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10. Topography Created by Volcanic Action / ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति

 10. Topography Created by Volcanic Action

(ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति)


ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृति⇒

Topography Created by Volcanic Action

   ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के भीतर गैस एवं लावा की उत्पति से लेकर उनके पृथ्वी के भीतर या बाहर प्रकट होने की सभी क्रियाएं सम्मिलित होती है। ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर :- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रकार के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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2. Complete Educational Psychology Capsule 2 / सम्पूर्ण  शिक्षा मनोविज्ञान

2. Complete Educational Psychology Capsule 2


Complete Educational Psychology Capsule 2 ⇒

Psychology Capsule 2Education (शिक्षा)

                     शिक्षा एक जीवनपर्यन्त चलने वाली बालक के प्राकृतिक विकास की प्रक्रिया है, जिसे सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। यह देश, काल व स्थान आदि के बन्धनों से मुक्त होती है। अर्थात  वास्तव में शिक्षा एक अनियंत्रित वातावरण है, जिसमें रहते हुए बालक स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी प्रकृति एवं क्षमता  के अनुसार विभिन्न अनुभवों को प्राप्त करते हुए सीखता है। 

एक नजर में इन्हें जरुर देखें-

➡शिक्षा शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष’ धातु से हुई है, जिसका  शाब्दिक अर्थ सीखने, ज्ञान ग्रहण करने या विद्या प्राप्त करने से है।

➡शिक्षा शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर शब्द Education है। Education शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा एडुकेट ‘Educatum’से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षण कार्य करना।

➡कई विद्वानों के अनुसार Education शब्द की उत्पत्ति ‘Educare’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ  है – पालन पोषण और विकसित करना।

➡ इस प्रकार Education शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Educatum शब्द से हुई है जिसमें E मतलब अन्दर से, Duco मतलब बाहर निकालना। अर्थात शिक्षा का अर्थ होता है, बालक के अन्तर्निहित योग्यताओं को बाहर निकाल कर उसके व्यवहार में परिवर्तन करना है।

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति: 

➡शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।

➡इसमें नियम व सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है।

➡ शिक्षा मनोविज्ञान अतीत की अपेक्षा वर्तमान की घटनाओं से, क्या और क्यों से सम्बन्धित है।

➡ इसके नियम व सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं।

➡इसके द्वारा भविष्यवाणी की जा सकती है।

➡किसी भी वैज्ञानिक पद्धति में हम उसका अध्ययन करते हैं, जिसक निरीक्षण किया जाता है। 

➡शिक्षा मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन करता है, इसका निरीक्षण किया जा सकता है।

➡ शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहारात्मक पक्ष का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है।

➡शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

➡शिक्षा मनोविज्ञान एक सकारात्मक विद्यालय विज्ञान है, जो शिक्षा के कब, कैसे, और कहाँ आदि प्रश्नों के उत्तर पर ध्यान केन्द्रित करता है।

Complete Educational Psychology Capsule 2

शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता :

➡स्वयं को पहचानने में सहायक।

➡बालक को पहचानने में सहायक।

➡मूल्यांकन की नई-नई विधियों का प्रयोग करना।

➡शिक्षक के दृष्टिकोण को उन्नत व व्यापक बनाने में सहायक।

➡ किसी भी प्रकार की कक्षा में शैक्षणिक प्रस्तुतियां जागृत करने में सहायक।

➡बालको के प्रति प्रेम, सहानुभूति व समदृशी भाव अपनाने में।

➡बालकों के चहुमुखी विकास के लिए उचित शिक्षण विधियों अपनाने में सहायक।

➡बालकों को अभिप्रेरित करते हुए उनमें रुचि जागृत करना। 

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar

1. Complete Educational Psychology Capsule 1 / शिक्षा मनोविज्ञान

1. Complete Educational Psychology Capsule 1


Complete Educational Psychology Capsule 1⇒

Psychology Capsule 1

शिक्षा मनोविज्ञान

शिक्षा मनोविज्ञान’ दो शब्दों से मिलकर बना है- पहला- ‘शिक्षा’ और दूसरा- ‘मनोविज्ञान’। इस प्रकार शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ शिक्षा संबंधी मनोविज्ञान से है। दूसरे शब्दों में, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का ही व्यावहारिक रूप है और शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का सम्पूर्ण अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

एक नजर में इन्हें जरुर देखें

➡ शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में माना जाता था।

➡ विलियम जेम्स ने दर्शनशास्त्र से मनोविज्ञान को मुक्त कराया। इसलिए मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स को माना जाता है।

➡ मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रूडोल्फ गोयल ने किया।

➡ मनोविज्ञान को स्वतन्त्र विषय बनाने के लिए मनीषियों द्वारा इसे परिभाषित करना आरम्भ किया गया।

➡ गेरेट के अनुसार PSYCHOLOGY शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के दो शब्दों PSYCHE और LOGOS से मिलकर हुई हैं।

➡ यहाँ PSYCHE का अर्थ :- आत्मा तथा LOGOS का अर्थ – अध्ययन करना है।

➡ 16वीं शताब्दी में सर्वप्रथम आत्मा को आधार मानकर प्लेटो, अरस्तु और डेकार्डे  के द्वारा मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना गया। 

➡ आत्मा शाब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16वीं शताब्दी के अन्त में यह परिभाषा अमान्य हो गयी।

➡ 17वीं शताब्दी में इटली के मनोविज्ञानी पॉम्पोनोजी व थासडरीन इसे मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान माना। बाद में यह परि भाषा भी अपूर्ण अर्थ के कारण अमान्य कर दी गयी।

➡ 19वीं शताब्दी में विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान माना और अपने अपूर्ण अर्थ की वजह से यह भी अमान्य कर दी गयी।

➡ 20वीं शताब्दी में वाटसन, थार्नडाइक, स्किनर तथा मेग्डुगल इत्यादि ने मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना जो आज तक प्रचलित है।

➡ भारत में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला सेन गुप्त के द्वारा 1915 ई0 में कलकत्ता शहर में स्थापित की गयी।

➡ जर्मनी के लिपजिंग शहर में विलियम वुण्ट के द्वारा 1879 ई० में ‘कार्लमार्क्स विश्विद्यालय में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोग शाला स्थापित की गयी। 

➡ विलियम वुण्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।

➡ वुडवर्थ के अनुसार – “मनोविज्ञान में सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर मन व मस्तिष्क का त्याग किया और फिर उसने अपनी चेतना का त्याग किया तथा तब आज वर्तमान में मनोविज्ञान व्यवहार के विधि स्वरूप स्वीकार करता है।”

➡ वाटसन का कथन – ‘तुम मुझे एक बालक दो मैं उसे वो बना सकता हूँ जो मैं बनाना चाहता हूँ।” 

मनोविज्ञान के अर्थ पर विभिन्न विज्ञानियों के मत
➡ मेग्डुगल- मनोविज्ञान व्यवहार व आचरण का विज्ञान है।’
➡ स्किनर- ‘मनोविज्ञान व्यवहार व अनुभव का विज्ञान है।’
➡ वाटसन- मनोविज्ञान व्यवहार का सुख निश्चित, सकारात्मक धनात्मक विज्ञान है।” 
➡ क्रो एण्ड क्रो- ‘मनोविज्ञान मानव व्यवहार व संबंधों का अध्ययन है।
➡ मन- ‘आधुनिक मनोविज्ञान का संबंध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज है।’
➡विलियम मेग्डुगल ने अपनी पुस्तक Outline Psychology में चेतना शब्द की निंदा की है।
मनोविज्ञान की प्रमुख शाखायें / क्षेत्र-
1. सामान्य मनोविज्ञान,
2. असामान्य मनोविज्ञान,
3. तुलनात्मक मनोविज्ञान,
4. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान,
5. समाज मनो विज्ञान,
6. औद्योगिक मनोविज्ञान,
7. बाल मनोविज्ञान,
8. किशोर मनोविज्ञान,
9. प्रोढ़ मनोविज्ञान,
10. विकासात्मक मनोविज्ञानी,
11. निदानात्मक / उपचाराला / क्लिनिक मनोविज्ञान,
12. परा मनो विज्ञान,
13. पशु मनो विज्ञान,
14. शिक्षा मनोविज्ञान।

➡ मनोविज्ञान की शाखा शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति 1900 ई० में मानी जाती है। बाद में थार्नडाइक, जड़, टरमन, प्रोबेल, हरबल आदि के प्रयासों से 1920 ई0 में शिक्षा मनोविज्ञान को स्पष्ट स्वरूप प्राप्त हुआ।

➡ प्रथम शैक्षिक मनोविज्ञानिक थार्नडाइक को माना जाता है।

➡ शिक्षा में मनोवैज्ञानिक दृष्टि का सूत्रपात रूसो ने किया। रूसो ने अपनी पुस्तक E-mail में लिखा- “शिक्षा संस्कृत के शिक्ष धातु से बना है।”

➡ स्किनर के अनुसार- “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी की आधार शिला है।”

 शिक्षा मनोविज्ञान पर विभिन्न वैज्ञानिकों के मत

➡रूसो- “बालक एक पुस्तक के समान है जिसका अध्ययन प्रत्येक अध्यापक को करना चाहिए।”

➡फ्रॉबेल- “शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बालक अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास करता है।”

➡क्रो एण्ड क्रो- “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से वृद्धावस्था तक किसी भी व्यक्ति के सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”

➡स्किनर-“मनोविज्ञान शिक्षा का आधार भूत विज्ञान है। 

➡ट्रो-  “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक प्रस्तुतियों का मनोवैज्ञानिक ‘दृष्टि से अध्ययन है।”

➡ब्राउन- “शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति के व्ययवहारों में परिवर्तन होता है।”

➡विवेकानन्द- “अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रदान करना ही शिक्षा है।”

➡महात्मा गांधी- “शिक्षा से अभिप्राय बालक या मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्तम विकास से है।”

नोट :  मैं आशा करता हूँ कि शिक्षा मनोविज्ञान से सम्बंधित सभी CAPSULE आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

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7. Plate Tectonic Theory / प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत

Plate Tectonic Theory

(प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत)



Plate Tectonic Theory

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत⇒

Plate Tectonic Theory

      प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे- पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर एक नया विचार प्रस्तुत करता है।

       इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। अर्थात् पृथ्वी के ऊपरी ठोस परत को ही प्लेट कहते है। इसके अंतर्गत न सिर्फ महाद्वीपीय एवं महासागरीय भूपटल (Crust) शामिल हैं बल्कि मैंटल का ऊपरी पतला हिस्सा भी शामिल है। वास्तव में यह स्थलमंडल (Lithosphere) ही है, जिसके नीचे दुर्बलमंडल (Astheno sphere) स्थित है।

     सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों (मोर्गन, मैकेंजी व पार्कर इत्यादि) का योगदान है। इस सिद्धांत के विकास में पहले से चली आ रही निम्नलिखित तीन सिद्धांतों का महत्वपूर्ण योगदान हैः-

(i) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (अलफ्रेड वेगनर, 1912 ई.)

Continental Drift Theory (Alfred Wegener, 1912)

(ii) संवहन तरंग सिद्धांत (ऑर्थर होम्स, 1929 ई.)

Convection Current Theory (Arthur Holmes, 1929)

(iii) समुद्र तली प्रसार सिद्धांत (हैरीहेस, 1960 ई.)

Sea-Floor Spreading Theory (Harry Hess, 1960)

    परंतु 1962 ई० में हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया।

{नोट:

♣ प्लेट शब्द- टूजो विल्सन

♣ प्लेट विवर्तनिकी शब्द- मोर्गन

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का प्रतिपादन- हैरिहेस

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की वैज्ञानिक रूप से विस्तृत व्याख्या- मोर्गन

♣ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में अन्य भू-वैज्ञानिक जो सहायता किए- मैकेंजी व पार्कर}

प्लेटों का स्वभाव तथा संख्या:

Nature and Number of Plates

    इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई महाद्वीपीय भागों में 100 किमी० और न्यूनतम मोटाई  महासागरीय भागों में 5 किमी० तथा औसत मोटाई 70 किमी० है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी  के 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-

प्रमुख प्लेट (बड़े प्लेट)- 7

Major Plates

1. प्रशांत महासागरीय प्लेट/ Pacific Plate

2. उ० अमेरिकी प्लेट/ North American Plate

3. द० अमेरिकी प्लेट/ South American Plate

4. अफ्रीकन प्लेट/ African Plate

5. यूरेशियन प्लेट/Eurasian Plate

6. इण्डियन प्लेट (इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट) /Indian Plate (Indo-Australian Plate)

7. अंटार्कटिका प्लेट/Antarctic Plate

नोट: कुछ विद्वान उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिणी अमेरिका को एक ही प्लेट मानते हैं। ऐसी स्थिति में बड़े प्लेटों की संख्या 6 हो जाती है।

गौण प्लेट (छोटे प्लेट)- 6

Minor Plate

(i) अरेबियन प्लेट/ Arabian Plate

(ii) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट/ Philippine Plate

(iii) कोकस प्लेट/ Cocos Plate

(iv) नास्का प्लेट/ Nazca Plate

(v) स्कोशिया प्लेट/ Scotia Plate

(vi) कैरेबियन प्लेट/ Caribbean Plate

 

Plate Tectonic Theory

प्लेटों के प्रकार/Types of Plates

⇒ गति के आधार पर/Based on Movement

    इस सिद्धांत के अनुसार गति के आधार पर प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–

1. स्थिर प्लेट/Stable Plate

2. गतिशील प्लेट/Moving Plate

       स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है।

⇒ संरचना के आधार पर/Based on Structure

     संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है-

1. महासागरीय प्लेट/Oceanic Plate:-  प्रशांत महासागरीय प्लेट, इण्डियन प्लेट या इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट।

⇒ गति- 5 सेमी० प्रति वर्ष

2. महाद्वीपीय  प्लेट/Continental Plate:- उ० अमेरिकी प्लेट, द० अमेरिकी प्लेट, अफ्रीकन प्लेट, युरेशियन प्लेट, अंटार्कटिका प्लेट।

⇒ गति- 2 सेमी० प्रति वर्ष

       महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व (2.9 ग्राम/सेमी०3) अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व (2.7 ग्राम/सेमी०3)  कम है।

प्लेट सीमांत तथा प्लेट सीमा /Plate Margins & Plate Boundaries

     इस सिद्धांत के अनुसार किसी एक प्लेट के किनारे या अंत के हिस्से को प्लेट सीमांत (Plate Margins) कहते है।

    ‘प्लेट सीमा’ (Plate Boundaries) दो या दो से अधिक प्लेटों के मध्य का वह क्षेत्र है जिसके सहारे वे आपस में मिलते (Converge) हैं या दूर जाते (Diverge) हैं या घर्षण (Slide) करते हैं।

     इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं होती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

(i) अपसारी प्लेट सीमा (Constructive Plate Margin)
(ii) अभिसारी प्लेट सीमा (Destructive Plate Margin)
(iii) संरक्षी प्लेट सीमा (Conservative/Transform Plate Margin)
प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
Driving Forces of Plate Tectonics

        इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे-

(i) पृथ्वी के घूर्णन गति/ Rotational Force of the Earth,

(ii) प्लवनशीलता बल/ Buoyant Force,

(iii) गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन /Gravitational Force and Plate Retreat at 45°,

(iv) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल /Tidal Force of the Sun and the Moon,

(v) संवहन तरंग/ Convection Currents आदि।

         इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे-

(i) निर्माणकारी प्लेट गति/ Constructive Plate Movement- इसकी उत्पत्ति अपसरण प्लेट सीमा के सहारे होती है।

(ii) विनाशकारी प्लेट गति/ Destructive Plate Movement- इसकी उत्पति अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

(iii) संरक्षी प्लेट गति/ Conservative Plate Movement- इसकी उत्पति संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

प्लेटों का क्रियाविधि /Mechanism of Plate Movement

      उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है।

     इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” Benioff Zone निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-

सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण:

Evidence Supporting the Plate Tectonic Theory

   प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है-

1. ज्वालामुखी/ Volcano:–

         विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।

2. भूकम्प/ Earthquake:–

       भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।

3. सागर नितल प्रसार और पुराचुम्बकत्व/ Seafloor Spreading and Palaeomagnetism:-

        सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुम्बकत्व का गुण कम तथा पुराने चट्टानों में पुराचुम्बकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।

4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान/ Solving Geological Problems:-

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचलन, महाद्वीपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुम्बकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।

आलोचना/Criticism:

       उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियाँ है। जैसे- 

(i) प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है। जैसे-जैसे सर्वेक्षण किए जा रहे हैं, प्लेटों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

(ii) हॉट स्पॉट की संख्या का भी स्पष्ट पता नहीं चल पाता है।

(iii) कई संभावित क्षेत्रों में बेनी ऑफ जोन का निर्माण नहीं हुआ है।

(iv) बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता। 

(v) प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है? इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं किया गया है।

(vi) एक प्लेट को एक ही दिशा में गतिशील होना चाहिए, लेकिन कई प्लेटों में विपरीत (opposite) गति के प्रमाण भी मिलते हैं, जैसे- अफ्रीकी प्लेट।

(vii) कई प्राचीन मोड़दार पर्वतों के निर्माण की व्याख्या करने में यह सिद्धांत सक्षम नहीं है, जैसे- सेरा डो मार (Serra do Mar) पर्वत (ब्राजील), ड्रेकेन्सबर्ग पर्वत (दक्षिण अफ्रीका), ग्रेट डिवाइडिंग रेंज (ऑस्ट्रेलिया) आदि पर्वतों की अवस्थिति प्लेट सीमा पर नहीं है, वरन् प्लेटों के मध्य है।

(viii) रचनात्मक सीमा मध्य महासागरीय कटक के रूप में सभी महासागरों में पाए जाते हैं, लेकिन विनाशात्मक सीमा अथवा प्रत्यावर्तन क्षेत्र (सिंक/Sink) सभी महासागरों में नहीं पाए जाते हैं। ये मुख्यतः प्रशांत महासागर के तटों के सहारे ही देखे जाते हैं।

     इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।



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6. Continental drift theory of Alfred Wegener / वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त

 6. Continental drift theory of Alfred Wegener

(वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त)


Continental drift theory of Alfred Wegener 

Continental drift theory

      वेगनर महोदय एक जलवायुवेता एवं भूगर्भशास्त्री थे। इन्होंने 1912 ई० में अपनी पुस्तक डाई इंटेस्टहंगडर कण्टिनेंट एण्ड ओगोनी में महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं विभिन्न स्थानों पर मिलने वाले वनस्पतियों के समानता का व्याख्या करना था। इसके व्याख्या में उन्होंने दो तर्क दिए–

(1) या तो समय-समय पर जलवायु में परिवर्तन होता रहा है।

(2) या तो महाद्वीपों का विस्थापन होता रहा है।

        वेगनर के अनुसार प्रांभिक कार्बोनिफेरस युग में सभी महाद्वीप आपस में जुड़े थे, जिसे पेंजिया कहा तथा इसके चारों ओर स्थित विशाल महासागर को पैंथालास कहा। कालान्तर में पेंजिया के विखण्डन से मध्य भाग में गहरी व सकरी भूसन्नति का निर्माण हुआ जिसे टेथिस सागर कहा। टेथिस के उत्तर में स्थित भूखण्ड को लॉरेशिया तथा दक्षिण में स्थित भूखण्ड को गोंडवानलैंड कहा।

         वेगनर के अनुसार भूपटल सियाल से निर्मित है और इससे नीचे सीमा तथा निफे की परत है तथा सियाल सीमा पर अबाध रूप से तैर रही है।

       कार्बोनिफेरस युग में कुछ भूगर्भिक शक्तियों के कारण लॉरेशिया एवं गोंडवाना लैंड में विखण्डन की क्रिया हुई जिससे छोटे-छोटे भूखण्ड यानी महाद्वीपों का निर्माण हुआ। इन महाद्वीपों के विस्थापन से ही दरार घाटी में हुए जल विस्तार से महासागरों का निर्माण हुआ जिसे निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

महाद्वीपों का प्रवाह

       वेगनर के अनुसार महाद्वीपों के विस्थापन के लिए दो बल उत्तरदायी है– 

(i) गुरुत्वाकर्षण एवम प्लवनशीलता बल- महाद्वीपों का उत्तर की ओर विस्थापन

(ii) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल- महाद्वीपों के पश्चिम दिशा की ओर विस्थापन के लिए उत्तरदायी।

       वेगनर के अनुसार लौरेशिया भूखंड में उ० अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप एवं एशिया के अधिकांश भाग तथा गोण्डवाना लैंड में द० अमेरिका, अफ्रीका, प्रायद्वीपीय भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका सम्मलित थे।

पक्ष में प्रमाण

(1) भूगर्भिक प्रमाण- भारतीय पठार, अफ्रीकी पठार, ब्राजील का पठार एवं ऑस्ट्रेलिया के पठार सभी एक ही समय के निर्मित एवं समान विशेषताएं वाले चट्टान है। 

(2) अटलांटिक महासागर के दोनों तटों पर समानता पायी जाती है तथा दोनों तटों को मिलाया जा सकता है, जिसे उन्होंने– Jig-Saw-Fit कहा।

(3) साइबेरिया, ग्रीनलैण्ड, कनाडा में कोयला का पाया जाना तथा केन्या, युगांडा, ब्राजील के मध्य भाग में बोल्डर क्ले का पाया जाना।

(4) सभी महाद्वीपों पर ग्लोसॉप्टेरिस एवं रेन्डियर का पाया जाना।

(5) लेमिंग नामक जंतु का पश्चिम की ओर भागने की प्रवृति।

(6) सभी महाद्वीपों को कम्प्यूटर पर टूटे हुए प्लेट के समान जोड़ा जा सकता है।

आलोचना

• वेगनर मूलतः जलवायुवेत्ता एवं भूगर्भशास्त्री थे जो जलवायु परिवर्तन का अध्ययन न कर महाद्वीप के विस्थापन का अध्ययन करने लगे।

• इनके द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन का कारक बल पर्याप्त नहीं है।

• आस्ट्रेलिया का उ० पू० में प्रवाहित होने इस सिद्धांत के विरुद्ध है।

• प्लेट विवर्तनिकी के अनुसार विस्थापन महाद्वीपों का नहीं बल्कि प्लेटों का हो रहा है।

• इनके अनुसार महाद्वीप सियाल एवं महासागर सीमा से निर्मित है जो गलत है।

• इनके अनुसार सियाल सीमा पर निर्बाध रूप से तैर रही है परंतु मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के लिए सीमा द्वारा अवरोध बताता है जो विरोधाभाषी है।

निष्कर्ष:-

       उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद यह सिद्धांत भूपटल प्रवाह के सम्बंध में व्यक्त प्रथम विचार था जो प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का आधार बना।


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