9. एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Iron-Ore of Asia

9. एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Iron-Ore of Asia)


एशिया का लौह के उत्पादन एवं वितरण

एशिया का लौह

              लौह विश्व की एक महत्वपूर्ण खनिज धातु है। यह पृथ्वी के अन्दर चट्टानों में कच्ची धातु के रूप में पाया जाता है जिसे अग्नि भट्टियों में डालकर उपयोगी बनाया जाता है। दैनिक प्रयोग में आने वाली अनेक मशीने, यातायात के साधन-रेल, मोटर, साइकिल, हवाई जहाज, जलयान, हथियार आदि वस्तुओं को तैयार करने के लिये लौह की ही आवश्यकता पड़ती है। लौह अयस्क निम्नलिखित प्रकार का होता है –

(i) हेमेटाइट: इसमें लौह का अंश 75 प्रतिशत तक होता है। यह आसानी से गल जाता है। यह कठोर तथा कम वजन का होता है। 

(ii) मैगनेटाइट: यह हरे भूरे काले रंग का लौह खनिज है। इसमें लोहे का अंश 72 प्रतिशत तक होता है। यह चुम्बक द्वारा सरलता से आकर्षित हो जाता है।

(iii) लिमोनाइट: इसमें लौह अयस्क अंश 60 प्रतिशत तक रहता है। इसकी खुदाई सरलता से हो जाती है। यह पीले व भूरे रंग में मिलता है। 

(iv) साइडेराइट: इसमें लौह अंश 20-30 प्रतिशत तक होता है। यह अशुद्ध मिश्रित लौह धातु है। यह भी भूरे रंग का होता है।

उत्पादन : 

          एशिया में विश्व का लगभग 14 प्रतिशत लौह उत्पन्न होता है। एशिया के प्रमुख लौह उत्पादक देश चीन, सोवियत एशिया, भारत, उत्तरी कोरिया, फिलीपाइन तथा मलेशिया है। जापान, बर्मा, थाइलैंड, टर्की, पाकिस्तान तथा दक्षिण कोरिया भी कुछ लौह का उत्पादन करते हैं।

चीन: चीन में लौह अयस्क के भण्डारों का अनुमान 46 बिलियन टन का है। अधिकांश लोहा उत्तर के कोयला क्षेत्रों के साथ ही निकाला जाता है। विश्व में लौह-अयस्क के उत्पादन में चीन का प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व में लोह अयस्क के कुल उत्पादन का 28% होता है। चीन विश्व का अग्रणी लौह-अयस्क उत्पादक देश है। चीन में लौह अयस्क के भण्डार शन्सी कोयला क्षेत्र के पास हेबेई और शान्डोंग में पाया जाता है। हुपेड़ तथा चिनलिंग की खानों से भी लोहा निकाला जाता है। अन्य लोहे की खाने भीतरी मंगोलिया, आन्हेई, लिआओनिंग, चिघाई, आदि राज्यों में मिलती है।

एशिया में लौह उत्पादन

देश     उत्पादन (मिलियन टन)

चीन    – 610.0

भारत  -140.0

कजाखस्तान  -19.20

ईरान   -18.20

मलेशिया  -6.6

भारत: भारत एशिया का प्रमुख लोहा उत्पादक देश है। भारत का लगभग 50% लोहा झारखण्ड की सिंहभूम तथा ओडिशा की मयूरभंज एवं क्योंझर की खानों से प्राप्त होता है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की खानों से भी लोहा निकाला जाता है। भारत लोहे का निर्यात करता है। यहाँ से निर्यात जापान, चैक, स्लोवाक, जर्मनी, रोमानिया, इटली, पोलैण्ड, बेल्जियम, हंगरी आदि देशों को होता है। 

कजाखस्तान: मध्य एशियाई देशों में कजाखस्तान लौह अयस्क का उल्लेखनीय उत्पादक देश है। यहाँ लौह अयस्क का खनन कारगाण्डा तथा कोस्तानाय क्षेत्रों में होता है। 

ईरान: यहाँ लौह अयस्क का खान रश्त् (गिलान) क्षेत्र में होता है।

जापान: जापान के मुरोरां जिला तथा कैमेशी क्षेत्र की खानों से भी उत्तम प्रकार की लौह धातु प्राप्त की जाती है। कैमेशी में मिलने वाली लौह धातु मैगनेटाइट श्रेणी की है। अन्य खानों में मोथाइशी तथा ओमोरी हैं। 

मलेशिया: मलेशिया संघ के मलाया प्रायद्वीप की जोहोर तथा ट्रैगानू राज्यों की लौह खानों से लोहा निकाला जाता है। ट्रैगानू राज्य की डुंगन तथा बुकिनवेसी लौह खाने प्रसिद्ध हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार  

          आज के इस्पात युग में लोहे का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मलाया प्रायद्वीप, उत्तरी कोरिया, भारत तथा चीन देश लोहे का निर्यात करते हैं। जापान तथा फिलीपाइन प्रमुख आयात करने वाले देश है।

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया में लौह अयस्क के उत्पादन और प्रमुख उत्पादक देशों पर संक्षेप में प्रकाश डालें।

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Petroleum of Asia

8. एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण 

(Distribution and Production of Petroleum of Asia)


एशिया का पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरणएशिया का पेट्रोलियम

        शक्ति के साधनों में कोयला के बाद पेट्रोलियम का दूसरा स्थान है। परिवहन सुविधा के कारण इसका खर्चा कम आता है। आधुनिक युग में संसार की बढ़ती हुई यातायात की मांग तथा तेज रफ्तार में चलने वाले यंत्रों की चालक शक्ति के कारण पेट्रोलियम की काफी अधिक मांग है। औद्योगिक युग का विस्तार तथा विकास प्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलियम की प्राप्ति पर निर्भर करता है।

उत्पादन: 

          एशिया महाद्वीप विश्व का लगभग 40% खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम का उत्पादन करता है। दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के तेल उत्पादक देश ईरान, इराक, सऊदी अरब, कुवैत, कतार, बहरीन, टर्की, इजरायल, आदि है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया तथा एशियाई रूस में भी तेल का उत्पादन किया जाता है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के पेट्रोलियम उत्पादक देश इण्डोनेशिया, चीन, ब्रूनी, मलेशिया, म्यांमार आदि हैं।

पेट्रोलियम का वितरण (Distribution of Petroleum): 

           एशिया में खनिज तेल का वितरण निम्नलिखित है-

1. दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (South-West Asia):

               दक्षिण-पश्चिम एशिया आज केवल एशिया का ही नहीं बल्कि विश्व को सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ पर पेट्रोलियम का काफी विशाल भण्डार है। यहाँ तेल के अनेक कुएँ हैं। इन तेल भण्डारो को पाइप लाइन से आपस में जोड़ दिया गया है। यह तेल पाइप भूमध्य सागर के पूर्वी किनारे के तट तक फैले हुए हैं।

             हैफा और त्रिपोली बन्दरगाह को इस तेल की बहुत मात्रा इन पाइप लाइन से पहुँचा दी जाती है जहाँ से तेल का निर्यात किया जाता है। ईरान का आबादान तेल शोधन करने का विश्व में सबसे बड़ा केन्द्र है। दक्षिण-पश्चिमी एशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

सऊदी अरब: 

       संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत रूस के बाद सऊदी अरब विश्व का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ रासतबूरा पत्तन के समीप दाहरीन क्षेत्र में तेल कूपों का आविष्कार 1936 में हुआ। इसके बाद अबैक्वेक और घावर क्षेत्र की खोज हुई। इस क्षेत्र में पेट्रोलियम उत्पादन फार्म इतनी शीघ्र प्रगति कर गया कि इस देश में पेट्रोलियम उत्पादन मुख्य पेशा बन गया। यहाँ से लेवनान के सिदोन पत्तन तक पाइप लाईन है। यहाँ पेट्रोलियम की सुरक्षित सम्पत्ति अति विशाल है।

         यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र अल खाबर, अवकेक, हाफर, शेदगम, दम्माम सफानिया, कानिफ खुरेस, आबू अली, आबू, हिरेन, फथीली आदि है। रासतनूरा यहाँ का तेल शोधन केन्द्र है। यहां जल की कमी, तापमान की अधिकता, बालू के स्तूपों की प्रचुरता तथा परिवहन सुविधाओं में कमी पेट्रोल के विकास में प्रधान बाधायें है।

ईरान: 

           सउदी अरब के बाद ईरान एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। लेकिन ईराक-ईरान युद्ध के कारण यहाँ खनिज तेल का उत्पादन काफी गिर गया है। यहाँ 1908 में मस्जिदे सुलेमान पेट्रोल क्षेत्रों के अन्तर्गत पेट्रोल उत्पादन कार्य आरम्भ किया। यहाँ का प्रमुख तेल क्षेत्र आगाजरी, मस्जिदे सुलमान, हफ्ते केल, गाकसरन, नपत खानाह, नपतेशाह, नपते सफीद, लाली, गुलखरी, मारून आदि है।

         आबादान और करमन शाह यहाँ के तेल शोधन केन्द्र है। इस देश में पेट्रोल उत्पादन कार्य एंग्लो ईरानी कम्पनी के द्वारा होता था। अंग्रेज और ईरानी सरकार के बीच मतभेद हो जाने पर 1951 में इस कम्पनी का राष्ट्रीयकरण कर लिया जिससे कुछ समय के लिए उत्पादन कार्य ठप्प हो गया। इस कारण 1953 में यहाँ से मात्र 90 लाख वैरल पेट्रोल प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् पुन: समझौता हो जाने के बाद पेट्रोल उत्पादन की व्यवस्था पूर्ववत हो गयी।

इराक: 

          पेट्रोल उत्पादन में इसका स्थान छठा है। 1927 में किरकुक पेट्रोल क्षेत्र के अन्तर्गत बाबागुरगुर स्थान पर पेट्रोल का पता लगा और वहाँ तेल कूप बनाये गये। सन् 1934 तक पेट्रोल उत्पादन में विशेष प्रगति नहीं हो पायी। कुछ वर्ष पूर्व किरकुक से त्रिपोली तथा हैफा पत्तनी तक तेल की पाइप लाइन बिछाई गयी। 1952 में यहाँ से सीरिया के बनेस स्थान तक पाइप लाइन ले जाई गयी।

        पेट्रोल उत्पादन के लिए डच, फ्रांसीसी तथा अमेरिकन कम्पनियों को लाइसेंस प्राप्त हुए हैं। प्रतिवर्ष यहाँ लगभग 3.4 करोड़ मीट्रिक टन पेट्रोल उत्पन्न किया जाता है। यहां के प्रमुख तेल क्षेत्र ऐनजलेह, मौसल, केयारा, किरकुक, जाम्बुरी, नहर उमर, जुबैर, रूमैला, बसरा खानविवन आदि है। किरकुक यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। दौरा तथा करमनशाह में तेलशोधक कारखाने हैं। इसक अपने कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत तेल निर्यात कर देता है।

कुवैत: 

       सुरक्षित मात्रा के विचार से इसका संसार में तीसरा स्थान है परन्तु उत्पादन में इसका चौथा स्थान है। यहाँ वर्धन क्षेत्र से पेट्रोल प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में पेट्रोल निकालने का लाइसेंस एंग्लो अमेरिकन कम्पनी को प्राप्त हुआ है। यहाँ तेल फारस की खाड़ी के तट के समीप फैला हुआ है। यहाँ के प्रमुख तेल क्षेत्र बरगन, अलजहरा, मगब इत्यादि हैं। बरगन सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। मीना अल अहमदी तेल शोधन केन्द्र तथा निर्यात करने वाला बन्दरगाह है।

कतार:

       फारस की खाड़ी के पश्चिमी तट पर स्थित कतार दक्षिणी-पश्चिमी एशिया का महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश है। यहाँ तेल के 24 कुएँ हैं। दूखन तेल क्षेत्र यहाँ का सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र है। दोहा में तेल शोधक कारखाना है। 

बहरीन:

        कुवैत और कतार के मध्य स्थित बहरीन फारस की खाड़ी का एक महत्वपूर्ण द्वीप है। यहाँ तटीय क्षेत्र में तेल के अनेक क्षेत्र फैले हुए हैं। बहेसि यहाँ का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। बहरीन में तेल शोधक कारखाना भी है। 

सीरिया: 

        यहाँ तेल उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र बनियास है। यहाँ नये तेल क्षेत्रों का पता लगाने के लिए मनहल कम्पनी काफी प्रयत्न कर रही है। होम्स नगर में तेल शोधन कारखाना है।

टर्की: 

       यहाँ का तेल क्षेत्र 1,21,000 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। यहाँ तेल उत्पादक दो क्षेत्र है- (i) रमन और (ii) बरजन। इस क्षेत्र में तेल प्राप्त करने का कार्य सरकार की टर्किश पेट्रोलियम कम्पनी करती है। वरजन तेल क्षेत्र से सन् 1949 ई. में प्रथम बार तेल प्राप्त किया गया। इस क्षेत्र का सम्भावित तेल भण्डार लगभग 525 लाख बैरल है।

        विभिन्न योजनाओं में ईरान और तुर्की के बीच 985 कि.मी. लम्बी पाइप लाइन का निर्माण किया। यहाँ दो पम्पिंग स्टेशनों की स्थापना की गयी। इनकी क्षमता 9000 से 10,000 अश्व शक्ति है। यहाँ प्रतिवर्ष 3.56 करोड़ टन कच्चा तेल पम्प करने के लिए प्राप्त होता है। 

दक्षिणी-पूर्वी एशिया  के तेल:

           क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में तेल के उत्पादन की बहुत कमी है। इसका कारण यहाँ के तेल भण्डारों में सुरक्षित तेल की मात्रा कम होना है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इण्डोनेशिया सबसे अधिक तेल का उत्पादन करता है। इस क्षेत्र के प्रमुख देशों के तेल क्षेत्र निम्न प्रकार है – 

1. इण्डोनेशिया:

         इण्डोनेशिया दक्षिणी पूर्वी एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक राष्ट्र है। यहाँ तेल के प्रमुख क्षेत्र सुमात्रा, जावा तथा कालीमण्टन (बोर्नियों) में है। सुमात्रा से पैलेमबाग, मेदन व जाम्बी, कालीमण्टन (बोर्नियों) में बालिक, पापन व तराकन तथा जावा में रेमबाग तथा सुरखाया प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। सुमात्रा में मेदन तथा साबाग तेलशोधक केन्द्र है।

2. चीन: 

        चीन के दक्षिणी भाग में अनेक तेल के क्षेत्र पाए जाते हैं, जिनमें से काराभाई, तुन्शाजे, सैदाम बेसिन, आदि प्रमुख है।

3. म्यांमार: 

         म्यांमार के प्रमुख तेल क्षेत्र येनाग, सिगू, डण्डो, यनान्मा आदि है। यंगून (रंगून) तथा बेनांगयांग तेल शोधन केन्द्र है। यहाँ से विश्व का लगभग 1% खनिज तेल प्राप्त किया जाता है। यहाँ इरावदी नदी घाटी में तेल के कुएँ खोदे गए है। 

4. मलेशिया: 

               मलेशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र साबाह तथा साराबाक है। लुटांग तेल शोधन केन्द्र है।

5. भारत:

         यहाँ गुजरात तथा असम राज्य प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक है। मुम्बई के निकट मुम्बई हाई से बड़ी मात्रा में खनिज तेल निकाला जाता है। अभी हाल में गोदावरी डेल्टा में, कावेरी डेल्टा में तथा पश्चिमी राजस्थान में भी खनिज तेल के पर्याप्त भण्डार पाए गये है।

प्रश्न प्रारूप 

1. एशिया में पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण की विवेचना कीजिए।

(Discuss the production and distribution of petroleum in Asia.) 

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण / Distribution and Production of Coal of Asia

7. एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण

(Distribution and Production of Coal of Asia)


एशिया का कोयले के उत्पादन एवं वितरण⇒एशिया का कोयले

            शक्ति के साधनों में कोयला संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। आज के औद्योगिक युग में कोयले का महत्व और बढ़ गया है क्योंकि अनेक विशाल उद्योग कोयले पर ही निर्भर है। कोयला पृथ्वी के अन्दर चट्टानों के रूप में अनेक पत में पाया जाता है। इसमें प्रमुख रूप से कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, राख आदि पदार्थ प्राप्त होते है। कार्बन की मात्रानुसार कोयले के निम्नलिखित भेद है-

1. एन्थेसाइट: यह अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 90% से 959 तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जाता है। 

2. विटूमीनस: यह भी अच्छी किस्म का कोयला है। इसमें कार्बनिक मात्रा 75 से 90 प्रतिशत तक होती है। इसका सामान्य प्रयोग उद्योग में शक्ति के रूप में किया जाता है।

3. लिग्नाइट: इसे भूरे कोयले के नाम से जाना जाता है। यह घटिया किस्म का अशुद्ध कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 से 60% तक होती है। इसमें मोम व कृत्रिम पेट्रोल बनाया जाता है।

4. पीट: यह कच्चा कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 40 प्रतिशत होती है। यह कोलतार बनाने में प्रयोग किया जाता है। 

उत्पादन (Production)

          एशिया समस्त विश्व के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27% भाग उत्पादन करता है। एशिया के प्रमुख कोयला उत्पादक देश चीन, भारत, जापान, एशियाई रूस, दक्षिणी एवं उत्तरी कोरिया, टर्की, ताईवान आदि है।

भारत: भारत संसार का लगभग 7% तथा एशिया का 14% कोयला उत्पन्न करता है। यहाँ कोयला झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों से निकला जाता है। कुछ मात्रा में कोयला उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, असम, बिहार तथा जम्मू-कश्मीर में भी है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार देश में 23.411.4 करोड़ टन कोयला के भण्डार है।

जापान: देश का अधिकांश कोयला उत्तरी क्यूशू द्वीप की चिकूहो, सागा, होकुशू तथा मिको खानी से निकाला जाता है। थोड़ी मात्रा होकैडो द्वीप की इशीकारी व कुशिरों खानों से एवं होन्शू की जीवान एवं उबे खानों से निकाला जाता है। जापान अपनी अधिकांश आवश्यकता का कोयला आयात करता है। 

चीन: एशिया एवं विश्व में कोयला का सर्वाधिक उत्पादन चीन में होता है। यहाँ कोयला का खनन हेदी, हिलोगजिआग, हेनान, लिआओनिंग शानडॉग, शान्सी, सिचुआन, निगजिआ तथा नी मंगोल क्षेत्रों में होता है। यहाँ कोयले का उत्पादन विश्व उत्पादन का 35% है। 

कोरिया: उत्तरी कोरिया की एलांग खाड़ी के तट क्षेत्र तथा दक्षिणी कोरिया दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र भी प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र है। उत्तरी कोरिया में दक्षिणी कोरिया की अपेक्षा अधिक कोयला मिलता है।

पाकिस्तान: पाकिस्तान में अच्छे किस्म के कोयले की कमी है परन्तु टर्शियरी किस्म का कोयला यहाँ अधिक पाया जाता है। यहाँ कोयले का उत्पादन 2140 हजार टन है। कोयला यहां रावलपिडी, मजराबल तथा हैदराबाद में पाया जाता है।

म्यांमार: कोयला यहाँ चिन्दविन घाटी तथा शान पठार पर निकाला जाता है। 

थाइलैण्ड: कोयला थाइलैण्ड में दक्षिणी थाइलैण्ड के क्रावी क्षेत्र में मायेमोह की खानों से निकाला जाता है। यह घटिया किस्म का कोयला है। आमफरली में भी लिग्नाइट कोयले के भण्डार मिले हैं। 

मलेशिया: यहाँ घटिया किस्म का कोयला मिलता है जो कुछ गहराई पर निकाला जाता है। इस कारण यह कम निकाला जाता है। मलाया में कोयला सेलांगोर, सारावाक, सिलाप्टेक एवं साबाह में पाया जाता है।

 इण्डोनेशिया: इन्डोनेशिया का सबसे अधिक कोयला सुमात्रा द्वीप में पाया जाता है। कोयले की मुख्य खाने दक्षिण सुमात्रा में बुकिन आसाम तथा मध्य सुमात्रा में ओमविलिन में है। कालीमण्टन की महाकाम क्षेत्र की खानों में भी कोयला का उत्पादन होता है।

ताइवान: कोयला यहाँ का प्रमुख खनिज है। यहाँ के सम्पूर्ण भण्डार का 80 प्रतिशत उत्तरी ताइवान में पाया जाता है। इस कोयले की प्रमुख खाने चिलाओ, नानचुआंग, हिब्रू, कीलंग आदि है। यहाँ का लगभग 75 प्रतिशत कोयला विटमिनस किस्म का है जो धरातल पर कम गहराई में मिलता है।

सोवियत एशिया: कोयला साइबेरिया का मुख्य खनिज है। कोयला के भण्डारों के दृष्टिकोण से यह विश्व का धनी देश है। अन्तर्राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक कांग्रेस के अनुसार साइबेरिया में 1,73,900 करोड़ मीट्रिक टन कोयले का भण्डार है। साइबेरिया में कोयला उत्पादन क्षेत्र हैं- कुण्नेटस्क बेसीन यनीसो, लीना बेसीन चिलियाविस्क, इर्कुटस्क मिनुसिक्स, कारागंडा, आमूर दी की घाटी, ट्रान्स बैकाल ।

बांग्लादेश: खनिज पदार्थ के दृष्टिकोण से यह काफी निर्धन राष्ट्र है। यहाँ घटिया कोयला पाया जाता है। यहाँ के प्रमुख कोयला क्षेत्र रंगपुर, फरीदपुर, खुलना, मैमन सिंह इत्यादि हैं।

अफगानिस्तान: अफगानिस्तान में सबसे अधिक मात्रा में हिन्दुकुश पर्वतीय क्षेत्र में काफी कोयला पाया जाता है। दरे साफ में कोयले का काफी भण्डार है। कोयला को वार्षिक उत्पादन लगभग 150 हजार मीट्रिक टन पाया जाता है। 

       इस प्रकार एशिया समस्त संसार के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 27 प्रतिशत भाग उत्पन्न करता है। संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चीन का स्थान प्रथम है। परन्तु अच्छी श्रेणी के कोयले के उत्पादन के दृष्टिकोण से भारत का स्थान प्रथम है। 

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार (International Trade):

             कोयला का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत महत्वपूर्ण है तथा इसकी माँग भी काफी अधिक है। भारत तथा चीन एशिया के प्रमुख कोयला निर्यात करने वाले देश है। जापान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा बर्मा प्रमुख कोयला आयात करने वाले देश है। कोयले की माँग भी निरन्तर बढ़ रही है। 

प्रश्न प्रारूप

1. एशिया कोयले के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिये। 

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व

(Distribution and Density of Population of India)


भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व⇒

परिचय –

     किसी देश में उत्पत्ति के संसाधनों में जनसंख्या का अधिक महत्व होता है। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और देश की आर्थिक एवं व्यापारिक उन्नति वहाँ पाए जाने वाले जनसंख्या के वितरण, उसके घनत्व एवं लोगों के स्वभाव पर निर्भर करती है। अतः जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को जानना अति आवश्यक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.2 करोड़ है तथा औसतन जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। वास्तव में वर्तमान में भारत विश्व का सघन बसे देशों की श्रेणी में सम्मिलित है। संपूर्ण विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4%  भाग भारत के पास है अर्थात क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवाँ परंतु जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। भारत में विश्व की 17.5 % से अधिक जनसँख्या निवास करती है।     

    भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत ही असमान है। देश की 16.51% जनसंख्या अकेले उत्तर प्रदेश में निवास करती है। यह जनसंख्या जापान की कुल जनसंख्या के बराबर है। जनसंख्या वितरण का सही ज्ञान जनसंख्या घनत्व से  होता है। प्रति इकाई क्षेत्र पर निवास करने वाली व्यक्तियों की संख्या को जनसंख्या घनत्व कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जनसंख्या घनत्व संपूर्ण जनसंख्या एवं क्षेत्रफल का अनुपात है तथा इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

      भारत में जनसंख्या का घनत्व सदैव एक समान नहीं रहा है। यह क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। निम्नलिखित तालिका से इस बात की भली-भांति पुष्टि हो जाती है।

  भारत में जनसंख्या घनत्व (1921-2011)

वर्ष जनसँख्या घनत्व

(प्रति वर्ग किलोमीटर)

1921 81
1931 90
1941 103
1951 117
1961 142
1971 177
1981 216
1991 274
2001 324
2011 382

     इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत के जनसंख्या घनत्व में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1931 से 1991 तक छह दशकों में जनसंख्या घनत्व 3 गुना हो गया है। 1951 से 2011 के बीच जनघनत्व में चार गुनी वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। विगत दशक में घनत्व 58 व्यक्ति प्रति किलोमीटर बढ़ा है जो 1921 से 1951 के मध्य तीन दशकों में हुई कुल 36  से भी अधिक है । 1991 की जनगणना के अनुसार देश में जनसंख्या घनत्व 267 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था जो  2001 में 324 तथा 2011 में 382 हो गई। यह एक ओर  बांग्लादेश, नीदरलैंड, जापान जैसे देशों से कम है तो दूसरी ओर कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और विश्व की तुलना में बहुत अधिक है। देश के विभिन्न भागों में जनसंख्या घनत्व में असमानता है। यह असमानता देश, राज्य और जिला स्तर पर देखने को मिलता है।

       प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व एक ओर अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति का है तो दूसरी ओर दिल्ली का जनघनत्व 11320 है। पहला पर्वतीय क्षेत्र है जहां मानव बसाव की परिस्थितियां सर्वथा प्रतिकूल है जबकि दूसरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है जहाँ मानव बसाव की परिस्थियाँ अनुकूल है। बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश,  हरियाणा उच्च जनघनत्व वाला राज्य है जबकि कई राज्यों में जनसंख्या का घनत्व राष्ट्रीय औसत से भी कम है।

     जनसख्या घनत्व के इस असमान वितरण के लिए कई कारण उत्तरदायी होते है–

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

2. मानवीय कारक

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

    जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक

  • धरातलीय संरचना
  • जलवायु
  • मिट्टी का उपजाऊपन
  • जलापूर्ति
  • खनिज पदार्थ

(i) धरातलीय संरचना-

        समतल मैदानी भाग पठारी भूतल की अपेक्षा घने बसे होते हैं, क्योंकि यहां उत्तम जलवायु व कृषि की सुविधाएं, परिवहन सुविधा और व्यापारिक सुविधा अधिक होती है जैसे- सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र। इसके अलावा पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्रों में जनसंख्या कम होती है, क्योंकि यहां ऊंची नीची और कम उपजाऊ मिट्टी होती है। जैसे दक्कन का पठार पर्वतीय प्रदेशों में है यहां जनसंख्या बहुत कम है।

(ii) जलवायु-

      अनुकूल जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि रेगिस्तान जैसे चरम जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र काफी कम आबादी वाले क्षेत्र हैं। इसलिए, मुंबई और तमिलनाडु शहर जैसे मध्यम जलवायु का अनुभव करने वाले तटीय क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि थार रेगिस्तान और लेह और लद्दाख क्षेत्र मामूली या कम आबादी वाले हैं।

(iii) मिट्टी का उपजाऊपन-

         जहाँ की मिट्टी उपजाऊ होती है वहां मनुष्य को भोजन, वस्त्र, आवास आदि की सुविधाएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाती है। इसीलिए उपजाऊ मिट्टी वाले भूभाग घने बसे होते हैं इसके विपरीत जहां की मिट्टी कम उपजाऊ होती है वहां कम जनसंख्या पाई जाती है। यही कारण है कि गंगा के मैदान वाले क्षेत्रों में आबादी बहुत घनी है जबकि पश्चिमी राजस्थान और पश्चिमी गुजरात कम आबादी वाले क्षेत्र हैं।

(iv) जल-आपूर्ति-

       जिन भू-भागों में पर्याप्त जल उपलब्ध होते हैं वह सघन बसे होते हैं। इसके विपरीत शुष्क एवं जल आभाव वाले क्षेत्रों में जनसंख्या कम निवास करती है। प्राय: यह देखा गया है कि भारत में नदियों की घाटियों एवं डेल्टाई भागों में अधिकांश जनसंख्या निवास करती है। इसका प्रमुख कारण स्वच्छ जल की उपलब्धता ही है। शुष्क एवं पर्वतीय भागों में, जहाँ भूमिगत जल की प्राप्ति में अधिक कठिनाई होती है, जनसंख्या विरल मिलती है।

(v) खनिज पदार्थ-

         खनिज पदार्थों की उपलब्धता जनसंख्या के घनत्व को बढ़ाती है, इसलिए जहां खनिज पदार्थ की उपलब्धता अधिक होगी वहां जनसंख्या भी अधिक होगी। क्योंकि खनिजों के खनन से अनेकों उद्योग का विकास होता है। छोटानागपुर क्षेत्र में खनिज उपलब्धता के कारण ही जनसंख्या का अधिक जमाव पाया जाता है।

2. मानवीय कारक

      जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले मानवीय कारक

  • नगरीकरण
  • परिवहन साधनों का विकास
  • औद्योगिकरण
  • सामाजिक एवं धार्मिक कारण
  • कृषि  योग्य भूमि की उपलब्धता
  • धान क्षेत्र
  • राजनीतिक कारक
  • सरकार की नीतियां

(i)  नगरीकरण- 

     नगरीकरण का मुख्य कारण सुरक्षा, रोजगार, परिवहन, शिक्षा आदि सुविधाओं का नगरों में पाया जाना है। नगर वाणिज्य व्यापार उद्योग तथा प्रशासन के भी केंद्र होते हैं। अतः नगरों में जनसंख्या की अधिक वृद्धि हुई है।

(ii) परिवहन साधनों का विकास- 

       परिवहन साधनों के विकास के साथ-साथ जनसंख्या में भी वृद्धि होती जाती है। जैसे सड़कों के किनारे कस्बों और नगरों एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना हो जाने से जनसंख्या बढ़ती है।

(iii) औद्योगिकरण- 

    औद्योगिक दृष्टि से विकसित प्रदेशों में जनसंख्या का घनत्व उच्च पाया जाता है क्योंकि इन प्रदेशों में रोजगार के अवसर विद्यमान होते हैं। जैसे- जमशेदपुर, भिलाई, तथा दुर्गापुर आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। इसके अतिरक्त देश के महानगरों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव अन्य कारणों की अपेक्षा वहाँ पर स्थगित औद्योगिक भू-दृश्यों के करण भी होता है ।

(iv) सामाजिक एवं धार्मिक कारण- 

    जन-घनत्व के वितरण में सामाजिक, सांस्कृतिक  एवं धार्मिक कारकों की भी अहम भूमिका होती है । पर्वतीय एवं आदिवासी क्षेत्रों में सांस्कृतिक अलगाव की प्रवृति एवं धार्मिक कारणों से स्थानांतरण पर प्रतिबन्ध मिलता है । अत: इन भागों में जनसँख्या की विरलता मिलती है । जैसे पूर्वोत्तर भारत, झारखंड, छतीसगढ़ आदि राज्यों में ।

(v) कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता-

       कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता भारत में जनसँख्या घनत्व को प्रभावित करने वाला एक सर्वप्रमुख कारक है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर रहती है। अत: देश के ऐसे भू-भाग जहाँ कृषि योग्य भूमि की अधिक उपलब्धता है, साथ ही कृषि भूमि के उपजाऊ होने के साथ-साथ अन्य भौगोलिक दशाएँ कृषि कार्यों के लिए अनुकूल है तो उन क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव अधिक मिलता है। गंगा-यमुना का का मैदानी भाग, पूर्वी तटीय भाग तथा मालाबार तट देश के अति सघन बसे भाग है। यह क्षेत्र कृषि के लिए देश के सर्वोत्तम क्षेत्र माने जाते है, जबकि देश के पर्वतीय भाग समतल भूमि की अनुपलब्धता के कारण विरल आबादी वाले है।

(vi) धान क्षेत्र-

         इस अनाज क्षेत्र में अधिक लोगों के जीवन-निर्वाह करने की बेजोड़ क्षमता है । गंगा का मैदान तथा पूर्वी समुद्र तटीय भाग धान के ही क्षेत्र है। यही कारण है कि यहाँ अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक जनसँख्या मिलती है। पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत (झारखण्ड, बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना) के लोगों का मुख्य आहार चावल है। बिहार और केरल में भी घनी आबादी का यही कारण है।

(vii) राजनीतिक कारक- 

       राजनितिक उथल-पुथल, असुरक्षा, असंतोष आदि राजनितिक कारकों ने देश में जनसंख्या वितरण में असमानता उत्पन्न करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवाद बढ़ने के कारण स्थानान्तरण दर में तीव्र वृद्धि भी जनसंख्या वितरण में असमानता का कारण बन गई है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब व असम में आतंकवाद के कारण ही विरल जनसंख्या पाई जाती है।

         जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत के तीन भाग

1. उच्च घनत्व के क्षेत्र-

      इसके अन्दर पूरे देश के लगभग 1/4 जिलें आते हैं। इसका विस्तार बिहार, पश्चिमी बंगाल, केरल,  उत्तर प्रदेश और हरियाणा में है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व (Population Density) 500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से अधिक मिलता है। ये क्षेत्र भारतीय कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। 

2. मध्यम घनत्व के क्षेत्र-

        भारत में लगभग 130 जिलों में 300-500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी घनत्व पाया जाता है। भारत में मध्यम घनत्व के क्षेत्र उत्तरी भारत के उच्च घनत्व के निकटवर्ती क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र के तटवर्ती भाग, छोटा नागपुर के पठार आदि हैं। इन क्षेत्रों में धरातल की विषमता और जल की कमी पाई जाती है। इसलिए ये क्षेत्र कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते. इसलिए इन क्षेत्रों में कम जनसंख्या पाई जाती हैं। पर यहाँ खनिजों का भण्डार है जिससे ये क्षेत्र औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कृषि तथा लघु उद्योगों के विकास के कारण मध्यम घनत्व के कुछ क्षेत्र विकसित हुए हैं। 

3. निम्न घनत्व के क्षेत्र-

      भारत के लगभग 150 जिलों में 300 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से भी कम जनसंख्या का घनत्व मिलता है। उत्तर-पूर्व हिमालयी क्षेत्र में और पश्चिमी भारत में कमी और जनसंख्या का अल्प घनत्व मिलता है। मध्य प्रदेश और उड़ीसा के पठारी और जनजातीय क्षेत्रों, कर्नाटक के पूर्वी भाग और आंध्र प्रदेश के मध्यवर्ती भाग में भौतिक बाधाओं और कृषि के अविकसित होने के चलते कम जनसंख्या पाई जाती है। कच्छ के दलदल वाले क्षेत्र भी निम्न घनत्व वाले क्षेत्र हैं।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. बिहार – 1106
  2. पश्चिम बंगाल – 1028
  3. केरल – 860
  4. उत्तर प्रदेश – 829
  5. हरियाणा – 573

2011 के जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. अरुणाचल प्रदेश –17
  2. मिजोरम – 52
  3. सिक्किम – 86
  4. नागालैंड- 119
  5. हिमाचल प्रदेश –123

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच केंद्रशासित राज्य है-

  1. राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली –11320
  2. चंडीगढ़ – 9258
  3. पुद्दुचेरी – 2547
  4. दमन एवं द्वीप – 2191
  5. लक्षद्वीप – 2149

          जबकि क्षेत्रीय आधार पर भी भारत को तीन जनसंख्या वर्गों में विभाजित किया गया है-

1. उत्तर का मैदानी भाग: 

       भारत में उत्तर का मैदानी भाग सर्वाधिक जनसंख्या रखने वाला क्षेत्र है जिसमें सन् 2011 में देश की लगभग 52 करोड़ जनसंख्या (42.7 प्रतिशत) निवासित थी। उत्तर के मैदानी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश (19.96 करोड़), बिहार (10.38 करोड़), प. बंगाल (9.13 करोड़), राजस्थान (6.86 करोड़), पंजाब (2,77 करोड़) तथा हरियाणा (2.54 करोड़) नामक राज्य देश में सवार्धिक जनसंख्या वाले राज्य हैं।

2. दक्षिण के पठारी भाग:

         जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का दूसरा स्थान है। महाराष्ट्र (11.24 करोड़), मध्य प्रदेश (7.26 करोड़), कर्नाटक (6.11 करोड़) तथा आन्ध्र प्रदेश (8.47 करोड़) दक्षिण के पठारी भाग पर विस्तृत राज्य हैं जिनमें सन् 2011 में देश की 27.3 प्रतिशत जनसंख्या निवासित थी।

3. तटवर्ती,पर्वतीय तथा मरुस्थलीय भाग:

       जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का तिसरा स्थान है। देश के सभी तटीय क्षेत्रों, उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों तथा राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय भागों में प्राकृतिक एवं धरातलीय विषमता के कारण जनसंख्या कम निवासित है।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)   उत्तर प्रदेश – 16.51%

(ii)   महाराष्ट्र – 9.28%

(iii)  बिहार – 8.6%

(iv)  पश्चिम बंगाल – 7.54%

(v)   आंध्रप्रदेश – 6.99%

2011 के जनगणना के अनुसार सबसे कम जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)  सिक्किम – 0.05%

(ii)   मिजोरम – 0.09%

(iii)  अरुणाचल प्रदेश – 0.11%

(iv)   गोवा – 0.12%

(v)   नागालैंड  – 0.16%

निष्कर्ष :

       निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत में जनसंख्या वितरण व घनत्व सभी क्षेत्रों में एक सामान नहीं है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत आबादी मात्र पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,  बिहार,  पश्चिम बंगाल व आंध्रप्रदेश में निवास करती है जबकि 4 प्रतिशत उतरी एवं उत्तरी पूर्वी 10 पर्वतीय राज्यों  में निवास करती है।  साथ ही भारत के जन-घनत्व में 1901 से 2011 तक हमेशा वृद्धि ही  हुआ है।



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34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति / Natural Vegetation of Asiya

6. एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(Natural Vegetation of Asiya)


एशिया के प्राकृतिक वनस्पति⇒

                  प्राकृतिक वनस्पति मूलरूप से जलवायु की दशाओं पर निर्भर होती है। यही कारण है कि एशिया महाद्वीप में मिलने वाली भिन्न-भिन्न प्रकार की जलवायु भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पति को जन्म देती है। इस विशाल भूखण्ड पर प्राकृतिक वनस्पति का विस्तृत आवरण है। एशिया को 12 वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त किया गया है, जिनका वर्णन इस प्रकार है –

(1) आर्द्र सदाबहार वन- ये वन एशिया महाद्वीप के विषुवत् रेखीय प्रदेशों एवं समीपवर्ती मानसूनी प्रदेशों में विस्तृत है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में जहाँ वर्षपर्यन्त वर्षा व उच्च तापमान रहता है वहीं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों में 125 सेमी. से अधिक वर्षा होती है। विषुवत् रेखीय प्रदेशों में मलाया, फिलीपीन्स व इण्डोनेशिया के भाग सम्मिलित हैं।

         दक्षिणी-पूर्वी एशिया में भारत का पश्चिमी घाट, असम, म्यांमार, बांग्लादेश, थाइलैण्ड के वे भाग जहाँ 125 सेमी. से अधिक वर्षा पायी जाती है। उन भागों में ये वन विस्तृत हैं।

         इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में महोगनी, गाटापार्चा, बाँस, बेंत, रबड़, सिनकोना आदि प्रमुख हैं। इन वृक्षों की लकड़ी अत्यधिक कठोर होती है। ये वृक्ष अत्यधिक पास-पास सघन रूप में पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे एक साथ पाये जाते हैं। मुख्य वृक्षों के नीचे अन्य छोटे-छोटे पौधे तथा लताएँ पायी जाती हैं। अत्यधिक वर्षा व उच्च तापमान के कारण यहाँ वृक्ष 55 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।

          ये वृक्ष इतने सघन होते हैं कि सूर्य का प्रकाश तक धरातल पर नहीं पहुँच पाता। इन वनों में पाये जाने वाले कठोर लकड़ी के वृक्ष विविध कार्यों में प्रयोग किये जाते हैं। अत्यधिक मिश्रित होने तथा परिवहन की सुविधा नहीं होने के कारण इन वनों की आर्थिक उपयोगिता बहुत कम है।

एशिया के प्राकृतिक

एशिया के प्राकृतिक वनस्पति

(2) मानसूनी पतझड़ वन- मानसूनी वन क्षेत्र का विस्तार भारत के अनेक भागों तथा म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम, दक्षिणी चीन तथा जावा-सुमात्रा द्वीपों के कुछ भागों तक है।

        जहाँ वर्षा की मात्रा 200 सेमी. के लगभग होती है वहाँ सदाबहार वन पाये जाते हैं एवं 100 से 200 सेमी. के मध्य वर्षा वाले भागों में पतझड़ वन पाये जाते हैं। अधिक वर्षा वाले भागों में सागवान, सिनकोना, महोगनी एवं नारियल वृक्ष होते हैं एवं जहाँ वर्षा 100 सेमी. के लगभग होती है वहाँ शीशम, साल, आम, नीम, जामुन आदि वृक्षों की बहुतायत होती है।

          इन वनों में अधिकांश वृक्ष ग्रीष्मकाल में पत्तियाँ गिरा देते हैं। मानसूनी वनों से प्राप्त होने वाली लकड़ी बहुमूल्य होती है। यह लकड़ी इमारती सामान तथा फर्नीचर बनाने के काम आती है। ये वन सघन तथा लम्बे नहीं पाये जाते हैं। इन वनों की ऊँचाई लगभग 30 मीटर तक पायी जाती है।

(3) शीतोष्ण मानसूनी वन प्रदेश- इन वनों का विस्तार जापान के दक्षिणी भाग, चीन के मध्यवर्ती भाग, मंचूरिया तथा ताइवान तक फैला हुआ है। इन वनों में पाये जाने वाले वृक्षों में ओक, मेपल, लारेल, वालनट, शहतूत आदि प्रमुख हैं। ये वृक्ष ग्रीष्म पत्तियाँ गिरा देते हैं। ये वन अधिक सघन नहीं होते हैं। इन वनों की लकड़ी बहुमूल्य होती ऋतु में अपनी है। जापान के पर्वतीय भागों में इन वनों को काटकर चाय के बागानों में परिवर्तित कर दिया है तथा चीन में इन वनों को काटकर कृषि भूमि बना ली गई है। इस प्रकार इन वनों का विस्तार कम होता जा रहा है।

(4) पर्वतीय वनस्पति- यह वनस्पति हिमालय से लेकर उत्तरी-पूर्वी साइबेरिया के पर्वतीय ढालों पर पायी जाती है जिसे अल्पाइन के नाम से भी जाना जाता है। ऊँचाई के साथ जैसे-जैसे जलवायु में परिवर्तन होता है वैसे ही प्राकृतिक वनस्पति का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है। ऊँचाई के साथ वृक्षों को आकृति छोटी होती जाती है।

          इन वनों में चीड़-देवदार जैसे नरम वृक्ष पाये जाते हैं 1000 मीटर की ऊँचाई तक तो सघन वनस्पति पायी जाती है इसके पश्चात् 3000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भागों पर तो बहुत कम वनस्पति होती है। 4000 मीटर की ऊँचाई के बाद मात्र घास पायी जाती है।

(5) समशीतोष्ण घास के मैदान- समशीतोष्ण घास के मैदान मध्य एशिया में स्थित है। ये मंगोलिया, मध्य मंचूरिया तथा साइबेरिया के दक्षिणी भाग में फैले हुए हैं। मध्य शिया में स्थित इस वृक्षविहीन घास की पेटी को स्टेपी के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है। इस कारण वृक्ष बहुत कम उगते हैं एवं घास बहुतायत में उगती है। ग्रीष्म ऋतु में यह स्टेपी घास झुलस जाती है। ग्रीष्म काल में उच्च ताप, न्यून वर्षा एवं शीत काल में न्यून तापमान व शुष्कता के कारण इस क्षेत्र में स्टेपी घास के अलावा अन्य वनस्पति उगने की सम्भावना नहीं है। इस क्षेत्र की घास गुच्छेदार होती है। जो पशुचारण के लिए उपयोगी होती है। इस क्षेत्र में पशुचारण का अधिक प्रचार है। 

(6) कोणधारी पतझड़ मिश्रित वन- इस प्रकार की वनस्पति मुख्यतः जापान, उत्तरी चीन, कोरिया, दक्षिणी-पूर्वी साइबेरिया तथा तुर्की के पठारी भागों एवं पर्वतीय दालो पर पायी जाती है। यहाँ पतझड़ तथा सदाबहार दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इन वृक्षों में नरम लकड़ी तथा कठोर लकड़ी दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं।

         नरम लकड़ी वाले वृक्षों में मेपल, बैतूल, चौड़ तथा हेमलाक प्रमुख है। जहाँ पर्याप्त वर्षा होती है वहाँ चौड़ी पत्ती वाले सदावहार वृक्ष पाये जाते हैं। चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्षों में शहतूत, तुंग तथा कपूर आदि वृक्ष प्रमुख हैं।

(7) मिश्रित सदाबहार एवं पतझड़ वन- पूर्वी एशिया के सामान्य तापमान तथा पर्याप्त मानसूनी वर्षा वाले भागों में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन पाये जाते हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वन के रूप में मिश्रित वन पाये जाते हैं।

        चीन तथा हिन्दचीन में इस प्रकार की वनस्पति पायी जाती है लेकिन जनाधिक्य के कारण इन देशों में अधिकांश वनस्पति का विनाश हो गया है। अब केवल उच्च भागों में इनके अवशेष हैं। चीन में ऐसे उच्च क्षेत्र नानशान तथा टिसिनलिंग है। यहाँ अनेक प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं। इनके मध्य में घास, बाँस आदि के भी विस्तार हैं।

(8) भूमध्यसागरीय वन प्रदेश- भूमध्यसागर के तटवर्ती देश इजरायल, लेबनान, सीरिया, टर्की के तटवर्ती भाग तथा उत्तरी ईराक, इरान आदि में इस वनस्पति का विस्तार पाया जाता है। वर्षा शीत ऋतु में होती है, ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है लेकिन इस वनस्पति क्षेत्र के वृक्षों को जड़ें लम्बी तथा पत्तियाँ मोटी व चिकनी होने के कारण ग्रीष्मकाल के तीव्र वाष्पीकरण को झेल लेती है। इस कारण वाष्पीकरण कम होता है तथा ये वृक्ष सदैव हरे-भरे रहते हैं।

           जैतून, ओक, अंगूर, अंजीर, नौबू, नारंगी, पाइन व फर इन वनों के मुख्य वृक्ष हैं। इन वनों में रसदार फल बहुतायत में उगते हैं। जैतून, अंगूर, नींबू आदि रसदार फल बहुतायत में पाये जाते हैं।

(9) शुष्क घास के मैदान- इस वनस्पति क्षेत्र का विस्तार ब्लूचिस्तान से लालसागर तक और साइबेरिया के कुछ भागों में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में तीव्र गर्मी व वर्षा की मात्रा अति न्यून होती है जिसके कारण ग्रीष्मकाल में घासें सूख जाती हैं व धरातल वनस्पति विहीन हो जाता है। इस क्षेत्र में केवल वही वनस्पति जीवित रह सकती हैं जो गर्मी व वाष्पीकरण को सहन कर सके। खजूर, बबूल, झाड़ियाँ और ताड़ के वृक्ष यहाँ विकसित हो सकते हैं, क्योंकि इनमें शुष्कता सहन करने की क्षमता होती है।

(10) उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति प्रदेश- एशिया महाद्वीप में उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति का विस्तार भारत के थार के मरुस्थल, अरब, ईराक, इरान आदि के क्षेत्रों में है। इन क्षेत्रों में अल्प वर्षा व उच्च तापमान के कारण इस प्रकार की उष्ण मरुस्थलीय वनस्पति पायी जाती है। रेगिस्तानी भागों में उच्च तापमान व निम्न वर्षा के कारण काँटेदार वृक्ष तथा झाड़ियाँ पायी जाती हैं।

         कंटीली झाड़ियाँ, नागफनी, बबूल, खजूर आदि इस क्षेत्र में पाये जाने वाले प्रमुख वृक्ष हैं। रेगिस्तानी क्षेत्र में पौधों की जड़ें लम्बी, छाल मोटी तथा पत्तियाँ कम एवं काँटे अधिक पाये जाते हैं। यह वनस्पति ईंधन के अलावा और किसी उपयोग की नहीं होती हैं। 

(11) कोणधारी वन प्रदेश (टैगा)- सम्पूर्ण साइबेरिया के उत्तरी भाग में एक लम्बी-चौड़ी पेटी के रूप में पाये जाने वाले कोणधारी वन को टैगा वन कहा जाता है। टैगा वनों को बोरियल वन भी कहा जाता है। इन वनों में स्प्रूस, चीड़, लार्च, हेमलाक, फर, सीडार आदि वृक्ष प्रमुखता से मिलते हैं। टैगा वन प्रदेश में पाये जाने वाले वृक्षों की पत्तियाँ नुकीले आकार की होती हैं, जिनकी नोंक सुई की तरह होती है। अतः इसी कारण इन्हें कोणधारी वन कहते हैं।

          टैगा वन क्षेत्र में ग्रीष्मकाल में तापमान 6° सेल्सियस तक पाया जाता है एवं शीतकाल में तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है। ग्रीष्मकालीन 3-4 महीनों में वर्षा होती है। अत: यहाँ ऐसी वनस्पति पायी जाती है जो लघु समय में विकसित हो सके।

(12) शीत टुण्ड्रा वनस्पति प्रदेश- यह वनस्पति प्रदेश एशिया महाद्वीप के उत्तरी भाग में उत्तरी ध्रुव महासागर के तट पर फैला हुआ है। यहाँ दस महीने तक कठोर सर्दी पड़ती है जिससे भूमि बर्फ से ढकी रहती है। वर्ष भर न्यूनतम तापमान रहता है। इसलिए यहाँ लम्बी शीत ऋतु के कारण मॉस, लाइकेन, काई आदि किस्म की छोटी घास पायी जाती हैं।

प्रश्न प्रारूप 

 Q.8. एशिया महाद्वीप को वनस्पतिक प्रदेशों में विभक्त करते हुये प्रत्येक की प्रमुख विशेषतायें बताइये।

(Divide Asia into the region of vegetation and explain the characteristics of each region.)

Or, एशिया के प्राकृतिक वनस्पति प्रदेशों के नाम बताइये तथा उनमें से किन्हीं दो की विवेचना कीजिए। 

(Name the natural vegetation region of Asia and discuss any two of them.)

Or, “वनस्पति जलवायु का सच्चा सूचक है।” एशिया के सन्दर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।

(Natural vegetation is the true index of climate. Explain this statement in relation to Asia.) 

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