बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर
1. बहुवैकल्पिक प्रश्नोत्तर
(i) निम्नलिखित में से कौन भूगर्भ की जानकारी का प्रत्यक्ष साधन है-
(क) भूकम्पीय तरंगें
(ख) गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) ज्वालामुखी
(घ) पृथ्वी का चुम्बकत्व
उत्तर- (क) भूकम्पीय तरंगें
(ii) दक्कन ट्रैप की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम है-
(क) शील्ड
(ख) मिश्र
(ग) प्रवाह
(घ) कुण्ड
उत्तर- (ग) प्रवाह
(iii) निम्नलिखित में से कौन सा स्थलमण्डल को वर्णित करता है?
(क) ऊपरी व निचले मैंटल
(ख) भूपटल व क्रोड
(ग) भूपटल व ऊपरी मैंटल
(घ) मैंटल व क्रोड
उत्तर- (ग) भूपटल व ऊपरी मैंटल
(iv) निम्न में से कौन सी भूकम्प तरंगें चट्टानों में संकुचन व फैलाव लाती हैं-
(क) ‘P’ तरंगे
(ख) ‘S’ तरंगे
(ग) धरातलीय तरंगे
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर- (क) ‘P’ तरंगे
(v) पृथ्वी की क्रोड पर कौन से दो पदार्थ पाये जाते हैं।
(क) निकिल व ताँबा
(ख) तांबा व लोहा
(ग) निकिल व लोहा
(घ) लोहा व चूना
उत्तर- (ग) निकिल व लोहा
(vi) निम्नलिखित में कौन-सा सक्रीय ज्वालामुखी है?
(क) स्ट्रांबोली
(ख) विसूवियस
(ग) बैरन द्वीप
(घ) पोपा
उत्तर- (क) स्ट्रांबोली
(vii) निम्नलिखित में से किस शहर में दिन का अवधि सर्वाधिक है?
(क) मुंबई
(ख) चेन्नई
(ग) श्रीनगर
(घ) दिल्ली
उत्तर- (ग) श्रीनगर
(viii) निम्नलिखित में से किस राज्य की जनसंख्या सर्वाधिक है?
(क) पं० बंगाल
(ख) बिहार
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) आन्ध्र प्रदेश
उत्तर- (ग) उत्तर प्रदेश
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
(i) भूगर्भीय तरंगें क्या हैं?
उत्तर- भूगर्भीय तरंगें (Body Waves): भूगर्भीय तरंगें भूकंप के केंद्र (Earthquake’s epicenter) पर मुक्त ऊर्जा का परिणाम होती हैं। ये पृथ्वी के आंतरिक भाग से गुजरते हुए सभी दिशाओं में फैलती हैं। भूगर्भीय तरंगों को मुख्यतः दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है: P-Waves और S-Waves।
(ii) भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों के नाम बाताइए।
उत्तर- हलांकि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के विषय में हमारी अधिकतर जानकारी परोक्ष रूप से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है।
भूगर्भ की जानकारी के प्रत्यक्ष स्रोत हैं: ज्वालामुखी, खनन, धरातलीय चट्टानें, और उल्कापिंड। ये स्रोत सीधे तौर पर पृथ्वी के आंतरिक भाग से संबंधित हैं या उनसे प्राप्त जानकारी प्रदान करते हैं।
(iii) भूकंपीय तरंगे छाया क्षेत्र कैसे बनाती हैं?
उत्तर- जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती, ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone) कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है। यह क्षेत्र दोनों प्रकार की तरगों के लिए छाया क्षेत्र (Shadow zone) हैं।
(iv) भूकंपीय गतिविधियों के अतिरिक्त भूगर्भ की जानकारी संबंधी अप्रत्यक्ष साधनों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर- भूकंपीय गतिविधियों के अलावा भूगर्भ की जानकारी प्राप्त करने के लिए कई अप्रत्यक्ष साधन हैं। इनमें गुरुत्वाकर्षण सर्वेक्षण, चुंबकीय क्षेत्र, उल्कापिंडों का विश्लेषण, और पृथ्वी के तापमान, दबाव और घनत्व में परिवर्तन शामिल हैं। ये विधियां भूगर्भ की संरचना और गुणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।
(i) भूकंपीय तरंगों के संचरण का उन चट्टानों पर प्रभाव बताएं जिनसे होकर यह तरंगे गुजरती हैं?
उत्तर- भिन्न-भिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भिन्न-भिन्न होती है। जैसे ही ये संचरित होती हैं तो चट्टानों में कंपन पैदा होती है।
भूकंपीय तरंगों के प्रकार का प्रभाव:
P-तरंगें (Primary Waves):-
ये सबसे तेज तरंगें हैं और ठोस, तरल और गैसों से गुजर सकती हैं। ये चट्टानों को संकुचित और विरलीकृत करती हैं।
S-तरंगें (Secondary Waves):
ये तरंगें केवल ठोस पदार्थों से होकर गुजर सकती हैं और चट्टानों को ऊपर-नीचे या एक तरफ से दूसरी तरफ गतिमान करती हैं।
सतही तरंगें (Surface Waves):
ये तरंगें पृथ्वी की सतह के साथ-साथ यात्रा करती हैं और सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं, खासकर लव तरंगें।
(ii) अंतर्वेधी आकृतियों से आप क्या समझते हैं? विभिन्न अंतर्वेधी आकृतियों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर- अंतर्वेधी ज्वालामुखी स्थलाकृति-
➤जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है, तब उससे अंतर्वेधी या आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे– डाइक, सिल, लैकोलिथ, लोपोलिथ, फैकोलिथ, बैथोलिथ।
➤जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तोडाइक, क्षैतिज ठोस होता है तोसिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तोलैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथस्थलाकृति का निर्माण होता है।
➤इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससेबैथोलिथका निर्माण होता है।
प्राकृतिक खतरों और आपदाओं में उन घटनाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनसे जन-धन की अपार हानि होती है और जिनसे प्रलय एवं विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उल्लेखनीय है कि मानव इन घटनाओं की उत्पत्ति को पूर्णतः नियंत्रित नहीं कर सका है।
प्राकृतिक खतरों और आपदाओं के अन्तर्गत ज्वालामुखी उद्गार, भूकम्प, भूस्खलन, टारनेडो, हरीकेन, चक्रवात, बाढ़, सूखा, जंगल की आग और ब्लिजार्ड जैसी प्राकृतिक घटनाओं को सम्मिलित किया गया है। ध्यान रहे कि उपरोक्त उल्लेखित सभी घटनाएं उस समय पर्यावरणीय या प्राकृतिक आपदाओं का रूप लेती हैं जब इनसे मानव को भारी हानि होती है।
स्पष्ट है कि पर्यावरणीय आपदाओं की तीव्रता का निर्धारण उनके द्वारा होने वाली जन-धन की हानि की मात्रा के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के लिए, मानव रहित क्षेत्रों में भूकम्प एवं ज्वालामुखी उद्गार कभी भी आपदा के रूप में वर्णित नहीं किया जाता है, लेकिन जब कभी भूकम्प और ज्वालामुखी का उद्गार मानव आवासित क्षेत्रों में होता है तो ये प्राकृतिक घटनाएं आपदाओं के रूप में विवेचित की जाती हैं।
इसी प्रकार मानव जान-बूझकर भी इन प्राकृतिक घटनाओं से ग्रस्त क्षेत्रों को अपने आवास हेतु चुनता है। विश्व में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां मानव ने भूकम्पग्रस्त एवं बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों को अपने आवास-स्थल के रूप में पसन्द किया है। इस प्रकार के मानवीय निर्णय उसके अवबोध (Perception) से, कि वह किसी भी प्राकृतिक घटना का बोध कैसे करता है, प्रभावित होते हैं।
ज्ञातव्य है कि मानवीय अवबोध समय और संस्कृति (culture) के साथ बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए, तिमोर सागर के समीपवर्ती क्षेत्रों में चक्रवातों से अपार जन-धन की हानि का भय सदैव बना रहता है।
1974 के भयंकर चक्रवात से हुई जन-धन की अपार हानि के उपरान्त डार्विन और उत्तरी आस्ट्रेलिया के निवासियों ने इस घटना का बोध कर अपने आवास हेतु अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित स्थलों को चुना है।
किसी भी प्राकृतिक घटना के बोध द्वारा ही इस बात का निर्धारण होता है कि या तो मानव उस आपदाग्रस्त क्षेत्र को छोड़ दे या फिर उस आपदा से होने वाली हानि को स्वीकार कर उस आपदाग्रस्त क्षेत्र में ही रहे या फिर उस आपदा को कम करने के उपाय करे।
आपदा को कम करने के उपायों में व्यावहारिक भौतिक भूगोल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो घटना की तीव्रता एवं आवृत्ति, इनकी उत्पत्ति के स्थल और उत्पत्ति के कारकों का ज्ञान करा मानव को इन घटनाओं को नियंत्रित करने के उपायों की ओर प्रवृत्त करती है।
मुख्य प्रकार:
1. बाढ़ (Floods) – अत्यधिक वर्षा या नदी के उफान से जलभराव।
2. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption) – मैग्मा और गैसों का विस्फोट।
3. भूकंप (Earthquake)– धरती की सतह पर कंपन।
4. सुनामी (Tsunami) – समुद्र में भूकंप या ज्वालामुखी से उत्पन्न विशाल लहरें।
5. सूखा (Drought) – लंबे समय तक वर्षा न होना।
6. चक्रवात (Cyclone/Hurricane/Typhoon) – तेज हवाएँ और तूफान।
7. भूस्खलन (Landslide) – पर्वतीय ढलानों से चट्टानों या मिट्टी का खिसकना।
8. अत्यधिक तापमान (Extreme Temperature) – लू, शीतलहर, हीटवेव।
9. जंगल की आग (Forest Fire / Wildfire) – भारत में प्रमुख उदाहरण (जैसे उत्तराखंड या हिमाचल के जंगलों की आग)।
1. बाढ़ (FLOODING)
पर्यावरणीय अथवा प्राकृतिक आपदा के रूप में बाढ़ एक सामान्य घटना है जो मानव को प्रभावित करती है विशेषकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में। जल की उपलब्धता, समतल भूमि की उपलब्धता, कृषि कार्यों में सुविधा तथा बाढ़ को एक आपदा के रूप में स्वीकार न करने के मानवीय बोध के कारण विश्व जनसंख्या का एक बड़ा भाग बाढ़ के मैदानों में रह रहा है।
उल्लेखनीय है कि मानव वायुमण्डलीय प्रक्रमों को नियंत्रित नहीं कर सकता है अर्थात् वह हरीकेन और चक्रवातों को तो आने से नहीं रोक सकता है, लेकिन जलवायवीय, भू-आकृतिक, जलीय और जैविक प्रक्रमों के सैद्धान्तिक ज्ञान का उपयोग कर बाढ़ जैसी आपदा को अवश्य नियंत्रित कर सकता है। एक अपवाह बेसिन में ढालों पर क्रियाशील प्रक्रमों और नदियों द्वारा उन प्रक्रमों के प्रति अनुक्रिया के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यही घनिष्ठ सम्बन्ध नदी में बाढ़ को नियंत्रित करने हेतु सैद्धान्तिक आधार प्रदान करता है।
बाढ़ जैसी आपदा को नियंत्रित करने के लिए वस्तुतः दो प्रकार के उपागमों को व्यवहार में लाया जाता है।
पहले उपागम (Approach) में बाढ़ को रोकने के सभी उपाय नदियों के उद्गम स्थल तथा ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में क्रियान्वित किए जाते हैं, जैसे:
(i) ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में ढालों को रूपान्तरित (Modified) करना,
(ii) नदी के उद्गम स्थल एवं ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में वृहत् पैमाने पर वृक्षारोपण करना ताकि वर्षा जल का भूमि में अन्तः स्पन्दन (Infilteration) अधिक हो सके, फलतः वाही जल की मात्रा में कमी हो सके और वह विलम्ब से नदियों में पहुंचे।
वृक्षारोपण द्वारा मृदा अपरदन में कमी होने पर नदियों का अवसाद-भार तो कम होता ही है साथ ही नदियों की जलधारण क्षमता में कमी नहीं आने के कारण बाढ़ की आवृत्ति में भी कमी आती है और बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र का भी विस्तार नहीं हो पाता है।
दूसरे उपागम (Approach) के अन्तर्गत नदियों के मार्ग में ही बाढ़ को नियंत्रित करने के उपाय किए जाते हैं, जैसे :
(i) नदी के प्रवाह मार्ग में बाढ़ को नियन्त्रित करने हेतु भण्डारण जलाशयों अर्थात् बांधों का निर्माण करना।
(ii) नदियों के विसर्पाकार (Meandering) मार्ग को अभियांत्रिकी की सहायता से सीधा करना।
(iii) बाढ़ के समय अतिरिक्त जल के प्रवाह को निम्न भूमि (Low Land) या कृत्रिम रूप से निर्मित जलवाहिकाओं (Channels) में मोड़ देना।
(iv) जहां आवश्यक हो, वहां अभियांत्रिकी उपायों द्वारा नदियों के किनारों पर कृत्रिम तटबन्धों, डाइक (दीवार जैसी संरचना) और बाढ़-दीवाल (Flood wall) का निर्माण करना।
उपरोक्त उपायों के द्वारा नदियों में बाढ़ के समय जल के आयतन, उसकी ऊंचाई तथा परिमाण में कमी की जा सकती है। यद्यपि ये उपाय नदी की गति और उसके अपरदन तथा निक्षेपण कार्यों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वस्तु को बाढ़-प्रूफ (Flood-Proof) बनाने की बजाय समय पर बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी देकर मानव एवं पशुधन को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना अधिक सुविधाजनक एवं सस्ता होता है।
2. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)
ज्ञातव्य है कि परिप्रशान्त मेखला तथा मध्य महाद्वीपीय मेखला के अन्तर्गत विश्व के 80 प्रतिशत ज्वालामुखी आते हैं और वस्तुतः विश्व के 80 प्रतिशत सक्रिय (Active) ज्वालामुखी विनाशकारी (Destructive) अभिसारी (Convergent) प्लेट किनारों के सहारे पाए जाते हैं।
यह सत्य है कि ज्वालामुखी के उद्गार को रोका तो नहीं जा सकता है, लेकिन उसके भावी उद्गार की भविष्यवाणी करके उसके द्वारा होने वाली जल-धन की हानि को अवश्य कम किया जा सकता है। इस हेतु निम्नांकित उपाय व्यवहार में लाए जा सकते हैं :
(i) सम्भावित ज्वालामुखी उद्गार वाले क्षेत्रों में भूकम्प लेखी यंत्र द्वारा भकम्पीय घटनाओं के नियमित मापन से प्राप्त संकेतों के आधार पर भावी ज्वालामुखी उद्गार की भविष्यवाणी की जा सकती है।
(ii) मेग्मा तथा गैसों के भूगर्भ में नीचे से उपर की ओर उठने से धरातलीय सतह में उभार तथा झुकाव के रूप में विरूपण होने लगता है। विरूपण की यह मात्रा ज्वालामुखी उद्गार के पहले बढ़ती जाती है अतः सम्भावित क्षेत्रों में टिल्टमीटर की सहायता से धरातलीय सतह में झुकाव के नियमित मापन से भावी ज्वालामुखी उद्गार के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है।
(iii) सम्भावित ज्वालामुखी उद्गार के पहले तापमान में वृद्धि होने लगती है। इस आधार पर क्रेटर झीलों, गर्म जल स्रोतों, गेसर एवं धुंआरों के जल के तापमान के नियमित मापन से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भावी ज्वालामुखी उद्गार की भविष्यवाणी की जा सकती है।
(iv) स्थानीय गुरुत्व तथा चुम्बकीय क्षेत्र के मापन से प्राप्त परिणामों से सम्भावित ज्वालामुखी के उद्गार की भविष्यवाणी में सहायता मिलती है। स्मरणीय है कि उपरोक्त उपायों को व्यवहार में लाते हुए 1980 में संयुक्त राज्य अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में हुए सेण्ट हेलेन्स ज्वालामुखी के उद्गार की भविष्यवाणी पहले की जा चुकी थी। इस भविष्यवाणी के आधार पर व्यवहार में लाए गए सुरक्षात्मक उपायों के कारण ही इस ज्वालामुखी उद्गार से जन-धन की हानि अपेक्षाकृत कम हुई।
3. भूकम्प
भूकम्प प्राकृतिक भू-आकृतिक आपदा है। ज्ञातव्य है कि रचनात्मक प्लेट सीमाओं के सहारे मध्यम परिमाण वाले भूकम्प आते हैं जबकि उच्च परिमाण वाले भूकम्प विनाशी प्लेट सीमाओं के सहारे आते हैं, जहां पर दो अभिसारी प्लेट आपस में टकराते हैं तथा अपेक्षाकृत भारी प्लेट का हल्के प्लेट के नीचे क्षेपण (Subduction) होता है।
इस दृष्टि से विश्व में परिप्रशान्त मेखला क्षेत्र, अल्पाइन-हिमालय पर्वत श्रृंखला के सहारे स्थित क्षेत्र तथा उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र भूकम्प की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं।
यद्यपि प्लेट के किनारों पर स्थित क्षेत्रों में भूकम्पीय घटनाएं सर्वाधिक होती हैं तथापि प्लेट के मध्यवर्ती भागों में भी कभी-कभी भूकम्प आते हैं। ज्वालामुखी उद्गार की भांति ही भूकम्प को भी आने से रोका नहीं जा सकता है, किन्तु भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील भागों में मानव बसाव को हतोत्साहित करके भूकम्प द्वारा होने वाली जन-धन की हानि को अवश्य कम किया जा सकता है। साथ ही धरातलीय स्थिरता की दृष्टि से अस्थिर एवं कमजोर क्षेत्रों का निर्धारण करके उन क्षेत्रों में मानव बसाव को रोका जा सकता है।
4. सुनामी (Tsunami)
सुनामी समुद्र में उत्पन्न होने वाली अत्यधिक ऊँची और तीव्र गति से चलने वाली लहरों की शृंखला होती है। यह एक प्रकार का प्राकृतिक खतरा है जो अक्सर भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, समुद्र के भीतर भूस्खलन या उल्का-पिंड के गिरने जैसी घटनाओं के कारण उत्पन्न होता है। जब यह खतरा मानव जीवन, संपत्ति और पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचाता है, तब यह एक प्राकृतिक आपदा का रूप ले लेता है।
5. सूखा (Drought)
सूखा (Drought) एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो लंबे समय तक वर्षा के अभाव या अपर्याप्त वर्षा के कारण उत्पन्न होती है। यह प्राकृतिक खतरा कृषि, जल संसाधनों, पर्यावरण, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। सूखा केवल पानी की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक असंतुलन और पर्यावरणीय संकट का कारण भी बनता है।
6. चक्रवात (Cyclone/Hurricane/Typhoon)
जब समुद्र की सतह पर अत्यधिक गर्मी और नमी इकट्ठी हो जाती है, तो वायुमंडलीय दबाव कम होने लगता है और तेज़ हवाओं के साथ यह प्रणाली घूमती है। यही प्रक्रिया चक्रवात कहलाती है। चक्रवात एक प्राकृतिक आपदा है जो समुद्री एवं तटीय क्षेत्रों में सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती है। इसके प्रबंधन हेतु पूर्वानुमान, चेतावनी प्रणाली, तटीय सुरक्षा दीवारें और राहत कार्य बेहद ज़रूरी हैं।
7. भूस्खलन (Landslide)
भूस्खलन (Landslide) प्राकृतिक खतरा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह अचानक होने वाली प्राकृतिक भू-प्रक्रिया है, जिसमें भारी मात्रा में मिट्टी, चट्टानें और मलबा ढलान से नीचे की ओर खिसक जाते हैं। यह घटना अक्सर लोगों, पशुओं और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न करती है। इसी कारण भूस्खलन को प्राकृतिक खतरा (Natural Hazard) की श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि यह मानव जीवन, आजीविका, अवसंरचना और पर्यावरण सभी को प्रभावित करता है।
8. अत्यधिक तापमान (Extreme Temperature)
अत्यधिक तापमान (Extreme Temperature) को प्राकृतिक खतरा (Natural Hazard) इसलिए माना जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली ऐसी चरम स्थिति है जो मानव जीवन, पशु-पक्षियों, कृषि, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
9. जंगल की आग (Forest Fire / Wildfire)
जंगल की आग (Forest Fire / Wildfire) को प्राकृतिक आपदा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होकर बड़े पैमाने पर पर्यावरण, जीव-जंतु, मानव जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुँचाती है।
निष्कर्ष:
स्पष्ट है कि प्राकृतिक भू-आकृतिक प्रकोपों के सम्भावित खतरों एवं प्रभावों के निर्धारण, भविष्यवाणी तथा आकलन एवं प्रबन्धन में भू-आकृति विज्ञान से पर्याप्त सहायता मिलती है।
विश्व स्तर पर यह बहुत बड़ा उद्योग है और इसका अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान है। इस पर कई सहायक अथवा गौण उद्योग निर्भर करते हैं जिससे यह विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियों को काफी बल प्रदान करता है। इस समय भारत में यह उद्योग काफी पनप गया है और इसमें विभिन्न प्रकार के वाहनों का उत्पादन होता है।
हालांकि स्वतंत्रता से पूर्व भारत में मोटर वाहन उद्योग नगण्य था। केवल आयातित पुर्जों को जोड़ कर वाहन बनाए जाते थे। वर्ष 1928 में ‘जनरल मोटर्स’ मुम्बई ने ट्रकों तथा कारों का संयोजन शुरू किया था। फोर्ड मोटर कं. (इण्डिया) लि. चेन्नई में 1930 तथा मुम्बई में 1931 में कारों तथा ट्रकों का संयोजन शुरू किया। इस उद्योग का वास्तविक विकास प्रीमियर ऑटोमोबाइल लि. कुर्ला (मुम्बई) की स्थापना 1941 में तथा हिन्दुस्तान मोटर्स लि. उत्तरपाड़ा (कोलकाता) की स्थापना 1948 में होने में शुरू हुआ। पिछले तीन-चार दशकों में इस उद्योग ने बड़ी उन्नति की है।
1991 की औद्योगिक उदारीकरण नीति से इस उद्योग को काफी लाभ मिला और अब यह हमारी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है। इस समय देश में 15 कंपनियाँ सवारी कारें व बहुउद्देशीय वाहन, 9 कंपनियाँ व्यावसायिक वाहन, 14 कंपनियाँ 2/3 पहिया वाहन, 14 कंपनियाँ ट्रैक्टर तथा पाँच कंपनियाँ इंजन बनाने में सक्रिय हैं।
स्थानीकरण
मोटर वाहन उद्योग मुख्यतः लौह-इस्पात उत्पादक क्षेत्रों के निकट ही पनपता है क्योंकि इसका मुख्य कच्चा माल इस्पात है। यदि टायर, ट्यूब, बैटरी, पेंट तथा अन्य उपयोगी उत्पाद भी निकटवती क्षेत्र में हो तो सुविधा अधिक हो जाती है।
इसके लिए बन्दरगाह भी उपयुक्त होता है क्योंकि वहां पर आयात-निर्यात की सुविधा होती है। सरकार की विकेन्द्रीकरण की नीति के अन्तर्गत दूर स्थित क्षेत्रों को भी प्राथमिकता दी जाती है।
उत्पादन तथा वितरण
भारतीय मोटर वाहन उद्योग को सनराइज (Sun rise) उद्योग कहा जाता है। पिछले दशक में इस उद्योग ने प्रतिवर्ष 10-12 प्रतिशत की दर से उन्नति की। परन्तु 2008-09 में वैश्विक आर्थिक मन्दी के कारण इस उद्योग को भारी क्षति हुई। इसके बाद शीघ्र ही इस उद्योग में विकास हुआ और भारत एक महत्वपूर्ण उत्पादक बन गया। इस समय भारत विश्व का सातवां बड़ा मोटर वाहन उत्पादक, दूसरा बड़ा दो-पहिया उत्पादक, सबसे बड़ा ट्रैक्टर उत्पादक और पाँचवां बड़ा वाणिज्यिक वाहनों का उत्पादक है।
मोटर वाहनों में मुख्य उत्पादक मुम्बई, चेन्नई, जमशेदपुर, जबलपुर तथा कोलकाता हैं। ये केन्द्र ट्रक, बस, कार, ति-पहिये एवं दो-पहिए सहित सभी प्रकार के वाहनों का निर्माण करते हैं। मोटर साइकिल फरीदाबाद, गुरुग्राम तथा मैसूर में बनाए जाने है। स्कूटरों का निर्माण लखनऊ, सतारा, अकुर्डी (पुणे के निकट), पनकी (कानपुर के निकट) तथा ओधव (अहमदाबाद जिला) में होता है। मारुति उद्योग लि. ने हरियाणा के गुरुग्राम में 1983 में कारों का उत्पादन शुरू किया। इस समय देश में 38 इकाइयाँ चार-पहिया, ति-पहिया तथा दो-पहिया वाहनों का निर्माण कर रही हैं।
वाणिज्यिक वाहन:-
वाणिज्यिक वाहन उद्योग को सवारी तथा माल ढोने वाले दो प्रकार के वाहनों में बांटा जाता है। सवारी वाहनों का उत्पादन मुख्यत: सरकारी संस्थानों द्वारा तथा माल ढोने वाले वाहनों का उत्पादन मुख्यत: निजी क्षेत्र में किया जाता है।
इनका उत्पादन 1950 के दशक में शुरू हुआ और 1991 की नई औद्योगिक नीति के बाद इस उद्योग ने बहुत उन्नति की। बस, ट्रक, टैम्पू, तथा तीन पहिया वाहनों का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव क. लि. (TELCO) मध्यम तथा भारी वाहनों का मुख्य उत्पादक है और देश के 70% वाणिज्यिक वाहन बनाता है। चार केंद्रों पर हल्के वाणिज्यिक वाहन बनते हैं ये केंद्र हैदराबाद, पिथमपुर (मध्य प्रदेश), आरसन रूपनगर के निकट (पंजाब) तथा सूरजपुर (उत्तर प्रदेश) हैं। प्रीमीयर ऑटोमोबाइल तथा महेंद्रा एंड महेंद्रा मुम्बई में, अशोका लेलैण्ड लि. एवं स्टैंडर्ड मोटर प्रॉड्क्स ऑफ इंडिया लि. चेन्नई में, हिन्दुस्तान मोटर लि. कोलकाता में तथा बजाज टैम्पो लि. पुणे में सक्रिय है।
उपरोक्त निर्माताओं के अतिरिक्त रक्षा मंत्रालय के अधीन शक्तिमान ट्रक तथा जापान की निस्सान (Nissan) की सहायता से जबलपुर में निस्सान जीप का उत्पादन होता है।
सवारी मोटर वाहन:-
गुरुग्राम (हरियाणा) स्थित मारूति उद्योग लि. अग्रणीय है। जापान की सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन के सहयोग से स्थापित की गई इस कंपनी ने 1983 में उत्पादन शुरू कर दिया था। इस समय यह भारत की लगभग 80% कारें बनाती है। इसने कई मॉडल बनाये हैं जिनमें से जैन, बेगन-R, एस्टीम, स्विफ्ट तथा जिप्सी अधिक लोकप्रिय हैं।
मारुति 800 का उत्पादन बन्द कर दिया गया है। हिन्दुस्तान मोटर्स (कोलकाता एवं चेन्नई) तथा प्रीमियम ऑटोमोबाइल्स (मुम्बई), स्टेण्डर्ड मोटर प्रॉड्क्स (चेन्नई) तथा सनराईज इंडस्ट्रीज (बैंगलूरू) अन्य उत्पादक हैं।
1991 की उद्योग नीति के बाद अन्य कंपनियों ने भारत में मोटर वाहन उद्योग में सहयोग दिया। इनमें हुंडई (तमिलनाडु), दायवू (Deawoo of Korea) सूरजपुर (उत्तर प्रदेश), टेल्को, पिम्परी (पुणे के निकट), होंडा आदि प्रमुख हैं।
⇒ जनरल मोटर्स ने ओपेल आस्तरा मैदान में उतारी हैं।
⇒ महेंद्रा के सहयोग से फोर्ट मोटर्स ने फार्ड का निर्माण किया है।
⇒ जापान के मित्शुविशी के सहयोग से मध्य आकर की लान्सन प्रस्तुत की है।
⇒ टेल्को के सहयोग से जर्मनी की मर्सिडीज वैन्ज ने E 220 तथा 250D मॉडल बाजार में उतारे हैं।
⇒ 1998 के अन्तिम चरणों में छोटे एवं मध्यम सवारी कार में बहुत-सी नई गाड़ियां आई जैसे- डेबू की माटिज, टाटा की इंडिका, हुंडई की सेन्ट्रा व मारुति की बेंगन आर, फियट की उनों, अपोलो की कोर्सा आदि।
⇒ 2008 में टाटा ने नानो नामक छोटी कार की रूपरेखा प्रस्तुत की। यह अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी।
इस उद्योग के विकास में कई कारकों का सहयोग रहा। उत्पाद शुल्क (Excise duty) में कमी होने से इस उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला। सवारी गाड़ियों पर उत्पाद शुल्क कम होने से इनकी कीमत कम हो गई और बाजार में इनकी मांग बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप सवारी मोटर वाहनों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सरकार की भारत को एशिया का बहुत बड़ा मोटर वाहन उत्पादक देश बनाने की नीति से भी इस उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला। भारतीय बाजार में 65% छोटी कारें हैं जो ‘A’ तथा ‘B’ वर्ग की हैं। इन कारों की कम कीमत एवं इनकी उच्च गुणवत्ता के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं।
भारत में कार पैठ (Car penetration) केवल 28 प्रति हजार व्यक्ति है जो यू. के. की 473 प्रति हजार, संयुक्त राज्य अमेरिका की 816 प्रति हजार, न्यूजीलैण्ड की 837 प्रति हजार तथा आइस लैण्ड 866 प्रति हजार की तुलना में काफी कम है। जहां तक कि अफगानिस्तान (47), भूटान (57) तथा इण्डोनेशिया (77) जैसे पिछड़े दिशों में भी भारत की अपेक्षा कार पैठ बेहतर हैं। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत में मोटर कार उद्योग की मांग बढ़ेगी और भविष्य में यह उद्योग काफी उन्नति करेगा। इस उद्योग के लगभग 87 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ने का अनुमान है।
ऋण की सुविधा से भी इस उद्योग को काफी प्रोत्साहन मिला है। एक समय था जबकि ऋण के लिए लम्बी प्रक्रिया होती थी और ऋण प्राप्त करने में काफी समय लगता था। अब विभिन्न स्रोतों से ऋण आसानी से मिल जाता है और ग्राहकों की क्रय क्षमता बढ़ जाती है। इस समय लगभग 70% कारें ऋण लेकर ही खरीदी जाती हैं।
जीप (Jeeps):-
भारत की लगभग समस्त जीप मुम्बई स्थित महेन्द्रा बनाता है। इसकी वार्षिक क्षमता लगभग 13,000 जीप है।
दो-पहिया वाहन:-
इस वर्ग में मोटर साइकिल, स्कूटर, मोपेड तथा स्कूटी आदि सम्मिलित हैं। यह उद्योग 1950 में शुरू हुआ जब आटोमोबाइल प्रोडक्टस ऑफ इंडिया ने स्कूटरों का निर्माण शुरू किया। वर्ष 1960 में बजाज ऑटो ने इटली की पिआजियों के सहयोग से स्कूटरों का निर्माण शुरू किया। 1980 के दशक में भारत के दो पहिया वाहन उद्योग में अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा शुरू हो गई। विश्व की लगभग सभी बड़ी कंपनियों ने इनका निर्माण शुरू कर दिया। सबसे पहले 1984 में सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन ने (TVS) का निर्माण शुरू कर दिया। इसके अगले वर्ष होंडा ने अपने पैर जमाए। इसके बाद कावासाकी एवं यामाह ने क्रमशः बजाज ऑटो एवं एस्कॉर्ट के साथ समझौते किए। पियाजियों ने (LMR) बाजार में उतारा।
⇒ हीरो होंडा, अपने धारूहेड़ा प्लांट की क्षमता बढ़ा रहा है और इसने गुरुग्राम में एक नया प्लांट लगाया है।
⇒ यामाह एस्कॉर्ट नए वाहनों के निर्माण की योजना बना रहा है और अपने सूरजपुर प्लांट का विस्तार कर रहा है।
⇒ सार्वजनिक क्षेत्र के यूनिट हैदराबाद, बैंगलूरू, सतारा, लखनऊ तथा अलवर में सक्रिय हैं।
⇒ मोटर साइकिल उत्पादन की इकाइयाँ नई दिल्ली, चेन्नई, मैसूर तथा गुड़गांव में हैं। दो पहिया वाहनों में सबसे अधिक बिक्री मोटर साइकिलों की है।
इस समय भारत विश्व में दो पहिया वाहनों का सबसे बड़ा उत्पादक है। दो-पहिया वाहन उद्योग कुल आद्यौगिक सकल घरेलू उत्पाद का 7% योगदान देता है। इससे 2% GST भी प्राप्त होता है। अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष 190 मिलियन दो-पहिया वाहनों के उत्पादन की क्षमता है। कुल मोटर वाहनों के उत्पादन का लगभग 80% भाग दो पहिया वाहनों का है। भारत में दो पहिया वाहनों के उत्पादन की क्षमता 250 लाख इकाइयाँ है।
भारत में वाहनों का उत्पादन
(हजार इकाईयाँ)
वाहन का नाम
2019-20
2020-21
परिवर्तन (%)
दो- पहिया
21033
18350
– 12.8
सवारी गाड़ियां
3425
3062
– 10.6
तीन- पहिया
1133
611
– 46.1
वाणिज्यिक
757
625
– 17.6
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि सभी मोटर वाहनों के उत्पादन में 2019-20 की तुलना में 2020-21 में कमी आई है। इसका एक मात्र कारण कोविड-19 था।
नगरीय इलाकों में दो-पहिया वाहन व्यक्तिगत परिवहन के भार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश के लगभग 65% दो पहिया वाहन नगरीय एवं उपनगरीय क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। भारत के अधिकांश नगरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर्याप्त नहीं हैं और ऐसी स्थिति में दो-पहिया वाहन अच्छा विकल्प हैं।
उत्तर लिखने का दूसरा तरीका
परिचय
भारत का मोटर वाहन उद्योग विश्व के सबसे बड़े और सबसे तेजी से उभरते औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। यह उद्योग न केवल देश की औद्योगिक वृद्धि का प्रमुख चालक है, बल्कि रोजगार, निर्यात, तकनीकी नवोन्मेष और क्षेत्रीय विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
वर्तमान में भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है और निकट भविष्य में तीसरा सबसे बड़ा बनने की क्षमता रखता है। “मेक इन इंडिया”, “ऑटोमोटिव मिशन प्लान”, और विद्युत वाहन नीति जैसे सरकारी कार्यक्रमों ने इस उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए और अधिक सक्षम बनाया है।
भारत में मोटर वाहन उद्योग का ऐतिहासिक विकास
भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग का विकास विभिन्न चरणों से होकर गुजरा है-
(i) 1940–1960 का दौर:-
उद्योग की शुरुआत मुख्यतः असेंबली यूनिट के रूप में हुई। हिंदुस्तान मोटर्स, प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स जैसी कंपनियाँ बाजार में आईं।
(ii) 1960–1980:-
लाइसेंस राज, सीमित प्रतिस्पर्धा और प्रतिबंधात्मक नीतियों के कारण उत्पादन सीमित रहा।
(iii) 1980–1990:-
मारुति उद्योग लिमिटेड की स्थापना भारतीय यात्री कार बाजार में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई।
(iv) 1991 के बाद का उदारीकरण:-
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के खुलने से सुज़ुकी, ह्युंडई, होंडा, टोयोटा, टाटा मोटर्स आदि ने विनिर्माण इकाइयाँ स्थापित कीं।
(v) 2014 के बाद:-
Make in India, BS-IV और BS-VI जैसे उत्सर्जन मानक, इलेक्ट्रिक वाहन नीति और ग्लोबल सप्लाई चेन में एकीकरण ने उद्योग को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया।
उद्योग की संरचना
भारत का मोटर वाहन उद्योग कई उप-क्षेत्रों में विभाजित है-
⇒ यात्री वाहन (Passenger Vehicles): कारें, यूवी, वैन आदि
⇒ वाणिज्यिक वाहन (Commercial Vehicles): ट्रक, बसें
⇒ द्विचक्र एवं त्रिचक्र वाहन (Two & Three Wheelers): मोटरसाइकिल, स्कूटर, ऑटो-रिक्शा
⇒ इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) और चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर
इन सभी क्षेत्रों में भारत की मजबूत उपस्थिति है, विशेषकर द्विचक्र वाहनों का उत्पादन भारत को वैश्विक नेता बनाता है।
भारत में मोटर वाहन उद्योग का आर्थिक महत्व
(क) जीडीपी में योगदान:-
ऑटोमोबाइल उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश के GDP का लगभग 7–8% योगदान देता है। इसमें विनिर्माण, परिवहन, सेवा क्षेत्र और संबद्ध उद्योग शामिल हैं।
(ख) रोजगार:-
यह क्षेत्र लगभग 37 मिलियन लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। उत्पादन, बिक्री, सर्विस सेंटर, लॉजिस्टिक्स, स्पेयर पार्ट्स और डीलरशिप के माध्यम से बड़े पैमाने पर नौकरियाँ सृजित होती हैं।
(ग) निर्यात:-
भारत ऑटो कंपोनेंट और छोटे वाहनों का बड़ा निर्यातक है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशियाई देशों में भारतीय निर्मित मोटरसाइकिलें विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
(घ) शहरी एवं क्षेत्रीय विकास:-
चेन्नई, पुणे, गुरुग्राम-मानेसर, सानंद, और बेंगलुरु जैसे शहर ऑटोमोबाइल हब के रूप में विकसित हुए हैं, जहाँ उद्योग आधारित शहरीकरण तेजी से बढ़ा है।
सरकारी नीतियाँ और पहल
(1) ऑटोमोटिव मिशन प्लान (AMP 2006–2016 और AMP 2016–2026)
⇒ भारतीय ऑटो उद्योग को विश्वस्तरीय बनाने का लक्ष्य
⇒ विनिर्माण क्षमता, निर्यात और अनुसंधान को बढ़ाने पर बल
⇒ 2026 तक भारत को वैश्विक स्तर पर उत्पादन और नवाचार केंद्र बनाने का उद्देश्य
(2) राष्ट्रीय विद्युत वाहन नीति (FAME Scheme)
⇒ EV खरीद पर सब्सिडी
⇒ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास
⇒ बैटरी निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में पहल
(3) BS-VI उत्सर्जन मानक
2020 में BS-IV से सीधे BS-VI पर शिफ्ट करना एक ऐतिहासिक कदम रहा, जिससे प्रदूषण में कमी और हरित प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ा।
(4) मेक इन इंडिया और PLI Scheme
⇒ High-value components के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन
⇒ EV बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, और विशेष स्टील उत्पादन पर केंद्रित प्रोत्साहन
उद्योग की वर्तमान स्थिति (Present Scenario)
(क) उत्पादन और बिक्री
भारत विश्व में-
⇒ मोटरसाइकिल उत्पादन में पहला
⇒ कार बाजार में चौथा
⇒ वाणिज्यिक वाहनों में पाँचवाँ स्थान रखता है।
(ख) EV सेक्टर का उभार
दो-पहिया इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। टाटा, ओला, Ather, महिंद्रा, और MG जैसे निर्माता EV लाइनअप बढ़ा रहे हैं।
सरकारी योजनाओं के कारण EV का बाजार हिस्सा निरंतर बढ़ रहा है।
(ग) विदेशी निवेश
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में FDI का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है। जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, अमेरिका और चीन प्रमुख निवेशक देश हैं।
भारत में मोटर वाहन उद्योग की चुनौतियाँ
(1) तकनीकी एवं नवाचार चुनौतियाँ
⇒ इलेक्ट्रिक वाहन तकनीक में बैटरी लागत अभी भी बहुत अधिक है।
⇒ स्वदेशी चिप निर्माण और सेमीकंडक्टर सप्लाई की कमी।
(2) बुनियादी ढाँचा (Infrastructure)
⇒ EV चार्जिंग नेटवर्क अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
⇒ सड़क और लॉजिस्टिक्स लागत कई देशों की तुलना में अधिक है।
(3) पर्यावरणीय दबाव
⇒ प्रदूषण कम करने के लिए लगातार कठोर नियम लागू किए जा रहे हैं।
⇒ पारंपरिक पेट्रोल-डीजल वाहनों का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है।
(4) वैश्विक प्रतिस्पर्धा
⇒ चीन, जापान, और दक्षिण कोरिया की कंपनियाँ तकनीक और R&D में बहुत आगे हैं।
⇒ भारत को भी R&D निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
(5) कौशल विकास
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कुशल तकनीशियन और उन्नत इंजीनियरों की मांग तेजी से बढ़ रही है, परन्तु गुणवत्ता आधारित कौशल विकास पर्याप्त नहीं है।
अवसर (Opportunities)
(1) EV और ग्रीन टेक्नोलॉजी
भारत में EV उद्योग के विस्तार की अपार संभावनाएँ हैं।
⇒ बैटरी निर्माण
⇒ हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक
⇒ इलेक्ट्रिक बसें और लॉजिस्टिक वाहन
ये क्षेत्र निवेश का बड़ा अवसर प्रस्तुत करते हैं।
(2) निर्यात हब बनने की क्षमता
सस्ती श्रम लागत, विशाल घरेलू बाजार और मजबूत कंपोनेंट उद्योग भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बना सकते हैं।
(3) डिजिटल परिवर्तन
⇒ स्मार्ट कारें
⇒ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम
⇒ AI आधारित सुरक्षा फीचर
इनके लिए भारतीय IT सेक्टर मजबूत बैकअप उपलब्ध कराता है।
भविष्य की संभावनाएँ
भारत अगले दशक में टॉप-3 ऑटोमोबाइल बाजार बन सकता है।
⇒ PLI स्कीम
⇒ अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों का बढ़ता निवेश
⇒ EV मार्केट का तीव्र विस्तार
⇒ घरेलू अनुसंधान केंद्रों का विकास
इन्हें देखते हुए यह उद्योग GDP में दो अंकों का योगदान कर सकता है।
2030 तक भारत-
⇒ दुनिया का सबसे बड़ा दो-पहिया EV बाजार
⇒ इलेक्ट्रिक बसों का अग्रणी उत्पादक
⇒ ऑटो कंपोनेंट का प्रमुख निर्यातक बन सकता है।
निष्कर्ष:
भारत का मोटर वाहन उद्योग न केवल आर्थिक विकास बल्कि तकनीकी उन्नति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, और ऊर्जा परिवर्तन का भी प्रतीक बन चुका है।
उद्योग तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों, स्वचालन और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। सरकार की प्रगतिशील नीतियाँ और निजी निवेश मिलकर भारत को आगामी वर्षों में वैश्विक ऑटोमोटिव महाशक्ति बना सकते हैं।
शोधकर्ता अपने शोध के लिए समग्र (Whole) से निश्चित संख्या में कुछ सदस्यों या वस्तुओं का चयन (Selection) कर लेता है। इस चयनित संख्या को प्रतिदर्श (Sample) कहा जाता है तथा प्रतिदर्श चयन करने की प्रविधि को प्रतिदर्शन (Sampling) कहा जाता है।
Example:
यदि कोई शोधकर्ता किसी Universities के 5,000 छात्रों में से 50 छात्रों को अपने शोध में सम्मिलित करने के उद्देश्य से चयन कर लेता है, तो यह 50 छात्रों का चुना हुआ समूह प्रतिदर्श (Sample) कहलायेगा तथा इस प्रक्रिया को प्रतिदर्शन (Sampling) कहा जाता है।
शोध कार्य के प्रमुख पद्धतियाँ
शोध कार्य मुख्यत: दो पद्धतियों के आधार पर किया जा सकता है:-
(1) संगणना पद्धति (Census method)
(ii) निदर्शन पद्धति (Sampling method)
संगणना पद्धति में अध्ययन विषय की समस्त इकाईयों का अध्ययन किया जाता है और उसी के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। जबकि निदर्शन पद्धति के अन्तर्गत सभी इकाईयों का अध्ययन न कर समग्र में से कुछ ऐसी इकाईयों को चुना जाता है जो समस्त इकाइयों का अच्छे तरीके से प्रतिनिधित्व करती है। इससे शोधकर्ता अपना ध्यान समग्र (Whole) में व्यर्थ न गवाकर कुछ पर ही केन्द्रित करता है जिससे अध्ययन विषय का गहन अध्ययन, समय और धन की बचत होती है।
⇒ न्यादर्श, प्रतिचयन, प्रतिदर्श, निदर्शन आदि शब्द समानार्थी है। इसके लिए अंग्रेजी शब्द Sampling है।
⇒ दैनिक जीवन में इस पद्धति का बहुत प्रयोग किया जाता है। जैसे- अनाज के बोरे से नमूने लेकर अनाज की जाँच करना, भोजन बनाते समय दाल या चावल के नमूने को लेकर उनकी पकने की जानकारी लेना, रक्त (blood) की बूंद से शरीर के सभी रक्त के बारे में जानकारी प्राप्त करना इत्यादि।
गुडे तथा हाट के अनुसार “प्रतिदर्श जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि एक विस्तृत समूह का छोटा प्रतिनिधि है।”
करलिंगर के अनुसार “किसी जनसंख्या या समष्टि से उसके प्रतिनिधित्व एक अंश चुन लेने को प्रतिचयन कहते है।”
अत: न्यादर्श किसी विशाल समूह, समग्र या योग का एक अंश है जो कि समग्र का प्रतिनिधि है। अर्थात अंश की वही विशेषताएँ है जो कि सम्पूर्ण समूह या समग्र की है।
प्रतिदर्शन करते समय ध्यान में रखने वाले कारक
(factors to be kept in view During Sampling)
Sample का चयन करते समय निम्नांकित तीन बातों पर ध्यान देना काफी महत्वपूर्ण है-
1. जीवसंख्या का का आकार
(Size of population):-
यदि Population का आकार छोटा है जैसे- 200 या 300 तो ऐसी स्थिति में सामान्यतः यह देखा गया है कि Researcher सभी सदस्यों को अपने अध्ययन में शामिल कर लेता है, इस प्रकार इस स्थिति में Sampling का प्रश्न ही नहीं उठता है।
परन्तु यदि Population का आकार बड़ा होता है जैसे- 10,000 या अधिक तो शोधकर्ता को उचित प्रतिदर्श का चयन करना आवश्यक हो जाता है।
2. प्रतिदर्शन की कीमत
(Cost of Sampling):-
Sampling के सभी प्रक्रियाओं की लागत क्या आयेगी और वह शोधकर्ता के बजट के अनुरूप है या नहीं, यह देखना अति आवश्यक हो जाता है। शोधकर्ता को बजट के अनुसार Sampling plan में परिवर्तन करना पड़ता है।
3. जीवसंख्या के सदस्यों की प्राप्यता
(Accessibility of members of populations):-
Sampling करते समय तीसरी बात जो ध्यान में रखना आवश्यक है, वह यह है कि जीवसंख्या के सदस्यों का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि उन्हें आसानी से प्राप्त हो। यदि वे शोधकर्ता के लिए दुर्लभ है तो वैसी परिस्थिति में उन्हें प्रतिदर्श में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है और तब शोधकर्ता को अपनी Planning में परिवर्तन करना पड़ता है।
प्रतिदर्श के आधार (Bases of Samipling)
1. समग्र की एकरूपता
(Homogeneity of whole):-
यदि समग्र विभिन्न इकाइयों में अधिक भिन्नताएं नहीं है तो जिन इकाइयों को चुना जाएगा वे प्रतिनिधित्वपूर्ण होगी। थोड़ी बहुत भिन्नता तो मिलेगी परंतु साधारणतः यदि उनमें एकरुपता मिलेगी तो चयनित इकाईयों के आधार पर निकाला गया परिणाम विश्वसनीय एवं लाभप्रद होगा।
2. प्रतिनिधित्वपूर्ण चयन
(Representative Selection):-
इस पद्धति के अंतर्गत समग्र में से इकाइयों को इस प्रकार चुना जाता है कि वे संपूर्ण का प्रतिनिधित्व करें।
3. अधिक परिशुद्धता की संभावना
(Possibility of much Accuracy):-
निदर्शन में शत प्रतिशत परिशुद्धता लाना मुश्किल है, फिर भी यही कोशिश होनी चाहिए कि निदर्शन अधिक-से-अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण हो। प्रतिनिधित्वपूर्ण निदर्शन वास्तविक स्थिति का प्रतिबिंब होता है और उसके निष्कर्ष भी लगभग ठीक होते है।
सामाजिक घटनाओं की विविधताओं के कारण निदर्शन का चुनाव यदि ठीक कर लिया जाता है तो शुद्धता की संभावना काफी अधिक रहती है।
एक अच्छे प्रतिदर्श की विशेषताएँ
(Characteristics of a good samples)
अनुसंधान की सफलता एक अच्छे प्रतिदर्श पर निर्भर करती है। सामान्यतः एक श्रेष्ठ प्रतिदर्श में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई
(i) जनसंख्या का प्रतिनिधित्व
(Representative of the Population)
(ii) प्रतिदर्श का उचित आकार
(Appropriate Size of the Sample)
(iii) इकाईयों को चुने जाने की समान संभावना
(Equal chance of selection of Study units)
(iv) प्रतिचयन पक्षपात रहित होना चाहिए
(Sample Should be free from Bias)
(v) अध्ययन इकाईयों का उचित अनुपात
(Proper Ratio of Study Units)
(vi) अनुसंधान उद्देश्यों के अनुरूप
(According to The aims of Research)
(vii) समय, श्रम व धन की बचत
(Saving of Time, Labour, and money
(viii) सम्भाव्यता सिद्धांत पर आधारित
(Based on probability Theory)
(ix) अशुद्धियों से मुक्त (free from errors)
(x) तर्क पर आधारित
(Based on logic)
(xi) उच्च विश्वसनीयता स्तर
(High level of Reliability)
प्रतिदर्श के सिद्धांत अथवा सोपान
(Principles of sampling)
प्रतिदर्श चयन करने के लिए किसी-न-किसी प्रतिचयन विधि का प्रयोग किया जाता है। प्रतिचयन सफलतापूर्वक तभी किया जा सकता है जब शोधकर्ता को प्रतिचयन पद्धतियों का आवश्यक ज्ञान हो या उसने उस क्षेत्र में कोई प्रशिक्षण लिया हो। प्रतिदर्श का चुनाव करने के लिए निम्नलिखित पदों या सिद्धांतों का अनुसरण किया जाता है-
⇒ अध्ययन उद्देश्यों का परिभाषीकरण
(Defining the objectives of the Study)
⇒ समष्टि को स्पष्ट करना
(Defining the wholes)
⇒ स्रोत सूची (Source list)
⇒ प्रतिदर्श की इकाईयाँ निर्धारित करना
(Determination of Sample Units)
⇒ प्रतिदर्श के आकार का निर्धारण
(Determination of Sample Size)
⇒ अर्थपूर्ण एवं आवश्यक आंकडों का चयन
(Selection of meaningful and essential Data)
⇒ आवश्यक शुद्धता की मात्रा का पूर्ण निर्धारण
(Predetermination of the degree of the Required precision)
⇒ मापन विधि का परिभाषीकरण
(Defining the method of measurement)
⇒ निर्देश सूची को बनाना
(Construction of Direction list)
⇒ प्रतिचयन विधि का चयन
(Selection of Sampling technique)
⇒ पूर्व परीक्षण (Pre-testing)
⇒ अध्ययन क्षेत्र का सफल संगठन
(Successful organisation of field work)
⇒ आँकड़ों का विश्लेषण तथा सारांश
(Analysis and summary of Data)
न्यादर्श के प्रकार / पद्धतियाँ एवं तकनीक
(Method and Technique of sampling)
न्यादर्श के चयन की प्रमुख पद्धतियाँ निम्न प्रकार से है-
निदर्शन के प्रकार
Probability or Random↓
Non Probability or Non Random↓
1. Simple Random Sampling
साधारण दैव (संयोग) निदर्शन
1. Purposive / Judgement Sampling
उद्देश्यपूर्ण निदर्शन
2. Systematic Sampling
व्यवस्थित निदर्शन
2. Convenience Sampling
सुविधाजनक निदर्शन
3. Stratified Sampling
वर्गीय निदर्शन
3. Quota Sampling
कोटा निदर्शन
4. Cluster Sampling
क्लस्टर निदर्शन
4. Panel Sampling
पैनल निदर्शन
5. Area Sampling
क्षेत्रीय निदर्शन
5. Snowball Sampling
स्नोबॉल निदर्शन
6. Multi Stage Sampling
बहुस्तरीय निदर्शन
1. दैव (संयोग) निदर्शन पद्धति
(Random Sampling method):-
इस पद्धति के द्वारा प्रतिदर्श चुनने के लिए सर्वप्रथम संपूर्ण जनसंख्या (Total Population) की इकाईयों की सूची बनाकर उसकी प्रत्येक इकाई को समान मात्रा में महत्व देते हुए आवश्यक इकाईयों को बिना किसी भी पक्षपात के चुन लिया जाता है और ये चुनी हुई इकाइयाँ सम्पूर्ण जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रतिदर्श में किसी भी इकाई को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता है। इसके अंतर्गत प्रतिदर्श चुनने की अनेक प्रचलित विधियाँ है-
(i) लॉटरी विधि
(Lottery method)
(ii) कार्ड या टिकट विधि
(Card or Ticket Method)
(iii) नियमित अंकन प्रणाली
(Regular marking method)
(iv) अनियमित अंकन प्रणाली
(Irregular marking method)
(v) टिप्पेट प्रणाली
(Tippet method)
(vi) ग्रिड प्रणाली
(Grid method)
(vii) फिसबॉल ड्रा
(Fishbowl Draw)
मुख्य विशेषताएँ:
(i) निष्पक्षता (Impartiality):- चयन की प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति या वस्तु के प्रति पक्षपात नहीं होता।
(ii) समान अवसर (Equal Chance):- प्रत्येक इकाई को चयनित होने का समान अवसर प्रदान किया जाता है।
(iii) सरलता (Simplicity):- यह विधि समझने और प्रयोग करने में सरल होती है।
(iv) प्राकृतिक प्रतिनिधित्व (True Representation):- यह विधि जनसंख्या के सही प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करती है।
दैव निदर्शन के लाभ:
⇒ यह विधि पूर्वाग्रह-मुक्त परिणाम प्रदान करती है।
⇒ प्राप्त नमूना जनसंख्या का सही प्रतिनिधि होता है।
⇒ परिणामों की सामान्यीकरण क्षमता (Generalizability) अधिक होती है।
⇒ यह सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए उपयुक्त होती है।
⇒ इसकी प्रक्रिया वैज्ञानिक और विश्वसनीय होती है।
दैव निदर्शन की सीमाएँ:
⇒ यदि जनसंख्या बहुत बड़ी हो, तो सभी इकाइयों की सूची तैयार करना कठिन होता है।
⇒ कभी-कभी यादृच्छिक रूप से चुने गए नमूने जनसंख्या का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
⇒ तकनीकी या समय-संबंधी सीमाओं के कारण इसका प्रयोग हमेशा व्यावहारिक नहीं होता।
निष्कर्ष:
दैव निदर्शन विधि अनुसंधान में निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने का एक सशक्त माध्यम है। यह न केवल डेटा संग्रहण की प्रक्रिया को वैज्ञानिक बनाती है, बल्कि परिणामों की सटीकता को भी बढ़ाती है। यद्यपि इसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं, फिर भी यह शोध पद्धति में सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली सैम्पलिंग तकनीक मानी जाती है।
2. वर्गीय निदर्शन प्रणाली
(Stratified Sampling method):-
वर्गीय निदर्शन प्रणाली में समग्र (Whole) को सजातीय वर्गों में बाँटकर प्रत्येक वर्ग में निश्चित संख्या में इकाईयाँ दैव निदर्शन आधार पर चयनित की जाती है। इसमें शोधकर्ता समग्र की सभी विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेता है और इसी आधार पर वह सम्पूर्ण को वर्गों में बाँट देता है। इसके बाद प्रत्येक वर्ग में से निदर्शन का चयन करता है। सभी वर्गों से अलग-अलग निदर्शन चुनकर उन्हें मिला दिया जाता है जिसके द्वारा पूर्ण निदर्शन प्राप्त हो जाता है।
अर्थात सांख्यिकी (Statistics) और अनुसंधान (Research) में डेटा संग्रहण के लिए विभिन्न प्रकार की नमूना पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। इन पद्धतियों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विश्वसनीय पद्धति है स्तरीकृत नमूना पद्धति (Stratified Sampling Method)। यह एक संभाव्यता-आधारित (Probability-based) नमूना चयन की तकनीक है, जिसमें संपूर्ण जनसंख्या (Population) को विभिन्न उपसमूहों या “स्तरों” (Strata) में विभाजित किया जाता है, ताकि प्रत्येक स्तर से प्रतिनिधि नमूना प्राप्त किया जा सके।
उद्देश्य:
इस पद्धति का प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-
⇒ नमूने में विविधता को नियंत्रित करना।
⇒ जनसंख्या के प्रत्येक उपसमूह को उचित प्रतिनिधित्व देना।
⇒ परिणामों की सटीकता (Accuracy) और विश्वसनीयता (Reliability) बढ़ाना।
प्रक्रिया (Steps):
(i) जनसंख्या की पहचान (Identification of Population):-
पहले उस संपूर्ण जनसंख्या का निर्धारण किया जाता है, जिसके बारे में जानकारी प्राप्त करनी है।
(ii) स्तरीकरण (Stratification):-
इसके बाद जनसंख्या को किसी समान विशेषता के आधार पर अलग-अलग स्तरों में बाँटा जाता है। उदाहरण – यदि एक विद्यालय के छात्रों का अध्ययन करना है, तो उन्हें कक्षा, लिंग या विषय के आधार पर विभाजित किया जा सकता है।
(iii) नमूना चयन (Selection of Sample):-
प्रत्येक स्तर से यादृच्छिक या अनुपातिक संख्या में व्यक्तियों का चयन किया जाता है।
(iv) डेटा संग्रहण (Data Collection):-
चुने गए नमूनों से आवश्यक सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।
(v) विश्लेषण (Analysis):-
अंततः संपूर्ण डेटा का विश्लेषण कर निष्कर्ष निकाला जाता है।
इसमें प्रत्येक स्तर से समान या विशेष अनुपात में नमूना लिया जाता है, चाहे उसका वास्तविक अनुपात जनसंख्या में कुछ भी हो।
लाभ (Advantages):
⇒ यह विधि नमूना त्रुटि (Sampling Error) को कम करती है।
⇒ प्रत्येक उपसमूह का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
⇒ विश्लेषण अधिक सटीक और विस्तृत रूप से किया जा सकता है।
⇒ छोटे-छोटे भिन्नताओं को भी पहचाना जा सकता है।
सीमाएँ (Limitations):
⇒ यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत समय-साध्य और महँगी होती है।
⇒ स्तरों का सही निर्धारण करना कठिन होता है।
⇒ यदि स्तरों के भीतर एकरूपता न हो, तो परिणाम भ्रामक हो सकते हैं।
उदाहरण:
मान लीजिए किसी विश्वविद्यालय में 5000 विद्यार्थी हैं — 3000 स्नातक (UG), 1500 स्नातकोत्तर (PG), और 500 शोधार्थी (PhD)। यदि शोधकर्ता 10% का नमूना लेना चाहता है, तो स्तरीकृत नमूना पद्धति के अनुसार वह 300 UG, 150 PG, और 50 PhD छात्रों को यादृच्छिक रूप से चुन लेगा। इस प्रकार प्रत्येक समूह का उचित प्रतिनिधित्व होगा।
निष्कर्ष:
इस प्रकार स्तरीकृत नमूना पद्धति अनुसंधान में अत्यंत प्रभावी होती है क्योंकि यह जनसंख्या के सभी उपसमूहों को शामिल कर एक संतुलित और विश्वसनीय परिणाम प्रदान करती है। यद्यपि इसमें समय और संसाधनों की अधिक आवश्यकता होती है, फिर भी यह वैज्ञानिक दृष्टि से सबसे सटीक नमूना चयन विधियों में से एक मानी जाती है।
3. उद्देश्यपूर्ण न्यादर्श प्रणाली
(Purposive Sampling या Judgmental Sampling):-
जब अध्ययनकर्ता सम्पूर्ण समूह (Whole) में से किसी विशेष उद्देश्य से कुछ इकाईयाँ निदर्शन के रूप में चयनित करता है, उसे उद्देश्यपूर्ण सप्रयोजन या सविचार निदर्शन प्रणाली कहा जाता है। इस प्रणाली के द्वारा पक्षपात की संभावना अधिक रहती है क्योंकि शोधकर्ता अपनी इच्छानुसार इकाइयों का चयन करता है। सम्पूर्ण समूह की इकाइयों से शोधकर्ता पहले से परिचित समूह होता है। इस प्रणाली द्वारा यथासंभव उद्देश्य की पूर्ति होती है।
अर्थात उद्देश्यपूर्ण न्यादर्श प्रणाली एक असंभाव्य (Non-probability) नमूना चयन पद्धति है, जिसमें शोधकर्ता अपने अध्ययन के उद्देश्य, अनुभव और ज्ञान के आधार पर नमूना चुनता है। इसमें जनसंख्या के प्रत्येक सदस्य को चुने जाने की समान संभावना नहीं होती, बल्कि केवल वे इकाइयाँ चयनित की जाती हैं जो शोध के उद्देश्य से सबसे अधिक संबंधित होती हैं।
इस पद्धति का मुख्य उद्देश्य अध्ययन की प्रकृति के अनुरूप ऐसे व्यक्तियों, समूहों या क्षेत्रों का चयन करना है जो आवश्यक सूचनाएँ देने में सक्षम हों। उदाहरण के लिए, यदि शोध “कृषि में तकनीकी नवाचार” पर है, तो केवल उन्हीं किसानों का चयन किया जाएगा जिन्होंने नई तकनीक अपनाई हो।
उद्देश्यपूर्ण नमूना चयन के प्रकार:
(i) समानुपातिक उद्देश्यपूर्ण नमूना (Homogeneous Sampling):-
इसमें एक जैसे गुणों वाले व्यक्तियों या समूहों का चयन किया जाता है।
(ii) विविधतापूर्ण नमूना (Heterogeneous Sampling):-
इसमें विभिन्न प्रकार के लोगों या समूहों को शामिल किया जाता है ताकि विविध विचार मिल सकें।
(iii) सर्वोत्तम केस नमूना (Typical Case Sampling):-
किसी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले सामान्य या विशिष्ट उदाहरणों का चयन किया जाता है।
(iv) चरम या असामान्य केस नमूना (Extreme Case Sampling):-
इसमें विशेष रूप से उत्कृष्ट या असामान्य मामलों का अध्ययन किया जाता है।
(v) विशेषज्ञ नमूना (Expert Sampling):-
इसमें किसी विषय के विशेषज्ञों का चयन कर उनसे जानकारी प्राप्त की जाती है।
मुख्य विशेषताएँ:
(i) विवेकाधारित चयन:-
इस प्रणाली में नमूने का चयन शोधकर्ता के विवेक, अनुभव और अध्ययन के लक्ष्य के आधार पर किया जाता है।
(ii) उद्देश्य-निष्ठ पद्धति:-
नमूना चयन का उद्देश्य विशेष समस्या या जनसंख्या वर्ग के व्यवहार, विचार या प्रवृत्ति का गहन अध्ययन करना होता है।
(iii) लचीलापन (Flexibility):-
इसमें चयन की प्रक्रिया में कोई कठोर नियम नहीं होते, जिससे शोधकर्ता अपने अनुसार उपयुक्त इकाइयाँ चुन सकता है।
(iv) गुणात्मक शोध के लिए उपयोगी:-
यह विधि विशेषतः समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, शिक्षा और नृविज्ञान जैसे क्षेत्रों में उपयोगी होती है जहाँ गुणात्मक जानकारी का संकलन आवश्यक होता है।
(v) लागत और समय की बचत:-
चूँकि केवल विशेष व्यक्तियों का चयन किया जाता है, इसलिए यह प्रणाली समय और संसाधन दोनों की दृष्टि से लाभकारी होती है।
लाभ (Advantages):
⇒ यह प्रणाली विशिष्ट विषय पर गहन और सटीक जानकारी प्रदान करती है।
⇒ सीमित समय और संसाधनों में भी अध्ययन संभव होता है।
⇒ शोधकर्ता को अध्ययन की दिशा और दायरे पर पूर्ण नियंत्रण रहता है।
⇒ दुर्लभ या संवेदनशील समूहों (जैसे अपराधी, मरीज, शोध विशेषज्ञ आदि) के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी है।
सीमाएँ (Limitations):
⇒ इसमें शोधकर्ता की व्यक्तिगत पक्षपात (Bias) की संभावना अधिक होती है।
⇒ चयनित नमूना पूरी जनसंख्या का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाता।
⇒ इसके निष्कर्षों का सामान्यीकरण (Generalization) कठिन होता है।
⇒ यह वैज्ञानिक दृष्टि से संभाव्यता आधारित विधियों की तुलना में कम विश्वसनीय मानी जाती है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार उद्देश्यपूर्ण न्यादर्श प्रणाली एक ऐसी विधि है जिसमें शोधकर्ता अपने विवेक, अनुभव और शोध उद्देश्यों के अनुरूप उपयुक्त व्यक्तियों या समूहों का चयन करता है। यह विधि विशेष रूप से गुणात्मक अनुसंधानों के लिए उपयोगी है जहाँ उद्देश्य किसी समस्या की गहराई तक जाना होता है, न कि सांख्यिकीय निष्कर्ष प्राप्त करना। हालाँकि इसमें पक्षपात की संभावना बनी रहती है, फिर भी यह सामाजिक विज्ञानों में अनुसंधान की एक अत्यंत प्रभावी और व्यावहारिक पद्धति मानी जाती है।
Sampling से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (MCQs) – UG, PG, NET/JRF, Pre-PhD एवं Assistant Professor परीक्षाओं के लिए सरल एवं परीक्षा-उपयोगी अध्ययन सामग्री।
1. Sampling means-
निदर्शन (Sampling) का अर्थ है-
(A) Study of whole population / पूरी जनसंख्या का अध्ययन
(B) Selection of a representative part of population / जनसंख्या के एक प्रतिनिधि भाग का चयन
(C) Data analysis / डेटा विश्लेषण
(D) Questionnaire preparation / प्रश्नावली बनाना
(B) Selection of a representative part of population / जनसंख्या के एक प्रतिनिधि भाग का चयन
2. Main objective of Sampling is
Sampling का मुख्य उद्देश्य है-
(A) Save time and cost / समय एवं लागत की बचत
(B) Increase population / जनसंख्या बढ़ाना
(C) Write report / रिपोर्ट लिखना
(D) Prepare maps / मानचित्र बनाना
(A) Save time and cost / समय एवं लागत की बचत
3. Which is a Probability Sampling?
निम्नलिखित में से कौन-सा Probability Sampling है?
(A) Purposive
(B) Random
(C) Convenience
(D) Quota
(B) Random
4. Random Sampling means
Random Sampling का अर्थ है-
(A) Purposive / उद्देश्यपूर्ण
(B) Stratified / स्तरीकृत
(C) Random / यादृच्छिक
(D) Convenience / सुविधाजनक
(C) Random / यादृच्छिक
5. In Random Sampling every unit has
Random Sampling में प्रत्येक इकाई को होता है-
(A) Unequal chance / असमान अवसर
(B) Equal chance / समान अवसर
(C) No chance / कोई अवसर नहीं
(D) Fixed choice / निश्चित चयन
(B) Equal chance / समान अवसर
6. Main feature of Random Sampling
Random Sampling की मुख्य विशेषता-
(A) Unbiased selection / पक्षपात रहित चयन
(B) Researcher’s choice
(C) Small sample only
(D) Qualitative only
(A) Unbiased selection / पक्षपात रहित चयन
7. Purposive Sampling is
Purposive Sampling है-
(A) Probability
(B) Non-Probability
(C) Systematic
(D) Cluster
(B) Non-Probability
8. Purposive Sampling means
Purposive Sampling का अर्थ है-
(A) Random
(B) Stratified
(C) Purposeful / उद्देश्यपूर्ण
(D) Cluster
(C) Purposeful / उद्देश्यपूर्ण
9. Who selects sample in Purposive Sampling
Purposive Sampling में नमूना कौन चुनता है?
(A) Computer
(B) Researcher / शोधकर्ता
(C) Respondent
(D) Government
(B) Researcher / शोधकर्ता
10. Purposive Sampling is mainly used in
Purposive Sampling मुख्यतः उपयोग होती है-
(A) Qualitative research / गुणात्मक शोध
(B) Physics
(C) Chemistry
(D) Mathematics
(A) Qualitative research / गुणात्मक शोध
11. Stratified Sampling means
Stratified Sampling का अर्थ है-
(A) Random
(B) Stratified / स्तरीकृत
(C) Purposive
(D) Convenience
(B) Stratified / स्तरीकृत
12. Population is divided into
Stratified Sampling में जनसंख्या को विभाजित किया जाता है-
(A) Villages
(B) Strata / स्तर
(C) Families
(D) Districts
(B) Strata / स्तर
13. Purpose of Stratified Sampling
Stratified Sampling का उद्देश्य-
(A) Representation of all strata / सभी स्तरों का प्रतिनिधित्व
(B) Increase cost
(C) Waste time
(D) Data collection
(A) Representation of all strata / सभी स्तरों का प्रतिनिधित्व
Q. सामाजिक परिवर्तन से क्या तात्पर्य है? सामाजिक परिवर्तन के प्रतिरूप लिखिए।
Ans- परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जीवन और समाज गतिशील है, परिवर्तनशील है। प्रत्येक समाज में परिवर्तन होता है। सामाजिक परिवर्तन वह परिवर्तन है जिसका सम्बन्ध समाज एवं सामाजिक व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन से है। परिवर्तन समाज एवं जीवन का आधार है। सामाजिक परिवर्तन समाज से सम्बन्धित है। समाज, सामाजिक संगठन सामाजिक सम्बन्ध और सामाजिक ढांचे का सम्मिलित रूप है। समाज के इन भागों में जब परिवर्तन होता है तो इसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है।
किंग्सले डेविस के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन से हम केवल उन्हीं परिवर्तनों को समझते हैं जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज के ढांचे और प्रकार्यों में घटित होते हैं।”
गिलिन एवं गिलिन के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन जीवन की मानी हुई रीतियों में परिवर्तन को कहते हैं। चाहे ये परिवर्तन भौगोलिक दशाओं के परिवर्तन से हों या सांस्कृतिक साधनों, जनसंख्या की रचना या सिद्धान्तों के परिवर्तन से या प्रसार से या समूह के अन्दर ही आविष्कारों के फलस्वरूप हुए हों।”
समाज की भौगोलिक दशाओं में परिवर्तन होने से जीवन की स्वीकृत प्रणालियों एवं मान्य रीतियों में परिवर्तन होने लगता है।
सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ
सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-
(1) सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक घटना है। प्रत्येक समाज में प्रत्येक काल में परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक जनसंख्या में परिवर्तन होता है, उसकी कार्य पद्धतियां बदलती हैं।
यदि परिवर्तन न होता तो आज भी समाज उसी आखेट की अवस्था में होता। मानव की आवश्यकताओं, विचार एवं उसकी मनोवृत्तियों में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।
(2) सामाजिक परिवर्तन अनिवार्य तो है, किन्तु उसकी गति समान नहीं है। एक समाज में परिवर्तन दूसरे समाज से भिन्न होता है अर्थात् एक समाज में परिवर्तन की गति तीव्र हो सकती है जबकि दूसरे में बन्द।
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आए आर्थिक परिवर्तन के साथ उसी गति से सामाजिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आया है।
(3) सामाजिक परिवर्तन प्रत्येक देश, काल और परिस्थितियों में होता रहा है और होता भी रहेगा। समाज चाहे शिक्षित हो अथवा अशिक्षित, आदिम हो या आधुनिक, सभ्य हो या असभ्य परिवर्तन तो सभी में होता रहता है।
(4) सामाजिक परिवर्तन समाज में होने वाले अन्तर से सम्बन्धित होता है। समाज में अन्तर होने से सामाजिक परिवर्तन होता है। जो अन्तर कल था, वह आज नहीं है। सामाजिक संगठन, परिवार, विवाह-प्रथा, परम्परा, रीति-रिवाज और रहन-सहन, आदि में होने वाले अन्तर ही सामाजिक अन्तर हैं।
(5) सामाजिक परिवर्तन वैयक्तिक नहीं होता अर्थात् किसी एक व्यक्ति के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता है। सामाजिक परिवर्तन तो समुदाय के जीवन में आने वाले अन्तरों या विचलनों को कहा जाता है।
(6) सामाजिक परिवर्तन निश्चित नहीं होता है। इसका पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता है। समाज में परिवर्तन अनेक ऐसे कारकों द्वारा होता है जो अचानक होते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी निश्चित नहीं होता कि इसके परिणाम क्या होंगे ?
(7) परिवर्तन भौतिक एवं अभौतिक दोनों वस्तुओं में होता है। भौतिक वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों को नापा जा सकता है जबकि अभौतिक वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों को नापा नहीं जा सकता है।
व्यक्ति के आचार-विचार, रीति-रिवाज तथा मनोवृत्तियों में होने वाले परिवर्तनों को नापा नहीं जा सकता है।
(8) समाज सामाजिक सम्बन्धों की एक सुसम्बद्ध व्यवस्था है। जब समाज के किसी एक भाग में परिवर्तन उत्पन्न होता है तो वह सम्बन्धित दूसरे भागों को भी प्रभावित करता है। इससे सामाजिक परिवर्तन एक श्रृंखलाबद्ध क्रम में होता है।
(9) सामाजिक परिवर्तन से समाज संगठित होता है और कभी-कभी विघटित भी होता है। परिवर्तन की प्रकृति के अनुसार समाज उन्नति एवं अवनति दोनों करता है।
सामाजिक परिवर्तन के प्रतिरूप
सामाजिक परिवर्तन इतनी तीव्रता से हो रहे हैं कि उनका प्रतिरूप जानना कठिन हो रहा है। मैकाइवर एवं पेज ने परिवर्तन के तीन प्रतिरूप बताए हैं:-
(1) औद्योगिक प्रतिरूप:-
इस प्रतिरूप में परिवर्तन की दिशा निरन्तर ऊपर ही रहती है। समाज में होने वाले आविष्कार निरन्तर प्रगतिशील होंगे। मानव ने बैलगाड़ी से लेकर वायुयान तक बना लिए हैं जो उसकी प्रगति के सूचक हैं।
(2) उत्थान एवं पतन प्रतिरूप:-
समाज में परिवर्तन की गति एक निश्चित सीमा तक बढ़कर विपरीत दिशा की ओर मुड़ जाती है। यह उत्थान एवं पतन प्रत्येक क्षेत्र में देखा जा सकता है। आर्थिक क्रियाओं से भी जिस गति से उन्नति होती है, उसी गति से अवनति भी हो जाती है।
(3) चक्रीय परिवर्तन प्रतिरूप:-
इस प्रतिरूप में सामाजिक परिवर्तन की गति एक चक्र की भांति चलती है। विल्फ्रेडो पैरेटो ने अभिजात वर्ग के परिभ्रमण की चर्चा की है। जब अभिजात वर्ग निष्क्रिय हो उठता है तो वह सत्ता पर से अपनी पकड़ खो बैठता है। नीचे से दलित वर्ग ऊपर उठता है और अभिजात वर्ग नीचे लुढ़क जाता है। इसी तरह के परिवर्तन समाज में निरन्तर चलते रहते हैं।
स्प्रंगलर ने अनेक सभ्यताओं का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सभ्यताओं का उद्भव व विकास प्राणियों के समान ही होता है। सभ्यता बाल्यावस्था एवं तरुणाई पार करके परिपक्व अवस्था में आती है अन्ततः उसका क्षय होकर विघटन हो जाता है। यह क्रम निरन्तर चलता रहता है।
जोसेफ आर्नोल्ड टायनबी ने सभ्यता के उद्भव को चुनौती और प्रत्युत्तर का काल माना है। इसमें प्रकृति चुनौती देती है और समाज उस चुनौती का सामना करता है और प्रत्युत्तर देता है। प्रकृति उच्च स्तर पर चुनौती देती है और समाज उसी स्तर पर प्रत्युत्तर देता है। परिपक्वावस्था में समाज में पूर्व जैसी ताकत नहीं रहती, किन्तु पूर्व अनुभवों के आधार पर वह कठिनाइयों का सामना करता रहता है।
अन्त में समाज की सभ्यता और संस्कृति का पतन हो जाता है। इस पुरानी संस्कृति के आधार पर नई संस्कृति का पुनः उद्भव व विकास होता है। इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रतिरूप चक्रीय प्रतिरूप कहलाते हैं।