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21. Cleaning of rivers (नदियों की सफाई)

Cleaning of rivers

(नदियों की सफाई)


Cleaning of rivers

    नदियों की सफाई (Cleaning of rivers) एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसे भारत में विशेष रूप से गंगा नदी की सफाई के संदर्भ में देखा जाता है।

   नदियों की सफाई के लिए अनेकों प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें मोटे तौर पर सरकारी, सामुदायिक और व्यक्तिगत प्रयास शामिल हैं। नमामि गंगे कार्यक्रम जैसी राष्ट्रीय योजनाएँ, नदियों को प्रदूषण से बचाने और उनके पुनर्जीवन पर केंद्रित हैं।

    व्यक्तिगत स्तर पर, लोग नदियों में कचरा न डालकर, जल संरक्षण करके और पेड़-पौधे लगाकर नदियों को साफ रखने में योगदान कर सकते हैं।

नदियों की सफाई हेतु प्रमुख प्रयास:

Major Initiatives for River Cleaning

1. सरकारी प्रयास/Government Initiatives:

       भारत में नदियों की सुरक्षा और स्वच्छता के लिए सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

(i) गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan):-

       गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan) भारत सरकार द्वारा 1985 में शुरू की गई एक महत्त्वपूर्ण नदी संरक्षण योजना थी। इसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी में बढ़ते जल प्रदूषण को नियंत्रित करना तथा जल की गुणवत्ता में सुधार करना था। योजना के अंतर्गत घरेलू एवं औद्योगिक सीवेज को नदी में सीधे गिरने से रोकने, सीवेज उपचार संयंत्रों की स्थापना, घाटों के विकास तथा जन-जागरूकता जैसे उपाय किए गए।

      इसका एक प्रमुख उद्देश्य गंगा के जलीय एवं नदीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण और पुनर्जीवन भी था। आगे चलकर इस योजना का विस्तार अन्य नदियों तक किया गया और बाद में नमामि गंगे कार्यक्रम के माध्यम से गंगा संरक्षण के प्रयासों को व्यापक रूप दिया गया।

(ii) नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme):-

      नमामि गंगे कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा गंगा नदी के प्रदूषण में प्रभावी कमी, संरक्षण तथा पुनरुद्धार के उद्देश्य से शुरू किया गया एक प्रमुख समेकित नदी संरक्षण कार्यक्रम है। इसे वर्ष 2014 में 20,000 करोड़ रुपए के बजट के साथ वर्ष 2021 तक की अवधि के लिये लॉन्च किया गया था।

⇒ इसके अंतर्गत सीवेज उपचार अवसंरचना, नदी-तट विकास, नदी की सतह की सफाई, जैव-विविधता संरक्षण, वनीकरण, औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी तथा जन-जागरूकता जैसे कार्य किए जाते हैं।

⇒ कार्यक्रम के दूसरे चरण नमामि गंगे मिशन-II को जनवरी 2022 में ₹22,500 करोड़ के अतिरिक्त परिव्यय के साथ 31 मार्च 2026 तक स्वीकृति दी गई। इस प्रकार दोनों चरणों का कुल स्वीकृत परिव्यय ₹42,500 करोड़ रहा।

मुख्य उद्देश्य: गंगा को “निर्मल” (प्रदूषणमुक्त) और “अविरल” (निरंतर प्रवाहयुक्त) बनाना तथा इसके पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करना है।

(iii) राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना / National River Conservation Plan (NRCP):-

     राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश में नदियों के प्रदूषण को कम करना और पानी की गुणवत्ता में सुधार करना है।

⇒ यह योजना गंगा नदी बेसिन को छोड़कर, देश की अन्य प्रमुख नदियों के प्रदूषणग्रस्त हिस्सों पर केंद्रित है।

⇒ NRCP के तहत, राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।

(iv) सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP):-

   नदियों में प्रदूषण को कम करने के लिए एसटीपी का निर्माण किया गया है, जो सीवेज को साफ करके नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करते हैं।

(v) औद्योगिक अपशिष्ट उपचार/ Industrial Waste Treatment:-

   उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करने के लिए नियम बनाए गए हैं। अर्थात औद्योगिक अपशिष्ट उपचार, औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाले दूषित पानी को साफ करने की प्रक्रिया है ताकि इसे पर्यावरण में सुरक्षित रूप से छोड़ा जा सके या पुन: उपयोग किया जा सके।

⇒ इसमें विभिन्न प्रकार की भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

 2. समुदायिक प्रयास/Community Effort:

     नदियों की सफाई एक महत्वपूर्ण सामुदायिक प्रयास है जिसमें स्थानीय लोगों, गैर सरकारी संगठनों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों को मिलकर काम करना होता है। यह प्रयास नदियों के प्रदूषण को कम करने, जल की गुणवत्ता में सुधार करने और समुदायों के लिए स्वच्छ जल सुनिश्चित करने में काफी मदद करता है। 

(i) स्वयंसेवी सफाई अभियान/ Voluntary Cleanliness Campaign:-

    इसके तहत लोग नदियों से कचरा उठाते हैं और जागरूकता फैलाते हैं।

(ii) जल संरक्षण अभियान /Water Conservation Campaign:-

       इसके तहत नदियों, तालाबों एवं जलस्रोतों को स्वच्छ और सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न संरक्षण कार्य किए जाते हैं। लोगों को जल बचाने, प्रदूषण रोकने, वर्षा जल संचयन तथा जलस्रोतों के पुनर्जीवन के प्रति जागरूक किया जाता है।

3. व्यक्तिगत प्रयास/Individual Effort:

   नदियों की साफ-सफाई के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी कई प्रयास किए जा सकते हैं। जिसमें मुख्य रूप से इधर-उधर कचरा न फैलाना, पेड़-पौधे लगाना, जल संरक्षण का पालन करना, जागरूकता फैलाना और सफाई अभियानों में बढ़-चढ़कर भाग लेना शामिल है। 

(i) कचरा न फैलाना/ Do Not Litter:-

     नदियों में कचरा न डालकर हम प्रदूषण को कम कर सकते हैं।

(ii) पेड़ लगाना / Plant Trees:-

     पेड़-पौधे लगाने से मिट्टी का कटाव कम होता है और नदियों में गाद जमा होने से रोका जा सकता है।

(iii) जल संरक्षण का पालन करना/ Practice Water Conservation:-

    पानी का सीमित उपयोग करके हम नदियों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं।

(iv) जागरूकता फैलाना/ Spread Awareness:-

    नदियों के महत्व के बारे में दूसरों को जागरूक करना अर्थात् नदियों को साफ रखने के लिए हम सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा।

(v) सफाई अभियान/ Cleanliness Drive:-

      नदी के किनारे या आस-पास के क्षेत्रों में सफाई अभियान में हमेशा बढ़ चढ़ कर भाग लेना चाहिए। सभी छात्रों को अपने स्कूल, कॉलेज या समुदाय को भी किसी जल निकाय को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता हैं। 

निष्कर्ष (Conclusion):

    इस प्रकार निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि नदियों की सफाई करना एक जटिल समस्या है, इसके लिए सभी जनता के सहयोग और प्रभावी प्रयासों की आवश्यकता है। सरकार, औद्योगिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और आम जनता को मिलकर काम करना होगा ताकि हमारी नदियाँ साफ और स्वस्थ हो सकें।

10. Population Composition, Growth, Density and Distribution (World) / जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण (विश्व)

Population Composition, Growth, Density and Distribution (World)

जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण (विश्व)



       विश्व की जनसंख्या संरचना, वृद्धि, घनत्व और वितरण एक जटिल विषय है जो भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारकों से प्रभावित होता है। जनसंख्या संरचना में उम्र, लिंग, जातीयता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे कारक शामिल हैं। जनसंख्या वृद्धि जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास जैसे कारकों से प्रभावित होती है। जनसंख्या घनत्व प्रति इकाई क्षेत्र में लोगों की संख्या को दर्शाता है जबकि जनसंख्या वितरण से तात्पर्य है कि पृथ्वी की सतह पर लोग कैसे फैले हुए हैं।

Population Composition

जनसंख्या संरचना

    जनसंख्या संरचना से तात्पर्य जनसंख्या के विभिन्न घटकों जैसे आयु, लिंग, जातीयता, शिक्षा, व्यवसाय, आदि के आधार पर जनसंख्या का विभाजन है। यह जनसंख्या की गुणात्मक विशेषताओं को दर्शाता है और इससे किसी क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिशीलता को समझने में काफी मदद होती है।
     विश्व की जनसंख्या संरचना के कुछ प्रमुख तत्व इस प्रकार हैं:-
1. आयु संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न आयु समूहों के लोगों का अनुपात को आयु संरचना कहा जाता है।

⇒ यह जनसंख्या की वृद्धि दर, विकास दर और भविष्य की संभावनाओं को समझने में मदद करता है।

⇒ उदाहरण के लिए, युवा जनसंख्या वाले देशों में उच्च जन्म दर और तीव्र जनसंख्या वृद्धि की संभावना होती है, जबकि वृद्ध जनसंख्या वाले देशों में धीमी वृद्धि या जनसंख्या में कमी हो सकती है। 

2. लिंग संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात को लिंग संरचना कहा जाता है।

⇒ यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों से प्रभावित होता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कुछ देशों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक हो सकती है, जबकि अन्य में इसके विपरीत हो सकता है। 

3. जातीय संरचना:
⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न जातीय समूहों का अनुपात को जातीय संरचना कहा जाता है।

⇒ यह सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कुछ देशों में एक ही जातीय समूह के लोग अधिक संख्या में हो सकते हैं, जबकि अन्य में कई जातीय समूहों का मिश्रण हो सकता है।

4. शिक्षा:

⇒ किसी जनसंख्या में शिक्षित और अशिक्षित लोगों का अनुपात।

⇒ यह जनसंख्या की साक्षरता दर, कौशल स्तर और आर्थिक विकास को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, उच्च साक्षरता दर वाले देशों में बेहतर स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति की संभावना होती है।

5. व्यवसाय:

⇒ किसी जनसंख्या में विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों का अनुपात।

⇒ यह जनसंख्या की आर्थिक गतिविधियों, कौशल स्तर और जीवन स्तर को दर्शाता है।

⇒ उदाहरण के लिए, कृषि प्रधान देशों में अधिकांश लोग कृषि कार्यों में लगे हो सकते हैं, जबकि औद्योगिक देशों में औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में अधिक लोग काम करते हैं। 

जनसंख्या संरचना का महत्व:

⇒ यह किसी देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

⇒ यह सरकारों और नीति निर्माताओं को जनसंख्या से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को बनाने में मदद करती है।

⇒ यह जनसंख्या की वृद्धि दर, विकास दर और भविष्य की संभावनाओं का अनुमान लगाने में मदद करती है।

⇒ यह व्यवसायों को अपने उत्पादों और सेवाओं को लक्षित करने में मदद करता है।

जनसंख्या वृद्धि

    जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है किसी क्षेत्र में लोगों की संख्या में समय के साथ होने वाली वृद्धि। यह वृद्धि जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास जैसे कारकों से प्रभावित होती है। 

     कृषि की शुरुआत के पूर्व जन्म दर एवं मृत्यु दर में लगभग संतुलन था, फलस्वरूप जनसंख्या लगभग स्थिर थी। कृषि के विकास के साथ खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बढ़ने पर जन्म दर मृत्यु दर की तुलना में अधिक होने लगी, फलस्वरूप लम्बे समय तक जनसंख्या में धीरे-धीरे वृद्धि होती रही। परन्तु औद्योगिक क्रांति के पश्चात खाद्यान्न उत्पादन में तीव्र वृद्धि एवं चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार के साथ जनसंख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होने लगी। पिछले कुछ दशकों में यह वृद्धि विस्फोटक रूप धारण कर चुकी है।

विश्व जनसँख्या में वृद्धि
वर्ष जनसँख्या
1 ई० 2 करोड़
1000 30 करोड़
1650 50 करोड़
1850 100 करोड़
1930 200 करोड़
1960 300 करोड़
1975 400 करोड़
1987 500 करोड़
1999 600 करोड़
2011 700 करोड़
2022 800 करोड़

⇒ पिछली एक शताब्दी में U.S.A की जनसंख्या में 350 प्रतिशत वृद्धि हुई है जबकि भारत में यह वृद्धि 257 प्रतिशत है।

⇒ पिछले 37 वर्षों में विश्व की जनसंख्या दुगुनी हो गई है।

⇒ वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर के अनुसार फ्रांस, जापान, अमेरिका, भारत एवं कीनिया की जनसंख्या क्रमशः 178, 124, 102, 33 एवं 18 वर्षों में दुगुनी हो जाएगी।

⇒ 1950 ई. के पूर्व विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर विकासशील देशों की जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में अधिक थी, परन्तु 1950 के पश्चात् विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक हो गई है।

⇒ इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में विश्व की कुल जनसंख्या 6 अरब हो गई। मात्र एक शताब्दी में ही यह 1.6 अरब से चार गुनी बढ़ गई। हम प्रतिवर्ष आठ करोड़ व्यक्ति जोड़ रहे हैं। वास्वत में गत 500 वर्षों में मानव जनसंख्या में दस गुने से अधिक की वृद्धि हुई है।

⇒ आज जनसंख्या की सर्वाधिक वृद्धि अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के कुछ भागों में हो रही है, जहां मृत्यु दर तेजी से घटी है जबकि जन्म दर काफी ऊंची है।

⇒ विश्व के दस सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में संसार की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। इन दस देशों में से छः देश एशिया महाद्वीप में स्थित हैं। विश्व के प्रत्येक पांच व्यक्तियों में से एक व्यक्ति चीन में निवास करता है तथा प्रत्येक छः में से एक भारत में। भारत में एक हेक्टेयर कृषि भूमि पर 5 व्यक्ति, चीन में 12 व्यक्ति और संयुक्त राज्य अमेरिका में 1.5 व्यक्ति आश्रित हैं।

⇒ वास्तविक अर्थों में, विश्व की लगभग आधी जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत क्षेत्र पर ही संकेंद्रित है, जबकि कुल क्षेत्रफल का 33 प्रतिशत भाग लगभग निर्जन है।

⇒ वर्तमान समय में विश्व में जनसंख्या वृद्धि दर 1% है। विकसित देशों में से विकासशील देशों में भी वृद्धि दर कम हो रही है। अनुमान है कि विश्व की जनसंख्या 2022 में 8 अरब तथा वर्ष 2037 में 9 अरब तक पहुंच जाएगी। 

⇒ अफ्रीका की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर (2.5 प्रतिशत) आज विश्व के प्रमुख देशों में सबसे अधिक है। अफ्रीका की सबसे अधिक आबादी वाले देश नाइजीरिया में जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक दर 2.4 प्रतिशत है।

⇒ नाइजीरिया की वर्तमान जनसंख्या 22 करोड़ है जो इस दर से अगले 25 वर्षों से कम समय में ही दोगुनी हो जायेगी।

⇒ दक्षिण अमेरिका, एशिया, ओशिनिया और उत्तरी अमेरिका में औसत वार्षिक वृद्धि दर 1 से 2 प्रतिशत के बीच है। इसके विपरीत यूरोप में वृद्धि दर न्यूनतम अर्थात 0.2 प्रतिशत ही है।

⇒ रूस और यूक्रेन, दोनों ही सीआईएस (स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रमंडल) के सदस्य हैं, प्राकृतिक जनसंख्या परिवर्तन के मामले में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। दोनों देशों में जन्म दर कम है और मृत्यु दर अधिक है, जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या वृद्धि धीमी है या नकारात्मक है। इसके अतिरिक्त, यूक्रेन में रूस के साथ युद्ध के कारण जनसंख्या में भारी गिरावट आई है, जिसमें शरणार्थी संकट और मृत्यु दर शामिल है। 

      जनसंख्या वृद्धि दर की दृष्टि से संपूर्ण विश्व को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:-

(i) अत्यधिक वृद्धि दर:-

     इसके अंतर्गत वे देश आते है, जहां वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 3% से भी अधिक है। विश्व में अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि दर वाले देशों में, कुछ अफ्रीकी देश सबसे आगे हैं, जैसे कि नाइजर, अंगोला, बेनिन और युगांडा इसके अलावा, सीरिया भी इस सूची में शामिल है। इन देशों में जन्म दर मृत्यु दर से काफी अधिक है, और मृत्यु दर में भी कमी आई है, जिससे जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। 2100 तक, दुनिया की एक तिहाई आबादी अफ्रीकी हो सकती है।

(ii) अधिक वृद्धि दर:-

    इस वर्ग के देशों में जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक गति 2% से 3% के बीच है। इसके अंतर्गत मध्य अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, द. पू. एशिया सहित एशिया के अनेक देश आते हैं, जैसे: बांग्लादेश।

(iii) मध्यम वृद्धि दर:-

    विश्व के मध्यम जनसंख्या वृद्धि दर वाले देशों में मुख्य रूप से वे देश शामिल हैं जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर 1% से 2% के बीच है। इन देशों में आमतौर पर विकासशील देश शामिल होते हैं, जहाँ जन्म दर अधिक होती है, लेकिन मृत्यु दर में भी सुधार हो रहा है, जिससे जनसंख्या में वृद्धि होती है।, जैसे:

उदाहरण के लिए, कुछ मध्यम जनसंख्या वृद्धि दर वाले देश हैं: 

⇒ अफ्रीका: नाइजीरिया, इथियोपिया, तंजानिया।

⇒ एशिया: भारत, पाकिस्तान, इंडोनेशिया।

⇒ मध्य पूर्व: सऊदी अरब, ईरान।

⇒ लैटिन अमेरिका: मेक्सिको, ब्राजील।

(iv) न्यून वृद्धि दर:-

     इस वर्ग के देशों में जनसंख्या वृद्धि दर 1% से भी कम है। इसके अंतर्गत अधिकांश विकसित देश आते हैं। कुछ विकसित देशों में जनसंख्या में स्थायित्व आ चुका है एवं जनसंख्या ह्रास की प्रवृत्ति है, जैसे: अमेरिका- 0.5%, जापान- (-०.4%)।

जनसंख्या घनत्व

⇒ जनसंख्या घनत्व का अर्थ सामान्यतः किसी क्षेत्र में प्रति वर्ग किलोमीटर या प्रति मील अथवा प्रति हेक्टेयर में निवास करने वाली जनसंख्या से लगाया जाता है।

⇒ जनसंख्या घनत्व एक निश्चित भू-भाग के संपूर्ण क्षेत्र एवं कुल जनसंख्या का अनुपात है।

⇒ जनसंख्या घनत्व के अध्ययन से हमे यह किसी क्षेत्र विशेष जनसंख्या भार, जनाधिक्य एवं जनाभाव, अनुकूलतम जनसंख्या आदि की जानकारी प्राप्त होती है।

⇒ जनसंख्या घनत्व की संकल्पना का उपयोग 1837 में हेनरी ड्यूटी द्वारा आयरलैंड में किया गया था।

⇒ जनसँख्या घनत्व से मनुष्य एवं भूमि के निरन्तर बदलते सम्बन्धों को बताया जा सकता है किन्तु कम बसे एवं अधिक संसाधन वाले रूस, संयुक्त राज्य, ब्राजील जैसे देशों में यह वृद्धि उत्साहजनक मानी जाती है, जबकि चीन, भारत, जापान, बांग्लादेश, इण्डोनेशिया जैसे सीमित संसाधनों वाले एवं अत्यधिक जनसंख्या वाले देशों में यह वृद्धि निराशाजनक एवं अभिशाप भी मानी जाती है।

      जनसंख्या घनत्व निम्नलिखित प्रकार का होता है:-

(1) गणितीय घनत्व:-

     यह वास्तविक घनत्व भी कहलाता है। किसी क्षेत्र की जनसंख्या और वहाँ के क्षेत्रफल के अनुपात को गणितीय घनत्व कहा जाता है। यह मानव एवं भूमि अनुपात भी कहलाता है। इसे निम्नांकित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है-

गणितीय घनत्व = कुल जनसंख्या / कुल क्षेत्रफल

(2) कृषि घनत्व:-

     यह घनत्व किसी प्रदेश की कृषिगत भूमि एवं उस क्षेत्र में निवास करने वाली कृषि जनसंख्या के अनुपात से प्राप्त होता है। इसका सूत्र निम्न है-

कृषि घनत्व = कृषक जनसंख्या / कृषिगत भूमि का क्षेत्रफल

   कृषि जनसंख्या में वयस्क कृषक तथा कृषि श्रमिक तथा उनके परिवार सम्मिलित होते हैं।
(3) आर्थिक घनत्व:-

    यह घनत्व किसी प्रदेश के आर्थिक संसाधनों की उत्पादन क्षमता एवं वहाँ की जनसंख्या अनुपात से प्राप्त होता है, जैसे-

आर्थिक घनत्व = प्रदेश की जनसंख्या / प्रदेश के संसाधनों की उत्पादन क्षमता

  आर्थिक घनत्व निकालना थोड़ा जटिल होता है क्योंकि आर्थिक संसाधनों का मूल्यांकन करना आसान कार्य नहीं है।

(4) कायिकी घनत्व:-

    इसे कुल क्षेत्रफल के स्थान पर कुल कृषि भूमि से जनसंख्या को विभाजित करके प्राप्त किया जाता है।

कायिकी घनत्व = देश की कुल जनसंख्या/देश की कुल कृषि योग्य भूमि

(5) पौष्टिक घनत्व:-

    इस घनत्व से कृषि भूमि की भार वहन क्षमता ज्ञात होती है। इस घनत्व को भोज्य फसलों के उत्पादक क्षेत्र के क्षेत्रफल तथा उस क्षेत्र में पायी जाने वाली समस्त जनसंख्या के अनुपात से ज्ञात किया जाता है।

पौष्टिक घनत्व = कुल जनसंख्या / खाद्यान्न फसलों के अन्तर्गत क्षेत्र

(6) अधिवासीय घनत्व:-

    यदि कुल क्षेत्रफल के स्थान पर कुल मानव अधिवासीय क्षेत्र जनसंख्या को विभाजित किया जाय तो इसे अधिवासीय घनत्व कहा जाता है।

(7) नगरीय तथा ग्रामीण घनत्व:-

      नगरीय क्षेत्र की प्रति इकाई और ग्रामीण प्रति इकाई में जितने व्यक्ति निवास करते हैं, इसे नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या घनत्व कहते है।

विश्व की जनसंख्या का घनत्व (Density of Population of the World):-
     विश्व में जिस प्रकार अधिकांश देशों की कुल जनसंख्या में बहुत अधिक अन्तर है, उसी भाँति देशो के जनसंख्या घनत्व में जमीन-आसमान का अन्तर पाया जाता है।

       जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से विश्व को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

(1) सबसे अधिक घनत्व वाले देश (प्रदेश):-

     जहाँ का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक है, ऐसे देश इसके अन्तर्गत आते है। विकासशील देशों के कृषि, औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्रों में एवं विकसित देशों में औद्योगिक एवं व्यापारिक केन्द्रों (नगर) में सभी स्थानों पर आबादी घनी पायी जाती है। दक्षिणी व द.-पू. एशिया की नदी घाटियों एवं उपजाऊ मैदानों में तथा पश्चिमी यूरोप की औद्योगिक पेटी में एवं संयुक्त राज्य का मध्यवर्ती व पूर्वी औद्योगिक प्रदेश सभी में जनसंख्या का घनत्व बहुत ही अधिक है।

(2) घने बसे प्रदेश:-

     इनका घनत्व 200 से 400 मनुष्य प्रति वर्ग किमी० है। इस भाग में भारत, यूरोप और चीन के कृषि-प्रधान क्षेत्र है जिनके बीच-बीच में औद्योगिक क्षेत्रों की पेटियाँ मिलती है, अतः कई भागो में स्थानीय घनत्व 400 मनुष्य से भी अधिक का हो जाता है। उपयुक्त जलवायु, पर्याप्त जलवृष्टि तथा उपजाऊ भूमि के कारण घनत्व अधिक मिलता है।

(3) मध्यम घनत्व वाले प्रदेश:-

     इनमें प्रति वर्ग किमी 50 से 250 मनुष्य तक पाये जाते है। ऐसे भागो में मिसीसिपी नदी का मैदान और उसके संलग्न उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, अधिकांश पूर्वी यूरोप के देश, मुख्य चीन के उत्तरी-पश्चिमी तथा हिन्दचीन के पूर्वी और भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग विशेष रूप से सम्मिलित किये जाते है। इनमे वर्षा की मात्रा कम होने पर सिचाई की जाती है और उपयुक्त क्षेत्रों में खेती की जाती है।

(4) कम घनत्व वाले प्रदेश:-

     इनका प्रति वर्ग किमी घनत्व 5 से 50 होता है। जिन क्षेत्रों में घास के मैदान पाये जाते है, वहाँ पशुपालन अथवा अनुकूल स्थिति में सिंचित कृषि की जाती है। एशिया, अफ्रीका एवं उत्तरी व दक्षिणी घास के मैदानों में ऐसी ही स्थिति है।

(5) जनविहीन प्रदेश:-

     अत्यधिक ठण्डे एवं बर्फ से ढंके ध्रुवीय व उपधुवीय प्रदेश, घने वनों से ढंके प्रदेश, ऊँचे पर्वत, पठारी भाग, उष्ण व शीतोष्ण मरुस्थल विश्व के प्रायः जनशून्य प्रदेश है। यहाँ पर दूर-दूर इनी-गिनी झोपड़ियाँ पायी जाती है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व 2 से भी कम पाया जाता है।

विश्व में जनसंख्या वितरण

    विश्व में जनसंख्या के वितरण पर भौतिक (जलवायु, स्थलाकृति, मिट्टी, खनिज आदि), सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय कारकों का प्रभाव पड़ा है।

⇒ विश्व की 60 प्रतिशत जनसंख्या 200 मीटर से कम एवं 80 प्रतिशत जनसंख्या 500 मीटर से कम ऊँचाई वाले भागों में निवास करती है।

⇒ उष्ण मरुस्थलों में विरल जनसंख्या का प्रमुख कारण निम्न वर्षा है न कि उच्च तापमान।

⇒ विश्व की कुल जनसंख्या का 90 प्रतिशत भाग उत्तरी गोलार्द्ध में एवं 10% दक्षिणी गोलार्द्ध में निवास करता है।
⇒ एशिया में 20° से 40° उत्तरी अक्षांश के बीच विश्व की 50% से भी अधिक जनसंख्या निवास करती है। इसी प्रकार यूरोप में 40° से 60° अक्षांश के बीच विश्व की 30% जनसंख्या निवास करती है।

⇒  60° अक्षांश के उत्तर विश्व की मात्र 1 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

⇒ विश्व की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या 5 प्रतिशत से भी कम भू-भाग पर निवास करती है।

⇒ विश्व की 75 प्रतिशत जनसंख्या समुद्री तट से 1000 कि.मी. से कम दूरी पर एवं 66 प्रतिशत जनसंख्या समुदी तट से 500 कि.मी. से कम दूरी पर बसी हुई है।

⇒ विश्व का लगभग एक-तिहाई भाग शीत एवं शुष्कता के कारण मानव अधिवास के अनुपयुक्त है। इस प्रकार महाद्वीपों के कुल क्षेत्रफल का 55 से 60 प्रतिशत भाग अधिवास योग्य या एक्यूमीन (Ecumene) है।

⇒ कठोर जलवायु के कारण अंटार्कटिका महाद्वीप जनशून्य है एवं ग्रीनलैंड में जनसंख्या का घनत्व 1 व्यक्ति प्रति 50 वर्ग कि.मी. है।

⇒ इसी प्रकार अलास्का, आस्ट्रेलियाई मरुस्थल एवं अमेजन बेसिन में जनसंख्या का घनत्व क्रमशः 1 व्यक्ति प्रति 3 वर्ग कि.मी., 2.5 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. एवं 2 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है।

⇒ दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया में उपयुक्त जलवायु एवं उपजाऊ मिट्टी के कारण सघन जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ चीन की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या समुद्र तटीय क्षेत्रों एवं निम्न नदी घाटियों में निवास करती है, क्योंकि इन क्षेत्रों की जलवायु एवं मृदा कृषि कार्य के लिए उपयुक्त है। ⇒ मरुस्थलीय जलवायु के बावजूद नील घाटी एवं राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में काफी सघन जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ जावा द्वीप पर ज्वालामखी लावा द्वारा निर्मित उपजाऊ मिट्टी के कारण सघन जनसंख्या पाई जाती है, जबकि सुमात्रा द्वीप पर अपक्षयण (Leached) एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण जनसंख्या की सघनता कम है।

⇒ अनुपयुक्त भौतिक परिस्थितियों के बावजूद एण्डीज पर्वत के चुकाईकामाटा (तांबा खनन), कनाडा के यूरेनियम सिटी (यूरेनियम खनन); पश्चिमी आस्ट्रेलिया एवं दक्षिण अफ्रीका के मरुस्थलीय क्षेत्र (स्वर्ण खनन) के कुछ भागों में सघन जनसंख्या पाई जाती है।

      जनसंख्या वितरण की दृष्टि से विश्व को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

1. सघन जनसंख्या के प्रदेश (Densly Populated Region):-

      इसके अंतर्गत विश्व के 5 प्रदेश आते हैं, जिनमें जनसंख्या का औसत घनत्त्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से भी अधिक है:

(i) पूर्वी एशियाः चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग।

(ii) दक्षिणी एशियाः भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश नेपाल।

(iii) दक्षिण-पूर्वी एशिया

(iv) उत्तर-पश्चिमी यूरोपः ब्रिटेन, जर्मनी, हालैंड, बेल्जियम, लक्समबर्ग, फ्रांस, आयरलैंड, डेनमार्क, स्पेन, इटली।

(v) पूर्वी-उत्तर अमेरिकाः उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण-पूर्वी कनाडा।

     उपरोक्त क्षेत्रों के अलावा मिस्त्र में नील नदी की घाटी में भी जनसंख्या का घनत्व अधिक है।

⇒ प्रथम तीन क्षेत्रों में विश्व की 58 प्रतिशत जनसंख्या पाई जाती है।

⇒ जावा, ह्वांगहो का मैदान, चीन के पूर्वी तट, सिंगापुर, हांगकांग जैसे क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 1000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से भी अधिक है।

⇒ जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से मकाओ का विश्व में प्रथम स्थान है।

2. विरल जनसंख्या के प्रदेश (Sparsely Populated Region):-

     विश्व के 5 प्रदेश ऐसे हैं, जहाँ जनसंख्या का घनत्व 10 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से भी कम है। वास्तविकता यह है कि विश्व के 55 प्रतिशत भू-भाग पर मात्र 5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

(i) उच्च अक्षांशीय क्षेत्रः 60° अक्षांश से ऊपर विश्व की मात्र 1% जनसंख्या निवास करती है। आर्कटिक एवं अंटार्कटिक के अलावा उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग, ग्रीनलैंड एवं साइबेरिया इसके अंतर्गत आते हैं।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रः विश्व के सभी मरुस्थलों (उष्ण एवं शीतोष्ण) में जनसंख्या का घनत्व काफी कम है।

(iii) महाद्वीपीय जलवायु वाले आंतरिक प्रदेशः शुष्कता के कारण मध्य एशिया में जनसंख्या का घनत्व काफी कम है।

(iv) विषुवत रेखीय घने वनः इसके अंतर्गत अफ्रीका का कांगो बेसिन एवं द. अमेरिका का अमेजन बेसिन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपीय क्षेत्र सम्मिलित हैं। इस प्रदेश की उष्ण एवं आर्द्र जलवायु, घने जंगल, मच्छर एवं सीसी-सीसी (Tsi-Tsi) मक्खी का प्रकोप जनसंख्या के विकास में बाधक है।

(v) उच्च पर्वतीय क्षेत्रः पर्वतों पर ऊँचाई के अनुसार जनसंख्या विरल होती जाती है। हिमालय, आल्पस, रॉकी एवं एण्डीज के पर्वतीय भागों में 2500 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भाग निर्जन हैं।

3. सामान्य जनसंख्या के प्रदेशः-

     ये प्रदेश उपरोक्त दोनों प्रदेशों के मध्य स्थित हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियाँ न ही अधिक अनुकूल हैं और न ही प्रतिकूल।

     खनिजों के विदोहन के लिए विश्व के कई प्रतिकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में बस्तियों का विकास किया गया है। उदाहरण के लिए स्वीडन के गैलीवारा (लौह अयस्क), कनाडा के यूकन घाना (सोना), अलास्का के यूकनपोर्ट (सोना), साइबेरिया (सोना, तेल, प्राकृतिक गैस) आदि।

    उष्ण कटिबंध के प्रतिकूल जलवायु के कारण अनेक बस्तियां समुद्र तल से 2000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर बसी हुई हैं। जैसे अदीस अबाबा (इथियोपिया), कम्पाला (युगांडा), क्योटो (इक्वेडोर), नैरोबी (कीनिया), ऊटी (भारत) एवं कैण्डी (श्रीलंका)।

बोलीविया की राजधानी ला-पाज (La Paz): विश्व में सर्वाधिक ऊंचाई पर बसा हुआ नगर है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 3640 मीटर है।

निष्कर्ष:

    निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि जनसंख्या वितरण, घनत्व, वृद्धि और संरचना का अध्ययन महत्वपूर्ण है ताकि हम जनसंख्या के रुझानों को समझ सकें और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए योजना बना सकें। यह समझना कि जनसंख्या कैसे वितरित की जाती है और कैसे बदलती है, नीति निर्माताओं को संसाधनों का आवंटन करने और स्थायी विकास को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।

47. Factor Influencing Agricultural Pattern (कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक)

Factor Influencing Agricultural Pattern

(कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक)



      कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारकों को मोटे तौर पर प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी कारकों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

     प्राकृतिक कारकों में जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति और जल की उपलब्धता शामिल हैं। 

    आर्थिक कारकों में बाजार की मांग, कीमतें, श्रम की उपलब्धता और ऋण तक पहुंच शामिल हैं।

     सामाजिक कारकों में भूमि स्वामित्व, सांस्कृतिक प्रथाएं और जनसंख्या घनत्व शामिल हैं।

    तकनीकी कारकों में सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक और बेहतर बीज का चयन शामिल हैं। 

कृषि पैटर्न को प्रभावित करने वाले कारक:

1. प्राकृतिक कारक:

(i) जलवायु:

    तापमान, प्रकाश, वर्षा और आर्द्रता जैसे जलवायु कारक फसल के विकास और उसके उपज को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं।

(ii) मिट्टी:

    मिट्टी की उर्वरता, बनावट और जल धारण करने की क्षमता फसल के प्रकार और उसके उपज को निर्धारित करती है।

(iii) स्थलाकृति:

    समतल भू-भाग, ऊँचाई और ढलान फसल के प्रकार और खेती के तरीकों को प्रभावित करते हैं।

(iv) जल की उपलब्धता:

   सिंचाई और वर्षा जल की उपलब्धता फसलों की सिंचाई और विकास के लिए आवश्यक है।

2. आर्थिक कारक:

(i) बाजार की माँग:

    फसलों की कीमतें और बाजार की मांग किसानों को यह तय करने में मदद करती है कि कौन सी फसलें उगाना है।

(ii) कीमतें:

    फसलों की कीमतें और इनपुट लागत (जैसे- उर्वरक, बीज, कीटनाशक) किसानों के मुनाफे को प्रभावित करती हैं जो कि फसल पैटर्न को प्रभावित करती हैं।

(iii) श्रम की उपलब्धता:

   श्रम की उपलब्धता और लागत कृषि कार्यों को प्रभावित करती है, जैसे कि बुवाई, निराई, कटाई इत्यादि।

(iv) ऋण तक पहुंच:

   किसानों को फसल उगाने के लिए काफी पूँजी की आवश्यकता होती है, और ऋण तक पहुंच उनके फसल पैटर्न को प्रभावित कर सकती है।

3. सामाजिक कारक:

(i) भूमि स्वामित्व:

     भूमि का स्वामित्व और आकार किसानों के फसल पैटर्न को प्रभावित करता है।

(ii) सांस्कृतिक प्रथाएं:

    कुछ क्षेत्रों में, विशिष्ट फसलें उगाने की सांस्कृतिक प्रथाएं होती हैं।

(iii) जनसंख्या घनत्व:

   अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में, गहन कृषि और अधिक फसल चक्रण की प्रवृत्ति होती है।

4. तकनीकी कारक:

(i) सिंचाई:

     सिंचाई की उपलब्धता फसलों के प्रकार और उपज को प्रभावित करती है।

(ii) उर्वरक और कीटनाशक:

    उर्वरक और कीटनाशकों का उचित मात्रा में उपयोग फसलों की उपज को बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन उनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान भी पहुंचा सकता है।

(iii) बेहतर बीज का चयन:    उच्च उपज और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के चयन का उपयोग फसलों की उपज को बढ़ाने में मदद करता है।

अन्य कारक:

⇒ सरकारी नीतियाँ:

    सरकार की नीतियाँ, जैसे कि कृषि सब्सिडी और न्यूनतम मूल्य समर्थन, किसानों के फसल पैटर्न को काफी प्रभावित कर सकती हैं।

⇒ परिवहन और संचार:

     परिवहन और संचार सुविधाओं की उपलब्धता फसलों के परिवहन और बाजार तक पहुंचने में काफी मदद करती है।

⇒ शिक्षा और प्रौद्योगिकी:

     शिक्षा और प्रौद्योगिकी का स्तर किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों और फसल पैटर्न को अपनाने में काफी मदद करता है। 

46. Indian Agricultural Policies (भारतीय कृषि नीतियाँ)

Indian Agricultural Policies

(भारतीय कृषि नीतियाँ)



स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार के प्रयास

            स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं:- 

⇒ भूमि सुधारों पर केन्द्रित प्रथम संविधान संशोधन।

⇒ जमींदारी प्रथा की समाप्ति, भूमि हदबंदी सीमा अधिनियम।

⇒ प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्राथमिकता।

⇒ भूदान और सर्वोदय आंदोलनों को प्रोत्साहन तथा।

⇒ भू-राजस्व वसूली के लिए उपयुक्त व्यवस्था तैयार करना।

⇒  खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने हेतु हरित क्रांति।

⇒ कृषि के लिए आवश्यक क्षेत्रों जैसे- सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक आदि में निवेश।

⇒ कृषकों को वित्तीय सहायता, कर राहत, सब्सिडी आदि के प्रावधान।

नई कृषि नीति:-

     कृषि विकास की कम दर के कारण एक नई कृषि नीति की आवश्यकता महसूस की गई क्योंकि 1990-91 से 1998-99 में खाद्यान्न उत्पादन की विकास दर मात्र 1.8 प्रतिशत थी जो कि जनसंख्या वृद्धि दर के बराबर थी।

      भारत सरकार ने 28 जुलाई 2000 को एक नई कृषि नीति की घोषणा की जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में 4% वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त करना है। 

   नई कृषि नीति में अपर्याप्त पूँजी, कृषि पदार्थों के संग्रहण तथा विपणन की समस्या को कृषि विकास की धीमी गति के लिए जिम्मेदार माना गया हैं।

कृषि क्षेत्र के विकास हेतु सरकार द्वारा किए गए हालिया प्रयास

⇒ 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की दिशा में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि पहल।

⇒ कृषि के व्यापक विकास हेतु 2007 में राष्ट्रीय कृषक नीति।

⇒ कृषि संबंधी जानकारी हेतु किसान कॉल सेंटर की सुविधाएँ।

⇒ खेती में वित्त संबंधी समस्या हेतु किसान क्रेडिट कार्ड, ऋण सुविधा, न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी पहल।

⇒ सिंचाई समस्याओं को हल करने हेतु ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’।

⇒ रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव को कम करने हेतु नीम कोटेड यूरिया।

⇒ जमीन की उर्वरता और जैव विविधता को संरक्षित करने हेतु जैविक खेती को बढ़ावा।

⇒ मृदा स्वास्थ्य एवं पोषण की जानकारी हेतु मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना।

⇒ कृषि में जोखिम न्यूनता हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना।

⇒ खाद्यान्नों के भंडारण और उनके प्रसंस्करण से जुड़ी ढांचागत विकास पर ध्यान।

⇒ कृषि उत्पादों के बेचने हेतु बड़ा बाजार ई- नाम  (e-NAM) अर्थात् राष्ट्रीय कृषि बाजार (National Agricultural Market) और APMC अर्थात् कृषि उपज मंडी समिति (Agricultural Produce Market Committee) कानून।

⇒ जलवायु परिवर्तन के अनुसार जैविक खेती को बढ़ावा, कृषि में नवचार, अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा।

⇒ कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने हेतु 2018 में कृषि निर्यात नीति।

⇒ फसल कटाई के बाद बुनियादी ढाँचा प्रबंधन एवं कृषि परिसंपत्तियों में निवेश हेतु कृषि अवसंरचना कोष का गठन।

भारतीय कृषि नीतियों के मुख्य घटक

(i) न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP):-

    सरकार द्वारा घोषित यह मूल्य, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करता है, जिससे उन्हें नुकसान से बचाया जा सके। 

    सरकार, कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न फसलों के लिए MSP (Minimum Support Price) निर्धारित करती है।

(ii) सिंचाई परियोजनाएँ:-

    सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से, विशेष रूप से सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

(iii) उर्वरक और बीज सब्सिडी:-

   सरकार द्वारा उर्वरकों और बीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी, किसानों को इनपुट लागत कम करने और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करती है। 

(iv) कृषि ऋण:-

    किसानों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराना, उन्हें निवेश करने और अपनी उपज बढ़ाने में मदद करता है।

(v) भूमि सुधार:-

    भूमि सुधारों के माध्यम से, भूमि का समान वितरण और जोत की अधिकतम सीमा तय की जाती है, जिससे किसानों को अपनी जमीन पर बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है। 

(vi) कृषि अनुसंधान और विकास:-

    सरकार कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश करती है, ताकि नई और बेहतर तकनीकों का विकास हो सके और किसानों को उनका लाभ मिल सके।

(vii) कृषि विपणन:-

    कृषि उपज के विपणन को बेहतर बनाने के लिए, सरकार भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण सुविधाओं में सुधार करती है। 

(viii) कृषि शिक्षा और विस्तार:-

    कृषि शिक्षा और विस्तार सेवाओं के माध्यम से, किसानों को नवीनतम तकनीकों और सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में जानकारी दी जाती है। 

(ix) कृषि निर्यात नीति:-

    निर्यात को बढ़ावा देने के लिए, सरकार कृषि उत्पादों के निर्यात को सरल और सुगम बनाने के लिए नीतियाँ बनाती है। 

(x) कृषि वानिकी नीति:-

    यह नीति जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए कृषि उत्पादकता को अधिकतम करके कृषि आजीविका में सुधार करने के लिए डिजाइन की गई है।

कृषि नीतियों का उद्देश्य:

            कृषि नीतियों का उद्देश्य निम्नलिखित है-

(i) कृषि उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि करना।

(ii) किसानों की आय में वृद्धि करना।

(iii) खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।

(iv) कृषि क्षेत्र में स्थिरता लाना।

(v) किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाना।

(vi) कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा करना।

चुनौतियाँ:

⇒ भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून पर अधिक निर्भर है, जिससे कभी सूखा और कभी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है।

⇒ छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक है, जिन्हें ऋण और अन्य संसाधनों तक पहुंचने में कठिनाई होती है।

⇒ कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का उपयोग अभी भी काफी सीमित है। 

⇒ कृषि उत्पादों के विपणन में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे भंडारण और परिवहन की कमी। 

45. White Revolution in India (भारत में श्वेत क्रांति)

White Revolution in India

(भारत में श्वेत क्रांति)



भारत में श्वेत क्रांति (White Revolution in India):-

     भारत की श्वेत क्रांति जिसे ‘ऑपरेशन फ्लड’ के नाम से भी जाना जाता है, वर्ष 1970 में शुरू की गई एक पहल थी जिसका मुख्य उद्देश्य दूध उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाना था।

     इस क्रांति का नेतृत्व डॉ० वर्गीज कुरियन ने किया था, जिन्हें ‘श्वेत क्रांति का जनक’ भी कहा जाता है।

    ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood) वह कार्यक्रम है जिसके कारण “श्वेत क्रांति” हुई। इसने पूरे भारत में उत्पादकों को 700 से अधिक कस्बों और शहरों में उपभोक्ताओं से जोड़ने वाला एक राष्ट्रीय दूध ग्रिड बनाया और मौसमी और क्षेत्रीय मूल्य भिन्नताओं को कम किया, जबकि यह सुनिश्चित किया कि बिचौलियों को खत्म करके उत्पादकों को लाभ का बड़ा हिस्सा मिले।

     ऑपरेशन फ्लड की नींव में गाँव के दूध उत्पादकों की सहकारी समितियाँ हैं, जो दूध खरीदती हैं और इनपुट और सेवाएँ प्रदान करती हैं, जिससे सभी सदस्यों को आधुनिक प्रबंधन और तकनीक उपलब्ध होती है।

श्वेत क्रांति का इतिहास (History of White Revolution)

     वर्ष 1964-1965 के दौरान भारत में सघन पशु विकास कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसमें देश में श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने के लिए पशुपालकों को उन्नत पशुपालन का पैकेज प्रदान किया गया था। बाद में, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने देश में श्वेत क्रांति की गति बढ़ाने के लिए “ऑपरेशन फ्लड” नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया।

   ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत 1970 में हुई थी और इसका उद्देश्य देश भर में दूध ग्रिड बनाना था। यह NDDB (भारतीय राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) द्वारा शुरू किया गया एक ग्रामीण विकास कार्यक्रम था।

    जब ऑपरेशन फ्लड को लागू किया गया था, तब डॉ. वर्गीस कुरियन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष थे। अपने शानदार प्रबंधन कौशल के साथ डॉ. कुरियन ने सहकारी समितियों को क्रांति हेतु सशक्त बनाने के लिए आगे बढ़ाया। इस प्रकार, उन्हें भारत की ‘श्वेत क्रांति का वास्तुकार’ माना जाता है।

    कई बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसमें भाग लिया और इस क्रांति को सशक्त बनाया जिसने भारत में ऑपरेशन फ्लड को श्वेत क्रांति में बदल दिया। गुजरात स्थित सहकारी संस्था अमूल-आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड ने ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

भारत में श्वेत क्रांति के उद्देश्य (Objectives of White Revolution in India)

      श्वेत क्रांति के उद्देश्य निम्नलिखित थे:-

⇒ दूध की खरीद, परिवहन और भंडारण का प्रबंधन शीतलन संयंत्रों में करना।

⇒ पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना।

⇒ सहकारी समितियों द्वारा विभिन्न दुग्ध उत्पादों का उत्पादन और विपणन करना

⇒ बेहतर मवेशी नस्लों (गाय और भैंस), स्वास्थ्य सेवाएँ, पशु चिकित्सा, कृत्रिम गर्भाधान सुविधाएँ और विस्तार सेवाएँ प्रदान करना।

⇒ सहकारी समितियों के विस्तृत नेटवर्क पर आधारित तकनीक के माध्यम से डेयरी उद्योग का प्रबंधन करना।

⇒ गांव के संग्रहण केंद्र पर दूध एकत्र करने के बाद उसे तुरंत दूध शीतलन केंद्र स्थित डेयरी संयंत्र में पहुँचाना।

⇒ शीतलन केन्द्रों का प्रबंधन उत्पादक सहकारी संघों द्वारा किया जाता है, ताकि उनसे कुछ दूरी पर रहने वाले उत्पादकों से दूध एकत्रित करने में सुविधा हो, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त की जा सके।

ऑपरेशन फ्लड का महत्व एवं विशेषताएँ (Importance and features of Operation Flood)

(i) दूध उत्पादन में वृद्धि (Increase in milk production):–

     इस क्रांति ने भारत के दूध उत्पादन को काफी हद तक बढ़ावा दिया, जिससे देश दुनिया भर में सबसे बड़े दूध उत्पादकों में से एक बन गया। इससे बड़ी आबादी को दूध और डेयरी उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई।

(ii) ग्रामीण विकास और रोजगार (Rural development and employment):-

     इस क्रांति ने लाखों छोटे पैमाने के डेयरी किसानों के लिए आय का एक स्थायी स्रोत प्रदान किया, जिससे ग्रामीण आर्थिक विकास हुआ और डेयरी क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा हुए।

(iii) डेयरी उत्पादों में आत्मनिर्भरता (Self-sufficiency in dairy products):-

     भारत दूध की कमी वाले देश से आत्मनिर्भर बन गया है, आयात पर निर्भरता कम हो गई है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो गई है।

(iv) बेहतर पोषण (Better Nutrition):–

     दूध और डेयरी उत्पादों की बढ़ती उपलब्धता ने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर पोषण में योगदान दिया, जिससे कुपोषण से निपटने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद मिली।

(v) महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment):–

      कई महिलाएं डेयरी फार्मिंग में सक्रिय रूप से शामिल थीं, और इस क्रांति ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया, घरेलू निर्णय लेने और सामुदायिक जीवन में उनकी भूमिका को बढ़ाया।

(vi) आर्थिक विकास (Economic development):-

       श्वेत क्रांति ने भारत की जीडीपी को बढ़ावा दिया, जिससे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को बल मिला।

(vii) सहकारी समितियों का गठन (Formation of co-operative societies):-

      श्वेत क्रांति के तहत, सहकारी समितियों का एक मजबूत नेटवर्क स्थापित किया गया, जिसने दूध के संग्रह, प्रसंस्करण और वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(viii) आधुनिक तकनीकों का उपयोग (Use of modern techniques):-

      श्वेत क्रांति ने डेयरी फार्मिंग में आधुनिक तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया, जिससे दूध उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार हुआ।

(ix) किसानों को सशक्त बनाना (Empowering the farmers):-

    श्वेत क्रांति ने किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने और अपनी उपज को संसाधित करने के लिए सहकारी समितियों के माध्यम से संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया। 

भारत में श्वेत क्रांति के विभिन्न चरण (Different Phases of White Revolution in India)

     ऑपरेशन फ्लड तीन चरणों में शुरू किया गया था जिनकी चर्चा नीचे की गई है:- 

1. पहला चरण / First Phase (1970-1980):-

     पहला चरण 1970 से शुरू हुआ और 10 वर्षों तक यानि 1980 तक चला। इस चरण का वित्तपोषण विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से यूरोपीय संघ द्वारा दान किए गए मक्खन तेल और स्किम्ड मिल्क पाउडर की बिक्री से किया गया था। 

    कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए, पहले चरण के प्रारंभिक चरण में कुछ लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। ऐसा ही एक लक्ष्य था, लक्ष्यों को पूरा करने के लिए महानगरों में दूध की विपणन रणनीति में सुधार करना।

2. दूसरा चरण / Second Phase (1981-1985):-

      दूसरा चरण 1981 से 1985 तक पाँच वर्षों तक चला। इस चरण के दौरान, दूध शेडों की संख्या 18 से बढ़कर 136 हो गई, दूध की दुकानों का विस्तार लगभग 290 शहरी बाजारों तक किया गया, एक आत्मनिर्भर प्रणाली स्थापित की गई जिसमें 43,000 ग्रामीण सहकारी समितियों में फैले 4,250,000 दूध उत्पादक शामिल थे।

    घरेलू दूध पाउडर का उत्पादन वर्ष 1980 में 22,000 टन से बढ़कर 1989 तक 140,000 टन हो गया, और सहकारी समितियों द्वारा दूध के प्रत्यक्ष विपणन के कारण दूध की बिक्री में भी प्रतिदिन कई मिलियन लीटर की वृद्धि हुई। उत्पादन में सभी वृद्धि केवल ऑपरेशन फ्लड के तहत स्थापित डेयरियों की वजह से हुई। 

3. तीसरा चरण / Third Phase (1985-1996):-

      तीसरा चरण भी लगभग 10 वर्षों तक चला, यानी 1985-1996 तक। इस चरण ने डेयरी सहकारी समितियों को विस्तार करने में सक्षम बनाया और कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया। इसने दूध की बढ़ती मात्रा की खरीद और विपणन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया। 

     श्वेत क्रांति या ऑपरेशन फ्लड के अंत में 73,930 डेयरी सहकारी समितियां स्थापित की गईं, जिनसे 3.5 करोड़ से अधिक डेयरी किसान सदस्य जुड़े। वर्तमान में श्वेत क्रांति के कारण भारत में कई सौ सहकारी समितियां हैं जो बहुत कुशलता से काम कर रही हैं। इसलिए, यह क्रांति कई भारतीय गांवों की समृद्धि का कारण है।

(i) असमान विकास (Uneven Development):– भारत में श्वेत क्रांति के लाभ भारत के सभी क्षेत्रों में समान रूप से वितरित नहीं हुए। कुछ राज्यों में, विशेष रूप से उत्तर और पश्चिम में, महत्वपूर्ण प्रगति हुई, जबकि अन्य पिछड़ गए, जिसके कारण क्षेत्रीय असमानताएं पैदा हुईं।

(ii) पर्यावरणीय चिंताएं (Environmental concerns):– डेयरी फार्मिंग के तीव्र होने से अतिचारण, जल प्रदूषण और स्थानीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं, जिससे पारिस्थितिक स्थिरता संबंधी चिंताएं बढ़ गईं।

(iii) क्रॉस-ब्रीडिंग पर अत्यधिक जोर (Excessive emphasis on cross-breeding):– विदेशी मवेशियों की नस्लों के साथ क्रॉस-ब्रीडिंग पर ध्यान देने से स्वदेशी मवेशियों की आबादी में गिरावट आई, जो स्थानीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त हैं और उन्हें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है।

(iv) अपर्याप्त बुनियादी ढांचा (Inadequate Infrastructure):– महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद, कई ग्रामीण क्षेत्रों में शीत भंडारण, परिवहन और पशु चिकित्सा सेवाओं के लिए बुनियादी ढांचा अपर्याप्त बना हुआ है, जिससे दूध उत्पादन और वितरण की पूरी क्षमता सीमित हो रही है।

(v) आर्थिक असमानताएँ (Economic inequalities):– भारत में श्वेत क्रांति ने कई छोटे और सीमांत किसानों को लाभ पहुँचाया, लेकिन इसने असमानताएँ भी पैदा कीं। अधिक संसाधनों वाले बड़े किसान छोटे किसानों की तुलना में अवसरों का अधिक प्रभावी ढंग से लाभ उठा सकते हैं।

(vi) सहकारी संरचनाओं पर निर्भरता (Dependence on co-operative structures):– भारत में श्वेत क्रांति की सफलता काफी हद तक सहकारी समितियों की दक्षता पर निर्भर थी।

(vii) कुछ क्षेत्रों में कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप ने उनके प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न की, जिससे कार्यक्रम का समग्र प्रभाव सीमित हो गया।

(viii) पशु कल्याण के मुद्दे (Animal welfare issues):- दूध उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने से पशु कल्याण के बारे में चिंताएं पैदा हुईं, डेयरी मवेशियों के लिए खराब रहने की स्थिति, अधिक दूध निकालना और अपर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल।

(ix) बाजार संतृप्ति (Market saturation):- कुछ क्षेत्रों में, दूध उत्पादन में तीव्र वृद्धि के कारण बाजार संतृप्ति हो गई, जिससे मूल्य में उतार-चढ़ाव और डेयरी किसानों के लिए आर्थिक अस्थिरता पैदा हो गई।

निष्कर्ष: इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्वेत क्रांति ने भारत के डेयरी उद्योग में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया, जिससे न केवल दूध उत्पादन में वृद्धि हुई, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में भी सुधार हुआ। 

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