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13. Atlantic Oceanic Currents

13. Atlantic Oceanic Currents

(अटलांटिक महासागर की जलधारा) 

Atlantic Oceanic Currents


Atlantic Oceanic Currents

अटलांटिक महासागर की जलधारा⇒

         अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा फिर का कीमत 8.24 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। उत्तर में यह डेविस की खाड़ी, डेनमार्क जलडमरूमध्य तथा नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिंद महासागर से मिला हुआ है। इसका आकार अंग्रेजी के S- अक्षर के समान है।अटलांटिक महासागर में मंद व तीव्र तथा उष्ण एवं शीतल सभी प्रकार के धाराएं प्रवाहित होती है। अटलांटिक महासागर की प्रमुख धाराएं निम्नलिखित है –

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा

1.उतरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. कैरेबियन जलधारा

3. यूकाटन जलधारा

4. मैक्सिको जलधारा

5. गल्फ स्ट्रीम

6. उतरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह

7. पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा

8. नार्वेजियन जलधारा

9. इरमिंजर जलधारा

10. लैबराडोर जलधारा

11. केनारी जलधारा

(B) दक्षिणी अटलांटिक की जलधारा

1. दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. ब्राजीलियन गर्म जलधारा

3. फॉकलैण्ड जलधारा

4. अंटार्कटिका पछुआ प्रवाह (विश्व मे)

5. वेंगुएला जलधारा

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा 

(1) उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा- इसका विस्तार 0° से 10°N अक्षांश तक होता है। व्यापारिक हवा के कारण इस धारा की प्रवाह दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह अफ्रीका के तट को छोड़ने के बाद अपने गुणों को प्राप्त करती है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य अटलांटिक कटक को पार कर उत्तर पश्चिम की ओर मुड़कर दो शाखाओं में बँट जाती है। वेस्टइंडीज के पूर्व में “एंटीलीज जलधारा” और पश्चिम में “कैरेबियन जलधारा” कहलाता है। कैरेबियन जलधारा ही मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है। 

(2) फ्लोरिडा जलधारा- यह कैरेबियन जलधारा का अग्रभाग है जो यूकाटन चैनल से होती हुई मैं मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है। मैक्सिको की खाड़ी अर्द्धचंद्राकार रूप में है। वुस्ट महोदय के अनुसार यह गर्म जलधारा औसतन 26 मिलियन घन मीटर/सेकंड वार्षिक जलराशि फ्लोरिडा जल डमरूमध्य से होकर अटलांटिक महासागर में लाती है। इस जलधारा का विस्तार 30°N अक्षांश तक रहता है। भूमध्यरेखा से मैक्सिको की खाड़ी तक इस धारा का तापक्रम 75° F तथा सतह की लवणता 36% रहती है। 30°N अक्षांश से आगे एंटीलिस जलधारा से मिल जाती है।

(3) गल्फ स्ट्रीम धारा- यह एक गर्म जलधारा है। इसकी खोज 1513 ई० में पास दि लियोन ने की थी। फ्लोरिडा की धारा का जहाँ अंत होता है वहाँ से यह धारा प्रारम्भ होती है। मैक्सिको की खाड़ी में जन्म लेने के कारण इसका नाम गल्फ स्ट्रीम पड़ा है। यह सेंटलॉरेन्स नदी के मुहाने तक निर्विध्न रूप से चलती है। 40°N अक्षांश के पास तक यह उत्तरी-पूर्वी दिशा में बहती है और इसके बाद एकदम पूर्व की ओर मुड़ जाती है।

                  न्यूफाउंडलैंड तट के पास यह उत्तर की ओर से आने वाले लैब्रोडोर ठंडी जलधारा से मिलकर घना कोहरा उत्पन्न करती है। 45° W देशांतर के बाद गल्फस्ट्रीम कई शाखाओं में बँट जाती है। बिस्के की खाड़ी में बहने वाली धारा रेनेल धारा कहलाती है। यह इंग्लिश चैनल में भी प्रवेश करती है। एक शाखा नार्वे के तट से होकर बहती है जो नॉर्वेजियन जलधारा कहलाता है। आईसलैंड के दक्षिणी किनारे पर चलने वाली शाखा इरमिंजर जलधारा कहलाती है।                              

                 न्यूफाउंडलैंड के बाद गल्फस्ट्रीम धारा की दिशा व प्रवाह गति पर पछुआ पवनों का विशेष प्रभाव पड़ता है। पुनः 40° N अक्षांश पर इसकी दिशा पृथ्वी के विक्षेपक बल के कारण बदलती, 45°W अक्षांश के बाद गल्फस्ट्रीम ही उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह जलधारा कहलाती है।

(4) लैब्रोडोर धारा- उत्तरी अटलांटिक महासागर में लैब्रोडोर तट के सहारे उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूरब की ओर चलने वाली जलधारा लैब्रोडोर जलधारा कहलाती है। यह एक ठंडी जलधारा है। यह उत्तरी ध्रुव महासागर का ठंडा जल खींचकर ले आती है। सेंट लारेंस नदी के मुहाने पर न्यूफाउलैंड द्वीप के समीप यह गल्फस्ट्रीम से मिल जाती है जिससे घना कोहरा बनता है।

(5) केनारी जलधारा- अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम तट के सहारे के केनारी द्वीपों के पास से बहने वाली जलधारा केनारी जलधारा कहलाती है। यह धारा ठंडी है और उतर से दक्षिण दिशा में बहती है। वाणिज्य पवन इसे विशेष गति प्रदान करते हैं। यह धारा आगे चलकर उतरी विषुवतीय जलधारा में मिल जाती है। यह एक उपसतही जलधारा है।

(6) पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा- ग्रीनलैंड के पूर्व से भी एक ठंडी जलधारा दक्षिण की ओर चलती है जिसे पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा कहते हैं। यह उतरी अटलांटिक प्रवाह में मिल जाती है।

                      उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य में जलधाराओं का एक वृत्त बन जाता है जिसकी प्रवाह दिशा घड़ी की सूईयों की गति की तरह होती है। इसके बीच का भाग स्थिर रहता है, जिसमें सारगैसो नामक समुद्री घास उग जाती है। जिसके कारण इसे सारगैसो सागर करते हैं। इसका विस्तार 20° से 35°N के बीच है। लेक के अनुसार दूसरे महासागरों में इस प्रकार की विशेषता नहीं पाई जाती है। मगर मारशक के अनुसार विश्व के महासागरों में ऐसे सागरों की संख्या 6 तक हो सकती है। इसके संबंध में अभी ज्ञान अधूरा है। अतः उनकी उचित खोज आवश्यक है।Atlantic Oceanic Currents

(B) दक्षिणी अटलांटिक की धाराएँ :-

(1) दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय जलधारा- इस धारा का प्रवाह क्षेत्र 0° से 20°S अक्षांश के मध्य पश्चिमी अफ्रीकी तट से प्रारंभ होकर दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट पर जाकर सैनरॉक नामक टापू से टकराकर दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा उतरी विषुवतीय धारा से तथा दूसरी शाखा ब्राजील तट के पास से दक्षिण की ओर गुजरती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाती है। 

(2) विपरीत विषुवतीय जलधारा- इस धारा की दिशा उत्तरी तथा दक्षिणी विषुवतीय धारा के प्रतिकूल दिशा में होती है। यह पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह एक गर्म एवं कम शक्तिशाली जलधारा है। यही धारा पुरब में गिनी खाड़ी में पहुंचकर गिनी गर्म धारा के रूप में प्रवाहित होती है। 

(3) ब्राजील गर्म जलधारा- दक्षिण विषुवतीय धारा दक्षिण अमेरिकी के पूर्वी तट पर सैन रॉक अंतरीप से टकराकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। एक शाखा तट के सहारे उत्तर की ओर चलती है जबकि दूसरी शाखा दक्षिण की ओर चलती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाता है। इसकी जल 40°S अक्षांश के निकट पहुंचकर फॉकलैंड की धारा से मिल जाती है।

(4) फाकलैंड की ठंडी जलधारा- दक्षिणी अटलांटिक में फाकलैंड द्वीप के पास अर्जेंटीना तट के सहारे दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। अंटार्कटिका ड्रिफ्ट का एक अंग होने के कारण यह एक ठंडी धारा है।

(5) दक्षिणी अटलांटिक ड्रिफ्ट या पछुआ प्रवाह – जब 40° अक्षांश के पास ब्राजील व फाकलैंड पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो समुद्री धारा का प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होने लगता है। इसे पश्चिम वायु प्रवाह (West Wind Drift) भी कहते हैं। यह एक ठंडी जलधारा है। अंटार्कटिका महाद्वीप के तट के सहारे चलती है। यह 40° से 60°S अक्षांशों के मध्य बहती है।

(6) बेंगुएला जलधारा- पश्चिमी वायु प्रवाह का कुछ जल पृथ्वी की दैनिक गति के कारण थोड़ा-सा उत्तर की ओर मुड़ जाता है। यह धारा दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। यह एक ठंडी जलधारा है जो कालाहारी मरुस्थल के तट पर चलती है। उत्तर में यह दक्षिणी विषुवतीय जलधारा से मिल जाती है और अंततः चक्र को पूरा करता है।

                 अत: उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तरी एवं दक्षिणी अटलांटिक महासागर में अलग-अलग विशेषताओं से युक्त कई जलधाराएं मिलती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                       अटलाण्टिक महासागर की धाराएँ प्रचलित व्यापारिक पवन, विषुवत् रेखा के उत्तर और दक्षिण में महासागर के धरातलीय जल को प्रेरित करते हैं। इससे यहां का जल दो धाराओं के रूप में पश्चिम की ओर बहता है। इन्हें उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धारा कहते हैं। इस प्रकार से असन्तुलित हुए जलस्तर पर सन्तुलन वापस लाने के उद्देश्य से एक वापसी धारा जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं, उपरोक्त दोनों विषुवतीय धाराओं के बीच पश्चिम से पूर्व की और बहती है। पश्चिमी अफ्रीका के तट के समीप इसे गिनी धारा कहते हैं।

               ब्राजील के साओ राक अन्तरीप के समीप दक्षिणी विषुवतीय धारा दो शाखाओं में बंट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा में मिल जाती है। इस सम्मिलित धारा का कुछ अंश कैरिबियन सागर तथा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है, जबकि शेष भाग वेस्टइंडीज द्वीप समूह के पूर्वी किनारे पर अंटाईल्स धारा के नाम से बहता हुआ गुजरता है।

                जो शाखा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है, उसमें व्यापारिक पवन द्वारा प्रेरित तथा मिसिसिपी नदी द्वारा प्रदत्त अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। इसके परिणामस्वरूप खाड़ी का जलस्तर अटलाण्टिक महासागर के जलस्तर की अपेक्षा कुछ ऊंचा हो जाता है। अतः खाड़ी से जल की धारा फ्लोरिडा के मुहाने से होकर बाहर खुले महासागर में निकलती है, जहां अंटाईल्स की धारा इससे मिल जाती है। फ्लोरिडा अन्तरीप से यह सम्मिलित धारा संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर बहने लगती है। इसे हटेरस अन्तरीप तक फ्लोरिडा धारा कहते हैं। हटेरस अन्तरीप से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप स्थित ग्रैंड बैंक तक इस धारा को गल्फस्ट्रीम कहते हैं। गहरे जल में यह गल्फस्ट्रीम सुस्पष्ट रहती है।

          ग्रैंड बैंक से गल्फस्ट्रीम, पछुआ पवन के प्रभाव में आकर, पूर्व की ओर मुड़ जाती है और अटलाण्टिक के आर-पार उत्तरी अटलाण्टिक धारा के नाम से पूर्व की ओर बहती है। महासागर के पूर्वी भाग में पहुंचकर यह धारा दो मुख्य शाखाओं में बंट जाती है। मुख्य धारा ब्रिटिश द्वीप समूह पहुंचकर वहां के नार्वे के तट पर बहने लगती है, जिसे नार्वे धारा कहते हैं। वहां से यह आर्कटिक महासागर में प्रवेश कर जाती है। दक्षिणी शाखा स्पेन तथा एजोर्स के मध्य दक्षिण की ओर बहती है। यहाँ इसे कनारी धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है। अन्त में यह उत्तरी विषुवतीय धारा में विलीन होकर उत्तरी अटलाण्टिक में धाराओं के चक्र (Gyre) को पूरा करती है। बीच के शान्त क्षेत्र को सारगेसो सागर कहते हैं जो सारगेसम नामक समुद्री शैवाल से भरा हुआ है।
                दो ठण्डी जलधाराएं आर्कटिक महासागर से अटलाण्टिक महासागर में बहती हैं। ये हैं- पूर्वी ग्रीनलैण्ड धारा तथा लेब्राडोर धारा।       

           लेब्राडोर धारा कनाडा के पूर्वी तट पर दक्षिण की ओर  बहती हुई गर्म गल्फस्ट्रीम से मिलती है। भिन्न तापमान वाली इन दो धाराओं के संगम से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप विश्व विख्यात कोहरे का निर्माण होता है। यहां संसार का सबसे महत्वपूर्ण मत्स्य-आखेट क्षेत्र है।

                  दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा साओ राक अन्तरीप से दक्षिण की ओर दक्षिणी अमेरीका के पूर्वी तट से लगी हुई बहती है। इसे ब्राजील धारा कहते हैं। लगभग 35° अक्षांश पर ब्राजील धारा पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं और पछुआ पवन से प्रेरित दक्षिणी अटलाण्टिक धारा से मिलकर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगती है।

                   गुड होप अन्तरीप के निकट, दक्षिणी अटलाण्टिक धारा की एक शाखा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर उत्तर की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे बेंगुएला धारा कहते हैं। यह अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिलकर दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर की धाराओं का चक्र पूरा करती है। एक ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जिसे फाकलैण्ड धारा कहते हैं।


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12. Indian Ocean Currents / हिन्द महासागर की जलधारा

12. Indian Ocean Currents

(हिन्द महासागर की जलधारा)

Indian Ocean Currents


Indian Ocean Currents

हिन्द महासागर की जलधारा⇒

                 हिन्द महासागर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी महासागर है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जो आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़ा हुआ है। पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ा हुआ है। हिंद महासागर के पूर्व में आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और मलाया प्रायद्वीप है। उत्तरी भाग में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप स्थित है। विषुवत रेखा इस महासागर को दो भागों में बांटती है-

(i) उत्तरी हिंद महासागर और

(ii) दक्षिणी हिंद महासागर।

            दक्षिणी हिंद महासागर एक पूर्ण महासागर है। इसमें समुद्री जल धाराएं सामान्य नियमों के अनुरूप प्रवाहित होती है जबकि उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपना मार्ग परिवर्तित करती है। उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है-

(i) मानसूनी जलवायु

(ii) तटीय आकृति तथा

(iii) उत्तर में महाद्वीपीय स्थिति के कारण उत्पन्न तापीय प्रभाव।

                        हिंद महासागर के जलधाराओं का अध्ययन मुख्यतः दो भागों में बांटकर करते हैं-

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा 

(B) उत्तर हिंद महासागर की जलधारा 

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा- 

                  दक्षिण हिन्द महासागर में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण विषुवतीय क्षेत्रों में हिंद महासागरीय गर्म विषुवतीय जलधारा उत्पन्न होती है। यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा की ओर चलते हुए पूर्वी अफ्रीकी तट से टकराती है। लेकिन मेडागास्कर द्वीप के कारण दो भागों में बँट जाती है। 

         प्रथम शाखा मोजांबिक और मेडागास्कर के बीच से गुजरती है जिसे मोजांबिक जलधारा कहते हैं। दूसरी शाखा मेडागास्कर के पूर्वी तट से गुजरती है जिसे मलागासी जलधारा कहते हैं। ये दोनों जलधारायें दक्षिण की ओर अग्रसारित होकर आपस में मिल जाती है और अगुलहास जलधारा को जन्म देती है। यह जलधारा दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर चलती है। यह जल आगे अग्रसारित होकर विश्व स्तरीय जलधारा पछुआ वायु प्रवाह (West Wind Drift) अंटार्कटिक प्रवाह से मिल जाती है।

          अंटार्कटिका प्रवाह पश्चिम से पूरब चलने की प्रवृति रखती है। इसकी उत्पत्ति अंटार्कटिका के हिमानी पिघलने से होती है। इसलिए इसकी प्रकृति ठंडी होती है। अंटार्कटिका प्रवाह का अधिकांश जल प्रशांत महासागर में प्रविष्ट कर जाता है लेकिन थोड़ा बहुत जल ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग से टकराकर दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगती है। यह एक ठंडी जलधारा है जिसे पश्चिमी आस्ट्रेलियन ठंडी जलधारा के नाम से जानते हैं और ये जलधारा अंततः विषुवतीय गर्म जलधारा से मिल जाती है इस तरह ये एक चक्र को पूरा करती है। इसे आगे के मानचित्र में भी देखा जा सकता है।

Indian Ocean Currents
(B) उत्तरी हिंद महासागर की जलधारा –
                       उत्तरी हिंद महासागर एक अपूर्ण महासागर है। इसका नितल काफी छिछला है। हिंद महासागर में भारतीय प्रायद्वीप काफी अंदर तक घुसा हुआ है। आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़े रहने के कारण इसमें ठंडी जलधाराएं नहीं पाई जाती है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जिसमें जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपने दिशा में परिवर्तन लाती है।
             उतरी हिंद महासागर में समुद्री जल जुलाई माह में घड़ी की सुई की दिशा में चलती है। जबकि जनवरी महीने में उत्तरी पूर्वी मानसून या वाणिज्यिक हवा के प्रभाव में आकर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जुलाई के महीने में चलने वाली धारा को दक्षिण-पश्चिम मानसून प्रवाह और जनवरी के महीने में चलने वाली जलधारा को उत्तरी-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं।

         विषुवतीय क्षेत्रों में पूर्वी अफ्रीका के तट पर विशाल जलराशि के जमाव के कारण विषुवतीय प्रति जलधारा का भी निर्माण होता है।

★ दक्षिण पश्चिम मानसून प्रवाह उत्तरी पूर्वी मानसून प्रवाह की तुलना में ठंडी होती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                  हिन्द महासागर की धाराओं का प्रवाह क्रम प्रशान्त एवं अटलाण्टिक महासागर की धाराओं के प्रवाह-क्रम से भिन्नता लिए हुए है। हिन्द महासागर की धाराओं पर स्थलखण्डों एवं मानसूनी पवनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। हिन्द महासागर उत्तर में भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम में अफ्रीका तथा दक्षिण में आस्ट्रेलिया महाद्वीप से घिरा हुआ है फलतः इस महासागर में धाराओं का स्थायी क्रम अस्तित्व में नहीं रह पाता है। उत्तरी हिन्द महासागर में उत्तर पूर्वी तथा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं के कारण वर्ष में दो बार धाराएं अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं। स्पष्ट है कि हिन्द महासागर में स्थायी और सामयिक दोनों ही प्रकार की धाराएं प्रवाहित होती हैं।

(A) सामयिक धाराएं

                        विषुवत् रेखा के उत्तर में हिन्द महासागर की समस्त धाराएं मानसून के प्रभाव से अपनी दिशा एवं क्रम में वर्ष में दो बार परिवर्तन कर लेती हैं। मानसूनी पवनों से प्रवाहित होने के कारण इन्हें मानसून प्रवाह भी कहते हैं।

(1) उत्तर-पूर्वी मानसून धारा- शरदकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं स्थल से जल की ओर चलती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर में अण्डमान तथा सोमाली के बीच पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने वाली उत्तर-पूर्वी मानसून धारा का जन्म होता है। यह धारा 5° उत्तरी अक्षांश से होकर प्रवाहित होती है। यह एशिया महाद्वीप के दक्षिणी तटों के सहारे बहते हुए अफ्रीका के तट पर पहुंचती है। फिर अफ्रीका के शृंग से टकराकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। विषुवत् रेखा के उत्तर में यह पूर्व की ओर मुड़कर पूर्वी द्वीप समूह तक जाती है। इस सम्पूर्ण चक्र को उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं। यह एक मन्द समुद्री धारा है।

(2) भारतीय प्रतिधारा- यह उपर्युक्त 2° से 8° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य शीतकाल में जंजीबार से सुमात्रा के बीच पूर्व की ओर बहने वाली धारा है।

(3) दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा- ग्रीष्मकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) मानसूनी हवाओं की दिशाएं उलट कर दक्षिण-पश्चिमी हो जाती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर का धारा क्रम भी उलट जाता है। उत्तर-पूर्वी मानसून धारा उलट जाती है और उसकी जगह पर दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा का जन्म होता है, जो मोजाम्बिक के पास से प्रारम्भ होकर अफ्रीका के पूर्वी तट के सहारे बहती हुई अरब सागर में प्रवेश करती है और दक्षिणी एशिया के तटवर्ती भागों का अनुसरण करती हुई सुमात्रा के पश्चिमी तट तक पहुंचती है। अन्त में यह भूमध्य रेखीय धारा से मिल जाती है।

(B) स्थायी धाराएं

               हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में स्थायी धाराओं का क्रम पाया जाता है जो निम्नलिखित हैं :

(1) दक्षिणी विषुवत्रेखीय धारा- यह धारा दक्षिणी हिन्द महासागर में 10° से 15° दक्षिणी अक्षांश के बीच आस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बीच दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पश्चिम की ओर बहती है। 10° अक्षांशों के निकट यह मालागासी द्वीप के उत्तर में दो शाखाओं में विभाजित होकर दक्षिण की ओर बहती है।

(2) मोजाम्बिक धारा- उपर्युक्त धारा के मालागासी के उत्तर में दो भाग हो जाते हैं जिसका पश्चिमी भाग मोजाम्बिक धारा कहलाती है। यह शाखा अफ्रीका महाद्वीप और मालागासी द्वीप के बीच भाग से दक्षिण की ओर बहती है।

(3) अगुलहास की धारा-  मेडागास्कर द्वीप के दक्षिण में दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की दो विभाजित शाखाएं पुनः मिलकर एक हो जाती हैं और दक्षिण की और दक्षिण-पूर्व अफ्रीका के तट के सहारे अगुलहास की धारा के नाम से बहते हुए अन्ततः अण्टार्कटिक प्रवाह से मिल जाती हैं।

(4) मालागासी धारा- यह धारा उपर्युक्त वर्णित दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की (जब वह पूर्वी अफ्रीका तट पर दक्षिण की ओर बहती है और मेडागास्कर के उत्तर से दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।) पूर्वी शाखा को ही, जो मेडागास्कर के पूर्व से होकर दक्षिण दिशा में बहती है, मेडागास्कर या मालागासी धारा कहते हैं।

(5) अण्टार्कटिक प्रवाह-  हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम भाग में अगुलहास धारा जब पछुआ हवाओं के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़कर निर्वाध रूप से बड़ी तीव्र गति से पूर्व की ओर बहती है। यह बड़ी ठण्डी धारा होती है।

हिन्द महासागर की धाराओं एवं पवनों में सम्बन्ध तथा ऋत्विक भिन्नता-

              हिन्द महासागर की धाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यहां उत्तरी हिन्द महासागर में प्रवाहित होने वाली धाराएं अस्थायी तथा शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा के अनुरूप होती हैं। जबकि दक्षिणी हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएं स्थायी तो है, परन्तु उनकी गति व दिशा पर भी (प्रत्येक महासागर की धाराओं की तरह) पवनी का प्रभाव दिखाई पड़ता है। पवनों व धाराओं का जितना स्पष्ट सम्बन्ध हिन्द महासागर में दिखाई पड़ता है, उतना किसी भी महासागर में प्रतीत नहीं होता है।

            उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी की मौसमी पवनों तथा धाराओं का अध्ययन किया गया। 1857 से 1952 ई. तक हिन्द महासागर की मौसमी पवनों के 6 माह एक दिशा में तथा 6 माह दूसरी दिशा में प्रवाहित होने के कारणों का पता लगाने के लिए इस क्षेत्र में 16 बार समुद्री खोज की गई।

               1968 में हेले ने स्पष्ट किया था कि मानसून पवनें दक्षिणी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों की पेटी से उत्पन्न होती हैं तथा  पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न विक्षेपक बल के कारण ये पवनें पश्चिमी भारत के वर्षा क्रम के अन्तर्गत आ जाती है।

             पीसारोटी ने अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय समुद्री खोज के समय सिद्ध किया कि जितने जल की मात्रा भूमध्य रेखा को पार करके अरब सागर में पहुंचती है, उससे भी तिगुनी वाष्पभरी पवनें जुलाई के महीने में भारत के पश्चिमी तट को पार करके प्रायद्वीपीय भारत में पहुंचती है।

            लाइट हिल ने 1969 में यह स्पष्ट किया कि हिन्द महासागर में सोमालीलैण्ड के निकट सोमाली धारा केवल स्थानीय क्षेत्र के मानसून पवनों के प्रवाह एवं आयतन को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र की पवनों एवं समुद्र की गति को प्रभावित करती है। इन्होंने भूमध्यरेखीय भागों में स्थित होने के कारण हिन्द महासागर में पवनों की गति का प्रभाव वहां की लहरों पर आंका है।


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11. Ocean current / समुद्री  जलधारा

 11. Ocean current / समुद्री  जलधारा 


Ocean current / समुद्री  जलधारा ⇒

Ocean current                                         

                    मोंकहाउस ने समुद्री जलधारा को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री नितल के ऊपर स्थित विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली सामान्य गति को महासागरीय जलधारा करते हैं।” जलधाराओं के अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलधाराएं नदी के समान होती है। इनके किनारों पर जल लगभग स्थिर होते हैं जबकि मध्यवर्ती भाग में गति अधिक होती है। जलधाराएं न केवल समुद्री सतह के ऊपर चलती है बल्कि गहराई में भी चलती है। जलधाराएं एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जलधाराओं में जल की गति 2 से 10 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। समुद्री जलधाराएं भौतिक विशेषता गति एवं स्थिति के आधार पर कई प्रकार की होती है। जैसे :- भौतिक विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है-

(i) ठंडी जलधारा 

(ii) गर्म जलधारा 

               विषुवतीय क्षेत्र से चलने वाले जलधाराएं गर्म प्रकार की होती है जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली जलधाराएं ठंडी होती है। जैसे – तीनों महासागरों में चलने वाले विषुवतीय जलधारा गर्म जलधारा का उदाहरण है। जबकि हम्बोल्ट (पेरू) जलधारा, अंटार्कटिका, पछुआ प्रवाह ठंडी जलधारा का उदाहरण है। 

            स्थिति के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है। 

(i) सतही जलधारा

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा

(i) सतही जलधारा (Surface Current)- ध्रुवों और भूमध्यरेखीय भागों के बीच तापक्रम में अधिक अंतर पाया जाता है। समुद्री जल गर्म होकर हल्की होती है और ठंडी होकर भारी होती है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं समुद्र सतह के ऊपर से प्रवाहित होती है। ऐसी जलधारा को सतही जलधारा कहते हैं।

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा- ध्रुवों से विषुवतीय क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं ठंडी एवं भारी होती है। इसलिए वे समुद्री नितल के ऊपर से प्रवाहित होने लगती है और धीरे-धीरे गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है। ऐसी जलधाराओं को ही अधोवाहिनी जलधारा या उपसतही जलधारा कहते हैं। 

         गति के आधार पर समुद्री जल धाराएं तीन प्रकार की होती है –

(i) प्रवाह (Drift)- जब सागरीय जल मंद गति से प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है तो उसे प्रवाह कहते हैं। प्रवाह में समुद्री जल केवल ऊपरी सतह पर प्रगतिशील रहता है। प्रवाह की उत्पत्ति में प्रचलित हवाओं का विशिष्ट योगदान है। प्रवाह की कोई निश्चित गति सीमा निर्धारित नहीं है।

(ii) धारा (Current)- धारा की औसत गति 30 से 40 किलोमीटर प्रतिदिन होता है। इसमें समुद्री नितल के ऊपर स्थित संपूर्ण समुद्री जलराशि प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। धारा की गति प्रवाह की तुलना में अधिक होती है।

(iii) स्ट्रीम (Stream)-  स्ट्रीम विशाल मात्रा में समुद्री जलराशि किसी एक निश्चित दिशा में तीव्र गति से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखती है। स्ट्रीम की गति धारा से भी अधिक होती है।

समुद्री जलधारा की उत्पत्ति के कारक

                समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। इसकी उत्पत्ति के कारकों को मोटे तौर पर 4 वर्गों में बांटा जा सकता है – 

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक (पृथ्वी की आकृति एवं गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की घूर्णन गति)

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक (वायुदाब, वायु की दिशा, वाष्पीकरण, वर्षण)

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े हुए कारक (लवणता, घनत्व, तापमान)

(4) धाराओं की दिशा को प्रभावित करने वाला कारक (समुद्री नितल की उच्चावच, तटीय आकृति, मौसम परिवर्तन, पृथ्वी का भ्रमण/कोरियोलिस बल)

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक- पृथ्वी की आकृति, गुरुत्वाकर्षण बल एवं घूर्णन गति का प्रभाव जलधाराओं की उत्पत्ति पर पड़ता है। विषुवत रेखा पर गुरुत्वाकर्षण बल न्यूनतम एवं अपकेंद्रीय बल अधिकतम होता है। जबकि ध्रूवों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिकतम तथा अपकेंद्रीय बल न्यूनतम होता है। इसके कारण विषुवतीय प्रदेश का सागरीय जल ध्रूवों की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखता है।

                      अर्थात पृथ्वी अपने दोनों ध्रुवों पर नारंगी की तरह धँसी हुई है। जबकि विषुवतीय भाग में ऊपर उठी हुई है। पुनः ध्रुवीय भागों में गुरुत्वकर्षण शक्ति अधिक होने के कारण जल का ऊपरी स्तर नीचे की ओर दवा हुआ रहता है। जबकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण क्षमता कम होने के कारण जल का स्तर ऊपर उठा रहता है। फलतः उच्च  जल स्तर से निम्न जल स्तर की ओर जल में प्रवाह की प्रवृति होती है।

                    इसी तरह पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण ही जलधाराएँ उत्पन्न होती है। पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। चूंकि समुद्र की सतह ठोस है। जबकि समुद्री पानी द्रव है। इसीलिए जब पृथ्वी पश्चिम से पूरब घूमती है तो समुद्री जल में पूरब से पश्चिम की ओर क्षैतिज गति उत्पन्न होती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण सभी विषुवतीय गर्म जलधाराएँ हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का पर प्रभाव समुद्री सतह पर जलधारा सर्वाधिक विषुवतीय क्षेत्र में ही पड़ता है।

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक- वायुमंडलीय कारकों के अंतर्गत को शामिल किया जाता है-

(i) वायुदाब

(ii) वायु की दिशा 

(iii) वाष्पीकरण

(iv) वर्षण 

वायुदाब- सामान्यत: निम्न वायुदाब प्रदेश के जल उच्च वायुदाब प्रदेश की तरफ गतिशील हो जाते हैं क्योंकि दोनों के जलसतह में अंतर होता है। जैसे – केनारी जलधारा, कैलिफ़ोर्निया जलधारा ये सभी उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है।

वायुदिशा/प्रचलित पवनें एवं घर्षण बल- समुद्री जलधाराओं के निर्धारण में वायुदिशा का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः इतना प्रभाव किसी भी अन्य कारक का नहीं है। वायुदिशा के अनुरूप समुद्री जलधाराएं हजारों किलोमीटर तक प्रवाहित होती है। विश्व के प्रमुख प्रचलित वायु के समानांतर ही कई जलधाराएं चला करती है।

जैसे – 

◆ उत्तरी-पूर्वी वाणिज्य हवा- उत्तरी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ दक्षिणी-पूर्वी वाणिज्य हवा- दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ उत्तरी गोलार्ध की पछुआ वायु- उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह और उत्तरी प्रशांत प्रवाह 

◆ दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ वायु- पश्चिमी वायु प्रवाह

वाष्पीकरण- अधिक वाष्पीकरण के कारण जल की मात्रा कम हो जाती है। साथी जल की लवणता एवं घनत्व में वृद्धि होती है। इन सबका सम्मिलित प्रभाव यह होता है कि अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में जल का तल नीचा हो जाता है।  फलस्वरुप कम वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों से अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों की ओर समुद्री जल जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। 

वर्षण- जिन क्षेत्रों में वर्षण क्रिया से अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। उन क्षेत्रों से जल कम वर्षण वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। जैसे – विषुवतीय क्षेत्र में वर्षण की क्रिया से अधिक जलापूर्ति होने के कारण जलधाराएँ उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के कम वर्षा वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है।

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े कारक / अंतः समुद्री कारक- सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिसके कारण जल धाराओं की उत्पत्ति होती है। तापमान के कारण लवणता प्रभावित होती है और लवणता के कारण जल का घनत्व प्रभावित होता है। अतः ये तीनों कारक आपस में जुड़े हुए हैं। सामान्यतः निम्न घनत्व के जल अधिक घनत्व जल की तरफ गतिशील होते हैं। जैसे- निम्न घनत्व वाले अटलांटिक महासागर का जल अधिक घनत्व वाले भूमध्यसागर की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। सामान्यत: समुद्री जलधारा की उत्पत्ति में घनत्व का सबसे कम प्रभाव है।

समुद्र जल का तापमान- समुद्र की सतह के तापीय विषमता ही जल धाराओं को उत्पन्न करती है। जैसे निम्न अक्षांश क्षेत्र के जल उच्च अक्षांश क्षेत्र की तुलना में गर्म होती है। इसका परिणाम यह है कि सभी समुद्रों में जलधारा की सामान्य प्रवाह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ होती है। गर्म जल सापेक्षिक रूप से उठे हुए होते हैं। इसी तरह ध्रुवोय क्षेत्रों में हिमानी के कारण और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होने के कारण जल का तापमान कम हो जाता है। ऐसे जल उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर प्रवाहित होती है।

(4) समुद्री जल धाराओं के दिशाओं को प्रभावित करने वाले कारक

उच्चावच एवं तट की आकृति- समुद्री नितल का उच्चावच और तटीय आकृति समुद्री जलधाराओं की दिशा निर्धारण में मदद करते हैं। इसलिए इसे संशोधनात्मक कारक कहा जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उत्तरी अटलांटिक महासागर में विषुवतीय गर्म जलधारा का मध्य अटलांटिक कटक के पास उत्पन्न प्रतिरोध के कारण उत्तर की तरफ मुड़ जाना है। इसी तरह सभी विषुवतीय जलधाराएं महाद्वीपों के पूर्वी तट से टकरा कर निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ चलने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसी तरह छोटे द्वीपों के कारण जलधाराएं कई भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होती है।

                                          पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न कोरियोलिस बल या विक्षेप बल (Deflective Force) के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्ध में दायीं ओर एवं दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाती है। पृथ्वी के पश्चिम से पूरब दिशा में घूर्णन के कारण धाराओं का मार्ग गोलाकार हो जाता है।  

मौसम परिवर्तन का प्रभाव:- जब सूर्य उत्तरायण होता है तो समुद्री धाराओं  का प्रवाह क्षेत्र थोड़ा सा उत्तर की ओर खिसक जाता है एवं दक्षिणायन होता है तो धारा क्षेत्र थोड़ा दक्षिण की ओर खिसक जाता है। मानसूनी पवनों की दिशा में परिवर्तन के कारण उत्तरी हिंद महासागर में धाराओं की दिशा में भी परिवर्तन हो जाता है।

                 इस प्रकार स्पष्ट है कि समुद्री जल धाराओं की उत्पत्ति में कई कारकों का प्रभाव होता है।


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10. OCEAN WAVE / समुद्री तरंग

10. OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

OCEAN WAVE


OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

          समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पायी जाती है। जैसे- ज्वार-भाटा, जलधारा, तरंग इत्यादि। रिचर्ड महोदय ने समुद्री तरंग को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री लहर महासागर की तरल सतह का एक विक्षोभ गति है।” इसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समुद्री जल का ऊपरी भाग किसी एक निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द दोलन करने वाली गति को तरंग कहते हैं। समुद्री लहरें व्यापक एवं सर्वत्र पायी जाने वाली गति है। लहरों की उत्पत्ति में वायु, ज्वार-भाटा तथा भूकंप का योगदान होता है। इन तीनों में सर्वाधिक योगदान वायु की होती है। वायु जब सागरीय जल के साथ घर्षण करते हुए आगे बढ़ती है तो सागरीय जल के ऊपरी भाग में एक दोलन गति उत्पन्न होती है। इस गति में जल का स्थानांतरण नहीं होता है बल्कि जल एक निश्चित बिंदु के आगे या पीछे ऊपर या नीचे दोलन करती है।

OCEAN WAVE

 

लहर की संरचना

          तरंग में जल के लगातार उठाव और गिराव का क्रम जारी रहता है। इसके उठाव वाले भाग को शिखर या शीर्ष कहते हैं। जबकि गिराव वाले भाग को गर्त कहते हैं। दो क्रमबद्ध शीर्ष या दो क्रमबद्व गर्त के बीच की दूरी को तरंग की लंबाई कहते हैं।

           गर्त बिंदु से शीर्ष बिंदु के बीच की लम्बवत ऊंचाई को तरंग की ऊंचाई कहते हैं। दो शीर्ष बिंदुओं को एक निश्चित बिंदु से गुजरने में जो समय लगता है उसे तरंग की अवधि कहते हैं। तरंग की वेग और उसकी अवधि वायु की गति पर निर्भर करती है। जैसे- खुले समुद्रों में निर्विध्न रुप से हवाएं चलती है वहां अधिक लंबी एक ऊंची लहरें उत्पन्न होती है। पवन का प्रभाव सागर के भीतर 100 वर्ग मीटर की गहराई तक पड़ता है।
         सागरीय तरंगे तट की ओर अग्रसर होती है। जैसे-जैसे लहरें तट के निकट आते जाती है वैसे-वैसे सागरों की गहराई में भी कमी आते जाती है। इसी कारण से छिछले समुद्र में तरंग का निचला भाग समुद्र नितल से रगड़ खाकर आगे बढ़ने लगता है। रगड़ के कारण तरंग के प्रवाह में रुकावट आती है जिसके कारण लहरों की ऊंचाई अधिक हो जाती है लेकिन तरंग की लंबाई कम हो जाती है। तरंग की शीर्ष की ऊंचाई अधिक हो जाने से वह टूटकर आगे गिरता है। तरंग की टूटी हुई जल की भाग को सर्फ या ब्रेकर या स्वाश कहा जाता है। इसमें जल पीछे की ओर गिरते हुए प्रतीत होता है। 
 चित्र  : समुद्र में उत्पन्न तरंग एवं सर्फ
 
         समुद्री तरंगों में उत्पन्न तरंग दो कारकों पर निर्भर करते हैं-
(i) जल की गहराई पर
(ii) तरंग की ऊंचाई पर
      टुक्कर नामक समुद्रीवेता ने तरंग की लंबाई ज्ञात करने के लिए एक सूत्र का प्रयोग किया। जैसे-
तरंग की लंबाई = तरंग के दो शीर्षों की लम्बाई ÷ उनकी अवधि
        इस सूत्र के आधार पर टुक्कर ने बताया कि यदि तरंग की लंबाई अधिक है और जल की गहराई कम है तो उसकी गति पर नियंत्रण जल की गहराई का होता है। यदि लहर की लंबाई कम है तो गति पर लहर की लंबाई का नियंत्रण होता है। खुले समुद्रों में लहरों की गति एवं आकार पर जल की गहराई और वायु के वेग पर निर्भर करती है। लेकिन तटवर्ती क्षेत्रों में तटीय आकृति का भी लहरों पर प्रभाव पड़ने लगता है।
तरंग की प्रकार
 
      दोलन के आधार पर सागरीय तरंग दो प्रकार के होते हैं:-
1. अनुप्रस्थ
2. अनुधैर्य
        अनुप्रस्थ तरंग की तुलना प्रकाश तरंग से और अनुदैर्ध्य तरंग की तुलना ध्वनि गति से की जा सकती है। अनुप्रस्थ तरंग में जल किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द लंबवत रूप से ऊपर उठने एवं नीचे बैठने की प्रवृत्ति रखता है जबकि अनुदैर्ध्य तरंग में क्षैतिज रूप से जल दोलन करने की प्रवृत्ति रखता है। ब्यूफोर्ट महोदय ने कुछ विशिष्ट लहरों का विवरण प्रस्तुत किया है। जैसे- 
(1) स्वेल- स्वेल तरंग में तरंग का शीर्ष गोलाकार तथा गर्त ज्यावक्रीय होती है। इसमें जल की सतह हल्के उभार वाली होती है। 
(2) फेनिल तरंग (Surf)- ऐसे तरंगें छिछले सागरों में उत्पन्न होते है। छिछले सागर में तरंग की शीर्ष टूटकर सर्प का निर्माण होता है। 
(3) स्थानांतरण तरंग- स्थानांतरण तरंग में जल की वास्तविक गति और तरंग की गति एक ही दिशा में होती है। स्थानांतरण तरंग में जल की ऊपरी सतह से लेकर सागर की तली तक का समस्त जल एक ही दिशा में गतिशील होता है।
(4) दोलन करने वाली लहरें- जब किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द तरंगों के शीर्ष एवं गर्त का निर्माण होता है तो उसे दोलन करने वाली लहरें कहते हैं।
(5) हानिकारक तरंग- इसे ब्यूफोर्ट महोदय ने पुनः दो भागों में बाँटा है:-
(i) सूनामी- सुनामी समुद्री क्षेत्रों में आने वाले भूकंप एवं ज्वालामुखी उद्गारों के कारण उत्पन्न होते हैं। सुनामी एक जापानी शब्द है जिसका तात्पर्य भूकंप से उत्पन्न समुद्री लहर है। सुनामी लहर के उत्पन्न में वायु का कोई योगदान नहीं होता। सुनामी सामान्य लहरों की तुलना में बड़ी एवं विनाशकारी होती है। भूकम्प आने के 12 मिनट बाद सुनामी लहरें आती है। समुद्र में जितने भूकंप के झटके आते हैं समुद्र में उतने ही सुनामी लहरें आती है। प्रशांत महासागर सुनामी तरंगों के लिए प्रसिद्ध है। फिलीपींस, जापान, हवाई द्वीप सुनामी तरंगों से अत्याधिक प्रभावित होते हैं। खुले समुद्रों में सुनामी तरंगे अधिक हानिकारक नहीं होती है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में इनकी भयंकर परिणाम होते हैं। 1883 ई० में इंडोनेशिया के क्राकाडोवा द्वीप पर भयंकर ज्वालामुखी उद्गार से 360 मीटर ऊँची तरंगे उत्पन्न हुई थी जिसमें 36000 लोग मारे गए थे। 26 दिसंबर 2004 को सुमात्रा के दक्षिणी भाग में आए भूकंप के कारण उत्पन्न सुनामी लहरों के कारण लाखों लोग मारे गए।
(ii) तूफानी तरंग- जब हरिकेन जैसे चक्रवात उत्पन्न होते हैं तो तटीय भागों में ऊंची-ऊंची लहरें उठती है। इससे प्रायः तटीय भागों में जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
समुद्री तरंग का महत्व
(1) समुद्री तरंगों के द्वारा तट का कटाव होता है। कटे-फटे तट जलयानों एवं बंदरगाहों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
(2) लहरों के द्वारा होने वाले कटाव के कारण कृषि योग्य भूमि इत्यादि विलीन हो जाते हैं।
(3) लहरों के कारण वायु और जल में मिश्रण का कार्य होता है जिससे समुद्री जीव ऑक्सीजन ग्रहण कर जीवित रहते हैं। 
(4) लहरों के कारण संचार व्यवस्था प्रभावित होती है।
(5) लहरों के कारण समुद्री तट पर कई प्रकार के निक्षेप एकत्रित हो जाते हैं।
(6) लहरी तरंग ऊर्जा के उत्पादन में सहायक होता है।
निष्कर्ष:- इस उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लहर मानव जीवन को कई प्रकार से प्रभावित करते हैं।

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9. Oceanic Deposits / महासागरीय निक्षेप

Oceanic Deposits

(महासागरीय निक्षेप)  



Oceanic DepositsOceanic Deposits (महासागरीय निक्षेप)  

         समुद्र के तली पर मिलने वाले अनेक असंगठित पदार्थों के निक्षेप को समुद्री निक्षेप कहते है। इन निक्षेपों में अकार्बनिक एवं कार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ शामिल होते है। समुद्री निक्षेप के विषय में अनेक अध्ययन समुद्रीवेताओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। समुद्री निक्षेप के सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी यूनानी भूगोलवेत्ता हेरोडोटस ने दिया था। उसके बाद 1773 ई० में कैप्टन किप्स, 1872 ई० में मर्रे और रेनार्ड ने समुद्री निक्षेप का मानचित्र प्रस्तुत किया। उसके बाद गरहार्ड स्कॉट महोदय ने विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

        इन विद्वानों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समुद्री निक्षेप के कई स्रोत है। जैसे स्थलीय भाग, ज्वालामुखी उदगार से प्राप्त मलबा, वायुमंडल, ब्रह्मांड एवं समुद्र से मिलने वाले अनेक जीव जंतु। इन स्रोतों से प्राप्त होने वाले पदार्थों का निक्षेपण लाखों वर्षों से हो रहा है। इसकी मोटाई एक समान नहीं है। लेकिन कहीं-कहीं पर मोटाई 500 मीटर से अधिक पाई गई है। समुद्री निक्षेपों का वितरण कणों के आकार-प्रकार, समुद्री लवणता एवं समुद्री जल की गतियों पर निर्भर करता है। समुद्री निक्षेप के जमाव का दर बहुत ही मन्द है। इन निक्षेपों में स्थलीय निक्षेप की भाँति स्तर नहीं पाए जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि समुद्र तल से ज्यों-ज्यों गहराई में जाते हैं, त्यों-त्यों समुद्री निक्षेप की गहनता में वृद्धि होती जाती है। इसी तरह तटीय क्षेत्र से गहन सागर क्षेत्रों की ओर जाने पर इनके वितरण प्रारूप में परिवर्तन होता जाता है।

समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

      समुद्री निक्षेपों का कई आधार पर एवं कई विद्वानों के द्वारा वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। जैसे:-

(1) मरे के अनुसार-  मरे महोदय ने स्थिति के आधार पर समुद्री निक्षेप को दो भागों में बांटा है- 

(i) भूमिज निक्षेप

(ii) पेलाजिक निक्षेप

      मरे के अनुसार 100 फैदम या 200 मी० की गहराई तक भूमिज निक्षेप और उसके आगे पेलाजिक निक्षेप पाई जाती है।

(2) जेनकिंस के अनुसार- जेनकिंस ने समुद्र की गहराई को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है:-

(i) तटीय निक्षेप- तटीय निक्षेप उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच में तटीय भागों में पाई जाती है। यह सामान्यतः 100 फैदम की गहराई तक पाए जाते हैं। इसमें मूलतः कंकड़, बालू, बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

(ii) छिछला सागर निक्षेप- यह 100 से 200 फैदम में समुद्री गहराई के बीच मिलते हैं।

(iii) गहन सागरीय निक्षेप- इसे जेनकिंस महोदय ने पेलाजिक निक्षेप से भी संबोधित किया है।

(3) जॉनसन के अनुसार- जॉनसन ने समुद्री निक्षेपों के प्रकृति को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है :-

(i) छिछला सागरीय समुद्री निक्षेप- कुल समुद्री भूपटल के क्षेत्र का 9.1% भाग पर फैला है। 

(ii) भूमिज निक्षेप- इसका विस्तार 15.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(iii) पेलाजिक निक्षेप- इसका विस्तार 75.5% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(4) स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

         यह किसी एक समुद्रीवेता के द्वारा  प्रस्तुत नहीं किया गया है। समुद्री निक्षेप का सबसे उपयुक्त एवं वैज्ञानिक विश्लेषण स्रोत के आधार पर ही किया जा सकता है। स्रोत के आधार पर किए गए वर्गीकरण से उसकी उत्पत्ति एवं प्रत्येक की विशेषता का भी विश्लेषण स्पष्ट हो जाता है। अतः स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप को 6 भागों में बांटते हैं:-

(i) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)

(ii) ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Deposits)

(iii) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits)

(iv) ब्रह्माण्डीय निक्षेप 

(v) जैविक निक्षेप (Organic Deposits)

(vi) लाल चिका 

(1) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)- 

       समुद्र के तली पर निक्षेपित अधिकतर पदार्थ स्थलीय भागों से ही प्राप्त होते हैं। स्थलीय भागों के चट्टानें सतत ऋतुक्षरित होते रहती है। ऋतुक्षरण से प्राप्त मलबा को अपरदन के दूत समुद्र के नितल तक पहुंचाते रहते हैं। इनमें सबसे प्रमुख योगदान नदियों का है। भूमिज निक्षेप को उत्पत्ति, कणों की आकृति और रासायनिक संगठन के आधार पर कई भागों में बांटते हैं :-

(A) गोलाश्म और बजरी (Bolder and Gravel)

(B) रेत या बालू (Sand)

(C) गाद (Silt)

(D) मृतिका (Clay)

(E) पंक (Mud)

           गोलाश्म के टुकड़ों का व्यास न्यूनतम 256 mm होता है जबकि बजरी का व्यास 2 से 256 mm तक होता है। ये दोनों समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में सतत किए जा रहे अपरदन से प्राप्त होते हैं। इनका निक्षेपण प्राय: तटीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। 

          रेत या बालू के कणों का व्यास 1/8 से 2mm तक होता है। बालू की प्राप्ति स्थानीय चट्टानों के ऋतुक्षण एवं अपरदन से होता है। रेत के कण भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे :- बहुत मोटी रेत, मोटी रेत, मध्यम बालू/ रेत, बारिक रेत और बहुत बारीक रेत।

           गाद, मृतिका और पंक के कणों के व्यास 1/8192mm से 1/8mm तक होता है। गाद पंक के चट्टानी कणों को जोड़ने का कार्य करता है। छिछली एवं शांत सागरों में मृतिका एवं पंक बारीक कण के रूप में पानी पर लटके रहते हैं।

        सबसे सूक्ष्म भूमिज निक्षेप में पंक या कीचड़ को शामिल किया जाता है। कीचड़ प्रायः 1000 फैदम गहराई के बाद ही पाये जाते हैं। मर्रे महोदय ने बताया कि ये कई रंग के होते है। रंग के आधार पर उन्होनें पंक या कीचड़ को तीन भागों में बांटा है- 

(i) नीला पंक (Blue Mud)

(ii) लाल पंक (Red Mud)

(iii) हरा पंक (Green Mud)

        नीला पंक उन चट्टानों के अवशेषों से बनती है जिसमें आयरन सल्फाइड एवं अन्य जैविक तत्व मौजूद रहते है। नीली पंक सभी महासागरों में मिलती है। इसका विस्तार लगभग 232 लाख वर्ग किमी में है।

         लाल पंक का निर्माण लौह ऑक्साइड वाले चट्टानों के ऋतुक्षरण से हुआ है। इसका सर्वाधिक विस्तार पीला सागर और अटलांटिक महासागर के ब्राजील के तट पर देखा जा सकता है।

       हरा पंक का निर्माण नीला पंक के रासायनिक परिवर्तन से होता है। इसमें हरा रंग Gluconites नामक खनिज के कारण होता है। हरा पंक उतरी अमेरिका के प्रशांत एवं अटलांटिक तट पर, ऑस्ट्रेलिया और जापान के तट पर तथा दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के तट पर पाये जाते हैं।

(2) ज्वालामुखी निक्षेप 

           ज्वालामुखी उदगार के कारण बड़े पैमाने पर मलबा का जमाव स्थलीय एवं सागरीय भूपटल पर होता रहता है। स्थलीय भाग पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले मलबा, लावा धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृति रखते है। जबकि सागरीय भूपटल पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले लावा तेजी से ठंडा होता है। अतः इसके आधार पर ज्वालामुखी निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) समुद्री ज्वालामुखी निक्षेप

(ii) स्थलीय ज्वालामुखी निक्षेप

         स्थलीय ज्वालामुखी पदार्थ अपरदन के दूतों के द्वारा समुद्री भूपटल पर लाये जाते हैं जो भूमिज के निक्षेप के साथ मिश्रित हो जाते है जिसके कारण इन्हें अलग से पहचान करना संभव नहीं हो पाता है। जबकि समुद्री ज्वालामुखी से प्राप्त पदार्थ अपने मौलिक अवस्था में लंबे समय तक बने रहते हैं। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के अभाव में इनका मौलिक गुण यथावत रहता है। 10 लाख वर्ग किमी० समुद्री भूपटल पर इनका निक्षेपण हुआ है। इसका प्रमाण महासागरीय कटक और ज्वालामुखी द्वीपों के सहारे मिलता है।

(3) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits) 

      अजैविक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत वायुमण्डल है। जब जलवायु परिवर्तन होता है तो वैसी स्थिति में वायुमण्डल के ठोस कण सतह पर गिरने लगते है और रासायनिक प्रतिक्रिया कर ग्लूकोनाइट जैसे खनिज का निर्माण करते हैं। इसी तरह यदि वायुमण्डल से CO2 हटा दिया जाय तो डोलोमाइट, सिलिका और लौहे के कण सतह पर गिरकर विशिष्ट अजैविक समुद्री निक्षेप का निर्माण करते हैं। इनका निक्षेपण लगभग सभी सागरों में हुआ है। 

(4)  ब्रह्माण्डीय निक्षेप

          ब्रह्माण्डीय पिंडों से हमारी समुद्री सतह पर निक्षेपित होने वाली पदार्थों को ब्रह्माण्डीय निक्षेप कहते है। स्पष्ट है कि इसका स्रोत हमारी पृथ्वी या वायुमण्डल नहीं है बल्कि हमारे सौरमण्डल या अन्य खगोलीय पिंड इसके स्रोत है। इस प्रकार के निक्षेप सबसे अधिक प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर में हुआ है। प्रशांत महासागर के 0.25% क्षेत्रफल पर इसका विस्तार हुआ है। ब्रह्माण्डीय निक्षेप का रंग काला होता है तथा इसमें लोहे का अंश अधिक होता है।

(5) जैविक निक्षेप 

            समुद्री जल में अनेक प्रकार के जीव जंतु पाए जाते हैं। जब ये सागरीय जीव मरते हैं तो उन जीवों के हड्डियां, मांस एवं उनके शरीर में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों इत्यादि का जमाव समुद्री नीतल पर होता रहता है। जैविक समुद्री निक्षेप गर्म सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। गुणों के आधार पर जैविक निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) नेरेटिक जमाव/ तट तलवासी निक्षेप

(ii) पेलाजिक जमाव/अगाध सागरस्थ निक्षेप

           समुद्र में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की हड्डियों, मछलियों, प्रवाल, शीप, स्पंज इत्यादि के स्थिर पंजर वाले अवशेषों को नेरेटिक जमाव कहते हैं। नेरिटिक जमाव समुद्री तली में किसी विशिष्ट स्थान पर नहीं पाए जाते। लेकिन इन पर लगातार समुद्री लहरों एवं जल धाराओं के प्रहार के कारण महीन कण के रूप में टूटते रहते हैं। 

           पेलाजिक जमाव कीचड़ के समान होता है जिसे ऊज (Ooze) भी कहा जाता है। सूखने पर यह पाउडर के समान हो जाता है। इसका निर्माण विशिष्ट प्रकार के शैवाल, प्रोटोजोआ, डायटम जैसे जीवों के द्वारा होता है। ये प्रायः सागरीय क्षेत्रों में मिलते हैं। रसायनिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में बांटते हैं –

(A) चुना प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) टेरोपॉड

(ii) ग्लोबीजेरिना

(B) सिलिका प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) रेडियोलेरियन पेलाजिक

(ii) डायटम पेलाजिक

       टेरोपॉड का विस्तार 0.4%, ग्लोबीजेरिना का विस्तार 29.2%, रेडियोलेरीयन का विस्तार 3.4% और डायटम का विस्तार 6.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

      टेरोपॉड चूनायुक्त पदार्थ है। इसका स्रोत चूना प्रधान वाले जीवों का शरीर होता है। इस निक्षेप का नाम भी टेरोपॉड नामक जीव के आधार पर किया गया है। यह प्रायः उष्ण एवं छिछले सागरों में पाया जाता है। यह 1600-3000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। इसका सर्वाधिक विस्तार अटलांटिक महासागर में हुआ है।

        ग्लोबीजेरिना का रंग सफेद होता है। इसका प्रमुख स्रोत फेरामिनीफेरा नामक समुद्री जीव है। 3000 से 4000 मीटर की गहराई पर मिलते हैं। ठंडे सागरीय जल में कम और गर्म सागरीय जल में अधिक मिलते हैं।

          डायटम सिलिका प्रधान जैविक निक्षेप है। इसका रंग स्लेटी होता है। 1200 से 4000 मीटर की गहराई पर अधिक मिलते हैं। इसका प्रमुख स्रोत डायटम नामक जीव है। उच्च अक्षांशीय भागों के ठंडे सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। अंटार्कटिका के इर्द-गिर्द इसका निक्षेप सर्वाधिक हुआ है। 

       रेडियोलेरियन नामक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत रेडियोलेरियन नामक जीव है। जो उष्ण जल में मिलने वाला जीव है। 4000-10000 मीटर की गहराई तक इसका निक्षेपण हुआ है। प्रशांत महासागर में इसका विस्तार सबसे अधिक है।

(6) लाल चीका 

        यह मुख्यतः एलुमिनियम और ऑक्सीकृत लोहा के हाइड्रेट सिलिकेट से निर्मित होता है। प्राथमिक मान्यता यह रही है कि इसका निर्माण विभिन्न प्रकार के समुद्री निक्षेपों से प्राप्त होने वाले खनिजों के टूटने से बनता है। लेकिन नवीन मान्यता वाईविल थॉमसन ने विकसित करते हुए कहा है कि यह भी एक प्रकार का जैविक निक्षेप ही है जिसका निर्माण चूना प्रधान वाले जीवों के विघटन से होता है। लाल चिका चूना प्रधान वाले जीवों में मिलने वाला ऐसा खनिज है जिसका विलियन संभव नहीं हो सका है। लाल चिका का निक्षेपण तीनों महासागरों में हुआ है। 

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्रोत के आधार पर किया गया वर्गीकरण को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। समुद्री निक्षेपों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।



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