7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन


  मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

मानसून क्षेत्र           

       मानूसन क्षेत्र की निम्न विशेषताएँ होती हैं:-

अक्षांशीय स्थिति:-

       मानसूनी जलवायु का विस्तार भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5º से 36° अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। वास्तव में ये प्रदेश व्यापारिक हवाओं की पेटी में आते हैं, जिनमें ऋतुवत उत्तर तथा दक्षिण की ओर खिसकाव होता रहता है; जिस कारण मानूसन प्रकार की विशिष्ट जलवायु की उत्पत्ति होती है, जिसमें 6 महीने तक हवायें सागर से स्थल की ओर तथा शेष 6 महीने में स्थल से सागर की ओर चला करती हैं। इस जलवायु के अन्तर्गत पाकिस्तान, भारत, बांगलादेश, बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, उ० तथा द० वियतनाम, पू० द्वीप समूह, आस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग आदि को शामिल किया जाता है।

तापक्रम:-

        तापक्रम वर्ष भर ऊँचा बना रहता है, परन्तु सूर्य की उत्तरायण तथा दक्षिणायन की स्थितियों की वजह से ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आविर्भाव होता है। कुल मिलाकर यहाँ पर तीन मौसम होते हैं-

(i) ग्रीष्मकाल

(ii) वर्षाकाल और

(iii) शीतकाल

        इनमें ग्रीष्मकाल मार्च से जून, वर्षाकाल जुलाई से अक्टूबर और अन्तिम शीतकाल नवम्बर से फरवरी तक रहता है। ग्रीष्मकाल का औसत तापक्रम 80° से 90° फ० रहता है, परन्तु मई तथा जून में तापक्रम कई स्थानों पर 105° से 120° फा० तक पहुँच जाता है। उत्तरी भारत में तो मई और जून में कई बार गर्म हवायें चलने लग जाती हैं। तटीय भागों में तापक्रम 80° से 950 फ० के बीच आंका जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उच्च तापक्रम पर धरातलीय प्रभाव की छाप है।

        शीतकाल में औसत तापक्रम 50º से 80º फा० के बीच होता है। सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है, जिस कारण वह मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है, परिणामस्वरूप इस भाग का तापक्रम गिर जाता है। इस तरह वार्षिक तापान्तर अधिक हो जाता है। वार्षिक तापान्तर पर सागर से दूरी तथा वर्षा की मात्रा का पर्याप्त प्रभाव होता है। तट से दूर शुष्क भागों में वार्षिक तापान्तर बढ़ता जाता है। दैनिक तापान्तर 10° से 20° फा० के बीच रहता है। वर्षाकाल में तापक्रम ग्रीष्मकाल की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है।

वायु दाब तथा हवायें:-

        ग्रीष्म तथा शीतकाल के कारण मानसूनी प्रदेश क्रमशः निम्न तथा उच्च दाब से प्रभावित होता रहता है। ग्रीष्म काल में 21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा 21 जून को कर्क रेखा पर लम्बबत् चमकता है, परिणामस्वरूप उच्च तपक्रम के कारण निम्न वायुदाब का निर्माण हो जाता है जिस कारण सागर से स्थल की ओर हवायें चलने लगती है जो द०-पू० मानसून होती है।

        23 सितम्बर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है और वह 24 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण उत्तरी गोलार्द्ध के मानसूनी प्रदेशों में शीतकाल के कारण उच्च वायुदाब का निर्माण होता है। परिणामस्वरूप स्थल से सागर की और हवायें चलने लगती है। ये हवायें ‘उ०-पू० मानसून’ कही जाती है।

          वास्तव में उ०-पू० मानसूनी हवायें व्यापारिक हवायें होती है, जो कि सूर्य की दक्षिणामण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के द० की ओर खिसकाव के कारण द०-पू० एशिया आदि पर स्थापित हो जाती है। चूँकि ये हवायें स्थल से होकर आती है, अतः ये शुष्क होती हैं, परन्तु जहाँ कहीं भी ये सागर के ऊपर से चलती हैं, नमी धारण कर लेती है तथा वर्षा कर बैठती हैं। मानसून की तापीय उत्पत्ति के सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार द०-प० मानसूनी हवायें भी द०-पू० व्यापारिक हवायें ही होती है।

          सूर्य की उत्तरायण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के कारण द०-पू० व्यापारिक हवायें भूमध्य रेखा को पार कर लेती हैं तथा ‘फेरल के नियम’ के अनुसार उनकी दिशा द०-प० हो जाती है, चूँकि ये हवायें सागर से होकर आती है। अतः आर्द्र होने के कारण वर्षा करती हैं।

             मानसून की गतिक उत्पत्ति के समर्थकों के अनुसार सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय डोलड्रम की पेटी का द०-पू० एशिया पर विस्तार हो जाता है तथा उसमें प्रवावित होने वाली विषुवत रेखीय पछुवा ही द०-पू० मानसून हवा होती है। डोलड्रम के साथ द०-पू० एशिया पर चक्रवातीय दिशायें व्याप्त हो जाती है। ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात प्रायः पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चलते हैं तथा पर्याप्त वर्षा प्रदान करते हैं। विभिन्न स्थानों पर इन्हें “टाइफून” चक्रवात तथा “हरीकेन” नाम से पुकारा जाता है।

वर्षा:

      मानसून प्रदेशों में वर्षा मुख्यतः चक्रवातीय तथा पर्वतीय प्रकार की होती हैं। परन्तु कुछ वर्षा संवहनीय प्रकार की होती है। अर्द्ध मानसून हवायें जब पर्वतीय अवरोध का सामना करती हैं तो उन्हें ऊपर उठना पड़ता है परिणामस्वरूप पर्याप्त वर्षा हो जाती है। हिमालय के दक्षिणी ढाल पर आसम से लेकर काश्मीर तक इन हवाओं से पर्याप्त वर्षा होती है परन्तु जैसे-जैसे ये हवायें आगे बढ़ती जाती है वर्षा की मात्रा घटती जाती है। जून से अक्टूबर तक द०-पू० मानसून हवाओं से वर्षा प्राप्त होती है। शरद काल में पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से कुछ वर्षा होती है।

         वर्षा के वार्षिक वितरण में पर्याप्त विषमता पाई जाती है। वर्षा का अधिकांश भाग केवल चार महीनों (जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर) में प्राप्त हो जाता है। यहाँ वर्षा भी लगातार नहीं होती है। बीच-बीच में सूखा भी पड़ जाता है। वर्षा के प्रादेशिक वितरण में भी पर्याप्त अन्तर होता है। उदाहरणार्थ भारत के चेरापूँजी में वार्षिक वर्षा 426″ तक होती है जबकि थार के रेगिस्तान में 10″ से भी कम होती है। इस तरह मानसून वर्षा की मात्रा, वितरण, समय आदि सभी अनिश्चित होते हैं जिस कारण कृषि कार्य भी अनिश्चित हो जाती है।

वनस्पति:-

       मानसूनी प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में विषमता के कारण कई प्रकार की वनस्पति मिलती है। 200 से० मी० से अधिक वर्षा वाले भागों में सदाबहार वन मिलते हैं। उदाहरणार्थ भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में 100 से 200 से० मी० वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वृक्ष मिलते हैं। 50 से 100 सेमी० वर्षा वाले भागों में घास पर्णपाती वन मिलते हैं। शुष्क भाग में झाड़ियाँ आदि  मिलती है।

प्रश्न प्रारूप

1. मानसूनी भूमि की स्थिति, जलवायु तथा वनस्पति के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिये।

अथवा, मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप


 समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

समशीतोष्ण घास

                 प्रकृति के विस्तृत आँगन पर अनेकों प्रकार की वनस्पतियाँ सृष्टि के आरम्भ से ही उगती बढ़ती आई हैं। इन वनस्पतियों का समय विशेष पर विनाश हो जाता है और उसके स्थान पर पुनः उसी तरह की वनस्पति उग आती है। संसार के ग्लोव पर नजर डालने पर हमें ज्ञात होता है कि वनस्पति चारों ओर एक सी नहीं है। कहीं पर विस्तृत सघन वन है तो कहीं पर घास के मैदान, कहीं कांटेदार झाड़ियाँ हैं, तो कहीं फूलदार वनें।

                 अतः स्थान-स्थान पर तरह-तरह की वनस्पतियाँ दिखाई देती हैं। इन विभिन्नता के कारण तापमान की दशा, वर्षा की मात्रा, मिट्टी की प्रकृति, प्रकाश प्राप्ति, पवन आदि की प्राप्ति की विभिन्नता है। संसार में घास के मैदानों को प्राकृतिक दशाओं के अनुसार दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।:-

1. उष्ण घास के मैदान तथा

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान।

1. ऊष्ण घास के मैदान:-

         भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में 10° से 20° अक्षांशों के बीच भूमध्य रेखीय वनों को घेरे हुए विस्तृत घास के मैदान फैले हुए हैं। ये घास के मैदान उष्ण मरुस्थलों और मानसूनी प्रदेशों के बीच फैले हैं। इस प्रकार की जलवायु अफ्रीका के सूडान राज्य में अधिक होने से इन प्रदेशों को सूडान तुल्य जलवायु वाले प्रदेश कहते हैं। वेनेजुएला में इन घास के मैदानों में ‘लानोज’, ब्राजील में कम्पास तथा इन्हीं अक्षांशों के बीच मध्य आस्ट्रेलिया के भाग शामिल हैं।

अफ्रीका के सवाना प्रदेश:

          अफ्रीका में भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में ये घास के मैदान फैले हैं। इन घास के मैदानों की घास 3 मीटर तक लम्बी है। यहाँ प्रमुख धंधा पशुपालन है। सूडान का सबसे प्रसिद्ध नगर तुम है। अधिक वर्षा वाले भागों में गाय, बैल और शुष्क भागों में भेड़, बकरियां और ऊँट पाले जाते हैं।

          नील और श्वेत नील के दोआब कपास के लिये प्रसिद्ध है। खजूर, मूंगफली और बाजरा तथा बबूल के पेड़ों से अरबी गोंद प्राप्त होता है। पश्चिमी सूडान का प्रसिद्ध नगर टिम्बकटू है।

           दक्षिणी अफ्रीका के सवाना प्रदेश में न्यासालैंड, उत्तर रोडेशिया और अंगोला सम्मिलित हैं। इन घास के मैदानों में अन्य जानवर बहुत रहते हैं। अतः यहाँ के लोग अपने निवास के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बाड़े बनाकर उनके बीच में अपनी भेड़, बकरियाँ और अन्य पशुओं को रात के समय रखते हैं।

             यहाँ टिसीटिसी मक्खी, जो जहरीली होती है पाई जाती है, जो घोड़ों और पशुओं को हानि पहुँचाती है। यहाँ की घास लम्बी और सघन होने के कारण यहाँ तापमान और वर्षा की अधिकता है। यहाँ घास नदियों के पास तो बहुत ही सघन और लम्बी-लम्बी होती है।

दक्षिणी अमरीका के सवाना प्रदेश

ओरिनिको बेसिन के लानोज:

         ओरिनिको के बेसिन में विस्तृत घास के मैदान मिलते हैं। इन्हें बेनेजुएला के ‘लानोज’ कहा जाता है। पशुपालन भी यहाँ अधिक होता है। गायें यहाँ खूब पाली जाती हैं। यहाँ मच्छरों की भरमार है और जलवायु गर्म है अतः यहाँ पशुओं की दशा अच्छी नहीं हैं। यहाँ मांस का व्यापार घरेलू खपत के लिये हैं।

ब्राजील के कैम्पास:

           इस क्षेत्र में भी पशु पाले जाते हैं, परन्तु गर्म जलवायु परिवहन की कठिनाई और मांस के जल्दी खराब होने के कारण यहाँ पशुपालन महत्वपूर्ण नहीं हैं। कहबे की कृषि के कारण इस भाग की बहुत उन्नति हुई है। साओपाली और रियोडिजेनेरी कहवा की उपज के मुख्य क्षेत्र हैं। इस प्रदेश का पूर्वी भाग लोहा, ताँबा, हीरे, सोना, मैगनीज आदि खनिज पदार्थों से सम्पन्न है।

आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश:

            आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश उत्तरी प्रान्त और क्वीसलैंड के मध्य में फैला हुआ है। इस प्रदेश के उत्तर में मानसूनी खण्ड, दक्षिण में शुष्क मरुस्थल और पूर्व में ग्रेट डिवाइडिंग रेंज पर्वत है। इस प्रदेश का प्रमुख धन्धा पशुपालन है। पानी की कमी के कारण यहाँ भेड़ें अधिक पाली जाती है।

            जहाँ कहीं पानी की सुविधा है, वहीं गेहूँ की कृषि की जाती है। सवाना घास के मैदानों में वार्षिक मध्यमान 30° सेन्टीग्रेड और वार्षिक ताप परिसर 120° सेन्टीग्रेड है। ये घास के मैदान ध्रुवों की ओर तो मरुस्थलों में बदलकर झाड़ियाँ मात्र रह जाते हैं और भूमध्य रेखा की ओर वनों में परिणत हो जाते हैं। इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होती है।

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान:-

           ये घास के मैदान 30° से 45° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के मध्य भागों में पाये जाते हैं। इस प्रदेश के भाग विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से पुकारे जाते हैं। ये भाग पूर्णतया घास के मैदान हैं।

        समशीतोष्ण घास के मैदान में छोटी-छोटी झकड़ेदार घासों की हरीतिमा सर्वव्याप्त होती है। कम तापमान और साधारण नमी से इस क्षेत्र में घास के विकास के लिए आदर्श परिस्थिति उपलब्ध होती है। यहाँ की अधिकांश वर्षा ग्रीष्म काल में होती है तथा शीतकाल ठण्डा और कम आर्द्र होता है। घासों के साथ झाड़ियाँ और बौने वृक्ष भी उगते हैं। ऐसे परिवेश में शाकाहारी और मांसाहारी जीव-जन्तुओं का साम्राज्य पाया जाता है। मानव के लिए ये आदर्श पशुपालन की स्थिति है। यही कारण है कि युगों से यहाँ पशुपालन मुख्य पेशा रहा है।

                मध्य एशिया के किरगीज न जाने कब से इस पेशे से अपना जीवन-यापन करते चले आ रहे हैं। इनकी अधिकांश आवश्यकताएँ पशु उत्पादों से पूरी हो जाती हैं। पर्वतों के ऊँचे भागों पर भी इस प्रकार की घास पाई जाती है, जहाँ पशुपालन प्रचलित पेशा है।

                 जिन भागों में कृषि का विस्तार हुआ है, वहाँ समशीतोष्ण घास के मैदान लुप्त हो गये हैं, जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी और मध्यवर्ती भागों में ऐसे घास के मैदानों पर अब व्यापारिक पशुपालन का विकास भी किया गया है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी भाग, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और साइबेरिया में। यहाँ सिंचाई और उर्वरक का प्रयोग कर घास के मैदानों को अधिक उपजाऊ बनाया गया है।

            ये क्षेत्र आज पशु उत्पादों के प्रधान क्षेत्र हैं। आल्पस और रॉकी क्षेत्रों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के क्षेत्र हैं। हिमालय में कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की पहाड़ियों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के आधार हैं।

         समशीतोष्ण घास के मैदानों में आदिवासी जातियों का अर्थतंत्र पशुपालन पर आधारित होता है। पशुओं से प्राप्त दूध, मांस उनका भोजन, ऊन, चमड़ा, हड्डी उनका वस्त्र, तम्बू और हथियार और कुछ पशु उत्पाद व्यापार के आधार होते हैं, जिन्हें बेचकर वे अपनी आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

              पशुओं के साथ घूमते रहने के कारण तम्बू इनके गृह का काम करता है। कभी-कभी ये अपनी बस्ती भी बनाते हैं, जहाँ बहुधा जाड़े के मौसम में निवास करते हैं। अब विकसित चारागाहों पर स्थायी निवास भी बनाये गये हैं और अतिरिक्त पेशा के रूप में कृषि करने का रिवाज भी बढ़ता जा रहा है। रूसी सरकार द्वारा किरगीज चरवाहों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था की गई है।

               व्यावसायिक पशुपालन वाले घास के मैदानों में विशेषकर आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया, स्विट्जरलैण्ड, अर्जेण्टाइना आदि में विकसित नस्ल के पशु और रोपित घास का प्राधानता पाया जाता है। रूस के साइबेरिया क्षेत्र में भी ऐसे घास फार्मों का विकास किया गया है। स्पष्ट है कि जीवन-पद्धति के निर्धारण में घास की भूमिका प्रधान है। ऐसे क्षेत्रों में आदिवासी, जीवन-पद्धति का आदर्श रूप साइबेरिया के किरगीज में पाया जाता है।

            जनवरी का मध्यमान 10° सेन्टीग्रेट और जुलाई का 20° सेन्टीग्रेड है। उन भागों में बर्फ पिघलने से घास और फूलों के उगने के लिए पर्याप्त आर्द्रता मिल जाती है। यहाँ बौछार के रूप में थोड़ी वर्षा भी हो जाती है जो घास के लिये पर्याप्त है। संसार में इन घास के मैदानों का वितरण निम्नलिखित प्रकार है-

यूरेशिया के स्टेपीज:

         अजरबेजान, जोर्जिया और जार्मिनिया तीन एशियायी राज्य जो कैस्पियन, अरब सागर तटीय भाग सम्मिलित है। यहाँ शीत ऋतु में तापमान गिर जाता है और वर्षा नहीं होती है। ग्रीष्म ऋतु में पठार के गर्म हो जाने पर दोनों सागरों पर अपेक्षाकृत अधिक दबाव होता है, जिससे वर्षा होती है। काकेशस पर्वत उत्तर की ओर से आने वाली बर्फीली पवनों को रोक लेते हैं। वर्षा पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है। यह भाग रूस के लिये बड़े महत्त्व का है।

           क्यूबान के स्टैपी प्रदेश में मुख्यतः गेहूँ उगाया जाता है, जलवायु मृदु होने के कारण काले सागर के सामने वाली पर्वत श्रेणियों के निचले ढलानों पर अंगूरों और चाय के वृक्ष लगे हैं। ग्रीष्म ऋतु गर्म होती है। पूर्वी भाग में पशुचारण का काम होता है। सम्पूर्ण रूस का 90 प्रतिशत तेल यूरेशिया के इन्हीं भागों से प्राप्त होता है।

उत्तरी अमेरिका के प्रेरीज:

            उत्तरी अमेरिका में प्रेरीज प्रदेश का विस्तार मिसीसिपी नदी और उसकी सहायक नदियों के बेसिन में फैला है। यदि ओहियो और मिसीसिपी नदियों के संगम स्थान को दक्षिण आकोटा राज्य की ब्लैक पर्वत श्रेणियाँ और मेक्सिको देश के सियरा मोद्र पर्वत के पूर्वी भाग की तली पर स्थित मोन्टेरे नगर से मिला दिया जाये तो इस प्रदेश की सीमा बन जायेगी।

          यहां वर्षा थोड़ी बहुत वर्ष के हर माह में हो जाती है। अधिकतम वर्षा 70 सेन्टीमीटर और न्यूनतम 5 सेन्टीमीटर होती है। मुख्य उपज घास है, पश्चिम की ओर से ग्रेट प्लेन में घास भी कम पाई जाती है। आजकल इन प्रदेश का मुख्य धन्धा कृषि हो चला है। गेहूँ की प्रधानता है। यहाँ संसार का सबसे अधिक तेल निकाला जाता है।

दक्षिणी अमेरिका के पैम्पाज:

            अर्जेन्टाइना में घास के समतल मैदानों को पैम्पाज कहते हैं। आरम्भ में चमड़ा और चर्बी बिक्रय धन्धा बहुत उन्नति कर गया था वहाँ से आज भी संसार का सबसे अधिक गोमांस निर्यात होता है। यहाँ गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम के शुष्क भाग में भेड़ें पाली जाती हैं, जिनसे ऊन और चमड़ा प्राप्त हो जाता है।

आस्ट्रेलिया के डार्लिंग डाउन्स:

           डार्लिंग नदी के पूर्वी पर्वतों तक के चरागाहों को आस्ट्रेलिया में डाउन्स कहते हैं। इस मैदान के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा पर्याप्त होती है, जिससे गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम की ओर का भाग शुष्क होने से भेड़ों के चराने योग्य है।

अफ्रीका के वेड:

             अफ्रीका में इन घास के मैदानों को ‘बेल्ड’ कहा जाता है। यहाँ भी पशुचारण का महत्व अधिक है। अब कृषि का भी पर्याप्त विस्तार हो चला है। इन घास के मैदानों में घास की कम सघनता और कृषि के उपयुक्त जलवायु होने से घास के मैदानों को साफ करके कृषि की जाने लगी है।

प्रश्न प्रारूप

1. उष्ण घास एवं शीतोष्ण घास प्रदेश में आर्थिक विकास की सम्भावनाओं का परीक्षण कीजिए।

अथवा, समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलापों की विवेचना करें।

अथवा, शीतोष्ण घास के मैदान में मानवीय कार्यकलापों का परीक्षण कीजिए।

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप


विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

विषुवतरेखीय प्रदेश

                      भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाओं का अध्ययन करने से पूर्व निम्न तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।

भौगोलिक स्थिति:-

          यह जलवायु प्रदेश भूमध्यरेखा के दोनों तरफ 5º उत्तरी व 5º दक्षिणी अक्षाशों के मध्य फैला हुआ है। यहाँ दिन में सूर्य की सीधी एवं तीव्र गर्मी से वायु हल्की होकर ऊपर उठती है। वायु ऊपर उठकर फैल जाती है, जिससे उसमें जलवाष्प ग्रहण करने की शक्ति क्षीण हो जाती है अर्थात् वायु ठण्डी हो जाती है। वायु ठण्डी होने से वर्षा होने लगती है। यह वर्षा कम समय के लिए परन्तु प्रतिदिन होती है।

              जलवायु के इस कटिबन्ध को शान्त कटिबन्ध भी कहते हैं- यह जलवायु अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, घाना व जंजीबार का तट, दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीपों (हिन्देशिया व मलेशिया) सहित एशिया महाद्वीप के कुछ भाग व आस्ट्रेलिया के कुछ भागों में पायी जाती है। इस जलवायु प्रदेश में हर ऋतु में दिन व रात बराबर होते हैं। सालो भर गर्मी पड़ती है लेकिन तापक्रम अधिक नहीं होता। वर्षा प्रत्येक महीने में होती है।

जलवायु:-

      भूमध्य रेखा पर स्थित होने के कारण यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। यहाँ औसत वार्षिक तापक्रम 27° सेन्टीग्रेड रहता है। ताप में मौसमी परिवर्तन बहुत कम होता है इसलिए वार्षिक ताप परिसर अधिक-से-अधिक 3º सेन्टीग्रेड रहता है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी० से अधिक होती है। यहाँ किसी-किसी क्षेत्र में 250 से 500 सेमी० तक वार्षिक वर्षा नापी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति:-

          विषुवतीय प्रदेश की उष्णार्द्र जलवायु में घने वन पाये जाते हैं। वनों में वृक्ष की इतनी अधिक सघनता होती है कि सूर्य का प्रकाश भी आसानी से भूमि पर नहीं पहुँच पाता है। इन वृक्षों के अतिरिक्त लताएँ व झाड़ियाँ भी उगती हैं। इन वनों से होकर गुजरना बहुत कठिन है। जंगली जानवरों के लिए यह उपयुक्त क्षेत्र हैं। इन वनों में महोगनी, सिनकोना, गटापार्चा, सीडर, चन्दन, रोजवुड, आबनूस, ताड़, रबड़, बाँस व बेंत आदि प्रमुख वृक्ष पाये जाते हैं।

मिट्टियाँ:-

         यहाँ पुरानी लाल रंग की मिट्टी पायी जाती है। यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है। इस क्षेत्र में वर्षा की अधिकता के कारण खनिज पदार्थ भूमि के नीचे की ओर खिसक जाते हैं। इस प्रकार मिट्टी की उत्पादकता कम हो जाती है। यहाँ की मिट्टियों में लोहे व ऐल्यूमिनियम के कण अधिक पाये जाते हैं।

जीव-जन्तु:-

       यहाँ के वनों में अनेक प्रकार के पशु-पक्षी व कीड़े-मकोड़े पाये जाते हैं। खुले जंगलों में हाथी, गैंडा, भैंस, हिरन, जंगली सुअर आदि पाये जाते हैं। नदियों में मगर, घड़ियाल व दरयाई घोड़े पाये जाते हैं। पेड़ों पर रहने वाले जीवों में चिड़ियाँ, साँप, बन्दर, छिपकली गिरगिट आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त भी असंख्य जहरीले कीड़े-मकोड़े व जीव पाये जाते हैं।

भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियायें:-

          कांगो बेसिन के ‘पिग्मी’ लोगों की अर्थव्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि कांगो तथा अमेजन बेसिन क्षेत्र में घने जंगलों की प्रतिकूल जलवायु में मानवीय विकास रूक गया है। इस क्षेत्र में बीमारियों के कारण यहाँ के लोगों की लम्बाई 90 से०मी० से 150 से०मी० तक होती है।

             ये लोग आखेट करने में बहुत चतुर होते हैं। जंगली जानवरों के मांस, मछलियाँ, फल, कन्दमूल व पत्तियाँ आदि इनका भोजन है। ये लोग तोड़ की पत्तियों या वृक्षों की छाल को कमर से नीचे लटकाये रहते हैं। इन लोगों का स्थायी निवास नहीं होता, ये घूमते-फिरते रहते हैं।

            इस क्षेत्र में लकड़ी-व्यवसाय अधिक उन्नति इसलिये नहीं कर पाया है। क्योंकि यहाँ प्रतिकूल जलवायु परिवहन मार्गों की कमी, उपयोगी वृक्षों का असमान वितरण एवं वनों को काटने के लिये साधनों की कमी आदि की सुविधा नहीं है। लकड़ी-व्यवसाय ने उन्नति केवल समुद्र तटीय भागों में की है।

            इन वनों में महत्त्वपूर्ण वृक्षों के अतिरिक्त रबड़, गोंद, आइवरी नट, ताड़, तेल, कुनेने आदि वस्तुओं को भी एकत्र किया जाता है। दलदली भूमि, घने जंगलों में प्रतिकूल जलवायु के कारण ये क्षेत्र शक्तिहीन प्रदेश कहलाते हैं। इस क्षेत्र में विश्व की कुल जनसंख्या का केवल 10% भाग निवास करता है। इस क्षेत्र में वनों को साफ करके आदिम ढंग से मकई, ज्वार व बाजरा आदि की खेती की जाती है।

           इण्डोनेशिया व मलेशिया के द्वीपीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल पायी जाती है। इस क्षेत्र में यूरोपीय लोग पहाड़ी ढालों और समुद्र तटीय भागों के वनों को साफ करके रबड़, ताड़, कहवा, चाय, नारियल व गन्ने आदि की बागानी कृषि करते हैं।

          इस क्षेत्र में बागानी कृषि वैज्ञानिक ढंग से की जाती है, इसलिए बागानी फसलों के उत्पादन में यह क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध है। संसार की कुल रबड़ उत्पादन का लगभग दो-तिहाई रबड़ इसी क्षेत्र से उत्पादित किया जाता है। रबड़ के अतिरिक्त इस क्षेत्र में गन्ना, कहवा व चावल आदि खाद्यान्न फसलों का भी उत्पादन किया जाता है।

        मलेशिया व इण्डोनेशिया में टिन व पेट्रोलियम का उत्पादन भी किया जाता है। संसार का लगभग 50% दिन उत्पादन इस क्षेत्र में किया जाता है। इस प्रदेश में जावा द्वीप का विकास अन्य द्वीपों की में अधिक हुआ है। यहाँ मत्स्यपालन भी समुद्र तटीय भागों में अधिक विकसित हुआ है।

          इक्वेडोर तुल्य उच्च पठारी क्षेत्रों में कृषि, पशुचारण, उत्खनन, लकड़ी काटना आदि प्रमुख व्यवसाय हैं। यहाँ की प्रमुख फसलें चावल, गन्ना, कपास, गेहूँ, तम्बाकू, फल, चाय व कहवा आदि हैं। इक्वेडोर व कोलम्बिया के पठारी क्षेत्र में सोने-चाँदी, मैगनीज व ताँबे की खानें पायी जाती हैं।

           सोने, चाँदी, ताँबे, नमक, ग्रेफाइट व टिन आदि के भण्डार पूर्वी अफ्रीका के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। इस क्षेत्र में परिवहन के साधन भी अच्छी तरह से विकसित हैं।

           इस प्रदेश के अधिकांश नगर तटीय क्षेत्रों में समुद्री मार्गों पर बसे हुए हैं। मनाओस, बेलमपारा, बगोटा, नैरोबी, एका, लैगोस, स्टेनलेविले, लियोलिविले, लियोपोल्डविले, जकार्ता व सिंगापुर आदि प्रमुख नगर हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व के विषुवतरेखीय प्रदेशों या भूमध्य रेखीय प्रदेशों के मानवीय कार्य-कलापों का विवरण दीजिये।

अथवा, विषुवतरेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों का परीक्षण कीजिए। 

4. मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

4. मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप


मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

मरूस्थलीय वातावरण

                 मरुस्थलीकरण एक ऐसी भौगोलिक प्रक्रिया है, जिसमें समतल मैदानी उपजाऊ क्षेत्रों में भी मरुस्थल जैसी विशिष्टताएँ विकसित होने लगती हैं। जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय गतिविधियाँ है। इससे शुष्क, अर्द्ध-शुष्क, निर्जल इलाकों की मिट्टी रेगिस्तान में बदल जाती है तथा मिट्टी की उत्पादन क्षमता ह्रास होने लगता है। मरुस्थलीकरण से प्राकृतिक वनस्पतियों का ह्रास तो होता ही है, साथ ही कृषि उत्पादकता, पशुधन एवं जलवायवीय घटनाएँ भी प्रभावित होती हैं।

अक्षांशीय स्थिति:-

           यह प्रदेश भूमध्य रेखा के दोनों ओर 20° से 30° अक्षांशों के बीच अर्थात् उष्ण कटिबन्ध में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में फैला हुआ है।

सम्मिलित क्षेत्र:-

         अफ्रीका में सहारा तथा कालाहारी मरुस्थल हैं। एशिया में भारत एवं पाकिस्तान का थार मरुस्थल तथा अरब मरुस्थल आस्ट्रेलिया में पश्चिमी आस्ट्रेलिया का मरुस्थल। उत्तरी अमेरिका में कोलोरेडी ऐरीजीना तथा दक्षिणी कैलीफोर्निया के मरुस्थल। दक्षिणी अमेरिका में चिली तथा दक्षिणी पेरू का एटाकामा मरुस्थल।

तापमान एवं वर्षा:-

             ग्रीष्म ऋतु अत्यधिक गर्म और शीत ऋतु कम गर्म होती है। इस प्रदेश में संसार के उच्चतम तापमान वाले स्थान स्थित हैं। इस प्रदेश में वर्षा बहुत कम होती है। वर्ष भर में 25 सेन्टीमीटर से भी कम वर्षा होती है।

वनस्पति:-

           अति गर्म एवं शुष्क जलवायु के कारण यहाँ वनस्पति बहुत ही कम होती है। इस प्रदेश में वह वनस्पति है जो गर्मी तथा शुष्कता सहन कर सके, जिनकी जड़ें लम्बी हो ताकि भूमि के भीतर दूर गहराई से जल ले सकें, जिनकी पत्तियाँ मोटी हों ताकि वाष्पीकरण द्वारा उनमें जल की कमी न हो।

आर्थिक विकास:-

             आर्थिक विकास की दृष्टि से यह प्रदेश बहुत पिछड़ा हुआ है। इसके पिछड़ेपन के कारण निम्नलिखित हैं-

(1) भूमि के अधिकतर भाग में रेत फैली हुई हैं।

(2) वर्षा नहीं होती।

(3) गर्मी बहुत पड़ती है।

(4) अति शुष्क पवनें चलती हैं।

(5) आंधियाँ आती हैं।

(6) जल की कमी है।

(7) यातायात के साधनों की कमी है।

(8) जनसंख्या बहुत कम है।

कृषि:-

         इस प्रदेश के अधिकतर भाग में रेत फैली हुई है जिसके कारक कृषि योग्य भूमि बहुत कम है। अत्यधिक गर्मी, शुष्क पवनों तथा जल की कमी के कारण कृषि का विकास अधिक नहीं हो सकता है। नदी घाटियों में सिंचाई द्वारा कृषि की जाती है। मिस्र तथा सूडान की नील घाटी में इस प्रकार की कृषि की जाती है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा, कपास तथा तम्बाकू यहाँ की मुख्य फसलें हैं।

उद्योग:-

         अरब तथा कैलिफोर्निया में तेल साफ करने के कारखाने हैं। थार तथा कैलिफोर्निया में झीलों से नमक प्राप्त करने का उद्योग है। लोग भेड़ एवं बकरियाँ पालकर ऊन प्राप्त करते हैं जिससे ऊन उद्योग चलता है। चारों ओर रेत फैले होने के कारण यातायात के साधनों की कमी तथा जनसंख्या कम होने के कारण उद्योग का विकास नहीं हो सका है।

          यहाँ दो प्रकार के लोग निवास करते हैं। एक तो वे जो कि यूरोप के उन्नतशील लोगों के सम्पर्क में आने से पर्याप्त प्रगति कर गये हैं। उदाहरणार्थ अरब के लोग कैलिफोर्निया तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया में भी यूरोप के उन्नतशील लोग बसे हैं। अतः यहाँ पर लोगों का रहन-सहन आधुनिक ढंग का है।

प्रश्न प्रारूप

1. मरुस्थलों में मानव जीवन तथा कार्यकलापों पर वातावरण के प्रभाव की विवेचना कीजिये।

अथवा, मरूस्थलीय पर्यावरण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

अथवा, मरूस्थलीय वातावरण में मानवीय क्रियाओं का वर्णन कीजिए।

अथवा, मरूस्थलीय क्षेत्र की विशेषताओं और मानवीय कार्यकलाप का विवरण दीजिए।


3. पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

3. पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप


पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलाप

पर्वतीय वातावरण

                भूपृष्ठ की बनावट मानव जीवन को अत्यन्त प्रभावित करती है। भूपृष्ठीय रचना के अनुरूप स्थलरूपों को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा गया है- पर्वत, पठार और मैदान। मानव पर प्रभाव डालने में प्रत्येक की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं।

(1) पर्वत और मानव जीवन:-

          पर्वतों पर मानव जीवन के सामने अनेक तरह की कठिनाइयाँ आती हैं जिनका आभास समतल मैदानी भागों में नहीं होता। पर्वतीय क्षेत्रों में समतल भूमि अत्यन्त सीमित होती है। तीव्र ढाल की अपेक्षा साधारण ढाल वाले क्षेत्र मानव के लिए अधिक उपयोगी होते हैं। साधारण ढाल भूमि पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जाती है किन्तु ऊपरी डालों पर सिंचाई की सुविधा प्रदान नहीं की जाती, वहाँ केवल शुष्क कृषि की जाती है।

         अधिक ऊँचाई पर तापमान गिर जाता है या बर्फ गिरने की वजह से मानव का रहना सम्भव नहीं होता। इसके अलावा ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायुदाब घटता जाता है। 6000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर मनुष्य को साँस लेने में कठिनाई होती है। अतः ऐसे स्थानों पर मानवीय कार्य-कलाप नगण्य मिलता है।

      पर्वतों की ऊँची नीची भूमि पर परिवहन के साधनों को बनाया जाना भी काफी कठिन होता है।

(2) पर्वत एवं जलवायु:-

          एक देश की जलवायु पर पर्वतों का भी प्रभाव पड़ता है। ऊँचाई पर जाते हुए तापमान कम होता जाता है। लगभग 160 मीटर की ऊँचाई पर 90 से०ग्रे० ताप कम हो जाता है। उष्ण देशों में जहाँ पर्वत स्थित है वहाँ, पर्वतों पर स्वास्थ्यवर्धक जलवायु मिल जाती है। पर्वत-शिखरों पर पर्यटक केन्द्र बन जाते हैं। भारत में शिमला, मंसूरी, दार्जिलिंग, उटकमण्ड आदि इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय नगर हैं।

         पर्वतीय प्रदेश आर्द्रतापूर्ण पवनों को रोकने में पूर्ण सक्षम होते हैं इसलिए वर्षा भी मैदानों की अपेक्षा अधिक होती है। साथ ही पर्वत श्रेणियाँ एक देश को ठंडी पवनों से सुरक्षा भी प्रदान करती है। भारत के उत्तर में हिमालय स्थित होने के कारण मध्य एशिया की ठंडी पवनें भारत में प्रवेश नहीं कर पाती जबकि यही ठंडी पवनें चीन के आधे से अधिक भाग को प्रभावित करती हैं। इसी प्रकार उत्तरी अमेरीकी में कनाडा की ठंडी पवनें संयुक्त राज्य अमेरीका के दक्षिण तक पहुँच जाती है और तापमान को पर्याप्त गिरा देती है।

(3) पर्वत एवं वनस्पति:-

        पर्वतों पर ऊँचाई के अनुसार वनस्पति के प्रकार में काफी भिन्नता पाई जाती है। अत: भूमि उपयोग भी प्रभावित होता है। पर्वतों पर एक विशिष्ट ऊँचाई से ऊपर वृक्ष नहीं उगते, केवल घास के मैदान पाये जाते हैं। यहाँ पशुओं के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं।

            ग्रीष्मकाल में यह क्षेत्र चरागाहों के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं। पशुओं में भेड़, बकरियाँ ही ज्यादा पाई जाती हैं क्योंकि इनमें ठंड सहने की शक्ति ज्यादा होती है। चरागाहों के नीचे शंकुधारी वनों का कटिबन्ध मिलता है जहाँ मुलायम लकड़ी के अधिक उपयोगी वृक्ष उगे हुए पाये जाते हैं। शंकुधारी वनों से नीचे पर्णपाती वनों का कटिबन्ध मिलता है, इन दोनों के बीच मिश्रित वनों का कटिबन्ध मिलता है।

           पर्वतीय क्षेत्रों में वनों की अधिकता की वजह से लकड़ी काटने का धन्या अत्यन्त लोकप्रिय होता है किन्तु यहाँ की ढालू भूमि पर लकड़ी काटना, छाँटना तथा लट्ठों को लकड़ी के चीरने वाले कारखानों तक पहुँचाना अत्यन्त कठिन काम होता है। इन कामों के लिये सरल उपाय खोज निकाले गये हैं। नार्वे और स्वीडन में लकड़ी के लट्ठों को बर्फ पर फिसलाकर जमी हुई नदियों तक पहुँचाया जाता है। हिमालय क्षेत्र के वृक्ष को काटकर तनों को नदियों में बहा दिया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पक्की सड़कें बना दी गई हैं। लट्ठों को ढोने का काम मोटर ठेलों से लिया जाता है। कहीं-कहीं पर बाँधकर लट्ठों को खिसकाकर ले जाया जाता है।

          लकड़ी का उपयोग अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। अतः लकड़ी की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, इसलिए वनों को निर्दयतापूर्वक काटा जा रहा है। वन केवल उच्च क्षेत्रों में ही शेष रह गये हैं।

(4) पर्वत एवं कृषि:-

           पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि कार्य केवल सीमित मात्रा में सम्भव है। यहाँ किसानों को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जैसे-

(क) समतल भूमि की कमी,

(ख) मिट्टी का अधिक क्षरण,

(ग) मिट्टी का कम गहरा होना, तथा

(घ) जलवायु की बाधाएँ।

              कृषि के काम के लिए समतल भूमि की जरूरत होती है। समतल भूमि पर ही पूर्ण सिंचाई का लाभ प्रदान किया जा सकता है तथा कृषि यंत्रों का भी उपयोग सम्भव होता है। इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि मानव के कठिन परिश्रम पर ही टिकी है। यहाँ खेत जोतने से लेकर फसल काटने तक समस्त कार्य हाथों से ही करने होते हैं कहीं-कहीं तो मनुष्य को हल भी स्वयं ही चलाना पड़ता है, इसीलिए पहाड़ी भागों में हल्के किस्म के हलों का प्रचलन है।

             कृषि योग्य समतल खण्ड बनाने के लिए पर्वतीय ढालों पर सीढ़ियाँ काटकर सोपानी कृषि की जाती है। ऐसा करने से खेतों में वर्षा या सिंचाई का जल कुछ समय तक रूकने में समर्थ होता है। स्पष्ट है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कृषि नहीं की जा सकती।

        सीढ़ीनुमा, लम्बाकार तथा कम चौड़े खेत पर्वतों के चारों तरफ गोलाई में स्थित मिलते हैं। इस प्रकार के खेत विश्व के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में, जहाँ जलवायु अनुकूल होती है, पाये जाते हैं। किन्तु जापान का उदाहरण इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है। यहाँ किसानों ने अत्यधिक मेहनत करके जगह-जगह भूमि को सीढ़ीनुमा खेतों में तब्दील कर दिया है। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए अनेक तरह की खादों को प्रयोग में लाया गया है। अतः प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद प्रति हैक्टेयर उत्पादन अत्यधिक है।

           पर्वतीय क्षेत्रों में ढालू भूमि होने के कारण मिट्टी का क्षरण भी तीव्र गति से होता है। वर्षा के समय मिट्टी तेजी से कट कटकर जल के साथ बहती रहती है। पहाड़ी भागों में वर्षा भी अधिक होती है। निरन्तर मिट्टी के क्षरण से मिट्टी की गहराई कम रह जाती है और पथरीली भूमि उभर जाती है। कहीं-कहीं पर गहरी नालियाँ बन जाती हैं जहाँ भविष्य में कृषि सदा के लिए असम्भव हो जाती है। वैसे पर्वतीय क्षेत्रों में स्वभावतः मिट्टी की गहराई कम पाई जाती है। मिट्टियाँ अधिकतर कठोर होती हैं जो कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं होती।

        पर्वतों पर कृषि के लिए सभी स्थानों की जलवायु अनुकूल नहीं होती। विषुवत रेखा से 30° अक्षांशों तक 2500 से 3000 मीटर की ऊँचाई तक 30° और 45° अक्षांशों के मध्य 2000 से 3000 मीटर की ऊँचाई तक 45° से 55° अक्षांशों के मध्य 1500 से 2000 मीटर की ऊँचाई तक 55° अक्षांशों के निकट लगभग 200 मीटर की ऊँचाई तक कृषि सम्भव होती है।

            ऊँचाई अथवा अक्षांशों के अन्तर का प्रभाव तापमान पर पड़ता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा द्वारा वांछित लाभ नहीं उठाया जा सकता, जबकि वर्षा काफी होती है। ढालू भूमि होने के कारण वर्षा का जल जल्दी बह जाता है।

           पर्वतों का सबसे ज्यादा लाभ यह है कि उनकी चट्टानों से बहुमूल्य खनिज सम्पत्ति का भण्डार मिलता है। प्राचीन पर्वतों में खनिज पदार्थ ज्यादा मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि प्रकृति की क्षरण करने वाली शक्तियाँ ऊपर की परतों को बहाकर ले जाती हैं और खनिज पदार्थ भूपृष्ठ के ऊपरी भाग में उभर आता है।

            इसके अतिरिक्त अन्तर्जात बलों के प्रभाव में जब भूमि की परतें मुड़ती हैं तो खनिज पदार्थ भी मुड़कर ऊपर पहुँच जाते हैं। इन्हीं कारणों के फलस्वरूप यूराल पर्वतों पर सभी खनिज पदार्थों का भण्डार है। अपलेशियन पर्वतों पर कोयला, लोहा और मिट्टी के तेल का भण्डार पाया जाता है। दक्षिणी भारत के प्राचीन पठार पर मैगनीज, लोहा, सोना, कोयला और अभ्रक आदि खनिज बहुतायत से मिलते हैं।

            वर्तमान सभ्यता का आधार खनिज पदार्थों पर टिका हुआ है। खनिज पदार्थों का अधिक-से-अधिक उत्पादन और उपयोग किया जा रहा है। मानव खनिजों की खोज में दूर पर्वतीय भागों में कठिनाइयों का सामना करते हुए भटकना मंजूर कर लेता है। पर्वतों पर खान खोदना भी अत्यन्त मुश्किल का कार्य है।

       अधिक ऊँचाई पर वायुदाब की कमी की वजह से श्रमिकों को कार्य करने में भी कठिनाई होती है। भारी मशीनों को ले जाकर स्थापित करना भी कठिन होता है क्योंकि उत्तम किस्म के सड़कों के निर्माण में कठिनाई होती है। इसके अलावा खानों से निकले पदार्थ को ढ़ोने की समस्या भी अत्यन्त जटिल होती है क्योंकि परिवहन के साधन अपर्याप्त होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी-अपनी अलग समस्याएँ हैं।

        पर्वतीय क्षेत्रों में औद्योगिक केन्द्रों की स्थापना भी सरल नहीं उद्योगों की स्थापना के लिए तरह-तरह की वस्तुएँ जुटानी पड़ती हैं। कच्चे माल, श्रमिकों की व्यवस्था, शक्ति के साधनों की सफलता तथा परिवहन के साधनों की व्यवस्था करना आवश्यक है।

प्रश्न प्रारूप

1. पर्वतीय वातावरण मानवीय क्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है? संक्षेप में लिखिए।

अथवा, पर्वतीय वातावरण में मानवीय क्रिया-कलापों का वर्णन कीजिए।


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