23. The Industrial Regions of Japan (जापान के औद्योगिक क्षेत्र)

23. The Industrial Regions of Japan

(जापान के औद्योगिक क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. जापान के औद्योगिक क्षेत्र पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Industrial regions of Japan.)

उत्तर-

जापान के औद्योगिक प्रदेश-

    उद्योगों की स्थापना की दृष्टि से जापान प्राचीन काल से ही एक विकसित देश रहा है, जहाँ पहले परम्परागत हस्त उद्योगों में उत्पादन होता था लेकिन 1870 के बाद जापान के उद्योगों में स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन कार्य होने लगा। प्राचीन उद्योग रेशमी वस्त्र, चीनी मिट्टी के बर्तन, पोशाक, खिलौने, हस्त कलाकारी की वस्तुओं आदि का उत्पादन हाथ के बजाय स्वचालित मशीनों द्वारा होने लगा।

     निर्मित माल की विदेशों में बढ़ती हुई माँग को देखते हुए जापान सरकार ने 1930 के बाद भारी उद्योगों की स्थापना पर अधिक बल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के समय में जापान में लोह इस्पात तथा विविध इंजीनियरिंग उद्योगों का विकास तीव्र गति से हुआ। सूती वस्त्र उद्योग जापान का प्राचीन उद्योग है जिसमें स्वचालित मशीनों द्वारा उत्पादन होने के कारण जापान का मुख्य उद्योग बन गया।

    1945 में आणविक बम विस्फोटों से अधिकतर उद्योग नष्ट हो गए थे लेकिन 1950 के बाद जापान सरकार की औद्योगिक नीति के द्वारा उद्योगों का सर्वाधिक विकास हुआ। जापान विश्व में संयुक्त राज्य तथा रूस के बाद तीसरा और एशिया में औद्योगिक विकास की दृष्टि से प्रथम स्थान रखता है।

    विविध खनिज पदार्थों की कमी होते हुए भी जापान विदेशों से आयातित कच्चे पदार्थों के आधार पर एक विकसित औद्योगिक देश बन गया है जिसके लिए द्विपीय स्थिति के कारण सस्ता जल परिवहन, कुशल श्रमिक, सघन जनंसख्या, तटीय स्थिति आदि सुविधाओं का प्रमुख योगदान है। जापान में उद्योगों के लिए कच्चा माल अन्य देशों से आयात करने के कारण उद्योगों की स्थापना महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में अधिक हुई है। जापान के निम्नांकित पाँच औद्योगिक प्रदेश प्रमुख हैं-

1. क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश

3. किंकी औद्योगिक प्रदेश

4. किता क्यूशू औद्योगिक प्रदेश

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश

The Industrial Regions of Japan

1. क्वान्तो या टोकियो-याकोहामा औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो प्रदेश जापान के दक्षिण-पूर्व में स्थित जापान का सबसे बड़ा मैदान है जो प्रशान्त महासागर के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित है। क्वान्तो जापान का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है जहाँ टोकियो, याकोहामा, कावासाकी, चीबा, इथिकावा; काबागुची, हिताची, मितो, उरावा, कोगा, कोनोसू, ओमिया, ताबिकावा, तनावा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    क्वान्तो प्रदेश में पर्वतीय क्षेत्र से बहकर आने वाली नदियों से जल की प्राप्ति, तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण जल परिवहन की सुविधा जिसके द्वारा कच्चे पदार्थों के आयात तथा निर्मित माल के निर्यात का प्रमुख यातायात साधन है। सस्ते तथा कुशल श्रमिकों की व्यवस्था, उच्च तकनीकि सुविधाएँ, श्रमिकों की अपने कार्य के प्रति वफादारी, सघन जनसंख्या जिसके कारण पर्याप्त श्रमिक तथा स्थानीय बाजार की व्यवस्था तथा टोकियो जापान की राजधानी होने के साथ-साथ सबसे बड़ा आर्थिक सांस्कृतिक नगर है तथा रेलमार्गों द्वारा जापान के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।

     इन विभिन्न सुविधाओं के कारण यह क्षेत्र जापान का प्रमुख औद्योगिक प्रदेश बन गया है। इस क्षेत्र में लौह-इस्पात, वायुयानों का निर्माण, वस्त्र उद्योग, कृषि यन्त्र, रासायनिक पदार्थ, कागज आदि उद्योग इस क्षेत्र में सघन रूप से अवस्थित हैं।

     टोकियो, कावासाकी, चीता तथा इथिकावा में लौह इस्पात, योकोहामा कावासाकी में भारी धातु निर्माण उद्योग, टोकियो-याकोहामा, कावासाकी उकागा में जलपोत निर्माण, ताविकावा-मिआमी तथा तनावा में वायुयान निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

2. नगोया औद्योगिक प्रदेश:-

    क्वान्तो औद्योगिक प्रदेश के पश्चिम में जापान के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्र में नगोया औद्योगिक प्रदेश स्थित है जहाँ नगोया, गिफू, ओकाजाकी, आकोशी, अन्जो, इशीकी, तायोहाशी, हिकोने, कामेयामा, तजू, ओका, तोबा प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। जापान का यह औद्योगिक प्रदेश वस्त्र निर्माण उद्योगों की स्थापना के लिए प्रसिद्ध है जहाँ सूती, ऊनी, रेशमी तथा कृत्रिम रेयन वस्त्रों के निर्माण उद्योगों की प्रधानता है।

      वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त, मशीन निर्माण, भारी धातु निर्माण, वायुयान तथा जलयान निर्माण, रसायन उद्योग, बिजली के सामान तथा रेल के डिब्बे तथा रेल इंजन निर्माण उद्योग भी अवस्थित हैं। नगोया-वाकायामा जापान के वस्त्र निर्माण के प्रमुख केन्द्र हैं जहाँ वर्तमान में वस्त्र निर्माण के अतिरिक्त मशीन निर्माण उद्योगों की स्थापना भी की गयी है।

     वायुयान निर्माण मिताका तथा इनाबागून में, जलपोत निर्माण उरागा में, मिट्टी के बर्तन गनोया में तथा यातायात के साधनों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग नगोया तथा शिगा में स्थित हैं। इस क्षेत्र में उद्योग स्थापित होने का प्रमुख कारण समतल भूमि, तटीय स्थिति तथा सघन जनसंख्या है।

3. किंकी या कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश:-

     नगोया औद्योगिक प्रदेश के पश्चिमी भाग में तटीय क्षेत्र में स्थित कोबे-ओसाका तथा क्योटो नगरों में किंकी औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। अतः इसे कोबे-ओसाका क्योटो औद्योगिक प्रदेश भी कहते हैं। ओसाका, कोबे-क्योटो, हिमेजी, सकाई फ्यूजे, वाकायामा, नारा, किजू, यवाता, यासू, अवाजी, ओमिजो, अमागासाकी, निशिनोमिया इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं।

    इस क्षेत्र में लोह इस्पात उद्योगों की प्रधानता है। इसके अतिरिक्त ओसाका में सूती, ऊनी, रेशमी, वस्त्र निर्माण उद्योगों की प्रधानता है जिसके कारण इसे जापान का मेनचेस्टर कहा जाता है। जलयान, वायुयान, रासायनिक पदार्थ, मशीन निर्माण तथा खाद्य पदार्थों के निर्माण उद्योग भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र में ओसाका खाड़ी पर स्थित होने के कारण स्वच्छ जल की प्राप्ति तथा सघन जनसंख्या के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध हैं।

4. किता क्यूशू या मौजी नागासाकी औद्योगिक प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में समुद्र तटीय क्षेत्र में इस औद्योगिक प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। यह प्रदेश जापान में लौह-इस्पात उद्योगों की दृष्टि से अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है जहाँ जापान के कुल लौह-इस्पात में उत्पादन का 50 प्रतिशत उत्पादित होता है। तटीय क्षेत्र में स्थिति के कारण तथा एशियाई देशों के समीप स्थित होने के कारण लौह अयस्क, कोयला आदि कच्चे पदार्थ जल परिवहन द्वारा आसानी से आयात कर लिया जाता है।

    निर्मित पदार्थों को जलयानों द्वारा विदेशों में निर्यात कर दिया जाता है। अतः यह प्रदेश पूर्णतया आयातित कच्चे पदार्थों पर आधारित है। क्यूशू-केमोगी-यावाता-कोकुश-वाकामात्सु-शिमोनो-सेकी-मोजी-ऊबे-फुकुओका-सासेबे-नागासाकी इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश हैं जहाँ लौह इस्पात के अतिरिक्त धातु निर्माण उद्योग, इंजीनियरिंग पदार्थों का निर्माण, सीमेंट, मोटर गाड़ियाँ, जलयान निर्माण तथा रासायनिक पदार्थों से सम्बन्धित उद्योग भी पाए जाते हैं।

5. हिरोशिमा-कुरे-उत्तरी शिकोकु प्रदेश:-

     जापान के दक्षिण-पश्चिम में किंकी तथा किता-क्यूशू औद्योगिक प्रदेशों के मध्यवर्ती भाग में इस प्रदेश का विस्तार पाया जाता है। हिरोशिमा-कुरे-नोमी ओकायामा-मत्सूयामा-ताकामात्सू-कूबा इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं जहाँ लौह इस्पात भारी धातु निर्माण-जलयान पेट्रो शोधन कारखाने-यंत्र निर्माण-बिजली के सामान तथा विविध रासायनिक पदार्थों के निर्माण से सम्बन्धित उद्योग पाए जाते हैं। जापान के ये सभी औद्योगिक प्रदेश दक्षिणी क्षेत्र में स्थित हैं।

     इनके अतिरिक्त उत्तर में सेन्दाई क्षेत्र तथा होकैडो द्वीप के दक्षिणी भाग में भी लघु औद्योगिक क्षेत्र हैं जहाँ केवल सामान्यतः उपभोक्ता वस्तुओं का ही उत्पादन किया जाता है। इस क्षेत्र में जलवायु दशाएँ प्रतिकूल तथा कच्चे पदार्थों की कमी के कारण जनसंख्या भी न्यूनतम ही पायी जाती है। अतः औद्योगिक विकास वर्तमान में अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है।



नोट:

जापान में औद्योगिक उन्नति के कारण

     जापान एशिया महाद्वीप का अकेला ऐसा देश है जो औद्योगिक विकास की उस चरम सीमा तक पहुँच गया है, जहाँ तक पहुँचना साधन सम्पन्न विकसित देशों के लिए भी बहुत कठिन है। यह विश्व का प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र है। 20वीं शताब्दी में जापान ने अद्वितीय औद्योगिक विकास किया है। जापान की औद्योगिक उन्नति के निम्नलिखित कारण हैं-

(1) भौगोलिक स्थिति- जापान की स्थिति द्वीपीय होने के कारण इसका जलमार्गों द्वारा विभिन्न देशों से सम्पर्क स्थापित हो सका है। जापान के लिए कच्चे माल के स्रोत एशियाई देश इसके बहुत समीप हैं।

(2) अनुकूल जलवायु- इस देश की जलवायु रेशम, कपास आदि के उत्पादन के लिए अनुकूल है। अक्षांशीय विस्तार अधिक होने के कारण इसके उत्तरी व दक्षिणी भागों में जलवायुवीय भिन्नता पायी जाती है।

(3) कच्चे माल की प्राप्ति- यद्यपि जापान में लोहा, कोयला, कपास आदि कच्चे मालों की कमी है फिर भी जापान अति तीव्र गति से औद्योगिक विकास हो रहा है। इसका प्रमुख कारण विदेशों से सस्ते कच्चे माल का प्राप्त होना है।

(4) जल-विद्युत- औद्योगिक शक्ति के साधन कोयले की कमी सस्ती जल-विद्युत द्वारा पूरी कर दी जाती है। यदि जापान में जल विद्युत उत्पादन की अनुकूल भौगोलिक दशाएँ न होर्ती तो जापान औद्योगिक दृष्टि से बहुत अधिक पिछड़ा हुआ होता।

(5) कुशल श्रमिक- देश की अधिकांश जनसंख्या के औद्योगिक क्षेत्रों में निवास करने से पर्याप्त मात्रा में सस्ते व कुशल श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।

(6) बाजार की समीपता- जापान द्वारा निर्मित माल को इसके समीप दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया के देश आयात कर लेते हैं।

(7) सामुद्रिक स्थिति- जापान के चारों ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण यहाँ जल यातायात द्वारा कच्चा माल आयात करने तथा तैयार माल निर्यात करने की बहुत सुविधा है।

(8) परिवहन की सुविधाएँ- जापान की अधिकांश जनसंख्या का जमाव तटीय भागों में है। अतः यहाँ उद्योगों का विकास भी तटीय केन्द्रों पर ही हुआ है।

(9) सरकारी सहयोग- जापान की सरकार ने औद्योगिक विकास के लिए अनेक प्रकार सहयोग किया है। यहाँ सरकार द्वारा नवीन उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तथा वित्तीय सहायता दी जाती है। यहाँ सरकार औद्योगिक नीति को उदार और प्रगतिशील रखकर अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।

(10) आधुनिक मशीनरी का प्रयोग- यहाँ कारखानों में आधुनिकतम मशीनरी का प्रयोग किया जाता है तथा ऐसी विधियों का प्रयोग किया जाता है जिनसे श्रम की बचत होती है। ये मशीनें सुविधाजनक भी होती हैं। आधुनिक मशीनरी के विकास की ओर जापान में विशेष ध्यान दिया जाता है।

(11) औद्योगिक सम्बन्ध- यहाँ उद्योगों का विकास निराले ढंग से किया गया है। बड़े उद्योगों की कुटीर उद्योगों से प्रतिस्पर्धा न करके बड़े उद्योगों और कुटीर उद्योगों में सम्पर्क रखा गया है।

(12) चीन-जापान संघर्ष- जब चीन तथा जापान का संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जापान में वस्त्र व वस्त्र निर्माण उद्योगों का विकास प्रारम्भ हुआ।

(13) प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध- विश्व युद्ध में शामिल हो जाने के कारण जापान को सैनिक तथा आम जनता की माँग की पूर्ति के लिए सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, रेशमी वस्त्र, जलयान, वायुयान, मशीनरी आदि के निर्माण में वृद्धि करनी पड़ी।

40. SCALES OF MEASUREMENT (मापन के पैमाने)

SCALES OF MEASUREMENT

(मापन के पैमाने)



      भौगोलिक आँकड़ों के मापन का तात्पर्य नियमों के अनुसार आँकड़ों का वर्गीकरण, विश्लेषण और मानचित्रण है। आँकड़ों में अन्तरनिहित समरूपता के आधार पर आँकड़ों का कई तरह से प्रदर्शन ही मापक कहा जाता है। सामान्यतया भौगोलिक आँकड़ों के मापन स्तर के 4 वर्ग हैं।

1. नामिक मापक (Nominal Scale):-

     इसे प्रतीक मापक कहा जा सकता है क्योंकि यह आँकड़ों की किसी उल्लेखनीय विशेषता के आधार पर उनका वर्णन नहीं करता है। केवल प्रतीक रूप में वर्गीकरण और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जैसे- पशुओं का गाय, बैल, भैंस, बकरी में विभाजन या यौनानुपात में स्त्री-पुरुष, मिट्टी विभाजन में दोमट, बलुई आदि नामिक मापक के उदाहरण है।

    इस मापक से आँकड़ों के वास्तविक मूल्य का बोध नहीं होता है, बल्कि उनके प्रतीकों का बोध होता है। भौगोलिक विश्लेषण में बहुलक (Mode) का प्रयोग इसके आधार पर किया जाता है।

2. क्रमसूचक मापक (Ordinal Scale):-

      इसके अन्तर्गत विभिन्न आँकड़ों को अधिकतम और न्यूनतम परिमाण के आधार पर आरोही अथवा अवरोही क्रमों में रखते हैं। इस तरह आँकड़ों में अन्तर का आधार उनकी मात्रा (Quantity) रहती है। जैसे आकार के आधार पर नगरों, गाँवों का वर्गीकरण, दुकानों की संख्या, खुलनशीलता के आधार पर वर्गीकरण, उत्पादन के अनुसार विभिन्न इकाइयों का वर्गीकरण इसके उदाहरण हैं।

   इस प्रकार के आँकड़ों के विश्लेषण में अनेक सांख्यिकीय विधियों, आरेख और मानचित्र उपयोगी हैं। जैसे नगरों या गाँवों के वितरण में क्रमशः आकार के अनुसार वर्गीकरण, उच्चावचन में अधिक ऊँचा, मध्यम या न्यून ऊँचा क्षेत्र आदि है।

3. अन्तराल मापक (Interval Scale):-

    अन्तराल मापन समान इकाई मापक के आधार पर आँकड़ों का वर्णन करता है। इसमें क्रमसूचक मापक के अनुसार आँकड़ों के बीच का अन्तराल परिवर्तनशील होता है। इससे असंख्य आँकड़ों को संक्षेप में व्यवस्थित कर लेते हैं और आँकड़ों का क्रम भी बना रहता है। जैसे- < 5, 5-10, 10-15, 15-20 आदि। इसमें 0 से 20 तक जितने भी प्रेक्षण हैं, सभी किसी भी अन्तराल वर्ग में रखे जा सकते हैं। इस पर माध्य, मानक विचलन, सहसम्बन्ध आदि अनेक सांख्यिकीय विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं।

4. आनुपातिक मापक (Ratio Scale):-

    आनुपातिक मापक का प्रयोग करके बड़ी संख्या में आँकड़ों को लघुतम रूप में व्यक्त कर सकते हैं। जैसे 10/100 को 1/10, 5/50, 2/20 आदि रूप में व्यक्त कर सकते हैं। अधिकांश भौगोलिक आँकड़े आनुपातिक मापक पर ही पाये जाते हैं।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

(i) नाममात्र पैमाना (Nominal Scale):-

     नाममात्र पैमाना मापन का सबसे सरल और प्रारंभिक पैमाना है। इसमें आँकड़ों को केवल नाम या श्रेणी के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें संख्याएँ केवल पहचान (Identification) के लिए होती हैं

✍️ न तो क्रम होता है और न ही परिमाण

✍️ गणितीय क्रियाएँ संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ भूमि उपयोग के प्रकार (कृषि, वन, बंजर)

✍️ मिट्टी के प्रकार

✍️ जलवायु के प्रकार

✍️ धर्म, भाषा, जाति

महत्व

     नाममात्र पैमाना भूगोल में वर्गीकरण और मानचित्रण के लिए उपयोगी है, जैसे- भूमि उपयोग मानचित्र।

(ii) क्रमिक पैमाना (Ordinal Scale):-

    क्रमिक पैमाने में आँकड़ों को क्रम या रैंक के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है।

विशेषताएँ

✍️ इसमें क्रम (Order) होता है

✍️ परंतु दो मानों के बीच का अंतर ज्ञात नहीं होता

✍️ केवल तुलना संभव होती है

भूगोल में उदाहरण

✍️ जनसंख्या घनत्व: उच्च, मध्यम, निम्न

✍️ विकास स्तर: विकसित, विकासशील, अविकसित

✍️ नगरीय श्रेणीकरण

महत्व

     यह पैमाना भूगोल में क्षेत्रीय तुलना और स्तरीकरण (Ranking) के लिए अत्यंत उपयोगी है।

(iii) अंतराल पैमाना (Interval Scale):-

     अंतराल पैमाने में आँकड़ों के बीच समान अंतर होता है, परंतु पूर्ण शून्य (True Zero) नहीं होता।

विशेषताएँ

✍️ क्रम और अंतर दोनों मौजूद

✍️ शून्य केवल सांकेतिक होता है

✍️ गुणा और भाग संभव नहीं

भूगोल में उदाहरण

✍️ तापमान (सेल्सियस, फारेनहाइट)

✍️ तिथियाँ और वर्ष

✍️ ऊँचाई (समुद्र तल के सापेक्ष)

महत्व

    यह पैमाना भौतिक भूगोल में-

✍️ जलवायु विश्लेषण

✍️ तापमान प्रवृत्ति

✍️ समय आधारित अध्ययन के लिए उपयोगी है।

(iv) अनुपात पैमाना (Ratio Scale):- 

    अनुपात पैमाना मापन का सबसे उन्नत और पूर्ण पैमाना है। इसमें समान अंतर के साथ-साथ पूर्ण शून्य भी होता है।

विशेषताएँ

✍️ क्रम, अंतर और अनुपात तीनों मौजूद

✍️ सभी गणितीय क्रियाएँ संभव

✍️ सबसे विश्वसनीय पैमाना

भूगोल में उदाहरण- जनसंख्या, वर्षा की मात्रा, दूरी, क्षेत्रफल, उत्पादन

महत्व

     अनुपात पैमाना भूगोल में-

✍️ सांख्यिकीय विश्लेषण

✍️ मॉडल निर्माण

✍️ पूर्वानुमान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मापन के पैमानों का तुलनात्मक सार

पैमाना क्रम अंतर पूर्ण शून्य
नाममात्र ❌ ❌ ❌
क्रमिक ✔ ❌ ❌
अंतराल ✔ ✔ ❌
अनुपात ✔ ✔ ✔

भूगोल में मापन पैमानों का महत्व

✍️ भौगोलिक आँकड़ों की वैज्ञानिक व्याख्या

✍️ उपयुक्त सांख्यिकीय विधि का चयन

✍️ मानचित्रण एवं मॉडलिंग

✍️ क्षेत्रीय योजना और नीति निर्माण

✍️ शोध एवं परियोजना कार्य

निष्कर्ष 

       मापन के पैमाने भूगोल में सांख्यिकीय अध्ययन की आधारशिला हैं। ये आँकड़ों को अर्थपूर्ण, तुलनात्मक और विश्लेषण योग्य बनाते हैं। प्रत्येक पैमाने की अपनी सीमाएँ और उपयोगिता है। भूगोल के छात्र के लिए इन पैमानों की स्पष्ट समझ आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना सांख्यिकीय विश्लेषण अधूरा माना जाता है।

22. What is language? Origin and classification of languages ​​in India (भाषा क्या है? उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण)

What is language? Origin and classification of languages ​​in India

(भाषा क्या है? उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण)



     भाषा अभिव्यक्ति का सबसे उत्तम साधन है। यदि मानव के पास भाषा न होती तो उसके आविष्कारों का विस्तार एवं प्रसार अत्यन्त सीमित हो जाता। मानव की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक उन्नति का प्रमुख कारण आविष्कार है और आविष्कार को प्रसारित करने का सबसे अधिक श्रेय मनुष्य की भाषा शक्ति को है।

    भाषा द्वारा मानव अपने मन के भाव प्रकट करता है, सामाजिक आदान-प्रदान या अन्तःक्रिया में भाग लेता है। संगीत रचना करता है और गाता है, साहित्य की सृष्टि करता है और आविष्कारों का प्रसार मानवीय धरातल में करता है।

    भाषा का अर्थ बोलना है, क्योंकि इसका मुख्य प्रयोग बोलकर ही किया जाता है, किन्तु दूरस्थ व्यक्ति को विचार लिखकर ही व्यक्त किए जाते हैं।

परिभाषा

स्टर्टीवेण्ट के अनुसार, “भाषा मुंह से उच्चारण किए जाने वाले संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग तथा अन्तः क्रिया करते हैं।”

पतंजलि मुनि के अनुसार, “जिस व्यापार में वाणी द्वारा वर्ण व्यक्त किए जाते हैं। वह व्यक्त वाक् अर्थात् भाषा है।

हर्सकोविट्ज के अनुसार, “भाषा मुंह से उच्चारण किए जाने वाले संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग तथा अन्तः क्रिया करते हैं और जिसके माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को सफल बनाया जाता है तथा जीवन की एक विधि विशेष को निरन्तरता एवं परिवर्तनशीलता दोनों ही प्राप्त होती हैं।”

भाषा की उत्पत्ति:-

      भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा की उत्पत्ति उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनमें प्रारम्भिक काल में मानव निवास करता था। उस समय प्राकृतिक वस्तुएं एवं घटनाएं देखकर अनायास मुंह से आवाजें निकल पड़ती थीं।

     धीरे-धीरे आवाजें निकालकर ही वह अपने भावों को दूसरों तक पहुंचाता था। धीरे-धीरे सामाजिक अन्तः क्रिया के दौरान एक-एक विशिष्ट आवाज एक-एक विशेष प्रकार के संकेत के रूप में स्थापित व क्रियाशील हुई। इन्हीं संकेतों के क्रमिक विकास से भाषा की उत्पत्ति हुई।

      भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में द्वितीय मत यह है कि मानव ने बोलने की प्रेरणा प्रकृति से ही ली है। प्रारम्भिक समय में मानव ने प्रकृति में कुछ आवाजें सुनीं जिनकी नकल की जिससे बाद में संकेतों का जन्म हुआ तथा भाषा की उत्पत्ति हुई।

     भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में तृतीय सिद्धान्त प्राणीशास्त्रीय है। मानव में कुछ प्राणीशास्त्रीय विशेषताएं पाई जाती हैं जिनके कारण वाणी अथवा भाषा की उत्पत्ति होती है।

भाषाओं का वर्गीकरण:-

    भारत में बोली जाने वाली भाषाएं निम्नांकित चार परिवारों से सम्बन्धित हैं:

(1) ऑस्ट्रिक (Ausric)

(2) द्रविण (Dravidian)

(3) चीनी-तिब्बती (Sino-Tibetan)

(4) इण्डो-यूरोपियन (Indo-European)

(1) ऑस्ट्रिक:-

    इसकी दो शाखाएं हैं-

(ⅰ) ऑस्ट्रो-एशियाटिक शाखा एवं

(ii) ऑस्ट्रोनेशियन शाखा।

   ऑस्ट्रो-एशियाटिक शाखा के अन्तर्गत मध्य एवं पूर्वी भारत की कोल एवं मुण्डा बोलियां, निकोबार द्वीप समूह की बोली तथा थाईलैण्ड और वियतनाम की भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि ऑस्ट्रोनेशियन शाखा के अन्तर्गत इण्डोनेशिया की राष्ट्रभाषा तथा मलाया, माइक्रोनेशिया, मैलेनेशिया तथा पोलिनेशिया, आदि की भाषाएं सम्मिलित हैं। इनमें सबसे बड़ा भाग सन्थाली बोलने वालों का है।

(2) द्रविण:-

     इसके सदस्य मध्य और दक्षिणी भारत में रहते हैं। इसके अन्तर्गत निम्नांकित चार साहित्यिक भाषाएं आती हैं-तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालय। द्रविण समूह में निम्नांकित तीन समूह हैं-

(i) दक्षिणी द्रविण,

(ii) मध्य द्रविण तथा

(iii) उत्तरी द्रविण।

     दक्षिणी द्रविण समूह में दक्षिणी भारत का बड़ा भाग सम्मिलित है जिसमें तमिल, मलयालम तथा कन्नड़ भाषाएं बोली जाती हैं। मध्य द्रविण में तेलुगु तथा गोंडी भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि उत्तरी द्रविण समूह में कुराख (ओरांव) तथा माल्टो हैं।

(3) चीनी-तिब्बती:-

      इसे भाषाओं का किरात समूह भी कहा जाता है। इस भाषा परिवार में हिमालय के दक्षिणी ढालों, उत्तरी पंजाब से भूटान, उत्तरी तथा पूर्वी बंगाल और असम में पाई जाने वाली इण्डो मंगोलाइड प्रगति के लोगों में प्रचलित भाषाएं आती हैं। भारत में तिब्बती भाषा बोलने वालों की निम्नांकित शाखाएं हैं:-

(i) तिब्बत-हिमालयी,

(ii) उत्तरी असम,

(iii) असम म्यांमारी। (बर्मी)।

      तिब्बत-हिमालयी शाखा में भूटिया समूह तथा हिमालयन समूह हैं। भूटिया समूह में तिब्बत, बेल्टी, लद्दाखी, लाहुली, शेरपा तथा सिक्किम भूटिया सम्मिलित हैं। हिमालयन समूह में चम्बा, कनौरी तथा लेप्चा हैं।

     उत्तरी असम समूह में अका, इफला, अबोर, मिरी, मिशमी तथा निशिंग हैं। इनमें मिरी सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है।

    असम म्यांमारी भाषा को पुनः निम्नांकित उपविभागों में विभाजित किया जा सकता है-बोडा, नागा, कचिन, कुकिचिन, म्यांमार।

(4) इण्डो यूरेपियन:-

      इसके अन्तर्गत दो मुख्य शाखाएं हैं:

(i) डारडिक तथा

(ii) इण्डो-आर्यन।

    डारडिक समूह में दारदी, शिना, कोहिस्तानी तथा कश्मीरी, आदि हैं। इनमें कश्मीरी सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है।

    इण्डो-आर्यन शाखा को पुनः उत्तर-पश्चिमी, दक्षिणी, पूर्वी, पूर्वी-मध्य, मध्य तथा उत्तरी समूहों में उपविभाजित किया जाता है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. भाषा क्या है? इसकी उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण कीजिए।

21. Fundamental Concepts in Human Geography (मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)

Fundamental Concepts in Human Geography

(मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)



अवधारणाएँ (Concepts):-

      अवधारणाएँ किसी भी विषय का एक महत्वपूर्ण अंग होती है, क्योंकि वे उस विषय को एक अलग पहचान देने का काम करती है। जबकि एक विषय की मौलिक अवधारणाएँ उस विषय में अध्ययन किए गए तथ्यों की प्रकृति और उन तथ्यों का अध्ययन करने हेतु अपनाए गए परिप्रेक्ष्य या दृष्टिकोण पर निर्भर करती है, क्योंकि पृथक् पृथक् विषय तथ्यों के पृथक् पृथक् समूहों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और पृथक पृथक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग करते है इसलिए उनके पास अवधारणाओं का उनका अपना विशिष्ट समूह होता है।

    मानव भूगोल की कुछ अवधारणाएँ तो अभिन्न अंग है जो मानव भूगोल की विशिष्ट प्रकृति को चरित्रित करने में उपयोगी है। इसी कारण इन्हें मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं के रूप में जाना जाता है। मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाएँ समय (काल), स्थान/जगह, अवस्थिति, स्थानिक वितरण, स्थानिक अंत: क्रिया और स्थानिक संगठन मानव भूगोल की अपनी मूल अवधारणाएँ है।

     जबकि दूसरी ओर समय (काल), समाज, संस्कृति, धारणा, व्यवहार, विकास और असमानता जैसी अवधारणाएँ व्युत्पन्न अवधारणाएँ है। अतः मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं का विस्तृत अध्ययन निम्न प्रकार है-

(1) मापक (Scale):-

    मानचित्र का मापक मानचित्र पर दूरी तथा धरातल पर वास्तविक दूरी का अनुपात है। जैसे मानचित्र पर 1 इंच धरातल पर 20 मील को प्रदर्शित कर सकता है। द्वितीय मापक का विश्लेषण किसी क्षेत्रीय इकाई के आकार के रूप में करता है जिस पर किसी समस्या का विश्लेषण किया जाता है, जैसे- देश, राज्य या जिला स्तर।

    तथ्य विषयक/ परिघटनात्मक मापक का मतलब उस आकार से है जिस पर भौगोलिक संरचनाएँ उपलब्ध है अथवा जिस पर भौगोलिक प्रक्रिया संसार में काम कर रही है। विद्वानों द्वारा अध्ययन किए गए तथ्य-विषयकों/परिघटना को सूक्ष्म, समष्टि या वृहत् स्तर पर देखा जा सकता है। यह स्थानीय, प्रादेशिक या वैश्विक स्तर पर भी उपलब्ध हो सकते है। जैसे- एक समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बोली स्थानीय स्तर पर मिलती है जबकि एक भाषा प्रादेशिक स्तर या वैश्विक स्तर पर मिलती है।

(2) समय/काल और जगह/स्थान (Time/Period and Place/Space):-

      समय तथा जगह दोनों पृथ्वी की सतह पर किसी भी वस्तु के अस्तित्व की दो मूलभूत वास्तविकताएँ है। काण्ट (1724-1804) का मत था कि समय (काल) और जगह स्थान मानव अनुभव की सम्पूर्ण परिधि को भरते है। मानव सहित समस्त कुछ समय (काल) और जगह स्थान के अन्तर्गत होता है।

   समय (काल) और जगह दोनों को रोजमर्रा के शब्दों के रूप में जाना जाता है, क्योंकि हम समस्त अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में समय एवं जगह सम्बन्धी तथ्यों का सामना करते हैं। फलस्वरूप, हम सभी को इन शब्दों के बारे में सामान्य समझ है। इसके बावजूद इन अवधारणाओं को परिभाषित करना मुश्किल है। समय के साथ दो लगातार घटित घटनाओं का पृथक्‌करण है। जबकि जगह को दो स्थानों के मध्य पृथक्‌करण के रूप में माना गया है।

     इतिहास समय (काल) के साथ सम्बन्धित है। इसी कारण इतिहासकार वास्तविकता के लौकिक या सामयिक आयाम से सम्बन्ध रखते है। वे मुख्य रूप से समाज के लौकिक या सामयिक क्रम विकास का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं। मानव इतिहास में अब तक जो कुछ घटित हुआ है, वह केवल विशिष्ट स्थानों पर हुआ है जबकि भूगोल का सम्बन्ध जगह से है। इसलिए भूगोलवेत्ता वास्तविकता के स्थानिक आयामों से सम्बन्ध रखते है। अतः भूगोल को एक क्षेत्र या स्थानिक विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया है।

      समय एवं जगह की अवधारणाओं की परस्पर अन्तनिर्भरता इतिहास और भूगोल के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध की वकालत करते है। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (485-428 ई. पू.) का मत है कि “सम्पूर्ण इतिहास को भौगोलिक रूप से देखना चाहिए और सम्पूर्ण भूगोल को ऐतिहासिक रूप से देखना चाहिए।”

(3) क्षेत्र, स्थान और प्रदेश (Area, Place and Region):-

     कई विद्वानों ने संसार को समझने हेतु क्षेत्र, स्थान एवं प्रदेश की अवधारणा को विकसित किया है। क्षेत्र शब्द सामान्यतः किसी स्थान के एक भाग या पृथ्वी की सतह के एक भाग के रूप में माना गया है जिसका एक निश्चित विस्तार एवं सीमा होती है, परन्तु यह किसी आकार का हो सकता है। यह एक सामान्य अवधारणा है, परन्तु इसकी कोई निश्चित अवस्थिति नहीं होती है।

    वहीं दूसरी ओर एक स्थान अपनी भौतिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं या कार्यों के रूप में विशिष्टता व विलक्षणता के कारण निश्चित या अनिश्चित सीमा का क्षेत्र है। किसी स्थान की भौतिक विशेषताओं में भू-आकृतियाँ, जलाशय, मिट्टी, तापमान, वर्षा, वायु, जीव एवं वनस्पति तथा जीवन आदि सम्मिलित है। जबकि सांस्कृतिक विशेषताओं में मानव अधिवास, कारखाने, अस्पताल, विद्यालय, रक्षा प्रतिष्ठान, सड़कें, रेलवे, भाषा, धर्म आदि सम्मिलित है।

(4) तंत्र (Mechanism):-

     तंत्र एक-दूसरे से अंतः परस्पर या एक-दूसरे से जुड़े तत्वों का समूह है या जुड़े हुए सिरों का समूह तंत्र है। पृथ्वी की सतह पर अवस्थित या वितरित तत्व स्थानिक तत्व है। परिवहन तंत्र स्थानिक तंत्र की व्यापक श्रेणी से सम्बन्धित है। जबकि जैविक प्रणाली, सामाजिक तंत्र, कार्यालय व्यवस्थान गैर-स्थानिक तंत्र के उत्तम उदाहरण है। भूगोल विशेषज्ञ अधिकतर स्थानिक तंत्र में ध्यान केन्द्रित रखते है।

     एक तंत्र एवं उसकी संयोजकता का प्रतीकात्मक प्रदर्शन रेखाचित्र के रूप में होता है। यह संधियों द्वारा जुड़े असंधियों या किनारों का एक समूह होता है। स्थानिक तंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व शीर्ष (Vertex) और छोर (edge or link) है। एक असंधि एक रेखाचित्र का एक अंतिम बिंदु या प्रतिच्छेदन बिंदु है। परिवहन तंत्र में असंधि (nodes) का उत्तम उदाहरण सड़क का चौराहा या परिवहन टर्मिनल है।

    मानव भूगोल के प्रमुख विद्वान मानव के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक तत्वों को पृथ्वी की सतह पर व्यवस्थित और संरचित करने के तरीकों के अध्ययन में रुचि लेते हैं। इनमें सड़क तंत्र, रेलवे तंत्र, बिजली तंत्र, संचार तंत्र, सामाजिक एवं संपर्क तंत्र आदि प्रमुख है।

(5) स्थानिक अंतः क्रिया (Spatial Interaction):–

     स्थानिक अंतःक्रिया द्वारा पृथ्वी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसलिए एक स्थान के व्यक्ति दूसरे स्थान के व्यक्तियों से सम्पर्क एवं सम्बन्ध स्थापित करते हैं। गाँव से गाँव के मध्य, गाँव से शहरों के मध्य, शहरों का शहरों के मध्य और बन्दरगाह एवं आन्तरिक प्रदेशों के मध्य अन्त: क्रिया होती है। व्यक्ति वस्तुओं, सेवाओं, पैसा, सूचना और विचारों का संचार तथा आदान-प्रदान के कारण स्थानों के मध्य स्थापित अंतर्निर्भरता का सम्बन्ध स्थानिक अंत: क्रिया कहा जाता है।

(6) अवस्थिति एवं स्थानिक वितरण (Location and Spatial Distribution):-

     मानव भूगोल में भूगोलवेत्ता पृथ्वी पर स्थानों, परिघटनाओं की अवस्थिति एवं वितरण की व्याख्या करते हैं, जबकि मानव भूगोल में प्रयुक्त होने वाली अवस्थिति और वितरण की अवधारणा को जानने हेतु सर्वप्रथम स्थानिक, वितरण, अवस्थिति, परिघटना और परिमाण की अवधारणाओं को जानना होगा। गॉर्डन जे. फील्डिंग (1974) ने इन शब्दों की अवधारणाओं के मध्य अन्तर स्पष्ट किया है। स्थानिक शब्द इंगित करता है कि एक परिघटना पृथ्वी की सतह के एक हिस्से को अधिग्रहित करती है। जबकि वितरण एक-दूसरे से सम्बन्धित परिघटनाओं का संयोजन है और वितरण एक प्रकार की परिघटना की व्यवस्था है।

(7) पदानुक्रम और स्थानिक व्यवस्थापन (Hierarchy and Spatial Organisation):-

    पदानुक्रम (Hierarchy) आकार, कार्य या महत्व के किसी अन्य आधार पर वस्तुओं को क्रमबद्ध या श्रेणीबद्ध किया जाता है। स्थानिक शब्द में कल्पना की जाती है कि संसार का आकार, कार्यात्मक महत्व या भौगोलिक महत्व का पदानुक्रम में व्यवस्थित करता है। पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों और वस्तुओं की श्रेणी या क्रम को स्थानिक पदानुक्रम में रखा जाता है। जैसे भारत में बस्तियों का पदानुक्रम।

     जनसख्या के आधार पर भारत में बस्तियों सबसे बड़ी इकाई (महानगर) से लेकर सबसे छोटी इकाई (पल्ली गाँव) तक होती हैं। इसके अलावा भारत की जनगणना के आधार पर शहरी बस्तियों के पदानुक्रम में रखा गया है। स्थानिक पदानुक्रम का एक उत्तम उदाहरण प्रादेशिक पदानुक्रम है। एक प्रदेश समान श्रेणी के प्रदेशों के पदानुक्रम में एक नियत स्थान रखता है। जैसे भारत का सम्पूर्ण क्षेत्र 6 जल संसाधन प्रदेशों में बंटा है। प्रत्येक जल संसाधन प्रदेश में अनेक द्रोणियाँ है। एक द्रोणी कई जलग्रहण क्षेत्रों के मिलने से बनती है एक जलग्रहण क्षेत्र में कई उप-जलग्रहण क्षेत्र होते हैं। एक उप-जलग्रहण क्षेत्र कई वाटरशेड में विभाजित होते है।

    मानवीय बस्तियों का आकार मुख्यतः उनके मध्य अन्तः क्रिया का स्तर निर्धारित करता है। कम जनसंख्या वाली बस्तियों की तुलना में अधिक जनसंख्या वाली बस्तियों के मध्य से सम्बन्धित है। जबकि देहरादून दूरी के कारण दिल्ली के निकट है मुम्बई-देहरादून की तुलना में दिल्ली से अधिक दूर होने पर भी यहाँ स्थानिक पदानुक्रम की अवधारणा का प्रयोग देश के प्रशासन और विकास की योजना का निर्धारण होता है। जैसे-प्रशासनिक उद्देश्य हेतु देश राज्यों और जिलों में बाँट दिया जाता है।

(8) अन्तर्सम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Inter-relationship):-

   इसे पार्थिव एकता की संकल्पना के नाम से भी जाना जाता है। विश्व के सभी भौगोलिक तत्व चाहे वे प्राकृतिक हो या मानवीय एक-दूसरे से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्धित होते है और किसी भी तत्व का अकेले तथा स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। सभी तथ्य एक-दूसरे को प्रभावित करते है।

    अतः किसी प्रदेश का वास्तविक भृदृश्य वहाँ के सभी तथ्यों के मिले-जुले प्रभावों का परिणाम होता है। किसी प्रदेश में मानव जीवन के विवेचन के लिए वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अध्ययन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि मानव जीवन उनसे निश्चित रूप से सम्बन्धित तथा प्रभावित होता है। इसी कारण मानव भूगोल को “मानव पारिस्थितिकी” का अध्ययन माना जाता है।

    जर्मन विद्वान फ्रेडरिक रैटजेल ने “पार्थिव एकता के सिद्धान्त” को ही प्रमुखता प्रदान की थी। इनके अलावा ब्लाश, बूंश, डिमांजिया आदि भूगोलविदों ने भी ‘पार्थिव एकता या अन्तर्सम्बन्धों के सिद्धान्त’ को मानव भूगोल का प्रमुख सिद्धान्त माना है।

(9) कालिक परिवर्तन की संकल्पना (Concept of Temporal Change):-

    कालिक परिवर्तन की संकल्पना को ‘क्रियाशीलता का सिद्धान्त’ के नाम से भी जाना जाता है। विश्व में कोई तत्व पूर्णतः स्थायी नहीं है. क्योंकि यह दुनिया ही परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पर्यावरण के सभी तत्व चाहे वे प्राकृतिक हों या सास्कृतिक, जड़ हो या चेतन सभी परिवर्तनशील हैं। उनमें परिवर्तन की क्रिया निरन्तर क्रियाशील रहती है। बूंश के शब्दों में “हमसे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु परिवर्तित हो रही है, प्रत्येक वस्तु बढ़ रही है या घट रही है। वास्तव में कुछ भी बिना परिवर्तन के नहीं है।” प्रत्येक जीव अथवा वस्तु सभी अपनी उत्पत्ति से विनाश तक जीवन चक्र में परिवर्तित होती रहती है।

(10) सांस्कृतिक भूदृश्य की संकल्पना (Concept of Cultural Landscape):-

    किसी प्रदेश में भू-आकृत्तियों, वनस्पतियाँ, जलाशयों, मानव भूमि उपयोग तथा अन्य प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के सम्पूर्ण योग को भूदृश्य कहा जाता है। तत्वों की प्रकृति के अनुसार उन्हें प्राकृतिक भूदृश्य और सांस्कृतिक भूदृश्य में बाँटा जाता है। भूदृश्य की संकल्पना परम्परागत भूगोल का अभिन्न अंग रही है। जर्मन भाषा में भूदृश्य के समानार्थी ‘लैण्डशाफ्ट’ (Landschaft) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

    अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्ल सावर ने भूदृश्य की व्याख्या की है और उन्होंने कहा है कि सम्पूर्ण भूदृश्य में प्राकृतिक तत्वों के समुच्चयिक स्वरूप को प्राकृतिक भूदृश्य और मानवकृत तत्वों के समुच्चयक स्वरूप को सांस्कृतिक भूदृश्य कहा जा सकता है। मानव द्वारा निर्मित गृह, ग्राम, नगर, मार्ग, सड़क, खेत, बाग-बगीने, फसलें, कल-कारखाने, खेल के मैदान, पार्क आदि सांस्कृतिक भूदृश्य के प्रमुख घटक है।

(11) नियतिवाद की संकल्पना (Concept of Determinism):-

     भूगोल में मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधो का अध्ययन हेतु अनेक पद्धति एवं वैचारिक सम्प्रदाय का विकास हुआ। उनमें से एक विचार निश्चवादी के नाम से जाना जाता है। भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध तक निश्चयवादी विचार का प्रभाव बना रहा। निश्चयवादी विचार का तात्पर्य है- समय का इतिहास, सभ्यता, जीवनशैली, संस्कृति एवं राष्ट्र की सभी धारणाएँ पर्यावरण के द्वारा निर्धारित एवं संचालित होती है।

    भौतिक दशाओं के अनुसार ही मानव के शारीरिक गठन, उसके भोजन, वस्त्र, आवास आदि प्राथमिक आवश्यकताओं, व्यवसायी तथा सामाजिक व सांस्कृतिक क्रियाओं का निर्धारण होता है। इसमें प्रकृति की प्रबलता पर बल दिया है और मनुष्य को प्रकृति का दास माना है। जर्मन भूगोलवेत्ता रैटजेल इस विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। इस विद्यारधारा को पर्यावरणवाद या पर्यावरणीय नियतिवाद के नाम से भी जाना जाता है।

(12) सम्भववाद की संकल्पना (Concept of Possibilism):-

    ‘सम्भववाद’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता लुसियन फैबे (1922) ने किया था, लेकिन इसका प्रतिपादन इससे पूर्व विडाल डी ला ब्लाश के द्वारा किया जा चुका था। अधिकतर फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने मानव की स्वतन्त्रता और उसके कार्यों को बल दिया तथा नियतिवाद विचारधारा की कटु आलोचना की। ब्लाश के अनुसार, “प्राकृतिक वातावरण मानव को सम्भावनाएँ प्रदान करता है, उसके बदले में मानव अपनी आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा क्षमताओं के आधार पर उनका उपयोग करता है।” एक अन्य स्थान पर ब्लाश ने लिखा है, “प्रकृति असंख्य सम्भावनाएँ प्रदान करती है तथा इन सम्भावनाओं का उपयोग मानवीय छांट पर निर्भर करता है।”

(13) नवनिश्चयवाद की संकल्पना (Concept of Neodeterminism):-

    नवनिश्चयवाद, नियतिवाद की संशोधित विचारधारा है, जो व्यावहारिक जगत् के अधिक पास है। इसका प्रतिपादन अमेरिकन भूगोलवेत्ता ग्रिफ्थ टेलर ने किया। टेलर ने इस विचारधारा को ‘वैज्ञानिक निश्चयवाद’ तथा रुको और जाओ निश्चयवाद की संज्ञा दी। टेलर का मानना था कि न तो प्रकृति का मानव पर पूर्ण नियन्त्रण है और न ही मानव का प्रकृति पर। दोनों में एक सक्रिय क्रियात्मक अन्तर्सम्बंध है।

(14) व्यवहारपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Behavioural Geography):-

    यह मानव भूगोल की एक नवीन संकल्पना है। इस विचारधारा का प्रारम्भ अमेरिकन भूगोलवेत्ता विलियम किर्क द्वारा प्रकाशित लेख ‘Historical Geography and the Concept of Behavioural Environment’ के माध्यम से हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था।

    आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था। अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

(15) अतिवादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Radical Geography):-

    अतिवादी भूगोल को उग्र सुधारवाद या अमूल्य चुल परिवर्तनवादी क्रांतिकारी उपागम के नाम से जानते है। अतिवादी भूगोल का जन्म 1960-70 ई० के दशक में USA में हुआ। भूगोल में अतिवाद का उदय मात्रात्मक क्रांति और स्थानिक विश्लेषण के विरोध में हुआ। यह साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है लेकिन इसका उद‌य साम्यवादी या समाजवादी देशों में न होकर पूँजीवादी देश USA में हुआ है।

    अतिवादी भूगोल के विचारधारा को विकसित करने में अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय और वहाँ से प्रकाशित होने वाला पत्रिका ‘एंटीपोड’ का विशेष योगदान है। व्यक्तिगत रूप से डेविड हार्वे और जे.आर. पीट जैसे भूगोलवेताओं का योगदान रहा है। इस विचारधारा का विकास मूलतः पूर्व संस्थापित नियमो की नकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था जिसका केन्द्र बिन्दु मानव कल्याण से सम्बद्ध सामाजिक मूल्यों का प्रश्न है।

        निष्कर्षतः जा सकता है कि मात्रात्मक कांति, व्यावहारात्मक क्रांति,  प्रत्यक्षवादी दर्शन, भूगोल को मानवीय समस्याओं के समाधान से दूर रखकर इसके आधार को ही समाप्त कर रहे थे लेकिन अतिवादी भूगोल ने सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर भूगोल में नई दृष्टि का सूत्रपात्र किया।

(16) मानवतावादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Humanistic Geography):-

    मानवतावादी भूगोल प्रत्यक्षवाद के भी विरुद्ध है क्योंकि प्रत्यक्षवाद उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे आँखों से देखा जा सके। लेकिन मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम वैसे तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे मात्र अनुभव किया जा सके। ‘मानवतावादी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1976 में ‘तुआन’ ने किया था।

     मानववाद का सर्वप्रथम आरम्भ 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ब्लाश के नेतृत्व में फ्रांसीसी विद्वानों ने किया था। भौगोलिक अध्ययनों में मानवतावादी दृष्टिकोण का समावेश 1970 के दशक में प्रारम्भ हुआ। मानवतावादी विचारधारा भौगोलिक अध्ययनों में मानवीय जागरूकता, मानवीय चेतना तथा मानवीय क्रियात्मकता को केन्द्रीय एवं सक्रिय भूमिका प्रदान करती है। इस विचारधारा से अनुप्रेरित मानववादी भूगोल अपने भौगोलिक अध्ययनी में मानवीय अनुभवो, मानवीय मूल्यों के आकलन एवं मूल्यांकन की महत्व प्रदान करता है।

(17) कल्याणपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Welfare Geography):-

      मानव भूगोल की इस अभिनव प्रवृत्ति के अन्तर्गत विकसित इस विचारधारा ने मानव भूगोल की एक नवीन शाखा को उद्धृत किया है, जिसे परिवर्तनवादी भूगोल अथवा क्रान्तिकारी भूगोल की संज्ञा दी जा रही है। यद्यपि मानव कल्याणपरक भूगोल से सम्बन्धित अध्ययन सन् 1960 के बाद ही प्रारम्भ हो गये थे, किन्तु सन् 1971 में लन्दन में प्रकाशित ‘एरिया’ शोध पत्रिका में डेविड स्मिथ के क्रान्तिकारी भूगोल पर लेख प्रकाशित हुए। सन् 1977 में इससे सम्बन्धित दो पुस्तके प्रकाशित हुई।

    वर्तमान में मानव कल्याणपरक विचारधारा विकराल रूप लेती जा रही मानवीय समस्याओं, जैसे गरीबी, भुखमरी, अकाल, युद्ध, जाति-भेद, रंग-भेद, नैतिक मूल्यों में गिरावट, पर्यावरण प्रदूषण आदि से सम्बन्धित है। इसके अन्तर्गत हम समाज के कल्याण पर विभिन्न भौगोलिक नीतियों के सम्भावित प्रभावों का अध्ययन करते है। यह संकल्पना ‘सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय’ की अवधारणा पर आधारित है।

1. River Valley Regions (नदी घाटी क्षेत्र)

1. River Valley Regions

(नदी घाटी क्षेत्र)



        नदी घाटी क्षेत्र एक ऐसी घाटी होती है जो नदी द्वारा आसपास के परिदृश्य को काट कर बनाई जाती है, जिससे V-आकार का रूप बनता है। यह क्षेत्र कृषि, जल संसाधन और परिवहन के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं।

नदी घाटी क्षेत्र की विशेषताएं:-

(i) V-आकार की घाटी:-

        नदी के पानी में बहने वाली चट्टानें नदी के तल को काटती हैं, जिससे V-आकार की घाटी बनती है।

(ii) कृषि के लिए उपजाऊ:-

        नदी के किनारे की मिट्टी जिसे खादर कहते है, काफी उपजाऊ होती है। यह मिट्टी कृषि के लिए उपयुक्त होती है।

(iii) जल संसाधन:-

        नदियाँ पीने और सिंचाई के लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

(iv) परिवहन:-

       नदियाँ परिवहन के लिए भी महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे जलमार्ग प्रदान करती हैं।

(v) सभ्यता का विकास:-

       कई प्राचीन सभ्यताएँ नदी घाटियों में ही विकसित हुई हैं, जैसे कि सिंधु घाटी सभ्यता।

भारत में नदी घाटी परियोजनाएँ:

     भारत में कई नदी घाटी परियोजनाएँ जो कि बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ हैं। ये मुख्यतः बिजली उत्पादन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण, नौ संचालन, मत्स्य पालन जैसे उद्देश्यों के लिए बनाई गई हैं। 

जैसे- दामोदर नदी घाटी परियोजना, नर्मदा नदी घाटी परियोजना, भाखड़ा नांगल परियोजना, इडुक्की परियोजना, उकाई परियोजना, ऊपरी कृष्णा परियोजना, कोसी परियोजना, गण्डक परियोजना आदि। 
River Valley Regions

नदी घाटी क्षेत्र की संकल्पना:

      नदी घाटी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र है जिसे क्षेत्रीय विकास नियोजन में एक इकाई के रूप में लिया जा सकता है। इसमें मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रवाहित क्षेत्र शामिल है। यह भौतिक और सामाजिक रूप से एकीकृत क्षेत्र है और इसे नियोजन क्षेत्र की एक आदर्श इकाई के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

    नदी घाटी नियोजन विकास और संरक्षण दोनों को एक साथ लाने का एक पारिस्थितिक रूप से सुदृढ़ और आर्थिक रूप से लागत प्रभावी साधन है। संपूर्ण नदी बेसिन को विकसित करने में शामिल विचार क्षेत्रवार आधार पर विकास को प्रेरित करना है ताकि सभी प्राकृतिक संसाधन बेसिन की सभी उप-इकाइयों को स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हों। इसलिए नदी बेसिन नियोजन की अवधारणा को क्षेत्रीय विकास दृष्टिकोण के एक भाग के रूप में देखा जाता है।

नदी घाटी क्षेत्र के लिए अलग नियोजन:

    भारत के सिंचाई आयोग (1972) ने नदी बेसिन योजना के निर्माण के लिए निम्नलिखित नीति की सिफारिश की है-

(i) बेसिन योजना को क्षेत्रीय और स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमि-जल संसाधनों की एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करनी चाहिए।

(ii) मांग के अनुसार जरूरतों को पूरा करने के लिए बेसिन में विभिन्न इंजीनियरिंग कार्य किए जाने चाहिए। जैसे- जल संसाधनों का प्राथमिकता के अनुसार उपयोग, परियोजनाओं की प्राथमिकता।

(iii) योजना की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए तथा बदलती जरूरतों और आपूर्ति के मद्देनजर आवश्यकतानुसार इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।

       यह अर्थव्यवस्था को प्रेरित करने के लिए जल प्रेरित विकास पर आधारित है तथा अंतरराज्यीय नदी बेसिन के लिए सहयोग की आवश्यकता है।

उद्देश्य:

      नदी घाटी क्षेत्र नियोजन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जल संसाधनों का उचित प्रबंधन:-

      नदी घाटी क्षेत्र में जल की उपलब्धता, उपयोग और वितरण को योजनाबद्ध तरीके से प्रबंधित करना ताकि सभी क्षेत्रों और उपयोगों के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सके।

(ii) बाढ़ नियंत्रण:-

     बाढ़ के खतरों को कम करने और बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए बांध, तटबंध और अन्य संरचनाओं का निर्माण करना।

(iii) समुचित सिंचाई की व्यवस्था करना:-

      कृषि के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सिंचाई प्रणालियों का विकास करना, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सके।

(iv) बिजली उत्पादन:-

       जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से बिजली का उत्पादन करना जो ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करता है।

(v) भूमि उपयोग योजना:-

    नदी घाटी क्षेत्र में भूमि के विभिन्न उपयोगों (जैसे कृषि, उद्योग, आवास) को योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित करना, ताकि संसाधनों का अधिकतम और प्रभावी उपयोग हो सके।

(vi) पर्यावरण संरक्षण:-

       नदी घाटी क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करना, ताकि भविष्य में भी इनका लाभ उठाया जा सके।

(vii) सामाजिक-आर्थिक विकास:-

       नदी घाटी क्षेत्र के निवासियों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, जैसे कि रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार।

(viii) मत्स्य पालन और पर्यटन:-

      नदी घाटी क्षेत्र में मत्स्य पालन और पर्यटन को बढ़ावा देना, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार और आय के अवसर मिल सकें।

नदी घाटी क्षेत्र की समस्याएं:

1. विभिन्न फसलों के लिए भूमि और जल की उपयुक्तता और उपयोग के लिए उचित भूमि-जल प्रबंधन नहीं होना।

2. वैकल्पिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभाव।

3. बाढ़, फसलों की अनिश्चितता, जीवन और संपत्ति।

4. प्रति हेक्टेयर कम उत्पादन।

5. वर्षा पर कृषि की निर्भरता।

6. ग्रामीण संरचनात्मक सुविधाओं का अभाव।

7. वर्षा जल की बर्बादी।

8. मृदा अपरदन।

9. पेयजल की समस्या।

10. वन अपरदन।

11. फसल की उपयुक्तता के लिए मिट्टी के वैज्ञानिक परीक्षण और उचित नियोजन का अभाव

योजना और संभावनाएँ:

(i) कृषि

(ii) मत्स्य पालन

(iii) जलीय कृषि

(iv) उद्योग

(v) जल विज्ञान शक्ति

      बाढ़ प्रतिरोधी फसलें- अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, मनीला द्वारा 2004 में “स्वर्ण जलमग्नता-I” के रूप में विकसित चावल की किस्म और ढाका में चावल अनुसंधान द्वारा प्रचलित।

     एक नदी बेसिन का जल निकासी बेसिन योजनाबद्ध विकास के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य, शारीरिक रूप से एकीकृत और व्यापक रूप से स्वीकृत क्षेत्रीय इकाई साबित हुआ है।

     नदी बेसिन एक प्राकृतिक अपेक्षाकृत आसानी से परिभाषित क्षेत्र है। इसमें संसाधन संपदा के कई तत्व हैं, जो अधिकांश भाग में सांस्कृतिक और पारिस्थितिक प्रक्रिया से जुड़े हैं, सतह विन्यास, मिट्टी, वनस्पति और जलवायु उन तत्वों में से हैं जो जल निकासी बेसिन के भीतर पानी से जुड़े हैं।

     नदी बेसिन को पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका में क्षेत्रीय नियोजन के लिए एक इकाई के रूप में 1933 में लिया गया था जब टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA- टेनेसी घाटी प्राधिकरण) की स्थापना की गई थी।

    भारत में मार्च, 1948 में दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) को नदी बेसिन विकास के उद्देश्य से एक केंद्रीय सरकारी एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ को नियंत्रित करना और सिंचाई, बिजली उत्पादन, नौवहन, जल आपूर्ति, मृदा संरक्षण, मत्स्य विकास आदि के लिए प्रावधान करना था।

वाटरशेड क्षेत्र

      वाटरशेड एक भौगोलिक क्षेत्र है जो वर्षा जल को एक सामान्य बिंदु पर बहा देता है। अर्थात वाटरशेड भूमि का वह क्षेत्र होता है जिसका समस्त अपवाहित जल एक ही बिंदु से होकर गुजरता है। वर्षा जल का आकार इसके आगे के वर्गीकरण का आधार बनता है।

      वाटरशेड क्षेत्र को आकार के अनुसार कई प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे-

(i) मिनी-वाटरशेड (Mini-Watershed):

      यह सबसे छोटा प्रकार का वाटरशेड है, जिसका क्षेत्र 1 से 100 हेक्टेयर तक होता है।

(ii) माइक्रो-वाटरशेड (Micro-Watershed):

      इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 100 से 1000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(iii) मिली-वाटरशेड (Milli-Watershed):

       इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 1000 से 10,000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(iv) सब-वाटरशेड (Sub-Watershed):

        इस प्रकार के वाटरशेड का क्षेत्र 10,000 से 50,000 हेक्टेयर के बीच होता है।

(v) मैक्रो-वाटरशेड (Macro-Watershed):

      यह सबसे बड़ा प्रकार का वाटरशेड है, जिसका क्षेत्र 50,000 हेक्टेयर से अधिक होता है।

योजना का उद्देश्य:

1. जल संरक्षण

2. वर्षा जल संचयन

3. पेयजल का समाधान

4. सिंचाई सुविधाएँ

5. वानिकी और मत्स्य पालन

6. कृषि और जलीय कृषि

नियोजन के लिए एक इकाई के रूप में नदी घाटी क्षेत्र: समस्याएं

⇒ इसमें भौतिक, सामाजिक और आर्थिक एकरूपता नहीं है और इसलिए इसे बहु-स्तरीय नियोजन की आवश्यकता है।

⇒ इसकी बहु-राष्ट्रीय सीमाएँ हो सकती हैं।

⇒ विकास की गति में असमानता।

⇒ अंतर-राज्यीय विवाद

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