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43. According to Trewartha, The Climatic Regions of India and Their Characteristics (ट्रीवार्था के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश और उसकी विशेषता)

43. According to Trewartha, The Climatic Regions of India and Their Characteristics

(ट्रीवार्था के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश और उसकी विशेषता)



       जलवायु प्रदेश का तात्पर्य उस भौगोलिक भूखण्ड से है जहाँ जलवायु के तत्वों के बीच समानता पायी जाती है। विश्व व्यापी जलवायु कर्गीकरण में भारत को मानसूनी जलवायु वर्गीकरण में रखा गया है। लेकिन आन्तरिक विविधता के कारण कई छोटे-2 जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया गया है। ट्रीवार्था ने कोपेन जलवायु वर्गीकरण को आधार मानते हुए भारत के जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया।

     वस्तुत: कोपेन विश्व के संदर्भ में जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया था और अपने अनुभव के आधार पर भारतीय जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया। जबकि ट्रीवार्था का कार्य पूर्णतः भारतीय उपमहाद्वीप पर आधारित था। उन्होंने अधिक से अधिक जलवायु केन्द्रों पर जाकर आँकड़ों का संग्रहण किया और उसके बाद जलवायु प्रदेश को निर्धारित किये।

       पुन: ट्रीवार्था ने कोपेन के ही समान वनस्पति, तापमान, वर्षा और ऊँचाई को आधार मानते हुए भारत को 7 प्रमुख जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया। जैसे-

(1) उष्ण वर्षा वन की जलवायु प्रदेश (Am)

(2) उष्ण सवाना प्रदेश की जलवायु (Aw)

(3) उष्ण अर्द्ध मरूस्थतीय स्टेपी जलवायु प्रदेश (BSW)

(4) उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश की जलवायु (Bwh)

(5) उष्ण उपोष्ण जलवायु प्रदेश (BS)

(6) आर्द्र उपोष्ण जलवायु प्रदेश (Cwa)

(7) पर्वतीय जलवायु (H)

According to Trewartha

       ट्रीवार्था और कोपेन के जलवायु प्रदेशों का तुलनात्मक अध्ययन नीचे के तालिका में किया जा रहा है:-

कोपेन का जलवायु प्रदेश ट्रीवार्था का जलवायु प्रदेश
1. Amw Am
2. AS BS
3. Aw Aw
4. BShw BSh
5. BWhw BWh
6. Cwg Cwa
7. Dfc H
8. ET –
9. EF –

(1) उष्ण वर्षा वन की जलवायु प्रदेश (Am):-

       ऐसे जलवायु प्रदेश जहाँ का तापमान 18°C से अधिक होती है वहाँ इस प्रकार की जलवायु की दशाएँ देखने को मिलती है। यहाँ ऐसे क्षेत्र आते है जहाँ की औसत वार्षिक तापमान 27°C से अधिक एवं औसत वार्षिक वर्षा 250 सेंमी० या इससे अधिक हो। भारत के पश्चिम तटीय क्षेत्रों, दक्षिणी असम, पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा में इस तरह की जलवायु देखने को मिलती है।

(2) उष्ण सवाना प्रदेश की जलवायु (Aw):-

         यहाँ का भी तापमान 18°C से अधिक ही होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 27°C के आसपास रहता है तथा औसत वार्षिक वर्षा 100 सेंमी० रहता है। यहाँ वर्षा मुख्य रूप से ग्रीष्म ऋतु में होती है।इस प्रकार की जलवायु मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत में देखने को मिलती है।

(3) उष्ण अर्द्ध मरूस्थतीय स्टेपी जलवायु प्रदेश (BSW):-

        इस प्रकार के जलवायु प्रदेशों में वर्षा बहुत कम होती है लेकिन अधिक गर्मी के कारण वाष्पीकरण अधिक तेजी से होती है। यह ऐसे जलवायु प्रदेश होते है जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर तक होती है और औसत वार्षिक तापमान लगभग 27°C तक रहती है। भारत के राजस्थान और गुजरात में इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।

(4) उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश की जलवायु (Bwh):-     

          यह उष्ण तथा अर्द्ध उष्ण मरुस्थलीय प्रकार की जलवायु है। इस प्रकार की जलवायु में वर्षा काफी कम होती है लेकिन वाष्पीकरण बहुत तेजी से होता है। यहाँ तापमान 40°C से भी अधिक पहुँच जाता है और वर्षा 50 सेंटीमीटर से भी कम होती है।भारत के थार मरुस्थल में इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।

(5) उष्ण उपोष्ण जलवायु प्रदेश (BS):-

            यह उष्ण तथा अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय सवाना तुल्य जलवायु का भाग है। इसमें औसत वार्षिक तापमान 27°C तक तथा औसत वार्षिक वर्षा लगभग 100 सेंटीमीटर तक होती है। भारत के प्रायद्वीपीय पश्चिम तटीय भाग में जहां वृष्टि छाया प्रदेश है यहां इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।          

(6) आर्द्र उपोष्ण जलवायु प्रदेश (Cwa):-

               इस प्रकार की जलवायु में हवाएँ शुष्क और मौसम ठंडा होता है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 18°C से कम रहता है।इस प्रकार के जलवायु प्रदेशों में केवल ग्रीष्म ऋतु में ही वर्षा होती है। लेकिन शीत ऋतु जो वर्षा होती है वह पश्चिमी भाग में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवाती हवाओं से होती है। यह जलवायु भारत के गंगा-यमुना के मैदान में पायी जाती है।    

(7) पर्वतीय जलवायु (H):-

                यह जलवायु भारत के हिलालय पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है। यहाँ शीत ऋतु में हिमपात अर्थात् बर्फबारी होती है और ग्रीष्म काल में मानसूनी हवाओं से वर्षा होती है।

9. Rostow’s Economic Development Model (रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)

9. Rostow’s Economic Development Model

(रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)



    Rostow

       रोस्तोव मूलतः एक इतिहासकार थे जिन्होंने ऐतिहासिक अर्थशास्त्रों के रूप में आर्थिक-सामाजिक विकास से संबंधित एक बहुस्तरीय मॉडल प्रस्तुत किया। यह मॉडल 1971 ई० में रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह मॉडल 5 चरणों में विभक्त है-

   रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत आर्थिक विकास के इस मॉडल के अनुसार सभी देश एक साथ और एक समान आर्थिक विकास नहीं कर पाते हैं अर्थात् यह मॉडल स्थान और समय के संदर्भ में विभिन्न देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास की व्याख्या करता है। इसे एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे- भारत (1947) और द० कोरिया (1948) क्षेत्रों लगभग एक ही समय आजाद हुए। लेकिन विकास के दृष्टिकोण से द० कोरिया की अर्थव्यवस्था विकसित देशों के समतुल्य पहुँच गई। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विकासशील अवस्था से गुजर रहा है।

      रोस्तोव ने सामाजिक आर्थिक विकास की व्याख्या करने हेतु 5 स्तरीय विकास का मॉडल निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है।

आर्थिक विकास की अवस्था सामाजिक-आर्थिक स्थिति
(1) प्रथम अवस्था जीवन निर्वाह की अवस्था / अर्थव्यवस्था
(2) द्वितीय अवस्था विकास के पूर्व की अवस्था
(3) तृतीय अवस्था तीव्र विकास की अवस्था
(4) चतुर्थ अवस्था आर्थिक प्रौढ़ावस्था
(5) पंचम अवस्था उपभोक्ता वस्तुओं की तीव्र उपयोग की अवस्था

    रोस्तोव ने बताया कि कोई भी देश उपरोक्त 5 अवस्थाओं से गुजरकर ही विकास के चरम अवस्था को प्राप्त करते हैं।

    रोस्टोव ने प्रत्येक अवस्था की विशेषता निम्न प्रकार से बताया

(1) प्रथम अवस्था की विशेषता 

       यह परम्परागत समाज की विशेषता है। इस अवस्था से गुजरने वाले समाज अनुत्पादक कार्यों पर धन अधिक खर्च करहे हैं। अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह की होती है। कुल GDP का 1/3 भाग खाद्य पदार्थों पर खर्च किया जाता है। साक्षरता, स्वास्थ्य और नियोजित कार्यों का अभाव होता है। लोगों को राज्य के द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम की जानकारी कम होती है। देश की सरकारें सुरक्षा और धार्मिक कार्यों पर अधिक खर्च करते हैं। राज्य में निराशा का वातावरण होता है। अनेक प्रकार के सामाजिक-धार्मिक तनाव व्याप्त होते है। भारत के पड़ोसी देश म्यानमार, अफगानिस्तान, मध्य अफ्रीकी देश और उप सहारा के देश की आर्थिक व्यवस्था इसी अवस्था से गुजर रही है।

(2) दूसरी की अवस्था की विशेषता

       रोस्तोव ने बताया कि जिस देश की अर्थव्यवस्था दूसरे चरण गुजर रही होती है। वैसे देशों में एक ऐसे अभिजात वर्ग का उदय होता है जो नवोत्पाद या नयी तकनीक को प्राश्रय देता है। इस अवस्था से गुजरने वाले देश की सरकार अधिकत्तर धन परिवहन, संचार और संरचनात्मक सुविधाओं पर खर्च करते हैं। एक देश के अन्दर विकास दृष्टिकोण से अन्तः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दिखायी देती है अर्थात् कुछ क्षेत्र विकसित हो जाते है और कुछ क्षेत्र पिछड़े ही रह जाते है। भारत, चीन, मैक्सिको ब्राजील द० अफ्रीका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

(3) तीसरा अवस्था की विशेषता

      तीसरा अवस्था से गुजरने वाले देशों में विकास का कार्य खण्डीय होता है। रोस्तोव ने पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए बताया है कि आर्थिक विकास के तीसरे चरण में पहले वस्त्र उद्योग, उसके बाद रेलवे परिवहन अंतत: दुग्ध उद्योग का विकास हुआ है। ये ऐसे उद्योग है जिनके विकास के लिए न विशिष्ट तकनीक की आवश्यकता है और न ही विशेष निवेश की। लेकिन इन तीनों के विकास से समाज का विकास त्वरित गति से होता है। रोस्तोव ने बताया कि तीसरे अवस्था को जलविभाजक से तुलना की जा सकती है। इस अवस्था से कोई भी देश 20-30 वर्षों तक गुजरता है। तीसरे अवस्था से गुजरने के बाद राज्य के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का कायाकल्प हो जाता है।

       मलेशिया ने 2020 का नारा दिया। भारत ने “विजन 2020” का नारा दे रहा है ताकि एक नियत समय के बाद में देश विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायें। मध्य अमेरिकी देश, इजराइल, द. कोरिया जैसे देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(4) चौथा अवस्था

     चौथा अवस्था को प्रौढ़ावस्था से सम्बोधित किया गया है। इस अवस्था से गुजरने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पूर्णरूपेण विकसित होती है। देश में अकाल, भूखमरी इत्यादि की समस्या समाप्त हो जाती है। प्रति व्यक्ति आय अति उच्च होता है। आधुनिक तकनीक का बोलबाला होता है। प्रशिक्षित वर्ग का एक विशिष्ट श्रमिक समूह उभरकर सामने आता है। उत्पादन के कार्यों में निवेश अधिक से अधिक किया जाता है। उपभोक्ता वस्तुओं पर अधिक-से-अधिक खर्च किया जाता है। द० एवं पूर्वी यूरोप के अधिकतर देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। 

(5) पाँचवाँ अवस्था की विशेषता

    पाँचवाँ अवस्था से गुजरने वाले देशों में उपभोक्ता वस्तुओं की माँग अधिक होती है। लोग नवीन उत्पाद को खरीदने के लिए बेचैन रहते है। प्रति व्यक्ति आप अधिक होती है। समाज का मशीनीकरण और वैज्ञानिकरण हो जाता है। सामूहिक भावना कमजोर पड़ने लगती है। व्यक्तिवादिता का विकास अधिक हो जाता है। विश्व के आज नगरीय समाज, जापान, अमेरिका सिंगापुर, फ्रांस, इंगलैण्ड, जर्मनी जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

    रोस्तोव ने बताया है कि सभी देशों की अर्थव्यवस्था इन 5 अवस्थाओं से होकर गुजरती है। इन्होंने USA के संदर्भ में उदाहरण देते हुए बताया है कि 1800 ई० के पहले प्रथम अवस्था से 1800- 50 ई० के बीच द्वितीय अवल्या से, 1850-75 to 1बीच तृतीय अवस्थत से, 1875 – 1925 के बीच चतुर्थ अवस्था से और 1925 के बाद पाँचवाँ अवस्था ये गुजर रही है।

आलोचना

      रोस्तोव के इस मॉडल की कई आधारों पर आलोचना भी की गई। जैसे:-

(1) अरब देशों पर यह मॉडल बिल्कुल लागू नहीं होती क्योंकि वहाँ प्रति व्यक्ति आय अधिक है लेकिन सरकार अधिकतर खर्च सुरक्षा और धार्मिक कार्य पर करती है।

(2) इस मॉडल में कहा गया है कि एक दीर्घ अवधि के बाद ही तीव्र विकास की अवस्था प्रारंभ होती है जो गलत है क्योंकि कई ऐसे देश हैं जो आधुनिक तकनीक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के आधार पर विकास के कार्यों को तीव्र कर चुके है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस मॉडल की अपवादवश कुछ सीमाएँ अवश्य है, इसके बावजूद यह मॉडल अधिकांश देशों के संदर्भ में उपयोगिता रखता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. रोस्तोव के आर्थिक विकास अवस्था मॉडल का सामालोचनात्मक परीक्षण कीजिए तथा अपने उत्तर के पुष्टि में उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करें। (UPSC, 2003)

23. Christoller’s Central Place Theory (क्रिस्टॉलर का केन्द्रीय स्थल सिद्धांत)

23. Christoller’s Central Place Theory

(क्रिस्टॉलर का केन्द्रीय स्थल सिद्धांत)



         केन्द्रीय स्थल सिद्धांत मूलत: नगरीय भूगोल से संबंधित है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन क्रिस्टॉलर महोदय ने दक्षिण जर्मनी के नगरों के स्थानीयकरण के प्रतिरूप का अध्ययन कर (1933 ई०) में प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार केन्द्रीय स्थलों का वितरण षष्टकोणीय और पदानुक्रमिक तरीके से होता है।

    क्रिस्टॉलर ने केन्द्रीय स्थल की परिभाषा देते हुए बताया कि वैसा नगर जो किसी भौगोलिक क्षेत्र में कई बस्तियों के बीच में होता है तथा अन्य बस्तियों को सेवा प्रदान करती है एवं द्वितीयक तथा तृतीयक कार्यों का केन्द्र बिन्दु होती है।

   क्रिस्टॉलर के अनुसार केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत उन्हीं क्षेत्रों में लागू होती है जहाँ निम्नलिखित मान्यताएँ काम करती है।

मान्यताएँ

(1) भौगोलिक दृष्टि से वह क्षेत्र समरूपता रखता हो। सम्पूर्ण प्रदेश में संसाधन, जनसंख्या, उत्पादक एवं उपभोक्ताओं का वितरण लगभग समान रूप से हो।

(2) दूसरी मान्यता यह है कि केंद्रीय स्थल से किसी भी दिशा में जाने पर परिवहन मूल्य में दूरी और भार के अनुसार वास्तविक वृद्धि होती है। 

     ऊपर वर्णित शर्तों को पूर्ण करने वाले प्रदेश में ही यह सिद्धांत लागू होता है।

    क्रिस्टॉलर के केन्द्रीय स्थल सिद्धांत तीन परिकल्पनाओं पर आधारित है:

(1) बस्तियों का वितरण षष्टकोणीय होता है और षष्टकोणीय बस्ती के बीच में केन्द्रीय बस्ती अवस्थित होती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।Christoller
   क्रिस्टॉलर के पूर्व यह मान्यता कार्य करता था कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश के बीच में केन्द्रीय स्थल होता है और उसके प्रभाव क्षेत्र की बस्ती वृत के आकार में विकसित होते हैं।

    चित्र से स्पष्ट है कि पूर्व की मान्यता में छाया प्रदेश का विकास होता है। लेकिन किस्टॉलर के षष्टकोणीय परिकल्पना में छाया प्रदेश के विकास की कोई संभवना नहीं हैं।

(2) क्रिस्टॉलर की दूसरी परिकल्पना यह है कि षष्टकोणीय वितरण प्रारूप पदानुक्रमिक होता है अर्थात् इसे स्पष्ट करते हुए क्रिस्टॉलर ने कहा है कि केन्द्रीय बस्ती एक छोटे बाजार से लेकर एक वृहद बाजार (बड़े-2 महानगर) तक हो सकते हैं। हर हाल में केन्द्रीय स्थान षष्टकोणीय बस्तियों के बीच में होता है। इसे नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है।

          क्रिस्टॉलर के अनुसार बस्तियों का सात पदानुक्रम में विकास होता है।

पदानुक्रम बस्ती का नाम केंद्रीय स्थल की जनसंख्या दो केंद्रीय स्थल के बीच की दूरी प्रभाव क्षेत्र का क्षेत्रफल प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या
1. मार्केट (M)

(बाजार-कस्बा)

1000 7 KM. 45 KM2 2700
2. टाउनशीप सेंटर (A) 2000 12 KM. 135 KM2 8100
3. काउंटी सिटी(K) 4000 21 KM. 400 KM2 24000
4. जिला नगर (B) 10,000 36 KM. 1200 KM2 75000
5. स्टेट कैपिटल सिटी (G) 30,000 62 KM. 3600 KM2 225000
6. प्रोविन्सियल सिटी (P) 1,00000 108 KM. 10800 KM2 675000
7. रिजनल कैप्टल सिटी (L) 5,000 182 KM. 32400 KM2 22025000

(3) क्रिस्टॉलर का तीसरा महत्वपूर्ण परिकल्पना यह है कि केन्द्रीय स्थान के प्रभाव में आने वाले बस्तियों की संख्या का विश्लेषण तीन मान्यताओं आधार पर किया जाता है। जैसे :-

(i) बाजार सिद्धांत या K=3 सिद्धांत

(ii) परिवहन सिद्धांत या K=4 सिद्धांत

(iii) प्रशासन सिद्धांत या K=7 सिद्धांत

    K=3 सिद्धांत का तात्पर्य यह है कि सबसे छोटी केन्द्रीय बस्ती (बाजार केन्द्र) औसतन तीन गाँवों को बाजार की सुविधा प्रदान करती है। पुन: जैसे-2 केन्द्रीय बस्ती के आकार में क्रमिक वृद्धि होती है। वैसे-2 उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाली बस्तियों का क्रमिक वृद्धि 3 के गुणनफल में होता है। जैसे- 3, 9, 27, 81 ……..।

     K=4 सिद्धांत का तात्पर्य है कि अगर केन्द्रीय बस्ती परिवहन के कारण विकसित हुआ हो तो वहाँ की सबसे छोटी परिवहन आधारित केन्द्रीय बस्ती 9 गाँव को सेवा प्रदान करेगी।

    पुन: जैसे-2 केन्द्रीय बस्ती के आकार में क्रमिक वृद्धि होगी। वैसे-2 बस्तियों की संख्या में 4 के गुणनफल में वृद्धि होगी।

   K=7 सिद्धांत का तात्पर्य है कि अगर कोई केन्द्रीय बस्ती प्रशासनिक दृष्टिकोण से विकसित हुआ हो तो सबसे छोटी प्रशासन पर आधारित केन्द्रीय बस्ती न्यूनतम 7 गाँवों को सेवा प्रदान करेगी। इसी तरह से ज्यों-2 केन्द्रीय बस्ती के पदानुक्रम में वृद्धि होते जायेगी। त्यों-त्यों 7 के गुणनफल में बस्तियों की संख्या में वृद्धि होते जायेगी।

K=3 सिद्धांत का विश्लेषण

    K=3 सिद्धांत अर्थात बाजार सिद्धांत का मूलभूत संकल्पना यह है कि षष्टकोण पर स्थित कोई भी बस्ती दो भुजाओं के मिलन केन्द्र पर होगी और कोई भी बस्ती तीन केन्द्रीय बस्ती से समान दूरी पर होगी। चूँकि षष्टकोण में छ: बस्तियाँ होती है और उनके तीन केन्द्रीय बस्तियों में सेवा वितरित होने की पूरी संभावनाएँ हैं। इसलिए एक केन्द्रीय बस्ती षष्टकोण की 6 बस्तियों में से दो बस्तियों की सेवा करेगा। इसके अलावे केन्द्रीय बस्ती स्वयं भी सेवा ग्रहण करेंगे। इस प्रकार से कुल तीन बस्तियों को केन्द्रीय बस्ती से सेवा मिलेगी। इसी के आधार पर K=3 सिद्धांत प्रतिपादित किया गया।

 

K=4 सिद्धांत का विश्लेषण

   K=4 सिद्धांत के अन्तर्गत यह माना गया है कि बस्तियाँ षष्टकोण के भुजाओं के मिलन केन्द्र पर न होकर भुजाओं के मध्य में स्थित होते हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक बस्ती के लिए दो केन्द्रीय बस्ती समान दूरी पर होते हैं अर्थात् षष्टकोण छः बस्तियों में से प्रत्येक बस्ती का प्रभाव दो केन्द्रीय बस्ती में विभाजित हो जाती है और ऐसी स्थिति में 4 केन्द्रीय बस्ती से सेवा ग्रहण करते लगती है।

K=7 सिद्धांत का विश्लेषण

   K=7 सिद्धांत के अन्तर्गत माना गया है कि कोई भी बस्ती भुजा के मिलन बिन्दु या मध्य भुजा पर विकसित नहीं होती है बल्कि षष्टकोण के अन्दर विकसित होती है। चूंकि प्रशासनिक कार्य दो षष्ट कोण में विभाजित नहीं हो सकती है। इसलिए प्रशासन की सुविधा के हेतु एक षष्टकोण के अन्तर्गत कुल 7 बस्तियों प्रशासनिक क्षेत्र के अन्तर्गत आती हैं।

क्रिस्टॉलर सिद्धांत का परीक्षण

     क्रिस्टॉलर महोदय ने स्वयं यह बताया कि केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत उसी क्षेत्र में लागू होगा जहाँ पर ऊपर में बताये गये मान्यताएँ कार्य करेंगी। अर्थात् उन्होंने स्वयं स्पष्ट कर दिया था कि उन‌का K-3, K-4 और K-7 का सिद्धांत विश्व व्यापी नहीं हो सकता क्योंकि इस सिद्धांत में बताये गये मान्यताएं पूर्ण रूप से लागू नहीं होती है।

   क्रिस्ट्रॉलर का सिद्धांत दक्षिणी जर्मनी में पूर्णतः लागू होती है क्योंकि वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनसंख्या वितरण में समरूपता पाई जाती है। भारत के UP और उत्तरी-पश्चिमी बिहार में यह सिद्धांत कुछ हद तक लागू होती है क्योंकि इस प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एवं जनसंख्या का समान वितरण पाया जाता है।

लॉश का संशोधन

     क्रिस्टॉलर के सिद्धांत की जटिलताओं को समझते हुए लॉश महोदय ने बताया कि केन्द्रीय स्थल और बस्तियों का वितरण समान षष्टकोण में न होकर जालीनु‌मा षष्टकोण में वितरित होने की अधिक संभावनाएँ हैं।

   लॉश के अनुसार प्रत्येक केन्द्रीय स्थान के द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक कार्य का प्रभाव समान रूप से सभी बस्तियों पर नहीं पड़ती है। लॉश ने यह भी स्पष्ट किया कि केन्द्रीय स्थल के ईर्द-गिर्द बस्तियों पर केन्द्रीय स्थल का प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि उसके द्वारा किये जा रहे कार्यों का प्रभाव पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द कई षष्टकोण का विकास हो जाता है जो देखने में जालीनुमा षष्टकोण लगता है।

आलोचना:-

(1) बेरी और गैरीसन ने केन्द्रीय स्थल का आलोचना करते हुए कहा है कि नगरीय बस्तियों का षष्टकोण के रूप में वितरण होना अत्यन्त ही कठिन है क्योंकि उनके वितरण पर निम्नलिखित दो कारकों का प्रभाव पड़ता है-

(1) उपभोक्ताओं के आचारपरकता (व्यवहार) का

(2) उपभोक्ताओं के खरीद बिक्री करने की क्षमताओं का।

        ये दोनों कारक भौगोलिक दूरियों को संशोधित कर देती है। इसीलिए केन्द्रीय स्थल के इर्द-गिर्द बस्तियों का वितरण षष्टकोण के रूप में हो भी नहीं सकता।

(2) बेरी ने यहाँ तक कहा है कि जीवन-निर्वाह अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्र में भी यह संभव नहीं है।

(3) हाँलाकि क्रिस्टॉलर ने यह स्वीकार किया है कि उनका सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ पर उनके द्वारा बताये गए शर्त लागू होंगे। लेकिन कहीं भी व्यवहारिक रूप में ये उनकी मान्यताएँ लागू होती ही नहीं है। वैसी स्थिति में उनका सिद्धांत उपयोगी नहीं रह पाता है।

(4) क्रिस्टॉलर के सिद्धांत की आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश में केन्द्रीय स्थल का विकास 7 पदानुक्रम में नहीं हो सकता।

निष्कर्ष:

      क्रिस्टॉलर के केन्द्रीय स्थल सिद्धांत की कुछ सीमाएँ अवश्य है। इसके बावजूद इस सिद्धांत की व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि इस सिद्धांत के आधार पर ही कई देश के सरकारों ने प्रादेशिक नियोजन का कार्य किया है तथा बोडोविले जैसे भूगोलवेता ने विकास ध्रुव का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके अलावे केन्द्रीय बाजार का वितरण पदानुक्रमिक होता है। यह भी एक उपयोगी संकल्पना है। इस तरह इनके सिद्धांतों को अव्यवहारिक घोषित नहीं किया जा सकता है।


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Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023


(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary

GROUP-A / समूह-अ

(Objective Type Questions)

( वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: All the questions are of equal value and are compulsory. Choose the correct answer from’ the given options.

[10×2=20]

सभी प्रश्नों के उत्तर देना अनिवार्य है तथा इनके मान समान हैं। दिये गये विकल्पों के आधार पर प्रश्नों का उत्तर दीजिए ।

1. (i) The closest planet to the Sun is:

(a) Venus

(b) Mercury

(c) Mars

(d) Earth

सूर्य का निकटम ग्रह है:

(a) शुक्र

(b) बुध

(c) मंगल

(d) पृथ्वी

उत्तर- (b) बुध

(ii) The origin of Earth is related to the origin of:

(a) Comet

(b) Nebula

(c) Solar system

(d) Stars

पृथ्वी की उत्पत्ति का सम्बन्ध ……की उत्पत्ति से है।

(a) धूमकेतु

(b) निहारिका

(c) सौर मण्डल

(d) तारे

उत्तर- (c) सौर मण्डल

(iii) A natural way of knowing about the internal structure of the Earth is:

(a) Density

(b) Volcano

(c) Pressure

(d) Temperature

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में जानने का एक प्राकृतिक साधन है:

(a) घनत्व

(b) ज्वालामुखी

(c) दाब

(d) तापक्रम

उत्तर- (b) ज्वालामुखी

(iv) Igneous Rocks originated from:

(a) Fire

(b) Sun heat

(c) Ashes

(d) Magma

आग्नेय चट्टानों की उत्पत्ति हुई है:

(a) अग्नि से

(b) सूर्य ताप से

(c) राख से

(d) मैग्मा से

उत्तर- (d) मैग्मा से

(v) Granite is an example of:

(a) Sedimentary rock

(b) Igneous rock

(c) Metamorphic rock

(d) Residual rock

प्रेनाइट उदाहरण है।

(a) अवसादी चट्टान का

(b) आग्नेय चट्टान का

(c) कायान्तरित चट्टान का

(d) अवशिष्ट चट्टान का

उत्तर- (b) आग्नेय चट्टान का

(vi) The process of rusting of iron-rich r called:

(a) Carbonation

(b) Hydration

(c) Solution

(d) Oxidation

लौहयुक्त चट्टानों पर जंग लगने की क्रिया कहलाती है:

(a) कार्बोनेशन

(b) हाइड्रेशन

(c) विलयन

(d) ऑक्सीकरण

उत्तर- (d) ऑक्सीकरण

(vii) The most important factor of erosion on the Earth’s surface is:

(a) Ice

(b) Flowing water

(c) Wind

(d) Underground water

पृथ्वी की सतह पर सबसे महत्त्वपूर्ण अपरदन का कारक है:

(a) हिमानी

(b) प्रवाहित जल

(c) पवन

(d) भूमिगत जल

उत्तर- (b) प्रवाहित जल

(viii) How many main types of plate edges are there?

(a) 2

(b) 3

(c) 4

(d) 5

प्लेट किनारे मुख्यतः कितने प्रकार के है

(a) 2

(b) 3

(c) 4

(d) 5

उत्तर- (b) 3

(ix) Which scale is used to measure t of Earthquake?

(a) Reed scale

(b) Richter scale

(c) Holmes scale

(d) Vernier scale

भूकम्प की तीव्रता मापने के लिए किस मापक का प्रयोग करते हैं?

(a) रीड स्केल

(b) रिक्टर स्केल

(c) होम्स स्केल

(d) वर्नियर स्केल

उत्तर- (b) रिक्टर स्केल

(x) Volcanoes that remain quiet for long period of time and thereafter become are called:

(a) Active Volcano

(b) Waking Volcano

(c) Dormant Volcano

(d) Quiet Volcano

ऐसे ज्वालामुखी जो लम्बी अवधि तक शान्त रहने के बाद पुनः सक्रिय हो जाते हैं, कहलाते है:

(a) सक्रिय ज्वालामुखी

(b) जागृत ज्वालामुखी

(c) सुषुप्त ज्वालामुखी

(d) शान्त ज्वालामुखी

उत्तर- (c) सुषुप्त ज्वालामुखी

Group B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

( लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

2. Discuss the Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट द्वारा दी गयी वायव्य राशि परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

3. Explain the importance of study of internal structure of Earth.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के महत्व की व्याख्या कीजिए।

4. Discuss about the different types of Weathering.

अपक्षय के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए।

5. Describe the characteristics of Divergent/Constructive Plate Margins.

अपसारी / रचनात्मक प्लेट किनारे की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।

6. Give the definition of Earthquake.

भूकम्प की परिभाषा दीजिए।

7. Explain the effects of volcano on human activities.

ज्वालामुखी के मानवीय क्रियाकलापों पर होने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिए।

Group-C / समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3×10 = 30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

8. Discuss the internal structure of Earth with suitable diagram.

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।

9. Describe the solar system and any one theory regarding its origin

सौर मण्डल एवं उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिये गये किसी एक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।

10. Explain the different types of rocks.

चट्टानों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

11. What is an Earthquake? Describe about the origin of Earthquake.

भूकम्प क्या है? भूकम्प की उत्पत्ति के कारणों की विवेचना कीजिए।

12. Describe the landforms made by volcanic activity with diagram.

ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों का सचित्र वर्णन कीजिए।


सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें


Group B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

2. Discuss the Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट द्वारा दी गयी वायव्य राशि परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितबल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

3. Explain the importance of study of internal structure of Earth.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के महत्व की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

4. Discuss about the different types of Weathering.

अपक्षय के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है।

अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

    भौतिक ऋतुक्षरण में चट्टानें टूटती तो जरूर है साथ ही उनका भौतिक स्वरूप भी बदल जाता है, लेकिन उसमें रासायनिक परिवर्तन नहीं होता है। भौतिक ऋतुक्षरण तीन क्रियाओं से होता है

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा:-
     तुषार क्रिया में क्रमिक रूप से जल जमता और पिघलता रहता है। जब तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है तब जल बर्फ में बदल जाता है और उसका आयतन बढ़ जाता है। एक घन सेंटीमीटर जब जल जमता है तो डेढ़ सौ किलोग्राम के बराबर चट्टानों पर प्रहार करता है। इससे स्पष्ट होता है कि तुषार की क्रिया चट्टानों को तोड़ने में सक्षम है। उच्च अक्षांशीय प्रदेश में और पर्वतीय भाग के ऊंचे क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं देखी जा सकती है।

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया मुख्यत: उष्ण एवं शीतोष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र में सक्रिय रहती है। तापीय प्रभाव के कारण चट्टानें फैलती और सिकुड़ती है। अधिक तापमान पर चट्टानें फैलती है और निम्न तापमान पर सिकुड़ती है।

     मरुस्थलीय क्षेत्रों में तापमान दिन में अधिक हो जाता है और रात में अत्यधिक कम हो जाता है जिसके चलते चट्टानें टूटकर बालू का निर्माण करते हैं।

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया ग्रेनाइट चट्टानों वाले क्षेत्र में होता है। ग्रेनाइट चट्टानी अगर बड़ी एवं मोटी हो तो तापीय प्रभाव के कारण चट्टान का ऊपरी भाग गर्म होकर फैल जाता है जबकि उसे चट्टान के आंतरिक भाग में तापमान कम रहने के कारण फैल नहीं पता है जिसके परिणामस्वरुप चट्टान का ऊपरी परत प्याज के छिलके की भांति टूटती रहती है। इसी प्रक्रिया को अपदलन कहते हैं। इसे प्याज ऋतुक्षरण भी कहा जाता है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

     जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

5. Describe the characteristics of Divergent/Constructive Plate Margins.

अपसारी / रचनात्मक प्लेट किनारे की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे के विपरीत गतिशील होती हैं, अर्थात एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहाँ नीचे से मैग्मा ऊपर उठकर नयी प्लेट का निर्माण करता है। नयी प्लेट के निर्माण के कारण इसे रचनात्मक किनारा भी कहते हैं। इन किनारों पर पाए जाने वाले सबसे प्रमुख स्थलरूप मध्य महासागरीय कटक हैं।

⇒ जब यह किनारा किसी महाद्वीप पर स्थित होता है तो रिफ्ट घाटियों (Rift Valleys) का निर्माण होता है।

6. Give the definition of Earthquake.

भूकम्प की परिभाषा दीजिए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है-भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

        इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★ समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र- भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)- अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

7. Explain the effects of volcano on human activities.

ज्वालामुखी के मानवीय क्रियाकलापों पर होने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का प्रभाव:

    मानवीय क्रियाकलापों को ज्वालामुखी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभावित करता है।

1. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का सकारात्मक प्रभाव:

       मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखियों के सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी से बहुत सारे नए भू-आकृतियों का निर्माण होता है। जैसे- क्रेटर और काल्डेरा झीलें, लावा मैदान, गेसर, ज्वालामुखीय पठार और ज्वालामुखी पर्वत।

⇒ यह दुर्बलमंडल (Asthenosphere) से सतह पर सोना, लोहा, निकेल और मैग्नीशियम जैसे मूल्यवान तत्व को पृथ्वी के सतह पर लाता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग का सोना और कनाडा में सडबरी का निकेल निक्षेप ज्वालामुखी निक्षेपण के उदाहरण हैं।

⇒ आग्नेय शैल लावा के ठंडा होने के बाद बनता है, जिसका उपयोग निर्माण जैसी विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है।

⇒ ज्वालामुखी हमें उपजाऊ भूमि प्रदान करते हैं। ज्वालामुखी की धूल और राख का जमाव भूमि को उपजाऊ बनाता है। उदाहरण के लिए, दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी और जावा द्वीपों की उपजाऊ भूमि ज्वालामुखी द्वारा बनाई गई है।

⇒ यह सुंदर दृश्य भी बनाता है और जिससे यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।

⇒ यह पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में भी बहुत सारी जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं और प्लेटों की गति की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह भूतापीय ऊर्जा का एक संभावित स्रोत भी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, इटली और जापान जैसे कई देश भूतापीय ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।

2. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का नकारात्मक प्रभाव:

      मनुष्य पर ज्वालामुखी के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी की धूल और गैसें वातावरण को अपारदर्शी बना देती हैं जिससे वायु परिवहन मुश्किल हो जाता है, श्वसन रोग बढ़ जाता है और सूर्यातप को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से भी रोकता है अर्थात यह पृथ्वी को ठंण्डा करता है।

⇒ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद क्षेत्र में लावा का जमाव होने से वहाँ की जमीन को सरंध्र बनाती है जिससे क्षेत्र में पानी की कमी हो जाती है।

⇒ ज्वालामुखियों के अचानक फटने से मानव बस्ती, मानव जीवन और उसकी संपत्ति को काफी नुकसान होता  है। उदाहरण के लिए, माउंट वेसुवियस (जो एक ज्वालामुखी विस्फोट से बना है) ने 78 ई० में इटली में पोम्पेई शहर को नष्ट कर दिया।

⇒ जब समुद्र में ज्वालामुखियों का विस्फोट होता है तो यह आसपास के जल को गर्म कर देता है जिससे की वहाँ के जलीय जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।

Group-C / समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3× 10 = 30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

8. Discuss the internal structure of Earth with suitable diagram.

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

       स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

9. Describe the solar system and any one theory regarding its origin

सौर मण्डल एवं उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिये गये किसी एक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।

        इस ब्रह्माण्ड में हमारा सौरमंडल सबसे अलग है। इसका आकार एक तश्तरी की तरह है। सौर मंडल का निर्माण लगभग 5 बिलियन वर्ष पहले हुई थी, जब एक नए तारे का जन्म हुआ था जिसे हम सूर्य के नाम से जानते हैं। सूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोल पिण्डों को ग्रह कहते हैं। सौरमंडल के उत्पति के संदर्भ में कई सिद्धान्त दिए गए है। पहला सिद्धान्त  ‘कास्ते-द-बफन’ के द्वारा प्रतिपादित किया गया था।

⇒ उन्होंने 1749 ई० में ‘पुच्छल तारा परिकल्पना’ (Comet Hyppothesis) प्रस्तुत किया।

⇒ इनके सिद्धान्त के बाद कई विद्वानों ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

⇒ इन सिद्धांतों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कुछ विद्वानों का मानना है कि हमारी पृथ्वी / सौरमंडल के निर्माण में केवल एक ही तारा का योगदान है जबकि कुछ लोगों के मतानुसार हमारे पृथ्वी के निर्माण में एक से अधिक तारों का योगदान है।

⇒ तारों की संख्या के आधार पर सभी सिद्धान्तों को दो भागों में बाँटते है।

(A) अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic Concept):-

⇒ इसमें एक ही तारे से सम्पूर्ण ग्रहों की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया है।

⇒ इसे (पैतृक संकल्पना) भी कहते है। इसके अनुसार सम्पूर्ण ग्रहों  की उत्पत्ति में एक ही पिता तारे की भूमिका रही है।

⇒ इस संकल्पना पर चार सिद्धान्त दिए गए है:-

1. पुच्छलतारा परिकल्पना (1749)- कास्ते-द-बफन

2. वायव्य राशि परिकल्पना (1755)- इमैनुएल कांट

3. निहारिका परिकल्पना (1796)- लाप्लास

4. उल्कापिंड परिकल्पना (1919)– लॉकियर

(B) द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic Concept):-

⇒ इस संकल्पना में ग्रहों की उत्पति दो तारों से मानी गई है।

⇒ इस सिद्धांत के अनुसार ग्रहों की उत्पति को आकस्मिक घटना से जोड़ा जाता है।

⇒ द्वैतवादी संकल्पना पर आधारित प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है:

1. ग्रहाणु परिकल्पना (1905)- टी०सी० चैम्बरलिन

2.ज्वारीय परिकल्पना (1919)– जेम्स जीन्स एवं जेफरीज

3. द्वैतारक परिकल्पना- एच० एन० रसेल

4. विखण्डन का सिद्धान्त– रॉसजन

5. विधुत चुम्बकीय परिकल्पना– डॉ० आल्फवेन

6.निहारिका मेघ सिद्धान्त (1974)- डॉ० वॉन विजसैकर

7. नवतारा परिकल्पना-  फ्रेड होयल एवं लिटिलटन 

8. अन्तरतारक धूलकण परिकल्पना- ऑटो श्मिड

9. सिफीड संकल्पना- ए० सी० बनर्जी

10. घूर्णन एवं ज्वारीय परिकल्पना- रॉसजन

11. वृहस्पति- सूर्य द्वैतारक- ई० एम० ड्रोवीशेवस्की

जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना:-

       सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

       यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध 7°
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण 2°
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

             पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

           जेफरीज ने ‘ज्वारीय परिकल्पना’ में, जिससे ग्रहों का निर्माण सूर्य तथा पास आते हुये तारे के संयोग से बताया गया है, संशोधन प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार दो तारों (सूर्य तथा पास आता हुआ तारा) के अलावा एक और तारा था, जिसे उन्होंने सूर्य का साथी बताया है। पास आता हुआ तारा इस साथी तारे की ही सीध में बढ़ रहा था, जिस कारण दोनों में टक्कर हो गयी। फलस्वरूप कुछ भाग आकाश में बिखर गया। जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

          लघु ग्रह तथा उपग्रह घनीभवन की मन्द क्रिया (Slow condensation) के फलस्वरूप नहीं बने, वरन् आंशिक रूप में ठोस होने अथवा तरल होने के कारण शीघ्र निर्मित हो गये। गैसों के विस्तार के फलस्वरूप शीतल होने तथा ऊपरी सतह से विकिरण (Radiation) द्वारा इन लघु ग्रहों तथा उपग्रहों में शीघ्र ही तरल केन्द्र (liquid core) का निर्माण हो गया।

            इस रूप में पृथ्वी तब तक शीतल होती गयी, जब तक कि वह पूर्ण रूप से तरल नहीं हो गयी। इसके बाद विकिरण द्वारा तापह्रास होने के कारण पृथ्वी के पदार्थ ठोस होने लगे तथा घनत्व के अनुसार उसमें विभिन्न मेखलाएं (zones) बन गयीं। ये सभी घटनाएं शीघ्रता से अल्प समय में घटित हुईं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दूर है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके कारण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

10. Explain the different types of rocks.

चट्टानों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं।

      पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

⇒ ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

        स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

          वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

        वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है,अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालिय चट्टान (Plutonic Rock)

         इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं।अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

⇒ जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

         इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे-ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

       इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे-गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली ‘मेसा’ को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे लैकोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थर– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

11. What is an Earthquake? Describe about the origin of Earthquake.

भूकम्प क्या है? भूकम्प की उत्पत्ति के कारणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

          इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
      भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)–

     अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है। जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

 भूकम्प के प्रकार

    भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

      गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

I. छिछला भूकम्प– फोकस 70 KM से ऊपर होता है।

II. मध्यम भूकम्प– फोकस 70-300 KM के बीच

III. गहरा भूकम्प– फोकस 300-700 KM के बीच

(C) समय के आधार पर

     समय के आधार पर भूकम्प दो प्रकार के होते है:-

I. धीमा भूकम्प

II. अचानक भूकम्प

      धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

     अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वतका निर्माण होता है।

★ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

        भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण :-

I. परमाणु विस्फोट

II. मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

III. बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

IV. पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण, वन ह्रास इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

       ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

1) प्रत्यास्य पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्य चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

      इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

I. अपसरण सीमा

II. अभिसरण सीमा

III. संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

I. चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

II. एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

III. पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

IV. दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

          जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
         जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है। जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह संरक्षी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
Earthquake
      इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

       विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर– विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्विपीय क्षेत्र– यह क्षेत्र यूरेनियम प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र- अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार आइसलैंड से अंटार्कटिका तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

मार्सेली पैमाना

       मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

        रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता मापन 1 से 9 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन 10 के घात के रूप में होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है।
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है।
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं।
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
       
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

       भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

I. P तरंग

II. S तरंग

III. L तरंग

(B) गौण तरंग

I. P* & S*

II. Pg & Sg

P तरंग 

   P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य और गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है। 

S तरंग

      S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है।

★ P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

Earthquake
P* & S* तरंग 

         पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:- (1) ग्रेनाइट  &  (2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

 P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

          ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

         Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।

12. Describe the landforms made by volcanic activity with diagram.

ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर- ज्वालामुखी क्रिया:- ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।

            जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ जल एवं बाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।

           क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।

       ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”

 ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर:- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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Questions Bank

♣ 2023 में पाटलिपुत्र विश्विधालय द्वारा आयोजित सेमेस्टर-1 की वार्षिक परीक्षाओं का प्रश्न-पत्र यहाँ उपलब्ध है।
     Geomorphology (Theory) First Semester का Solved Exam Paper देखने के लिए नीचे क्लिक करें-

1. Major Course (MJC-1)

2. Minor Course (MIC-1)

3. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science

5. Multidisciplinary Course (MDC-1) For B.Com

42. Determination of Climatic Regions of India According to Koppen (कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश का निर्धारण)

42. Determination of Climatic Regions of India According to Koppen

(कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश का निर्धारण)



          जलवायु प्रदेश का तात्पर्य स्थलखंड के उस क्षेत्र से है जिसके अंतर्गत जलवायु तत्वों के बीच समरूपता पायी जाती है। कोपेन महोदय ने अपने विश्वव्यापी जलवायु वर्गीकरण में भारत को मानसूनी जलवायु क्षेत्र में रखा लेकिन भारत के जलवायु में आंतरिक विषमता को देखते हुए इसे कई जलवायु क्षेत्रों में वर्गीकृत किए।

          भारतीय जलवायु के निर्धारण में कोपेन के जलवायु वर्गीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

       वस्तुत: ट्रीवार्था के कार्य को कोपेन जलवायु का प्रतीक माना जाता है। दोनों भूगोलवेत्ताओं ने वनस्पति, तापमान, वर्षा और उच्चावच को ध्यान में रखते हुए जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया है। दोनों भूगोवेत्ताओं ने जलवायु प्रदेशों को सांकेतिक शब्दावली से प्रकट किया है। कोपेन महोदय ने भारत को 9 प्रमुख जलवायु प्रदेशों में विभक्त किया है। जैसे-

(1) Amw

(2) Aw

(3) AS

(4) BShw

(5) Bwhw

(6) Cwg

(7) Dfc

(8) ET

(9) EF

Climatic Regions of India

      प्रारंभ में ET और EF प्रकार का जलवायु प्रदेश हिमालय क्षेत्र के लिए निर्धारित किया। बाद में उन्हें ऐसा लगा की हिमालय क्षेत्र में उच्चावच का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। अत: उच्चावच को ध्यान में रखते हुए उन्होंने Dfc जलवायु प्रदेश का सीमांकन हिमालय प्रदेश में किया।

(1) Amw प्रकार की जलवायु

        इसे उष्णार्द्र जलवायु कहते है। इस प्रकार की जलवायु पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग, अंडमान निकोबार द्वीप समूह तथा उत्तरी पूर्वी भारत में पाई जाती है। इस प्रकार की जलवायु प्रदेश में शुष्क ऋतु छोटी होती है। वार्षिक वर्षा 300 cm से अधिक होती है। वायुमंडलीय आर्द्रता भी अधिक होती है। वार्षिक तापांतर न्यून होती है। सालोंभार तापमान उच्च रहता है।

        इस क्षेत्र में मिलने वाली वनस्पति सदाबहार प्रकार के होती है। वृक्षों की लंबाई 45-60 मी० तक होती है। लकड़ियां कठोर होती है। वृक्षों के ऊपर विशिष्ट प्रकार के लताएं मिलती है जिसे लियाना कहते है। वन काफी सघन प्रकार के होते है। जंगलों में विविध प्रकार के वृक्ष पाए जाते है।

(2) Aw प्रकार की जलवायु

      Aw प्रकार की जलवायु लगभग संपूर्ण प्रायद्वीपीय पठार के वृष्टिछाया प्रदेश और तमिलनाडु के तटवर्ती क्षेत्र को छोड़कर पाई जाती है। यहाँ अधिकांश वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से होती है। वर्षा 75-200 cm रिकॉर्ड किया जाता है। यहाँ वार्षिक तापांतर 13.8ºC होता है। मौसमी विशेषता के आधार पर तीन ऋतुएं पाई जाती है। जैसे- शुष्क ग्रीष्म ऋतु, आर्द्र ग्रीष्म ऋतु और जाड़े की ऋतु। शुष्क गर्मी ऋतु में कभी कभी चक्रवातीय वर्षा होती है जिसे आम्र वृष्टि कहते है।

(3) AS प्रकार की जलवायु

         इस प्रकार की जलवायु प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है जबकि शीत ऋतु में लौटती हुई तापमान से वर्षा होती है। यह जलवायु प्रदेश तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र पाई जाती है। अक्टूबर-नवंबर में यहां चक्रवातीय वर्षा होती है। इस वर्षा के दौरान बंगाल की खड़ी से जलवाष्प लायी जाती है।

(4) BShw प्रकार की जलवायु

      यह जलवायु प्रदेश भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में और अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में पाई जाती है। यहाँ सामान्य तौर पर वर्षा 50-100 cm के बीच होती है। कोपेन के अनुसार वृष्टिछाया प्रदेश में वर्षा 35-75 cm होती है जबकि अरावली के पश्चिमी भाग में 30-65 cm होती है। ये दोनों क्षेत्र जलवायु को आर्द्र मरुस्थलीय या स्टेपी तुल्य जलवायु कहा जाता है। वृष्टिछाया प्रदेश में तापीय स्थिति के कारण तापांतर कम होता है जबकि अरावली के पूर्वी भाग में तापांतर महाद्वीपीय स्थिति के अधिक पाई जाती है।

(5) BWhw प्रकार की जलवायु

इसे कोपेन ने शुष्क मरुस्थलीय जलवायु से संबोधित किया है। इसके अंतर्गत रण ऑफ कच्छ तथा थार मरुस्थलीय भाग को शामिल किया है। औसत वार्षिक वर्षा 35 cm से कम होती है। जून यहाँ का सर्वाधिक गर्म महीना है जबकि जनवरी यहां का सबसे ठंडा माह है। जून का तापमान 35ºC तक पहुंच जाता है जबकि जनवरी का तापमान 11ºC तक जाता है। यहाँ 5 जुलाई से 12 जुलाई के बीच मानसून की ऋतु पहुंचती है और अगस्त महीने में मानसून लौटने लगती है।

(6) Cwg प्रकार की जलवायु

      ऐसी जलवायु उत्तर भारत के मौसमी क्षेत्र में पाई जाती है। इसका विस्तार पंजाब से लेकर पूर्वी असम तक हुआ है। इसके पूर्वी सीमा पर वर्षा 300 cm तक और पश्चिमी सीमा पर वर्षा 65 cm तक होती है। इस तरह स्पष्ट है कि पूरब से पश्चिम की तरफ जाने पर लगातार वर्षा में कमी आते जाती है।

       यह जलवायु मौसमी विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में तीन स्पष्ट ऋतुएं पाई जाती है। जाड़े की ऋतु, ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु। मैदानी क्षेत्र शीत ऋतु में उच्च वायुदाब के रूप में बदल जाता है। इसीलिए वायु ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है। जिसके कारण कड़ाके की ठण्डी पड़ती है।

      गांगेय घाटी में पछुवा विक्षोभ के कारण जनवरी एवं फरवरी महीने में थोड़ी मात्रा में वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु शुष्क होती है क्योंकि सूर्य के लंबवत प्रभाव के कारण धरातलीय भाग के गर्म होने से हवा लंबवत रूप से ऊपर उठने लगती है जिसके कारण संपूर्ण मैदानी क्षेत्र निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाती है। थार मरूस्थलीय क्षेत्र से गर्म वायु गांगेय घाटी में चलने लगती है जिसे ‘लू’ कहते है। अप्रैल एवं मई महीने में मानसून पूर्व चक्रवातीय वर्षा होती है जिसे बंगाल में ‘कालवैशाखी’ बिहार में ‘अंधड़’ और पंजाब में ‘तूफान’ कहा जाता है।

       ग्रीष्म ऋतु के अंत में मानसून विस्फोट के साथ वर्षा ऋतु का आरंभ होती है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी की शाखा से 90 प्रतिशत वर्षा रिकॉर्ड की जाती है। इस क्षेत्र में मानसूनी पतझड़ वन पाए जाते है।

(7) Dfc प्रकार की जलवायु

        यह हिमालय प्रदेश की विशेषता है। इसके अंतर्गत उत्तरी पूर्वी भारत के हिमालय एवं पंजाब हिमालय को शामिल करते है। इस क्षेत्र में 4 महीने तक तापमान 10ºC से कम होता है। यहाँ वार्षिक वर्षा 200 cm से अधिक होती है अर्थात यह कम तापमान और अधिक वर्षा वाला क्षेत्र है।

(8) ET प्रकार की जलवायु

       यह भी हिमालय प्रदेश की जलवायु है। इसमें ग्रीष्म ऋतु का भी तापमान 10ºC से कम होता है। यह कड़ाके की सर्दी वाला क्षेत्र है। वर्ष में कभी न कभी हिमपात की क्रिया होती है और बर्फीली हवाएँ चलती है। यह जलवायु लघु हिमालय तथा हिमालय में मिलने वाले घाटी एवं दून प्रदेश में मिलती है। जाड़े की ऋतु में धरातल बर्फ से ढक जाती है जबकि ग्रीष्म ऋतु में बर्फ के पिघल जाने से धरातल पर जल की आपूर्ति बढ़ जाती है। समतल पर्वतीय ढालों पर फूलों की खेती की जाती है और घाटी क्षेत्र में धान की कृषि की जाती है।

(9) EF प्रकार की जलवायु

      इस प्रकार की जलवायु महान हिमालय के चोटियों पर तथा 6000 मी० से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इस क्षेत्र का तापमान सदैव हिमांक से नीचे रहता है। धरातल सदैव बर्फ से अच्छादित रहते है। वनस्पति के रूप में शैवाल और मॉश पाई जाती है।

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कोपेन महोदय ने अनुभावाश्रित विधि का प्रयोग कर भारत को कई जलवायु प्रदेश में वर्गीकृत किया है। आगे चलकर ट्रीवार्था महोदय ने संशोधन प्रस्तुत किया। इसीलिए कोपेन की तुलना में ट्रीवार्था के जलवायु वर्गीकरण को अधिक मान्यता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश का निर्धारण कीजिए और प्रत्येक जलवायु प्रदेश का विस्तार से चर्चा करें।

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