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19. Applied Geomorphology / अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान

Applied Geomorphology

(अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान)

अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान ⇒

Applied Geomorphology

 1. परिचय

     व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान का विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ है। डब्ल्यू.एम.डेविस, बाल्थर पेंक और एल.सी. किंग जैसे भूगोलवेताओं ने भूआकृति विज्ञान का विकास दार्शनिक एवं सैद्धांतिक तत्वों के आधार पर किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मात्र वही विषय जीवित रह सके जो प्रत्यक्ष उपयोगिता रखता था या वे विषय जिन्होंने समय के अनुसार अपने विषय वस्तु में परिवर्तन कर लिया। इसी का परिणाम था कि भूआकृति विज्ञान में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान का विकास किया गया। इसके कारण भू आकृति विज्ञान की उपयोगिता एवं महत्व और बढ़ गयी।

        व्यावहारिक भूआकृति विज्ञान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग थॉर्नबरी महोदय के द्वारा 1954 ई० में किया गया था। उन्होंने 1954 में “प्रिंसिपल्स ऑफ ज्योमॉरफोलोजी” नामक पुस्तक लिखा जिसके अंत में एक अध्याय था जिसका शीर्षक ‘व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान’ था। थॉर्नबरी महोदय ने कहा कि “भूआकृति विज्ञान का अध्ययन मात्र सजावट की भाँति है। यदि इसके व्यावहारिक पक्ष को स्थापित नहीं किया गया तो यह अजयघर की वस्तु हो जाएगी।”

      थॉर्नबरी की इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए 1956 में अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक यूनियन एक समिति का गठन किया इसी तरह 1968 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के द्वारा भी एक आयोग का गठन किया गया। इन दोनों आयोगों ने भूआकृति विज्ञान के उपयोग के संबंध में एक समान विचार प्रकट किए। इन दोनों ने सिफारिश किया कि व्यवहारिक भूआकृति विज्ञान का अध्ययन एवं अध्यापन अनिवार्य रूप से कराया जाना चाहिए। 1960-70 के दशक में कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, पूर्व सोवियत संघ और जापान जैसे देशों में अध्ययन अध्यापन का कार्य प्रारंभ हो गया।

      भारत में इसका अध्ययन 1980 के दशक से माना जाता है। इसका श्रेय पूणा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दीक्षित और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सविंद्र सिंह को जाता है। इसके अलावे दिल्ली स्कूल आफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर एस.के. पाल का विशेष योगदान है।

      जर्मनी के प्रोफेसर ब्रून्स डेन ने 1985 ई० में भू आकृति विज्ञान के सर्वाधिक मान्यता प्राप्त परिभाषा प्रस्तुत किया। यह परिभाषा आर.जे.जोहानटन के द्वारा प्रतिपादित पुस्तक “द फ्यूचर ऑफ ज्योग्राफी” में प्रकाशित हुआ। ब्रून्स डेन ने अपनी परिभाषा एक अनुसंधान प्रपत्र में “ज्योमोरफोलॉजी इन द साइंस ऑफ सोसाइटी” के रूप में प्रस्तुत किया था। इस अनुसंधान प्रपत्र को ही जॉनस्टन महोदय ने अपनी पुस्तक में शामिल किया था।

ब्रून्स डेन- “व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक ऐसा विषय वस्तु है जो स्थलाकृति विशेषताओं की सूचनाओं के आधार पर पृथ्वी के सीमित संसाधनों की खोज, मूल्यांकन, प्रबंधन तथा उनके संरक्षण में सहायक होता है। इसके अध्ययन के द्वारा पर्यावरण का पतन तथा प्राकृतिक विपदाओं के संभावनाओं का आकलन कर प्रभाव को कम किया जा सकता है।”

       जब से भूगोल में सुदूर संवेदन प्रणाली का प्रयोग किया जाने लगा है तब से भूआकृति विज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग को और बढ़ावा मिला है। इस नवीन तकनीक के द्वारा भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) का विकास किया गया है। जिससे भूआकृति विज्ञान के व्यवहारिक प्रयोग में व्यावहारिकता का आगमन हुआ है।

2. व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान की विषय वस्तु

            Verstaphen महोदय ने अनुप्रयुक्त भू आकृति विज्ञान के 6 विषय वस्तु का उल्लेख किया है-

(1) प्राकृतिक संसाधनों का स्थलाकृतिक मानचित्र तथा सभी प्रकार के तथ्यों से पूर्ण मानचित्र का निर्माण करना- इन दोनों ही कार्यों के लिए उच्चावच का अध्ययन अनिवार्य है। इसका अध्ययन भूआकृति विज्ञान में ही होता है। उच्चावच के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि किस ऊँचाई पर किस प्रकार के वृक्ष या कृषि कार्य किया जा सकता है। अधिक उच्चावच वाले क्षेत्र में तीव्र अपरदन की संभावना है। ऐसे में अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान अधिक उच्चावच वाले क्षेत्रों का मानचित्रण कर लोगों को सचेत कर सकता है।

(2) प्राकृतिक विपदाओं (जैसे -भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी क्रिया, बाढ़, सुखाड़) का वैज्ञानिक विश्लेषण भू आकृति विज्ञान में किया जाता है। ऐसे में इनका पूर्ण अध्ययन कर मानव एवं अन्य जीवों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है।

(3) स्थलाकृति विकास की प्रक्रियाओं का प्रभाव ग्रामीण विकास और नियोजन के कार्यों पर पड़ता है। ऐसे में ग्रामीण विकास और नियोजन कार्य प्रारंभ करने के पहले स्थलाकृतिक विकास का अध्ययन अनिवार्य है।

(4) नगरीय योजनाएँ भी व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान के अंग है। अर्थात नगर उसी स्थान पर विकसित होते हैं जहाँ पर स्थलाकृतिक परिस्थितियाँ विकास में मदद करती है।

(5) व्यवहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन खनन क्रिया को प्रारंभ करने के लिए या खनन कार्य के संभावित क्षेत्रों के सीमांकन के लिए अत्यंत ही आवश्यक है।

(6) व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अभियंताओं के लिए भी आवश्यक है। जैसे- नदियों पर बाँध बनाने में, अन्य जलाशयों के निर्माण में भू आकृति विज्ञान का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है।

      ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि व्यावहारिक भू आकृति विज्ञान एक उपयोगी विज्ञान है और यह अपना पहचान धीरे-धीरे स्थापित कर रहा है। वर्सटापेन के अलावे भारतीय भूगोलवेताओं ने इसके 8 विषय वस्तु निर्धारित किये हैं। जैसे:-

2.1 भू-आकृति विज्ञान तथा खनन कार्य-       

      व्यवहारिक भू-आकृति वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि भू-आकृति का वृहद अध्ययन खनिजों के संभावित क्षेत्र और उसके उपयोग की संभावनाओं को बता सकता है। सुदूर संवेदन प्रणाली इस कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। जैसे यदि कोई प्रदेश मंद रूप से वलित हो और उसके विभिन्न स्तरों में चुना प्रधान चट्टान पाए जा रहे हैं तो वहां पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मिलने की संभावना होती है। जैसे भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर खनिज तेल की खोज की गई थी।

       यदि जलोढ़ प्रक्रिया का सही अध्ययन किया गया हो तो यह बताया जा सकता है कि किस नदी में किस प्रकार के खनिज मिल सकते हैं? औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने स्वर्ण रेखा और कोयल नदी के स्रोत क्षेत्र का अध्ययन कर यह बताया था कि इन नदियों के बालू में सोना पाए जाते हैं।

       ऋतुक्षरण प्रक्रिया और ऋतुक्षरण के प्रभाव क्षेत्र के आधार पर खनन संभावनाओं को बताया जा सकता है। जैसे- यदि लैटेराइट संरचना के क्षेत्र का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि उसमें अपक्षालन(Leaching) की क्रिया अधिक होती है जिसके तहत लोहा एवं एल्युमिनियम जैसे खनिज पदार्थ के संचित भंडार मिलने की संभावना होती है।

2.2 भू-आकृति तथा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट-

           भूआकृति विज्ञान इंजीनियरिंग कार्य और भूमिगत जल संसाधन के निर्धारण में भी मदद करता है। जैसे- अभियंता लोग बड़े-बड़े बांधों का निर्माण उन्हीं क्षेत्रों में करना पसंद करती है जिस प्रदेश की ढाल तीव्र हो और नदी घाटियाँ सँकरी हो। इसी तरह आस्ट्रेलिया में अर्टिजियन उत्सुप्त कूआँ विशिष्ट भौगोलिक आकृति के कारण ही पाए जाते हैं।

       भू आकृति विज्ञान के आधार पर तटीय स्थलाकृतियों का अध्ययन किया जा सकता है और बड़े बंदरगाहों के निर्माण की संभावनाएं ढूँढ़ी जा सकती है।

        भू आकृति विज्ञान के अध्ययन कर भूमि उपयोग और पर्यावरण प्रबंधन तथा प्रादेशिक विकास में संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

       अक्सर सेनाओं को विषम भौगोलिक प्रदेशों में कार्य करना पड़ता है। ऐसे में प्रादेशिक भू आकृति विज्ञान का अध्ययन उनके लिए अनिवार्य है।

       सम्म (Schumm) महोदय ने भूआकृति विज्ञान के तीन उपयोग जलोढ़ स्थलाकृति का अध्ययन कर बताया है। इसी तरह से अनुप्रयुक्त भूआकृति विज्ञान में नित्य-प्रतिदिन नए-नए महत्त्व सामने उभरकर आ रहे हैं।

3. निष्कर्ष:-

      अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भू-आकृति विज्ञान का यह नवीन शाखा कार्यिक महत्व रखने के कारण आने वाले वर्षों में अंतर विषय विषय-वस्तु के रूप में और भी महत्व प्राप्त कर सकता है।



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18. Coastal Topography / समुद्र तटीय स्थलाकृति

18. Coastal Topography

(समुद्र तटीय स्थलाकृति) 

Coastal Topography


             स्थलाकृति के विकास के पांच प्रमुख दूतों में से एक दूत समुद्री तरंग है। समुद्री तरंग के द्वारा स्थलाकृतियों का निर्माण तटीय क्षेत्रों में होता है। इसीलिए समुद्री तरंग से निर्मित स्थलाकृति को तटीय स्थलाकृति कहते हैं। समुद्री तरंग के द्वारा अपरदित एवं निक्षेपित दोनों प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है। समुद्री तरंग प्रायः ऊपरी भागों का अपरदन करती है जबकि निचली भागों में निक्षेपण का कार्य करती है। समुद्री तरंग अपरदन का कार्य मुख्यतः 5 प्रक्रियाओं से करती है। जैसे-
(1) संक्षारण
(2) अपघर्षण
(3) सन्निघर्षण
(4) जल गतिक दबाब
(5) टूटते हुए लहरों के दवाब द्वारा इत्यादि।
                 
                तटीय भागों में अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे-
(i) तटीय भाग में प्रहर करने वाले तरंगों की आकार एवं उसमें व्याप्त ऊर्जा की मात्रा पर
(ii) तटीय प्रदेश की ढाल पर
(iii) तट रेखा की ऊँचाई पर
(iv) तटीय प्रदेशों की चट्टानों की संरचना पर
(v) तटीय प्रदेश में जल की गहराई पर
(vi) कहीं-कहीं तटीय क्षेत्रों में कई जीव-जंतु छिद्र बनाकर निवास करते हैं। ऐसी जीव तटीय क्षेत्रों में अपरदन के लिए अनुकूल परिस्थिति का निर्माण करते हैं।
               समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में दो प्रकार की स्थलाकृति विकसित होते हैं-
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति और
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति
(A)अपरदनात्मक स्थलाकृति 
(1) गल्फ और खाड़ी (Bay)-
   
              तटीय क्षेत्रों में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का वैकल्पिक जमाव समुद्री तरंग के सापेक्ष में दो प्रकार से संभव है।
(i) अगर कठोर एवं मुलायम चट्टान वैकल्पिक रूप से समुद्री तरंग के सापेक्ष में समानांतर अवस्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर खाड़ी का निर्माण करती है। जैसे- बंगाल की खाड़ी।
       
         बंगाल की खाड़ी के पूर्वी भाग में मलाया प्रायद्वीप और पश्चिमी भाग में प्रायद्वीपीय भारत रूपी कठोर चट्टानें अवस्थित है। इन दोनों के बीच अवस्थित मुलायम चट्टानों को हिंद महासागर का जल अपरदित कर बंगाल की खाड़ी का निर्माण किया है। इसे नीचे चित्र में देखा जा सकता है।
(ii) दूसरी परिस्थिति के अनुसार तटीय क्षेत्रों में समुद्री तरंग के सापेक्ष में कठोर एवं मुलायम चट्टानों का जमाव लम्बवत हो तो समुद्री तरंग के प्रहार से पहले कठोर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिकों का विकास होता है निवेश का सेजल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घोष कर चट्टानों के अपरदन से एक निवेशिका का विकास होता है। निवेशिका से जल मुलायम चट्टानों के क्षेत्र में घुसकर चट्टानों को अपरदित कर देती है और गल्फ का निर्माण करती है। जैसे- परसियन गल्फ। इसे इस चित्र में देखा जा सकता है- 
(2) समुद्री क्लिफ और तरंग घर्षित प्लेटफार्म-
            समुद्री तरंग तटीय भागों में अपने प्रहार के कारण चट्टानों को अपरदित करते रहती है। समुद्री तरंगों का जब तटीय भागों में स्थित खड़ी चट्टानों पर सतत प्रहार चलता रहता है तो उनके अपरदन से एक क्लिपनुमा संरचना का निर्माण होता है जिसे समुद्री क्लिप कहते हैं। जब समुद्री क्लिप का ऊपरी भाग असंतुलित होकर नीचे गिर जाती है तो “वेव कट प्लेटफार्म” का निर्माण करती है। समुद्री क्लिप सतत पीछे की ओर हटने की प्रवृत्ति रखती है जबकि वेव कट प्लेटफार्म सतत विस्तृत होने की प्रवृत्ति रखती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-
(3) समुद्री गुफा- 
       जब तटीय भागों में कठोर चट्टानों के बीच-बीच में मुलायम चट्टान भी खड़ी अवस्था में स्थित हो तो समुद्री तरंग मुलायम चट्टानों को अपरदित कर गुफानुमा स्थलाकृति का विकास करती है, जिसे समुद्री गुफा कहते है।
(4) समुद्री मेहराव एवं तटीय स्तंभ- 
         तटीय भागों में चट्टानों काफी दूर तक कहीं-कहीं घुँसे हुए दिखाई देते हैं। अगर समुद्र में घुसे हुए चट्टान के बीच-बीच में मुलायम चट्टान और उसके चारों और कठोर चट्टान स्थित हो तो समुद्री तरंग उस प्रक्षेपित चट्टान के दोनों ओर प्रहार कर अपरदित कर देती है और मेहरावनुमा स्थलाकृति का निर्माण करती है जिसे “समुद्री मेहराव”कहते हैं। 
           जब समुद्री मेहराव का ऊपरी भाग असंतुलित होकर गिर जाता है तो चिमनी के समान कठोर चट्टाने समुद्र में खड़े दिखाई देते हैं जिन्हें समुद्री स्तंभ(Skerries) कहते हैं। इसे चित्र में देखा जा सकता है। 
(B) निक्षेपात्मक स्थलाकृति- 
          जब समुद्री तरंग तटीय क्षेत्रों से टकराकर पीछे की ओर लौटने लगती है तो वह जहाँ एक ओर कमजोर हो जाती है वहीं दूसरी ओर तटीय क्षेत्रों को काटकर लाई जा रही मलवा का निक्षेपण मंद ढाल वाले क्षेत्रों में प्रारंभ कर देती है। चट्टानों के निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई स्थलाकृति विकसित होते हैं। जैसे-
(1) स्पीट
(2) बालू रोधिका
(3) लैगून
स्पीट- 
       स्पीट बालू और पत्थर के टुकड़ों से बना बाँधनुमा स्थलाकृति है जो तट के लंबवत स्थित होता है। इसका एक भाग तट से जुड़ा होता है जबकि दूसरा भाग समुद्र की ओर प्रक्षेपित रहता है। अगर इसका आकार सीधा हो तो उसे सामान स्पीट कहते हैं। लेकिन जब समुद्री तरंगों के प्रहार की दिशा में परिवर्तन हो तो उससे टेढ़ी स्पीट का निर्माण होता है जिसे हुक कहते हैं।
         
             जब किसी एक ही स्थान पर सामान्य स्पीट और हुक स्थित मिलते हैं तो उसे संयुक्त या मिश्रित स्पीट कहते हैं।
बालू रोधिका & लैगून- 
         कभी-कभी जलमग्न तटीय भागों में समुद्री तरंगें बालू एवं कंकड़-पत्थर का निक्षेपण तट के समानांतर करती है लेकिन तट से थोड़ा अलग होती है तो वैसे निर्मित स्थलाकृति को बालू रोधिका कहते हैं। बालू रोधिका और तट के बीच के पीछे अवस्थित जलाशय को लैगून कहते हैं। भौगोलिक स्थिति के अनुसार बालू रोधिका तीन प्रकार का हो सकता है। जैसे – 
(i) संयोजक रोधिका- इसमें बालू रोधिका का दोनों किनारा स्थल से जुड़ा होता है। जैसे – केरल के एर्नाकुलम के पास। 
(ii) लुप रोधिका- जब किसी द्वीप के चारों ओर बालू रोधिका का विकास हो तो उसे लूप रोधिका कहते हैं। 
(iii) टोम्बोलो रोधिका- जब बालू रोधिका का एक भाग तट से और दूसरा भाग किसी द्वीप से जुड़ा हुआ हो तो उसे टोम्बोलो रोधिका कहते हैं। 
निष्कर्ष-

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री तरंगों द्वारा किए गए अपरदन एवं निक्षेपण से तटीय क्षेत्रों में कई विशिष्ट स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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17. Karst Topography / कार्स्ट स्थलाकृति

17. Karst Topography

(कार्स्ट स्थलाकृति)



चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर (limestone) मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।  

        कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल (underground water)अपरदन का सबसे प्रमुख दूत (agent) होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-

(i) जहाँ विलियन (soluble) करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती हो।

(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध (Joints) का विकास हुआ हो।

(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान (Impermeable) पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

        कार्स्ट स्थलाकृति में निम्नलिखित अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण होता है-

अपरदित स्थलाकृति

(1) लैपिज (Lapies)

(2) विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) और घोलरन्द्र (Sink Holes)

(3) डोलाइन (Doline)

(4) युवाला (Uvalas)

(5) पोल्जे (Polje) 

(6) पोनोर (Ponor)

(7) अंधी घाटी (Blind Valley)

(8) पोल्जे (Polje)

(9) कार्स्ट खिड़की (Karst Window)

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

अपरदित स्थलाकृति

लैपिज (Lapies):

     लैपिज स्थलाकृति की तुलना यारदांग से की जा सकती है। यह यारदांग के समान उबड़-खाबड़ स्थलाकृति है। लैपीज का विकास उसी चूना पत्थर प्रदेश में होता है जहाँ संरोध का विकास नहीं हो पाता है। संरोध के अभाव में चूना पत्थर जल के साथ घुल कर प्रवाहित हो जाती हैं और धरातल पर उबड़-खाबड़ स्थलाकृति का विकास होता है, जिसे लैपीज कहते हैं।

विलियन रन्ध्र और घोलरन्द्र:   

         जिस चूना प्रधान प्रदेश में संरोध का विकास होता है उन प्रदेशों में संरोध के ऊपरी भाग में चूना पत्थर युक्त चट्टान जल में घुलकर भूमिगत हो जाती है जिससे घोलरन्ध्र (Sink Holes) का निर्माण होता है। घोलरन्द्र का आकार एक कीप के समान होता है। लेकिन जब चुना पत्थर चट्टान का विलियन तेजी से होता है तो घोलरन्ध्र के स्थान पर विलियन रन्ध्र (Swallow Holes) का निर्माण होता है। विलियन रन्ध्र का आकार एक बेलन के समान होता है।

डोलाइन (Doline):

      डोलाइन घोलरन्ध्र का ही विकसित रूप है। इसका ऊपरी व्यास 30 फीट से 40 फीट तक होता है। इसकी गहराई 6 से 75 फीट तक होता है। डोलाइन एक अस्थायी झील के समान होता है। कुछ समय के बाद इसके जल संरोध के सहारे भूमिगत हो जाते हैं और झील सूख जाती है। युगोस्लाविया से अलग हुए सर्बिया राज्य में डोलाइन के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

 

पोनोर (Ponor):

        डोलाइन के नीचे स्थित संरोध के सहारे जब जल भूमिगत होती है तो संरोध के किनारे स्थित चूना पत्थर का विलियन हो जाता है जिसके कारण संरोध काफी चौड़ा हो जाता है। इसी चौड़े संरोध वाले स्थलाकृति को पोनोर कहते हैं। अर्थात् पोनोर एक प्रकार का संरचनात्मक पाइप है, जो डोलाइन एवं उपसतही (Subsurface Cave) के मध्य विकसित होता है। इसका विकास भी संरोध के सहारे होता है। इसे गुफा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

युवाला (Uvalas):

    डोलाइन भी क्रमशः बड़ा होता जाता है। जब दो डोलाइन आसपास होते हैं तो बढ़ते-बढ़ते उनके बीच की दीवार टूट कर गिर जाती है और वे आपस में मिल जाते हैं। इससे एक वृहद् गड्ढे का निर्माण होता है, जो युवाला (Uvalas) कहलाता है।

      अर्थात् जब दो या दो से अधिक डोलाइन आपस में मिल जाते हैं तो एक विस्तृत गर्तनुमा स्थलाकृति का निर्माण होता है जिसे युवाला कहते हैं। युवाला का व्यास कई किलोमीटर तक हो सकता है। जल से भर जाने पर यह एक वृहद् झील के रूप में नजर आता है।

 
पोल्जे (Polje)

      अंधी गुफा के ऊपरी छत में घोलरन्ध्र के सहारे विकसित संरोध विलयन की क्रिया से चौड़ा होकर कार्स्ट खिड़की का निर्माण करती है। जब अंधी घाटी का ऊपरी छत धँस जाता है तो धँसान से निर्मित गर्त को पोल्जे कहते हैं।

      पोनोर के सहारे जब विलियन की क्रिया अति तीव्र हो जाती है तो धरातल और अपारगम्य चट्टान के बीच एक चौड़ी गुफानुमा स्थलाकृति का विकास होता है जिसे अंधी घाटी या अंधी गुफा कहते हैं। दूसरे शब्दों में, पोनोर का ही अति विस्तृत भाग अंधी घाटी या अंधी गुफा कहलाता है।

कार्स्ट खिड़की (Karst Window):

     गुफा स्तंभ के अभाव में जब कभी गुफा की छत का कुछ भाग ध्वस्त होकर गिर जाता है तो गुफा की छत में वृहद् छिद्र का निर्माण हो जाता है, जो ‘कार्ट खिड़की’ के नाम से जाना जाता है। इसे खिड़की इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा घरातल के ऊपर से भूमिगत जल-प्रवाह एवं अन्य उपसतही स्थल रूपों को देखा जा सकता है।

निक्षेपित स्थलाकृति

(1) स्टैलैक्टाइट (Stalactite)

(2) स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

(3) कन्दरा स्तम्भ/ गुफा स्तम्भ (Cave Pillars)

(4) टेरारोसा (Tera Rosa)

      चुना प्रधान प्रदेशों में निक्षेपण की प्रक्रिया दो स्थानों पर संभव है:-

(i)  धरातल के ऊपर और

(ii) गुफा के अंदर।

     धरातल के ऊपरी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त चट्टानें घुलकर किसी निम्न प्रदेशों में निक्षेपित हो जाती है तो चूना पत्थर युक्त मिट्टी के मैदान का निर्माण करती है। चुना पत्थर युक्त मिट्टी को ही टेरारोसा कहते हैं और निर्मित मैदान को टेरारोसा का मैदान कहते हैं।

         ब्राजील के दक्षिणी पूर्वी भाग में टेरारोसा मैदान का विकास हुआ है। इसी मैदान में वहाँ बड़े पैमाने पर कहवा की खेती की जाती है।

     गुफा के अंदर निम्न प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति विकसित होते हैं।

(i)  स्टैलेक्टाइट

(ii) स्टैलेगमाइट

(iii) कन्दरास्तम्भ

(iv) ट्रेवर्टाइन (Travertine)

         स्टैलेगटाइट का निर्माण गुफा के छत के सहारे होता है जबकि स्टैलेगमाइट का निर्माण गुफा के निचली सतह पर होता है।

         जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट आपस में मिल जाते हैं तो उससे स्तंभ का निर्माण होता है। जब अंधी गुफा के ऊपरी क्षेत्र में स्थित संरोध के सहारे जल भूमिगत होती है तो चूना पत्थर युक्त जल गुफा के सतह पर बूंद-बूंद टपकने की प्रवृत्ति रखती है। धरातल पर चुनायुक्त जल के गिरते ही जल वाष्पीकृत हो जाता है और चुना का निक्षेपण हो जाता है तो उससे निर्मत गुम्बदाकार स्थलाकृति को स्टैलेगमाइट कहते हैं।

     जब गुफा (कन्दरा) में गुफा के छत के सहारे निर्मित संरोध के सहारे भूमिगत होने वाले जल का रफ्तार काफी धीमी हो तो चुना का निक्षेपण मधुमक्खी के छत के समान गुफा के छत के सहारे हो जाता है जिसे स्टैलेगटाइट करते हैं।

  Karst Topography

     कालांतर में जब स्टैलेक्टाइट और स्टैलेगमाइट मिल जाते हैं तो उसे कन्दरा स्तम्भ करते हैं। जब गुफा के अन्दर चूना पत्थर प्रधान वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक अपरदन एवं निक्षेपण का कार्य  चलता रहता है तो अंत में “अपरदन सह निक्षेपित मैदान” मैदान का निर्माण होता है जिसे कार्स्ट मैदान के नाम से जानते हैं। इसे समप्राय मैदान से तुलना की जा सकती है।

ट्रेवर्टाइन (Travertine):

     गुफा की सतह पर निक्षेपित चूना-प्रधान मलबों को ‘ट्रेवर्टाइन‘ कहते हैं। ये प्रायः सफेद, हल्का पीला या पीला-भूरा होते हैं। चूना या कार्बोनेट खनिज की प्रधानता के कारण ये मुलायम एवं पारगम्य होते हैं। बाद में, इन्हीं निक्षेपित मलबों द्वारा कार्स्ट मैदान का निर्माण होता है।

        समप्राय मैदान के समान ही यहाँ भी कठोर चट्टान के टीले मिलते हैं जिसे यूरोप के लोग हम्स (Hums), क्यूबा के लोग मेंगॉट या Hay Stack तक कहते हैं।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि चुना पत्थर वाले प्रदेश में भूमिगत जल से अनेक प्रकार के अपरादित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

नोट: सर्वप्रथम अमेरिकी भूगर्भवेत्ता जे.डब्ल्यू. बीडे (J.W. Beede) ने सन् 1911 ई. में “कार्स्ट प्रदेश में अपरदन चक्र की संकल्पना” प्रस्तुत की थी। बाद में सन् 1918 ई. में, साइबेरियाई भूगोलवेत्ता जोवान स्वीजिक (Jovan Cvijic) ने यूगोस्लाविया के कार्स्ट क्षेत्र के अध्ययन के आधार पर “कार्स्ट चक्र की संकल्पना” को व्यवस्थित ढंग से सामने रखा।

∗ बिहार के रोहतास पठार पर पायी जाने वाली गुप्त-धाम कंदरा भी अंतर्भौम गुफा का एक प्रमुख उदाहरण है।



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16. Arid Topography / पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति

16. Arid Topography

(पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति)



पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति/शुष्क स्थलाकृति⇒Arid Topography             वैसे भौगोलिक क्षेत्र जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेमी० से कम होती है, उसे शुष्क प्रदेश या मरुस्थलीय प्रदेश कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, पश्चिम आस्ट्रेलिया, मध्य एशिया, गोबी, थार, सोनोरान, अटाकामा, पेटागोनिया मरुस्थल इत्यादि।

        डेविस के अनुसार किसी भी भौगोलिक प्रदेश में दिखाई देने वाले विशिष्ट स्थलाकृतियों के समूह को भूदृश्य / भूआकृति या भ्वाकृतिक कहते हैं। भ्वाकृतियों या स्थलाकृतियों के विकास पर प्रक्रम का प्रभाव पड़ता है। प्रक्रम का तात्पर्य अपरदन के दूतों से है। शुष्क प्रदेश में अपरदन के दो प्रमुख प्रक्रम सक्रिय रहते हैं। जैसे:

(1) शुष्क वायु

(2) बहता हुआ जल (आकस्मिक वर्षा)

       ये दोनों प्रक्रम शुष्क प्रदेशों में अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण का कार्य करते रहते हैं।

अपरदन – शुष्क वायु अपरदन की क्रिया तीन प्रकार से करती है-

(i) अपवाहन (Deflation)- अपवाहन क्रिया में वायु चट्टान-चूर्ण उड़ाकर अपरदन का कार्य करती है।

(ii) अपघर्षण(Abrasion)- तीव्र वेग से वायु के साथ उड़ते हुए रेत व धूलकण मार्गवर्ती शैलों को रगड़ते एवं घिसते हैं।

(iii) सन्निघर्षण (Attrition)- वायु के साथ उड़ते हुए धूल व रेत कण परस्पर टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं।

    शुष्क वायु अपरदन को प्रभावित करने वाले कारक:-

(i) वायु की गति

(ii) वायु में रेत व धूलकणों की मात्रा

(iii) शैलों की संरचना

(iv) जलवायु

परिवहन- जब वायु अपरदन किए हुए चट्टान-चूर्ण को अपने साथ लेकर प्रवाहित होती है तो उसे परिवहन कहते हैं।

निक्षेपण- जब चट्टान-चूर्ण के साथ उड़ते हुए वायु के मार्ग में कोई अवरोधक  मिलता है तो उसकी वहन क्षमता कम जाती है और चट्टान-चूर्ण का जमा होने लगता है, जिसे निक्षेपण कहते हैं।

शुष्क वायु द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति

1. वात गर्त/अपवाहन बेसिन

2. ज्यूगेन

3. यारडांग

4. गारा

5. छत्रक शिला

6. भूस्तंभ

7. मरुस्थलीय खिड़की

8. मरुस्थलीय पूल या मेहराव

9. ड्राई कान्टर

10. मरुस्थलीय बेसिन/अपवाह बेसिन

11. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग

निक्षेपित स्थलाकृति

1. बालुका स्तूप

(i) बरखान

(ii) सीफ

2. उर्मिल मैदान

3. लोएस मैदान

आकस्मिक व भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति

1. जलोढ़ पंख

2. जलोढ़ शंकु

3. बाजदा

4. बालसन

5. प्लाया

6. सेलीनॉस

7. पेडीमेंट/पेडीप्लेन

8.अंत: प्रवाही नदी

अपरदित स्थलाकृति

1. ज्यूगेन:-

        जब शुष्क प्रदेश में कठोर एवं मुलायम चट्टान क्षैतिज एवं वैकल्पिक रूप में पायी जाती है। यदि सतह पर कठोर चट्टान हो तो तापीय प्रभाव से उसमें दरारें पड़ जाती है। उन दरारों के माध्यम से वायु प्रविष्ट कर मुलायम चट्टानों के अपरदन प्रारम्भ कर देती है, जिससे दवातनुमा स्थलाकृति बनती है, उसे ज्यूगेन कहते है।

जैसे – USA के कोलरेडो, दक्षिण कैलिफोर्निया क्षेत्र में।

2. यारडांग:- 
        कठोर एवं मुलायम चट्टान लम्बवत एवं वैकल्पिक रूप में हो तो शुष्क वायु चट्टान के ऊपरी भाग मुलायम चट्टानों का अपघर्षण के माध्यम से अपरदित कर देती है और कठोर चट्टान यथावत रह जाता है, इसे यारडांग कहते है।
3. गारा एवं छत्रक शिला:- 
        मरुस्थलीय भागों में यदि कठोर शैल के रूप में ऊपरी आवरण के नीचे कोमल शैल लंबवत रूप में मिलती है तो इस कारण पवन द्वारा निचले भाग में अत्यधिक अपघर्षण द्वारा आधार कटने लगता है जबकि उसका ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है। इस आकृति को गारा एवं छत्रक शिला कहा जाता है। 
* यदि पवन एक ही दिशा से चलती है तो कटाव एक ही दिशा में होती है- गारा 
* पवन कई दिशाओं में- छत्रक शिला
4. भूस्तम्भ:- 
         शुष्क प्रदेशों में जहाँ पर असंगठित एवं कोमल शैल के ऊपर कठोर तथा प्रतिरोधी शैल का आवरण होता है, वहाँ कठोर शैलों के नीचे कोमल शैलों का अपरदन नहीं हो पाता है परंतु समीप के कोमल चट्टानों का अपरदन हो जाता है। जैसे- कालाहारी एवं कोलरैडो।
5. मरुस्थलीय खिड़की तथा मरुस्थलीय मेहराव/पुल:- 
    मरुस्थलीय क्षेत्रों में कांग्लोमरेट चट्टानों की प्रधानता होती है। इन चट्टानों की सामान्य विशेषता है कि कठोर भाग के मध्य में मुलायम चट्टानें भी मिलती है। मुलायम चट्टानें अपरदित होने के बाद खिड़की जैसी आकृति का निर्माण होता है जिसे मरुस्थलीय खिड़की कहते है।  जैसे- पेंटागोनिया मरुस्थल।
 
      मरुस्थलीय खिड़की के विस्तृत रूप को ही मरुस्थलीय मेहराव/पुल कहा जाता है।
6. अपवाह बेसिन/वात गर्त:- 
        सतह के ऊपर असंगठित तथा कोमल शैलों  के ढीले कणों को उड़ा ले जाती है जिस कारण छोटे-छोटे गर्तों का निर्माण होता है, जिसे अपवाह बेसिन कहते हैं। जैसे- सहारा, कालाहारी, यूएसए के पश्चिमी शुष्क प्रदेश।
7. पेडीप्लेन एवं इंसेलवर्ग:- इसके निर्माण में जलीय प्रक्रम का अधिक योगदान होता है। 
* एल.सी. किंग- मरुस्थलीय प्रदेश के अंतिम अवस्था में अपरदन एवं निक्षेपण के परिणामस्वरूप लगभग समतल मैदान को- पेडिप्लेन 
* जगह-जगह मिलने वाले कठोर चट्टानों (लम्बवत) को- इंसलबर्ग कहते है। 
8. ड्राइकांटर:- पथरीले मरुस्थल में सतह पर पड़े शीलाखंडों पर पवन के अपरदन द्वारा शिलाखंड चतुष्फलक आकृति का बन जाता है तो उसे ड्राइकांटर कहते हैं।
निक्षेपित स्थलाकृति 
1.बालुका स्तुप:- 
        जब चलती हुई शुष्क वायु के मार्ग में कोई अवरोधक मिल जाता है तो इन्हीं अवरोधकों  से टकराकर शुष्क वायु धूलकण निक्षेपण करने की प्रवृत्ति रखती है जिससे बालुका स्तूप का निर्माण होता है। वेगनौल्ड महोदय ने बालुका स्तूप को दो भागों में बाँटा है-
* अनुप्रस्त बालुका स्तूप- बरखान
* अनुधैर्य- सीफ
2. बरखान:- इसमें वायु का निक्षेपण अवरोधक के दोनों किनारों पर होता है जिसके कारण अर्धचंद्राकार आकृति बन जाती है, जिसे बरखान कहा जाता है।
3. सीफ:- जब बरखान का एक बाँह की लंबाई बढ़ जाती है तो देखने पर हॉकी स्टिक के समान लगता है जिसे सीफ कहते हैं।
4. उर्मिल मैदान:- जब बालू एवं धूलकणों का निक्षेपण तरंगित मैदान के रूप में होता है तो उसे उर्मिल मैदान कहते है।
5. लोएस का मैदान:- आर्द्रता ग्रहण करने के कारण शुष्क वायु वहन क्षमता खो देती है। जैसे- चीन के मंचूरियन प्रांत- टकलामकान तथा गोबी  मरुस्थल के मैदान बालू से निर्मित है।
 
आकस्मिक या भारी वर्षा से निर्मित स्थलाकृति
1. बाजदा:- प्लाया और पर्वतीय अग्रभाग के मध्य मंद ढाल वाले मैदान को बाजदा कहते है। इसका निर्माण मलवा के निक्षेपण से होता है।
2. बालसन:- रेगिस्तानी भागों में पर्वतों से गिरी बेसिन को वालसन कहते हैं।
3. प्लाया:- बालसन के नीचे गर्त में महीन बालू कण, घुलनशील चट्टानों और जलयुक्त अस्थायी झील को प्लाया कहते हैं।
4. सेलिनॉस:- जब प्लाया झील का जल वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है तो प्लाया झील बालसन का हिस्सा बन जाता है।
* कभी-कभी प्लाया झील सूखने के बाद नमक की परत दिखाई देती है वैसी परिस्थिति में उसे सेलिनॉस कहते हैं।
5. I आकार की घाटी:- USA के कोलरेडो पठार पर- I आकार की घाटी – ग्रैंड कैनियन।
6. पेडीमेंट/पेडीप्लेन:-
       जब किसी उत्थित भूखंड पर आकस्मिक वर्षा होती है तो उत्थित भूखंड के ढाल पर स्थित ऋतुक्षरित चट्टानें  बहते हुए जल के साथ नीचे गिर जाती है। फलत: उत्थित भूभाग का ऊपरी भाग पूर्णत: नग्न हो जाता है जिसे पेडीमेंट/ पेडीप्लेन कहा जाता है।
7. अंत: प्रवाही नदी:- 
         मरुस्थलीय प्रदेशों में जब तीव्र वर्षा होती है तो छोटी-छोटी सरिताओं का विकास होता है लेकिन यह नदियाँ समुद्र से जाकर नहीं मिलती है। इसीलिए इसे अंत: प्रवाही नदी कहते है।

निष्कर्ष:-   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मरुस्थलीय अथवा शुष्क प्रदेशों में शुष्क वायु, आकस्मिक भारी वर्षा के द्वारा कई विशिष्ट अपरदित एवं निक्षेपित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

विश्व के मरुस्थलीय क्षेत्र



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  15. GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS / हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप

GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS 

(हिमानी प्रक्रम और स्थलरुप)


विश्व में हिमानी के दो प्रमुख क्षेत्र है- 

(1) ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र (High mountainous regions)      

(2) ध्रुवीय क्षेत्र (Polar regions)

        नदी के समान प्रवाहित हो रहे हिम को हिमानी या हिमनद कहते है। नदियों की तरह हिमानी भी तीन प्रकार के कार्यों में संलग्न रहती है। 

(1) अपरदन (Erosion)

(2) परिवहन (Transportaion)

(3) निक्षेपण (Deposion)

     हिमानी अपरदन का कार्य कई तरह से सम्पादित करती है। जैसे-

(1) उत्पाटन (Plucking):- 

      जब हिमानी अपने मार्ग से गुरुत्वाकर्षण बल या हिमानी दबाव के कारण प्रवाहित होती है तो वैसी परिस्थिति में अगर कोई कठोर चट्टान मिल जाता है तो उसे हिमानी उखाड़कर फेंक डालती है, उसे उत्पाटन (Plucking) कहते है।

(2) तुषार अपरदन (Frost Erosion):- 

           जब ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में या ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थित चट्टानों के संधि या दरारों में जल जमकर हिम के रूप में बदल जाता है तो हिम के आयतन बढ़ने से चट्टानों के ऊपर दबाव बल कार्य करने लगता है फलतः चट्टानें कमजोर होकर टूटने लगती है। इसे ही तुषार अपरदन (Frost Erosion) कहते है।

(3) अपघर्षण (Abrasion):-  

       हिमनद में छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते है। ये कंकड़ पत्थर ही अपरदन के यंत्र होते है। इन्हीं कंकड़-पत्थर की सहायता से हिमानी तलीय एवं क्षैतिज अपरदन का कार्य करती है।

(4) प्रसर्पण (Sweeping):-  

     वास्तव में नदी जल और हिमानी के गति में अंतर होता है। नदी जल में महीन तथा बारीक धूलकण नदी जल में लटककर और बड़े चट्टानी कण तली में लुढ़कते हुए चलते है। जबकि  हिमानी में सभी आकार के चट्टान एक ही साथ आगे बढ़ते है। जब हिम और सभी आकार के चट्टानी कण किसी ढ़ाल के सहारे एक ही साथ फिसलते हुए आगे बढ़ते है तो उसे प्रसर्पण कहते है।

(5) जलीय अपरदन (Water erosion):-

         हिमानी हिमरेखा (Snow line) के बाद पिघलना प्रारंभ हो जाती है जिसे अधोहिमानी (Subglacial) कहते है। अधोहिमानी में जहां एक ओर हिम के द्वारा अपरदन का कार्य होता है वहीं बहता हुआ जल भी अपरदन कार्यों में संलग्न रहती है। 

        जब हिमानी ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के सहारे आगे बढ़ती है तो उसमें मौजूद चट्टानी कणों को हिमोढ़ (Moraine) कहते है। हिमानी के द्वारा हिमोढ़ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पर ले जाना, परिवहन कहलाता है। पुनः जब हिमानी पिघलने लगता है तो उसकी वहन क्षमता समाप्त हो जाती है जिसके फलस्वरूप हिमोढ़ का बड़े क्षेत्रों पर जमाव हो जाता है, जिसे निक्षेपण कहते है।

        हिमानी मुख्यतः तीन प्रकार के होते है:-

(1) पर्वतीय हिमानी/अल्पाइन हिमानी (Mountain Glaciers)

(2) महाद्वीपीय हिमानी (Continental Glaciers)

(3) पर्वतपदीय हिमानी (Piedmont Glaciers)

     पर्वतीय हिमानी का उदाहरण हिमालय पर्वत, आल्पस पर्वत, रॉकी एवं एंडिज पर्वत के ऊपरी भाग में मिलती है। 

(1) पर्वतीय हिमानी में गुरुत्वाकर्षण बल के कारण बर्फ ऊपर से नीचे की ओर आने की प्रवृति रखती है। 

(2) महाद्वीपीय हिमानी का प्रमाण ध्रुवीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। महाद्वीपीय हिमानी में हिम का प्रवाह बहुत ही मन्द होता है।

(3) पर्वतपदीय हिमानी का प्रमाण पेंटागोनिया के पठार पर मिलता है क्योंकि एंडिज पर्वत के पदीय भाग में स्थित होने के कारण इसे पर्वत पदीय हिमानी कहते है।

हिमानी के द्वारा निर्मित स्थलाकृति/Glacial Landforms

      स्थलाकृति के विकास में पर्वतीय & महाद्वीपीय हिमानी का मुख्य योगदान होता है।

      पर्वतीय हिमानी के द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृतियों का विकास होता है :-

पर्वतीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति/ Glacial Landforms Formed by Mountain Glaciers

(1) U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) & लटकती हुई घाटी (Hanging Valley)

(2) हिमगहवर/सर्क (Cirque)

(3) एरेट (Arete)

(4) कॉल (Col)

(5) पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn)

(6) अनुव्रती सोपान (Follow-up steps)

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति/ Landforms Formed by Continental Glaciers

(1) नुनाटक (Nunatak)

(2) रॉशमुतौनी (Roche Moutonnee)

(3) रॉक बेसिन (Rock Basins)

(4) टॉर्न (Tarn)

(5) अंगुलीनुमा झील (Finger Lake)

⇒ U-आकार की घाटी & लटकती हुई घाटी

        यह पर्वतीय हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका अनुप्रस्थ काट U-आकार का होता है। जब पर्वतीय हिमानी ऊपरी भाग से नीचे की ओर खिसकती है तो हिम टुकड़ों के द्वारा तली पर एक समान अपरदन की क्रिया होती है। इसके अलावे हिम के द्वारा अपघर्षण का भी कार्य होता है। जिसके परिणामस्वरूप U-आकार की घाटी (U-Shaped Valley) विकसित होता है।

        जब कोई मुख्य हिमानी में सहायक हिमानी मिलती है तो उसमें भी छोटी U-आकार की घाटी विकसित होती है। लेकिन संगम स्थल पर मुख्य हिमानी की तुलना में सहायक हिमानी की तली ऊपरी भाग में लटका हुआ दिखाई देता है जिसके कारण उसे लटकती हुई घाटी कहते है।

⇒ हिमगहवर/सर्क/कोरी

        यह पर्वतीय हिमानी द्वारा निर्मित अपरदित स्थलाकृति है। इसका आकार  एक आरामकुर्सी के समान होता है। इसका निर्माण पर्वतपदीय क्षेत्र में होता है। क्योंकि जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों से बर्फ (हिम) नीचे गिरती है तो हिम दबाव के कारण भूपटल का कुछ भाग अपरदित हो जाता है और अपरदन से आरामकुर्सी के समान गर्त का निर्माण होता है। इसी गर्त को हिमगहवर (Cirque) कहते है।

⇒ एरेट,कॉल तथा पिरामिडल हॉर्न

       जब किसी पर्वत के दोनों ढालों पर श्रृंखलाबद्ध अनेक सर्क का विकास हो जाय/ साथ ही कालांतर में दोनों ढालों पर विकसित सर्क आपस में मिल जाये तो ऐसी स्थिति में पहाड़ी के आर-पार अनुप्रस्थ घाटी का निर्माण हो जाता है। इन्हीं अनुप्रस्थ घाटियों को कॉल (Col) कहते है। इसकी तुलना दर्रा से भी की जाती है। दर्रा एवं कॉल में एक सामान्य अंतर यह है कि कॉल का निर्माण हिमानी अपरदन से होता है जबकि दर्रा का निर्माण नदी के अपरदन से होता है।

         दो कॉल के बीच स्थित कठोर चट्टान पिरामिड के समान दिखाई देते है जिन्हें पिरामिडल हॉर्न (Pyramidal Horn) कहा जाता है। जब कोई लम्बी पर्वतीय श्रृंखला के कटक पर स्थित मुलायम चट्टानों को हिमानी के द्वारा अपरदित कर दिया जाता है तो कठोर  चट्टानें एक श्रृंखला में या कंघी के समान दिखाई देते है। ऐसे ही कंघीनुमा पर्वतीय कटक को एरेट/अरेट (Arete) कहते है।

◆ स्वीटजरलैंड में मैटरहॉर्न पर्वत पर अरेट, पिरामिडल हॉर्न एवं कॉल का प्रमाण मिलता है।

◆ कुमायूँ हिमालय में स्थित माना एवं नीति कॉल का उदाहरण है।

⇒ अनुवर्ती सोपान (Follow-up steps)

        यह एक सीढ़ीनुमा स्थलाकृति है। यह पर्वतीय हिमानी की लम्बवत घाटी है। अर्थात पर्वतीय हिमानी (स्रोत) से समुद्र तट (मुहाना) तक निर्मित हिमानी के अनुवर्ती घाटी को अनुवर्ती सोपान / हिमसोपान (Glacial Stairway) कहते है। अनुवर्ती सोपान की उत्पति के सम्बंध में तीन प्रमुख विचार प्रकट किए गए है।

प्रथम विचार– जब हिमानी के मार्ग में कठोर एवं लम्बवत चट्टानें मिल जाती है तो हिमानी उसे अपरदन नहीं कर पाता है जिसके कारण सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास होता है।

दूसरा विचारधारा- जब कोई मुख्य हिमानी में आकर सहायक हिमानी मिलती है तो उस परिस्थित में हिम का मात्रा बढ़ जाने के कारण संगम स्थल से आगे तलीय अपरदन और बढ़ जाता है। पुनः जब एक और सहायक हिमानी मिलती है तो पुनः अपरदन में होने वाले वृद्धि से सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास होता है।

तीसरे विचार- ऐसी सोपानीकृत अनुवर्ती घाटी का विकास भूतल उत्थान एवं धंसान से भी हो सकता है।

      अनुवर्ती सोपान का उदाहरण नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, ग्रीनलैण्ड में देखने को मिलता है।

महाद्वीपीय हिमानी से निर्मित स्थलाकृति/ Landforms Formed by Continental Glaciers

          महाद्वीपीय हिमानी में पर्वतीय हिमानी के समान घाटी का निर्माण नहीं होता है बल्कि विस्तृत क्षेत्र के हिम रेंगते हुए धीमी गति से गुरुत्वाकर्षण ढाल के अनुरूप आगे बढ़ते है। ऐसी स्थिति में महाद्वीपीय हिमानी के द्वारा कई स्थलाकृति का विकास होता है। 

       जब महाद्वीपीय हिमानी के मार्ग में कोई कठोर चट्टान या अवरोधक मिल जाता है तो हिमानी अपना मार्ग न बदलकर उसी कठोर चट्टान के ऊपर से पार कर जाता है जिसके कारण महाद्वीपीय हिमानी के बीच-बीच में उभरा हुआ भाग दिखाई देता है जिसे नुनाटक कहते है।

⇒ रॉशमुतौनी / भेड़शैलपीठ / मेशशिलापीठ

           यदि किसी महाद्वीपीय हिमानी के मध्य कठोर चट्टान की पहाड़ी मिल जाती है तो हिमनी अपना मार्ग न बदलकर उस कठोर चट्टान के ऊपर चढ़कर पार करने की प्रवृति रखती है जिधर से हिमानी चढ़ने की प्रवृति रखती है उधर वाला भाग अपघर्षण से चिकना हो जाता है। लेकिन पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद हिमानी दूसरे ढाल पर गुरुत्वाकर्षण के कारण हिम टूटकर नीचे गिरती है और पहाड़ी के दूसरी ढाल पर उबड़-खाबड़ सतह के निर्माण करती है। जिसके कारण भेड़ के समान स्थलाकृति का विकास होता है जिसे रौशमुतौनी/भेड़शैलपीठ (Roche Moutonnee) कहते है।

⇒ रॉक बेसिन/ टॉर्न तथा अंगुलीनुमा झील

             यदि हिमनी के सतह पर कोई छोटी कठोर एवं उत्थित चट्टान मिलती है तो उसे हिमानी उखाड़ फेंकती है। चट्टानों के उखड़ जाने से जिस गर्त का निर्माण होता है उसे रॉक बेसिन (Rock Basins) कहते है। रॉक बेसिन के निर्माण होते ही उसमें बर्फ भर जाता है और हिमानी के प्रवाह की दिशा में उसका अग्र भाग अपरदित होकर टॉर्न का निर्माण करती है। जब टॉर्न का लम्बी अवधि तक अपरदन होता है तो अंगुलीनुमा झील का निर्माण होता है ऐसी स्थलाकृति का उदाहरण फिनलैण्ड और कनाडा में बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है।

⇒ फियोर्ड (Fiords)

         यह भी हिमानी के द्वारा निर्मित एक अपरदित स्थलाकृति है। इसका निर्माण महाद्वीपीय एवं पर्वतीय दोनों हिमानी से होता है। फियोर्ड का निर्माण प्रायः समुद्रतलीय क्षेत्रों में होता है क्योंकि जब पर्वतीय या महाद्वीपीय हिमानी समुद्र में उतरती है तो किनारों पर अपरदन का कार्य अधिक होता है और ज्यों-ज्यों किनारे से समुद्र की ओर जाते है त्यों-त्यों तलीय अपरदन का कार्य कम होता है। फलतः फियोर्ड में किनारे में अधिक गहरा और समुद्र की ओर जाने पर उसकी गहराई घटते जाती है। ऐसी स्थलाकृति का प्रमाण नार्वे तट पर अधिक देखने को मिलता है। 

⇒ नार्वे के तट को फियोर्ड तट के नाम से जानते है।

⇒ विश्व के सबसे लंबा फियोर्ड सोगनी फियोर्ड है।

हिमानी के द्वारा निर्मित निक्षेपित स्थलाकृति/ Depositional Landforms Created by Glaciers

         अपरदन के अन्य दूत के समान हिमानी भी कई प्रकार के निक्षेपित स्थलाकृति का निर्माण करते है। जब हिमानी आगे की ओर बढ़ती है तो वह भी पर्याप्त मात्रा में चट्टान, धूलकण, गाद, बोल्डर क्ले इत्यादि को लेकर आगे बढ़ती है। हिमानी के द्वारा ले जाया जाने वाले मलवों के समूह को हिमोढ़ कहते है। हिमोढ़ के निक्षेपण से दो प्रकार के स्थलाकृति विकसित होती है :-

1. अस्तरित  स्थलाकृति (Unstratified Topography)

2. स्तरित स्थलाकृति (Stratified Topography)

             हिमनी अपरदन से बोल्डर क्ले का विकास बड़े पैमाने पर होता है जिनका स्तरीकरण संभव नहीं हो पाता है उससे विकसित स्थलाकृति को अस्तरित स्थलाकृति कहते है। 

              लेकिन जब हिमानी के मलवे आपस में चूना पत्थर, क्ले, गाद इत्यादि के कारण एक-दूसरे से जुड़ जाते है तो स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

            अस्तरित स्थलाकृति का विकास हिमरेखा के ऊपरी भाग में जबकि हिमरेखा के नीचे स्तरित स्थलाकृति का विकास होता है।

⇒ हिमरेखा- ऐसी रेखा जहाँ से बर्फ पिघलकर हिम के साथ-साथ पानी भी प्रवाहित होने लगती है।

अस्तरित स्थलाकृति (Unstratified Topography)

        जब हिमानी अपने घाटी मार्ग से आगे की ओर बढ़ती है तो बड़े पैमाने पर हिमोढ़ का जमाव करते हुए आगे प्रवाहित होती है। जब हिमोढ़ का जमाव तलीय भाग में होता है तो तलीय हिमोढ़ (Ground Moraines) कहते है। जब हिमोढ़ का जमाव किनारों पर होता है तो उसे पार्श्व हिमोढ़ (Lateral Moraines) कहते है। जब दो हिमानी के मिलन बिंदु पर हिमोढ़ का जमाव होता है तो उसे मध्य हिमोढ़ (Medial Moraines) कहते है और जब हिमानी अपने मुहाना पर हिमोढ़ का जमाव करती है तो उसे अंतिम हिमोढ़ (Terminal Moraines) कहते है।

         अंतिम हिमोढ़ के बाद कभी-कभी हिमोढ़ का निक्षेपण उल्टे हुए नाव के समान होता है जिसे ड्रमलिन (Drumlin) या अंडों की टोकरी वाली स्थलाकृति कहते है। इसका अक्ष हिमनी प्रवाह की दिशा में होता है।

        जब महाद्वीपीय हिमानी आगे की ओर प्रवाहित होती है तो बड़े क्षेत्रों में या हजारों किमी. भूभाग में बोल्डर क्ले का निक्षेपण कर देती है जिससे निर्मित स्थलाकृति को टिल प्लेन (Till Plain or Till Sheet) कहते है।

◆ अमेरिका का प्रेयरी मैदान और साइबेरिया का मैदान (रूस) टिल प्लेन का उदाहरण है।

 स्तरित स्थलाकृति (Stratified Topography)

          स्तरित स्थलाकृति का निर्माण हिम रेखा के बाहर होता है। ऐसी स्थलाकृति में बोल्डर क्ले एवं अन्य चट्टानी कण एक-दूसरे से जुड़ जाती है। स्तरित स्थलाकृति में सबसे प्रमुख अवक्षेप का मैदान, केम, केटल (Kettles), सन्दूर घाटी एवं एस्कर है।

         जब हिमरेखा के बाहर बर्फ पिघलना प्रारंभ होता है तो हिम के द्वारा लाये गए हिमोढ़ एवं क्ले का निक्षेपण बड़े क्षेत्रों में किया जाता है तो अवक्षेप मैदान (Outwash Plain) का निर्माण होता है।

         हिम रेखा के बाहर जब बर्फ पिघलने लगती है तो नदी के समान ही कई शाखाओं में बंटकर हिमजल उपसरिताओं में बहने लगती है। ये उपसरिताएँ ही सन्दूर घाटी (Sandur Valley) कहलाती है।

         संदूर घाटी के बीच-बीच में मिलने वाले डेल्टानुमा स्थलाकृति को केम (Kame) कहते है।

         कभी-कभी जब महाद्वीपीय हिमानी प्रवाहित होती है तो उसके मार्ग में मिलने वाला गर्त बर्फ से भर जाता है तथा उसके चारों ओर हिमोढ़ का जमाव हो जाता है। कालांतर में जब बर्फ पिघलता है तो चित्र के अनुरूप स्थलाकृति का विकास होता है। इसे केम-केटल स्थलाकृति कहते है।GLACIAL PROCESS AND LANDFORMS

      जब महाद्वीपीय हिमानी का बर्फ पिघलने लगता है तो हिमानी के तली पर जलोढ़ एवं हिमोढ़ का जमाव एक तटबंधनुमा स्थलाकृति के रूप में होता है, जिसे एस्कर (Easker) कहा जाता है। कभी-कभी एस्कर का आकार माला के समान हो जाता है, इसीलिए इसे मालाकार एस्कर (Garland eskar) भी कहा जाता है। 
निष्कर्ष (Conclusion):

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमानी के अपरदन एवं निक्षेपण से हिमरेखा के अंदर एवं बाहर कई स्थलाकृतियों का विकास होता है।



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