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11. Earthquake / भूकंप

 11. Earthquake / भूकंप



Earthquake / भूकंप

Earthquake

भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू = भूपटल 

कम्प = कम्पन

      इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र या भूकंप मूल या हाइपोसेंटर (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
       भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)-

      अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

★ बिहार में औसतन प्रत्येक 17 वर्ष पर भूकम्प आता है।

सिस्मोग्राफ

     सिस्मोग्राफ भूकम्पीय तरंगों के प्रवृति को रेखांकन करने वाला यन्त्र है।

समभूकम्प रेखा

      समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकम्पीय रेखा  (Isoseismal line) कहते है।

सहभूकम्प रेखा

     एक ही समय पर पहुँचने वाले भूकम्पीय तरंगों को मिलाने वाली सरल रेखा को सहभूकम्प रेखा (Homoseismal line) कहते है।

 भूकम्प के प्रकार

     भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

(A) गहराई के आधार पर

       गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

(i) सामान्य गहराई के भूकंप– फोकस 50 KM से ऊपर होता है।

(ii) मध्यम गहराई के भूकंप– फोकस 50-250 KM के बीच

(iii) अधिक गहराई के भूकंप– फोकस 250-700 KM के बीच

(B) समय के आधार पर

       समय के आधार पर भूकम्प दो प्रकार के होते है:-

(i) धीमा भूकम्प

(ii) अचानक भूकम्प

➤ धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

➤ अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है।

➤ विश्व में सर्वाधिक कम गहराई वाले भूकंप या छिछले उदगम वाले भूकम्प आते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

      भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण:-

(i) परमाणु विस्फोट

(ii) मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

(iii) बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

(iv) पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

    ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है तो भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

(1) प्रत्यास्थ पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्थ चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

(2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

        इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

(i) अपसरण सीमा

(ii) अभिसरण सीमा

(iii) संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

(i) चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

(ii) एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

(iii) पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

(iv) दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

      प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

    जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
      दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर लेकिन विपरीत दिशाओं में खिसकती हैं, तो उनके बीच संरक्षी या रूपांतरित (Transform/Conservative) प्लेट सीमा का निर्माण होता है। ऐसी सीमा पर प्लेटों की गति को रूपांतरित/संरक्षी गति कहा जाता है।
    इन सीमाओं पर प्लेटों का न तो निर्माण होता है और न ही विनाश, बल्कि वे एक-दूसरे के सापेक्ष खिसकती हैं। घर्षण के कारण तनाव उत्पन्न होने से यहाँ भूकम्प आ सकते हैं।
ध्यान दें: जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया ये क्षेत्र मुख्यतः अभिसारी (Convergent) प्लेट सीमाओं एवं सबडक्शन क्षेत्रों से संबंधित हैं। इसी कारण इन क्षेत्रों में भूकम्पीय गतिविधि अत्यधिक है।
Earthquake
     इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

        विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर–

       विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र–

        यह क्षेत्र यूरेशियन प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक- 

     अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड से दक्षिण में बोबेट द्वीप तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

3. आधुनिक- आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw)

मार्सेली पैमाना

        मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

     रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता का मापन 1 से 9/10 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन स्केल पर अंकित हर अगला अंक अपने ठीक पिछले अंक की तुलना में 10 गुना अधिक तीव्र होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है।
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है।
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं।
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
     
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 
आधुनिक- आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw)
      आघूर्ण परिमाण पैमाने (Mw) का उपयोग भूकम्पों की तीव्रता मापने के लिए किया जाता है, जिसमें भूकंप के स्रोत से निकलने वाली कुल ऊर्जा को मापा जाता है। इसे रिक्टर पैमाने के अद्यतन रूप के रूप में 1979 में थॉमस हेंक्स और हिरो कानामोरी द्वारा विकसित किया गया था, क्योंकि यह बड़े और छोटे दोनों प्रकार के भूकंपों के लिए अधिक सटीक परिणाम देता है, जबकि रिक्टर पैमाने बड़े भूकंपों के लिए सटीक नहीं था। Mw भूकंप के आकार (यानी, आकार, विस्थापन और कठोरता) का सबसे विश्वसनीय अनुमान देता है।  

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

      भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

1. P तरंग

2. S तरंग

3. L तरंग

(B) गौण तरंग

1. P* तथा S*

2. Pg तथा Sg

(A) प्रमुख तरंग 

P तरंग 

     P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य तथा गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र / फोकस से होती है। 

S तरंग

     S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र / फोकस से होती है।

➤ P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone)

       भूकंप लेखी यंत्र (सिस्मोग्राफ) पर दूर के क्षेत्रों से आने वाली भूकंपीय तरंग अंकित होती हैं, परन्तु कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है, ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहते है।

➤ भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है।  यह क्षेत्र दोनों प्रकार की तरगों के लिए छाया क्षेत्र (Shadow zone) हैं।

➤ 105° के परे पूरे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं।

➤ ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘P’ तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत है।

➤ भूकंप अधिकेंद्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी (Band) के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है।

➤ ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन् यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है। 

(B) गौण तरंग

P* & S* तरंग 

        पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:-

(1) ग्रेनाइट तथा

(2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

      ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

       Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।



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9. Volcano / ज्वालामुखी

 9. Volcano / ज्वालामुखी


 Volcano / ज्वालामुखी

Volcano

★ज्वालामुखी क्रिया:- ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।
           जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ, जल एवं वाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।

      क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है, पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।

       ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”

       परिभाषा से स्पष्ट होता है कि ज्वालामुखी क्रिया दो प्रकार का होता  है। प्रथम आन्तरिक ज्वालामुखी की क्रिया दूसरा बाह्य ज्वालामुखी की क्रिया।

★ आन्तरिक ज्वालामुखी क्रिया में गर्म पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर धरातल के नीचे ही ठोस होने की प्रवृत्ति रखता है जबकि बाह्य ज्वालामुखी क्रिया में गर्म पदार्थ धरातल के ऊपर प्रकट होकर अनेक स्थलाकृतियां को जन्म देता है। इस तरह स्पष्ट होता है कि ज्वालामुखी क्रिया एक व्यापक शब्द है जिसमे अनेक क्रियाएं शामिल है।

ज्वालामुखी क्रिया में निकलने वाला पदार्थ-

      ज्वालामुखी उदगार के दौरान निकलने वाला पदार्थ को तीन श्रेणी में विभाजित करते है:-

(i) गैस तथा जलवाष्प

(ii) विखण्डित पदार्थ

(iii) लावा पदार्थ

        सर्वप्रथम जब ज्वालामुखी का उदगार होता है तो गैस एवं जलवाष्प धरातल को तोड़कर सबसे पहले तेजी से बाहर निकलते है। इसमें जलवाष्प की मात्रा सर्वाधिक होती है। सम्पूर्ण गैस का 60 से 90 प्रतिशत भाग जलवाष्प का होता है। वाष्प के अलावा कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड, जैसे गैस भी मौजूद रहते है।

       विखण्डित पदार्थ में बारीक धूलकण से लेकर बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़ों को शामिल किया जाता है। इसका मुख्य स्रोत क्रस्ट के विखंडित होता है। जब गैस निलकना मंद पड़ता है तो ये विखण्डित चट्टाने धरातल पर पुनः वापस आने लगते है जिससे ऐसा लगता है कि अकाश से बम्ब बरसाए जा रहे है। आकार के आधार पर इन टुकड़ों के अलग-अलग नाम रखे गए हैं :-

(क) ज्वालामुखी बम (Volcanic Bomb):

     ज्वालामुखी से निकलने वाले बड़े टुकड़ों को ‘ज्वालामुखी बम’ कहते हैं। इनका निर्माण धरातल के नीचे ही मैग्मा के जमकर ठोस रूप धारण करने से होता है। ये किसी भी आकार (यथा- गोलाकार, बेलनाकार आदि) के हो सकते हैं।

(ख) लैपिली (Lapilli):

      मटर के दाने या अखरोट के आकार वाले ठोस टुकड़ों को ‘लैपिली’ कहा जाता है।

(ग) स्कोरिया (Scoria):

     लैपिली से थोड़े छोटे टुकड़ों को ‘स्कोरिया’ कहते हैं।

(घ) प्यूमिस (Pumice):

     मैग्मा के झाग के जमने से बहुत हल्के एवं छिद्रदार शिलाखण्ड का निर्माण होता है। यह ‘प्यूमिस’ कहलाता है।

(ङ) ज्वालामुखी धूल या राख (Volcanic ash):

    ज्वालामुखी से निकलने वाले बारीक ठोस कणों को ‘ज्वालामुखी धूल या राख’ कहते हैं।

(च) टफ (Tuff):

     ज्वालामुखी धूल या राख जब संगठित होकर ठोस चट्टानी रूप धारण कर लेते हैं तो उन्हें ‘टफ’ कहा जाता है। अर्थात् जब लावा पदार्थ पानी के अंदर जमकर ठोस हो जाता है तो उसे ‘टफ(Tuff)’ कहते है।

(छ) ब्रेसिया (Breccia):

      जब ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थों का जमाव ठोस कोणीय नुकीले टुकड़ों के रूप में होता है तो ऐसे टुकड़ों को ‘ब्रेसिया’ कहा जाता है।      

    ज्वालामुखी उद्गार के दौरान सबसे अंत में लावा या मैग्मा पदार्थ बाहर निकलता है। लावा पदार्थ का स्रोत दुर्बलमण्डल में मिलने वाला मैग्मा चैम्बर या ‘बेनी ऑफ जोन’ होता है। ये लावा दो प्रकार के होते है। प्रथम अम्लीय लावा द्वितीय क्षारीय लावा।

     अम्लीय लावा का रंग पीला भार में हल्का लेकिन गाढ़ा होता है। अर्थात इसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। जिसके कारण अति उच्च तापमान पर पिघलता है।

        क्षारीय लावा का रंग गहरा तथा काला होता है। सिलिका की मात्रा कम होने के कारण शीघ्र पिघलने की क्षमता रखता है यह पतला और शीघ्र जमकर ठोस रूप धारण करने वाला होता है।

ज्वालामुखी उदगार के कारण 

 ज्वालामुखी उदगार के चार कारण है–

1) भूगर्भ में ताप का अधिक होना,

2) अत्यधिक ताप तथा दबाव के कारण लावा की उत्पति

3) गैस तथा वाष्प की उत्पति,

4) लावा पदार्थ का ऊपर की ओर आना।

1. भूगर्भ में ताप की वृद्धि–

      भूपटल के नीचे की ओर जाने पर प्रति 32 मीटर पर 1℃ तापमान बढ़ जाता है । इस प्रकार पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तापमान अत्यधिक होना चाहिए। तापमान के बढ़ोतरी पृथ्वी के आन्तरिक भागों में रेडियोसक्रिय पदार्थों के उपस्थिति को बतलाया जाता है।

     पृथ्वी के अंदर तापमान बढ़ने से चट्टानें पिघल जाती है और पिघलकर हल्की हो जाती है। यही पिघला हुआ पदार्थ धरातल को तोड़कर बाहर निकलता है या भूपटल के नीचे ही ठंडा हो जाता है तो ज्वालामुखी उत्पन्न होता है।Volcano2. अत्यधिक ताप एवं दबाव के कारण लावा की उत्पति–

       पृथ्वी  धरातल से ज्यों-ज्यों पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाते है त्यों-त्यों पृथ्वी के दबाव में बढ़ोतरी होती जाती है । ज्यों-ज्यों दबाव बढ़ता है त्यों-त्यों तापमान में बढ़ोतरी होती जाती है । इसी तापमान की बढ़ोतरी से चट्टानें पिघलकर मैग्मा पदार्थ का निर्माण करती है। यह मैग्मा पदार्थ जब अपने स्रोत क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करता है तो ज्वालामुखी का उदगार होता है।

3. गैस तथा वाष्प की उत्पति–

      ज्वालामुखी उदगार के समय कई तरह की गैस एवं जलवाष्प निकलती है। ज्वालामुखी गैसों की उत्पति के विषय में उनेेेक मत प्रचलित है। जैसे-जब भूमिगत जल रिसकर पृथ्वी के दुर्बलमण्डल में पहुंच जाते है तो अत्यधिक ताप के कारण बड़े पैमाने पर गैस तथा जलवाष्प निर्माण होता है।

         दूसरे मत के अनुसार वर्षा जल जब संरोधी चट्टानों के सहारे धरातल के अंदर पहुंचते है तो भी बड़े पैमाने पर गैस एवं जलवाष्प का  निर्माण होता है । भूपटल के नीचे निर्मित ये जलवाष्प एवं गैस ही भूकम्पीय उदगार को जन्म देते है।

4. लावा पदार्थ का ऊपर की ओर अग्रसर होना–

       पृथ्वी के अंदर स्थित दुर्बलमण्डल में मैग्मा पदार्थ स्थायी रूप से मौजूद है। दुर्बलमण्डल के चारों ओर स्थलमण्डल अवस्थित है। जब स्थलमण्डल में पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन या भूकंप या किसी कारण वश स्थलमण्डल कमजोर पड़ता है तो स्वत: मैग्मा पदार्थ धरातल से बाहर निकलने का प्रयास करते है और ज्वालामुखी उदगार को जन्म देते है।  

★प्लेटविवर्तनिकी सिद्धान्त ज्वालामुखी उदगार की व्याख्या करने वाला सबसे सटीक संकल्पना है। इस संकल्पना के अनुसार पृथ्वी अनेक प्लेटों से निर्मित है।Volcano

★ये प्लेट संवहन तरंगों के कारण हमेशा गतिशील रहते है। इन प्लेटों में तीन प्रकार के सीमा का निर्माण होता है :-

I. निर्माणकारी सीमा या अपसरण सीमा

II. विनाशकारी  या अभिसरण सीमा

III. संरक्षी सीमा

           ज्वालामुखी वितरण के माध्यम से स्पष्ट हुआ कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी के प्रमाण इन्हीं सीमाओं के सहारे मिलते है। अपसरण सीमा में उठते हुए संवहन तरंग के कारण दो प्लेटें एक दूसरे से दूर खिसकती है जिससे लम्बे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से मैग्मा चैंबर का लावा पदार्थ बाहर निकलता है और ज्वालामुखी उदगार को जन्म देता है। मध्य अटलांटिक कटक के सहारे इसी प्रक्रिया से ज्वालामुखी का उदगार हो रहा है। 

           विनाशात्मक सीमा का निर्माण नीचे गिरते हुए संवहन तरंगों के कारण होता है। प्रशान्त महासागर के चारों ओर इस प्रकार का सीमा का निर्माण हुआ है। विनाशात्मक सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले महासागरीय प्लेट कम घनत्व वाले महाद्वीपीय प्लेट के अंदर प्रविष्ट करने की प्रवृति रखते है।

       महासागरीय प्लेट का नीचे की ओर प्रक्षेपित भाग पिघलकर “बेनी ऑफ जोन” का निर्माण करते है। बेनी ऑफ जोन का ही मैग्मा पदार्थ धरातल से ऊपर आकर ज्वालामुखी उदगार को जन्म देता है। 

    कभी-कभी संरक्षी सीमा के सहारे भी ज्वालामुखी का उदगार होता है। जैसे जापान के होंशु द्वीप के सहारे दो महासागरीय प्लेट आपस में रगड़ खा रहे है। एक प्लेट जापान सागर प्लेट कहलाता है तो दूसरा प्लेट  प्रशान्त महासागरीय प्लेट कहलाता है।

    प्रशान्त महासागरीय प्लेट का सापेक्षिक घनत्व अधिक होने के कारण जापान सागर प्लेट के नीचे प्रक्षेपित हो गया है। और होन्शु द्वीप के नीचे ‘बेनी ऑफ जोन’ का निर्माण कर लिया।

Volcano

★ यहां जापान सागर प्लेट स्थिर है जबकि प्रशांत प्लेट ही गतिशील है।

★ इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्लेट टेक्टोनिक संकल्पना ज्वालामुखी उदगार का व्याख्या करने वाला सबसे सटीक मत है।

ज्वालामुखी क्रिया का प्रकार

      ज्वालामुखी क्रिया दो प्रकार का होता है।

A. केंद्रीय उदगार वाले ज्वालामुखी क्रिया :-

        इस प्रकार के उदगार में भूपटल में एक सँकरा छिद्र का निर्माण होता है और इन्ही छिद्रों के सहारे ज्वालामुखी पदार्थ बाहर की ओर निकलते है। मुख का व्यास कुछ 100 फीट से अधिक नहीं होता है।

       मुख का आकार लगभग गोल होता है। जिससे गैस, लावा एवं विखण्डित पदार्थ अत्यधिक भयंकर विस्फोट के साथ बाहर निकलते हैं तथा आकाश में काफी ऊँचाई तक पहुंच जाते हैं। ऐसे उदगार को ही केंद्रीय ज्वालामुखी उदगार कहते है। इस प्रकार का उदगार काफी विनाशकारी होता है। उदगार के समय भयंकर भूकम्प आती है। केन्द्रीय ज्वालामुखी उदगार को 1908 ई० में लैक्रोइक्स नमक विद्वान ने इसे चार वर्गों में बांटा है:-

1. हवाईतुल्य ज्वालामुखी उदगार

2. स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उदगार

3. वोल्केनियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार

4. पिलियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार

       इनके अलावा केन्द्रीय उदगार वाले एक अन्य प्रकार के ज्वालामुखी का जिक्र मिलता है जो विसुवियस-तुल्य ज्वालामुखी कहलाता है।

1. हवाई तुल्य ज्वालामुखी उद्गार- 

        इस प्रकार का ज्वालामुखी का उद्गार काफी शांत तरीके से होता है। क्योंकि इसमें निकलने वाला मैग्मा पदार्थ काफी पतला तथा गैसों की मात्रा कम होती है। इस कारण विस्फोट तीव्र नहीं होता है। इसमें निकलने वाला विखण्डित पदार्थ नगण्य होता है।

              उद्गार के समय लावा के छोटे-छोटे लाल पिंड गैसों के साथ ऊपर उछाल दिए जाते है जिसे हवाई द्वीप के निवासी “अग्नि देवी पिलीकेश राशि” कहते है। इस तरह का उद्गार खासकर हवाई द्वीप पर देखने को मिलता है इसीलिए इसे हवाईयन प्रकार का ज्वालामुखी कहते है।Volcano

2. स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उद्गार– हवाईयन के तुलना में ये ज्यादा विस्फोटक होता है। तरल लावा पदार्थ एवं अन्य विखण्डित पदार्थ उसके तुलना में अधिक निकलते है। उदगार के समय यह विखण्डित पदार्थ काफी ऊँचाई पर चले जाते है और जाकर पुनः क्रेटरमें गिरते रहते है। इस प्रकार का उदगार इटली के लिपारी द्वीप पर स्थित स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी में पाया जाता है। इसीलिए इसे स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उदगार कहते है।Volcano

3. वोल्केनियन ज्वालामुखी उदगार– इस प्रकार का उदगार काफी भयंकर एवं विस्फोटक होता है। इससे निकलने वाला लावा काफी चिपचिपा एवं लसदार होता है। जिसके कारण दो उदगार के बीच यह ज्वालामुखी छिद्र पर जमकर ढक देता है। जिसके कारण ज्वालामुखी नली में बड़ी मात्रा में गैस एवं जलवाष्प जमा हो जाते है जब विस्फोट होता है तो काफी तीव्रता के साथ बाहर निकलते है। ये गैस बाहर निकलने के बाद आसमान में फूलगोभी के समान दल का निर्माण करते है। इसका नामकरण लीपारी द्वीप पर स्थित वोल्केनो पर्वत के नाम पर किया गया है।Volcano

4. पीलियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार- यह उदगार सबसे अधिक विस्फोटक एवं भयंकर होता है। इसमें निकलने वाला लावा सबसे अधिक चिपचिपा एवं लसदार होता है। विस्फोट के समय काफी तीव्रता से आवाज उत्पन्न होता है।

            8 May, 1902 ई० को वेस्टइंडीज में स्थित पिल्ली ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट के आधार पर इसे पीलियन ज्वालामुखी उदगार कहते है। 1883 में हुआ क्राकातोआ विस्फोट (जावा और सुमात्रा द्वीप के बीच में) पीलीयन प्रकार का विस्फोट था। यह अब तक का सबसे भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट का उदाहरण है।

5. विसुवियस तुल्य ज्वालामुखी:- 

     कुछ विद्वान विसुवियस तुल्य ज्वालामुखी उदगार का भी उल्लेख करते है। इस प्रकार के ज्वालामुखी का नामकरण नेपल्स की खाड़ी (द. प. इटली) के तट से कुछ दूर स्थलखंड पर स्थित माउण्ट विसुवियस नामक ज्वालामुखी के आधार पर किया गया है। इस प्रकार के उदगार का पहला अध्ययन प्लिनी (इटली) ने किया था, इसलिए इसे प्लिनियन प्रकार का ज्वालामुखी उद्गार भी कहते है। यह भी काफी विस्फोटक होता है। लेकिन इसमें लावा पदार्थ काफी ऊँचाई तक पहुंच जाते है और ज्वालामुखी बादल का आकार गोलाकार हो जाता है।

Volcano

(B) दरारी उदभेदन वाले ज्वालामुखी– जब ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान गैस की मात्रा कम और लावा की मात्रा अधिक होती है तो भूपटल में दरार का विकास होता है। और उससे लावा निकलकर ठोस होने की प्रवित्ति रखती है। निकलने वाला लावा प्रायः क्षारीय (Basic) प्रकार का होता है। कोलम्बिया का पठार (USA), दक्कन का पठार दरारी उदगार के प्रमुख उदाहरण है।

ज्वालामुखी स्थलाकृति

 ज्वालामुखी क्रिया से मुख्यत: दो प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है।

1. आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति और

2. बाह्य ज्वालामुखी स्थलाकृति।

1. आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति- जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है, तब उससे आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

        जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है।

       इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

2. बाह्य स्थलाकृति– जब गर्म पदार्थ भूपटल को तोड़कर बाहर निकलती है तो निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण करते है:-

I. क्रैटर एवं कोल्डेरा- वैसा ज्वालामुखी छिद्र जिसका व्यास कम हो तथा समय-समय पर लावा निकलता रहता हो उसे क्रैटर कहते है, लेकिन जिस ज्वालामुखी के छिद्र का व्यास बहुत अधिक हो तथा लावा निकलना बंद हो गया हो तो उसे कोल्डेरा कहते है।

          अमेरिका का ओरेगन झील और भारत का लुनार झील क्रैटर का उदाहरण है जबकि किलिमंजारो पर्वत के ऊपर तथा भारत के पुष्कर झील कोल्डेरा का उदाहरण है।

II. सोल्फतारा और धुँआरा– जब ज्वालामुखी उदगार के बाद लावा निकलना बन्द हो जाता है तो लम्बे समय तक गैस एवं जलवाष्प निकलते रहते है तो उसे धुँआरा कहते है लेकिन जिस धुँआरे में गंधक की मात्रा अधिक होती है तो उसे सोल्फतारा कहते है।

          अलास्का के कटमई ज्वालामुखी के पास 10000 (दस हजार) धुँआरों की घाटी, न्यूजीलैण्ड के प्लेनेटी के खाड़ी में व्हाइट टापू का  धुँआरा, ईरान में कोह सुल्तान का धुँआरा का विकास हुआ है।

III. गीजर– यह एक ऐसी ज्वालामुखी स्थलाकृति है जिसमें भिन्न-भिन्न समयांतराल पर गर्म जलवाष्प फव्वारे के रूप में बाहर निकलते है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण USA के वायोमिंग राज्य में स्थित ओल्डफेथफुल गीजर है । इसी तरह आइसलैंड  के द ग्रेट गीसिर और न्यूजीलैंड के वायमान्यू गीजर प्रसिद्ध है।

IV. गर्म जल के सोते– यह एक ऐसी ज्वालामुखीय स्थलाकृति है, जिसके मुख से गर्म पानी बाहर निकलता रहता है। जैसे- राजगीर का सूर्य कुंड, नानक कुंड, हजारीबाग का सूर्य कुंड, सीताकुंड और मुंगेर का सीताकुंड प्रसिद्व है।

V. ज्वालामुखी पठार एवं मैदान– दरारी ज्वालामुखी उदगार के समय पर्याप्त मात्रा में क्षारीय लावा धरातल पर प्रकट होकर ठंडा हो जाते है और पठार जैसी स्थलाकृति का निर्माण करते है ।  भारत का दक्कन का पठार, USA का कोलम्बिया का पठार, इथोपिया का पठार और अनातोलिया का पठार इसका उदाहरण है।

VI. ज्वालामुखी पर्वत– जब केंद्रीय ज्वालामुखी उदगार होती है तो उससे पर्याप्त मात्रा में अम्लीय लावा बाहर की ओर निकलती है जो काफी गाढ़ा होता है। इनके जमाव से निर्मित पर्वतीय स्थलाकृति को ज्वालामुखी पर्वत कहते है।

          ज्वालामुखी पर्वत तीन प्रकार का होता है। 

1. सक्रीय/जीवित ज्वालामुखी पर्वत-

      वैसा ज्वालामुखी पर्वत जिसके क्रेटर से वर्त्तमान समय में भी मलवा बाहर निकल रहा हो। विश्व में कुल 500 जीवित ज्वालामुखी पर्वत है। जैसे– इटली का एटना तथा स्ट्रोम्बोली, फिलिपिंस का पिनाटुबो, हवाई द्वीप पर स्थित मोनालोआ, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी, अर्जेंटीना एवं चिली की सीमा पर स्थित ओजस डेल सालाडो इत्यादि इसका प्रमुख उदाहरण है। “स्ट्रोम्बोली को  भूमध्यसागर का प्रकाश स्तम्भ” कहते है। 

2. प्रसुप्त ज्वालामुखी पर्वत-

       वैसा ज्वालामुखी पर्वत जिनके क्रेटर से वर्तमान समय में लावा का उत्सर्जन नहीं हो रहा हो लेकिन भविष्य में लावा का उत्सर्जन  की पूरी संभावना हो, उसे प्रसुप्त ज्वालामुखी पर्वत कहते है। जैसे- इटली का विसुवियस, जापान का फ्यूजीयामा, इंडोनेशिया (जावा व सुमात्रा के मध्य) का क्राकाटोआ, इक्वेडोर का चिम्बराजों और चिली का एकांकागुआ इत्यादि।

3. शांत ज्वालामुखी पर्वत-

        जब ज्वालामुखी का उदगार पूर्णतया समाप्त हो गया हो या भविष्य में भी उदगार की कोई संभावना न हो, उसे शांत या मृत ज्वालामुखी कहते है। जैसे– ईरान का देमवन्द, पाकिस्तान का कोह-सुल्तान, म्यंनमार का माउंट पोपा, अफ्रीका का किलिमंजारों मृत ज्वालामुखी के उदाहरण है।

VII. शंकु– केन्द्रीय ज्वालामुखी उदगार के दौरान निकले विखण्डित पदार्थों के निक्षेपण से शंकु का निर्माण होता है। शंकु कई प्रकार का होता है। जैसे:-

1. सिंडर शंकु Volcano

जैसे – म्यांमार का प्यूमा शंकु

2. मिश्रित शंकु

Volcano

जैसे- जापान का फ्यूजियामा

3. सैटेलाइट शंकु

Volcano

सैटेलाइट शंकु

जैसे- जापान का फ्यूजियामा

विश्व में ज्वालामुखी का वितरण

        विश्व में ज्वालामुखी वितरण का एक निश्चित क्रम है जिसे नीचे की शीर्षक में चर्चा की जा रही है।

1. परिप्रशान्त मेखला के सहारे मिलने वाला ज्वालामुखी–

         यह मेखला प्रशांत महासागर के सहारे चारों ओर स्थित है, इसे “प्रशांत अग्निवलय” के नाम से भी जानते है। विश्व में सर्वाधिक ज्वालामुखी इसी क्षेत्र में मिलते है। जैसे जापान का फ्यूजियामा, फिलीपींस का माउंट टाल, USA का माउंट सस्ता, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी और चिम्बरजो, अर्जेंटीना का एकांकागुआ, कनाडा का माउंट रेनजल इत्यादि।

        विश्व के अधिकांश ऊँचे ज्वालामुखी पर्वत एवं चोटियाँ इसी मेखला के सहारे मिलती है।       

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी:-

       इस पेटी का विस्तार पूर्व में प्रशांत महासागर से लेकर पश्चिम में अटलांटिक महासागर के केनारी द्वीप तक हुआ है। यह हिमालय और आल्पस पर्वत से होकर गुजरती है। यह प्लेट अभिसरण का क्षेत्र है। हिमालय क्षेत्र में बाहरी ज्वालामुखी का प्रमाण मिलने की पूरी-पूरी संभावना है। जबकि इसी पेटी में स्थित भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अनेक जीवित एवं प्रसुप्त ज्वालामुखी का प्रमाण मिलता है। जैसे- इटली का विसुवियस, स्ट्राम्बोली, एटना, एल्बुर्ज, ईरान का कोह-सुल्तान इत्यादि।

3. मध्य अटलांटिक कटक पेटी:

        यह पेटी अटलांटिक महासागर के मध्य भाग में उत्तर से दक्षिण दिशा से होकर गुजरती है। यह प्लेट अपसरण का क्षेत्र है। यहाँ पर लम्बे दरार का निर्माण हुआ है। जिससे बैसाल्टिक लावा बाहर निकलता है और ठंडा होकर मध्य अटलांटिक कटक को जन्म दिया है। जैसे- आइसलैंड का माउंट हेकला, माउंट लोकी, सक्रिय ज्वालामुखी है, जो मध्य अटलांटिक पेटी में ही पड़ते है।

4. अन्य क्षेत्र:-

          विश्व के कई ऐसे छोटे-छोटे क्षेत्र है जहाँ पर ज्वालामुखी उदगार का प्रमाण मिलता है। जैसे- अफ्रीका के पूर्वी भाग में निर्मित महान भ्रंश घाटी के सहारे तंजानिया का किलिमंजारो, केन्या का  माउंट केनिया पर्वत मिलते है। इसी तरह क्रिटैशियस काल में हुए लावा उदगार से दक्कन के पठार पर ज्वालामुखी का प्रमाण मिलता है तथा अंडमान एवं निकोबार में बैरन (सक्रिय) एवं नरकोंडम (प्रसुप्त) द्वीप ज्वालामुखी के ही उदहारण है।

        अतः उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी के क्षेत्र प्लेट के किनारे पर अवस्थित है।

मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का प्रभाव:

    मानवीय क्रियाकलापों को ज्वालामुखी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभावित करता है।

1. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का सकारात्मक प्रभाव:

         मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखियों के सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी से बहुत सारे नए भू-आकृतियों का निर्माण होता है। जैसे- क्रेटर और काल्डेरा झीलें, लावा मैदान, गेसर, ज्वालामुखीय पठार और ज्वालामुखी पर्वत।

⇒ यह दुर्बलमंडल (Asthenosphere) से सतह पर सोना, लोहा, निकेल और मैग्नीशियम जैसे मूल्यवान तत्व को पृथ्वी के सतह पर लाता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग का सोना और कनाडा में सडबरी का निकेल निक्षेप ज्वालामुखी निक्षेपण के उदाहरण हैं।

⇒ आग्नेय शैल लावा के ठंडा होने के बाद बनता है, जिसका उपयोग निर्माण जैसी विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है।

⇒ ज्वालामुखी हमें उपजाऊ भूमि प्रदान करते हैं। ज्वालामुखी की धूल और राख का जमाव भूमि को उपजाऊ बनाता है। उदाहरण के लिए, दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी और जावा द्वीपों की उपजाऊ भूमि ज्वालामुखी द्वारा बनाई गई है।

⇒ यह सुंदर दृश्य भी बनाता है और जिससे यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।

⇒ यह पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में भी बहुत सारी जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं और प्लेटों की गति की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह भूतापीय ऊर्जा का एक संभावित स्रोत भी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, इटली और जापान जैसे कई देश भूतापीय ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।

2. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का नकारात्मक प्रभाव:

      मनुष्य पर ज्वालामुखी के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी की धूल और गैसें वातावरण को अपारदर्शी बना देती हैं जिससे वायु परिवहन मुश्किल हो जाता है, श्वसन रोग बढ़ जाता है और सूर्यातप को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से भी रोकता है अर्थात यह पृथ्वी को ठंण्डा करता है।

⇒ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद क्षेत्र में लावा का जमाव होने से वहाँ की जमीन को सरंध्र बनाती है जिससे क्षेत्र में पानी की कमी हो जाती है।

⇒ ज्वालामुखियों के अचानक फटने से मानव बस्ती, मानव जीवन और उसकी संपत्ति को काफी नुकसान होता  है। उदाहरण के लिए, माउंट वेसुवियस (जो एक ज्वालामुखी विस्फोट से बना है) ने 78 ई० में इटली में पोम्पेई शहर को नष्ट कर दिया।

⇒ जब समुद्र में ज्वालामुखियों का विस्फोट होता है तो यह आसपास के जल को गर्म कर देता है जिससे की वहाँ के जलीय जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।


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10. Topography Created by Volcanic Action / ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति

 10. Topography Created by Volcanic Action

(ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति)


ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति⇒

Topography Created by Volcanic Action

   ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के भीतर गैस एवं लावा की उत्पति से लेकर उनके पृथ्वी के भीतर या बाहर प्रकट होने की सभी क्रियाएं सम्मिलित होती है। ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर :- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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2. Complete Educational Psychology Capsule 2 / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

2. Complete Educational Psychology Capsule 2


Complete Educational Psychology Capsule 2 ⇒

Psychology Capsule 2Education (शिक्षा)

                     शिक्षा एक जीवनपर्यन्त चलने वाली बालक के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। यह देश, काल व स्थान आदि के बन्धनों से मुक्त होती है। अर्थात  वास्तव में शिक्षा एक अनियंत्रित वातावरण है, जिसमें रहते हुए बालक स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी प्रकृति एवं क्षमता  के अनुसार विभिन्न अनुभवों को प्राप्त करते हुए सीखता है। 

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

➡शिक्षा शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष’ धातु से हुई है, जिसका  शाब्दिक अर्थ सीखने, ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है।

➡शिक्षा शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर शब्द Education है। Education शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा एडुकेट ‘Educatum’से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षण कार्य करना।

➡कई विद्वानों के अनुसार Education शब्द की उत्पत्ति ‘Educare’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ  है – पालन पोषण और विकसित करना।

➡ इस प्रकार Education शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Educatum शब्द से हुई है जिसमें E मतलब अन्दर से, Duco मतलब बाहर निकालना। अर्थात शिक्षा का अर्थ होता है, बालक के अन्तर्निहित योग्यताओं को बाहर निकाल कर उसके व्यवहार में परिवर्तन करना है।

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति: 

➡शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।

➡इसमें नियम व सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है।

➡ शिक्षा मनोविज्ञान अतीत की अपेक्षा वर्तमान की घटनाओं से, क्या और क्यों से सम्बन्धित है।

➡ इसके नियम व सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं।

➡इसके द्वारा भविष्यवाणी की जा सकती है।

➡किसी भी वैज्ञानिक पद्धति में हम उसका अध्ययन करते हैं, जिसक निरीक्षण किया जाता है। 

➡शिक्षा मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन करता है, इसका निरीक्षण किया जा सकता है।

➡ शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहारात्मक पक्ष का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है।

➡शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

➡शिक्षा मनोविज्ञान एक सकारात्मक विद्यालय विज्ञान है, जो शिक्षा के कब, कैसे, और कहाँ आदि प्रश्नों के उत्तर पर ध्यान केन्द्रित करता है।

Complete Educational Psychology Capsule 2

शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता :

➡स्वयं को पहचानने में सहायक।

➡बालक को पहचानने में सहायक।

➡मूल्यांकन की नई-नई विधियों का प्रयोग करना।

➡शिक्षक के दृष्टिकोण को उन्नत व व्यापक बनाने में सहायक।

➡ किसी भी प्रकार की कक्षा में शैक्षणिक प्रस्तुतियां जागृत करने में सहायक।

➡बालको के प्रति प्रेम, सहानुभूति व समदृशी भाव अपनाने में।

➡बालकों के चहुमुखी विकास के लिए उचित शिक्षण विधियों अपनाने में सहायक।

➡बालकों को अभिप्रेरित करते हुए उनमें रुचि जागृत करना। 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

1. Complete Educational Psychology Capsule 1 / शिक्षा मनोविज्ञान

1. Complete Educational Psychology Capsule 1


Complete Educational Psychology Capsule 1⇒

Psychology Capsule 1

शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान’ दो शब्दों से मिलकर बना है- पहला- ‘शिक्षा’ और दूसरा- ‘मनोविज्ञान’। इस प्रकार शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ शिक्षा संबंधी मनोविज्ञान से है। दूसरे शब्दों में, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का ही व्यावहारिक रूप है और शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का सम्पूर्ण अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

एक नजर में इन्हें जरुर देखें

➡ शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में माना जाता था।

➡ विलियम जेम्स ने दर्शनशास्त्र से मनोविज्ञान को मुक्त कराया। इसलिए मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स को माना जाता है।

➡ मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रूडोल्फ गोयल ने किया।

➡ मनोविज्ञान को स्वतन्त्र विषय बनाने के लिए मनीषियों द्वारा इसे परिभाषित करना आरम्भ किया गया।

➡ गेरेट के अनुसार PSYCHOLOGY शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के दो शब्दों PSYCHE और LOGOS से मिलकर हुई हैं।

➡ यहाँ PSYCHE का अर्थ :- आत्मा तथा LOGOS का अर्थ – अध्ययन करना है।

➡ 16वीं शताब्दी में सर्वप्रथम आत्मा को आधार मानकर प्लेटो, अरस्तु और डेकार्डे  के द्वारा मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना गया। 

➡ आत्मा शाब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अन्त में यह परिभाषा अमान्य हो गयी।

➡ 17वीं शताब्दी में इटली के मनोविज्ञानी पॉम्पोनोजी व थासडरीन इसे मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान माना। बाद में यह परि भाषा भी अपूर्ण अर्थ के कारण अमान्य कर दी गयी।

➡ 19वीं शताब्दी में विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान माना और अपने अपूर्ण अर्थ की वजह से यह भी अमान्य कर दी गयी।

➡ 20वीं शताब्दी में वाटसन, थार्नडाइक, स्किनर तथा मेग्डुगल इत्यादि ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना जो आज तक प्रचलित है।

➡ भारत में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला सेन गुप्त के द्वारा 1915 ई0 में कलकत्ता शहर में स्थापित की गयी।

➡ जर्मनी के लिपजिंग शहर में विलियम वुण्ट के द्वारा 1879 ई० में ‘कार्लमार्क्स विश्विद्यालय में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोग शाला स्थापित की गयी। 

➡ विलियम वुण्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।

➡ वुडवर्थ के अनुसार – “मनोविज्ञान में सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मन व मस्तिष्क का त्याग किया और फिर उसने अपनी चेतना का त्याग किया तथा तब आज वर्तमान में मनोविज्ञान व्यवहार के विधि स्वरूप स्वीकार करता है।”

➡ वाटसन का कथन – ‘तुम मुझे एक बालक दो मैं उसे वो बना सकता हूँ जो मैं बनाना चाहता हूँ।” 

मनोविज्ञान के अर्थ पर विभिन्न विज्ञानियों के मत
➡ मेग्डुगल- मनोविज्ञान व्यवहार व आचरण का विज्ञान है।’
➡ स्किनर- ‘मनोविज्ञान व्यवहार व अनुभव का विज्ञान है।’
➡ वाटसन- मनोविज्ञान व्यवहार का सुख निश्चित, सकारात्मक धनात्मक विज्ञान है।” 
➡ क्रो एण्ड क्रो- ‘मनोविज्ञान मानव व्यवहार व संबंधों का अध्ययन है।
➡ मन- ‘आधुनिक मनोविज्ञान का संबंध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज है।’
➡विलियम मेग्डुगल ने अपनी पुस्तक Outline Psychology में चेतना शब्द की निंदा की है।
मनोविज्ञान की प्रमुख शाखायें / क्षेत्र-
1. सामान्य मनोविज्ञान,
2. असामान्य मनोविज्ञान,
3. तुलनात्मक मनोविज्ञान,
4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान,
5. समाज मनो विज्ञान,
6. औद्योगिक मनोविज्ञान,
7. बाल मनोविज्ञान,
8. किशोर मनोविज्ञान,
9. प्रोढ़ मनोविज्ञान,
10. विकासात्मक मनोविज्ञानी,
11. निदानात्मक / उपचाराला / क्लिनिक मनोविज्ञान,
12. परा मनो विज्ञान,
13. पशु मनो विज्ञान,
14. शिक्षा मनोविज्ञान।

➡ मनोविज्ञान की शाखा शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति 1900 ई० में मानी जाती है। बाद में थार्नडाइक, जड़, टरमन, प्रोबेल, हरबल आदि के प्रयासों से 1920 ई0 में शिक्षा मनोविज्ञान को स्पष्ट स्वरूप प्राप्त हुआ।

➡ प्रथम शैक्षिक मनोविज्ञानिक थार्नडाइक को माना जाता है।

➡ शिक्षा में मनोवैज्ञानिक दृष्टि का सूत्रपात रूसो ने किया। रूसो ने अपनी पुस्तक E-mail में लिखा- “शिक्षा संस्कृत के शिक्ष धातु से बना है।”

➡ स्किनर के अनुसार- “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी की आधार शिला है।”

 शिक्षा मनोविज्ञान पर विभिन्न वैज्ञानिकों के मत

➡रूसो- “बालक एक पुस्तक के समान है जिसका अध्ययन प्रत्येक अध्यापक को करना चाहिए।”

➡फ्रॉबेल- “शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बालक अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास करता है।”

➡क्रो एण्ड क्रो- “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से वृद्धावस्था तक किसी भी व्यक्ति के सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”

➡स्किनर-“मनोविज्ञान शिक्षा का आधार भूत विज्ञान है। 

➡ट्रो-  “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक प्रस्तुतियों का मनोवैज्ञानिक ‘दृष्टि से अध्ययन है।”

➡ब्राउन- “शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्ययवहारों में परिवर्तन होता है।”

➡विवेकानन्द- “अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रदान करना ही शिक्षा है।”

➡महात्मा गांधी- “शिक्षा से अभिप्राय बालक या मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्तम विकास से है।”

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

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