12. Best Mass Wasting & Mass Movement | वृहद् क्षरण एवं वृहद् संचलन

12. Best Mass Wasting & Mass Movement | वृहद् क्षरण एवं वृहद् संचलन

Mass Wasting & Mass Movement

वृहद् क्षरण एवं वृहद् संचलन

वृहद् संचलन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition):

    ढाल पर स्थित चट्टानों के टुकड़ों, मिट्टी तथा अन्य अपक्षयित पदार्थों का गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से नीचे की ओर खिसकना या गिरना वृहद् संचलन (Mass Movement) कहलाता है। जब ढाल पर स्थित अपक्षयित पदार्थ गुरुत्वाकर्षण के कारण अपने मूल स्थान से हटकर नीचे की ओर स्थानांतरित होते हैं, तो इस प्रक्रिया को वृहद् संचलन कहा जाता है। इसे कई पुस्तकों में वृहद् क्षरण (Mass Wasting) भी कहा जाता है।

    वृहद् संचलन में पदार्थों के स्थानांतरण का प्रमुख कारण गुरुत्वाकर्षण बल होता है। इसमें जल, वायु तथा हिमानी जैसे कारकों की सहायता आवश्यक नहीं होती, यद्यपि ये कारक इस प्रक्रिया को सुगम बना सकते हैं। यदि मलवे का स्थानांतरण मुख्य रूप से बहते हुए जल, वायु या हिमानी द्वारा होता है, तो उसे सामान्यतः वृहद् संचलन की श्रेणी में नहीं रखा जाता।

    इस प्रकार, वृहद् संचलन एक ऐसी भू-आकृतिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से ढालों पर स्थित मिट्टी, चट्टानों एवं अन्य पदार्थों का नीचे की ओर स्थानांतरण होता है।

वृहद् संचलन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Mass Movement)

    वृहद् संचलन की प्रक्रिया अनेक प्राकृतिक एवं भौतिक कारकों से प्रभावित होती है। इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं।

(i) चट्टान की ढाल (Slope of the Rock):-

    जब चट्टानें अधिक ढाल वाली भूमि पर स्थित होती हैं, तो गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से उनके नीचे की ओर खिसकने की संभावना बढ़ जाती है। सामान्यतः ढाल जितनी अधिक तीव्र होती है, वृहद् संचलन की संभावना उतनी ही अधिक हो सकती है।

(ii) चट्टान की ऊँचाई (Height of the Rock):-

   चट्टान या ढाल की ऊँचाई अधिक होने पर उसके नीचे की ओर खिसकने अथवा गिरने की संभावना बढ़ सकती है। विशेषकर तब, जब चट्टानें अस्थिर हों और उनके आधार को पर्याप्त सहारा प्राप्त न हो।

(iii) चट्टान का आधार (Base of the Rock):-

    जिस आधार पर कोई चट्टान स्थित होती है, उसके कमजोर होने से चट्टान की स्थिरता कम हो जाती है। आधार के कमजोर या कट जाने पर उसके ऊपर स्थित चट्टानें गुरुत्वाकर्षण बल के कारण तेजी से नीचे खिसक सकती हैं।

(iv) भूकंप एवं मानवीय गतिविधियाँ (Earthquakes and Human Activities)

    भूकंप के झटके चट्टानों एवं ढालों की स्थिरता को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार, सड़क निर्माण, खनन तथा ढालों की कटाई जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी वृहद् संचलन की संभावना बढ़ा सकती हैं।

(v) वनस्पति का विनाश (Destruction of Vegetation):-

    वनस्पति की जड़ें मिट्टी को बाँधने तथा ढालों को स्थिर बनाए रखने में सहायता करती हैं। जब वनस्पति नष्ट हो जाती है, तो मिट्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है और वृहद् संचलन की संभावना बढ़ जाती है। विशेष रूप से नग्न एवं वनस्पतिविहीन चट्टानी ढालों पर यह प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।

3. वृहद् संचलन के प्रमुख प्रकार (Major Types of Mass Movement):-

    वृहद् संचलन को गति एवं संचलन की प्रकृति के आधार पर मुख्यतः तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है।

(i) मंद संचलन (Slow Movements)

(ii) तीव्र संचलन (Rapid Movements)

(iii) भूस्खलन (Landslides)

Mass Wasting

(i) मंद संचलन (Slow Movements)

      मंद संचलन वह प्रक्रिया है, जिसमें ढाल पर स्थित मिट्टी एवं अन्य पदार्थ बहुत धीमी गति से गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नीचे की ओर खिसकते हैं। इस प्रकार के संचलन में पदार्थों का स्थानांतरण इतना धीमा होता है कि कई बार इसका प्रभाव लंबे समय के बाद स्पष्ट दिखाई देता है।

     मंद संचलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं।

(a) मृदा सर्पण (Soil Creep):-

     मृदा सर्पण वह प्रक्रिया है, जिसमें ढाल पर स्थित मिट्टी धीरे-धीरे गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नीचे की ओर खिसकती रहती है। इसमें मिट्टी के कणों का विस्थापन बहुत धीमी गति से होता है, इसलिए इसे सामान्यतः लंबे समय तक प्रत्यक्ष रूप से पहचानना कठिन होता है।

     मृदा सर्पण की प्रक्रिया में जल की उपस्थिति मिट्टी के कणों की गति को सुगम बना सकती है। पहाड़ी ढालों पर मिट्टी की धीमी गति के कारण पेड़, टेलीफोन के खंभे तथा अन्य ऊर्ध्वाधर वस्तुएँ धीरे-धीरे झुकने लगती हैं। कभी-कभी ढाल के सहारे मिट्टी के छोटे-छोटे टीले भी बन जाते हैं।

मृदा सर्पण की प्रमुख विशेषताएँ:

  • मिट्टी का संचलन अत्यंत धीमी गति से होता है।
  • यह मुख्यतः गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।
  • इसका प्रभाव लंबे समय के बाद स्पष्ट दिखाई देता है।
  • पेड़ों एवं खंभों का झुकना इसका प्रमुख संकेत है।

(b) टैलस सर्पण (Talus Creep):-

     टैलस का अर्थ है पहाड़ी ढालों के नीचे एकत्रित छोटे-बड़े चट्टानी टुकड़ों का ढेर। इन चट्टानी टुकड़ों को शैल-मलबा भी कहा जाता है।

     जब गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ऐसे चट्टानी टुकड़े धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकते हैं, तो इस प्रक्रिया को टैलस सर्पण (Talus Creep) कहते हैं।

    यह प्रक्रिया मुख्यतः उन पहाड़ी ढालों पर देखने को मिलती है, जहाँ चट्टानों के टूटने से पर्याप्त मात्रा में शैल-मलबा एकत्रित हो जाता है।

(c) शैल-हिमानी सर्पण (Rock-Glacier Creep):-

     शैल-हिमानी सर्पण ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शैल-मलबे तथा बर्फ से युक्त मिश्रित पदार्थ गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से मंद गति से ढाल के नीचे की ओर खिसकते हैं।

    यह प्रक्रिया विशेष रूप से ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है, जहाँ चट्टानी मलबे के बीच बर्फ मौजूद होती है। ऐसे मिश्रित पदार्थों का धीरे-धीरे नीचे की ओर संचलन शैल-हिमानी सर्पण कहलाता है।

(d) सॉलिफ्लक्शन (Solifluction):-

    सॉलिफ्लक्शन वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी या मृदा पदार्थ धीरे-धीरे ढाल के नीचे की ओर खिसकते हैं। यह प्रक्रिया प्रायः ठंडे एवं पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक देखी जाती है।

    इसमें मिट्टी जल से संतृप्त होने के कारण अपनी स्थिरता खोने लगती है और गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से धीरे-धीरे नीचे की ओर संचलित होती है। सॉलिफ्लक्शन में पदार्थों का प्रवाह किसी निश्चित मार्ग तक सीमित होना आवश्यक नहीं है।

(ii) तीव्र संचलन (Rapid Movements)

     तीव्र संचलन में मिट्टी, चट्टानी मलबा अथवा अन्य पदार्थ अपेक्षाकृत तेज गति से ढाल के नीचे की ओर गिरते या बहते हैं। इस प्रकार के संचलन में जल की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि जल मिट्टी एवं मलबे को संतृप्त करके उनकी स्थिरता कम कर देता है।

   तीव्र संचलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं।

(a) मृदा-प्रवाह (Soil Flow):-

    मृदा-प्रवाह वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से पहाड़ी ढाल पर नीचे की ओर बहने लगती है।

   जब मिट्टी में जल की मात्रा बढ़ जाती है, तो मिट्टी के कणों के बीच स्थिरता कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में मिट्टी एक प्रवाही पदार्थ की तरह ढाल के नीचे की ओर संचलित होती है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • मिट्टी में जल की मात्रा अधिक होती है।
  • गुरुत्वाकर्षण बल संचलन का प्रमुख कारण होता है।
  • मिट्टी ढाल के नीचे की ओर प्रवाहित होती है।

(b) कीचड़-प्रवाह (Mud Flow):-

      कीचड़-प्रवाह वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी एवं महीन पदार्थ कीचड़ के रूप में ढाल के नीचे की ओर तेजी से बहने लगते हैं। इसमें जल की मात्रा इतनी अधिक हो सकती है कि मिट्टी और अन्य महीन पदार्थ एक गतिशील मिश्रण का रूप ले लेते हैं।

    कीचड़-प्रवाह पर्वतीय क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण उत्पन्न हो सकता है। ज्वालामुखीय क्षेत्रों में ज्वालामुखीय राख, धूल एवं पाइरोक्लास्टिक पदार्थों के जल के साथ बहने से भी विनाशकारी कीचड़-प्रवाह की घटनाएँ हो सकती हैं।

    यह प्रक्रिया केवल आर्द्र क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में भी कभी-कभी तीव्र वर्षा के बाद कीचड़-प्रवाह देखने को मिलता है।

    वनस्पति के अभाव, तीव्र ढाल तथा अपरदन की अधिकता के कारण मिट्टी और चट्टानी मलबे का संचलन बढ़ सकता है। जब ये पदार्थ जल के संपर्क में आते हैं, तो उनका मिश्रण कीचड़-प्रवाह का रूप ले सकता है।

कीचड़-प्रवाह के प्रमुख प्रभाव:

  • ढाल के निचले भाग में बड़ी मात्रा में मलबा जमा हो सकता है।
  • पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं को क्षति पहुँच सकती है।
  • मानव बस्तियों एवं अन्य संरचनाओं को नुकसान हो सकता है।
  • सड़कें तथा परिवहन मार्ग अवरुद्ध हो सकते हैं।

(c) मलवा अवघाव (Debris Avalanche):-

    मलवा अवघाव वह प्रक्रिया है, जिसमें जल से संतृप्त मिट्टी, चट्टानी टुकड़े एवं अन्य मलबा गुरुत्वाकर्षण बल के कारण अचानक तीव्र गति से पहाड़ी ढाल के नीचे की ओर खिसकता या गिरता है।

    इस प्रक्रिया में मलबे का संचलन बहुत तेजी से होता है। पदार्थ प्रायः बिना किसी स्पष्ट घूर्णन गति के ढाल के नीचे की ओर बढ़ते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • मलबे का संचलन अत्यधिक तीव्र होता है।
  • इसमें मिट्टी, चट्टानी टुकड़े तथा अन्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं।
  • यह अचानक घटित हो सकता है।
  • इसके कारण जान-माल एवं प्राकृतिक पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँच सकती है।

(iii) भूस्खलन (Landslides)

     भूस्खलन वृहद् संचलन का एक तीव्र रूप है, जिसमें चट्टानों, मिट्टी अथवा चट्टानी मलबे का बड़ा भाग गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ढाल के नीचे की ओर खिसकता या गिरता है।

    भूस्खलन विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों की तीव्र ढालों पर देखने को मिलता है। इसकी उत्पत्ति में गुरुत्वाकर्षण बल प्रमुख भूमिका निभाता है, जबकि भूकंप, भारी वर्षा, ढालों की कटाई तथा अन्य मानवीय गतिविधियाँ इसे उत्प्रेरित कर सकती हैं।

    भूस्खलन के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं।

(a) स्लंप (Slump):-

     स्लंप वह प्रक्रिया है, जिसमें मिट्टी या चट्टानी पदार्थ का एक भाग ढाल के नीचे की ओर खिसकते समय घूर्णन गति करता है। इसमें पदार्थ एक वक्राकार सतह के सहारे नीचे की ओर विस्थापित होता है।

    यह प्रक्रिया तब अधिक संभावित होती है, जब ढाल के पदार्थों की स्थिरता कम हो जाती है और गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से उनका संतुलन बिगड़ जाता है।

(b) मलवा-स्खलन (Debris Slide):-

      मलवा-स्खलन वह प्रक्रिया है, जिसमें चट्टानी टुकड़ों, मिट्टी तथा अन्य मलबे का एक भाग ढाल के सहारे नीचे की ओर खिसकता है।

      इसमें पदार्थ का संचलन मुख्यतः एक सतह के सहारे होता है। स्लंप की तुलना में इसमें घूर्णन गति प्रमुख विशेषता नहीं होती।

(c) शैल-स्खलन (Rock Slide):-

    शैल-स्खलन वह प्रक्रिया है, जिसमें चट्टानों का एक बड़ा भाग किसी ढाल या कमजोर सतह के सहारे नीचे की ओर खिसक जाता है।

    यह प्रक्रिया उन क्षेत्रों में हो सकती है, जहाँ चट्टानों में दरारें मौजूद हों अथवा उनकी संरचनात्मक स्थिरता कम हो। भूकंप, भारी वर्षा और चट्टानों के आधार के कमजोर होने से शैल-स्खलन की संभावना बढ़ सकती है।

वृहद् संचलन का महत्त्व (Significance of Mass Movement)

    वृहद् संचलन भू-दृश्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके माध्यम से ढालों पर स्थित चट्टानी पदार्थ एवं मिट्टी नीचे की ओर स्थानांतरित होते हैं। इससे पर्वतीय ढालों का स्वरूप बदलता है तथा निचले भागों में मलबे का जमाव होता है।

     हालाँकि, तीव्र वृहद् संचलन से कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। भूस्खलन, कीचड़-प्रवाह तथा मलवा अवघाव जैसी घटनाएँ मानव बस्तियों, सड़कों, कृषि भूमि एवं प्राकृतिक वनस्पति को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

    इसलिए वृहद् संचलन का अध्ययन भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) में विशेष महत्त्व रखता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

     वृहद् संचलन एक महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें गुरुत्वाकर्षण बल के कारण मिट्टी, चट्टानों तथा अन्य पदार्थों का ढाल के नीचे की ओर स्थानांतरण होता है। इसकी गति के आधार पर इसे मंद संचलन, तीव्र संचलन तथा भूस्खलन जैसे प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। इन प्रक्रियाओं का अध्ययन पर्वतीय ढालों की स्थिरता, भू-दृश्य के विकास तथा प्राकृतिक आपदाओं को समझने में सहायक है।

Dr. Amar Kumar

Website: https://www.geographynotespdf.com

I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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