जलवायु पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश, पश्चिम तथा उत्तर पश्चिम बिहार, उत्तर-पश्चिम झारखंड में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 100 से 150 सेंटीमीटर के बीच होती है। 90% वर्षा वर्षा ऋतु में होती है। वर्षा बंगाल की खाड़ी के धारा से होती है। जनवरी का औसत तापमान 15०C तथा जुलाई का औसत अधिकतम तापमान 40०C से अधिक होता है।

(5) परवर्ती क्षेत्र:-

      यह संपूर्ण बिहार, उत्तर बंगाल और पश्चिम असम में पाई जाती है। औसत वर्षा 150 सेंटीमीटर से अधिक और तापमान सामान्य बना रहता है।

(B) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु

(1) अत्यधिक भारी वर्षा का क्षेत्र:-

       यह जलवायु असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा तथा मिजोरम में पाई जाती है। यहाँ वार्षिक वर्षा 250 cm से अधिक होती है। विश्व में सर्वाधिक वर्षा चेरापूंजी और मासिनराम में दर्ज किया जाता है। 90% वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून से होता है। तरंगित स्थलाकृतिक विशेषता के कारण मासिक तापमान में भिन्नता दिखाई देती है।

(2) भारी वर्षा का क्षेत्र:-

      यह जलवायु पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, आंध्रप्रदेश के पूर्वी भाग में पाई जाती है। यहाँ औसत वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर होती है। पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा घटती है। जनवरी का औसत तापमान 15०C से अधिक, जून तथा जुलाई का तापमान 30०C होता है।

(3) सामान्य (मध्यम वर्षा) के क्षेत्र:-

       यह पश्चिमी घाट के पूर्व गुजरात, दक्षिण-पश्चिम मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के अधिकांश भाग में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 75 सेंटीमीटर, जनवरी की तापमान 18०C तथा जुलाई का 32०C होता है।

(4) कोकण तट:-

      यह तापी नदी के मुहाने से लेकर गोवा तक तटीय भाग में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। इसमें 90% वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। जनवरी की औसत तापमान 24०C तथा जुलाई का 27०C होता है। औसत वार्षिक तापांतर 3 से 6०C तक होता है।

(5) मालाबार तट:-

      यह गोवा से लेकर कन्याकुमारी तक तटीय भाग में पाई जाती है। इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 250 सेंटीमीटर से अधिक होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 27०C होती है।

(6) तमिलनाडु क्षेत्र:-

          यह तमिलनाडु और कोरोमंडल के अधिकांश क्षेत्र में पाई जाती है। औसत वार्षिक वर्षा 100 से 150 सेंटीमीटर के बीच होती है। अधिकांश वर्षा लौटती मानसून से होती है। जनवरी की औसत तापमान 24०C और जुलाई का 30०C होता है।

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्टैम्प तथा केन्ड्रयू महोदय ने तापमान और वर्षा का आधार मानकर भारत के जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया।


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26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

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28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

41. Climate Classification of India by Stamp and Kendrew (स्टैम्प तथा केन्ड्रयू द्वारा भारत की जलवायु वर्गीकरण)

34. The Theory of Morphogenic Evolution Propunded By L. C. King (एल. सी. किंग द्वारा प्रतिपादित भ्वाकृतिक उद्भव के सिद्धान्त)

34. The Theory of Morphogenic Evolution Propunded By L.C. King

(एल.सी. किंग द्वारा प्रतिपादित भ्वाकृतिक उद्भव के सिद्धान्त)

या

भौगोलिक अपरदन चक्र के एल.सी. किंग मॉडल



    एल.सी. किंग का स्थलरूपों के विकास से सम्बन्धित सिद्धान्त उनके द्वारा दक्षिणी अफ्रीका की शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों के  स्थलाकृतियों के अध्ययन से सम्बन्धित तथ्यों के अवलोकन पर आधारित है।

       यद्यपि किंग ने डेविस के भ्वाकृतिक सिद्धान्त (भौगोलिक चक्र) का जोरदार खण्डन किया है, परन्तु इनके सिद्धान्त का भी मुख्य आधार चक्रीय संकल्पना की ही मान्यता है। इस प्रकार किंग का भ्वाकृतिक सिस्टम भी मूलरूप में विकासीय एवं चक्रीय ही है जैसा कि इनके ‘स्थलाकृति चक्र’ (The Landscape Cycle), ‘अपरदन का भूतलज चक्र’ (the epigene cycle of erosion), ‘पेडीप्लनेशन चक्र’ (the pediplantion cycle), एवं ‘पहाड़ी ढाल चक्र’ (Hillslope cycle) से प्रकट होता है।

       यद्यपि किंग ने डेविस से अलग तथा फेंक की कुछ मान्यताओं पर अपने भ्वाकृतिक सिस्टम को विकसित करने का प्रयास किया है, परन्तु इनका मॉडल पेंक की तुलना में डेविस के अधिक करीब है।

      किंग के सिद्धान्त की प्रमुख मान्यता यह है कि स्थलरूपों का विकास विभिन्न पर्यावरण अवस्थाओं में समान होता है, जल अपरदित स्थलरूपों के विकास में जलवायु परिवर्तनों का महत्त्व नगण्य होता है। सभी महाद्वीपों में प्रमुख स्थलाकृतियों का विकास लयात्मक व्यापक विवर्तनिक (rhythemic global tectonies) घटनाओं से नियंत्रित हुआ है।

      ढालों में सतत खिसकाव (migration) होता है तथा इस तरह का निवर्तन (retreat) समानान्तर होता है तथा इस तरह का निवर्तन (retreat) समानान्तर होता है। यह निवर्तन ढाल पर क्रियाशील प्रक्रमों द्वारा नियंत्रित होता है तथा उसी के अनुरूप (निवर्तन की प्रक्रिया) ढालों का रूप बनता है।

      किंग की मान्यता है कि पहाड़ी ढाल में चार तत्त्व होते हैं- शिखर, कगार, मलवा ढाल तथा पेडोमेण्ट। किंग ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन दक्षिणी अफ्रीका के अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर किया है तथा बाद में अपने सिद्धान्त को अन्य प्रदेशों में भी प्रयोज्य (practicable) बताया है। इनकी मान्यता है कि चार तत्वों (उपर्युक्त) से युक्त पहाड़ी ढाल आधारभूत स्थलरूप होता है जो उन सभी प्रदेशों में तथा सभी प्रकार के जलवायु में विकसित होता है जहाँ पर पर्याप्त उच्चावच्च होते हैं तथा जल-प्रवाह अनाच्छादन का प्रमुख प्रक्रम होता है।

      किंग के अनुसार प्रत्येक चक्र त्वरित उत्थान के साथ प्रारम्भ होता है तथा उत्थान के बाद दीर्घकाल तक विवर्तनिक स्थिरता होती है (स्थलखण्ड स्थिर रहते हैं)। किंग की यह मान्यता डेविस की मान्यता के अनुरूप है। इस त्वरित उत्थान के कारण नदियों द्वारा निम्नवर्ती अपरदन तेज हो जाता है तथा नदी के मार्ग में निकप्वाइण्ट बन जाते हैं जो नदी के ऊपरी मार्ग की ओर खिसकते जाते हैं। स्थलाकृतिक चक्र की तरुणावस्था में नदी द्वारा तीव्र निम्नवर्ती अपरदन के कारण गॉर्ज का निर्माण होता है।

        जब निम्नवर्ती अपरदन शिथिल हो जाता है तो घाटी-पार्श्वढाल (valley side slopes) स्थिर कोण वाले हो जाते हैं तथा ढाल का यह रूप उस पर (ढाल पर) क्रियाशील भौतिक कारकों एवं शैलिकी (lithology) द्वारा निर्धारित होता है। प्रौढ़ावस्था के समय निम्नवर्ती अपरदन समाप्त हो जाता है। घाटी-पार्श्व ढाल का नदी से खिसकाव निवर्तन (अर्थात् घाटी चौड़ी होती जाती है एवं घाटी पार्श्वढाल नदी के जलमार्ग channel से दूर हटता जाता है) होता है, परन्तु इस प्रक्रिया के दौरान घाटी पार्श्व ढाल के कोण में कोई महत्त्वपूर्ण अन्तर नहीं होता है।

        इन घाटी पार्श्व ढाल के आधार (base, पदस्थली) पर अपेक्षाकृत समतल एवं सपाट स्थलरूप का निर्माण होता है जिसका ढाल अधिकतम रूप में 10° होता है, परन्तु सामान्य रूप में यह 5° से अधिक नहीं हो पाता है। इस स्थलरूप को किंग ने पेडीमेण्ट नामावली दी है। इनकी परिच्छेदिका अवतल होती है। इस पेडीमेण्ट का धीरे-धीरे विस्तार होता है (घाटी पार्श्व के कगार के समानान्तर निवर्तन द्वारा) तथा अन्त में कई पेडीमेण्ट मिल जाते हैं और विस्तृत पेडोप्लेन का निर्माण होता है। इस तरह निर्मित पेडीप्लेन की सामान्य सतह निम्न उच्चावच्च वाली होती है तथा इसकी रचना कई निम्न प्रतिच्छेदी अवतल सतहों (subdued intersecting concavities) द्वारा होती है।

       इस सतह के ऊपर कुछ छिटपुट तीव्र ढाल वाले अवशिष्ट टीले मौजूद रहते हैं। चक्र की अन्तिम अवस्था में दीर्घकाल तक अपक्षय के कारण जलविभाजकों का विस्तृत उत्तलता में परिवर्तन हो जाता है।

Theory of Morphogenic

           किंग की मान्यता है कि निवर्तमान ढाल (migrating or retreating slope) का रूप उस पर क्रियाशील प्रक्रमों द्वारा निर्धारित होता है। पहाड़ी ढाल का शीर्ष (सबसे ऊपर का भाग) उत्तल होता है जो मृदा-सर्पण (soil creep) द्वारा निर्मित होता है कगार शैल दृश्यांग (rock outcrops) का बना होता है तथा उसमें निवर्तन होता है। यह निवर्तन चट्टान के टूट कर अध: पतन (नीचे की ओर गिरना), भूस्खलन (Inandslide) तथा अबनलिका अपर (gullying) द्वारा होता है। मलवा ढाल का सबसे सक्रिय तत्त्व कगार ही होता है।

      मलवा ढाल (debris slope) का निर्माण ऊपर से आने वाले मलवा के द्वारा होता है तथा इसकी प्रवणता (gradient) मलवा / पदार्थों के ठहराव (repose) के कोण द्वारा नियंत्रित होती है। पेडीमेण्ट पहाड़ी ढाल की परिच्छेदिका की सबसे निचली इकाई होती है तथा इसका निर्माण ठोस चट्टान के तीव्र चादरी बाढ़ (turbulent sheet flood) द्वारा अपरदन के कारण होता है।

      यदि डेविस एवं किंग के प्रतिरूपों की तुलनात्मक व्याख्या की जाए तो स्पष्ट होता है कि दोनों प्रतिरूपों में कुछ हद तक अनुरूपता अवश्य है। दोनों स्थलाकृति के चक्रीय विकास में विश्वास करते हैं जिसके अन्तर्गत अपरदन-चक्र स्थलखण्ड में तीव्र उत्थान के साथ प्रारम्भ होता है तथा उत्थान के बाद दीर्घकालिक विवर्तनिक निष्क्रियता (विवर्तनिक स्थिरता) होती है। इस अवधि के दौरान पेनीप्लेन (डेविस) या पेडीप्लेन (किंग) का निर्माण होता है। दोनों स्थलरूपों में सामान्य अनुरूपता होता है क्योंकि ये प्राचीन होते हैं। उच्चावच्च निम्न होते हैं एवं विस्तृत क्षेत्र को प्रदर्शित करते हैं। दोनों प्रतिरूप अपरदन चक्र के पूर्णकाल की तरुण, प्रौढ़ तथा जीर्ण अवस्थाओं की मान्यता पर आधारित हैं। इन दोनों प्रतिरूपों में अन्तर भी है।

           डेविस के पेनीप्लेन का निर्माण अधःक्षय (down wasting) द्वारा होता है जबकि किंग का पेडीप्लेन कई पेडीमेण्ट के समेकन एवं सम्बर्द्धन से निर्मित होता है। इन पेडीमेण्ट में शीर्षवर्ती निवर्तन द्वारा विस्तार होता है। डेविस का पेनीप्लेन जब निर्मित हो जाता है तो उसमें पुनः विकास नहीं होता है तथा जब नवीन उत्थान होने से नया चक्र प्रारम्भ होता है तो उसमें नवोन्मेष हो जाता है। इसके विपरीत किंग का पेडीप्लेन अपने निर्माण के बाद भी शीर्ष की ओर बढ़ता जाता है।

         यद्यपि इस पेडीप्लेन के दूरस्थ छोर पर नए कगार का निर्माण हो जाता है। इस नए कगार के निवर्तन द्वारा दूसरे पेडीमेण्ट (पूर्व निर्मित पेडीप्लेन के दूरस्थ भाग पर) का निर्माण होता है, जिसमें निवर्तन के कारण प्रारम्भिक पेडीप्लेन के विस्तार में ह्रास होता है। स्पष्ट है कि उत्पन्न स्थलाकृति ऐसी होती है कि उस पर कई पेडीप्लेन होते हैं जो शीर्ष की ओर बढ़ते जाते हैं। किंग का इस तरह का पेडीप्लेन फेंक के गिरिपद ट्रेपन (piedmont treppen) के अनुरूप होता है।

आलोचनाएँ

          किंग के भ्वाकृतिक मॉडल की निम्नलिखित मान्यताएँ विवादास्पद हैं।

(i) किंग के भ्वाकृतिक मॉडल की रचना दक्षिणी अफ्रीका के अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों की स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर की गई है, परन्तु किंग ने अपने विचारों को अन्य क्षेत्रों के स्थलरूपों की व्याख्या के लिए भी प्रयुक्त किया है। यह मान्यता सन्तोषजनक नहीं है।

(ii) किंग की मान्यता है कि स्थलरूपों का विकास विभिन्न पर्यावरण दशाओं समान रूप से होता है, सन्देहास्पद है। ज्ञातव्य है कि किंग के भ्वाकृतिक सिस्टम को उतनी मान्यता एवं समर्थन नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। इसका प्रमुख कारण यह है कि किंग का सिद्धांत उस समय (1953, Canons of landscape evolution) आया जब लोगों की दिलचस्पी भ्वाकृतिक सिद्धान्तों की आवश्यकता, वांछनीयता एवं उपादेयता से उठ चुकी थी।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रो. एल. सी. किंग द्वारा प्रतिपादित भ्वाकृतिक उद्भव के सिद्धान्त की विवेचना करें।


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8. The Distribution & Production of Copper in World (विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन)

8. The Distribution & Production of Copper in World

(विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन)



    Production of Copper

       ताँबा एक ऐसी धातु है जिसका प्रयोग अति प्राचीन काल से मानव समाज करता आ रहा है। ईसा से हजारों वर्ष पूर्व मानव समाज को ताँबे का ज्ञान प्राप्त हो गया था जिसके आधार पर उस युग को ताँब युग के नाम से जाना जाता है। आज से 6000 वर्ष पूर्व ताँबे का प्रयोग बर्तन और हथियार बनाने के लिए मिस्र तथा मेसेपोटामिया में होने लगा था।

      आधुनिक युग में ताँबे का विभिन्न कार्यों में प्रयोग होता है। इसका सबसे गुणकारी प्रयोग बिजली के उपकरणों में होता है क्योंकि वह सबसे अच्छा जंग रहित विद्युत उपचालक धातु है। इसके अतिरिक्त मोटरगाड़ी, रेल इन्जन, वायुयान आदि में प्रयोग होता है। इसका प्रयोग अन्य धातुओं के साथ मिश्रण करके भी किया जाता है। औसतन 40 प्रतिशत ताँबा बिजली के सामान, 45 प्रतिशत मशीन और 4.5 प्रतिशत अन्य धातुओं के साथ मिश्रण कर प्रयोग किया जाता है।

         प्रधानतः शुद्ध रूप, ताँबा ऑक्साइड, सल्फाइड कार्बोनेट, क्लोराइड आदि रूपों में पाया जाता है। अब शुद्ध रूप में बहुत कम ताँबा प्राप्त होता है। अतः अनेक खनिजों और चट्टानों के साथ मिश्रित रूप में पाया जाता है। ताँबे के साथ सीसा, जस्ता, टिन, सोना, चाँदी और निकेल भी पाये जाते हैं।

विश्व वितरण एवं उत्पादन

        ताँबे के उत्पादन में बहुत अधिक क्षेत्रीय उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन विश्व स्तर पर इसका उत्पादन निरन्तर बढ़ता रहा है। 1957 में विश्व का उत्पादन मात्र 3412 हजार मीट्रिक टन था जो बढ़कर 1964-65 में 5400 और 1978 में 7890 मीट्रिक टन हो गया। 1986-87 में विश्व का उत्पादन बढ़कर 9223 हजार मीट्रिक टन था, जो 1990 में घटकर 8969 हजार मीट्रिक टन रह गया, परन्तु 2006 में पुनः उत्पादन बढ़कर 15100 हजार मीट्रिक टन हो गया।

         ताँबा के संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, जाम्बिया, जायरे, पेरू, पूर्व सोवियत संघ और कनाडा अग्रणी देश हैं। उत्पादन में चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, इण्डोनेशिया, पेरू, आस्ट्रेलिया, रूस, चीन, कनाडा, पोलैण्ड और जाम्बिया अग्रणी देश हैं, जो विश्व का 83 प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित करते हैं।

अमेरिकी देश:

        तांबे के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका हमेशा प्रथम स्थान पर रहा है। 1948 में यहाँ विश्व का 37 प्रतिशत ताँबा उत्पादन हुआ था लेकिन अन्य देशों में उत्पादन वृद्धि के कारण 1977 में उसकी विश्व में सापेक्षिक स्थिति घट कर 17 प्रतिशत पर पहुँच गयी। 2006 में यहाँ विश्व का 8.1 प्रतिशत उत्पादन हुआ था। यहाँ का प्रथम उत्पादन मिशिगन के केवीन अन्तरीप में शुरू हुआ। यद्यपि वहाँ का ताँबा निम्न कोटि का है।

        यहाँ का दूसरा महत्त्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र मोण्टाना राज्य का बुट्टा क्षेत्र है, जो न केवल संयुक्त राज्य अमेरिका अपितु विश्व में अग्रणी उत्पादक है। यहाँ ताँबे के साथ सोना, सीसा, मँगनीज और जस्ता भी निकाला जाता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र को सबसे अधिक ताँबा सम्पन्न क्षेत्र कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य उत्पादक क्षेत्रों में एरिजोना राज्य का मोरेन्सी और सान मैनुअल क्षेत्र, नेवेदा राज्य का एली एवं एरेग्टन क्षेत्र तथा ऊटा का विघन क्षेत्र प्रमुख हैं।

कनाडा:-

     विश्व का लगभग 4.0 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करता है। 2006 में यहाँ 607 हजार मीट्रिक टन ताँबा उत्पादित हुआ था। इसका अधिकांश उत्पादन चार क्षेत्रों से प्राप्त होता है, यथा- आन्टोरिया राज्य का साइबरी क्षेत्र जो देश के कुल उत्पादन का पचास प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित करता है। यहाँ देश का बीस प्रतिशत ताँबे के भण्डार है। इस क्षेत्र से ताँबे के साथ निकेल भी उत्खनित होता है।

       दूसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र नोरन्दा रोना क्षेत्र है जो देश का बीस प्रतिशत से अधिक तांबा उत्पादित करता है। यहाँ ताँबा और सोना साथ-साथ प्राप्त किये जाते हैं। तीसरा क्षेत्र मैनीटोवा, सस्कैचवान है। फ्लिन-फ्लोन क्षेत्र तथा बैरोबर के उत्तर में स्थित ब्रिटेनिया में भी अच्छे किस्म का ताँबा उत्पादित होता है। यह विश्व का आठवाँ बड़ा ताँबा उत्पादक देश है।

मैक्सिको:-

      मैक्सिको विश्व का सोलहवाँ बड़ा ताँबा उत्पादक देश है। 2006 में इसका योगदान लगभग 1.0 प्रतिशत था।

चिली:-

      चिली तीव्र उत्पादन के कारण यह विश्व का प्रथम बड़ा ताँबा उत्पादक देश बन गया है। 2006 में यहाँ विश्व का 35.5 प्रतिशत ताँबा उत्पादित हुआ था। यहाँ की ताँबा की खानें चिक्वकामाटा एवं तेनियेन्स, एल सल्वाडोर एवं अफ्रीकाना से देश का नब्बे प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित होता है। चिक्वकामाटा की खान विश्व की बृहत्तम खानों में से एक है। यहाँ एक अरब मीट्रिक टन से अधिक ताँबा भण्डार है।

      मध्य चिली में स्थित एलतेनियेन्स की खान विश्व की सबसे गहरी खान है। चिली के अन्य उत्पादक क्षेत्रों में पोमेटिलोज का हनाम क्षेत्र भी विशेष उल्लेखनीय है। यहाँ का अधिकांश ताँबा निर्यात किया जाता है, जिससे देश को प्राप्त होने वाली आधी विदेशी मुद्रा ताँबे से प्राप्त होती है।

पेरु:-

       यह विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ प्रति वर्ष 1050 हजार मीट्रिक टन से अधिक ताँबा उत्पादित होता है, जो विश्व का 7.0 प्रतिशत है। यहाँ का प्रमुख ताँबा उत्पादन क्षेत्र सेहों पास्को रहा है जहाँ का भण्डार अब समाप्त होने लगा है। दूसरा प्रमुख क्षेत्र टोक्वे माला के समीप स्थित है, जो एण्डीज पर्वत पर लगभग 3000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अनुमानतः यहाँ पैंतालीस करोड़ मीट्रिक टन ताँबा का भण्डार है।

यूरोप के देश:-

      यूरोप के देशों में विश्व का लगभग दस प्रतिशत शुद्ध ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ के प्रमुख उत्पादकों में पूर्व सोवियत संघ, पोलैण्ड, जर्मनी और बेल्जिम आणी हैं जो यूरोप का लगभग 60 प्रतिशत और विश्व का 10 प्रतिशत शुद्ध ताँबा उत्पादित करते हैं

पूर्व सोवियत संघ:-

       विश्व के ताँबा उत्पादकों में पूर्व सोवियत संघ का दूसरा स्थान रहा है। यहाँ प्रतिवर्ष विश्व का 15 प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित होता रहा है। सोवियत संघ का ताँबा उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा है क्योंकि 1948 में यहाँ का उत्पादन विश्व का मात्र 5.3 प्रतिशत था। यहाँ विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत संचित भण्डार है जिसका तीन चौथाई कजाकिस्तान में बालकश झील के पास स्थित है।

       पूर्व सोवियत संघ का संचित भण्डार धातु सम्पन्नता के दृष्टिकोण से उतना अच्छा नहीं है। यह क्षेत्र देश के उत्पादन का आधा से अधिक ताँबा उत्पादित करता है। यहाँ की दो खाने झेज्कागान एवं केनराड विशेष उल्लेखनीय है। सोवियत रूस के अन्य उत्पादकों में दक्षिणी-पश्चिमी यूराल क्षेत्र, उत्तरी साइबेरिया का नोरिल्स्क क्षेत्र तथा आर्मेनिया में कदझरान है, जहाँ से देश का क्रमश: 15, 25 और 15 प्रतिशत ताँबा प्राप्त किया जाता है।

       सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान अब विश्व का 3.0 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करने लगा हैं। उज्बेकिस्तान का आल्मोलिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण उत्पादक बनता जा रहा है। रूस में अधिकांश ताँबा खानों के पास ताँबा साफ करने का कारखाने स्थापित किये गये हैं। अभी हाल में पूर्वी साइबेरिया के उडेनाक निक्षेपण का पता चला है। देश के विघटन से इसकी स्थिति बदल गयी है। रूस का ताँबा उत्पादन देश के विघटन के बाद घटकर 640 हजार मीटरी टन रह गया है।

अफ्रीका के प्रमुख उत्पादक देश:-

     ताँबा उत्पादन में अफ्रीका महाद्वीप में जिम्बावे, जायरे और दक्षिणी अफ्रीका संघ का योगदान मात्र 4 प्रतिशत के लगभग है, जबकि इनका संचित भण्डार ग्यारह प्रतिशत से अधिक है।

जाम्बिया:-

      विश्व का 9वाँ बड़ा उत्पादक है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 503 हजार मीटरी टन ताँबा उत्पादित किया जाता है जो विश्व उत्पादन का लगभग 3.3 प्रतिशत है। यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मुफिल आरा अग्रणी है, जहाँ से देश का आधा से अधिक ताँबा प्राप्त किया जाता है। यहाँ ताँबे की धातु सम्पन्नता दो से पाँच प्रतिशत होती है।

        यहाँ के अन्य उत्पादकों में चिबुलुमा एवं रोकाना क्षेत्र विशेष उल्लेखनीय हैं। यहाँ की सबसे बड़ी खान रोना एण्टीलोप में है जहाँ ताँबा गलाने का विशाल कारखाना है। यहाँ का अधिकांश ताँबा जापान, भारत, चीन आदि देशों को निर्यात किया जाता है।

जायरे:-

      अफ्रीका का दूसरा और विश्व का सत्रहवीं उत्पादक देश है जहाँ प्रतिवर्ष 131 हजार मीट्रिक टन ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ का विशाल ताँबा भण्डार कटांगा प्रदेश में है, जो विश्व प्रसिद्ध है। बेल्जियन इसी ताँबे के मोह में भौतिक विपत्तियों को झेलते रहते हैं।

        यहाँ 400 किमी० लम्बा और 80 किमी० चौड़ा भू-क्षेत्र है जिसमें ताँबा भण्डार सुरक्षित है, जो कटांग से जाम्बिया तक फैला है। यहाँ उत्खनन कार्य बहुत कठिन है क्योंकि परिवहन से लेकर जलवायविक कठिनाइयों तक ही बड़ी बाधाएँ हैं। यहाँ का अधिकांश उत्पादन निर्यात किया जाता है।

दक्षिणी अफ्रीका संघ:-

      अफ्रीका का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 90 हजार मीट्रिक टन से अधिक ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ का अधिकांश तथा केपप्रान्त कान कोडिया एवं ओकोप क्षेत्र तथा केपप्रान्त के मेसिना क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है। इस देश का अधिकांश उत्पादन निर्यात किया जा रहा है। बोत्सवाना, मारुतानिया, मोरक्को व जिम्बाबे, अफ्रीका के अन्य प्रमुख तांबा उत्पादक देश है।

एशिया के तांबा उत्पादक देश:-

         एशिया में विश्व का एक-चौथाई ताँबा उत्पाद होता है। यहाँ के प्रमुख तांबा उत्पादकों में चीन (4.3 प्रतिशत), इण्डोनेशिया (5.4 प्रतिशत), ईरान, जापान, दक्षिणी कोरिया और भारत विश्व के प्रमुख देश बने हुए हैं।

      जापान, दक्षिणी कोरिया और चीन अपनी पूरी आवश्यकता घरेलू उत्पादन से पूरा करते हैं, जबकि भारत ताँबे को आयात करना पड़ता है। भारत विश्व उत्पादकता का मुश्किल से 1 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करता है। भारत में तांबे का उत्पादन झारखण्ड के सिंहभूमि एवं हजारीबाग क्षेत्रों में होता है। इ

         सके अतिरिक्त राजस्थान में खेतरी कर्नाटक में चित्तलदुर्ग एवं हासन, आंध्र प्रदेश में नेलोर, कुर्नूल, अनन्तपुर एवं गुन्दूर मध्य प्रदेश में जबलपुर, बालाघाट, होशंगाबाद, सागर एवं बस्तर और उत्तराचल में गढ़वाल, देहरादून एवं अल्मोड़ा जनपदों में ताँबा भण्डार मिला है। भारत का उत्पादन अपनी आवश्यकता से बहुत कम है, जिसके कारण विदेशों से आयात करना पड़ता है। फिलीपीन्स भी एक प्रमुख उत्पादक देश है जिसका अधिकांश उत्पादन अमेरिका एवं जापान को निर्यात किया जाता है। 

       ताँबा उत्पादन में आस्ट्रेलिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। यहाँ क्वीन्सलैण्ड, न्यूसाउथवेल्स और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ताँबे का भण्डार मिला है। आस्ट्रेलिया एक महत्त्वपूर्ण निर्यातक बनता जा रहा है। 2006 में इसका उत्पादन 875 मीटरी टन था, जो विश्व उत्पादन का 5.8 प्रतिशत है।

विश्व व्यापार

       ताँबे का विश्व व्यापार बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सभी देशों को इसकी आवश्यकता है। विकसित देशों में तो इसकी सबसे अधिक खपत है। विश्व के निर्यातकों में चिली, जिम्मबावे, कनाडा, जाम्बिया, जायरे, मैक्सिको विशेष उल्लेखनीय हैं। आयतकों में ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, फ्रान्स, रूस, भारत, आदि का नाम अग्रणी है।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन पर प्रकाश डालें।

7. Distribution and Production of Iron ore in world (विश्व में लौह अयस्क के वितरण एवं उत्पादन)

7. Distribution and Production of Iron ore in world

(विश्व में लौह अयस्क के वितरण एवं उत्पादन)



Production of Iron     

           आज लोहा यांत्रिक युग की धुरी बन गया है क्योंकि अधिकांश यंत्र इसी से बनाये जा रहे हैं। इसकी कठोरता, टिकाऊपन और अन्य धातुओं के साथ मिलकर मजबूत बनने की क्षमता के कारण इसका उपयोग दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। लोहे का सक्षम विकल्प अभी तक सामने नहीं आया है।

       विश्व में अति प्राचीन काल से लौह खनिज का उपयोग मनुष्य करता रहा है। भारत में लौह खनिज के उपयोग का इतिहास लोहे की खोज के साथ जुड़ा है। दिल्ली में कुतुबमीनार के प्रांगण में स्थित लौह स्तम्भ विदेशी धातु विज्ञानियों के लिए एक आश्चर्यजनक निर्माण है। जंक रहित लोहा बनाने की कला का यह अनूठा प्रयोग है।

 लौह अयस्क के प्रकार-

        लौह अयस्क को लोहे के अंश के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया जाता है:

(i) मैग्नेटाइट (Magnetite) Fe3O4: यह सर्वोत्तम किस्म का लौह अयस्क होता है, जिसमें लोहे की मात्रा लगभग 72% होती है। इसमें वाष्प की मात्रा सबसे कम होती है एवं इसका रंग काला होता है।

(ii) हेमाटाइट (Hematite) Fe2O2: यह लोहे का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जिसमें लोहे का अंश लगभग 70 प्रतिशत होता है। इसका रंग लाल एवं कत्थई होता है।

(iii) लिमोनाइट (Limonite) 3Fe2O3 3H2O: इसमें धातु का अंश 60 प्रतिशत तक रहता है। इसका रंग पीला होता है। इसका रंग पीला या भूरा होता है।

(iv) सिडेराइट (Siderite) FeCO3: यह सर्वाधिक निम्न कोटि का अयस्क है, जिसमें लोहे का अंश 48 प्रतिशत होता है। यह राख के रंग का होता है

विश्व में लौह अयस्क का संचित भण्डार-

          पृथ्वी के धरातल के निर्माण में लौह तत्त्व की मात्रा लगभग 5 प्रतिशत है। फलतः यह प्रायः सर्वत्र पाया जाने वाला खनिज है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत धात्विक सम्पन्नता का लौह खनिज भण्डार 3700 अरब मीटरी टन है। 

विश्व में  लौह अयस्क का संचित भंडार का प्रतिशत

देश  प्रतिशत
यूक्रेन 18.9
ब्राजील 16.5
रूस 15.1
चीन 12.4
आस्ट्रेलिया 10.8
कजाकिस्तान  5.1
संयुक्त राज्य अमेरिका 4.1
भारत 2.6
स्वीडेन 2.1
वेनेजुएला 1.6
अन्य 11.0

          इस प्रकार विश्व के दस देश 89 प्रतिशत से अधिक लौह अयस्क भण्डार संजोए हुए हैं। शेष 11 प्रतिशत बाकी विश्व के देशों में पाया जाता है।

लौह अयस्क का उत्पादन

     विश्व के 45 देशों में लौह अयस्क का उत्पादन होता है। प्रमुख उत्पादक देश रूस, चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत तथा कनाडा हैं। अन्य उत्पादक देश दक्षिण अफ्रीका गणराज्य, लाइबेरिया, नाइजीरिया, फ्रांस, स्वीडन, स्पेन आदि हैं।

      लौह अयस्क का उत्पादन उपयोग पर आधारित होता है, फलत: विकसित देशों में इसकी माँग अधिक होने से उत्खन्न भी अधिक होता है। 1960 ई० तक विश्व का लौह अयस्क उत्पादन 2565 लाख मीट्रिक टन और 2006 में 18000 लाख मीट्रिक टन हो गया। इससे स्पष्ट है कि दिनोदिन लौह अयस्क की माँग बढ़ती जा रही है।

विश्व के प्रमुख देशों में लौह अयस्क उत्पादन (2021)
देश उत्पादन (मिलियन टन)
चीन 340
आस्ट्रेलिया 900
ब्राजील 490
भारत 250
रूस 95
दक्षिणीअफ्रीका 81
संयुक्त राज्य अमेरिका 60
कनाडा 49

1. चीन-

      यहाँ सामान्य स्तर के लौह अयस्क का विशाल भण्डार है जिसमें धातु सम्पन्नता चालीस प्रतिशत के आस-पास है। यहाँ का संचित भण्डार अभी परिवहन मार्गो की कमी के कारण उपयोग में नहीं लाया जा रहा है क्योंकि भण्डार दूर-दराज के इलाकों में स्थित है।

        चीन में लौह उत्खनन का तीव्र विकास 1950 के बाद शुरू हुआ जब घरेलु खपत के साथ निर्यात भी उत्पन्न हो गया। वर्तमान सूचनाओं के अनुसार चीन सर्वाधिक 58.8 करोड़ मीटरी टन से अधिक लौह-अयस्क स्थानान्तरित कर रहा है। हाल के वर्षों में तीव्र उत्पादन के कारण वह विश्व का प्रथम बड़ा लौह उत्पादक देश बन गया है। यहाँ का लगभग आधा संरक्षित भण्डार दक्षिणी मंचूरिया में है, जिसमें आशन-चांगलिंग एवं पेन्की क्षेत्र प्रमुख उत्पादक हैं।

2. ब्राजील-

        लौह अयस्क के उत्पादन में ब्राजील विश्व का दूसरा बड़ा उत्पादक देश बन गया है जो इसके उच्चकोटि के लौह अयस्क, विदेशी माँग और अनुकूल परिस्थिति में निक्षेपण के कारण सम्भव हुआ है। 1960 में यह विश्व का दसवाँ बड़ा उत्पादक था लेकिन इसके बाद उत्पादन तीव्र गति से बढ़ा और उछल कर यह दूसरे स्थान पर चला गया। यहाँ विश्व का 17.7 प्रतिशत लौह अयस्क भण्डार मिनास-गेरास राज्य के पठारी भाग में है। यही क्षेत्र उत्पादन में भी अग्रणी है।

3. आस्ट्रेलिया-

      आस्ट्रेलिया में लौह खनिज का उत्पादन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। 1960 की तुलना में यहाँ का उत्पादन लगभग डेढ़ गुना हो गया है। यह विश्व का लगभग 15.3 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित करता है और विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है।

4. भारत-

       यह विश्व का चौथा बड़ा लौह अयस्क उत्पादक देश हो गया है, जो आन्तरिक खपत और विदेशी माँग के कारण अपने उत्पादन को निरन्तर बढ़ाता रहा है। भारत में चीन के बाद एशिया का सबसे बड़ा लौह अयस्क भण्डार उपलब्ध है। यहाँ का लौह-अयस्क उच्च कोटि का है, जिससे इसकी विदेशी माँग बढ़ती जा रही है। 2006 में भारत का उत्पादन 1600 लाख मीटरी टन से अधिक था, जो विश्व उत्पादन का 8.9 प्रतिशत है।

5. रूस-

        रूस विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक रहा है, जो 1958 के बाद निरन्तर अपना प्रथम स्थान बनाये हुए था। यह अकेले विश्व का एक चौथाई से अधिक लोहा उत्खनित करता रहा है। रूस के विघटन के बाद यहाँ विश्व का 15.1 प्रतिशत लौह भण्डार सुरक्षित है। यहाँ 30 क्षेत्रों में उत्खनन कार्य किया जा रहा है।

6. यूक्रेन-

       दक्षिणी यूक्रेन में स्थित क्षेत्रों से उच्च कोटि का हेमाटाइट लौह अयस्क निकाला जाता है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और धात्विक सम्पन्नता के कारण यह पूर्व सोवियत संघ का सर्वश्रेष्ठ खनिज लौह उत्पादक क्षेत्र रहा है, हालांकि कोयले का क्षेत्र (डोनवास) इससे 400 किमी० की दूर है।

         यहाँ का अधिकांश उत्पादन यूक्रेन और मास्को-तुला क्षेत्र में प्रयुक्त होता है। यहाँ का कुछ उत्पादन पूर्वी यूरोप के इस्पात केन्द्रों को भी भेजा जाता रहा है। क्रिबोईराग यूक्रेन का सबसे बड़ा लौह-अयस्क उत्पादन क्षेत्र है। 2006 में यहाँ का उत्पादन विश्व का 4.1 प्रतिशत था।

7. संयुक्त राज्य अमेरिका-

         उच्च कोटि का लौह अयस्क, सुविधाजनक स्थिति, पर्याप्त रक्षित भण्डार, उन्नत प्रावधिकी और पर्याप्त माँग के कारण 1958 तक संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का अग्रणी लौह अयस्क उत्पादक देश था। राष्ट्रीय संरक्षण नीति के कारण इसका उत्पादन नियंत्रित कर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप अब यह विश्व का सातवाँ बड़ा उत्पादक हो गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पाँच क्षेत्र रक्षित भण्डार और उत्पादन दोनों के दृष्टिकोण से अग्रणी हैं। 2006 में यहाँ विश्व का केवल 2.9 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित हुआ था।

8. दक्षिणी अफ्रीका संघ-

        दक्षिणी अफ्रीका संघ में लौह धातु का उत्खनन अप्रत्याशित गति से बढ़ा है। 1960 में यह विश्व का मात्र एक प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित करता था लेकिन 2006 में इसका हिस्सा बढ़कर 2.3 प्रतिशत हो गया है। स्पष्ट है कि लौह अयस्क का उत्पादन व्यापारिक कारणों से अधिक बढ़ा है। यहाँ का अधिकांश लौह अयस्क निर्यात किया जाता है।

         यहाँ की लौह अयस्क की खानें ट्रांसवाल, आरेन्ज फ्री स्टेट और कपेटाउन प्रान्तों में स्थित हैं जो रेल मार्गों से सेवित हैं इन्हीं खानों के निकट मैगनीज और कोयले की खानें भी स्थित हैं।

9. कनाडा-

         कनाडा का लौह खनिज भण्डार उच्च कोटि का है। देश में सीमित माँग के बावजूद संयुक्त राज्य अमेरिका की बढ़ती माँग और जल यातायात की सुविधा के कारण यहाँ का उत्पादन तीव्र गति से बढ़ रहा है। 1948 में यहाँ मात्र चौदह लाख टन लौह खनिज का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर 2006 में 3.4 करोड़ मीटरी टन से अधिक हो गया है। कनाडा की प्रमुख खानें लेब्रोडोर (शेफलतिल) ओन्टोरिया, नेवस्का, क्यूवेक, ब्रिटिश कोलम्बिया तथा न्यूफाउण्डलैण्ड में हैं। यह विश्व का 9वाँ बड़ा उत्पादक है। 2006 में यहाँ विश्व का 1.9 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित हुआ था।

10. स्वीडन-

         स्वीडेन तीव्र उत्पादन के कारण यूरोप का प्रमुख लौह उत्पादक देश बन गया है। 2006 में यहाँ का उत्पादन 236 लाख मीटरी टन था, जो विश्व उत्पादन का 1.3 प्रतिशत है। उच्चकोटि के लौह खनिज के कारण स्वीडेन के लौह खनिज की अधिक माँग है।

11. वेनेजुएला-

         यह विश्व का ग्यारहवाँ प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देश है, जो 1960 के बाद अपना उत्पादन तीव्र गति से बढ़ाने में सफलता प्राप्त कर सका है। यहाँ का लौह अयस्क उच्चकोटि का है, जिसकी माँग संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों में है। इस देश की आय का लगभग तीस प्रतिशत भाग अयस्क नियत से प्राप्त होता है। 2006 में यहाँ विश्व का 1.3 प्रतिशत लौह-अयस्क उत्पादित हुआ था। वेनेजुएला में अधिकांश उत्पादन सेन बोलिवार तथा एलपाओ की खानों से प्राप्त किया जाता है ,यहाँ की संचित राशि बहुत अधिक है।

लैटिन अमेरिका के अन्य देश-

         चिली और पेरू लैटिन अमेरिका के अन्य महत्त्वपूर्ण देश है जहाँ लौह अयस्क का उत्पादन तीव्र गति से बढ़ रहा है। इन देशों में कोयले की कमी के कारण अधिकांश उत्खनन निर्यात के लिए किया जाता है। चिली के तटीय भाग में वृन्तोको तथा रामेन्ल क्षेत्रों से अधिकांश लौह अयस्क प्राप्त किया जाता है। पेरू की खाने मारकोना एवं अकोर में हैं। जहाँ उच्चकोटि का लौह-अयस्क प्राप्त किया जाता है।

यूरोप के लौह-अयस्क उत्पादक देश-

         यूरोप के प्रमुख उत्पादकों में स्वीडेन के अतिरिक्त फ्रान्स, स्पेन, पूर्व यूगोस्लाविया और नार्वे विशेष उल्लेखनीय हैं। 1960 तक फ्रांस विश्व का चौथा बड़ा लौह उत्पादक देश रहा है, लेकिन अब यहाँ का उत्पादन बहुत तेजी से घटा है फलस्वरूप अब यह विश्व का सोलहवाँ उत्पादक बन गया है।

        फ्रांस के लौह-अयस्क में धातु की मात्रा चालीस प्रतिशत से कम है लेकिन रक्षित भण्डार बहुत अधिक है। लाँगवी, लान्द्रे, ओटाज ओर्न और नेन्सी प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त नारमण्डी, ब्रिटेन एवं मध्यवर्ती पठार में भी छिटपुट जमाव पाया जाता है। स्पेन में उच्चकोटि का अयस्क प्राप्त किया जाता है जिसमें धातु की मात्रा साठ प्रतिशत से अधिक है। यहाँ सबसे अधिक उत्पादन बिलिवाओं क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त पिरेनीज एवं जिब्राल्टर क्षेत्रों में लौह अयस्क प्राप्त किया जाता है।

कजाकिस्तान-

      सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान विश्व का तेरहवाँ प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देश बन गया है, जो 2006 में विश्व का 1.0 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित किया था।

ईरान-

     ईरान विश्व का 1.1 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित कर बारहवें स्थान पर आ गया है।

    विश्व के अन्य प्रमुख उत्पादकों में मैक्सिकों, मारुतानिया, जर्मनी, लाइबेरिया, स्पेन, ब्रिटेन, पेरू, चिली, अल्जीरिया, मोरक्को, ट्यूनिएिशया, मारुतानिया, गैबन, स्वाजीलैण्ड, अंगाला, तुर्की, फिलीपीन्स, मलेशिया एवं इण्डोनेशिया के नाम विशेष उल्लेखनीय है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार-

         वर्ष 1999 में चीन संसार का सबसे बड़ा लौह-आयस्क उत्पादक देश था। इसके बाद ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, भारत तथा रूस का स्थान था। लोहे का विश्व व्यापार काफी बड़ी मात्रा में होता है। ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा एवं भारत लौह अयस्क के प्रमुख निर्यातक देश हैं, जिनका निर्यात व्यापार में हिस्सा 70 प्रतिशत है। अन्य निर्यातक देशों में स्वीडन, लाइबेरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला आदि का नाम आता है।

        जापान विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क आयातक (45 प्रतिशत) देश है। अन्य आयातक देशों में जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, इटली एवं फ्रांस प्रमुख हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व में लौह अयस्क के वितरण एवं उत्पादन की विवचेना करें।

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