Archives July 2023

26. ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश 

26. ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश


ब्रिटिश भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश 

            उन्नीसवीं सदी के मध्य तक ब्रिटेन में भूगोल की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। काफी समय बाद स्कूलों व कालेजों में भूगोल का अध्ययन प्रारम्भ किया गया। इस अध्यापन में छात्रों को पर्वतों, नदियों, शहरों आदि के नामों की सूची ही रटायी जाती थी। उन्नीसवीं सदी के अन्त में ब्रिटेन में भूगोल का अध्यापन विश्वविद्यालय स्तर पर प्रारम्भ किया गया। तब से अब तक ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने भी भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया है। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में विशेष योगदान किया है, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

(i) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

         हेफोर्ड मेकिण्डर (Halford Mackinder) सर्वप्रमुख ब्रिटिश राजनीतिक भूगोलवेत्ता था। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’, लन्दन के समक्ष एक पत्र पढ़ा। यह ‘हृदय स्थल सिद्धान्त’ (Heart Land Theory) था। सिद्धान्त इस प्रकार था:

“जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, हृदय स्थल को नियन्त्रित करता है, जो हृदय स्थल पर शासन करता है, विश्वद्वीप को नियन्त्रित करता है, जो विश्वद्वीप पर शासन करता है, विश्व को नियन्त्रित करता है।”

          रिचर्ड हार्टशोन के अनुसार मेकिण्डर का यह सिद्धान्त, संसार की शक्ति का विश्लेषण था, जो वर्तमान में मानव की राजनीतिक शक्तियों के मूल्यांकन का सबसे बड़ा योगदान हो गया है।

 

ब्रिटिश भौगोलिक

हेफोर्ड मेकिण्डर

(ii) आर्थिक भूगोल (Economic Geography):-

          दोनों महायुद्धों के मध्य ब्रिटेन में आर्थिक भूगोल पर विशेष ध्यान दिया गया था। इसमें प्राकृतिक तथ्यों के संसाधनों व आर्थिक क्रियाओं पर प्रभाव का अध्ययन किया गया। 1949 में स्मिथ (W. Smith) ने ब्रिटेन का ‘आर्थिक भूगोल’ (Economic Geography) लिखा। चिशोम (Chisholm) ने ‘वाणिज्य भूगोल’ (Hand book of Commercial Geography) नामक पुस्तक लिखी। 1930 में स्टाम्प (L. D. Stamp) ने ब्रिटेन के भूमि उपयोग मानचित्र पर कार्य प्रारम्भ किया।

          हरबर्टसन ने 1905 में विश्व के प्रादेशिक व आर्थिक भूगोल के लिये आधार तैयार किया। उसने विश्व को पन्द्रह प्राकृतिक भागों में बांटा था।

(iii) मानव-प्रकृति अन्तर्क्रिया (Man-Nature Interaction):-

           उन्नीसवीं सदी के अन्त से प्रथम विश्वयुद्ध तक ब्रिटेन में मानव व प्रकृति के सम्बन्धों का अध्ययन मुख्य रूप से किया गया। उस समय ब्रिटेन में भूगोल का अर्थ केवल धरातल व मानव पर उसके प्रभावों के वर्णनों तक ही सीमित था। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने विश्व को प्राकृतिक प्रदेशों में बांटा तथा बताया कि प्रत्येक प्रदेश में मानव किस प्रकार वातावरण से प्रभावित होकर कार्य करता है। फोर्डे (Forde) ने मानव के जीवन व कार्यों पर वातावरण का प्रभाव प्रदर्शित करने के लिये एक पुस्तक Habitat, Economy and Society प्रकाशित की।

(iv) ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography):-

         प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में ऐतिहासिक भूगोल पर अच्छा कार्य हुआ है। मेकिण्डर ने ब्रिटेन में ऐतिहासिक भूगोल के लिये आधार तैयार किया। उसका मत था कि भूगोलवेत्ताओं को वर्तमान के साथ-साथ अतीत की भौगोलिक विशेषताओं का भी अध्ययन करना चाहिये, अन्यथा भूगोल समकालीन घटनाओं का वर्णन मात्र रह जायेगा। ऐतिहासिक भूगोल में जिन ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया, वे हैं—न्यूबेगिन (M. I. Newbegin), टेलर (E. G. R. Taylor), गिलबर्ट (E. W. Gilbert) व डार्बी (H. C. Darby)।

(v) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

           बीसवीं सदी के आगमन के साथ ही ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने कृषि भूगोल में रुचि लेनी प्रारम्भ कर दी थी । शोध कार्य प्रारम्भ कर दिये थे। परन्तु भूमि उपयोग सर्वेक्षण का कार्य 1920-30 के बाद प्रारम्भ किया गया। 1920 में स्टाम्प (L. D. Stamp) ने ब्रिटेन के भूमि उपयोग मानचित्र तैयार किये। स्टाम्प ने एक पुस्तक ‘ब्रिटेन की भूमि, इसका उपयोग व दुरुपयोग’ (The land of Britain, Its Use and Misuse) भी लिखी।

(vi) मात्रात्मक क्रान्ति (Quantitative Revolution):-

        पिछले 40-50 वर्षों में ब्रिटेन में मात्रात्मक क्षेत्र में, भूगोल को स्थापित किया गया है। हैगेट (Peter Haggett) तथा चोर्ले (Richard Chorley) ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। हैगेट ने सांख्यिकी विधियों का उपयोग, मानव व सामाजिक भूगोल (Human and Social Geography) के क्षेत्र में, मॉडल (Models) बनाने में किया। मात्रात्मक क्रान्ति यद्यपि अमेरिका से प्रारम्भ हुई, परन्तु ब्रिटेन में फैलते भी इसे देर न लगी। ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं ने अपना ध्यान इस ओर केन्द्रित किया और मॉडलों व सांख्यिकी की सहायता से अध्ययन प्रारम्भ किया। ‘मानव भूगोल में मॉडल’ (Models is Human Geography), मानव भूगोल में ‘स्थानीकरण विश्लेषण’ (Locational Analysis in Human Geography) व ‘भौगोलिक शिक्षण की सीमाएं’ (Frontiers in Geographical Teachings) ऐसी ही कृतियां हैं।

       आज ब्रिटेन में ‘यथार्थवाद’ (Positivism or Realism) पर भी कार्य किया जा रहा है। इसमें उन पर जोर दिया जाता है जिनके सम्बन्ध में सही-सही निर्णय नहीं लिया जा सकता जैसे- मानव की व्यावहारिक समस्याओं (Practical ) पर ध्यान दिया जाता है। हंटिंगटन ने मानव भूगोल के तथ्यों को 5 तथा मानवीय आवश्यकताओं को 4 कोटियों में रखा है:

मानव भूगोल के तथ्य-

(i) पृथ्वी एक ग्लोब के रूप में,

(ii) भौम्याकार,

(iii) जलाशय,

(iv) मिट्टियां तथा खजिन पदार्थ,

(v) जलवायु।

मानवीय आवश्यकतायें-

(i) भौतिक आवश्यकताएं,

(ii) मुख्य व्यवसाय,

(iii) चातुर्थ और

(iv) उच्च आवश्यकताएं।

हटिंगटन के अनुसार-

(i) आबादी के घनत्व,

(ii) धन-धान्य तथा स्थिति,

(iii) एकाकीपन की मात्रा,

(iv) मानव झुकाव, साधन तथा उद्योग सम्बन्धी भिन्नता एवं

(v) स्फूर्ति की मात्रा पर भौगोलिक प्रभावों को स्पष्ट किया है।

          हटिंगटन ने आर्थिक तथा सामाजिक भूगोल पर भी कार्य किया है। वास्तव में भूगोल के क्षेत्र में इनका महान योगदान है। इनके भौगोलिक विचारधारा उसके सहयोगियों तथा मानव भूगोलवेत्ताओं के लिए प्रेरणा-स्रोत सिद्ध हुई है।


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25. हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

25. हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन


हम्बोल्ट एवं रिटर के भौगोलिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

हम्बोल्ट एवं रिटर

                     यद्यपि हम्बोल्ट तथा रिटर के विचारों में आधारभूत समानता (Similarity) थी, फिर भी दोनों के प्राकृतिक दर्शन (Philosophy of nature) में भिन्नता थी।

(1) हम्बोल्ट प्रकृति की एकता (Unity) में विश्वास करता था तथा वह कार्य-कारण के सम्बन्ध (Inherent causality) में भी विश्वास करता था।

       हम्बोल्ट ने स्वयं लिखा है कि मैंने पृथ्वी पर प्राकृतिक भू-दृश्यों को क्रमबद्ध करके प्रदेशों की सीमायें निर्धारित करने में ऐसा प्रयत्न किया है कि उन प्रदेशों के द्वारा कारण सम्बन्धों (Causal connecions) का स्पष्टीकरण हो जाता है। रिटर ने भी कारण-सम्बन्धों को तुलनात्मक विधि से निश्चित किया था। हम्बोल्ट के मतानुसार, प्रकृति के विभिन्न भू-दृश्यों के वर्गों (Groups of phenomena) में हमको आनुभविक नियमों (Empirical laws) को समझना चाहिये। परन्तु समस्त प्राकृतिक अध्ययन का सबसे ऊंचा लक्ष्य कारण-सम्बन्धों को खोजना होता है।

(2) परन्तु हम्बोल्ट के एकता तथ कारणत्व (causality) के विचार रिटर के विचारों से इस प्रकार भिन्न हैं कि रिटर के अध्ययन में मानव को केन्द्रीय स्थान (Anthropocentric attitude) देकर प्रकृति का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त रिटर में ईश्वरीय उद्देश्यवाद के विचारों (Teleological views) की प्रधानता थी। इस प्रकार हम्बोल्ट और रिटर में दार्शनिकता का भेद था। रिटर का दर्शन आदर्शवादी दार्शनिकों (Idealist philosophers) से मेल खाता था। परन्तु हम्बोल्ट की दार्शनिकता नितान्त आदर्शवादी नहीं थी।

(3) हम्बोल्ट तथा रिटर के कार्य-क्षेत्रों में भिन्नता थी। उनके अध्ययन के दृष्टिकोण अलग-अलग थे। हम्बोल्ट क्रमबद्ध अध्ययन को प्रधानता देता था, जबकि रिटर प्रादेशिक अध्ययन (Landerkunde) को प्रधानता देता था।

(4) समानता-

          रिटर ने अपने भाषणों में बतलाया था, कि प्रादेशिक अध्ययन (Landerkunde) में क्रमबद्ध अध्ययन का महत्व था, और उसने भूगोल की जो ग्रन्थमाला अर्डकुण्डे के नाम से प्रकाशित की थी उसका अन्तिम ग्रन्थ क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) था।

         हम्बोल्ट ने भी प्रादेशिक अध्ययन पर कुछ लेख प्रकाशित किये थे। परन्तु हम्बोल्ट ने प्रादेशिक भूगोल के विषय को अधिक विकसित नहीं किया, क्योंकि उसका लक्ष्य प्रादेशिक भूगोल नहीं था और उसने भौगोलिक ग्रन्थों में उसको कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया था।

(5) पूरकता- 

           इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रिटर और हम्बोल्ट दोनों का कार्य एक-दूसरे का पूरक (Complementary) था। हम्बोल्ट ने क्रमबद्ध भूगोल के अध्ययन की विधि बतलाई और उसका स्वरूप भी निश्चित किया था। उदाहरण के लिए, उसने जलवायु विज्ञान (Climatology) तथा वनस्पति भूगोल (Plant geography) पर ग्रन्थ लिखे थे। रिटर ने प्रादेशिक व्यक्तित्व (Regional individuality) के अध्ययन को अपने ग्रन्थ अर्डकुण्डे का आधार बनाया हुआ था, जिसके द्वारा प्रत्येक क्षेत्र के समस्त भौगोलिक तत्वों के विवेचन से उस क्षेत्र की पूर्णता (Totality) का वर्णन किया जाता था, अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र को एक सम्पूर्ण इकाई (Individual whole) के रूप में अध्ययन और वर्णित किया गया था। अतः उन दोनों ने मिलकर वर्तमान भूगोल (Modern geography) के कार्य को पूरा किया था।

          रिटर ने यूनिवर्सिटी में अध्यापन का कार्य किया था और विधितन्त्र (Methodology) पर बहुत से पत्र प्रकाशित किये थे। इसलिए आगे आने वाली पीढ़ियों पर हम्बोल्ट की अपेक्षा रिटर का अधिक प्रभाव पड़ा, क्योंकि हम्बोल्ट के लेख बहुत सी पत्रिकाओं में इधर-उधर बिखरे हुए थे और भूगोलवेत्ताओं को उनकी जानकारी अपेक्षाकृत कम थी।

         हम्बोल्ट और रिटर दोनों की मृत्यु 1859 में हुई थी। उसी वर्ष डार्विन (Darwin) का विकासवाद का सिद्धान्त, उसके द्वारा लिखी हुई पुस्तक ‘जीवधारियों के जातिवर्गों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) में प्रकाशित हुआ था। इस प्रकार उनकी मृत्यु से भौगोलिक विकास के एक युग का अन्त हो गया था, और वैज्ञानिक तथा दार्शनिक विचारधारा में एक नये आन्दोलन का आरम्भ हो गया था।

       19वीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर मध्य तक की अर्द्धशताब्दी में आदर्शवाद ( Idealism) का बोलबाला रहा था। विज्ञान में ‘पदार्थवाद’ ने प्राकृतिक नियम (Natural law) और कारणत्व (Causality) पर विशेष बल दिया था। लगभग 10 वर्षों बाद पदार्थवाद का प्रभाव भौगोलिक विचारधारा पर भी होने लगा।

उष्मा बजट


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24. भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

24. भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।


भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा अन्य विज्ञानों के साथ उसके सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।

भूगोल को परिभाषित

          भूगोल के लिए प्रयुक्त होने वाला अंग्रेजी शब्द ‘Geography’ यूनानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। Geo = पृथ्वी एवं (Graphy) वर्णन, जिसका अर्थ ‘पृथ्वी का वर्णन’ है। इस प्रकार भूगोल अर्थात ज्योग्रॉफी का सामान्य अर्थ है- पृथ्वी का वर्णन करना।

            भूगोल की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता का इतिहास तथा उतना ही नवीन है जितना कि दैनिक समाचार-पत्र। मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के साथ- साथ भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में भी विकास होता गया है। संक्षेप में कहा जा सकता “भूगोल पृथ्वी तल और उसके निवासियों का विज्ञान है।” (Geography is the Science of the earth’s surface and its inhabitants.) विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात के वर्षों में भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में आवश्यक विस्तार वैज्ञानीकरण और परिवर्तन तीव्र गति से हुआ है।

             विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई भूगोल की परिभाषायें निम्न प्रकार हैं-

1. शब्दकोष द्वारा परिभाषा- भूगोल पृथ्वी तल और पृथ्वी पर रहने वाले निवासियों का विज्ञान है।

2. मोंकहाउस द्वारा परिभाषा- भूगोल पृथ्वी तल का, उसकी क्षेत्रीय भिन्नता के साथ, मानवीय निवास के रूप में अध्ययन है।

3. हार्टशोर्न द्वारा परिभाषा- भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी के एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवर्तनशील स्वरूपों का वर्णन और उनकी व्याख्या ‘मानव के संसार’ के रूप में करता है। यह पृथ्वी तल के घटना दृश्यों के विविध परिवर्ती वितरणों और जटिल अंतर्संबंधों का विश्लेषण करता है और पृथ्वी तल के परिवर्ती स्वरूप की व्याख्या करके उसका शुद्ध क्रमबद्ध और परिमेय वर्णन करता है।

4. रिचथोफेन (Richthofen)- रिचथोफेन के मतानुसार भूगोल में पृथ्वी तल के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन उनकी समस्त विशेषताओं के अनुसार किया जाता है।

5. हेटनर (Hettner)- भूगोल क्षेत्रीय विज्ञान है जिसमें पृथ्वी तल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा स्थानिक संबंधों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।

6. हैगेट (Haggett)- भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वीतल पर मानव वातावरण के पारिस्थितिक तंत्र और प्रदेशों के स्थानिक तंत्र की संरचनाओं तथा पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन करता है।

7. हेरमेन- भूगोल विज्ञान में पृथ्वी के थल का अध्ययन उपत्यक (Genetic), कारणात्मक (Causal) और कार्यात्मक (Functional) दृष्टिकोणों से किया जाता है।

8. डूडले स्टाम्प (Dudley Stamp)- इनकी परिभाषा को तीन प्रकार से लिखा गया है:
(i) भूगोल में संसार का और उसके निवासियों का वर्णन होता है।

(ii) भूगोल में पृथ्वी का तथा मानव परिस्थितिकी का विज्ञान है।

(iii) भूगोल में पृथ्वीतल का वर्णन, क्षेत्रों की भिन्नताओं और सम्बन्धों के प्रसंग में किया जाता है।

9. काण्ट- भूगोल वह विज्ञान है जिसमें पृथ्वी के उस भाग का अध्ययन किया जाता है जो कि मानव का घर है। काण्ट भूगोल तथा खगोलकी को दो भिन्न विज्ञान मानते थे।

10. रिटर (Ritter)- भूगोल में पृथ्वी तल का अध्ययन किया जाता है जो कि मानव का निवास गृह है।

11. वूल्डरिज तथा ईस्ट द्वारा परिभाषा (Wooldridge and East)- भूगोल में भू-क्षेत्र तथा मानव का अध्ययन होता है। इन विद्वानों ने अपनी परिभाषा में तीन बातों को प्रधानता दी है-

(i) पृथ्वीतल (Earth’s Surface) का वैज्ञानिक अध्ययन,

(ii) पृथ्वीतल की विभिन्नताओं के आधार पर पृथ्वी के विभिन्न प्राकृतिक भाग जिनमें मानवीय क्रियाओं की विभिन्नताएं भी सम्मिलित रहती हैं और

(iii) तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध।

12. वर्तमान जर्मन भूगोलवेत्ता- वर्तमान जर्मन भूगोलवेत्ताओं के अनुसार, भूगेल वह विज्ञान है, जिसमें पृथ्वी के विभिन्न प्रदेशों ‘लैण्डशाफ्ट’ का अध्ययन होता है। इस प्रसंग में यह बात भली-भाँति समझ लेने की है कि जर्मन भाषा के शब्द ‘लैण्डशाफ्ट’ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘लैण्डस्केप’ से नहीं किया जा सकता है। अंग्रेजी शब्द ‘लैण्डस्केप’ का अर्थ हिन्दी भाषा में ‘दृश्यभूमि’ होता है, जिसमें प्राकृतिक दृश्यभूमि तथा सांस्कृतिक दृश्यभूमि दोनों ही समाविष्ट होते हैं।

           जबकि जर्मन शब्द ‘लैण्डशाफ्ट का प्रयोग दृश्यभूमि तथा प्रदेश दोनों अर्थों का वाचक है, जिसमें प्रदेश को विशेषताएँ और मानवीय क्रियाएँ भी सम्मिलित रहती हैं।

             भूगोल का अन्य भौतिक विज्ञानों से मनिष्ठ सम्बन्ध है। भूगोल की निम्नलिखित वस्तु है-

1. खगोल विज्ञान:-

        सौर मंडल, सूर्य की सीधी किरणों का उत्तरायण और दक्षिणायन होना, दिन-रात का होना और घटना बढ़ना, मौसम में परिवर्तन, चन्द्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का होना, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण आदि के अध्ययन भूगोल तथा खगोल विज्ञान दोनों में होता है। अतः भूगोल तथा खगोल विज्ञान में बहुत निकट का सम्बन्ध है।

2. गणित:-

        भूगोल में प्रदेशों की अवस्थिति और भौमिकीय स्थिति आदि का अध्ययन किया जाता है और इनको अंशों व कलाओं द्वारा व्यक्त करते हैं। इसके अतिरिक्त उस प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रफल और प्रदेश की आकृति का भी भूगोल में अध्ययन किया जाता है, क्योंकि इन सभी तत्वों का प्रभाव मानवीय उन्नति पर होता है। उन तत्वों का अध्ययन गणित के अन्तर्गत होने से भूगोल का गणित के साथ सम्बन्ध रहता है।

       मानव की अर्थव्यवस्था जैसे-कृषि, निर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, वाणिज्य आदि में सेवा केन्द्रों तथा नगरों की अवस्थिति विश्लेषण में, मात्राकरण और योजनाकरण में गणित की क्रियाएँ सम्मिलित रहती हैं। अतः भूगोल और गणित के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

3. भौमिकी:-

      प्रदेशों की भू-आकृतियों का जैसे पर्वतों, मैदानों, घाटियों आदि का मानव की क्रियाओं और निवास से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक संसाधनों में खनिज पदार्थों का भी प्रमुख स्थान होता है। इसलिए भूगोल में इन दोनों तत्वों अर्थात् भूमि की रचना और भू-आकृति तथा शैलों और खनिज पदार्थों का विशिष्ट अध्ययन होता है। भू-आकृतियों, शैलों और खनिज पदार्थों का विशिष्ट अध्ययन भौमिकी का भी विषय है। इसलिये भौमिकी और भूगोल के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

4. ऋतु विज्ञान और जलवायु विज्ञान:-

           किसी क्षेत्र में मनुष्य के भोजन, वस्त्र, आवास आदि का क्या रूप होगा, वहाँ कौन सी फसलें उग सकेगा और कहाँ पर अधिक स्वास्थ्यपूर्ण तथा सुविधाजनक जीवन व्यतीत कर सकेगा- इन सब बातों को निश्चित करने में मुख्य भूमिका होती है।

            मनुष्य की दैनिक क्रियाओं को ऋतुएँ प्रभावित करती हैं। जलवायु जलवायु अनुरूप ही विभिन्न प्रदेशों की वनस्पति और जीव-जन्तु होते हैं। भूगोल के अध्ययन में ऋतु की जलवायु का विश्लेषण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भूगोल का अध्ययन ऋतु और जलवायु के बिना अधूरा ही माना जाएगा। अतः कहा जा सकता है कि भूगोल का ऋतु विज्ञान और जलवायु विज्ञान से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

5. मृत्तिका विज्ञान:-

            विश्व भर के मनुष्य अपना भोजन मिट्टी से ही पैदा करते हैं। सभी प्रकार की फसलें, सभी प्रकार के फल मिट्टी में ही पैदा होते हैं। माँसाहारी मनुष्य जिन पशुओं और पक्षियों के माँस का सेवन करते हैं वे पशु भी मिट्टी से उगने वाली घास और फलों से ही अपना भोजन ग्रहण करते हैं। अतः सभी मनुष्यों का भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से ही प्राप्त होता है। कम उपजाऊ मिट्टी को मनुष्य खाद आदि के प्रयोग से उपजाऊ बनाता है और कृषि फसलों में हेरफेर की पद्धति को अपना कर और अन्य प्रकारों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखता है।

           विभिन्न प्रकार की कृषि फसलों के लिए विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ या खाद की आवश्यकता होती है। भोजन सामग्री और कच्चा माल उत्पन्न करने वाली मिट्टियों का अध्ययन भूगोल का भी विषय है। अतः भूगोल और मृत्तिका विज्ञान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

6. भूगोल और जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान:-

            प्रमुख प्राकृतिक संसाधन जल का महत्व सिर्फ मनुष्य के पीने के लिए ही नहीं है, वरन् सिंचाई एवं विद्युत् पैदा करने के लिए भी जल एक अनिवार्य साधन है। किसी देश-प्रदेश के सिंचाई साधनों तथा जलशक्ति की समता और विकास का अध्ययन मानव भूगोल में होता है, इसलिये इसका सम्बन्ध जल विज्ञान से हैं। समुद्री तटों और समुद्री पत्तनों का महत्व, मछुआराओं तथा समुद्री परिवहन और व्यापार के लिये कितना है, यह सभी को ज्ञात हैं। बन्दरगाहों और समुद्री परिवहन पर ज्वार-भाटे और धाराओं का प्रभाव पड़ता है। चूँकि भूगोल में भी समुद्र ज्वार-भाटा, बन्दरगाहों आदि का अध्ययन किया जाता है। अतः भूगोल और जल विज्ञान तथा समुद्र विज्ञान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।

7. भूगोल और वनस्पति विज्ञान:-

              मानव जीवन में वनस्पति का महत्वपूर्ण स्थान है। वनों से केवल मकान बनाने की लकड़ी और जलाने का ईंधन ही नहीं मिलता, वरन् कल-कारखानों और उद्योगों के लिये कई प्रकार का कच्चा माल भी वनों से प्राप्त होता है। वन, बाढ़ और मिट्टी का कटाव रोकने में भी मदद करते हैं। प्राकृतिक वनस्पति का मानव जीवन से गहरा सम्बन्ध है। वनस्पतियों का अध्ययन भूगोल का मुख्य विषय है। अतः भूगोल और वनस्पति विज्ञान के बीच सम्बन्धों की घनिष्ठता को नकारा नहीं जा सकता।

8. भूगोल और जन्तु विज्ञान:-

            मनुष्य के जीवन में पशुओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पशुओं से मनुष्य को दूध, माँस, ऊन, चमड़ा आदि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं और पशुओं को खेती करने, सामान ढ़ोने तथा यात्रा करने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त कुत्ता इत्यादि पशुओं को मनुष्य स्वामीभक्त पशुओं के रूप में पालता है। इस प्रकार मानव सभ्यता के आदिकाल से ही मनुष्य और पशुओं के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। चूँकि भूगोल और जन्तु विज्ञान दोनों ही पशुओं का अध्ययन करते हैं, अतः इनके बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है।


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23. भूगोल में अल्फ्रेड हेटनर के योगदान 

23. भूगोल में अल्फ्रेड हेटनर के योगदान 


भूगोल में अल्फ्रेड हेटनर के योगदान 

अल्फ्रेड हेटनर

            अल्फ्रेड हेटनर (1859-1941) बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ जर्मन भूगोलवेत्ता था। उसने अपने समकालीन किसी भी अन्य भूगोलवेत्ता से अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन की, कई ग्रन्थ लिखें जिनमें मुख्य ग्रन्थ भूगोल के विधि-तंत्र और प्रादेशिक भूगोल पर थे। इसके अतिरिक्त हैटनर ने लगभग 30 व्यक्तियों को डॉक्ट्रेट की उपाधि के लिये अनुसंधान कराये थे।

         अलफ्रेड हेटनर की शिक्षा भूगोल में हुई थी। वह रेटजेल और रिचथोफेन का शिष्य था। वह हाईडिलबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था। ये मुख्यतः भौतिक भूगोलवेत्ता और प्रादेशिक भूगोलवेत्ता था। उसने बहुत-सी भौगोलिक यात्रायें की थीं। भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोधपत्र प्रकाशित हुए थे, जो चार खण्डों में 1919 से आगे के वर्षों में छपे थे। उसकी यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में प्रकाशित हुई थी, इस पुस्तक का संशोधित संस्करण संसार के भूगोल के साथ 1923 में प्रकाशित हुआ था।

          हेटनर की विशेष ख्याति उसके भौगोलिक विधि तंत्र पर लिखे गये ग्रन्थ से हुई थी, जो 1927 में प्रकाशित हुआ था।

        हेटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा बतलाई गई भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया था, और उस ढाँचे के अन्दर हम्बोल्ट, पेशेल, रेटजेल के द्वारा लिखे गये क्रमबद्ध अध्ययन को तथा रिटर, मार्थे, रिचथोफेन के द्वारा लिखे गये प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर सम्मिलित करके उसने भूगोल को एक सम्बद्ध पूर्ण विषय बना दिया था।

        हेटनर ने अपनी भौगोलिक पत्रिका 1895 में आरम्भ की थी। उस पत्रिका की प्रस्तावना में तथा उसके बाद 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के आरम्भिक भाषण में, और उसके पश्चात् उसके द्वारा प्रकाशित की गई भौगोलिक विधि-तंत्र की पुस्तक में हेटनर की विचारधारा का प्रकाशन हुआ है।

        हेटनर के भौगोलिक विधि पर लिखे गये शोध-प्रबन्ध, जिनको वह विधि-विहार कहता था तथा जलवायु और उच्चावचन पर उसके विवेचन, आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतिकरण के क्षेत्र में बड़े उच्चस्तरीय माने जाते हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका का लेखन-सम्पादन लग नियमित रूप से किया था। उसने सोवियत रूस के भूगोल पर 1905 में एक श्रेष्ठ पुस्तक प्रकाशित की थी। इसके अतिरिक्त हैटनर ने 1907 में यूरोप का भूगोल तथा 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन छपवाया था।

        हेटनर ने अपनी भौगोलिक पत्रिका में पुस्तक के रूप में, अपने भूआकृतिक अध्ययन महाद्वीपों की स्थलाकृति और विश्व के सांस्कृतिक भूल की पुस्तकें प्रकाशित की थी।

संकल्पनाएँ:-

1. सामान्य भूगोल- भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है। विशिष्ट भूगोल गौण है।

2. भूगोल पृथ्वी की सतह का अध्ययन है। यह पृथ्वी के सतह के तथ्यों के क्षेत्रीय साहचर्य का अध्ययन करता है। क्षेत्रीय साहचर्य का अध्ययन भूगोल में प्रमुख है तथा प्रादेशिक भूगोल गौण है।

3. भूगोल “कोरोलाजिकल“ विज्ञान है। यह विभिन्न क्षेत्रों के तथ्यों का समाकलित अध्ययन करता है जिसके बिना क्रमबद्ध विज्ञानों का अध्ययन अपूर्ण रहता है। इस दृष्टिकोण से ये कार्ल रिटर के विचारों से अधिक सामंजस्य रखते हैं।

क्रमबद्ध विज्ञान एवं भूगोल में अन्तर:-

             हेटनर ने क्रमबद्ध विज्ञानों तथा भूगोल में अन्तर को स्पष्ट करने का प्रयास किया। इन्होंने यह स्वीकार किया कि भूगोल पृथ्वी की सतह पर पाये जाने वाले तथ्यों के वितरण का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। लेकिन क्रमबद्ध विज्ञान भी तथ्यों के वितरण से सम्बन्धित है। वनस्पति शास्त्र अन्य बातों के साथ वनस्पति के प्रकारों का पृथ्वी की सतह पर वितरण भी देखता है। इसी तरह प्राणी विज्ञान पृथ्वी की सतह पर विभिन्न प्रजातियों के पशुओं के साहचर्य का अध्ययन करता है। भौगोलिक प्राणी-विज्ञान लेकिन पशुओं के किसी स्थान या क्षेत्र में उस क्षेत्र के अन्य सभी तथ्यों के साथ क्षेत्रीय साहचर्य का अध्ययन प्राणी भूगोल है।

           भूगोल पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय साहचर्य को देखता है। वह पृथ्वी की सतह के अन्य तथ्यों के साथ वनस्पति एवं पशुओं के साहचर्य का समकालीन दृष्टिकोण से अध्ययन करता है। इसके लिए वनस्पति अपने में अलग तथा पशु अपने में अलग विषय नहीं हैं, वरन् वे पृथ्वी की सतह की समष्टि के अंग हैं।

           इस तरह वनस्पतिशास्त्र एवं प्राणीशास्त्र जैसे क्रमबद्ध विज्ञानों से भूगोल अलग है। यह अन्तर भौगोलिक अन्तर्दृष्टि एवं भूगोल में समष्टि के समावेश के कारण होता है।

          हेटनर इसे और भी आगे ले जाते हैं। उनके अनुसार अर्थशास्त्र, मांग पूर्ति, आवश्यकता, उपभोग जैसे तथ्यों के किसी विशिष्ट तथ्य का वितरण भी देखता है। यह भौगोलिक अर्थशास्त्र हुआ। लेकिन किसी स्थान या क्षेत्र के अन्य तथ्यों के साहचर्य में स्थित हैं तथा जो उस स्थान या क्षेत्र को उसका वैशिष्ट्य प्रदान करते हैं वे आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत आते हैं। अत: मात्र किसी तथ्य विशेष के वितरण के अध्ययन से या उसे मानचित्र पर प्रदर्शित करने से सम्बन्धित विषय भूगोल को अपने में समाहित करने का दावा नहीं कर सकता। वस्तुतः वह विषय स्वयं वितरण के अध्ययन से भूगोल की विधि का अनुसरण कर अपने दृष्टिकोण को विस्तृत करता है।

भूगोल क्रमबद्ध विज्ञानों की जननी है:-

              हेटनर ने भूगोल की जर्मन विचारधारा का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए सिद्ध किया कि कैसे भूगोल ने शुद्ध विज्ञानों को जन्म दिया। हेटनर के अनुसार भूगोल (अर्डकुंडे) पृथ्वी का विज्ञान नहीं है जैसा कि रिटर ने कहा था। भू-विज्ञान का अध्ययन अनेक विषयों के क्षेत्र में आता है जैसे भू-भौतिकी, भू-रसायन, खगोलशास्त्र, वनस्पति, पशु जगत आदि। ये सब विज्ञान आज स्वतंत्र शाखाओं के रूप में स्थापित हैं किन्तु इनका जन्म भूगोल से हुआ है। भूगोल पृथ्वी की सतह के तथ्यों का पृथ्वी की ब्रह्माण्ड में स्थिति का अध्ययन करता है। मनुष्य की जानकारी बढ़ने पर विभिन्न तथ्यों का स्वतंत्र रूप से अध्ययन होने लगा। इस अध्ययन की भूमिका भूगोल की देन है।

             हेटनर ने रियोफेन की तरह भूगोल की “अर्डीबर लेशन कुण्डे’ कहने से भी असहमति व्यक्त की। उनके अनुसार भूगोल पृथ्वी की सतह का अध्ययन महाद्वीपीय स्तर पर, क्षेत्रीय स्तर पर या स्थानीय स्तर पर करता है। वह पृथ्वी की सतह के तथ्यों को स्थानिक विन्यास क्रम के रूप में देखता है। भूगोल न तो क्रमबद्ध विज्ञानों की तरह वर्गीकृत तथ्यों का अलग-अलग अध्ययन करता है, न मानवीय घटनाओं को इतिहास की तरह कालक्रम में देखता है। यह तो पृथ्वी की सतह के तथ्यों के साहचर्य के वैभिन्य का अध्ययन करता है।

भौतिक जगत के छः परिमण्डल:-

            हेटनर ने भी अपने पूर्ववर्ती जर्मन विद्वानों की तरह पृथ्वी को छः परिमण्डलों में विभाजित मानते हैं, यथा-

1. भूमि,

2 जल,

3. वायुमण्डल,

4. वनस्पति,

5. पशु

6. मनुष्य

        इन छः परिमण्डलों के किसी क्षेत्र में पाये जाने वाले साहचर्य का इन परिमण्डलों के स्थानिक अन्तर्सम्बन्ध एवं कारण-कार्य सम्बन्ध के सन्दर्भ में देखा जाता है।

भूगोल प्राकृतिक एवं मानव विज्ञान के रूप में :-

                हेटनर भूगोल को मात्र प्राकृतिक विज्ञान के रूप में भी देखते हैं। उनके अनुसार ‘कोरोलाजिकल’ अध्ययन में मनुष्य का स्थान नहीं है। इसमें मात्र पृथ्वी सतह के प्राकृतिक तथ्य आते हैं। मनुष्य इसके अध्ययन का फोकस नहीं है। यहाँ उन्होंने जीन ब्रून्स (फ्रान्स) की भू-दृश्य की संकल्पना की आलोचना की।

          इनके अनुसार ‘कोरोलाजी’ में अध्ययन को दो भागों में बाँट सकते हैं-

(अ) तंत्र के रूप में- इसके अन्तर्गत भौगोलिक संश्लिष्टों एवं तन्त्रों का अध्ययन होता है जैसे नदी बेसिन, वायुमण्डल, व्यापार, प्रभाव प्रदेश आदि।

(ब) कारण-कार्य अन्तर्सम्बन्ध- इसके अन्तर्गत स्थानिक रूप से व्यवस्थित विभिन्न तथ्य समुच्चयों के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध को देखा जाता है।

            इसका अर्थ यह नहीं है कि हेटनर भूगोल में मनुष्य के महत्व को नकारते थे। ‘उन्होंने मनुष्य का भूगोल’ शीर्षक से तीन खण्डों की एक पुस्तक भी लिखी है जिसमें मनुष्य के आर्थिक क्रिया-कलापों एवं परिवहन की भी चर्चा है। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि हम पृथ्वी की सतह का अध्ययन बिना मनुष्य को सम्मिलित किये उसके स्थूल रूप में भी कर सकते हैं। हेटनर यह भी मानते थे कि पृथ्वी की सतह का अध्ययन क्रमबद्ध विज्ञान अलग-अलग मिलकर करें तब भी नहीं कर सकते। बिना भौगोलिक अध्ययन के जिसमें क्षेत्रीय साहचर्य को समझाने का गुण है, पृथ्वी की सतह का पूरा ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता।


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22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

22. मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त




मेकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

मेकिण्डर

            1861 में जन्में मेकिण्डर ने ग्रेट ब्रिटेन में भूगोल की सुदृढ़ स्थापना की और अपने भौगोलिक विचारों से विश्व भूगोल को प्रभावित किया।

       मेकिण्डर अपने समय के बड़े प्रभावशाली भूगोलवेत्ता रहे हैं जिनका भूगोल एवं राजनीति में पूरा-पूरा दखल था। इस तरह भूगोल के व्यावहारिक पक्ष को क्रियान्वित करने में इनकी प्रमुख भूमिका रही है। इन्होंने न केवल विश्व मंच की घटनाओं के संचालन में भूगोल के ज्ञान की सार्थकता सिद्ध की वरन् यह भी उदाहरण प्रस्तुत किया कि कैसे भूगोलवेत्ता संसार की समस्याओं को सुलझाने में व्यावहारिक योगदान दे सकता है।

       इन्होंने भूगोल को इतिहास के शिकंजे से उबारा। ज्ञातव्य है कि पूर्व काल में वस्तुतः रिटर महोदय द्वारा भूगोल को इतिहास का विषय वस्तु बना दिया गया था। मेकिण्डर ने भूगोल के स्वंत्रत अस्तित्व का प्रतिपादन किया तथा सिद्ध किया कि भौगोलिक पृष्ठभूमि ही इतिहास को प्रभावित करती है।

      मेकिण्डर ने ऐतिहासिक भूगोल का गम्भीर अध्ययन करके 1902 में एक पुस्तक ‘ब्रिटेन और ब्रिटिश सागर’ प्रकाशित की थी। उसका यह ग्रंथ बहुत समय तक ब्रिटिश भूगोल का एक प्रथम वर्गीय श्रेष्ठ ग्रन्थ माना जाता रहा था। इस ग्रन्थ में ब्रिटिश भूगोल के मूल सिद्धांतों का संक्षिप्त रूप बड़े कौशल से दिया गया है। मेकिण्डर का यह ग्रन्थ उसके विस्तृत अध्ययन और गंभीर विचारों पर आधारित था, जिसमें इस पृष्ठभूमि से संबंधित ब्रिटेन के इतिहास की समीक्षा दी हुई थी।

       ऐतिहासिक भूगोल पर लिखे गये एक अन्य निबन्ध से मैकिण्डर को इतनी ख्याति प्राप्त हुई जिसकी कभी आशा नहीं थी। 1904 में उसने ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसायटी’ की बैठक में एक निबन्ध पढ़ा जिसका शीर्षक था “इतिहास का भौगोलिक धुराग्र” (हृदय स्थल सिद्धान्त)। उस निबंध के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित थे।:-

(1) समुद्री (यात्राओं का) युग बीत चुका है, अब थल का कोई बड़ा भाग अन्वेषण द्वारा खोज निकालना शेष नहीं रहा है।

(2) भविष्य में, थल-शक्ति निर्णायक होगी, क्योंकि अब संसार के सभी भाग इतने समीपस्थ हो गये हैं कि महाशक्तियों के बीच होने वाली लड़ाई के विश्वव्यापी प्रभाव होंगे।

(3) सबसे बड़ा थल-खण्ड पुरानी दुनिया में है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों का सम्मिलित थलखण्ड ‘पुरानी दुनिया’ कहलाता है। इसके केन्द्रीय भाग का एक बड़ा भूराजनीतिक महत्व है। इसके हृदय भाग में महाद्वीपीय तथा आर्कटिक जल-प्रवाह वाला एक ऐसा विशाल क्षेत्र है, जो समुद्री शक्ति को पहुँच से पूर्णत: बाहर है। संक्षेपतः यह थल-खण्ड घास स्थल-स्टेपी तथा मरूस्थल है जो घुड़सवार और ऊँटसवार खानाबदोशों का निवास-स्थल रहा है तथा इन खानाबदोशों के आक्रमण सीमावर्ती स्थाई बस्तियों के देशों पर सारे इतिहास भर में लगातार होते रहे हैं।

(4) इस क्षेत्र के स्वरूप में बड़ी तेजी से आमूल परिवर्तन हो रहा है। महाद्वीप के आर-पार जाने वाले रेल मार्गों के निर्माण और उपनिवेशन के आधार पर वहाँ एक शक्ति का सृजन हो रहा है; और वह शक्ति, आन्तरिक मार्गों पर सत्ताधारी होने के कारण, संसार को केन्द्रीय युद्धनीतिक स्थिति को प्राप्त करती रही है।

(5) इस हृदय स्थल के बाहरी भाग में सीमावर्ती महाद्वीपीय राज्यों की एक आन्तरिक अर्द्ध रचनाकार पेटी और उसके परे एक बाहरी अर्द्ध चन्द्राकार पेटी है, जिसमें समुद्रपारीय (समुद्र के पार) शक्तियाँ ब्रिटेन, संयुक्त राज्य, जापान इत्यादि स्थित है।

(6) यदि शक्ति संतुलन इस घुराग्र-राज्य के अत्यधिक अनुकूल हो जाता है तो उसके परिणामस्वरूप उस शक्ति का प्रसार यूरोप-एशिया के सीमावर्ती थल-क्षेत्रों पर हो जायेगा, जिससे इस शक्ति को महासागरीय बेड़ों के निर्माण करने के लिये विस्तृत महाद्वीपीय साधनों का प्रयोग करने की छूट मिल जायेगी और तब संसार का साम्राज्य दृष्टिगोचर होगा। यदि जर्मनी अपनी मित्रता रूस के साथ कर ले तब ऐसा हो जायेगा।

(7) इस धमकी के विरूद्ध, समुद्रपारीय शक्तियों को अपने पुल-पदाधार सैन्य मोरचे फ्रांस, इटली, मिस्र, भारत और कोरिया में बनाये रखने चाहिये, जो धुराग्र मित्रों को अपनी थलीय शक्ति का विकास करने पर बाध्य करेंगे और उनको महासागरीय बेड़े रखने पर ध्यान केन्द्रित करने से रोकेंगे।

       मेकिण्डर की हृदय स्थल की विचारधारा का विकसित रूप उसी पुस्तक लोकतंत्रीय आदर्श और यथार्थता में प्रथम महायुद्ध के पश्चात 1919 में प्रकाशित हुआ था। उसने देखा कि उस युद्ध की उत्पत्ति इस कारण से हुई थी, कि जर्मनी ने रूसी हृदय-स्थल को संसार पर प्रभुत्व जमाने के लिए, प्रयोग करने का प्रयत्न किया था। क्योंकि उस थल-शक्ति ने मित्र राष्ट्रों के जहाजी बेड़ों को बाल्टिक सागर तथा काला सागर में आने से रोक दिया था, इसलिए मेकिण्डर ने अपने हृदय स्थल के क्षेत्र को बढ़ाकर उसमें पूर्वी यूरोप को भी सम्मिलित कर लिया था। यह उसका संसार द्वीप का सिद्धान्त था। उसने एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका के सम्मिलित महाद्वीप यूरेअफ्रेशिया को संसार-द्वीप का नाम दिया था।

         इस संसार द्वीप की विचारधारा में थलीय और समुद्री शक्तियों का तुलनात्मक-पूरक दृष्टिकोण रखा गया था।

      मेकिण्डर ने यह प्रस्ताव किया था कि जर्मनी और रूस के बीच एक स्वतंत्र राज्यों की पेटी बना दी जानी चाहिए। उसका प्रस्ताव यह भी था कि पेलेस्टाइन, सीरिया, मेसोपोटामिया, बोसफोरस, डारडेनलीज तथा बाल्टिक सागर का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो जाना चाहिए, तथा भारत और चीन को हृदय स्थल के आक्रमण से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पुरानी दुनिया के केन्द्रीय भाग के इस ‘ह्रदय स्थल’ सिद्धान्त के भूराजनीतिक महत्व से मेकिण्डर को बड़ी ख्याति प्राप्त हुई।

         वायुयान-यात्रा की बहुत अधिक उन्नति हो जाने पर मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त का महत्व गिर गया है। इस वायुयान युग में मेकिण्डर द्वारा बतलाये गये हृदय स्थल के बजाय उत्तरी ध्रुव का महत्व बढ़ गया है। अब तो आर्कटिक क्षेत्र ही नया या आधुनिक हृदय स्थल बन गया हैं। इस वायुयान युग में उत्तरी ध्रुव की केन्द्रीय स्थिति है, जिसके चारों ओर यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका स्थिति हैं।

     आर्कटिक वृत के चारों ओर स्थित इस आधुनिक हृदय स्थल में केवल जर्मनी और यूरोपीय रूस ही नहीं, वरन् समस्त उत्तरीय यूरोप, सोवियत संघ, उत्तरी चीन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका का आन्तरिक भाग भी सम्मिलित है। इसमें दो महान् शक्तियाँ सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं। महासागरीय युग में इन राष्ट्रों के बीच विशाल महानगर थे, और नाविक शक्ति द्वारा दोनों एक-दूसरे की पहुँच से बाहर थे, परन्तु वायुयान युग में सोवियत संघ और उत्तरी अमेरिका दोनों उत्तरी ध्रुव के मार्ग से एक दूसरे के सम्मुख स्थित हो गये हैं।

       वर्तमान युग तो परमाणु-युग है, जिसमें प्रक्षेपास्त्रो और रॉकेटों के प्रयोग ने मेकिण्डर के हृदय स्थल (Heartland) सिद्धान्त का महत्व और भी कम कर दिया है।  

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

 

 


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