35. Types of Agriculture (कृषि के प्रकार)

35. Types of Agriculture

(कृषि के प्रकार)



1. स्थानान्तरणशील कृषि की शुरूआत सर्वप्रथम कहीं से हुई?

(a) इण्डोनेशिया से

(b) थाईलैंड से

(c) कांगो बेसिन से

(d) अमेजन बेसिन से

2. कौन-सी एक विशेषता स्थानांतरित कृषि से सम्बन्धित नहीं है?

(a) मानवीय श्रम की प्रधानता रहती है।

(b) प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

(c) रसदार फलों की खेती होती है।

(d) उर्वरकों का प्रयोग नहीं होता है।

3. लदांग सम्बन्धित है-

(a) बागानी कृषि से

(b) पशुचारण से

(c) स्थानान्तरणशील कृषि से

(d) दुग्ध पशुपालन से

4. लदांग चलवासी कृषि किस देश से सम्बन्धित है?

(a) इण्डोनेशिया

(b) ब्राजील

(c) मलेशिया

(d) श्रीलंका

5. सामान्य जीवन निर्वहन कृषि श्रीलंका में निम्न में से किस नाम से जानी जाती है?

(a) कोनूको

(b) हुमा

(c) मिल्पा

(d) चेन्ना

6. थाईलैंड में की जाने वाली स्थानान्तरित कृषि को किस नाम से जाना जाता है?

(a) तुंग्या

(b) तमराई

(c) टावी

(d) हुमा

7. वियतनाम एवं लाओस में की जाने वाली स्थानान्तरित कृषि को क्या कहा जाता है?

(a) रे

(b) टावी

(c) तमराई

(d) तुंग्या

8. म्यान्मार में की जाने वाली स्थानान्तरणशील कृषि किस नाम से जानी जाती है?

(a) तमराई

(b) तुंग्या

(c) कैंगिन

(d) रे

9. निम्नलिखित में कौन सही सुमेलित है?

1. श्रीलंका-चेन्ना

2. जायरे- मसोले

3. इंडोनेशिया- हुमा

कूट:

(a) 1 एवं 3

(b) 1 एवं 2

(c) 2 एवं 3

(d) 1, 2 एवं 3

10. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) टावी- मालागासी

(b) मसोले- कांगो

(c) चेन्ना- म्यान्मार

(d) तमराई- थाईलैंड

11. निम्नलिखित में कौन सुमेलित नहीं है?

(a) रे- वियतनाम

(b) रोका- ब्राजील

(c) कैंगिन- फिलीपीन्स

(d) लदांग- म्यान्मार

12. ट्रक फार्मिंग (Truck Farming) का अभिप्राय है-

(a) रेशम कीट पालन से

(b) अंगूर की खेती से

(c) बागवानी कृषि से

(d) जलज कृषि से

13. महानगरों के बाहरी भाग में की जाने वाली फलों, सब्जियों एवं फूलों की गहन कृषि को कहा जाता है-

(a) उद्यान कृषि

(b) बाजार कृषि

(c) ट्रक फार्मिंग

(d) इनमें से सभी

14. डेयरी फार्मिंग के लिए आवश्यकता होती है-

(a) अधिक पूँजी, कम श्रम

(b) कम पूँजी, अधिक श्रम

(c) अधिक पूँजी, अधिक श्रम

(d) कम पूँजी, कम श्रम

15. मिश्रित कृषि सम्बन्धित है-

(a) एक ही फार्म पर दो या उससे अधिक फसलों की कृषि से

(b) आधुनिक विधियों द्वारा खेती करने से

(c) एक ही फार्म पर फसल उत्पादन एवं पशुपालन से

(d) एक ही फार्म पर फसल उत्पादन एवं बागवानी से

16. बागानी कृषि की प्रमुख विशेषता है-

(a) एक फसली उत्पादन

(b) विभिन्न समूहों में विविध फसलों का उत्पादन

(c) बड़े फार्मों पर पशुपालन एवं फसल उत्पादन

(d) फलदार वृक्षों की कृषि

17. विश्व में बागानी कृषि का सर्वाधिक विकास कहाँ हुआ है?

(a) मध्य अमेरिका

(b) अमेजन बेसिन

(c) कांगो बेसिन

(d) दक्षिण पूर्वी एशिया

18. सघन खेती के लिए खेतिहर क्षेत्र होना चाहिए-

(a) अधिक वर्षा वाला

(b) कम वर्षा वाला

(c) सिंचित

(d) असिंचित

19. बिना सिंचाई की सहायता से की जाने वाली तर खेती (Wet Farming) के लिए वार्षिक वर्षा की कितनी मात्रा आवश्यक होती है?

(a) 50 सेमी० से कम

(b) 50 से 100 सेमी०

(c) 100 से 200 सेमी ०

(d) 200 सेमी० से अधिक

20. सर्वाधिक सघन खेती प्रचलित है-

(a) चीन में

(b) भारत में

(c) इण्डोनेशिया में

(d) जापान में

21. बागानी कृषि के अन्तर्गत नहीं आता है-

(a) नारियल

(b) चावल

(c) कहवा

(d) रबड़

22. खाद्यान्न कृषि के अन्तर्गत नहीं आता है-

(a) चावल की कृषि

(b) गेहूँ की कृषि

(c) गन्ना की कृषि

(d) मक्का की कृषि

23. किस प्रकार की कृषि के अन्तर्गत बड़े-बड़े फार्मों की स्थापना करके कारखानों की भांति किसी एक ही फसल की कृषि की जाती है?

(a) गहन कृषि

(b) विस्तृत कृषि

(c) जीविका कृषि

(d) रोपण अथवा बागानी कृषि

24. विश्व में किस प्रकार की कृषि का सर्वाधिक प्रचलन है?

(a) गहन कृषि

(b) विस्तृत कृषि

(c) स्थानबद्ध कृषि

(d) बागानी कृषि

25. स्थानान्तरणशील कृषि के बिल्कुल विपरीत कृषि पद्धति है-

(a) जीविका कृषि

(b) स्थानबद्ध कृषि

(c) गहन कृषि

(d) विस्तृत कृषि

26. स्थानान्तरणशील कृषि का अन्य नाम है

(b) काटना एवं जलाना

(a) बुश फेलो कृषि

(c) उपर्युक्त दोनों

(d) इनमें से कोई नहीं

27. किस प्रकार की कृषि में फसलों का अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए भूमि की प्रत्येक इकाई पर अधिक मात्रा में पूँजी एवं श्रम का प्रयोग किया जाता है?

(a) जीविका कृषि

(b) गहन कृषि

(c) विस्तृत कृषि

(d) रोपण कृषि

28. विस्तृत आकार वाले खेतों पर यांत्रिक विधियों से की जाने वाली कृषि कहलाती है-

(a) गहन कृषि

(b) गहन जीविका कृषि

(c) विस्तृत कृषि

(d) बागानी कृषि

29. व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली सब्जियों एवं फलों-फूलों की कृषि जिसके परिवहन में ट्रकों का अधिक उपयोग होता है, कहलाता है-

(a) मार्केट फार्मिंग

(b) ट्रक फार्मिंग

(c) डेयरी फार्मिंग

(d) हाइड्रोपोनिक्स

30. पूर्व सोवियत संघ का स्टेपी, संयुक्त राज्य अमेरिका का मध्यवर्ती एवं पश्चिमी मैदानी भाग, कनाडा का प्रेयरी क्षेत्र, अर्जेण्टीना का पम्पास क्षेत्र तथा आस्ट्रेलिया का डाउन्स क्षेत्र किस प्रकार की कृषि के लिये प्रसिद्ध है?

(a) गहन जीविका कृषि

(b) गहन कृषि

(c) विस्तृत कृषि

(d) बागानी कृषि

31. निम्न में से कौन ट्रक फार्मिंग का दूसरा नाम है-

(a) रेशम उत्पादन कृषि

(b) अंगूरोत्पादन कृषि

(c) फल कृषि

(d) विपणन बागवानी

32. गहन कृषि से सम्बन्धित नहीं है-

(a) नीदरलैंड में सब्जी की कृषि

(b) कैलीफोर्निया में फलों की कृषि

(c) द० पू० एशिया में धान की कृषि

(d) कनाडा में गेहूँ की कृषि

33. निम्नलिखित में कौन-सा तत्व विस्तृत कृषि में समाविष्ट नहीं है?

(a) प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन

(b) प्रति व्यक्ति अधिक उत्पादन

(c) प्रति फार्म बड़ा भू-भाग

(d) प्रति फार्म अधिक आय

34. एशिया महाद्वीप के मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों तथा जहाँ जनसंख्या का बहुत अधिक घनत्व पाया जाता है, में किस प्रकार की कृषि की जाती है?

(a) गहन कृषि

(b) विस्तृत कृषि

(c) मिश्रित कृषि

(d) गहन जीविका कृषि

35. रेशम के उत्पादन हेतु व्यापारिक स्तर पर रेशम के कीड़ों का पाला जाना क्या कहलाता है?

(a) सिल्वीकल्चर

(b) सेरीकल्चर

(c) एपीकल्चर

(d) विटीकल्चर

36. व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु समुद्री जीवों के उत्पादन की क्रिया क्या कहलाती है?

(a) पीसीकल्चर

(b) एपीकल्चर

(c) मेरीकल्चर

(d) हार्टीकल्चर

37. व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली मछली पालन की क्रिया को क्या कहा जाता है?

(a) विटीकल्चर

(c) सिल्वीकल्चर

(b) मेरीकल्चर

(d) पीसीकल्चर

38. वनों के संरक्षण एवं सम्वर्द्धन से सम्बन्धित क्रिया क्या कहलाती है?

(a) एपीकल्चर

(b) सिल्वीकल्चर

(c) हार्टीकल्चर

(d) ओलेरीकल्चर

39. व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली फूलों की कृषि को क्या कहा जाता है?

(a) फ्लोरीकल्चर

(b) हार्टीकल्चर

(c) एपीकल्चर

(d) वेजीकल्चर

40. व्यापारिक स्तर पर किया जाने वाला विभिन्न प्रकार के फलों का उत्पादन कहलाता है-

(a) एपीकल्चर

(b) हार्टीकल्चर

(c) मेरीकल्चर

(d) सिल्वीकल्चर

41. व्यापारिक स्तर पर शहद उत्पादन हेतु किया जाने वाला मधुमक्खी या मौन पालन का कार्य कहलाता है-

(a) विटीकल्चर

(b) पिसीकल्चर

(c) मेरीकल्चर

(d) एपीकल्चर

42. जमीन पर फैलने वाली सब्जियों की व्यापारिक कृषि कहलाती है-

(a) वेजीकल्चर

(b) ओलेरीकल्चर

(c) आरबोरीकल्चर

(d) एपीकल्चर

43. सेरीकल्चर का सम्बन्ध है-

(a) लाख से

(b) रेशम कीट से

(c) मधुमक्खी से

(d) मछली से

44. मेरीकल्चर में किसका उत्पादन किया जाता है?

(a) वृक्षों तथा झाड़ियों का

(b) फूलों का

(c) समुद्री जीवों का

(d) मधुमक्खियों का

45. सुमेलित कीजिए-

सूची-I  सूची-II

A. एपीकल्चर 1. रेशम उत्पादन

B. सेरीकल्चर 2. शहद उत्पादन

C. पीसीकल्चर 3. अंगूर उत्पादन

D. विटीकल्चर 4. मत्स्य उत्पादन

कूट:

       A B C D

(a) 1 2 3 4

(b) 2 1 4 3

(c) 2 1 3 4

(d) 1 2 4 3

46. सुमेलित कीजिए-

सूची-I     सूची-II

A. फ्लोरीकल्चर 1. वन संरक्षण व सम्बर्द्धन

B. सिल्वीकल्चर 2. फूलों की कृषि

C. मेरीकल्चर   3. फलों का उत्पादन

D. हार्टीकल्चर 4. समुद्री जीवों का उत्पादन

कूट: A B C D

(a) 1 2 3 4

(b) 2 1 4 3

(c) 2 1 3 4

(d) 4 2 3 1

36. World Fishing (विश्व मत्स्यन)

36. World Fishing

(विश्व मत्स्यन)



1. मत्स्यन किस प्रकार की आर्थिक क्रिया है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

2. व्यापारिक रूप से मत्स्य पालन का व्यवसाय क्या कहलाता है?

(a) विटीकल्चर

(b) सेरीकल्चर

(c) एपीकल्चर

(d) पिसीकल्चर

3. नीली क्रांति (Blue revolution) निम्न में से किससे सम्बन्धित है?

(a) अन्तरिक्ष अनुसंधान

(b) मत्स्य पालन

(c) नील की खेती

(d) इनमें से कोई नहीं

4. प्लैंकटन (Plankton) है-

(a) वन

(b) धूमकेतु

(c) कृत्रिम उपग्रह

(d) समुद्री मछलियों का भोजन

5. मछलियों का सबसे अधिक केन्द्रीयकरण छिछले तटीय जल में पाया जाता है क्योंकि इन भागों में सहयोगी कारक है-

(a) गर्म जल

(b) स्वच्छ जल

(c) अत्यधिक प्लैंकटन

(d) समुद्री जलधाराओं से सुरक्षा

6. हेरिंग पॉण्ड (Hering Pond) के नाम से जाना जाता है-

(a) प्रशान्त महासागर

(b) अटलांटिक महासागर

(c) हिन्द महासागर

(d) आर्कटिक महासागर

7. मत्स्य उद्योग के विशेष रूप से उत्तरी गोलार्द्ध में ही विकसित होने का कारण है-

(a) उथले सागर

(b) स्थल खण्डों की अधिकता

(c) गर्म एवं ठंडी जल धाराओं का सम्मिलन

(d) उपर्युक्त सभी

8. संसार के प्रमुख मत्स्य ग्रहण क्षेत्रों में सम्मिलित नहीं है-

(a) उत्तर पश्चिम प्रशांत महासागर

(b) उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर

(c) उत्तर पूर्वी अटलांटिक महासागर

(d) दक्षिणी हिन्द महासागर

9. विश्व का लगभग एक तिहाई मत्स्योत्पादन प्राप्त होता है-

(a) उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर से

(b) उत्तर पूर्व अटलांटिक महासागर से

(c) उत्तर पश्चिम प्रशान्त महासागर से

(d) दक्षिण पूर्व प्रशान्त महासागर से

10. मत्स्य उद्योग की दृष्टि से कौन-सा देश महत्वपूर्ण है?

(a) चीन

(b) नार्वे

(c) इण्डोनेशिया

(d) भारत

11. विश्व का वृहत्तम मत्स्य आहरण क्षेत्र है-

(a) कैरेबियन सागर

(b) चेसापीक खाड़ी

(c) ग्रैंड बैंक

(d) नोवा-स्कोशिया

12. प्रसिद्ध मत्स्य क्षेत्र ‘ग्रैंड बैंक’ स्थित है-

(a) प्रशान्त महासागर में

(b) अटलांटिक महासागर में

(c) हिन्द महासागर में

(d) आर्कटिक महासागर में

13. विश्व का एक प्रमुख मत्स्यन क्षेत्र ‘डॉगर बैंक’ कहाँ स्थित है?

(a) बाल्टिक सागर में

(b) उत्तरी सागर में

(c) बोथनिया की खाड़ी में

(d) इंगलिश चैनल में

14. चेसापीक खाड़ी जो कि ओयस्टर पकड़ने के लिए प्रसिद्ध है, स्थित है-

(a) फ्रांस के तट के निकट

(b) नार्वे के तट के निकट

(c) यू०एस०ए० के तट के निकट

(d) कनाडा के तट के निकट

15. विश्व में स्वच्छ जल की मछली का सबसे बड़ा उत्पादक देश है-

(a) चीन

(c) बांग्लादेश

(b) भारत

(d) इण्डोनेशिया

16. विश्व में स्वच्छ जल की मछली के उत्पादक देशों का सही अवरोही क्रम है-

(a) चीन, बांग्लादेश, भारत, इण्डोनेशिया

(b) चीन, भारत, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया

(c) भारत, चीन, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया

(d) भारत, बांग्लादेश, चीन, इण्डोनेशिया

17. अटलांटिक महासागर के मत्स्य उत्पादन में कमी आने का मुख्य कारण है-

1. अति मत्स्यन

2. जल प्रदूषण

3. माँग में कमी

4. ग्लोबल वार्मिंग

कूट :

(a) 1 एवं 2

(b) 2 एवं 3

(c) 1, 2 एवं 3

(d) 1, 2, 3 एवं 4

18. मत्स्य ग्रहण क्षेत्र अधिकतर उच्च अक्षांशों में स्थित होते हैं, कारण-

I. तटरेखा का अत्यधिक लंबा होना

II. महाद्वीपीय मग्नतटों का अधिक विस्तार

III. सागरीय जल के तापमान का 20°C से कम होना

IV. कम जनसंख्या

कूट :

(a) I, II एवं III

(b) II, III एवं IV

(c) I एवं II

(d) II एवं IV

19. उष्ण कटिबंधीय महासागरों में मत्स्य उद्योग का विकास काफी कम हुआ है। इसका कारण है-

(a) छिछले सागरों का अभाव

(b) माँग की कमी

(c) संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव

(d) उपर्युक्त सभी

20. ग्रैंड बैंक है-

(a) संयुक्त राज्य अमेरिका का केन्द्रीय बैंक

(b) ग्रेट ब्रिटेन का सुरक्षित खाद्य भंडार

(c) गल्फस्ट्रीम तथा लैब्रोडोर धाराओं का संगम स्थल

(d) इंगलिश चैनल के दोनों तट

9. Eco-Tourism (पारिस्थैतिक पर्यटन)

Eco-Tourism

(पारिस्थैतिक पर्यटन)



           यह दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- पारिस्थैतिकी और दूसरा- पर्यटन। पारिस्थैतिकी का तात्पर्य उस समस्त भौगोलिक तत्त्व से है जो धरातल पर या उसके चारों ओर जैविक एवं अजैविक घटकों के रूप में मौजूद है। पुनः पर्यटन का तात्पर्य स्वेच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर घूमना-फिरना है।

       सदियों से लोग सांस्कृतिक तत्वों को समझने हेतु पर्यटन का सहारा लेते रहे हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में पारिस्थैतिकी के प्रति दिलचस्पी रखने वाले लोग पारिस्थैतिक केन्द्र की ओर आकर्षित होने लगे हैं, जिसे “पारिस्थैतिकी पर्यटन” कहते हैं। भूगोल में पारिस्थैतिकी पर्यटन का विशेष महत्व है क्योंकि एक ओर कई पर्यटक स्थल अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से प्रदूषित हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए पारिस्थैतिक पर्यटन की आवश्यकता पड़ती है। पारिस्थैतिक पर्यटन के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों पर जोर दिया जाता है:-

(1) जैविक, अजैविक तथा सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण दिया जाता है।

(2) पारिस्थैतिकी पर्यटन (Eco-Tourism) स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध करने में सहायक होती है।

(3) पारिस्थैतिक पर्यटन सतत् विकास की अवधारणा के बढ़ावा देता है।

(4) पर्यटन में स्थानीय लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करता है।

(5) पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव की प्राथमिकता दी जाती है।

(6) इस प्रकार के पर्यटन में भौतिक वस्तुओं के कम से कम प्रयोग को बढ़ावा दिया जाता है।

(7) वनस्पति, जीव-जन्तु एवं विभिन्न प्रकार के भौगोलिक स्थलाकृति पारिस्थैतिक पर्यटन के केन्द्र बिन्दु होता है।

      कुछ देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पारिस्थैतिक पर्यटन विशेष योगदान दिया है। जैसे- कोस्टारिका, इक्वेडोर, मेडागास्कर तथा नेपाल इत्यादि। “पारिस्थैतिक पर्यटन संकल्पना” का उदय 1980 के दशक से माना जाता है। भारत में इस प्रकार के पर्यटन का तेजी से विकास हो रहा है। UNO ने वर्ष 2002 को पारिस्थैतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए “पारिस्थैतिकी पर्यटन अन्तरर्राष्ट्रीय वर्ष” की घोषणा की थी।

    भारत में पारिस्थैतिकी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई स्थानीय पहल किये जा रहे हैं:-

(1) जम्मू-कश्मीर सरकार ने लद्दाख के कई गाँवों में पर्यटकों के लिए स्थानीय घरों में रहने की व्यवस्था की है। इससे जो आमदनी होती है, उससे ग्रामीण विकस और पर्यावरण के संरक्षण पर खर्च की जाती है।

(2) नागालैण्ड में कोहिमा के पास एक स्थानीय संस्था के द्वारा पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास हेतु पर्यटकों को प्रशिक्षण देती है।

(3) केरल के पेरियार बाघ संरक्षित क्षेत्र में वन विभाग के अधिकारियों ने “इको- टूरिज्म योजना” का निर्माण कर लागू की है ताकि लोग नजदीक से बाघों की मुआयना करें तथा पर्यावरण को भी हानि नहीं पहुंचे।

(4) सिक्कीम खनचेनजोंगा जीव मण्डल संरक्षित क्षेत्र में लेवचा समुदाय के लोग “पारिस्थैतिकी पर्यटन समिति” चला रहे हैं जो लोगों के प्राकृ‌तिक वातावरण में प्रकृति के साथ रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

(5) पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के डेल्टा पर अवस्थित कुछ गाँव के लोगों में ने “वन्य जीव संरक्षण समाज” की स्थापना की है। यह समाज पारिस्थैतिक पर्यटन की दिशा में सराहनीय कार्य कर रही है।

(6) सरकार विज्ञापनों के मध्यम से पारिस्थैतिक पर्यटन के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ विज्ञापनों से देती है।

(7) राष्ट्रीय जैविक उद्यान, जैवमंडल, अभ्यारण, सफारी इत्यादि निर्माण का एक ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर पारिस्थैतिकी के इन घटकों को बचाने के लिए भी कई प्रयास किये जा रहे हैं। जैसे- पर्यटक स्थलों पर प्लास्टिक वस्तुओं के प्रयोग पर रोक, बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग, कचड़ा प्रबंधन केन्द्रों की स्थापना की जा रही है।

पारिस्थैतिक पर्यटन का प्रभाव

     पारिस्थैतिक पर्यटन के कारण दो प्रकार के प्रभाव देखे जा सकते हैं।

(A) सकारात्मक प्रभाव:-

(1) पारिस्थैतिक के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है।

(2) पारिस्थैतिक तत्वों का संरक्षण एवं उनका विकास हो रहा है।

(B) नकारात्मक प्रभाव:-

(1) ऐसे पर्यटन से पारिस्थैतिक तत्वों का व्यापारीकरण होने लगा है जिसके कारण स्थानीय लोगों के विस्थापन और मौलिक अधिकारों के हनन को बढ़ावा मिला है।

(2) पारिस्थैतिक पर्यटन नीतियों का निर्धारण तो ठीक से करती हैं लेकिन, उसे  धरातल पर आदर्श रूप में लागू नहीं कर पाती है जिसके कारण पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़‌ता है।

(3) पारिस्थैतिक केन्द्रों को अत्याधिक पर्यटकों के आगमन से विभिन्न प्रकार के प्रदुषण की समस्या भी जन्म ले रही है।

(4) पारिस्थैतिक पर्यटन का बूरा प्रभाव जीव-जगत पर पड़ रहा है। जैसे- पशुओं को देखने के लिए, अनका चित्र उतारने के लिए उनसे छेड़-छाड़ करते हैं।

(5) पारिस्थैतिक पर्यटन के विकास से अछूते एवं अप्रयुक्त जंगली, पहाड़ी भूमि का अतिक्रमण होने लगा है।

(6) इस तरह के पर्यटन से याता‌यात साधनों बेहताशा वृद्धि होती है जिसका स्पष्ट प्रभाव जैविक विविधता पर पड़‌ती है।

(7) जंगली जानवरों के व्यापार तथा तस्करी को बढ़ावा मिलता है।

(8) स्थानीय संस्कृति खतरे में पड़ जाती है।

(9) स्थानीय लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(10) पर्यटन स्थलों का सही तरीके से प्रबंधन न होने पर कई प्रकार के सामजिक और आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती है।

निष्कर्ष:

       इस तरह ऊपर के तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पारिस्थैतिक पर्यटन का उद्देश्य भले ही सकारात्मक है लेकिन, इसके कई नकारात्मक प्रभाव पड़े है। अत: इन नकारात्मक समस्याओं से निपटने हेतु ऐसी योजना और रणनीति की आवश्यकता है जो सतत् विकास (पर्यावरण को बिना हानि पहुँचाये) की अवधारणा को आदर्श रूप में लागू कर सके। यह उद्देश्य तभी हासिल हो सकेगा जब पारिस्थैतिक पर्यटन में स्थानीय सहभागिता को बढ़ाया जाएगा। प्रशिक्षित गाइड को उतारा जाएगा एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों को भली- भाँति लागू किया जायेगा।

8. Liberalization (उदारीकरण)

Liberalization

(उदारीकरण)



      भारत द्वारा वर्ष 1991 ई० में आर्थिक सुधार नीति के तहत उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्विकरण की नीति को अपनाया गया था। उदारीकरण की नीति मुख्यतः उद्योगों से जुड़े हुए थे। 1991 ई० के औद्योगिक नीति का मुख्य उद्देश्य दो थे-

(4) भारत का तेजी से आर्थिक विकास करना।

(2) अर्थव्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा के योग्य बनाना।

    जब 1995 में WTO की स्थापना हुई तो भारतीय उदारीकरण को विशेष बल प्राप्त हुआ। भारत के द्वारा अपनायी गयी उदारीकरण की प्रक्रिया की मुख्य विशेषता निम्नलिखित हैं:-

(1) 1991 के औद्योगिक नीति में घोषणा की गई थी कि औद्योगिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोला जायेगा।

उद्योगों में सरकार का प्रशासनिक हस्तक्षेप कम होगा और देश में प्रतिस्पर्द्धात्मक महौल बनाया जायेगा। इसी घोषणा का पालन करते हुए उदारीकरण के नीति को अपनाया गया।

(2) उदारीकरण नीति को अपनाते हुए सरकार ने सभी उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया लेकिन तीन उद्योगों के आरक्षित उद्योग घोषित किया। जैसे- नाभिकीय ऊर्जा, रेल तथा अन्तरिक्ष।

(3) उद्योगों को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया।

(4) प्रतिबंधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1991 में सुधार लाकर विदेशों से पूंजी लाने की सीमा को समाप्त कर दिया गया तथा देशी कंपनियों के अधिग्रहण तथा समावेशन पर से प्रतिबंध हटा दिये गये।

(5) आयात एवं निर्यात से जुड़े हुए प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया।

(6) विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया।

(7) सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया प्रारंभ की गई।

(8) कृषि को उद्योग का दर्जा देते हुए देश में संगठित कृषि तथा ठेका कृषि की शुरुआत की गई।

(9) श्रम कानून और कर संरचना में सुधार लाया गया।

उदारीकरण के प्रभाव

     उदारीकरण की उपयुक्त विशेषताओं के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर चतुर्दिक प्रभाव पड़ा है। प्रभाव को लेकर अर्थशास्त्रियों के मध्य दो तरह के विचार है:-

      प्रथम विचार इसका समर्थन करता है और दूसरा विचार इसका विरोध करता है। फिर भी, उदारीकरण के प्रभाव को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है-

(1) प्रत्याक्ष विदेशी निवेश में तेजी से वृद्धि हुई है। इसका अनुमान बढ़ते हुए विदेशी मुद्रा भण्डार से लगाया जा सकता है।

(2) अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि का अनुमान बढ़ते हुए शेयर बाजार के सूचकांक से लगाया जा सकता है।

(3) सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि 1990-91 ई० में GDP का विकास दर 4% था जो 2023-24 में बढकर 8.2% हो गई।

(4) मंदी का कम प्रभाव-

     पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है फिर भी, भारत की अर्थव्यवस्था का विकास  7.5% दर से हो रहा है।

(5) रोजगार में वृद्धि-

     उदारीकरण नीति के कारण देश में शिक्षित एवं अशिक्षित लोगों को नए-2 रोजगार के अवसर प्रदान हो रहे हैं।

(6) आधारभूत संरचना का विकास-

     देशी एवं विदेशी निवेश के कारण आधारभूत संरचनाओं का विकास तेजी से हो रहा है।

(7) प्रादेशिक असंतुलन में वृद्धि-

      देश का आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है लेकिन, विकसित क्षेत्र और विकसित होने जा रहे हैं तथा पिछड़े क्षेत्र और पिछड़ते जा रहे हैं।

(8) कुटीर एवं लघु उद्योगों पर बूरा प्रभाव पड़ रहा है।

(9) मंहगाई पर नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रही है।

(10) विदेशों से उच्च तकनीक एवं आगमन बड़े पैमाने पर हो रहा है।

(11) आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में कमी आई है।

(12) कृषि क्षेत्र की उपेक्षा अभी जारी है।

(13) संगठित कृषि, ठेका कृषि और SEZ के कारण लगातार विवाद बढ़ते जा रहे है।

निष्कर्ष:

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि उदारीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ रहे हैं फिर भी, सकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक स्वरूप प्रदान करने में सक्षम हो रही है।

7. Nano Technology (नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)

Nano Technology

(नैनो टेक्नोलॉजी क्या है? परिभाषा, उदहारण तथा जोखिम)



प्रश्न प्रारूप

Q. नैनो टेक्नोलॉजी से आप क्या समझते है? उसके संभावित उद्योग पर विस्तार से चर्चा करें या प्रकाश डालें।

उत्तर- नैनो टेक्नोलॉजी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1974 ई० में जापानी विद्वान नोरियो तनीगुची ने किया था। लेकिन यह शब्द 1980 के आस-पास काफी लोकप्रिय हुआ। इस शब्दों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय एरिक ड्रेक्सलर को जाता है। क्योंकि डेक्सलर महोदय ने “इंजन ऑफ क्रिएशन नामक पुस्तक में ‘नैनो टेक’ शब्द का प्रयोग किया और कई संभावित एवं काल्पनिक उपयोग पर प्रकाश डाला।

        ‘नैनो टेक्नोलॉजी’ शब्द दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम- नैनो और द्वितीय- टेक्नोलॉजी। नैनो एक ग्रीक शब्द है जिसका तात्पर्य बौना होता है। यहाँ पर नैनो शब्द नैनो मीटर (10-9 मी०) का संक्षिप्त भाग है। किसी भी एक इकाई (जैसे- 1m या 1 sec या 1g) का अरबवाँ हिस्सा ‘नैनो मीटर’ या नैनो सकेण्ड या ‘नैनो ग्राम’ कहलाता है। दूसरी ओर टेक्नोलोजी का तात्पर्य उस तकनीक या प्रौद्योगिकी से है, जिसके माध्यम से नवीन भौतिक उत्पादों को जन्म दिया जाता है।

       अतः नैनो टेननोलॉजी का तात्पर्य उस तकनीक से है जिसके माध्यम से हम नैनो स्तर के भौतिक उत्पादों का निर्माण कर सकते हैं। विश्व की सबसे प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका (Science) ने नैनो टेक्नोलोजी को वर्ष 2001 का तथा 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ा उपलब्धि माना है।

      वैज्ञानिकों के द्वारा नैनो स्तर पर ही सूक्ष्म निर्माण की दिशा में प्रयोग करने का कारण यह है कि जब स्कूल स्तर से सूक्ष्म स्तर की ओर जाते हैं तो पदार्थों के विशेषताओं में एक खास स्तर तक कोई परिवर्तन नहीं होता है लेकिन एक नियत स्तर के बाद गुणों में परिवर्तन होने लगता है। यह स्तर है- नैनो इकाई (10-9 इकाई)।

        दूसरे शब्दों में परमाणु का औसत का स्तर 10-9 मी० होता है। अतः कोई भी स्थूल पदार्थ जब परमाण्विक स्तर पर (10-9 मी०) अते हैं तो उनके गुण धर्म में परिवर्तन होने लगता है। इसी स्तर को मानकर किया जा रहा शोध एवं अनुसंधान कार्यों से संबंधित प्रक्रिया, निर्मित उत्पाद इत्यादि को नैनो टेक्नोलॉजी कहा जाता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के विकास होने से कई प्रकार के संभावित उपयोग किये जाने की संभावना है। जैसे-

(1) नैनो टेक्नोलोजी के प्रयोग के द्वारा विभिन्न यौगिक के बंधन संरचना को बदलकर और उन्हें आपस में मिलाकर एक नये पदार्थ का निर्माण किया जा सकता है। जैसे- प्रयोगशाला में कोयला को हीरे में परिवर्तन किया जा सकता है। इसी तरह हवा, धूल, और पानी के अणुओं को दुबारा समायोजन करके फुल, फल इत्यादि बनाया जा सकता है।

        नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से दुनिया भर के लोगों को स्वस्थ्य, शिक्षित और प्रदूषण रहित वातावरण प्रदान किया जा सकता है। इसका समुचित विकास हो जाने पर टिकाऊ विकास, सुरक्षित तथा कुशल उत्पादों का निर्माण, दूर संचार, परिवहन, दवा, कृषि तथा उद्योगों हेतु किया जा सकता है। यह तकनीक उन सारे चीजों को संभव बना सकता है जो अभी कल्पना के स्तर पर है।

        जैसे- नैनो टेक्नोलोजी और बायोटेक्नोलोजी के संयोग से मानव को विलुप्त किया जा सकता है। गंतव्य स्थान पर कुछ सेकेण्ड में भेजा जा सकता है तथा उन्हें पुनः प्रकट किया जा सकता है। इच्छा के अनुसार किसी भी वस्तु के आकार को बदला जा सकता है तथा कम लागत में अच्छे गुणो वाले उत्पादों के निर्माण किया जा सकता है।

     वर्तमान समय में विश्व के अलग-2 देशों में नैनो टेक्नोलॉजी पर अनुसंधान का कार्य चल रहा है। यह टेक्नोलॉजी जहाँ एक ओर विकास की नवीन द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी ओर संभावित खतरे उत्पन्न करेंगे। जैसे- अगर किसी भी पदार्थ के कण को नैनो स्तर (10–9 मी०) पर विभाजित किया जाता है तो उसे पुनः विभक्त कर और नष्ट नहीं कि जा सकता है।

      नैनो कण मानव के शरीर में सांस के जरिये, गले के जरिये, त्वचा एवं इंजेक्शन के जरिये शरीर के कोशिका में पहुंचकर अनेक प्रकार के बीमारियाँ उत्पन्न कर सकती है। ये कण किसी जीव के अन्दर पहुंचकर किस तरह का व्यवहार करेंगें? यह अभी अज्ञात है।

        ये कण शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर सकते हैं। शरीर में इन्जाइम, प्रोटीन और DNA के निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण स्वरूप वैज्ञानिकों ने कार्बन पर आधारित एक कार्बन नैनो ट्यूब का निर्माण किया है। इसमें कार्बन-60 नामक समस्थानिक का प्रयोग किया गया है। यह समस्थानिक काफी रेडियो सक्रिय होता है। अगर कहीं पर कार्बन ट्यूब का प्रयोग किया जाता है तो वह उत्पाद रेडियो सक्रियता से कैसे बच सकता है।

     नैनो टेक्नोलॉजी से कई प्रकार के पर्यावरणीय संबंधी खतरे उत्पन्न हो सकते है। जैसे- पर्यावरण में नैनो पार्टिकिल के माध्यम/मौजूदगी से वायु, जल, अंतरीक्ष, मृदा इत्यादि प्रदूषित हो सकते हैं।

उपलब्धि

(1) कार्बन नैनो ट्यूबश (CNTs):-

     नैनो तकनीक से विकसित किया गया यह एक ऐसा निर्वात नली है जो शीशे के बजाए कार्बन अणुओं से बनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन के अणु काफी अभिक्रियाशील होते हैं। वे दूसरे पदार्थों के सम्पर्क में आकर उनके साथ किसी तरह के प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। अतः कार्बन ट्यूब का प्रयोग आदर्श कन्टेनर के रूप में किया जा सकता है। इनमें कोई पदार्थ भरकर इन्हें शीलबन्द कि जा सकता और उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है।

      CNTs को जोड़‌कर तार जैसी संरचना बनायी जा सकती है और कई पदार्थों का आसानी से परिवहन किया जा सकता है। शरीर के अन्दर किसी विशेष जगह पर केन्सर की दवा नैनो ट्यूबश के माध्यम से आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद अल्ट्रा वॉयलेट तरंग के जरिये उन नलिकाओं को तोड़‌कर दवा को सही स्थान पर फैलाया जा सकता है।

(2) प्रकाश अथवा कण माधारित पैनी टेक्नोलोजी:-

     यह ज्ञात है कि प्रकाश कण और तरंग दोनों की तरह व्यवहार करते हैं। अगर इस टेक्नोलॉजी की विकास हो जाता है तो इसके जरिये बिना तार के इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान संभव हो जायेगा। परमाणु के प्रत्येक इलेक्ट्रॉन को अपनी इच्छानुसार तोड़ा-मड़ोड़ा जा सकता है।

(3) नैनों क्रिस्टल:-

     ध्वनि तरंगों के साथ नैनो कण प्रतिक्रिया करना प्रारंभ कर देगी। नैनो- क्रिस्टल किसी दृश्यमान स्रोत को रंग बदलकर विलुप्त कर देगी। नैनो क्रिस्टल का प्रयोग गाड़ियों के विभिन्न पार्ट्स बनाने में किया जा सकेगा। इससे ऑटोमोबाइल क्षेत्र में नवीन क्रान्ति का युग प्रारंभ होने वाला है।

(4) DNA कम्प्यूटिंग:-

     DNA नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसी भी जीव के DNA में मनचाहा परिवर्तन करके नये-2 जीवों में विकास किया जा सकता है।

(5) क्वांटम नैनो टेक्नोलॉजी:-

      नैनो टेक्नोलॉजी वस्तुततः क्वांटम टेक्नोलॉजी ही है। इसके माध्यम से परमाणु के इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का नियंत्रण संभव हो जायेगा। इसी तरह से रेडिकल नैनो टेक्नोलॉजी, आण्विक नैनो टेक्नोलॉजी इत्यादि का भी विकास किया जा रहा है।

     विश्व के अलग-2 देशों में नैनो- टेक्नोलॉजी पर इसके संभावना को देखते हुए कई तरह के कार्यक्रम चल रहें है। भारत में इस पर अनुसंधान हैदराबाद तथा बंगलोर में किया जा रहा है।

निष्कर्ष

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नैनो टेक्नोलॉजी भविष्य में जहाँ कई संभावित द्वार को खोल सकेगा वहीं दूसरी और कई विसंगतियों को जन्म देगा। अतः इस तकनीक को सावधानी पूर्वक विकसित करने की आवश्यकता है।

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