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MAJOR CORE COURSE (Theory- Economic Geography) Solved Questions Paper 2024

(MAJOR CORE COURSE : MJC-3)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Economic Geography)

Time: Three Hours]   [Maximum Marks: 70



Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct options from the following questions. Each question carries 2 marks.[10×2=20]

निम्नलिखित प्रश्नों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

 

1. (i) Economic Geography is a branch of:

(a) Human Geography

(b) Physicsl Geography

(c) Urban Geography

(d) Political Geography

आर्थिक भूगोल किस विषय की शाखा है?

(a) मानव भूगोल

(b) भौतिक भूगोल

(c) नगरीय भूगोल

(d) राजनीतिक भूगोल

उत्तर – (a) मानव भूगोल

(ii) Who is known as founder of Economic Geography?

(a) G. Chisholm

(b) E.W. Zommermann

(c) D. Stamp

(d) J.W. Alxander

निम्नलिखित में से किसे आर्थिक भूगोल का जनक माना जाता है?

(a) जी. चिशोल्म

(b) ई. डब्ल्यू जिम्मरमैन

(c) डी. स्टाम्प

(d) जे. डब्ल्यू अलेक्जेण्डर

उत्तर – (a) जी. चिशोल्म

(iii) Which one of the following is not a primary activity?

(a) Transportation

(b) Mining

(c) Agriculture

(d) Hunting

निम्नलिखित में से कौन-सा प्राथमिक क्रियाकलाप नहीं है?

(a) परिवहन

(b) खनन

(c) कृषि

(d) आखेट

उत्तर – (a) परिवहन

(iv) Fishing occupation is of which group?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Tertiary

(d) Quarternary

मत्स्य उत्पादन व्यवसाय किस वर्ग का है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

उत्तर – (a) प्राथमिक

(v) In which year Von Thunen develop the model of agricultural land use zonation?

(a) 1817

(b) 1826

(c) 1856

(d) 1860

वॉन थ्यूरेन ने किस वर्ष कृषि भूमि उपयोग मंडलीकरण मॉडल विकसित किया?

(a) 1817

(b) 1826

(c) 1856

(d) 1860

उत्तर – (b) 1826

(vi) Which of the following does not fall under intensive rice cultivation?

(a) South-East Asia

(b) Southern China and Japan

(c) Nile Valley and delta

(d) Costal and Delta areas of India

निम्नलिखित में से कौन-सा गहन चावल उपज के अन्तर्गत नहीं आता है?

(a) दक्षिण-पूर्वी एशिया

(b) दक्षिणी चीन एवं जापान

(c) नील घाटी और डेल्टा

(d) भारत के तटीय एवं डेल्टा क्षेत्र

उत्तर – (c) नील घाटी और डेल्टा

(vii) The theory of Least Cost Location was proposed by:

(a) Losch

(b) Isard

(c) Dicey

(d) Weber

न्यूनतम लागत अवस्थिति का सिद्धान्त किसने दिया था?

(a) लॉश

(b) इजार्ड

(c) डाइसी

(d) वेबर

उत्तर – (d) वेबर

(viii) The leading country of Iron and Steel in the world is:

(a) Japan

(b) India

(c) U.S.A.

(d) China

विश्व में लौह-इस्पात उत्पादन का अग्रणी राष्ट्र है:

(a) जापान

(b) भारत

(c) यू.एस.ए.

(d) चीन

उत्तर – (d) चीन

(ix) The headquarter of World Trade Organisation is at:

(a) Geneva

(b) Vienna

(c) New York

(d) Washington

विश्व व्यापार संगठन का मुख्यालय है:

(a) जेनेवा में

(b) वियना में

(c) न्यूयार्क में

(d) वाशिंगटन में

उत्तर – (a) जेनेवा में

(x) Which country of the world introduced SEZ first?

(a) India

(b) South Korea

(c) China

(d) Pakistan

विश्व के किस देश ने सर्वप्रथम सेज की शुरुआत की?

(a) भारत

(b) दक्षिण कोरिया

(c) चीन

(d) पाकिस्तान

उत्तर – (c) चीन

SECTION-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2 What is the main purpose of Economic Development?

आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

3. Define Information Technology.

सूचना प्रौद्योगिकी को परिभाषित कीजिए।

4. What is the role of markets in the location of industries?

उद्योगों की स्थापना में बाजारों की भूमिका क्या है?

5. Mention in brief the advantages of Special Economic Zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र का लाभों को संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

6 What is Multilateral Trade?

बहुपक्षीय व्यापार क्या है?

7 What do you mean by Trade Liberalization?

व्यापार उदारीकरण से आप क्या समझते हैं?

 

SECTION-C/खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. of the following.

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe in detail the meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र का विस्तार सहित वर्णन कीजिए।

9. Evaluate the Von Thunen’s Agricultural Location theory.

वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धान्त का मूल्यांकन कीजिए।

10 Discuss the major oceanic routes of the world.

विश्व के प्रमुख सामुद्रिक मार्गों का उल्लेख कीजिए।

11. Explain the factors of localization of industry in a region.

किसी प्रदेश में उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की व्याख्या कीजिए।

12. Clarify the role of World Tade Organization in terms of International Trade.

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सन्दर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is the main purpose of Economic Development?

आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर- आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य किसी क्षेत्र की आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों का अध्ययन करना है। आर्थिक भूगोल के के अंतर्गत  आर्थिक गतिविधियों और आर्थिक विकास के स्थानिक वितरण का अध्ययन किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल का एक महत्वपूर्ण उपसमूह है। आर्थिक भूगोलवेत्ता, आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक आयामों का अध्ययन करते हैं।

      आर्थिक भूगोल के कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक आयामों का अध्ययन करना।

(ii) आर्थिक प्रणालियों और प्रथाओं के विकास की वजहों का पता लगाना।

(iii) आर्थिक विकास का मानव कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह पता लगाना।

(iv) आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक आयामों को समझना।

(v) आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और संस्थागत प्रभावों का अध्ययन करना।

(vi) आर्थिक भूगोल के ज़रिए, आर्थिक पैटर्न की पहचान करना।         

3. Define Information Technology.

सूचना प्रौद्योगिकी को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) का मतलब है, सूचना को बनाने, संग्रहीत करने, संचारित करने, और दिखाने के लिए हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करना। यह कंप्यूटिंग और संचार से जुड़ी हर चीज़ को शामिल करती है।

       सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें:-

(i) सूचना प्रौद्योगिकी, आवाज़, डेटा, और वीडियो का इस्तेमाल करके सूचना का प्रबंधन और वितरण करती है।

(ii) यह हमारी दैनिक गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा है।

(iii) यह व्यावसायिक संचालन, कार्यबल और सूचना तक व्यक्तिगत पहुंच को आसान बनाती है।

(iv) सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य और व्यापार का एक अहम हिस्सा है।

(v) दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख हिस्सा है।

(vi) सूचना प्रौद्योगिकी को आईसीटी (आईटीसीटी) यानी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी भी कहा जाता है।

(vii) सूचना प्रौद्योगिकी में इंटरनेट, वायरलेस नेटवर्क, कंप्यूटर, सॉफ़्टवेयर, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, सोशल नेटवर्किंग, और अन्य मीडिया अनुप्रयोग शामिल हैं।

4. What is the role of markets in the location of industries?

उद्योगों की स्थापना में बाजारों की भूमिका क्या है?

उत्तर- उद्योगों की स्थापना में बाज़ारों की भूमिका बहुत अहम होती है। बाज़ार की उपलब्धता से उद्योगों का विकास होता है। बाज़ार की उपलब्धता से उत्पादित माल की खपत जल्दी होती है और नया उत्पादन किया जा सकता है।

        उद्योगों की स्थापना में बाज़ार की भूमिका निम्नलिखित है:

(i) बाज़ार की उपलब्धता से उद्योगों का विकास होता है।

(ii) बाज़ार की उपलब्धता से उत्पादित माल की खपत जल्दी होती है।

(iii) बाज़ार की उपलब्धता से नया उत्पादन किया जा सकता है।

(iv) बाज़ार से निकटता उद्योगों के स्थान को प्रभावित करती है।

(v) खराब होने वाले या भारी सामान बनाने वाले उद्योग आम तौर पर बाज़ारों के पास होते हैं.

5. Mention in brief the advantages of Special Economic Zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र का लाभों को संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

        विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना के कई लाभ हो सकते है:-

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

6. What is Multilateral Trade?

बहुपक्षीय व्यापार क्या है?

उत्तर- बहुपक्षीय व्यापार का मतलब है, दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान करना। इसमें दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच व्यापार समझौतों और व्यवस्थाओं का होना शामिल होता है। बहुपक्षीय व्यापार के ज़रिए, देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा दिया जाता है और उनकी अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत किया जाता है

        बहुपक्षीय व्यापार की मुख्य विशेषताएँ :

(i) बहुपक्षीय व्यापार में, दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच व्यापार बाधाओं को कम किया जाता है।

(ii) इससे सीमाओं के पार वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान आसान होता है।

(iii) बहुपक्षीय व्यापार से दुनिया भर के देशों के बीच बातचीत होती है

(iv ) इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण, और दूसरे मकसदों के लिए भी बातचीत होती है

(v) बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के कुछ उदाहरण हैं – विश्व व्यापार संगठन (WTO) और उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता (NAFTA)

(vi) बहुपक्षीय व्यापार, द्विपक्षीय व्यापार से ज़्यादा जटिल होता है

(vii) द्विपक्षीय व्यापार में केवल दो देश शामिल होते हैं, इसलिए इनकी बातचीत करना आसान होता है

7. What do you mean by Trade Liberalization?

व्यापार उदारीकरण से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- व्यापार उदारीकरण का तात्पर्य दो या दो से ज़्यादा देशों के बीच व्यापार में बाधाओं को हटाना या कम करना है, जैसे टैरिफ और कोटा । व्यापार में कम बाधाएँ होने से आयात करने वाले देशों में बेची जाने वाली वस्तुओं की लागत कम हो जाती है। उदारीकरण प्रक्रिया के द्वारा वैश्वीकरण को बढ़ावा मिलता है। पूंजी और साधन संपन्न राष्ट्र आर्थिक तौर पर पिछड़े देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करते है। परिणामस्वरूप इन गरीब देशों मे पूंजी प्रवाह होता है और इन्हे विकसित होने का अवसर प्राप्त होता है। 

 

SECTION-C/खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. of the following.

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe in detail the meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र का विस्तार सहित वर्णन कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं।

        इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

9. Evaluate the Von Thunen’s Agricultural Location theory.

वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धान्त का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर-   वॉन थ्यूनेन एक जर्मन अर्थशास्त्री थे जिन्होंने 1826 ई० में कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनका सिद्धांत “सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह सिद्धांत 198 वर्ष पूर्व दिया गया था, लेकिन इसकी चर्चा आज भी भूगोल में की जाती है। वर्तमान समय में कृषि का प्रारूप बदल गया है। इसके बावजूद भी इनका सिद्धांत आर्थिक भूगोल में मान्यता रखता है।

मान्यताएँ:-

        वॉन थ्यूनेन का कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत एक चिर सम्मतकालीन सिद्धांत (Classical theory) है जो निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है।

(1) भौगोलिक प्रदेश एकाकी (पृथक) होना चाहिए।

(2) भौगोलिक प्रदेश के बीच में एक केन्द्रीय बाजार होना चाहिए।

(3) इसकी भौगोलिक प्रदेश में सभी भौतिक परिस्थितियाँ (जैसे – स्थलाकृति, जलवायु, मृदा और वनस्पति) एक समान हो।

(4) केन्द्रीय बाजार की एकाकी भौगोलिक प्रदेश में क्रय-विक्रय का केन्द्र हो।

(5) केन्द्रीय बाजार निश्चित बाजार मूल्य पर क्रय-विक्रय का कार्य करता हो।

(6) सम्पूर्ण एकाकी प्रदेश में कृषि उत्पादन लागत एक समान हो, लेकिन दूरी के अनुसार परिवहन मूल्य में परिवर्तन होता हो।

(7) कृषकों को बाजार का पूर्ण ज्ञान हो।

(8) एकाकी भौगोलिक प्रदेश में घोड़ागाड़ी और नौका का प्रयोग परिवहन के रूप में किया जाता हो।

(9) दूरी और भार में वास्तविक वृद्धि के अनुसार परिवहन मूल्य में वृद्धि होता हो।

        ऊपर वर्णित मान्यताएँ जिन भौगोलिक प्रदेशों में लागू होती है वहीं वॉन थ्यूनेन के कृषि अवस्थिति सिद्धांत लागू होता है।

परिकल्पनाएँ:-

        वॉन थ्यूनेन ने निम्नलिखित दो प्रमुख परिकल्पनाओं का निर्धारण किया है।

(1) केन्द्रीय नगर से ज्यों-2 दूर जाते हैं त्यों-2 फसल विशेष की गहनता में क्रमिक रूप से कमी आती है।

(2) केन्द्रीय नगर से दूरी में ज्यों-2 वृद्धि होती है त्यों-2 भू-उपयोग प्रारूप में संकेन्द्रीय पेटी के रूप में परिवर्तन होता है।

सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत

       वॉन थ्यूनेन के अनुसार केन्द्रीय नगर के चारों तरफ कृषि भूमि उपयोग की 6 संकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास होता है। वॉन थ्यूनेन ने नगरों के चारों ओर विकसित सकेन्द्रीय वलय पेटियों को समझाने हेतु दो मॉडल प्रस्तुत किया है:-

(1) सैद्धांतिक मॉडल

(2) व्यवहारिक मॉडल

        सैद्धांतिक मॉडल पूर्णतः ज्यामितीय है जबकि व्यवहारिक मॉडल पूर्णतः संशोधित है। वॉन थ्यूनेन ने संशोधन के लिए दो करकों को जिम्मेदार ठहराया है।

(1) अधिकतर नगर नदी के किनारे होते हैं और नदी परिवहन प्रभाव के कारण सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ पूर्णतः गोल न होकर नदी प्रवाह की तरफ प्रक्षेपित हो जाती है।

(2) बड़े नगरों के बाहरी क्षेत्रों में भी छोटे केन्द्रीय बस्तियों का विकास हो जाता है जिसके कारण भी सकेन्द्रीय वलय पेटियाँ निरूपित हो जाती है।

        वॉन थ्यूनेन के द्वारा प्रस्तुत सैद्धांतिक मॉडल एवं व्यवहारिक मॉडल नीचे के चित्र में देखा जा सकता है-

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का सैद्धांतिक मॉडल

चित्र:- वॉन थ्यूनेन का व्यवहारिक मॉडल

         वॉन थ्यूनेन के अनुसार नगरों के चारों ओर निम्नलिखित सकेन्द्रीय वलय पेटी का विकास होता है:-

1. फल, सब्जी एवं दुग्ध 

2. ईंधन के लिए लकड़ी/वन

3. गहन खाद्यान कृषि

4. कृषि और पशुपालन

5. तीन खेती प्रणाली

6. पशुपालन (चारागाह)

        वॉन थ्यूनेन ने बताया कि नगर के तत्काल बाहर फल, सब्जी और दुग्ध की कृषि की जाती है क्योंकि ये दैनिक आवश्यकता की वस्तु है तथा शीघ्र विनष्ट होने की प्रवृ‌ति रखते हैं। अगर इसकी खेती नगरों से दूर किया जाता है तो वे बर्बाद हो सकते हैं।

      दूसरी पेटी में जलावन की लकड़ी या वन का विकास होता है क्योंकि यह कम मूल्य का भारी वस्तु है। अत: दूर से इसका परिवहन मंहगी होती है।

     तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल पेटी का विकास होता है क्योंकि फल, सब्जी, दुग्ध मिलने के बाद खाद्य फसल अनिवार्य वस्तु है। नगरों में खाद्यान्न की मांग बहुत अधिक होती है। इसलिए किसान तीसरी पेटी में खाद्यान्न फसल का विकास करते हैं।

       चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल, परती भूमि और पशुचारण साथ-2 की जाती है। चौथी पेटी में खाद्यान्न फसल की खेती गहनता से नहीं की जाती है क्योंकि एक ओर बाजार से जहाँ दूरी बढ़ जाती है वहीं खाद्यान्न फसलों की माँग में कमी आने लगती है। चौथी पेटी में निवास करने वाले किसान समय-समय पर परती भूमि को छोड़‌ते रहते हैं तथा पशुचारे की कृषि भी करते हैं।

     पाँचवी पेटी में कृषि भूमि का तीन भागों में विभाजन होता है। इसलिए इस पेटी को तीन कृषि पद्धति वाली पेटी कहते हैं। 5वीं पेटी का किसान अपने कुल भूमि के 1/3 भाग पर खाद्यान्न के उत्पादन, 1/3 भूमि पर पशुपालन और शेष 1/3 भूमि परती भूमि के रूप में उपयोग करता है। कृषि भूमि का यह विभाजन फसल चक्र के नियम पर आधारित होता है अर्थात इस पेटी के किसान अपने भूमि पर लगातार 2-3 वर्षों तक कृषि करते है। उसके बाद उसे परती भूमि के रूप में छोड़ देते हैं।

       छठी पेटी में पशुपालन का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है क्योंकि छठी पेटी में जनसंख्या का दबाव बहुत कम होता है और नगर से दूरी बहुत अधिक होती है। किसानों के पास अधिक भूमि रहने के कारण पशुपालन को प्रमुखता प्रदान करते हैं।

सकेन्द्रीय वलय पेटी के निर्धारण की विधि

      वॉन थ्यूनेन महोदय ने एक ग्राफ के माध्यम से सकेन्द्रीय वलय पेटियों का निर्धारण किया है। उन्होंने परिकल्पना में कहा है कि नगर से बढ़ती दूरी के साथ-साथ फसलों की गहनता में कमी आते-जाती है। अतः वह बिन्दु जहाँ आर्थिक लगान किसी भी अन्य फसल की तुलना में अधिक होता है वही बिन्दु उस सकेन्द्रीय वलय पेटी की अंतिम सीमा होती है। इसे नीचे के ग्राफ से समझा जा सकता है।

MAJOR CORE COURSE

आलोचनात्मक मूल्यांकन

         वर्तमान समय में कृषि तकनीक का विकास नगरीकरण में वृद्धि और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने के बावजूद वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं हुआ है।

        1925 में जॉनसन महोदय ने स्टॉकहोम (स्वीडेन) को केन्द्र मानकर और 1932 ई० में बाल्केनबर्ग महोदय ने नगर में उ०-पश्चिमी यूरोप को एक केन्द्र मानकर इनके सिद्धांत को पुष्ट किया। दोनों ने अपने अध्ययन में बताया है कि वॉन थ्यूनेन के मुताबिक ही यहाँ सकेन्द्रीय पेटियों का विकास हुआ है।

          इन पेटियों में थोड़ा बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। जैसे:- पहली पेटी में आज भी दुग्ध और सब्जी की खेती होती है। दूसरी पेटी में खाद्यान्न फसल, तीसरी पेटी में पशुपालन और चौथी पेटी में वानिकी का कार्य होता है। इस परिवर्तन का कारण बताते हुए कहा है कि जीवाश्म ऊर्जा के विकास के कारण ईंधन की लकड़ी का महत्त्व घट गया है, इसलिए यह पेटी अब खिसकर बाहरी क्षेत्र में चला गया है।

भारत के संदर्भ में वॉन थ्यूनेन की कृषि स्थानीयकरण सिद्धांत

        कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी इनके मॉडल का अध्ययन किया है। 1972 ई० में भी प्रोमिला कुमार ने भोपाल नगर के संदर्भ में इसका अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन सिद्धांत के अनुरूप ही सकेन्द्रीय वलय पेटियों का विकास हुआ है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के अली मुहम्मद सहित कई लोगों ने UP नगरों के संदर्भ में, जशबीर सिंह (हरियाणा) के संदर्भ में, BL शर्मा (राजस्थान) के संदर्भ में इस मॉडल का अध्ययन किया और पाया कि वॉन थ्यूनेन के सिद्धांत के अनुसार ही प्रथम पेटी और तीसरी पेटी का विकास हुआ है लेकिन दूसरी पेटी खिसककर बाहर चला गया है।

      सैद्धांतिक तौर पर इनका सिद्धांत एक आदर्शवादी सिद्धांत प्रतीत होता है। लेकिन इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों पर की जाती है।

आलोचना

(1) वॉन थ्यूनेन ने अपनी संकल्पना (मान्यता) में एकाकी प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत किया है जो गलत है क्योंकि कोई भी प्रदेश वर्तमान समय में एकाकी प्रदेश नहीं रह सकता।

(2) किसी भी प्रदेश में केन्द्रीय नगर ही खरीद-बिक्री का एकमात्र केन्द्र नहीं हो सकता।

(3) भौगोलिक कारकों में समरूपता असंभव है।

(4) बाजार से बढ़ती दूरी के अनुसार वस्तुओं का मूल्य एक समान वृद्धि होना असंभव है।

(5) वर्तमान समय में आधु‌निक परिवहन के साधन विकसित हो चुके हैं। इसलिए नाव एवं घोड़ागाड़ी अव्यवहारिक हो चुका है।

(6) वॉन थ्यूनेन ने कहा है कि फल एवं सब्जी पेटी का विकास नगर के ठीक बाहरी क्षेत्रों में होता है। लेकिन वर्तमान समय में नगर से हजारों किमी० दूर फल, सब्जी एवं दुग्ध की कृषि की जा रही है और नगरों में आपूर्ति की जाती है। जैसे:- अमेरिका के झील प्रदेश में कैलिफोर्निया तथा फ्लोरिडा राज्य से फल एवं सब्जी की आपूर्ति की जाती है।

(7) वॉन थ्यूनेन के अनुसार दूसरी पेटी में ईधन लकड़ी की खेती की जाती है। लेकिन व्यवहारिक रूप में यह पेटी कहीं नहीं पायी जाती।

(8) वॉन थ्यूनेन के अनुसार व्यवहारिक सिद्धांत मॉडल में दो कारणों से संसोधन होता है- (i) नदी एवं (ii) छोटे नगर के कारण। लेकिन वर्तमान समय में उपजाऊ भूमि, नवीन तकनीक, रेल एवं सड़‌क परिवहन इत्यादि भी सकेन्द्रीय वलय पेटी में संशोधन लाते हैं।

निष्कर्ष

    अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान समय के संदर्भ में इस सिद्धांत में कई त्रुटियाँ है। इन त्रुटियों के बावजूद कृषि स्थानीयकरण के संबंध में प्रस्तुत किया गया यह पहला सिद्धांत था, इसीलिए यह आज भी मान्यता रखता है।

10 Discuss the major oceanic routes of the world.

विश्व के प्रमुख सामुद्रिक मार्गों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- जहां पहले महासागरों या समुद्रो को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों को अलग करने वाले अवरोध (barrier) के रूप में जाना जाता था,  वही अब उनको क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण कड़ी समझा जाता है। आज महासागार परिवहन के प्राचीनतम और सबसे सस्ते एवं महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक साधन हैं। मानव के लिए महासागर प्रकृति द्वारा दिए गए ऐसे उपहार हैं जिनको यातायात (transportation) के रूप में प्रयोग करने पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता और न ही सड़कों, रेलमार्गों तथा नहरों की भाँति उनका रख-रखाव करना पड़ता है।

इसके अतिरिक्त इसका उपयोग करने में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा की आवश्यकता पहोती है। तथा समुद्री मार्ग में स्थलीय तथा अन्तर्देशीय जलमार्गों (inland waterways) की तरह विभिन्न प्रकार की बाधाओं का सामना भी नहीं करना पड़ता है। सबसे  महत्वपूर्ण बात यह है कि महासागर तथा समुद्र बने-बनाये विश्व-मार्ग हैं, जिन पर किसी राष्ट्र विशेष का अधिकार नहीं होता और ये सभी राष्ट्रों द्वारा प्रयोग किए जा सकते हैं। इसलिए प्रमुख मार्गों के रूप में महासागर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं।

प्राचीनकाल में जहां पालदार जहाजों (sailing ships) के द्वारा व्यापार किया जाता था, वहीं वर्तमान समय में शक्तिशाली इंजनों से चलाए जाने वाले विशाल यात्री जहाज़ और माल वाहक जहाज़ों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बहुत बढ़ावा दिया है। आधुनिक जलयानों की सबसे खास बात यह है कि वे यातायात के अन्य साधनों की अपेक्षा कहीं अधिक सामान ढोते हैं और लम्बी दूरियो तक सामान ढोने का किराया भी बहुत कम होता है।

आजकल तो समुद्री जहाजों में प्रशीतन प्रणाली (refrigeration system) के प्रयोग से नाशवान् (perishable) वस्तुओं-जैसे माँस, फल, मछली, सब्जी, और दूध से बने सामान आदि  के व्यापार में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। बड़े टैंकर वाले समुद्री जहाज तो पेट्रोलियम की विशाल  मात्रा ढ़ोते हैं।

यदि संसार के विभिन्न महासागरीय मार्गों की बात करें तो ये मार्ग विभिन्न प्रकार के कारकों पर आधारित होते हैं। जैसे: दो स्थानों के बीच आने वाले स्टेशनों पर ईंधन की आपूर्ति की व्यवस्था, जहाज पर ले जाए जाने वाले पदार्थ का वजन, रास्ते में हिमशैलों (icebergs)  की उपस्थिति, कोहरा, तूफान, तथा समुद्री जल धाराएं आदि।

        विश्व का अधिकतर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार निम्नलिखित समुद्री मार्गों के द्वारा किया जाता है:-

1. उत्तर अटलांटिक मार्ग (North Atlantic route)

2. भूमध्यसागरीय – हिंद महासागरीय मार्ग (Mediterranean – Indian ocean route)

3. केप ऑफ गुड होप अर्थात् उत्तम आशा अन्तरीप मार्ग (Cape of Good-Hope route)

4. दक्षिणी अटलांटिक मार्ग (South Atlantic route)

5. कैरीबियन सागर व्यापारिक मार्ग (Caribbean sea trade route)

6. प्रशान्त महासागरीय मार्ग (Pacific oceanic route)

7. स्वेज नहर मार्ग (Suez Canal Route)

8. पनामा नहर मार्ग (Suez Canal Route)

1. उत्तर अटलांटिक मार्ग (North Atlantic route):-

       यह  विश्व का सबसे अधिक व्यस्ततम महासागरीय मार्ग है, जो पश्चिमी यूरोपीय देशों तथा उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित है। इस महासागरीय मार्ग के दोनों ओर विश्व के प्रमुख औद्योगिक उन्नति वाले देश, यूरोप के पश्चिमी देश तथा संयुक्त राज्य अमेरिका एवं पूर्वी कनाडा स्थित है। इनके बीच व्यापार के अंतर्गत खाद्य पदार्थों, कच्चे मालों तथा उत्पादित सामग्री की मात्रा विश्व के अन्य सभी महासागरीय मार्गो की अपेक्षा अधिक रहती है।

      पूरे विश्व के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 1/4 भाग इसी मार्ग के द्वारा होता है। इस मार्ग पर सबसे पहले 1938 में स्टीमर जलपोत शुरू हुआ था। तब से लेकर आज तक यहां परिवहन का इतना विकास हुआ है कि अब तक लगभग 300 कंपनियों को जलपोत इस मार्ग पर चलने लगे हैं।

पश्चिमी यूरोप के मुख्य बंदरगाह (अटलांटिक महासागर का पूर्वी तट):  लंदन, लिवरपूल, हैम्बर्ग, ब्रजेन, रॉटरडम एमस्टरडम, दी हेग, रोम, नेपिल्स आदि।

उत्तरी अमेरिका व कनाडा की बंदरगाह (अटलांटिक महासागर पश्चिमी तट):  उत्तरी अमेरिका में हेलीफ़ेक्स, न्यूयार्क, बोस्टन, फिलाडेलफिया, बाल्टीमोर, गेलवेस्टन, चार्ल्सटन, न्यूआर्लियन्स, हाउसटन और कनाडा का क्वेबेक आदि।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

कनाडा से गेहूँ, जौ, मछली, नर्म लकड़ी, काष्ठ मण्ड, कागज, ऐलुमिनियम, ताँबा, टिटेनियम, जस्ता, एस्बेस्टस, पारा, पोटाश, प्लेटिनम, चाँदी और यूरेनियम का निर्यात होता है। 

संयुक्त राज्य अमेरिका से गेहूँ, कपास, रूई, कोयला, पेट्रोलियम, सोयाबीन, तेल, मशीनरी, कृषि यन्त्र, साइन्स के सामान, मोटरकार, वस्त्र, आदि का निर्यात होता है। 

यूरोप से मशीनें, वस्त्र, साइन्स का सामान, आदि का निर्यात होता है।

2. भूमध्यसागरीय – हिंद महासागरीय मार्ग (Mediterranean – Indian ocean route)

       यह विश्व का सबसे अधिक लम्बा महासागरीय व्यापारिक मार्ग है, जो विश्व के मध्य सागर(भूमध्यसागर) से होकर जाता है और विश्व के सबसे बड़े स्थल भाग तथा विश्व की अधिकतम जनसंख्या (3/4 जनसंख्या) की सेवा करता है। यह मार्ग यूरोपीय और अमेरिकन पश्चिमी सभ्यता को भारत, चीन और जापान की पूर्वी सभ्यता से जोड़ता है।

      यह मार्ग पश्चिमी यूरोप से भूमध्यसागर होकर स्वेज़ नहर और लाल सागर को पार करता हुआ, हिन्द महासागर में पूर्वी अफ्रीका, दक्षिणी एशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को चला जाता है। इसी मार्ग की एक शाखा पूर्वी एशिया में चीन, जापान को जाती है।

भूमध्यसागर सागर तट के प्रमुख बंदरगाह – लेनिनग्राद, हेम्बर्ग, एम्स्टर्डम रोडरड्म, लन्दन, साउथेम्पटन, लिवरपूल, लोहेवर, लिस्बन, मार्सेली, जेनोआ, रोम, नेपुल्स, ओदेसा, पोर्ट सईद, आदि।

हिंद महासागर प्रमुख बंदरगाह – मुम्बई, कोलम्बो, सिंगापुर, पर्थ, एडिलेड, सिडनी तथा अफ्रीका के मोम्बासा, जेन्जीबार, डरबन, आदि हैं। सिंगापुर से एक शाखा हाँगकाँग, सिडनी, जापान और फिलिपीन्स को चली जाती है।

3. केप ऑफ गुड होप अर्थात् उत्तम आशा अन्तरीप मार्ग (Cape of Good-Hope route)

      यह  महासागरीय मार्ग उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट और पश्चिमी यूरोपीय देशों को अफ्रीका, दक्षिणी एशिया, पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया से जोड़ता है। स्वेज़ नहर के बन जाने से इस मार्ग का महत्व पहले से कम हो गया है।

पश्चिमी यूरोप से जहाज़ केप वर्डे द्वीपों के पास से होते हुये बृहत्-वृत्त (great circle) द्वारा अफ्रीका के दक्षिण में केप ऑफ गुड होप पहुँचते हैं। वहाँ केप टाउन बन्दरगाह है। केप टाउन बन्दरगाह से इण्डोनेशिया जाने वाले समुद्री जहाज़ बृहत् वृत्त मार्ग से जाते हैं, परन्तु केप टाउन से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का मार्ग बृहत्-वृत्त से कुछ उत्तर में है, ताकि जहाज़ों के मार्ग में तूफान और हिम खण्ड न आयें। रास्ते में समुद्री जहाज़ों के ईंधन लेने के लिए केपटाउन, पोर्ट एलिज़ाबेथ, ऐडिलेड, मेलबोर्न, सिडनी, आदि बन्दरगाह हैं।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

       दक्षिणी-पूर्वी एशिया से रबर, टिन, पेट्रोलियम, खाद्य पदार्थ, चीनी, कॉफी, नारियल, मसाले ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से ऊन, डेयरी के पदार्थ, खालें तथा, अन्य कच्चे माल जाते हैं। इनके बदले में निर्मित सामग्री आती है।

      अफ्रीका से ताड़ का तेल, आइवरी नट्स, फल, गोंद, मोहेर ऊन, खालें, मक्का, कॉफी, कोको, चीनी, माँस, आदि पदार्थ भेजे जाते हैं। दक्षिणी अफ्रीका के निर्यातों में सोना,कुछ लोह-मिश्र धातुयें का निर्यात होता है। तथा अलोह धातुएँ ताँबा, जस्ता, आदि का निर्यात होता है।

       पूर्वी अफ्रीका से रूई, कॉफी, तम्बाकू और तिलहन का निर्यात होता है। पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका से जो माल अफ्रीका को आता है, उसमें औद्योगिक मशीनरी, खनन मशीनरी, खोदने और रचना करने की मशीनें, कृषि के उपकरण, परिवहन की गाड़ियाँ, रासायनिक पदार्थ, स्वर का सामान, पेट्रोलियम के उत्पादन और बिजली के सामान होते हैं।

4. दक्षिणी अटलांटिक मार्ग (South Atlantic route)

      दक्षिणी अमेरिका में अमेजन बेसिन के  सघन वनों से, ब्राजील के पठार व पेटागोनिया की विस्तृत चरागाहों से, पम्पास के उपजाऊ कृषि प्रदेशसे, और एण्डीज के खनिज भण्डारों से विभन्न उत्पादों को पश्चिमी यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के बृहत् बाजरोंर में निर्यात किया जाता है।

दक्षिणी अटलांटिक मार्ग के प्रमुख बंदरगाह

दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट के बन्दरगाह मोण्टेविडियो और रायो-डि-जेनेरो, सेन्टोस, ब्यूनस आयर्स हैं।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

अर्जेंटीना, ब्राजील और यूरुग्वे से विशाल मात्राओं में गेंहू, मक्का, हिमीभूत माँस, ऊन, चमड़ा और खालें निर्यात होती हैं। कॉफी, चीनी, वनस्पति तेल, चर्वियाँ, मोम, चूर्म शोधक टेनिंग पदार्थ, कपास (रुई), तम्बाकू, उष्ण कटिबन्धीय और उपोष्ण कटिबन्धीय लकड़ी भी निर्यात होती है।

लौह-अयस्क मैंगनीज, क्रोमियम, टंगस्टन, बॉक्साइट, अभ्रक, आदि खनिजों का निर्यात भी बड़ी मात्राओं होता है।

उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप से लौटते हुए जहाजों में लौह-इस्पात, रेलवे-इंजन, रेलवे-वैगन, औद्योगिक मशीनरी, मोटर ट्रक, कार, रासायनिक पदार्थ, वस्त्र तथा अन्य निर्मित सामग्री आते हैं।

पेटागोनिया से ब्यूनस आयर्स को पेट्रोलियम आता है। मध्य अर्जेंटीना से पूर्वी ब्राजील को गेहूँ, आटा, समशीतोष्ण फल और शराब का निर्यात होता है। ब्राजील से अर्जेंटीना को केला, कॉफी, लोह-अयस्क और लकड़ी का निर्यात होता है।

5. कैरीबियन सागर व्यापारिक मार्ग (Caribbean sea trade route)

      कैरीबियन सागर में स्थित पश्चिमी द्वीपसमूहों से तथा वेनेजुएला, गायना, सूरीनाम, आदि देशों से उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तटीय बन्दरगाहों और यूरोप को खाद्य-पदार्थों व खनिज पदार्थों का निर्यात होता है। इन द्वीपों और देशों से चीनी, चीनी का औद्योगिक शीरा, केला, कॉफी, कोको, नारियल, बीन्स, शीतकालीन तरकारियाँ, कठोर वनस्पति-रेशे, कपास, उष्ण कटिबन्धीय लकड़ी का निर्यात होता है। गन्धक, बॉक्साइट, पोटाश, नमक, फॉस्फेट शैल, पेट्रोलियम एवं लौह-अयस्क भी निर्यात होते हैं।

      अमेरिका और यूरोप से आयात किये जाने वाले माल में मुख्यतः खाद्य-पदार्थ, रासायनिक पदार्थ, कागज, वस्त्र, मशीनें और परिवहन गाड़ियाँ होती हैं। इस मार्ग का सम्बन्ध अमेरिका के बन्दरगाहों न्यू ओर्लियन्स, गेल्वेस्टन, हाउसटन, मोरिखविले, स्पेरोज पोइन्ट, फिलाडेलफिया, न्यूयार्क, आदि से है। यूरोप के बन्दरगाहों – लन्दन, लीहेवर, हेम्बर्ग, आदि से यह मार्ग सम्बन्धित है। 

       पनामा नहर का प्रयोग करके यह व्यापारिक मार्ग उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तटीय बन्दरगाहों, सेन फ्रांसिस्को, सीएटल और बैंकूवर से जुड़ा है, तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट से भी जुड़ा है।

6. प्रशान्त महासागरीय मार्ग (Pacific oceanic route)

        हालांकि प्रशान्त महासागर सबसे बड़ा महासागर है, जो पृथ्वी तल के 1/8 भाग पर फैला हुआ है, फिर भी इसमें व्यापारिक परिवहन की मात्रा बहुत कम है। इसके दो कारण हैं-

(i) विश्व के मुख्य औद्योगिक प्रदेश, यूरोप तथा अमेरिका अटलांटिक के तटों पर हैं,  प्रशान्त के तट पर केवल जापान एक ऐसा औद्योगिक उन्नति का देश है। 

(ii) पैसिफिक में कोई ऐसा द्वीप नहीं है जिसका व्यापारिक महत्व हो ।

उत्तरी प्रशान्त मार्ग, उत्तरी अमेरिका तट को एशिया के देशों से जोड़ता है। इसकी दो शाखायें हैं:

(i) एक शाखा – चीन-जापान से पश्चिमी अमेरिका तट को जाने के लिए एल्यूशियन द्वीपों के समीप बृहत्-वृत्त मार्ग का अनुसरण करती है। 

(ii) दूसरी शाखा हवाई द्वीप होकर जाती है, जो एशियाई देशों तथा ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड को जाती है। अमेरिकन बन्दरगाह लॉस ऐंजिलीस, सेन फ्रांसिस्को,सीएटल, पोर्टलैंड, बैंकूवर और प्रिंस रूपर्ट हैं। एशियाई बन्दरगाह टोकियो, योकोहामा, कोबे, ओसाका, शंघाई, टीन्टसिन और हाँगकाँग हैं।

निर्यात की जाने वाली वस्तुएं

पश्चिमी अमेरिकी तट से लकड़ी, काष्ठ मण्ड, कागज़, गेहूँ, रूई, पेट्रोलियम, रद्दी इस्पात (स्क्रेप), गन्धक, फॉस्फेट तथा निर्मित सामग्री का निर्यात होता है। चीन, जापान, फिलिपीन्स, आदि से नारियल, चीनी, मनीला-हैम्प (सन), चाय, डिब्बा बन्द मछली, वनस्पति तेल और सूती वस्त्र आते हैं। जापान ने इतनी औद्योगिक उन्नति की है कि अब जापानी बिजली का सामान, कैमरे, वस्त्र, सस्ती कारें और बृहत् जलपोत अमेरिका के बाजारों में बिकते हैं।

7. स्वेज नहर मार्ग (Suez Canal Route)

       स्वेज नहर एक मानव निर्मित अर्थात् कृत्रिम नहर है जो कि भूमध्य सागर और लाल सागर को आपस में जोड़ती है। यह नहर सम्पूर्ण विश्व के लिए एक छोटा व्यापारिक मार्ग उपलब्ध कराता है। इस नहर के बनने से यूरोप, एशियाई देशों, ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी अफ्रीकी देशों के बीच व्यापार में आशातीत प्रगति हुआ है।

स्वेज नहर

स्वेज नहर का निर्माण

     स्वेज नहर का निर्माण  सन 1859 ई० में एक फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डिनेंड ने शुरू किया था। इस नहर के बनने और शुरु होने में लगभग 10 वर्ष का समय लग गए थे। यातायात के लिए यह 1869 ई० में खोला गया। इस नहर के बनने में लगभग 1,20,000 मजदूर हैजा तथा अन्य बीमारियों से काल कवलित हो गए थे अर्थात यह नहर काफी अधिक त्याग और तपस्या से बनी थी।

स्वेज नहर की संरचना

     यह नहर की लम्बाई 168 किमी०, चौडाई 60 मीटर और गहराई 10 से 15 मीटर है। इस नहर के भूमध्य सागर वाले उत्तरी छोर पर पोर्ट सईद तथा लाल सागर वाले दक्षिणी छोर पर पोर्ट तौफीक, स्वेज और पोर्ट इब्राहीम स्थित है।

Suez Canal

स्वेज नहर से लाभ

     स्वेज नहर के पहले यूरोप से आने वाले जहाजों को उत्तमाशा अंतरीप का चक्कर लगाना पड़ता था जो कि काफी लंबी दूरी वाला जलमार्ग है। अब उन्हें सीधे भूमध्य सागर से होकर स्वेज नहर होते हुए लाल सागर में प्रवेश करना पड़ता है जो अपेक्षाकृत एक बेहद छोटा मार्ग है।

      स्वेज नहर मार्ग के कारण यूरोप से एशिया और पूर्वी अफ्रीका का सीधा मार्ग खुल गया है और इससे लगभग 6000 मील की दूरी की बचत होती है। इसके कारण अनेक देशों, पूर्वी अफ्रीका, ईरान, अरब, भारत, पाकिस्तान, सुदूर पूर्व एशिया के देशों ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के साथ व्यापार में बड़ी सुविधा हुई है और व्यापार काफी अधिक बढ़ गया है।

     इस नहर के बन जाने से यूरोप एवं सुदूर पूर्व के देशों के मध्य दूरी काफी कम हो गई है जैसे कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के साथ व्यापार में बड़ी सुविधा हुई है और व्यापार बहुत बढ़ गया है। इस नहर के बन जाने से यूरोप एवं सुदूर पूर्व के देशों के मध्य दूरी काफी कम हो जाती है जैसे कि लिवरपूल से मुंबई- 7250 किमी०, लिवरपूल से हांगकांग- 4500 किमी० तथा न्यूयार्क से मुंबई- 4500 किमी० की दूरी कम होने से एशियाई तथा यूरोपीय देशों के व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ हुए हैं।

स्वेज नहर से होने वाले व्यापार

    इस नहर के द्वारा फारस की खाड़ी के देशों से खनिज तेल भारत तथा अन्य एशियाई देशों से अभ्रक, लौह अयस्क, मैगनीज, चाय, कॉफी, जुट, रबड, कपास, ऊन, मसाले, चीनी, चमड़ा, खाल, सागवान की लकड़ी, सूती वस्त्र, हैंडीक्राफ्ट आदि पश्चिम यूरोपीय देशों तथा उत्तर अमेरिका को भेजी जाती हैं।

   यूरोपीय देशों तथा उत्तर अमेरिका आदि देशों से रासायनिक पदार्थ, इस्पात, मशीन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औषधियाँ, मोटर गाड़ियाँ, वैज्ञानिक उपकरणों आदि का आयात किया जाता है।

8. पनामा नहर मार्ग (Suez Canal Route)

      पनामा नहर एक कृत्रिम अर्थात् मानव निर्मित जलमार्ग है जो पनामा में स्थित है। यह नहर दो विशाल महासागर प्रशांत तथा अटलांटिक को जोड़ने का काम करती है। यह नहर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख जलमार्गों में से एक है।

   

पनामा नहर से लाभ

      अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच की दूरी इस नहर से होकर गुजरने पर तकरीबन 8,000 मील घट जाती है क्योंकि इसके ना होने की स्थिति में जलयानों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी छोर केप हॉर्न अंतरीप से होकर चक्कर लगाते हुए जाना पड़ता था। पनामा नहर को पार करने में जलयानों को 8 घंटे का समय लगता है।

     इस नहर के द्वारा समुद्री मार्ग से न्यूयॉर्क एवं सैन फ्रांसिस्को के मध्य लगभग 13000 किलोमीटर की दूरी कम हो गई है। इसी प्रकार पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट, उत्तर पूर्वी और मध्य संयुक्त राज्य अमेरिका और पूर्वी तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के मध्य की दूरी बेहद कम हो गई है।

Panama Canal

पनामा नहर के द्वारा व्यापार

     पनामा नहर जल मार्ग से होकर विश्व के लगभग 5% से अधिक जहाज गुजरते हैं। इस नहर द्वारा अमेरिका, कनाडा, पश्चिमी यूरोप, चीन, कोरिया, और दक्षिण अमेरिका के अन्य देशों की कंपनियों द्वारा ऑटोमोबाइल, खाद्य पदार्थ, वस्त्र, दवाइयाँ, रसायन, मशीनरी, कोयला, पेट्रोलियम आदि विभिन्न उत्पादों का परिवहन किया जाता है। इस नहर का अधिकतम उपयोग अमेरिकी जलयान करते हैं जो चीन, जापान, कोलंबिया तथा साउथ कोरिया को जाते हैं।

11. Explain the factors of localization of industry in a region.

किसी प्रदेश में उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- किसी भी उद्योग में लागत को कम करने तथा लाभ को बढ़ाने के लिए एक अनुकूल स्थान की आवश्यकता होती है। उ‌द्योगों की स्थापना को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं:

1. भौगोलिक कारक

2. आर्थिक कारक

3. राजनीतिक कारक

1. भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

         इसमें कच्चा माल, शक्ति, श्रम, परिवहन तथा संचार, बाजार, जलवायु, जल आपूर्ति तथा सस्ती भूमि शामिल है।

कच्चा माल (Access to Raw Material):-

       कोई भी उ‌द्योग कच्चे माल के द्वारा ही तैयार माल उत्पन्न करता है और यह कच्चे माल दो प्रकार के होते हैं: वजन ह्रास और बिना वजन ह्रास। सामान्यता उ‌द्योग उन्ही स्थानों पर लगाए जाते हैं अहां कच्चे माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, जैसे वन, कृषि क्षेत्र तथा समुद्र के निकट आदि। अधिकांश लौह इस्पात उ‌द्योग वहां स्थापित किया जाता है जहां लौह अयस्क और कोयला दोनों ही उपलब्ध हों क्योंकि दोनों वजन हास कच्चे माल है।

       इसी प्रकार निर्माण प्रक्रिया में जिस कच्चे माल का भार घटता है उसे वजन हासमान पदार्थ कहते हैं। कुछ वस्तुएं ऐसी भी होती है जिनके भार का हास नहीं होता, जैसे 1 टन सूत बनाने के लिए 1 टन रुई की आवश्यकता होती है। वजन हास उ‌द्योग है लौह इस्पात उ‌द्योग, गन्ने से चीनी बनाना, लकड़ी से लुग्दी, लुगदी से कागज, लेटेक्स से रबर आदि।

शक्ति (Access to source of Energy):-

       उ‌द्योगों के मशीनों को चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। ये शक्ति के सदन हैं: तापीय शक्ति, पेट्रोलियम ऊर्जा, विद्युत शक्ति, जल विद्युत शक्ति, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा आदि। अधिकांश उ‌द्योग शक्ति के साधनों के निकट ही स्थापित होते हैं।

श्रम (Access to Labour supply):-

       बिना श्रम के किसी भी उ‌द्योग की कल्पना नहीं की जा सकती है, हालांकि पहले यह पूर्णतः मानव श्रम पर आधारित था जबकि अब कंप्यूटर और मशीनों के आ जाने से मानव श्रम की कम जरुरत पड़ती है परंतु अब कुशल मानव श्रम की आवश्यकता बढ़ गई है।

परिवहन तथा संचार के साधन (Transport and communication):-

       कच्चे माल को कारखाना तक लाने और तैयार माल को कारखाना से बाजार भेजने या निर्यात के लिए परिवहन के विकसित साधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए अधिकांश उद्‌द्योग रेलवे लाइन या बंदरगाह के निकट स्थापित होते हैं। परिवहन के साथ ही संचार के साधन जैसे डाक, तार, टेलीफोन और इन्टरनेट व ईमेल इत्यादि सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्र गति से करते हैं जो सहायक सिद्ध होते हैं।

बाजार (Access to Market):-

      उद्योगों का मुख्य उ‌द्देश्य ही है कि तैयार माल को जरूरतमंदों के पास पहुंचाया जाए नहीं तो उत्पादन का खपत नहीं हो पायेगा। इसके लिए एक के अच्छे बाजार की आवश्यकता होती है। इसलिए अधिकांश उद्‌द्योग बाजार के निकट या फिर बाजार से करखाने तक परिवहन के सांधन अच्छा हो तो बाजार से थोड़ी दूर भी स्थापित हो सकता है।

जलवायु (Climate):-

         जलवायु उ‌द्योगों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बहुत उ‌द्योगों के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है और बहुत सारे उ‌द्योगों के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है।

जल (Availability of Water):-

      अधिकांश उ‌द्योग भारी मात्रा में जल का उपयोग करते हैं। इसलिए अधिकांश उ‌द्योग जल स्रोतों के निकट स्थापित होते हैं। जैसे टाटा का लौह इस्पात उ‌द्योग खरकई और स्वर्णरेखा नदियों से जल प्राप्त करता है।

भूमि (Availability of Cheap Land):-

       उ‌द्योगों को स्थापित करने के लिए विस्तृत भूमि की आवश्यकता होती है क्योंकि इसमें उत्पादन के लिए मशीन स्थापित करना, कच्चे माल रखने के लिए व्यवस्था करना, उत्पादित माल को सुरक्षित रखना तथा मजदूरों के रहने के लिए व्यवस्था करना आदि में बहुत ज्यादा भूमि की आवश्यकता होती है। इसलिए भूमि सस्ती होनी चाहिए।

2. आर्थिक कारक (Economic Factor)

       इसमें मुख्य रूप से पूंजी, बैंकिंग सुविधा तथा बीमा सुविधा आती है।

पूंजी (Capital Flow):-

     किसी भी उद्‌योग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है। कारखाना लगाने, कच्चे माल खरीदने, मजदूरों को वेतन देने से लेकर बाजार तक पहुंचाने के लिए एक बड़ी रकम की आवश्यकता होती है।

बैंकिंग सुविधा (Banking Facility):-

        कारखाना के लगातार विकास के लिए निरंतर बहुत ज्यादा पूंजी की आवश्यकता पड़ती रहती हैं और इसीलिए बैंक उन्हें ऋण सुविधा के द्वारा यह रकम देते रहते हैं, जिससे उद्‌द्योगों का विकास होता है।

बीमा सुविधा (Insurance Facility):-

       आजकल जीवन के हर क्षेत्र में बीमा एक जरूरत बन गई है। इसी प्रकार किसी उ‌द्योग के लिए भी यह बहुत बड़ी जरूरत बन गई है। भारी मशीनों का बीमा, भूमि का बीमा, कारखाना का बीमा, श्रमिकों का बीमा से लेकर हर चीज का बीमा आवश्यक हो गया है।

3. राजनैतिक कारक (Political Factors)

         इसके अंतर्गत सरकार की नीतियां और राजनैतिक स्थिरता आती है।

सरकार की नीतियाँ (Government Policies):-

         उ‌द्योग की स्थापना में सरकार की नीतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

जैसे यदि किसी देश में सरकार कारखानों का राष्ट्रीयकरण कर रही हो तो वहां पर उद्‌द्योगपति अपने उद्‌द्योग नहीं लगाएंगे इसके विपरीत यदि कहीं टैक्स में छूट दिया जा रहा है तो उ‌द्योगपति वहीं पर अपना कारखाना लगाने लगते हैं।

राजनैतिक स्थिरता (Political Stability):-

        कोई भी कारखाना वहीं स्थापित हो सकता है जहां राजनीतिक स्थिरता हो। युद्ध और अशांति की स्थिति में कोई भी उ‌द्योग विकास नहीं कर सकता।

उ‌द्योगों के बीच लिंक (Access to Agglomeration Economies):-

        कई उ‌द्योगों अपने आस-पास के किसी बड़े या अन्य उ‌द्योगों से लाभान्वित होते हैं। मैं Agglomeration Economies के रूप में जाने जाते हैं। उ‌द्योगों के बीच लिंक होने से बचत भी होती है।

      इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी भी उ‌द्योग के स्थापित होने में कई कारक काम करते है जहां पर उपरोक्त में से अधिकतम कारक मिल पाते हैं उ‌द्योगों की स्थापना नहीं होती है।

12. Clarify the role of World Tade Organization in terms of International Trade.

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के सन्दर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।

MINOR CORE COURSE (Theory- Economic Geography) Solved Questions Paper 2024

(MINOR CORE COURSE : MIC-3)

UG (Sem.-III) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

GEOGRAPHY

(Economic Geography)

Time: Three Hours]   [Maximum Marks: 70



Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव उत्तर अपने शब्दों में ही दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct options from the following questions. Each question carries 2 marks.[10×2=20]

निम्नलिखित प्रश्नों में से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) Which human activity is studied in Economic Geography?

(a) Social activities

(b) Economic activities

(c) Political activities

(d) Biological activities

आर्थिक भूगोल में मानव की किन क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है?

(a) सामाजिक क्रियाएँ

(b) आर्थिक क्रियाएँ

(c) राजनैतिक क्रियाएँ

(d) जैविक क्रियाएँ

उत्तर – (b) आर्थिक क्रियाएँ

(ii) Agricultural Occupation is of which group?

(a) Primary

(b) Secondary

(c) Tertiary

(d) Quarternary

कृषि व्यवसाय किस वर्ग का है?

(a) प्राथमिक

(b) द्वितीयक

(c) तृतीयक

(d) चतुर्थक

उत्तर – (a) प्राथमिक

(iii) Economic Geography is a part of which branch of Geography?

(a) Population Geography

(b) Agricultural Geography

(c) Human Geography

(d) Transport Geography

आर्थिक भूगोल, भूगोल विषय के किस शाखा से सम्बन्धित है?

(a) जनसंख्या भूगोल

(b) कृषि भूगोल

(c) मानव भूगोल

(d) परिवहन भूगोल

उत्तर – (c) मानव भूगोल

(iv) Hunting and gathering is an important occupation of which area?

(a) Hot desert

(b) Cold desert

(c) Tropical Rain forest

(d) Temperate grassland

शिकार एवं संग्रह किस क्षेत्र का प्रमुख व्यवसाय है?

(a) गर्म मरूस्थल

(b) शीत मरूस्थल

(c) ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वन

(d) शीतोष्ण घास प्रदेश

उत्तर – (c) ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वन

(v) Which of the following falls under the secondary occupation?

(a) Cottage industry

(b) Transport

(c) Mining

(d) Fishing

निम्नलिखित में से कौन द्वितीयक व्यवसाय की श्रेणी में आता है?

(a) कुटीर उद्योग

(b) परिवहन

(c) खनन

(d) मत्स्य पालन

उत्तर – (a) कुटीर उद्योग

(vi) Which of the following does not fall under Intensive subsistence rice cultivation?

(a) South-East Asia

(b) Southern China and Japan

(c) Nile Valley and Delta

(d) Coastal and Delta areas of India

निम्नलिखित में कौन-सा गहन निर्वाह धान कृषि के अन्तर्गत नहीं आता है?

(a) दक्षिण-पूर्व एशिया

(b) दक्षिणी चीन एवं जापान

(c) नील नदी घाटी एवं डेल्टा

(d) भारत का तटीय एवं डेल्टा क्षेत्र

उत्तर – (c) नील नदी घाटी एवं डेल्टा

(vii) Rubber plantation is a type of:

(a) Commercial farming

(b) Intensive farming

(c) Subsistence farming

(d) None of the above

रबर पेड़ का बागान एक प्रकार की….है।

(a) व्यावसायिक कृषि

(b) गहन कृषि

(c) जीवन निर्वाह कृषि

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर – (a) व्यावसायिक कृषि

(viii) Most important factor for cotton textile industry is:

(a) Raw material

(b) Power resources

(c) Cheap labour

(d) All of the above

सूती वस्त्र उद्योग के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है:

(a) कच्चा माल

(b) शक्ति के संसाधन

(c) सस्ता श्रम

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर – (d) उपरोक्त सभी

(ix) Trade between two countries is known as:

(a) Inter country trade

(b) External trade

(c) Bilateral trade

(d) International trade

दो देशों के मध्य व्यापार कहलाता है:

(a) अन्तर्देशीय व्यापार

(b) बाह्य व्यापार

(c) द्विपक्षीय व्यापार

(d) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

उत्तर – (c) द्विपक्षीय व्यापार

(x) When was World Trade Organisation established?

(a) 1948

(b) 1995

(c) 1998

(d) 2000

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब हुई?

(a) 1948

(b) 1995

(c) 1998

(d) 2000

उत्तर – (b) 1995

PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions from the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. Define Economic Geography.

आर्थिक भूगोल को परिभाषित कीजिए।

3. Write a short note on tertiary occupation.

तृतीयक व्यवसाय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

4. What is Subsistence Agriculture?

जीवन निर्वाह कृषि क्या है?

5. Discuss the important factors for the establishment of Iron and Steel Industry.

लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

6. What is meant by International Trade?

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से क्या आशय है?

7. Write the types of special economic zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र के प्रकार लिखिए।

PART-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions from the following. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Explain meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के अर्थ एवं उद्देश्य का वर्णन कीजिये।

9. Discuss different types of Economic activities.

विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों की चर्चा कीजिए।

10. Analyse the distributional pattern of Cotton textile industry in China or India.

चीन या भारत में सूती वस्त्र उद्योग के वितरण प्रतिरूप की विवेचना कीजिए।

11. Briefly discuss the role of WTO in terms of International trade.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

12. What do you mean by Special Economic Zone?

Describe in brief the special economic zones in the important countries of world.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? विश्व के प्रमुख देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिये।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



PART-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions from the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. Define Economic Geography.

आर्थिक भूगोल को परिभाषित कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

3. Write a short note on tertiary occupation.

तृतीयक व्यवसाय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर-  तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. What is Subsistence Agriculture?

जीवन निर्वाह कृषि क्या है?

उत्तर- इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीवन निर्वाह कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीवन निर्वाह कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीवन निर्वाह कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

5. Discuss the important factors for the establishment of Iron and Steel Industry.

लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण कारकों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- भारत मे लौह तथा इस्पात उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक:

(i) कच्चा माल:- अधिकांश विशाल एकीकृत इस्पात संयंत्र कच्चे माल के स्रोतों के निकट स्थित हैं, क्योंकि इनमें भारी तथा वज़न में क्षरणीकृत कच्चे माल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। उदाहरण के लिये, छोटा नागपुर क्षेत्र में लौह तथा इस्पात उद्योग का संघनन इसलिये अधिक है क्योंकि वहाँ लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। जमशेदपुर स्थित टिस्को संयंत्र को कोयला झरिया की खदानों से और लौह अयस्क, चूना पत्थर, डोलोमाइट तथा मैंगनीज़ की आपूर्ति ओडिशा व छत्तीसगढ़ से होती है।

(ii) बाज़ार:- चूँकि लौह तथा इस्पात से बने उत्पाद भारी और बड़े होते हैं इसलिये इनकी परिवहन लागत अधिक होती है। अतः बाज़ार से निकटता बेहद अहम है, विशेषकर छोटे इस्पात संयंत्रों के लिये तो यह बेहद ज़रूरी है, ताकि परिवहन को न्यूनतम किया जा सके। जमशेदपुर का टिस्को कोलकाता के निकट है, जो एक बड़ा बाज़ार उपलब्ध कराता है। विशाखापत्तनम का इस्पात संयंत्र तटीय क्षेत्र में स्थित है, जहाँ आयात-निर्यात की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

(iii) श्रम:- सस्ते श्रम की उपलब्धता भी महत्त्वपूर्ण है। छोटा नागपुर क्षेत्र के अधिकांश संयंत्रों को इस क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में सस्ता श्रम उपलब्ध होता है।
शीतलन के लिये पानी की उपलब्धता: उदाहरण के लिये- दामोदर नदी के किनारे बोकारो इस्पात संयंत्र, भद्रावती कर्नाटक में विशेश्वर्या इस्पात संयंत्र, भद्रा नदी के समीप भद्रावती (कर्नाटक) में विशेश्वर्या इस्पात संयंत्र, आदि।

(iv) औद्योगिक नगरों से समीपता:- छोटे इस्पात संयंत्रों, जो उत्पादक सामग्री के रूप में स्क्रैप धातुओं का उपयोग करते हैं, के लिये अपशिष्ट धातुओं के पुनर्चक्रण की आवश्यकता होती है। ऐसे संयंत्र ज़्यादातर औद्योगिक नगरों के समीप अवस्थित होते हैं,जैसे – महाराष्ट्र के इस्पात संयंत्र।

(v) सरकारी नीतियाँ:- सरकार उद्योगों को पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित करने के लिये प्रोत्साहित करती है। यह उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने के लिये सब्सिडी, कर में छूट और पूँजी प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात संयंत्र को क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने के लिये स्थापित किया गया था।

(vi) विद्युत:- विद्युत की उपलब्धता उद्योगों की अवस्थिति का एक अन्य निर्धारक है। टिस्को और बोकारो इस्पात संयंत्र को दामोदर घाटी निगम (DVC) से जलविद्युत की प्राप्ति होती है। भिलाई संयंत्र को कोरबा तापीय स्टेशन से ऊर्जा प्राप्त होती है।

(vii) परिवहन:- कच्चे माल की उपलब्धता वाले स्थानों, बाज़ारों और बंदरगाहों से संपर्क एक अन्य कारक है। टिस्को कोलकाता, मुंबई और चेन्नई के साथ रेलवे के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दुर्गापुर संयंत्र के पास दुर्गापुर से हुगली और कोलकाता बंदरगाह के लिये नौगम्य नहर की सुविधा मौजूद है।

6. What is meant by International Trade?

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से क्या आशय है?

उत्तर- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान या व्यापार के रूप में संदर्भित किया जाता है। इस तरह का व्यापार विश्व अर्थव्यवस्था में योगदान देता है और उसे बढ़ाता है। सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली वस्तुएँ टेलीविज़न सेट, कपड़े, मशीनरी, पूंजीगत सामान, भोजन, कच्चा माल आदि हैं।

       अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में असाधारण वृद्धि हुई है, जिसमें विदेशी परिवहन, यात्रा और पर्यटन, बैंकिंग, भंडारण, संचार, वितरण और विज्ञापन जैसी सेवाएँ शामिल हैं। अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण विकास विदेशी निवेश में वृद्धि और एक अंतरराष्ट्रीय देश में विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन है।

     ये विदेशी निवेश और उत्पादन कम्पनियों को अपने अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के करीब आने में मदद करते हैं, जिससे उन्हें बहुत कम दर पर वस्तुएं और सेवाएं उपलब्ध होती हैं।

     उपरोक्त सभी गतिविधियाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अंग हैं। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उत्पादन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के दो पहलू हैं, जो दुनिया भर में दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं।

7. Write the types of special economic zone.

विशेष आर्थिक क्षेत्र के प्रकार लिखिए।

उत्तर-  विशेष आर्थिक क्षेत्र के प्रमुख प्रकार हैं:-

(i) मुक्त-व्यापार क्षेत्र (FTZ)
(ii) निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (EPZ)
(iii) मुक्त क्षेत्र/मुक्त आर्थिक क्षेत्र (FZ/FEZ)
(iv) औद्योगिक पार्क/औद्योगिक एस्टेट (IE)
(v) नि:शुल्क बंदरगाहों
(vi) बंधुआ रसद पार्क (बीएलपी)
(vii) शहरी उद्यम क्षेत्र

PART-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions from the following. [3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्त दीजिए।

8. Explain meaning and scope of Economic Geography.

आर्थिक भूगोल के अर्थ एवं उद्देश्य का वर्णन कीजिये।

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

9. Discuss different types of Economic activities.

विभिन्न प्रकार के आर्थिक क्रियाकलापों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचा अधिक महत्वपूर्ण है।

10. Analyse the distributional pattern of Cotton textile industry in China or India.

चीन या भारत में सूती वस्त्र उद्योग के वितरण प्रतिरूप की विवेचना कीजिए।

उत्तर-

सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है। यह भारत का सबसे बड़ा रुग्ण उद्योग भी है। भारत में सर्वाधिक कर्मचारी इसी उद्योग में संलग्न है। भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक देश हुआ करता था। लेकिन, इंगलैण्ड में हुए औद्योगिक क्रांति के कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को प्रायोजित तरीके से पीछे कर दिया गया।

विकास / वृद्धि

    सूती वस्त्र उद्योग यद्यपि भारत का सबसे प्राचीन उद्योग है। फिर इसका आधुनिक कारखाना 1818 ई० में कलकता के ‘फोर्ट ग्लोस्टर’ नामक स्थान पर लगाया गया था। लेकिन कच्चे माल के अभाव में असफल रहा। पुनः सफल सूती वस्त्र का कारखाना 1850 ई० में कलकत्ता में स्थापित किया गया। इस सफल प्रयास के बाद इस उद्योग का विकास सतत् जारी है। 

      1905 ई० तक भारत में 206 सूती वस्त्र के मील स्थापित हो चुके थे। 1958ई० तक भारत में मीलों की संख्या 1767 पहुंच गयी थी। वर्तमान समय में इसकी संख्या बढ़कर 2000 से भी अधिक हो चुकी है।

स्थानीयकरण

      बेवर ने अपने न्यूनतम परिवहन लागत सिद्धांत में बताया कि सूती वस्त्र उद्योग शुद्ध कच्चा माल पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम जितना कच्चा माल लगाते है उतने ही मात्रा में शुद्ध उत्पाद प्राप्त करते है। ऐसे उद्योगों को समभार उद्योग कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्योगों का स्थानीकरण कच्चे माल वाले क्षेत्रों में, बाजार में या दोनों स्थानों पर हो सकता है। जैसे- मुम्बई के आसपास इस उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र के काली मिट्टी की भूमि पर बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है।

      पुनः इस उद्योग का स्थानीयकरण कोलकाता के आस-पास हुआ है जबकि पूरे पश्चिम बंगाल में कपास की खेती कहीं नहीं की जाती है। अतः कलकत्ता के आस-पास सूती वस्त्र उद्योग विकास बाजार के कारण हुआ है।

विकास के विभिन्न चरण या नवीन प्रवृति या वितरण

    भारत उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाला देश है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में सदैव सूती वस्त्र की माँग होती रही है। प्रारंभ में इसके विकास में केन्द्रीयकरण की प्रवृति थी। कालान्तर में यह विकेन्द्रीकृत उद्योग बना। केन्द्रीयकरण से विकेन्द्रीकृत उद्योग बनने में काफी लम्बा समय लगा है। इस समय को चार चरण में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

प्रथम चरण:-

    प्रथम चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास केवल मुम्बई महानगर में हुआ। यहाँ पर इस उद्योग के स्थानीयकरण के चार कारक महत्त्वपूर्ण थे। जैसे-

(1) मुम्बई भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह रहा है।

  • कपास निर्यात करने के लिए यहाँ लाये जाते थे।
  • कपास के व्यापारी मुम्बई में ही रहा करते थे। उनके पास पूँजी और तकनीक पहले से मौजूद थी।
  • पुनः मुम्बई की आर्द्र जलवालु सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती थी।

     यही कारण था कि मुम्बई द्वीप पर सूटी वस्त्र उद्योग का प्रथम विकास हुआ।

(2) चीन में विकसित हो रहे सूती वस्त्र उद्योग में धागा आपूर्ति करने का कार्य ब्रिटिश कंपनियाँ किया करती थी। जब ब्रिटिश कंपनियाँ चीन को पर्याप्त मात्रा में धागा आपूर्ति करने में असफल होने लगी तो उन्होंने भारतीय व्यापारियों के इस क्षेत्र में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) मुम्बई महानगर में वाणिज्यिक ऊर्जा की कमी थी लेकिन द० अफ्रीका से आयातित कोयला पर मुम्बई के पास तापीय विद्युत केन्द्र की स्थापना की गई तो सुचारू रूप से विद्युत की आपूर्ति होने लगी।

(4) सस्ते श्रमिक और आन्तरिक बाजार की उपलब्धता भी यहाँ पर इस उद्योग के विकास में सहायक रहा।

    ऊपर वर्णित कारकों के कारण 19वीं सदी के अन्त तक मुम्बई द्वीप पर करीब 40 कारखाने विकसित हो चुके थे। इसे “भारत का मैनचेस्टर” या “कपास की महानगरी” भी कहा जाने लगा। स्वेज नहर के पूरब में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला यह सबसे बड़ा केन्द्र बन गया।

दूसरा चरण:-

      1900-23 ईo के मध्य लगे सूती वस्त्र उद्योग को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में उद्योगों का विकास मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में हुआ क्योंकि मुम्बई महानगर में लगातार जमीन का मूल्य बढ़ता जा रहा था। श्रमिक संगठनों का विकास बड़े पैमाने पर हो चुका था। मलीन बस्तियाँ विकसित होने लगी थी। अतः निवेशकों ने मुम्बई के बाहरी क्षेत्रों में पूँजी निवेश का कार्य प्रारंभ किया। इस चरण में स्थानीयकरण की दो प्रवृति थी- प्रथम मुम्बई के ही बाहरी क्षेत्रों में सूती वस्त्र के कारखाने लगाये गये।

     पुनः सूती वस्त्र कारखाना लगाने हेतु मुम्बई के आप-पास के नगरों का चयन किया जहाँ मुम्बई के समान सभी परिस्थितियाँ अनुकूल थी। जैसे- इस चरण में कल्याण, थाणे, पुणे, नासिक, सूरत, बड़ोदरा तथा अहमदाबाद जैसे नगरों में सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ क्योंकि ये सभी केन्द्र अरब सागर के निकट थे जिसके कारण नम जलवायु उपलब्ध थी। बड़ौदरा, सूरत बंदरगाह थे। “टाटा हाइड्रल प्रोजेक्ट” के द्वारा विद्युत की आपूर्ति सुनिश्चित हो चुकी थी। मुम्बई के ही समान सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध थे।

तीसार चरण:-

     1923 से 1947 ई० के बीच लगे उद्योगों को इस चरण में शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास दक्कन के लावा के पठारी क्षेत्र तथा मध्यवर्ती पठार पर हुआ। दक्कन के पठार पर पोरबन्दर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर (सूरत), भूसावल, अहमदनगर, नागपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, गुलवर्गा प्रमुख केन्द्र के रूप में थे। इन केन्द्रों में इस उद्योग का विकास कपास की खेती, सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण हुआ।

      भारत के उ० मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में इस उद्योग का विकास इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, भोपाल, इटारसी, भिलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर में हुआ। इन क्षेत्रों में सूती वस्त्र उद्योग का विकास कई कारणों के चलते हुआ। जैसे-

(1) इन क्षेत्रों में कई बड़े देशी रियासत रहा करते थे। इन रियासतों ने इस उद्योग में रुचि लिया। ब्रिटिश कंपनियों ने भी देशी रजबाड़ों को इस क्षेत्र में आमंत्रित किया। देशी रजबाड़ों ने ब्रिटिश कंपनियों को भूमि दिया तो दूसरी ओर ब्रिटिश कंपनियों ने बड़े पैमाने पर पूंजी तथा तकनीक का निवेश किया। इसके अलावे मैदानी भारत का बाजार, सस्ते श्रमिक उपलब्धता और कपास की खेती ने भी इस उद्योग को आकर्षित किया।

     इसी चरण में कानपुर, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलोर, विशाखापतन तथा कलकता भी सूती वस्त्र केन्द्र के रूप में उभरे क्योंकि यहाँ की सभी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल थी तथा सस्ते श्रमिक और बाजार उपलब्ध थे।

   आजादी के बाद भारत में सूती वस्त्र उद्योग

चौथा चरण:-

     आजादी के बाद विकसित हुए सूती वस्त्र उद्योगों को इसमें शामिल करते हैं। इस चरण में सूती वस्त्र उद्योग का विकास चार क्षेत्रों में हुआ-

(i) उ०-प० भारत-

   इसमें पंजाब तथा हरियाणा को शामिल करते हैं। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने के कारण इन क्षेत्रों में कपास की खेती प्रारंभ की गई। कपास की स्थानीय उपलब्धता के करण जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, चंडीगढ़ अमृतसर तथा गंगानगर जिला सूती वस्त्र उद्योग केन्द्र के रूप में उभरे।

(ii) UP तथा बिहार-

   यहाँ पर सस्ते श्रमिक तथा बाजार की उपलब्धता के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। UP में मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादाबाद, वाराणसी, मिर्जापुर जैसे नगर में और बिहार में गया, डुमराँव, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना इत्यादि में विकसित हुआ। इस क्षेत्रों में सस्ते श्रमिक तथा बाजार उपलब्ध होने के कारण इस उद्योग कर विकास हुआ था।

(iii) पूर्वी भारत-

   बाजार की सुविधा, सस्ते श्रमिक, आयात-निर्यात की सुविधा तथा हुगली औद्योगिक प्रदेश में विकसित संरचनात्मक सुविधाओं के कारण इस उद्योग का यहाँ विकास हुआ। यहाँ इस उद्योग के मुख्य केन्द्र कोलकाता, हावड़ा, मानिकपुर, नैहाटी, चन्दन नगर, सियारामपुर, दीमापुर, इम्फाल, गुवाहाटी तथा कटक थे।

(iv) द० भारत-

    यहाँ सस्ते जल विद्युत की अपलब्धता तथा कपास की खेती किए जाने के कारण इस उद्योग का विकास हुआ। विजयवाड़ा,  बेलगाँव मैसूर, काँचीपुरम्, मदुरई, तिरुचिरापल्ली, पाण्डिचेरी तथा तिरुअनन्तपुरम जैसे नगरों में इस उद्योग का विकास हुआ। कोयम्बटूर को “दक्षिण भारत का मैनचेस्टर” भी कहा जाने लगा। भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र का मील तमिलनाडु राज्य में ही स्थित है।

   उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का अभूतपूर्व विकेन्द्रीकरण हुआ है। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केन्द्रों को नीचे मानचित्र में देखा जा सकता है।

Cotton Textile Industry

चित्र: भारत के प्रमुख सूत्री वस्त्र उद्योग केंद्र

   भारत में सूती वस्त्र का उत्पादन तीन क्षेत्रों में किया जाता है:-

(1) मील 

(2) पावरलूम

(3) हथकरघा / चरखा

   इन तीनों क्षेत्रों में होने वाला उत्पादन को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-

क्षेत्र भारत के कुल उत्पादन का प्रतिशत 2005-06 में  (लाख वर्ग मी० में उत्पादन)
मील 3.3% 1656
पावरलूम 82.8% 41044
हथकरघा 12.3% 6108
अन्य 1.6% 769
कुल 100% 49577

           नीचे के तालिका में सूत उत्पादन को प्रदर्शित किया जा रहा है:-     

वर्ष सूत का उत्पादन हजार टन में
1950-51  835
1960-61 1075
1970-71 1050
1980-81 1400
1990-91 1430
2000-01 1600
2010-11 1820

       भारत में सूती वस्त्र उत्पादन करने वाला राज्यों का क्रम इस प्रकार से हैं-

(1) महाराष्ट्र- 39%

(2) गुजरात- 35%

(3) तमिलनाडु- 6.4%

(4) पंजाब- 6%

समस्या तथा संभावना

    सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। जैसे-

(1) कच्चे माल की समस्या-

    भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वस्त्र की माँग लगातार बढ़‌ती ही जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देश पूरा नहीं कर पा रहा है जिसके कारण कपास का मूल्य लगागर बढ़‌ता ही जा रहा है। फलतः भारत को अन्य देशों से कपास आयात करना पड़ता है।

    भारत के पास कपास उत्पादन हेतु विस्तृत काली मिट्टी का क्षेत्र उपलब्ध है। अतः सिंचाई सुविधाओं का विकास कर कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन को बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम की जा सकती है।

(2) पुराने मशीन-

    भारत में अधिकांश वस्त्र का उत्पादन पूराने मशीनों से किया जाता है। जबकि USA, चीन, मिस्र, जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सूती का उत्पादन करते हैं जिसके कारण भारतीय सूती वस्त्र उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़‌ता जा रहा है। लेकिन, नई औद्योगिक नीति की घोषणा से यह उम्मीद जगी है कि भारत में नवीन विदेशी तकनीक आगमन होगा।

(3) अनियमित विद्युत की आपूर्ति-

     देश में लगातार ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है। माँग के अनुरूप विद्युत की आपूर्ति न होने के कारण कोई भी कारखाना निर्बाध्य रूप से नहीं चल पाता है। लेकिन, आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि के विकास से इस समस्या से निजात मिल सकेगा।

(4) हड़ताल तथा तालाबंदी-

    सूती वस्त्र उद्योग से जुड़े हुए श्रमिक संगठन काफी मजबूत है। ये संगठन अपने मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं। अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो कंपनी में ताला लटका देते हैं, जिसके कारण उत्पादन में कमी आती है।

     हालांकि न्यापालिका के हस्तक्षेप से और सरकार के बीच-बचाव से इस समस्या में लगातार कमी आ रही है।

(5) कृत्रिम रेशे के साथ प्रतिस्पर्द्धा-

       देश की गरीब जनता कृत्रिम रेसे से बने वस्त्र का उपयोग करते हैं जो अधिक टिकाऊ, सस्ता तथा आकर्षक होता है जबकि सूती वस्त्र कम टिकाऊ तथा महंगा होता है।

(6) घाटे में चल रही मील-

    भारत में सबसे ज्यादा सूती वस्त्र मील तमिलनाडु में है। लेकिन, तमिलनाडू भारत का मात्र 6.4% ही सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। उत्तर भारत में खाद्यान्न फसल की खेती कपास उपजाने वाले भूमि पर की जाने लगी, जिसके कार‌ण कच्चे माल की कमी हो गई। फलतः अधिकांश उत्तर भारत के सूती वस्त्र उद्योग बन्द हो गए। पुनः अधिक आयात शुल्क होने के कारण उसका आयात भी संभव नहीं था। लेकिन नवीन औद्योगिक नीति के कारण इसमें सुधार आने की संभावना है।

निष्कर्ष:

       ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के सूती वस्त्र उद्योग कई समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी, यह भारत का सबसे बड़ा उद्योग है, इस उद्योग में सबसे अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

      यह भारत का पूर्ण रूप से विकेन्द्रित उद्योग है। भारत के पास देशी एवं विदेशी बाजार उपलब्ध है। अतः कहा जा सकता है कि भारत में सूती वस्त्र उद्योग का भविष्य काफी उज्ज्वल है।

11. Briefly discuss the role of WTO in terms of International trade.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में विश्व व्यापा संगठन की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर- ओपेक जैसे संगठनों के अस्तित्व और वस्तुओं के आयात पर भारी प्रशुल्कों से विश्व में वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार में कृत्रिम बाधा उपस्थित होती है। इन कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु तथा मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक देशों ने प्रादेशिक स्तर पर साझा बाजार की स्थापना की है।

      इस प्रकार के साझा बाजार का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच कृत्रिम बाधाओं को दूर करते हुए वस्तुओं एवं सेवाओं के मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना है। साझा बाजार के सदस्य देश अपनी वस्तुओं का आयात-निर्यात बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा, भेदभाव और प्रशुल्क दरों के बीच स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं।

     इस प्रकार के साझा बाजारों में यूरोपियन आर्थिक समुदाय (EEC) या यूरोपियन संघ (EC) या यूरोपियन साझा बाजार (ECM) उल्लेखनीय हैं जिसकी स्थापना 1951 में 6 यूरोपियन देशों द्वारा अपने कोयला और इस्पात उद्योग के समन्वय विकास हेतु हुई।

      वर्तमान में 15 सदस्य देशों के साथ यह एक शक्तिशाली साझा बाजार व्यवस्था है। अन्य साझा बाजार व्यवस्था वाले संगठनों में 1994 में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको द्वारा स्थापित उत्तरी अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (नाफ्टा), 1973 में 13 केरीबियन देशों द्वारा स्थापित केरीबियन समुदाय और साझा बाजार (केरीकोम), 1969 में स्थापित लैटिन अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार संघ (लाफ्टा) उल्लेखनीय हैं।

     देशों के बीच मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अन्तर्गत हवाना में 1947-48 में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 53 देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का गठन करने सम्बन्धी एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, किन्तु अमेरिका का समर्थन न मिल पाने के कारण विश्व व्यापार संगठन स्थापित नहीं किया जा सका।

    अन्ततः विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1.1.1995 को प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी सामान्य करार (General Agreement on Trade and Tarrif) (GATT) के उरुग्वे दौर में हुए समझौते के परिणामस्वरूप हुई।

प्रशुल्क और व्यापार सम्बन्धी करार (गैट):-

    गेट एक बहुपक्षीय व्यापार सन्धि है जो जेनेवा में 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से लागू हुई। इसका उद्देश्य परस्पर सहमति द्वारा व्यापारिक प्रतिबन्धों को समाप्त करना था। गैट वार्ताओं के अब तक कुल बारह चक्र आयोजित किए गए हैं। उरुग्वे के पश्चात् दोहा और कानकुन में इन वार्ताओं के दौर आयोजित किए जा चुके हैं।

    सात वर्षीय उरुग्वे दौर में चार नए समझौते हुए जो अब डब्ल्यू. टी. ओ. के मूलभूत समझौते के भाग हैं। ये समझौते निम्न हैं-

1. व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार (ट्रिप्स),

2. व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (ट्रिम्स),

3. सेवाओं में व्यापार का सामान्य समझौता (गैट्स)

4. कृषि।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य

     डंकल समझौते के अन्तर्गत ही गैट के स्थान पर 1 जनवरी, 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

(i) जीवन-स्तर में वृद्धि करना।

(ii) पूर्ण रोजगार एवं प्रभावपूर्ण मांग में वृहत्स्तरीय एवं ठोस वृद्धि करना।

(iii) वस्तुओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(iv) सेवाओं के उत्पादन एवं व्यापार का विस्तार करना।

(v) विश्व के संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना।

(vi) सुस्थिर या टिकाऊ विकास की आवधारणा को स्वीकार करना।

(vii) पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण करना।

(viii) विकास के वैयक्तिक स्तरों की आवश्यकता के साथ निरन्तर चलते रहने के साधनों में वृद्धि करना।

        इन उद्देश्यों में प्रथम तीन गैट के भी उद्देश्य थे। गैट के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के पूर्ण उपयोग की बात कही गई थी जबकि विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों में विश्व संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर अधिक बल दिया गया तथा सुस्थिर विकास एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के उद्देश्यों को भी जोड़ा गया है।

     अतः विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य अधिक व्यापक एवं प्रभावी हैं। विश्व व्यापार संगठन की प्रस्तावना में विकासशील देशों और विशेष रूप से कम विकसित देशों के लिए ऐसे सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता बताई गई जो उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ा सकें।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य

    विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों को मूर्तरूप देने के लिए विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:-

(i) अन्तर्राष्ट्रीय समझौते से सम्बन्धित विचार विमर्श के लिए एक सामूहिक संस्थागत मंच के रूप में काम करना।

(ii) विश्व व्यापार समझौता, बहुपक्षीय तथा बहुवचनीय समझौते के क्रियान्वयन, प्रशासन तथा परिचालन हेतु सुविधाएं प्रदान करना।

(iii) व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी किसी भी मसले पर सदस्यों को विचार-विमर्श हेतु मंच प्रदान करना।

(iv) व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया (Trade Policy Revise mechanism) से सम्बन्धित नियमों एवं प्रावधानों को लागू करना।

(v) सदस्य राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे से सम्बन्धित नियमों एवं प्रक्रियाओं को प्रशासित करना।

(vi) वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में अधिक सामजस्य भाव लाने हेतु विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से पूरा-पूरा सहयोग करना।

(vii) विश्व में संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग को बढ़ावा देना।

     इस प्रकार विश्व व्यापार संगठन के कार्यों में उन सभी बातों का समावेश है जिससे उसके सदस्य देशों को समझौते से सम्बन्धित मामलों पर विचार विमर्श का एक सामूहिक संस्थागत मंच प्राप्त होने के साथ-साथ एक एकीकृत स्थायी एवं मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली द्वारा व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने, वैधानिक ढंग से विवादों के निपटाने और व्यापार नीति समीक्षा प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू करने में सहायता मिलेगी।

     गैट और उसके पश्चात् विश्व व्यापार संगठन के गठन होने से प्रायः सभी देश इसकी नीतियां एवं प्रावधानों से प्रभावित हुए हैं। 90 के दशक से विश्व स्तर पर उदारीकरण और वैश्वीकरण द्रुतगति से प्रसारित हो रहे हैं। प्रत्येक देश इनका लाभ उठाने के लिए अपनी नीतियों में संशोधन क हा है।

12. What do you mean by Special Economic Zone? Describe in brief the special economic zones in the important countries of world.

विशेष आर्थिक क्षेत्र से आप क्या समझते हैं? विश्व के प्रमुख देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिये।

उत्तर- विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) एक ऐसे भौगोलिक प्रदेश है जहाँ देश का सामान्य आर्थिक कानून पूरी तरह से लागू नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘SEZ’ शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है और उत्पादकों को निर्यात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ऐतिहासिक पक्ष

     रॉबर्ट सी हेवर्ड के अनुसार SEZ की अवधारणा काफी प्राचीन है। प्राचीनतम SEZ का प्रमाण यूनान के टायर नगर से मिलता है। 1960 ई० में चीन ने SEZ का निर्माण कर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास किया। जबकि भारत ने अप्रैल 2000 ई० में पहले SEZ नीति की घोषणा की।

प्रकार/वर्गीकरण

      SEZ कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) निर्यात संवर्धन क्षेत्र (Export Prossising Zone), मुक्त क्षेत्र (Free Zone), औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Estate), मुक्त बंदरगाह, नगरीय उद्यम क्षेत्र इत्यादि।

उद्देश्य

     SEZ की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य है।

(1) उद्योगों के विकास हेतु विदेशी एवं घरेलू निवेशकों को उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराना।

(2) निर्यात को बढ़ावा देना।

(3) अधिक से अधिक रोजगार उत्पन्न करना।

(4) पिछड़े हुए क्षेत्रों को विकसित करना।

(5) सामाजिक-आर्थिक विषमता को कम करना।

(6) औद्योगीकरण तथा नगरीकरण को बढ़ावा देना।

स्वरूप एवं विशेषता

      किसी भी एक आदर्श SEZ के अंतर्गत एक हजार हेक्टेयर भूमि पर स्थापित किया जा सकता है और उसमें कम से कम 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश होना चाहिए। पुनः उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:-

(1) SEZ के अंतर्गत कार्य करने वाले इकाइ‌यों के द्वारा वस्तु तथा सेवाओं का मुक्त संचलन होना चाहिए।

(2) विश्व स्तर की आधारभूत संरचना का विकास किया जाना चाहिए।

(3) निर्माण या उत्पादन का कार्य गहन तरीके से होना चाहिए।

(4) निर्यात अभिमुख होना चाहिए।

(5) उन्नत तकनीक होना चाहिए।

(6) उचित प्रबंधन तथा उच्च तकनीक का उपयोग होना चाहिए।

वर्तमान स्थिति एवं महत्त्व

     वर्तमान में 379 SEZs अधिसूचित हैं, जिनमें से 265 चालू हैं। लगभग 64% SEZ पाँच राज्यों- तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित हैं। इससे एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। SEZ पर बाबा कल्याणी समिति की सिफारिशों के अनुसार, SEZ में MSME योजनाओं को जोड़कर तथा वैकल्पिक क्षेत्रों को क्षेत्र-विशिष्ट SEZ में निवेश करने की अनुमति देकर MSME निवेश को बढ़ावा देना है।

      इसके अतिरिक्त सक्षम और प्रक्रियात्मक छूट के साथ-साथ SEZ को अवसंरचनात्मक स्थिति प्रदान करने हेतु वित्त तक उनकी पहुँच में सुधार करके तथा  दीर्घकालिक ऋण को सक्षम करने के लिये भी अग्रगामी कदम उठाए गए। कुछ SEZ के उदाहरण निम्नलिखित है:-

भारत:-

(1) काण्डला तथा सूरत- गुजरात

(2) कोचीन- केरल

(3) सांताक्रुज- मुम्बई

(4) फाल्टा- पश्चिम बंगाल

(5) चेन्नई- तमिलनाडु

(6) विशाखापतनम- आन्ध्र प्रदेश

(7) नोएडा- उत्तर प्रदेश

(8) इंदौर- मध्य प्रदेश

(9) राजीव गाँधी इंटेफोर्ट पार्क- हिंजेवादी, पूना।

(10) जयपुर- राजस्थान

(11) सिंगुर (टाटा मोटर्स कंपनी)- पश्चिम बंगाल 

नोट: टाटा मोटर्स कंपनी 2008 में सिंगूर परियोजना को छोड़ने के बाद कंपनी ने अपनी विनिर्माण इकाई को साणंद, गुजरात में स्थानांतरित कर दिया।

MINOR CORE COURSE

टाटा मोटर्स कंपनी साणंद, गुजरात

(12) नन्दीग्राम (सलीम अली ग्रुप केमिकल फैक्ट्री)- पश्चिम बंगाल

        संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के अनुसार, 2019 तक, 147 देशों ने किसी न किसी तरह के SEZ की स्थापना की थी, दुनिया भर में SEZ की कुल संख्या 5,400 के करीब है।

3. Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

Multidisciplinary Course MDC-2 For Humanities

(Climatology and Oceanography)

(Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the sections as directed.

अभ्यर्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) All activity related to climate happens in this layer of atmosphere:

(a) Stratosphere

(b) Troposphere

(c) Ionosphere

(d) None of the above

मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ, वायुमण्डल के इस परत में होती है:

(a) समतापमण्डल

(b) क्षोभमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) क्षोभमण्डल

(ii) Which layer protect the Earth from Sun’s harmful rays?

(a) Oxygen layer

(b) Ozone layer

(c) Nitrogen layer

(d) Green house gas

कौन-सी परत पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है?

(a) ऑक्सीजन परत

(b) ओजोन परत

(c) नाइट्रोजन परत

(d) ग्रीन हाउस गैस

उत्तर- (b) ओजोन परत

(iii) Which among the following is

(a) Hailstorm 

(b) Shower

(c) Thunderstorm

(d) All of the above

इनमें से कौन वर्षा का एक रूप है?

(a) ओलावृष्टि

(b) बौछार

(c) तूफान

(d) उपरोक्त से सभी

उत्तर- (d) उपरोक्त से सभी

(iv) As one gaes above in the atmosphere, the air pressure :

(a) Increases

(b) Decreases

(c) Remain same

(d) None of the above

वायुमण्डल में ऊपर की तरफ बढ़ने पर, वायुदाब:

(a) बढ़ता है

(b) घटता है

(c) एक जैसा रहता है

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) घटता है

(v) This is a local wind of India:

(a) Loo

(b) Chinook

(c) Siroco

(d) Harmattan

यह भारत की स्थानीय पवन है:

(a) लू

(b) चिनूक

(c) सिरोको

(d) हरमट्टान

उत्तर- (a) लू

(vi) Where do temperate cyclones come?

(a) 5o – 10o north latitude

(b) 5o – 15o north latitude

(c) 5o – 10o south latitude

(d) 5o – 15o south latitude

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कहाँ आते हैं?

(a) 5o – 10o उत्तरी अक्षांश

(b) 5o – 15o उत्तरी अक्षांश

(c) 5o – 10o दक्षिणी अक्षांश

(d) 5o – 15o दक्षिणी अक्षांश

उत्तर- शीतोष्ण चक्रवात दोनों गोलार्द्धों में 35o से 65o अक्षांशों के बीच मध्य-अक्षांशीय क्षेत्र के ऊपर सक्रिय होते हैं।

(vii) Find out the wrong pair:

(a) China Sea – Typhoon

(b) India – Cyclone

(c) Eastern Island – Hurricane

(d) Australia-Tornado

गलत जोड़ा बताइए :

(a) चीन सागर – टाइफून

(b) भारत – चक्रवात

(c) पूर्वी द्वीप समूह – हरीकेन

(d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

उत्तर- (d) आस्ट्रेलिया- टॉरनैडो

(viii) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red sea

(c) Dead sea

(d) Sambher lake

विश्व के सबसे अधिक खारे सागर का नाम है:

(a) साल्ट झील

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

(ix) Going from equator to pole the salinity:

(a) Decreases

(b) Increases

(c) Remain same

(d) None of the above

विषुवतरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर लवणता:

(a) घटती है

(b) बढ़ती है

(c) समान रहती है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) घटती है

(x) Andaman-Nikobar ridge is situated in:

(a) Indian Ocean

(b) Pacific Ocean

(c) Atlantic Ocean

(d) Arctic Ocean

अंडमान-निकोबार कटक स्थित है:

(a) हिन्द महासागर में

(b) प्रशान्त महासागर में

(c) अन्ध महासागर में

(d) आर्कटिक महासागर में

उत्तर- (a) हिन्द महासागर में

Semester-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following: [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. State the importance of ozone layer in the atmosphere.

वायुमण्डल में ओजोन परत का महत्त्व बताइए।।

Discuss the composition of atmosphere.

वायुमडण्ल के संघटन की चर्चा कीजिए।

4. Why does Antarctic Bottom water have more nutrient than North Atlantic Bottom water?

उत्तर अटलाण्टिक नितल जल की तुलना में अन्टार्क्टिक तलीय जल में अधिक पोषक तत्व क्यों होते हैं?

5. Explain different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर पायी जाने वाली विभिन्न वायुदाब की पेटियों को समझाइए।

6. Write the characteristics of anticyclone.

प्रतिचक्रवात की विशेषताओं को लिखिए।

7. Describe the general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तली की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe the structure and composition of atmosphere
with suitable diagram.

वायुमंडल की संचना एवं संघटन का सचित्र वर्णन कीजिए।

9. Discuss the different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

10. Describe the mechanism of cyclone.

चक्रवात की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

11. Explain Ocean bottom relief of either Pacific or Indian ocean.

प्रशान्त अथवा हिन्द महासाग के महासागरीय तल उच्चावच की व्याख्या कीजिए।

12. What is Ocean Salinity? Describe its different sources.

महासागरीय खारापन क्या होता है? इसके विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए।

4. Multidisciplinary Course or MDC-2 / Solved Questions Paper 2024

Multidisciplinary Course or MDC-2 For Science and Commerce

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course or MDC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MDC-2: Multidisciplinary Course)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the marginindicate full marks. Answer from all sections as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी खण्डों से उत्तर दीजिए।

Section-A / खण्ड-अ

(Multiple Choice Questions)

(बहुविकल्पीय प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) The uppermost layer of atmosphare is:

(a) Troposphere

(b) Stratosphere

(c) Ionosphere

(d) Exosphere

वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत है-:

(a) क्षोभमण्डल

(b) समतापमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) बाह्ममण्डल

उत्तर- (d) बाह्ममण्डल

(ii) Which one of the following gases constitute the major portion of the atmosphare.

(a). Oxygen

(b) Argon

(c) Nitrogen

(d) Carbon dioxide

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?

(a) ऑक्सीजन

(b) आर्गन

(c) नाइट्रोजन

(d) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (c) नाइट्रोजन

(iii) Ozone layer is found in which layer of atmosphare?

(a) Troposphere

(b) Stratosphere

(Ionosphere

(d) Exosphere

ओजोन परत, वायुमण्डल की किस परत में पायी जाती है?

(a) क्षोभमण्डल

(b) समतापमण्डल

(c) आयनमण्डल

(d) बाह्ममण्डल

उत्तर- (b) समतापमण्डल

(iv) Which gas from the following gases protect us from Sun’s harmful ultraviolet rays?

(a) Nitrogen

(b) Ozone

(c) Oxygen

(d) Carbon dioxide

निम्नलिखित में से कौन-सी गैस हमें सूर्य की पराबैंगनी विकिरण से बचाती है?

(a) नाइट्रोजन

(b) ओजोन

(c) ऑक्सीजन

(d) कार्बन डाइऑक्साइड

उत्तर- (b) ओजोन

(v) The monsoon rainfall in India in which type of rainfall?

(a) Convectional rainfall

(b) Orographic rainfall

(c) Cyclonic rainfall

(d) None of the above

भारत की मानसून वर्षा, इनमें से किस तरह की वर्षा है?

(a) संवहनीय वर्षा

(b) पर्वतीय वर्षा

(c) चक्रवातीय वर्षा

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (b) पर्वतीय वर्षा

(vi) What happens when on move towards height from the surface on Earth?

(a) Air pressure increases

(b) Air pressure decreases

(c) Air pressure remain same

(d) None of the above

पृथ्वी पर धरातल से ऊँचाई की तरफ बढ़ने से क्या होता है?

(a) वायुदाब बढ़ता है

(b) वायुदाब घटता है

(c) वायुदाब सामान्य रहता है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (b) वायुदाब घटता है

(vii) An imaginary line joining places of equal air pressure at sea level is called:

(a) Isobar

(b) Isohyet

(c) Isohaline

(d) None of the above

सागर तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को दर्शाने वाली काल्पनिक रेखा को कहते हैः

(a) समदाब रेखा

(b) समवृष्टि रेखा

(c) समलवण रेखा

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) समदाब रेखा

(viii) The part continent which submerged into water is called:

(a) Continental slope

(b) Continental shelf

(c) Deep sea plain

(d) Ocean deep

महाद्वीप का वह भाग जो महासागरीय जल में डूबा रहता है, कहलाता है

(a) महाद्वीपीय मग्नढ़ाल

(b) महाद्वीपीय मग्नतट

(c) गहरा सागरीय मैदान

(d) महासागरीय गर्त

उत्तर- (b) महाद्वीपीय मग्नतट

(ix) Average depth of Pacific Ocean is:

(a) 1280 meters

(b) 4000 meters

(c) 3920 meters

(d) 5000 meters

प्रशान्त महासागर की औसत गहराई हैः

(a) 1280 मीटर

(b) 4000 मीटर

(c) 3920 मीटर

(d) 5000 मीटर

उत्तर- (b) 4000 मीटर

(x) Highest saline sea in the world is:

(a) Salt lake

(b) Red Sea

(c) Dead Sea

(d) Sambher lake

विश्व में सबसे अधिक खारा सागर हैः

(a) साल्ट लेक

(b) लाल सागर

(c) मृत सागर

(d) सांभर झील

उत्तर- (c) मृत सागर

Section-B / खण्ड-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is Troposphere? What is its importance?

क्षोभमण्डल क्या है? इसका क्या महत्व है?

3. Explain precipitation and its different types.

वर्षण एवं इसके विभिन्न प्रकारों को समझाइए।

4. Show different air pressure belts on Earth.

पृथ्वी पर वायुदाब की विभिन्न पेटियों को दर्शाइए।

5. Describe local winds around the world.

विश्व में पाये जाने वाले स्थानीय पवनों का वर्णन कीजिए।

6. What are the sources of salinity in ocean water?

महासागरीय जल में खारेपन के क्या स्रोत हैं?

7. Describe general characteristics of ocean bottom.

महासागरीय तल की सामान्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Section-C / खण्ड-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. Describe structure and characteristics of different layers of atmosphare.

वायुमण्डल की विभिन्न परतों की बनावट और विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

9. Explain different types of rainfall.

वर्षा के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।

10. What is Cyclone? Differentiate tropical and temperate cyclones.

चक्रवात किसे कहते हैं? उष्णकीटबन्धीय एवं समशीतोष्ण चक्रवातों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

11. Describe bottom surface of either Pacific or Indian Ocean.

प्रशान्त महासाग अथवा हिन्द महासागर के धरातलीय स्वरूप का वर्णन कीजिए।

12. What do you understand by oceanic salinity? Describe its world distribution pattern.

महासागरीय लवणता से आप क्या समझते हैं? इसके विश्व वितण प्रतिरूप का वर्णन कीजिए।

2. Minor Course or MIC-2 (Climatology and Oceanography) / Questions Paper 2024, PPU Patna

Minor Course or MIC-2

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Minor Course or MIC

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MIC-2: MINOR COURSE)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours]

[Maximum Marks: 70

Note: Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figure in the margin indicate full marks. Answer from all parts as directed.

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से उत्तर दीजिए।

Part-A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Choose the correct option from each question. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए।

1. (i) The main constituents of atmosphere are:

(a) Nitrogen and Oxygen

(b) Carbon dioxide and Nitrogen

(c) Carbon Monoxide and Carbon dioxide

(d) Ozone and Sulfur dioxide

वायुमंडल के प्रमुख घटक हैं:

(a) नाइट्रोजन और ऑक्सीजन

(b) कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन

(c) कार्बन मोनोक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड

(d) ओजोन और सल्फर डाइऑक्साइड

उत्तर- (a) नाइट्रोजन और ऑक्सीजन

(ii) The lies above the mesopause and is a region in which temperatures increase with height.

(a) Stratosphere

(b) Troposphere

(c) Thermosphere

(d) Exosphere

——मेसोपॉज के ऊपर स्थित होता है और यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता जाता है।

(a) समतापमण्डल

(b) क्षोभमण्डल

(c) तापमण्डल

(d) बर्हिमण्डल

उत्तर- (c) तापमण्डल

(iii) Imaginary lines joining equal as isohyets is known

(a) Height

(b) Humidity

(c) Rainfall

(d) Pressure

समान—–को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखाओं को समवर्षा रेखा कहा जाता है।

(a) ऊँचाई

(b) आर्द्रता

(c) वर्षा

(d) दाब

उत्तर- (c) वर्षा

(iv) Which of the following is an equatorial belt of low atmospheric pressure where the trade winds converge?

(a) Horse latitude

(b) Doldrums

(c) Roaring Forties

(d) Furious sixties

निम्नलिखित में से कौन एक कम वायुमंडलीय दबाव की भूमध्यरेखीय पेटी है, जहाँ व्यापारिक पवनें मिलती हैं?

(a) अश्व अक्षांश

(b) डोलड्रम्स

(c) गरजती चालीसा

(d) चीखता साठा

उत्तर- (b) डोलड्रम्स 

(v) The planetary winds that flows between the sub- tropical highs and equatorial low is known as:

(a) Trade winds

(b) Westerlies

(c) Polar Easterlies

(d) None of the above

ग्रहीय पवनें जो उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च और भूमध्यरेखीय निम्न के बीच बहती हैं, को जाना जाता हैः

(a) व्यापारिक पवनें

(b) पछुआ पवनें

(c) ध्रुवीय पवनें

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) व्यापारिक पवनें

(vi) Tropical storm in China Sea is known as:

(a) Wave

(b) Tornado

(c) Cyclone

(d) Typhoon

चीन सागर में उष्ण कटिबन्धीय तूफान को कहा जाता है:

(a) लहर

(b) टॉरनैडो

(c) चक्रवात

(d) टाइफून

उत्तर- (d) टाइफून

(vii) Which of the following connects the continental shelf and the ocean basins?

(a) Continental slope

(b) Deep sea plains

(c) Ocean deeps

(d) Submarine ridges

निम्नलिखित में से कौन महाद्वीपीय मग्नतट और महासागरीय बेसिन को जोड़ता है?

(a) महाद्वीपीय मग्न ढ़ाल

(b) अगाध सागरीय मैदान

(c) महासागरीय गर्त

(d) महासागरीय कटक (श्रेणी)

उत्तर- (a) महाद्वीपीय मग्न ढ़ाल

(viii) ‘Mariana Trench’ is located in the:

(a) Indian Ocean

(b) Arctic Ocean

(c) Atlantic Ocean

(d) Pacific Ocean

‘मेरियाना गर्त’ स्थित है:

(a) हिन्द महासागर में

(b) आर्कटिक महासागर में

(c) अटलांटिक महासागर में

(d) प्रशांत महासागर में

उत्तर- प्रशांत महासागर में

(ix) Major source of oceanic salinity is:

(a) Rivers

(b) Wind

(c) Land

(d) None of the above

महासागरीय लवणता का प्रमुख स्रोत हैः

(a) नदियाँ

(b) पवन

(c) भूमि

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर- (a) नदियाँ

(x) Which of the following sea has highest salinity in the world?

(a) Red Sea

(b) Black Sea

(c) White Sea

(d) Dead Sea

निम्नलिखित में से किस सागर में विश्व में सबसे अधिक लवणता है?

(a) लाल सागर

(b) काला सागर

(c) श्वेत सागर

(d) मृत सागर

उत्तर- (d) मृत सागर

Part-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

2. What is the composition of Earth’s atmosphere? What is the ratio of two most dominant gases in the atmosphere?

पृथ्वी के वायुमण्डल का संघटन क्या है? वायुमण्डल में सबसे प्रभावशाली गैसों का अनुपात क्या है?

3. Mention the different forms of precipitation.

वर्षण के विभिन्न प्रकारों के बारे में बताइए।

4. What are Local Winds? Write the name of any two local winds.

स्थानीय पवने क्या हैं? किन्हीं दो स्थानीय पवनों के नाम लिखिए।

5. What is the difference between Hurricane and Typhoon?

हरिफेन और टाइफून के मध्य क्या अंतर है?

6. What are the major types of Ocean relief features?

महासागरीय उच्चावच विशेषताओं के प्रमुख प्रकार क्या हैं?

7. What is the main cause of salinity of ocean water?

महासागरीय जल की लवणता का प्रमुख कारण क्या है?

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. [3×10-30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

8. What is atmosphere? Explain the different layers of Earth’s atmosphere.

वायुमण्डल क्या है? पृथ्वी के वायुमण्डल की विभिन्न परतों को समझाइए।

9. What Precipitation means? What are the four types of precipitation?

वर्षण का क्या अर्थ है? वर्षण के चार प्रकार क्या हैं?

10. What is Cyclone? How is it originated? Describe its salient features in the context of tropical cyclone.

चक्रवात किसे कहते हैं? इसकी उत्पत्ति किस प्रकार होती है? उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात के संदर्भ में इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

11. Give an account of principal local winds in the world.

विश्व में पायी जाने वाली सभी प्रमुख स्थानीय पवनों का विवरण दीजिए।
12. Discuss the factors which cause variation in salinity of oceans.

महासागरों की लवणता में अन्त उत्पन्न कने वाले कारकों की विवेचना कीजिए।

1. Major Course (Climatology and Oceanography) / MJC-2 Questions Paper 2024

Major Course or MJC-2

Climatology and Oceanography (Theory)

Solved Questions Paper 2024



(Patliputra University Patna)

Major Course

UG (Regular) (Sem.-II) Examination, 2024

(Session: 2023-27)

(MJC-2: MAJOR CORE COURSE)

GEOGRAPHY

(Climatology and Oceanography)

Time: Three Hours

Maximum Marks: 70

Note: Candiates are required to give their answers in their own words as far as practicable. The figures in the margin indicate full marks. Answer from all the parts as directed.

परीक्षार्थी यथासंभव अपने शब्दों में ही उत्तर दें। उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक हैं। निर्देशानुसार सभी भागों से प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

PART-A/भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Select the correct option from each question. Each question carries 2 marks. [10×2=20]

प्रत्येक प्रश्न से सही विकल्प का चयन कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंकों का है।

1. (i) What are two forms of oxygen found in the atmosphere?

(a) Water and Oxygen

(b) Water and Ozone

(c) Ozone and Oxygen

(d) None of the above

वायुमण्डल में पाये जाने वाले ऑक्सीजन के दो रूप क्या हैं?

(a) जल एवं ऑक्सीजन

(b) जल एवं ओजोन

(c) ओजोन एवं ऑक्सीजन

(d) उपरोक्त से कोई नहीं

उत्तर- (b) जल एवं ओजोन

(ii) The transfer of heat energy through the movement of a mass of substance from one place to another place is called:

(a) Conduction

(b) Convection

(c) Condensation

(d) Radiation

किसी पदार्थ के द्रव्यमान के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से ऊष्मा ऊर्जा का स्थानान्तरण कहलाता हैः

(a) चालन

(b) संवहन

((c) संघनन

(d) विकिरण

उत्तर- (b) संवहन

(iii) When two different air masses meet, the boundary zone between them is a:

(a) Front

(b) Fault

(c) Current

(d) Cyclone

जब दो अलग-अलग वायु राशियां मिलती हैं, तो उनके मध्य का सीमा क्षेत्र एक…… होता है।

(a) वाताग्र

(b) अंश

(c) धारा

(d) चक्रवात

उत्तर- (a) वाताग्र

(iv) The centre of a cyclone is a calm area. It is called ….of the storm.

(a) arm

(b) head

(c) heart

(d) eye

चक्रवात का केन्द्र एक शांत क्षेत्र है। इसे तूफान का…… कहा जाता है।

(a) भुजा

(b) सिर

(c) हृदय

(d) नेत्र

उत्तर- (d) नेत्र

(v) Which of the following codes signify the cold climate with dry winters acording to Koppen?

(a) EF

(b) Df

(c) ET

(d) Dw

कोपेन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा संकेत शीत जलवायु के साथ शुष्क शीत ऋतु को दर्शाता है?

(a) EF

(b) Df

(c) ET

(d) Dw

उत्तर- (d) Dw

(vi) Which of the following gases has the maximum contribution to global warming?

(a) Chlorofluorocarbons (CFCs)

(b) Methane (CH4)

(c) Sulfur Hexafluoride (SF6)

(d) Carbon dioxide (CO)

निम्नलिखित में से किस गैस का भूमण्डलीय तापन में सर्वाधिक योगदान है?

(a) क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)

(b) मीथेन (CH4)

(c) सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF)

(d) कार्बन डाइऑक्साइड (CO)

उत्तर- (d) कार्बन डाइऑक्साइड (CO)
(vii) A mid-ocean ridge is an underwater mountain system formed by:

(a) Plate tectonics

(b) Earthquake

(c) Ocean currents

(d) Submarine landslides

मध्य महासागरीय कटक एक जलमग्न पर्वतीय प्रणाली है, जिसका निर्माण होता है :

(a) प्लेट विवर्तनिकी से

(b) भूकम्प से

(c) महासागरीय धाराओं से

(d) अन्तः सागरीय भूस्खलन से

उत्तर- (a) प्लेट विवर्तनिकी से

(viii) Which of the following oceans has the shape of the english alphabet ‘S’?

(a) Atlantic ocean

(b) Arctic ocean

(c) Pacific ocean

(d) Indian ocean

निम्नलिखित में से किस महासागर का आकार अंग्रेजी वर्णमाला के ‘S’ के समान है?

(a) अटलांटिक महासागर

(b) आर्कटिक महासागर

(c) प्रशान्त महासागर

(d) हिन्द महासागर

उत्तर- (a) अटलांटिक महासागर

(ix) The deepest part of the Indian Ocean is:

(a) Mariana Trench

(b) Sunda Trench

(c) Tonga Trench

(d) Bonin Trench

हिन्द महासागर का सबसे गहरा भाग है:

(a) मेरियाना गर्त

(b) सुण्डा गर्त

(c) टोन्गा गर्त

(d) बोनिन गर्त

उत्तर- (b) सुण्डा गर्त

(x) The salinity of ocean water is calculated as the amount of salt (in gm) dissolved in——gm of seawater.

(a) 10,000

(b) 100

(c) 1000

(d) More than one of the above

महासागरीय जल की लवणता की गणना….. ग्राम सागरीय जल में घुले लवण की मात्रा (ग्राम में) के रूप में की जाती है?

(a) 10,000

(b) 100

(c) 1000

(d) उपरोक्त में से एक से अधिक

उत्तर- (c) 1000

 

PART-B/ भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries four marks.    [4×5=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न चार अंकों का है। [4×5=20]

2. What do you understand by heat budget of the Earth? Explain in detail.

पृथ्वी के ताप बजट से आप क्या समझते हैं? विस्तार से समझाइये।

3. What is an Air Mass? Write the name of different types of air masses.

वायुराशि क्या है? वायुराशियों के विभिन्न प्रकारों के नाम लिखिए।

4. What is Tropical Cyclone? What is the name given to tropical cyclone in China and Japan?

उष्णकटिबन्धीय चक्रवात क्या है? चीन और जापान में उष्णकटिन्धीय चक्रवात को क्या नाम दिया गया है?

5. What are the indicators of climate change?

जलवायु परिवर्तन के संकेतक क्या हैं?

6. How many types of ocean relief are there? Which is the largest relief in ocean?

महासागरीय उच्चावच के कितने प्रकार होते हैं? महासागर में सबसे बड़ा उच्चावच कौन-सा है?

7. What do you mean by salinity of ocean water? What is the average salinity of ocean water?

महासागरीय जल की लवणता से आप क्या समझते हैं? महासागरीय जल की औसत लवणता क्या है?

PART-C/ भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following. Each question carries three marks.

[3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न तीन अंकों का है।

Present an account of the composition and structure of atmosthere.

वायुमण्डल के संघटन एवं संरचना का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

9. What is front? Explain various types of fronts with diagrams.

वाताग्र क्या है? वाताग्र के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या रेखाचित्रों के साथ कीजिए।

10. Critically examine the classification of climate as given by Koppen.

कोपेन द्वारा दिये गये जलवायु वर्गीकरण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

11. Describe the major features of the bottom relief of Indian Ocean.

हिन्द महासाग के नितल की प्रमुख उच्चावच विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

12. Give an account of the horizontal distribution of salinity in ocean water.

महासागरीय जल में लवणता के क्षैतिज वितरण का विवण दीजिए।

3. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities

(Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023


(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary

GROUP-A / समूह-अ

(Objective Type Questions)

( वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: All the questions are of equal value and are compulsory. Choose the correct answer from’ the given options.

[10×2=20]

सभी प्रश्नों के उत्तर देना अनिवार्य है तथा इनके मान समान हैं। दिये गये विकल्पों के आधार पर प्रश्नों का उत्तर दीजिए ।

1. (i) The closest planet to the Sun is:

(a) Venus

(b) Mercury

(c) Mars

(d) Earth

सूर्य का निकटम ग्रह है:

(a) शुक्र

(b) बुध

(c) मंगल

(d) पृथ्वी

उत्तर- (b) बुध

(ii) The origin of Earth is related to the origin of:

(a) Comet

(b) Nebula

(c) Solar system

(d) Stars

पृथ्वी की उत्पत्ति का सम्बन्ध ……की उत्पत्ति से है।

(a) धूमकेतु

(b) निहारिका

(c) सौर मण्डल

(d) तारे

उत्तर- (c) सौर मण्डल

(iii) A natural way of knowing about the internal structure of the Earth is:

(a) Density

(b) Volcano

(c) Pressure

(d) Temperature

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में जानने का एक प्राकृतिक साधन है:

(a) घनत्व

(b) ज्वालामुखी

(c) दाब

(d) तापक्रम

उत्तर- (b) ज्वालामुखी

(iv) Igneous Rocks originated from:

(a) Fire

(b) Sun heat

(c) Ashes

(d) Magma

आग्नेय चट्टानों की उत्पत्ति हुई है:

(a) अग्नि से

(b) सूर्य ताप से

(c) राख से

(d) मैग्मा से

उत्तर- (d) मैग्मा से

(v) Granite is an example of:

(a) Sedimentary rock

(b) Igneous rock

(c) Metamorphic rock

(d) Residual rock

प्रेनाइट उदाहरण है।

(a) अवसादी चट्टान का

(b) आग्नेय चट्टान का

(c) कायान्तरित चट्टान का

(d) अवशिष्ट चट्टान का

उत्तर- (b) आग्नेय चट्टान का

(vi) The process of rusting of iron-rich r called:

(a) Carbonation

(b) Hydration

(c) Solution

(d) Oxidation

लौहयुक्त चट्टानों पर जंग लगने की क्रिया कहलाती है:

(a) कार्बोनेशन

(b) हाइड्रेशन

(c) विलयन

(d) ऑक्सीकरण

उत्तर- (d) ऑक्सीकरण

(vii) The most important factor of erosion on the Earth’s surface is:

(a) Ice

(b) Flowing water

(c) Wind

(d) Underground water

पृथ्वी की सतह पर सबसे महत्त्वपूर्ण अपरदन का कारक है:

(a) हिमानी

(b) प्रवाहित जल

(c) पवन

(d) भूमिगत जल

उत्तर- (b) प्रवाहित जल

(viii) How many main types of plate edges are there?

(a) 2

(b) 3

(c) 4

(d) 5

प्लेट किनारे मुख्यतः कितने प्रकार के है

(a) 2

(b) 3

(c) 4

(d) 5

उत्तर- (b) 3

(ix) Which scale is used to measure t of Earthquake?

(a) Reed scale

(b) Richter scale

(c) Holmes scale

(d) Vernier scale

भूकम्प की तीव्रता मापने के लिए किस मापक का प्रयोग करते हैं?

(a) रीड स्केल

(b) रिक्टर स्केल

(c) होम्स स्केल

(d) वर्नियर स्केल

उत्तर- (b) रिक्टर स्केल

(x) Volcanoes that remain quiet for long period of time and thereafter become are called:

(a) Active Volcano

(b) Waking Volcano

(c) Dormant Volcano

(d) Quiet Volcano

ऐसे ज्वालामुखी जो लम्बी अवधि तक शान्त रहने के बाद पुनः सक्रिय हो जाते हैं, कहलाते है:

(a) सक्रिय ज्वालामुखी

(b) जागृत ज्वालामुखी

(c) सुषुप्त ज्वालामुखी

(d) शान्त ज्वालामुखी

उत्तर- (c) सुषुप्त ज्वालामुखी

Group B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

( लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

2. Discuss the Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट द्वारा दी गयी वायव्य राशि परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

3. Explain the importance of study of internal structure of Earth.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के महत्व की व्याख्या कीजिए।

4. Discuss about the different types of Weathering.

अपक्षय के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए।

5. Describe the characteristics of Divergent/Constructive Plate Margins.

अपसारी / रचनात्मक प्लेट किनारे की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।

6. Give the definition of Earthquake.

भूकम्प की परिभाषा दीजिए।

7. Explain the effects of volcano on human activities.

ज्वालामुखी के मानवीय क्रियाकलापों पर होने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिए।

Group-C / समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3×10 = 30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

8. Discuss the internal structure of Earth with suitable diagram.

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।

9. Describe the solar system and any one theory regarding its origin

सौर मण्डल एवं उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिये गये किसी एक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।

10. Explain the different types of rocks.

चट्टानों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

11. What is an Earthquake? Describe about the origin of Earthquake.

भूकम्प क्या है? भूकम्प की उत्पत्ति के कारणों की विवेचना कीजिए।

12. Describe the landforms made by volcanic activity with diagram.

ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों का सचित्र वर्णन कीजिए।


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Group B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions. Each question carries 5 marks. [4×5=20]

किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

2. Discuss the Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट द्वारा दी गयी वायव्य राशि परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

3. Explain the importance of study of internal structure of Earth.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना के अध्ययन के महत्व की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

4. Discuss about the different types of Weathering.

अपक्षय के विभिन्न प्रकारों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है

अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

    भौतिक ऋतुक्षरण में चट्टानें टूटती तो जरूर है साथ ही उनका भौतिक स्वरूप भी बदल जाता है, लेकिन उसमें रासायनिक परिवर्तन नहीं होता है। भौतिक ऋतुक्षरण तीन क्रियाओं से होता है

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा:-
     तुषार क्रिया में क्रमिक रूप से जल जमता और पिघलता रहता है। जब तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है तब जल बर्फ में बदल जाता है और उसका आयतन बढ़ जाता है। एक घन सेंटीमीटर जब जल जमता है तो डेढ़ सौ किलोग्राम के बराबर चट्टानों पर प्रहार करता है। इससे स्पष्ट होता है कि तुषार की क्रिया चट्टानों को तोड़ने में सक्षम है। उच्च अक्षांशीय प्रदेश में और पर्वतीय भाग के ऊंचे क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं देखी जा सकती है।

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया मुख्यत: उष्ण एवं शीतोष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र में सक्रिय रहती है। तापीय प्रभाव के कारण चट्टानें फैलती और सिकुड़ती है। अधिक तापमान पर चट्टानें फैलती है और निम्न तापमान पर सिकुड़ती है।

     मरुस्थलीय क्षेत्रों में तापमान दिन में अधिक हो जाता है और रात में अत्यधिक कम हो जाता है जिसके चलते चट्टानें टूटकर बालू का निर्माण करते हैं।

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया ग्रेनाइट चट्टानों वाले क्षेत्र में होता है। ग्रेनाइट चट्टानी अगर बड़ी एवं मोटी हो तो तापीय प्रभाव के कारण चट्टान का ऊपरी भाग गर्म होकर फैल जाता है जबकि उसे चट्टान के आंतरिक भाग में तापमान कम रहने के कारण फैल नहीं पता है जिसके परिणामस्वरुप चट्टान का ऊपरी परत प्याज के छिलके की भांति टूटती रहती है। इसी प्रक्रिया को अपदलन कहते हैं। इसे प्याज ऋतुक्षरण भी कहा जाता है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

     जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

5. Describe the characteristics of Divergent/Constructive Plate Margins.

अपसारी / रचनात्मक प्लेट किनारे की विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे के विपरीत गतिशील होती हैं, अर्थात एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहाँ नीचे से मैग्मा ऊपर उठकर नयी प्लेट का निर्माण करता है। नयी प्लेट के निर्माण के कारण इसे रचनात्मक किनारा भी कहते हैं। इन किनारों पर पाए जाने वाले सबसे प्रमुख स्थलरूप मध्य महासागरीय कटक हैं।

⇒ जब यह किनारा किसी महाद्वीप पर स्थित होता है तो रिफ्ट घाटियों (Rift Valleys) का निर्माण होता है।

6. Give the definition of Earthquake.

भूकम्प की परिभाषा दीजिए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है-भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

        इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★ समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र- भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)- अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

7. Explain the effects of volcano on human activities.

ज्वालामुखी के मानवीय क्रियाकलापों पर होने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का प्रभाव:

    मानवीय क्रियाकलापों को ज्वालामुखी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभावित करता है।

1. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का सकारात्मक प्रभाव:

       मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखियों के सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी से बहुत सारे नए भू-आकृतियों का निर्माण होता है। जैसे- क्रेटर और काल्डेरा झीलें, लावा मैदान, गेसर, ज्वालामुखीय पठार और ज्वालामुखी पर्वत।

⇒ यह दुर्बलमंडल (Asthenosphere) से सतह पर सोना, लोहा, निकेल और मैग्नीशियम जैसे मूल्यवान तत्व को पृथ्वी के सतह पर लाता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग का सोना और कनाडा में सडबरी का निकेल निक्षेप ज्वालामुखी निक्षेपण के उदाहरण हैं।

⇒ आग्नेय शैल लावा के ठंडा होने के बाद बनता है, जिसका उपयोग निर्माण जैसी विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है।

⇒ ज्वालामुखी हमें उपजाऊ भूमि प्रदान करते हैं। ज्वालामुखी की धूल और राख का जमाव भूमि को उपजाऊ बनाता है। उदाहरण के लिए, दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी और जावा द्वीपों की उपजाऊ भूमि ज्वालामुखी द्वारा बनाई गई है।

⇒ यह सुंदर दृश्य भी बनाता है और जिससे यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।

⇒ यह पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में भी बहुत सारी जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं और प्लेटों की गति की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

⇒ यह भूतापीय ऊर्जा का एक संभावित स्रोत भी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, इटली और जापान जैसे कई देश भूतापीय ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।

2. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का नकारात्मक प्रभाव:

      मनुष्य पर ज्वालामुखी के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-

⇒ ज्वालामुखी की धूल और गैसें वातावरण को अपारदर्शी बना देती हैं जिससे वायु परिवहन मुश्किल हो जाता है, श्वसन रोग बढ़ जाता है और सूर्यातप को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से भी रोकता है अर्थात यह पृथ्वी को ठंण्डा करता है।

⇒ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद क्षेत्र में लावा का जमाव होने से वहाँ की जमीन को सरंध्र बनाती है जिससे क्षेत्र में पानी की कमी हो जाती है।

⇒ ज्वालामुखियों के अचानक फटने से मानव बस्ती, मानव जीवन और उसकी संपत्ति को काफी नुकसान होता  है। उदाहरण के लिए, माउंट वेसुवियस (जो एक ज्वालामुखी विस्फोट से बना है) ने 78 ई० में इटली में पोम्पेई शहर को नष्ट कर दिया।

⇒ जब समुद्र में ज्वालामुखियों का विस्फोट होता है तो यह आसपास के जल को गर्म कर देता है जिससे की वहाँ के जलीय जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।

Group-C / समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marks. [3× 10 = 30]

किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंक का है।

8. Discuss the internal structure of Earth with suitable diagram.

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

       स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

9. Describe the solar system and any one theory regarding its origin

सौर मण्डल एवं उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में दिये गये किसी एक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।

        इस ब्रह्माण्ड में हमारा सौरमंडल सबसे अलग है। इसका आकार एक तश्तरी की तरह है। सौर मंडल का निर्माण लगभग 5 बिलियन वर्ष पहले हुई थी, जब एक नए तारे का जन्म हुआ था जिसे हम सूर्य के नाम से जानते हैं। सूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोल पिण्डों को ग्रह कहते हैं। सौरमंडल के उत्पति के संदर्भ में कई सिद्धान्त दिए गए है। पहला सिद्धान्त  ‘कास्ते-द-बफन’ के द्वारा प्रतिपादित किया गया था।

⇒ उन्होंने 1749 ई० में ‘पुच्छल तारा परिकल्पना’ (Comet Hyppothesis) प्रस्तुत किया।

⇒ इनके सिद्धान्त के बाद कई विद्वानों ने अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

⇒ इन सिद्धांतों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कुछ विद्वानों का मानना है कि हमारी पृथ्वी / सौरमंडल के निर्माण में केवल एक ही तारा का योगदान है जबकि कुछ लोगों के मतानुसार हमारे पृथ्वी के निर्माण में एक से अधिक तारों का योगदान है।

⇒ तारों की संख्या के आधार पर सभी सिद्धान्तों को दो भागों में बाँटते है।

(A) अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic Concept):-

⇒ इसमें एक ही तारे से सम्पूर्ण ग्रहों की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया है।

⇒ इसे (पैतृक संकल्पना) भी कहते है। इसके अनुसार सम्पूर्ण ग्रहों  की उत्पत्ति में एक ही पिता तारे की भूमिका रही है।

⇒ इस संकल्पना पर चार सिद्धान्त दिए गए है:-

1. पुच्छलतारा परिकल्पना (1749)- कास्ते-द-बफन

2. वायव्य राशि परिकल्पना (1755)- इमैनुएल कांट

3. निहारिका परिकल्पना (1796)- लाप्लास

4. उल्कापिंड परिकल्पना (1919)– लॉकियर

(B) द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic Concept):-

⇒ इस संकल्पना में ग्रहों की उत्पति दो तारों से मानी गई है।

⇒ इस सिद्धांत के अनुसार ग्रहों की उत्पति को आकस्मिक घटना से जोड़ा जाता है।

⇒ द्वैतवादी संकल्पना पर आधारित प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है:

1. ग्रहाणु परिकल्पना (1905)- टी०सी० चैम्बरलिन

2.ज्वारीय परिकल्पना (1919)– जेम्स जीन्स एवं जेफरीज

3. द्वैतारक परिकल्पना- एच० एन० रसेल

4. विखण्डन का सिद्धान्त– रॉसजन

5. विधुत चुम्बकीय परिकल्पना– डॉ० आल्फवेन

6.निहारिका मेघ सिद्धान्त (1974)- डॉ० वॉन विजसैकर

7. नवतारा परिकल्पना-  फ्रेड होयल एवं लिटिलटन 

8. अन्तरतारक धूलकण परिकल्पना- ऑटो श्मिड

9. सिफीड संकल्पना- ए० सी० बनर्जी

10. घूर्णन एवं ज्वारीय परिकल्पना- रॉसजन

11. वृहस्पति- सूर्य द्वैतारक- ई० एम० ड्रोवीशेवस्की

जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना:-

       सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

       यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

             पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

           जेफरीज ने ‘ज्वारीय परिकल्पना’ में, जिससे ग्रहों का निर्माण सूर्य तथा पास आते हुये तारे के संयोग से बताया गया है, संशोधन प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार दो तारों (सूर्य तथा पास आता हुआ तारा) के अलावा एक और तारा था, जिसे उन्होंने सूर्य का साथी बताया है। पास आता हुआ तारा इस साथी तारे की ही सीध में बढ़ रहा था, जिस कारण दोनों में टक्कर हो गयी। फलस्वरूप कुछ भाग आकाश में बिखर गया। जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

          लघु ग्रह तथा उपग्रह घनीभवन की मन्द क्रिया (Slow condensation) के फलस्वरूप नहीं बने, वरन् आंशिक रूप में ठोस होने अथवा तरल होने के कारण शीघ्र निर्मित हो गये। गैसों के विस्तार के फलस्वरूप शीतल होने तथा ऊपरी सतह से विकिरण (Radiation) द्वारा इन लघु ग्रहों तथा उपग्रहों में शीघ्र ही तरल केन्द्र (liquid core) का निर्माण हो गया।

            इस रूप में पृथ्वी तब तक शीतल होती गयी, जब तक कि वह पूर्ण रूप से तरल नहीं हो गयी। इसके बाद विकिरण द्वारा तापह्रास होने के कारण पृथ्वी के पदार्थ ठोस होने लगे तथा घनत्व के अनुसार उसमें विभिन्न मेखलाएं (zones) बन गयीं। ये सभी घटनाएं शीघ्रता से अल्प समय में घटित हुईं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दू है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके काण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

10. Explain the different types of rocks.

चट्टानों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं।

      पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

        स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

          वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

        वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है,अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालिय चट्टान (Plutonic Rock)

         इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं।अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

         इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे-ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

       इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे-गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली ‘मेसा’ को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे लैकोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

11. What is an Earthquake? Describe about the origin of Earthquake.

भूकम्प क्या है? भूकम्प की उत्पत्ति के काणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

          इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
      भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)–

     अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है। जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

 भूकम्प के प्रकार

    भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

      गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

I. छिछला भूकम्प– फोकस 70 KM से ऊपर होता है।

II. मध्यम भूकम्प– फोकस 70-300 KM के बीच

III. गहरा भूकम्प– फोकस 300-700 KM के बीच

(C) समय के आधार पर

     समय के आधार पर भूकम्प दो प्रकार के होते है:-

I. धीमा भूकम्प

II. अचानक भूकम्प

      धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

     अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वतका निर्माण होता है।

★ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

        भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण :-

I. परमाणु विस्फोट

II. मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

III. बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

IV. पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण, वन ह्रास इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

       ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

1) प्रत्यास्य पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्य चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

      इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

I. अपसरण सीमा

II. अभिसरण सीमा

III. संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

I. चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

II. एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

III. पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

IV. दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

          जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
         जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है। जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह संरक्षी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
Earthquake
      इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

       विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर– विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्विपीय क्षेत्र– यह क्षेत्र यूरेनियम प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र- अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार आइसलैंड से अंटार्कटिका तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

मार्सेली पैमाना

       मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

        रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता मापन 1 से 9 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन 10 के घात के रूप में होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
       
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

       भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

I. P तरंग

II. S तरंग

III. L तरंग

(B) गौण तरंग

I. P* & S*

II. Pg & Sg

P तरंग 

   P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य और गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है। 

S तरंग

      S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है।

★ P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

Earthquake
P* & S* तरंग 

         पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:- (1) ग्रेनाइट  &  (2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

 P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

          ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

         Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।

12. Describe the landforms made by volcanic activity with diagram.

ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर- ज्वालामुखी क्रिया:- ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।

            जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ जल एवं बाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।

           क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।

       ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”

 ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर:- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रका के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


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Questions Bank

2023 में पाटलिपुत्र विश्विधालय द्वारा आयोजित सेमेस्टर-1 की वार्षिक परीक्षाओं का प्रश्न-पत्र यहाँ उपलब्ध है।
     Geomorphology (Theory) First Semester का Solved Exam Paper देखने के लिए नीचे क्लिक करें-

1. Major Course (MJC-1)

2. Minor Course (MIC-1)

3. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science

5. Multidisciplinary Course (MDC-1) For B.Com

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science and Commerce

(Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science and Commerce)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023



(Patliputra University Patna)

Multidisciplinary Course

GROUP-A / समूह-अ

(Objective Type Questions)

( वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: Attempt all MCQ from this section. Each question carries 2 marks.

[2×10=20]

इस खण्ड से सभी बहुविकल्पीय प्रश्नों को हल कीजिए। प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का है।

1. (i) Russel and Lyttleton gave following hypothesis:

(a) Binary star hypothesis

(b) Nova star hypothesis

(c) Planetesimal hypothesis

(d) Tidal hypothesis

रसेल एवं लिटिलटन द्वारा दी गयी परिकल्पना है:

(a) द्वैतारक परिकल्पना

(b) नवतारा परिकल्पना
(c) ग्रहाणु परिकल्पना

(d) ज्वारीय परिकल्पना

उत्तर- (a) द्वैतारक परिकल्पना-रसेल

(b) नवतारा परिकल्पना-लिटिलटन

(ii) Moon is a:

(a) Planet

(b) Satellite

(c) Asteroid

(d) Nebula

चन्द्रमा एक है:

(a) ग्रह

(b) उपग्रह

(c) क्षुद्र ग्रह

(d) निहारिका

उत्तर- (b) उपग्रह

(iii) The crust contains:

(a) Sial + Sima

(b) Sima + Nife

(c) Sima

(d) Sial + Upper limit

क्रस्ट में सम्मिलित है:

(a) सियाल + सिमा

(b) सिमा + निफे

(c) सिमा

(d) सियाल + ऊपरी सिमा

उत्तर- (d) सियाल + ऊपरी सिमा

(iv) The innermost layer of the earth is:

(a) Core

(b) Crust

(c) Mantle

(d) Substratum

पृथ्वी की सबसे आंतरिक परत है:

(a) कोर

(b) क्रस्ट

(c) मैन्टल

(d) अधःस्तर

उत्तर- (a) कोर

(v) The breaking down or dissolving of rocks and minerals on Earth surface is known as:

(a) Mass wasting

(b) Weathering

(c) Denudation

(d) Decomposition

पृथ्वी की सतह पर चट्टानों के टूटने अथवा घुलने की प्रक्रिया को कहते है:

(a) वृहद क्षरण

(b) अपरदन

(c) अनाच्छादन

(d) अपघटन

उत्तर- (b) Weathering (अपक्षयण)

(vi) Marble is a a type of.. ……. rock.

(a) Sedimentary

(b) Metamorphic

(c) Igneous

(d) Residual

संगमरमर एक तरह की चट्टान है।

(a) अवसादी

(b) कायान्तरित

(c) आग्नेय

(d) अवशिष्ट

उत्तर- (b) कायान्तरित

(vii) An example of Igneous rocks is:

(a) Granite

(b) Slate

(c) Coal

(d) Gniess

आग्नेय चट्टान का एक उदाहरण है:

(a) ग्रेनाइट

(b) स्लेट

(c) कोयला

(d) नाइस

उत्तर- (a) ग्रेनाइट

(viii) India is part of which Plate?

(a) Eurasia

(b) Indo-Australia

(c) China

(d) Pacific

भारत किस प्लेट के अन्तर्गत आता है?

(a) यूरेशिया

(b) इण्डो-आस्ट्रेलिया

(c) चीन

(d) प्रशान्त

उत्तर- (b) इण्डो-आस्ट्रेलिया

(ix) Which scale is used to measure the intensity of Earthquake?

(a) Read scale

(b) Richter scale

(c) Holmes scale

(d) Vernier scale

भूकंप की तीव्रता मापने के लिए किस मापक का प्रयोग करते हैं?

(a) रीड स्केल

(b) रिक्टर स्केल

(c) होम्स स्केल

(d) वर्नियर स्केल

उत्तर- (b) रिक्टर स्केल

(x) Which is the landforms formed by volcano :

(a) Fujiyama

(b) Aravali
(c) Alps

(d) Rockies

ज्वालामुखी से बनी भू-आकृति कौन-सी है?

(a) फूजीयामा

(b) अरावली

(c) आल्पस

(d) रॉकीज

उत्तर- (a) फूजीयामा

GROUP-B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks.

[5×4=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।
2. Discuss the binary star hypothesis given by Russel and Lyttleton,

रसेल एवं लिटिलटन द्वारा दी गयी द्वैतारिक परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

3. Describe the importance of Crust on Earth.

पृथ्वी पर क्रस्ट के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।

4. Explain the process of physical weathering.

भौतिक अपरदन की प्रक्रिया को समझाइए |

5. State the different types of rocks with example.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार उदाहरण के साथ बताइए।

6. Explain the different types of plate in plate tectonic theory.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में बताए गए विभिन्न प्लेटों की व्याख्या कीजिए।

7. What is Tsunami?

सुनामी किसे कहते हैं?

GROUP-C/ समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marksk. [10×3=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए । प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Discuss the internal structure of the Earth with suitable diagrams.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र चर्चा कीजिए।

9. What is weathering and its different types?

अपरदन एवं उसके विभिन्न प्रकार क्या हैं?

10. Explain the different tyeps of rocks and its importance.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार तथा उनके महत्त्व के बारे में व्याख्या कीजिए।
11. Discuss the plate tectonic theory with suitable diagrams.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का सचित्र विवरण प्रस्तुत कीजिए।

12. State the different types of Earthquake and its distribution around the world.

भूकंप के प्रकार बताते हुए, उनके विश्व वितरण को समझाइए।

13. Define Volcano and explain the different landforms formed by volcanic activities.

ज्वालामुखी की परिभाषा देते हुए, ज्वालामुखी क्रिया से संबंधित भूदृश्यों का वर्णन कीजिए।


सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें


GROUP-B / समूह-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following. Each question carries 5 marks.

[5×4=20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न 5 अंकों का है।
2. Discuss the binary star hypothesis given by Russel and Lyttleton,

रसेल एवं लिटिलटन द्वारा दी गयी द्वैतारिक परिकल्पना की चर्चा कीजिए।

उत्तर- जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

      आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दू थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी सेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

3. Describe the importance of Crust on Earth.

पृथ्वी पर क्रस्ट के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- भूपर्पटी (Crust):-

        यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

      महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

महत्त्व

        पृथ्वी की पपड़ी और अंतर्निहित कठोर आवरण स्थलमंडल का निर्माण करते हैं, जिसमें तेल और गैस सहित विभिन्न प्रकार के खनिज और चट्टानें शामिल हैं। अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण के विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले सभी कच्चे माल का 80% से अधिक खनिज इसी स्थलमंडल में पाए जाते है। उका उपयोग सड़कों, रेलवे ट्रैक, हवाई अड्डों, सुरंगों, नहरों, बांध स्थलों, ऊंची इमारतों, औद्योगिक बस्तियों, कृषि, आभूषण, चिकित्सा और कई अन्य प्रमुख निर्माण परियोजनाओं में होता है। इनकी मांग हर दिन अधिक होती जा रही है।

4. Explain the process of physical weathering.

भौतिक अपरदन की प्रक्रिया को समझाइए।

उत्तर- भौतिक ऋतुक्षरण में चट्टानें टूटती तो जरूर है साथ ही उनका भौतिक स्वरूप भी बदल जाता है, लेकिन उसमें रासायनिक परिवर्तन नहीं होता है। भौतिक ऋतुक्षरण तीन क्रियाओं से होता है

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा

A. तुषार प्रक्रिया द्वारा:-
     तुषार क्रिया में क्रमिक रूप से जल जमता और पिघलता रहता है। जब तापमान हिमांक से नीचे चला जाता है तब जल बर्फ में बदल जाता है और उसका आयतन बढ़ जाता है। एक घन सेंटीमीटर जब जल जमता है तो डेढ़ सौ किलोग्राम के बराबर चट्टानों पर प्रहार करता है। इससे स्पष्ट होता है कि तुषार की क्रिया चट्टानों को तोड़ने में सक्षम है। उच्च अक्षांशीय प्रदेश में और पर्वतीय भाग के ऊंचे क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाएं देखी जा सकती है।

B. तापीय प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया मुख्यत: उष्ण एवं शीतोष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र में सक्रिय रहती है। तापीय प्रभाव के कारण चट्टानें फैलती और सिकुड़ती है। अधिक तापमान पर चट्टानें फैलती है और निम्न तापमान पर सिकुड़ती है।

     मरुस्थलीय क्षेत्रों में तापमान दिन में अधिक हो जाता है और रात में अत्यधिक कम हो जाता है जिसके चलते चट्टानें टूटकर बालू का निर्माण करते हैं।

C. अपदलन प्रक्रिया द्वारा:-

     यह क्रिया ग्रेनाइट चट्टानों वाले क्षेत्र में होता है। ग्रेनाइट चट्टानी अगर बड़ी एवं मोटी हो तो तापीय प्रभाव के कारण चट्टान का ऊपरी भाग गर्म होकर फैल जाता है जबकि उसे चट्टान के आंतरिक भाग में तापमान कम रहने के कारण फैल नहीं पता है जिसके परिणामस्वरुप चट्टान का ऊपरी परत प्याज के छिलके की भांति टूटती रहती है। इसी प्रक्रिया को अपदलन कहते हैं। इसे प्याज ऋतुक्षरण भी कहा जाता है।

5. State the different types of rocks with example.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार उदाहरण के साथ बताइए।

उत्तर-

     चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

6. Explain the different types of plate in plate tectonic theory.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत में बताए गए विभिन्न प्लेटों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- प्लेटों का स्वभाव:-
      इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई 100 KM और न्यूनतम मोटाई 5 KM तथा औसत मोटाई 70 KM है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(a) अरेबियन प्लेट
(b) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(c) कोकस प्लेट
(d) नास्का प्लेट
(e) स्कोशिया प्लेट
(f) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
     इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
       
            स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
       संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
         
        महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है
सीमा या सीमांत
        इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है। इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं बांटी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-

7. What is Tsunami?

सुनामी किसे कहते हैं?

       भूकंप और ज्वालामुखी से महासागरीय धरातल मे अचानक हलचल पैदा होती है और महासागरीय जल का अचानक विस्थापन होता है। परिणामस्वरूप समुद्री जल में उर्ध्वाधर ऊँची तरंगे पैदा होती है, इन्हें ही सुनामी या भूकम्पीय समुद्री लहरें कहा जाता है।  अर्थात समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।      

सुनामी का कारण

        समुद्र जल कभी भी शांत नही रहता है। समुद्री जल मे हलचल होना स्वाभाविक है। भूकंप और ज्वालामुखी का समुद्री क्षेत्रों मे आना ही सुनामी आपदा का प्रमुख कारण है। जब समुद्री क्षेत्रों के धरातल मे अचानक ज्वालामुखी या भूकम्प के उदभेदन की क्रिया होती है तो समुद्र जल मे गतिशीलता बढ़ती है जिसके कारण समुद्री जल में ऊँची तरंगे उत्पन्न होती है जो तटीय क्षेत्रों में विनाश का कारण बनती है।

GROUP-C/ समूह-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions. Each question carries 10 marksk. [10×3=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए । प्रत्येक प्रश्न 10 अंकों का है।

8. Discuss the internal structure of the Earth with suitable diagrams.

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सचित्र चर्चा कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

9. What is weathering and its different types?

अपरदन एवं उसके विभिन्न प्रकार क्या हैं?

उत्तर– अपरदन वह क्रिया है जिसमें गतिशील अभिकरणों (Mobile Agencies) द्वारा शिलाखंडों का स्थानांतरण होता है। अपरदन के अंतर्गत तीन क्रियाएं सन्निहित हैं।

(क) परिवहन या अपनयन (Transportation):-

        इसमें ऋतुक्षरित चट्टानें कमजोर होकर अपरदन के दूतों के द्वारा बहाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है और निम्न भागों में निक्षेपण का कार्य किया जाता है स्रोत क्षेत्र से चट्टानों को उठाकर दूसरे स्थान पर पहुंचा देने वाले कारकों को अपरदन का दूत (बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग) कहा जाता है।    

(ख) अपघर्षण (Corrasion):-

     जब चट्टानों के टुकड़े अपरदन की शक्तियों (बहता जल, हिमानी, पवन आदि) द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाये जाते हैं तो वे धरातल की सतह को घिसते एवं काटते रहते हैं, इसे ही अपघर्षण कहा जाता है।

(ग) निक्षेपण (Deposition):-

        अपरदन के विभिन्न कारक परिवहन कार्य करने के बाद अपने साथ लाये गये मलबे को अपनी वाहन शक्ति के अनुसार जगह-जगह छोड़ते जाते हैं, जिसे निक्षेपण कहते हैं। निक्षेपण क्रिया से धरातल ऊंचा-नीचा हो जाता है। इस कार्य को बहता हुआ नदी, भूमिगत जल, हिमानी, वायु तथा सागरीय लहरें सम्पन्न करती हैं। निक्षेपण की इस अवस्था में धरातल पर विभिन्न भू-आकृतियों का जन्म एवं विकास होता है। 

अपरदन के प्रकार

    अपरदन के विभिन्न रूप अपरदन की भिन्न-भिन्न क्रियाओं में सम्पन्न होते हैं, जिसका विवरण निम्नलिखित है:-

(i) सन्नीघर्षण (Attrition):-

        एक ही प्रकार के चट्टानों का आपस में टकराना और टूटना सन्नीघर्षण कहलाता है।

(ii) अपघर्षण (Abrasion or corrasion):-

       जब दो विभिन्न प्रकार के चट्टान आपस में टकराकर टूटते हैं तो अपघर्षण कहलाता है।

(iii) उत्पाटन (Plucking):-

      अपरदन के दूतों के द्वारा चट्टानों को उखाड़ कर फेंकना उत्पाटन कहलाता है।

(iv) अपवाहन (Deflation):-

         वायु के द्वारा चट्टानों का उड़ा कर ले जाना अपवाहन कहलाता है।  यह क्रिया शुष्क मरुस्थलीय भागों में अधिक होती है। 

(v) स्थानांतरण या भूस्खलन (Landslide):-

          गुरुत्वाकर्षण बल के कारण चट्टानों का ऊपर से नीचे गिरना या खिसकना स्थानांतरण कहलाता है। 

(vi) अपक्षालन (Leaching):-

        अपरदन के दूतों के द्वारा छोटे एवं महीन चट्टानी कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना अपक्षालन कहलाता है।

(vii) संक्षारण (corrosion):-

       रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा चट्टानों का टूटना और दूसरे स्थान पर जमा करना संक्षारण कहलाता है। इस प्रकार संक्षारण रासायनिक क्षरण की एक प्रक्रिया है।

(viii) जलगति क्रिया (Hydraulic Action):-

            यह एक यान्त्रिक क्रिया है। इसमें बहता हुआ जल अपने वेग तथा दबाव के कारण मार्ग में स्थित चट्टानी कणों को अपने साथ बहाकर ले जाता है।   

10. Explain the different tyeps of rocks and its importance.

चट्टानों के विभिन्न प्रकार तथा उनके महत्त्व के बारे में व्याख्या कीजिए।

उत्तर- भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं।

      पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

        स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

          वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

        वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है,अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालिय चट्टान (Plutonic Rock)

         इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं।अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

         इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे-ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

       इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे-गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली ‘मेसा’ को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे लैकोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

11. Discuss the plate tectonic theory with suitable diagrams.

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का सचित्र विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे-पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर नया विचार प्रस्तुत करता है।

      इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त  कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों का योगदान है। लेकिन हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया। 
प्लेटों का स्वभाव
       इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई 100 KM और न्यूनतम मोटाई 5 KM तथा औसत मोटाई 70 KM है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(a) अरेबियन प्लेट
(b) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(c) कोकस प्लेट
(d) नास्का प्लेट
(e) स्कोशिया प्लेट
(f) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
      इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
       
        स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
       
संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
            महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है।
सीमा या सीमांत         
       
        इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है। इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं बांटी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
 प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
              इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे- पृथ्वी के घूर्णन गति, प्लवनशीलता बल, गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन, सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल, संवहन तरंग आदि।
                  इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे – निर्माणकारी गति की उत्पत्ति अपसरण सीमा के सहारे होती है, विनाशकारी गति की उत्पति अभिसारी सीमा के सहारे तथा संरक्षी गति संरक्षी सीमा के सहारे उत्पन्न होता है।
प्लेटों का क्रियाविधि
         उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-
इस सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण 
           
         प्लेट विवर्तनिकी के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है-
1. ज्वालामुखी विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।
2. भूकम्प भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।
3. सागर नितल प्रसार और पुराचुमकत्व– सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुमकत्व का गुण कम तथा पुराने चाट्टानों में चुमकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।
4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान  
           प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचालन, महाद्विपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुमकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।
आलोचना
        उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियां है। जैसे –  प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है, प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है?, हरसिनियन और कैलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है, बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता।   

         इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।

12. State the different types of Earthquake and its distribution around the world.

भूकंप के प्रकार बताते हुए, उनके विश्व वितरण को समझाइए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है-भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

          इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★ समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र- भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)– अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है । जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

 भूकम्प के प्रकार

      भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

       गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

I. छिछला भूकम्प– फोकस 70 KM से ऊपर होता है।

II. मध्यम भूकम्प– फोकस 70-300 KM के बीच

III. गहरा भूकम्प– फोकस 300-700 KM के बीच

(C) समय के आधार पर

        समय के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है:-

I. धीमा भूकम्प

II. अचानक भूकम्प

   धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

 अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है।

★ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

भूकम्प का वितरण

     विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर– विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्विपीय क्षेत्र– यह क्षेत्र यूरेनियम प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र- अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार आइसलैंड से अंटार्कटिका तक हुआ है।

13. Define Volcano and explain the different landforms formed by volcanic activities.

ज्वालामुखी की परिभाषा देते हुए, ज्वालामुखी क्रिया से संबंधित भूदृश्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- ज्वालामुखी क्रिया:- ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।

            जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ जल एवं बाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।

           क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।

       ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”

 ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर:- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रका के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।


Read More:-

Questions Bank

2023 में पाटलिपुत्र विश्विधालय द्वारा आयोजित सेमेस्टर-1 की वार्षिक परीक्षाओं का प्रश्न-पत्र यहाँ उपलब्ध है।
     Geomorphology (Theory) First Semester का Solved Exam Paper देखने के लिए नीचे क्लिक करें-

1. Major Course (MJC-1)

2. Minor Course (MIC-1)

3. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science

5. Multidisciplinary Course (MDC-1) For B.Com

2. Minor Course / Geomorphology (Theory) Solved Questions Paper 2023

(Minor Course or MIC-1)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023



(Patliputra University Patna)

Minor Course

Part A / भाग-अ

(Objective Type Questions)

(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: All questions are compulsory. Select the correct answer from the alternatives given below [2×10-20]

सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

1. (i) Which one of the following figures represents the age of the earth?

(a) 4.54 billion years

(b) 4.54 million years

(c) 13.7 billion years

(d) 13.7 trillion years

निम्नलिखित अंकों में से कौन पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करता है?

(a) 4.54 अरब वर्ष

(b) 4.54 मिलियन वर्ष

(c) 13.7 अरब वर्ष

(d) 13.7 खरब वर्ष

उत्तर- (a) 4.54 अरब वर्ष

(ii) The Gaseous Hypothesis regarding the origin of the earth is given by:

(a) Immanuel Kant

(b) Laplace

(c) Chamberlin and Moulton

(d) Jeans and Jefferys

पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी वायव्य-राशि परिकल्पना दी गई है :

(a) इमैनुएल काण्ट

(b) लाप्लास

(c) चेम्बलिन तथा मोल्टन

(d) जीन्स तथा जैफीस

उत्तर- (a) इमैनुएल काण्ट

(iii) What is the average density of the Earth?

(a) 3.5 gm/cm³

(b) 4.5 gm/cm³

(c) 5.5 gm/cm³

(d) 6.5 gm/cm³

पृथ्वी का औसत घनत्व कितना है?

(a) 3.5 gm/cm³

(b) 4.5 gm/cm³

(c) 5.5 gm/cm³

(d) 6.5 gm/cm³

उत्तर – (c) 5.5 gm/cm³

(iv) Physical weathering is also known as

(a) Mass weathering

(b) Material weathering

(c) Mechanical weathering

(d) Monitor weathering

भौतिक अपक्षय को के रूप में भी जाना जाता है।

(a) बृहत् अपक्षय

(b) प्रदार्थ अपक्षय

(c) यांत्रिक अपक्षय

(d) निगरानी अपक्षय

उत्तर – (c) यांत्रिक अपक्षय

(v) Which of the following is not a Metamorphic rock?

(a) Marble

(b) Sand stone

(c) Quartzite

(d) Slate

निम्नलिखित में से कौन कायान्तरित चट्टान नहीं है?

(a) संगमरमर

(b) बलुआ पत्थर

(c) क्वार्ट्जाइट

(d) स्लेट

उत्तर- (b) बलुआ पत्थर 

(vi) Which of the following is the hardest mineral?

(a) Topaz

(b) Quartz

(c) Diamond

(d) Feldspar

निम्नलिखित में से कौन-सा कठोरतम खनिज है?

(a) टोपाज

(b) क्वार्ट्ज

(c) हीरा

(d) फेल्सपार

उत्तर – (c) हीरा

(vii) Laurasia and Gondwana land were separated by:

(a) Black sea

(b) Red sea

(c) Pacific Ocean

(d) Tethys sea

लॉरेशिया और गोंडवाना भूमि अलग कर दिए गए थे।

(a) काला सागर के द्वारा

(b) लालसागर के द्वारा

(c) प्रशान्त महासागर के द्वारा-

(d) टेथिस सागर के द्वारा

उत्तर- (d) टेथिस सागर के द्वारा

(viii) Most earthquakes happen along the:

(a) Fault

(b) Volcanic mountain

(c) Mid-oceanic ridge

(d) Pacific ring of fire

ज्यादातर भूकम्प इसी के सहारे आते हैं

(a) भ्रंश

(b) ज्वालामुखी पर्वत

(c) मध्य महासागरीय कटक

(d) प्रशान्त अग्नि- मेखला

उत्तर- (d) प्रशान्त अग्नि- मेखला

(ix) What is the name of the largest active volcano on earth?

(a) Mauna Loa

(b) Kilauea

(c) Mount Etna

(d) Stromboli

पृथ्वी पर सबसे बड़े सक्रिय ज्वालामुखी का क्या नाम

(a) मौना लोआ

(b) किलाउआ

(c) माउंट एटना

(d) स्ट्राम्बोली

उत्तर- (a) मौना लोआ

(x) Where do Earthquakes occur most frequently?

(a) Along the plate boundaries

(b) Uppermost layers

(c) Core

(d) Mantle

भूकम्प अधिकांशतः बार-बार कहाँ घटित होते हैं?

(a) प्लेट सीमाओं के सहारे

(b) सबसे ऊपरी सतहों पर

(c) केन्द्र

(d) मेंटल

उत्तर- (a) प्लेट सीमाओं के सहारे

Part-B / भाग-ब

(Short Answer Type Questions)

(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following:

[4×5-20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए

2. Write a short note on Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना पर एक लघु नोट लिखिए।

3. What is the internal structure of the earth according to Suess?

स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना क्या है?

4. Name the four processes involved in chemical weathering.

रासायनिक अपक्षय में संलग्न चार प्रक्रियाओं के नाम लिखिए।

5. What are rocks and state its types?

चट्टानें क्या हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।

6. What are primary Earthquake waves?

प्राथमिक भूकम्पीय तरंगें क्या हैं?

7. Differentiate between rocks and minerals.

चट्टानों और खनिजों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए ।

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following:

[3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

8. What is Weathering? Explain its types with examples.

अपक्षय क्या है? इसके प्रकारों का उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।

9. Compare the views of Davis and Penck about the cycle of erosion.

अपरदन चक्र के बारे में डेविस तथा फेंक के विचारों की तुलना कीजिए।

10. What is Earthquake? Discuss causes, types and consequences of earthquakes.

भूकम्प क्या है? भूकम्पों के कारण, प्रकार और परिणामों की चर्चा कीजिए।

11. Write a note on different types of Landforms resulting from volcanic activities.

ज्वालामुखी क्रियाओं के परिणामस्वरूप विकसित होने वाली स्थलाकृतियों पर एक नोट लिखिए।

12. Give a reasoned account of the constitution of the interior of the earth.

पृथ्वी की आंतरिक संचना का सकारण विवरण दीजिए।


सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें


Part-B / भाग-ब
(Short Answer Type Questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any four questions of the following:

[4×5-20]

निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए

2. Write a short note on Gaseous Hypothesis of Kant.

काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना पर एक लघु नोट लिखिए।

उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

3. What is the internal structure of the earth according to Suess?

स्वेस के अनुसार पृथ्वी की आंतरिक संरचना क्या है?

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

4. Name the four processes involved in chemical weathering.

रासायनिक अपक्षय में संलग्न चार प्रक्रियाओं के नाम लिखिए।

उत्तर- जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

5. What are rocks and state its types?

चट्टानें क्या हैं? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं।

      पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं। अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

         उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

     आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

चट्टानें

आग्नेय चट्टान

आग्नेय चट्टान

ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

आग्नेय चट्टान के प्रकार

        स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

          वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igeous Rocks)-

        वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है,अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालिय चट्टान (Plutonic Rock)

         इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं।अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।
मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप

            जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है। इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

         इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे-ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

       इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे-गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली ‘मेसा’ को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे लैकोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी/तलछटी/परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

         ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

अवसादी चट्टान

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।
⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

          जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है। इस क्रिया को पुनःरूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

कायांतरित चट्टान

कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थ– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

6. What are primary Earthquake waves?

प्राथमिक भूकम्पीय तरंगें क्या हैं?

उत्तर- P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस,द्रव्य & गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है। 

7. Differentiate between rocks and minerals.

चट्टानों और खनिजों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- चट्टानों और खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर है-

क्र.सं. चट्टानों खनिजों
1. चट्टानों को उस ठोस द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौगोलिक सामग्रियों से बना होता है। दूसरी ओर, खनिजों को अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से बनते हैं।
2. चट्टानें खनिजों से बनी होती हैं। खनिज चट्टानों से नहीं बनते।
3. चट्टानें अपनी बनावट में एक समान नहीं होती हैं। खनिज अपनी बनावट में एक समान होते हैं।
4. जेडाइट, रेड बेरिल, ब्लैक ओपल, मसग्रेवाइट आदि चट्टानें कुछ दुर्लभ चट्टानें हैं। पेनाइट एक दुर्लभ खनिज है।
5. चट्टानें सूक्ष्म अर्थात् प्रकृति में छोटी होती हैं। खनिज सूक्ष्मदर्शी नहीं होते और इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
6. पृथ्वी पर चट्टानें ठोस रूप में मौजूद हैं। खनिज पदार्थ पृथ्वी पर खनिज भंडार के रूप में मौजूद हैं।
7. चट्टानों की एक परमाणु संरचना होती है। खनिजों में क्रिस्टलीय और रासायनिक संरचना होती है।
8. चट्टानों का उपयोग सड़क, भवन आदि निर्माण कार्यों के लिए किया जाता है। खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे प्रौद्योगिकी, फैशन, निर्माण आदि के लिए किया जाता है।
9. चट्टानों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ चट्टानों

⇒ आकार

⇒ रंग

⇒ आभा

⇒ नमूना

⇒ बनावट

खनिजों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ रंग

⇒ क्रिस्टल

⇒ कठोरता

⇒ भंग

⇒ तप

⇒ गुरुत्वाकर्षण

10. चट्टानों का कोई निश्चित आकार या रंग नहीं होता है। खनिजों का एक निश्चित रंग और आकार होता है।
11. उदाहरण:-

⇒ रेत

⇒ कंकड़

⇒ टुकड़े टुकड़े

⇒ गोले

उदाहरण:-

⇒ जीवाश्म ईंधन

⇒ कोयला

⇒ पेट्रोलियम

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions of the following:

[3×10=30]

निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

8. What is Weathering? Explain its types with examples.

अपक्षय क्या है? इसके प्रकारों का उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।

उत्तर- अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है

अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

           बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

           खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

     जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

9. Compare the views of Davis and Penck about the cycle of erosion.

अपरदन चक्र के बारे में डेविस तथा फेंक के विचारों की तुलना कीजिए।

उत्तर- डेविस और पेंक के अपरदन चक्र सिद्धांत का तुलनात्मक अध्ययन

      अमेरिकी भूगोलवेता डेविस की और जर्मन भूगोलवेता बाल्टर पेंक को “आधुनिक स्थलाकृति विज्ञान” का जन्मदाता माना जाता है। 1889 ई० में डेविस ने ‘ज्योग्राफिकल एसेज’ नामक पुस्तक में जबकि बाल्टर पेंक ने 1924 ई० में अनुसंधान प्रपत्र में “मॉरफोलोजिकल एनालिसिस ऑफ लैण्डफॉर्म” नामक शीर्षक से अपरदन चक्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इन दोनों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर करते हैं। जैसे- समानता और असमानता

समानताएँ

(i) दोनों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया।

(2) दोनों के अनुसार अपरदन चक्र के प्रारंभ में अपरदन का कार्य तेजी से और बाद में निक्षेपण का कार्य तेजी से होता है।

(3) दोनों ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया। जैसे- जिस प्रकार से मानव जीवनचक्र का 5 अंत होता है और पुनर्जन्म के बाद नयी जीवन चक्र प्रारंभ होता है। ठीक उसी तरह एक अपरदन चक्र समाप्त होता है और पुनरुत्थान के बाद दूसरा अपरदन चक्र प्रारंभ होता है।

(4) दोनों विद्वानों ने बताया कि अपरदन चक्र प्रारंभ होने के लिए उत्थान अति आवश्यक है।

(5) दोनों ने बताया कि बहते हुए जल के द्वारा अपरदन का कार्य आधारतल (S.L.) तक होता है।

(6) दोनों वैज्ञानिकों ने यह प्रकट किया कि अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान का निर्माण होता है।

असमानताएँ:-

           वास्तव में डेविस एवं पेंक का विचार समानता के लिए नहीं बल्कि असमानता के लिए जानी जाती है। दोनों के विचारों को चार आधार पर अन्तर स्थापित किया जा सकता है-

(1) उत्थान के संदर्भ में

(2) समय के संदर्भ में

(3) ढाल विकास के संदर्भ में

(क) समप्राय मैदान के संदर्भ में

(1) उत्थान के संदर्भ में

          दोनों विद्वानों ने अपरदन चक्र की शुरूआत के लिए उत्थान को अनिवार्य माना है। लेकिन उत्थान की प्रक्रिया और स्थलाकृति पर उसके प्रभाव के संदर्भ में अलग-2 विचार है। जैसे- डेविस ने कहा कि उत्थान के बाद अपरदन होती है, जबकि पेंक के अनुसार उत्थान के साथ-2 अपरदन का कार्य चलता है। डेविस के अनुसार उत्थान में समय बहुत कम लगता है। इसलिए यह कार्य तीव्र गति से सम्पन्न होती है जबकि पेंक के अनुसार उत्थान में समय बहुत अधिक लगता है। इसलिए उत्थान का कार्य मंद गति से होती है। डेविस के अनुसार उत्थान का कार्य एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। जबकि पेंक के अनुसार एक अनियमित प्रक्रिया है।

परीक्षण

       डेविस और पेंक के उत्थान के संबंध में व्यक्त किये गए विचारों का अगर परीक्षण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि पेंक का विचार अधिक वैज्ञानिक है। होम्स के द्वारा प्रस्तुत संवहन तरंग सिद्धांत और प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पेंक के विचारों को समर्थन करते हैं।

          डेविस और पेंक ने उत्थान और अपरदन के संदर्भ में जो मॉडल प्रस्तुत किया है उसमें भी स्पष्ट रूप से अन्तर दिखाई देता है।

डेविस और पेंक

नोट:

⇒ युवावस्था- केवल अपरदन का कार्य होता है।

⇒ प्रौढावस्था- अपरदन + निक्षेपण दोनों का कार्य होता है।

⇒ वृद्धावस्था- केवल निक्षेपण का कार्य होता है।

(2) समय के संदर्भ में:-

          दोनों विद्वानों ने अपना अपरदन चक्र का सिद्धांत समय के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। लेकिन डेविस ने अपरदन चक्र तीन अवस्थाओं में और पेंक पाँच दशाओं (Phases) में वर्गीकृत किया है।

        डेविस ने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान स्थलाकृतियों के निर्माण में 5 अपरदन दूत (नदी, शुष्क पवन, हिमानी, समुद्री तरंग, भूमिगत जल) का प्रभाव पड़ता है। जबकि पेंक के अनुसार अपरदन चक्र बाह्य अपरदन दूत के अतिरिक्त आन्तरिक कारक के सहभागिता से संचालित होती है।

          डेविस के अनुसार युवास्था में तलीय अपरदन अधिक होती है। जिसके कारण उच्चावच में तेजी से वृद्धि होती है। जलविभाजक रेखा चौड़ा होता है। प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन अधिक होती है। जिससे V-आकार की घाटी विकसित होती है। जलविभाजक की चौड़ाई कम होने लगती है। फलतः उच्चावच में भी कमी आने लगती है। वृद्धावस्था में अपरदन का कार्य समाप्त हो जाता है जिसके कारण इस अवस्था में केवल निक्षेपण का कार्य होता है। उच्चावच और जल-विभाजक अति न्यून रह जाती है। पेंक के अनुसार स्थलाकृतियों का विकास 5 दशाओं में सम्पन्न होता है। प्रत्येक दशा के विशेषताओं का उल्लेख नीचे के तालिका में किया गया है-

दशा/अवस्था उत्थान सापेक्षिक ऊँचाई उच्चावच
प्रथम सक्रिय वृद्धि वृद्धि
द्वितीय सक्रिय ह्रास स्थिर
तृतीय सक्रिय स्थिर स्थिर
चतुर्थ स्थिर या समाप्त स्थिर स्थिर
पंचम निष्क्रिय तीव्र ह्रास  ह्रास

        उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समय के संदर्भ में दोनों के विचार में कई मौलिक अन्तर हैं।

(3) ढाल के संदर्भ में:-

         डेविस का सिद्धांत ढाल ह्रास का सिद्धांत कहलाता है जबकि पेंक का सिद्धांत ढाल प्रतिस्थापना का सिद्धांत कहलाता है। डेविस ने बताया कि उत्थान के बाद ढाल अति तीव्र होती है जिसके कारण I-आकार की घाटी विकसित होती है। उसके बाद नदी घाटी के दीवारों का क्रमिक ह्रास होता है।

        प्रौढ़ावस्था में क्षैतिज अपरदन के कारण नदी घाटी के दीवारों का तेजी से कटाव होता है जिसके कारण ढाल में पुनः कमी आती है और V- आकार की घाटी विकसित होती है। वृद्धावस्था में क्षैतिज अपरदन और अधिक हो जाने पर  खुली V- आकार की घाटी विकसित होती है जिसके कारण जल-विभाजक रेखा उत्तल ढाल के समान और नदी घाटी अवतल ढाल के समान दिखाई पड़ती है।

       पेंक के अनुसार ढाल प्रतिस्थापन होता है न कि क्रमिक ह्रास होता है। उन्होंने बताया कि अपरदन चक्र के दौरान तीन प्रकार के ढाल विकसित होते हैं-

(i) उत्तल ढाल- इसे उन्होंने आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग से संबोधित किया।

(ii) समढाल- इसे उन्होंने ग्लीचफोर्मिंग इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

(iii) अवतल ढाल- इसे उन्होंने अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग से सम्बोधित किया।

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ढाल के संदर्भ में व्यक्त किये गये विचार में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक पेंक का विचार है।

नोट :

आफस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
ग्लीचफोर्मिंगे इन्टवकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
अबस्टीजेंड इन्टवकलुंग का अर्थ है- घटती द से विकास।

(4) समप्राय मैदान के संदर्भ में:-

           दोनों ने अपरदन चक्र के अन्त में लगभग समतल मैदान विकसित होने की संकल्पना प्रस्तुत की है। इसे डेविस ने समप्राय मैदान से सम्बोधित किया है। जबकि पेंक ने लगभग समतल मैदान को Endrumpf (इन्ड्रम्प) और Primarumpf (प्राइमारम्प) से सम्बोधित किया है। पेंक ने बताया कि एक अपरदन चक्र के अन्त में विकसित होने वाला लगभग समतल मैदान (Endrumpf) कहलाता है। लेकिन जब दूसरा अपरदन चक्र प्रारम्भ होता है तो अपरदन चक्र के पूर्व विकसित समताय मैदान को Primarumpf (प्राइमारम्प) कहते हैं। 

          डेविस ने बताया कि समप्राय मैदान में कहीं-कहीं कठोर चट्टानें दिखाई देती हैं। उसे मोनाडनॉक कहा जाना चाहिए। जबकि पेंक ऐसे कठोर चट्टानों को इन्सेलवर्ग से सम्बोधित किया है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कुछ समानताओं के बावजूद उनके चिन्तन में कई मौलिक विषमताएँ है। ये विषम‌ताएँ ही आधुनिक भू-आकृतिक विज्ञान के आधार का कार्य किया है

10. What is Earthquake? Discuss causes, types and consequences of earthquakes.

भूकम्प क्या है? भूकम्पों के कारण, प्रकार और परिणामों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- भूकम्प दो शब्दों के मिलने से बना है- भू + कम्प

भू=भूपटल 

 कम्प=कम्पन

          इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्प कहते है। 

★समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।

★ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ समुद्री तरंग होता है।

★विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है। 

★ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।

अधिकेंद्र-
      भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

प्रघात (Shocks)–

     अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है। जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shock कहा जाता है।

 भूकम्प के प्रकार

    भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-

(A) गहराई के आधार पर

(B) समय के आधार पर

      गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है–

I. छिछला भूकम्प– फोकस 70 KM से ऊपर होता है।

II. मध्यम भूकम्प– फोकस 70-300 KM के बीच

III. गहरा भूकम्प– फोकस 300-700 KM के बीच

(C) समय के आधार पर

     समय के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है:-

I. धीमा भूकम्प

II. अचानक भूकम्प

      धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।

     अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वतका निर्माण होता है।

★ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।

 भूकम्प के कारण

        भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-

(A) मानवीय कारण

(B) प्राकृतिक कारण

(A) मानवीय कारण :-

I. परमाणु विस्फोट

II. मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य

III. बड़े-बड़े बाँधों का निर्माणEarthquake

IV. पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण, वन ह्रास इत्यादि।

(B) प्राकृतिक कारक:-

       ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए है:-

1) प्रत्यास्य पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)

       इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था। इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्य चट्टानों से निर्मित है। जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।

2) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

      इस सिद्धान्त के प्रतिपादक हैरीहेस महोदय है। इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है। यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है। प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है। भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है–

I. अपसरण सीमा

II. अभिसरण सीमा

III. संरक्षी सीमाEarthquake

       प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-

जैसे:-

I. चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल

II. एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना

III. पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल

IV. दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग

        प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है। जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।

जैसे- अटलांटिक कटक के सहारेEarthquake

          जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है। 
Earthquake
         जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है। जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह संरक्षी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
Earthquake
      इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।

भूकम्प का वितरण

       विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-

(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर– विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।

(ii) मध्य महाद्विपीय क्षेत्र– यह क्षेत्र यूरेनियम प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।

(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र- अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार आइसलैंड से अंटार्कटिका तक हुआ है।

भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन

       भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है। वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है–

1. मार्सेली पैमाना

2. रिचर पैमाना

मार्सेली पैमाना

       मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था। इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया। इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।

रिचर पैमाना

        रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था। इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता मापन 1 से 9 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन 10 के घात के रूप में होता है।

रिचर पैमाना पर तीव्रता प्रभाव
1 केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2 केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3 चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है
4 केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है
5 अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं
6 विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7 दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8 इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9 सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
       
     अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है। 

भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता

       भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-

(A) प्रमुख तरंग 

I. P तरंग

II. S तरंग

III. L तरंग

(B) गौण तरंग

I. P* & S*

II. Pg & Sg

P तरंग 

   P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग। इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य और गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है। इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है। P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है। इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है। 

S तरंग

      S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है। इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है। यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है। भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है। S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है।

★ P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है। S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।

L तरंग 

      L तरंग को सतही तरंग भी कहा जाता है। L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है। L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है। इसी तरंग के कारण सर्वाधिक क्षति होती है। L तरंग की गति काफी अनियमित होती है। 

Earthquake
P* & S* तरंग 

         पृथ्वी  का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:- (1) ग्रेनाइट  &  (2) बैसाल्ट चट्टान

P* & S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।

 P* की गति=6-7 Km/Sec

S* की गति=3-4 Km/Sec

          ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है। इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था। इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।

Pg & Sg तरंग 

        ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है। इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।

Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec

Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec

         Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है। 

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।

11. Write a note on different types of Landforms resulting from volcanic activities.

ज्वालामुखी क्रियाओं के परिणामस्वरूप विकसित होने वाली स्थलाकृतियों पर एक नोट लिखिए।

उत्तर- ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के भीतर गैस एवं लावा की उत्पति से लेकर उनके पृथ्वी के भीतर या बाहर प्रकट होने की सभी क्रियाएं सम्मिलित होती है। ज्वालामुखी द्वारा निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण होता है– 

1. केंद्रीय विस्फोटक द्वारा निर्मित स्थलाकृति, बाह्य स्थलाकृति 

I. सिंडर शंकु:- ये प्रायः ज्वालामुखी धूल तथा राख से निर्मित होते है तथा कम ऊँचाई के होते है। जैसे– मेक्सिको का जोरल्लो, फिलीपाइन का कैमिग्विन इत्यादि।

II. कम्पोजिट शंकु:- इसका निर्माण लावा के तह के रूप में जमा होने से होता है। विश्व के अधिकांश बड़े ज्वालामुखी इसी प्रकार के है। जैसे:- फ्यूजियामा, मेयोन(फिलीपाइन), शस्त(USA) इत्यादि।
 
III. परिपोषित शंकु:- इसका निर्माण मुख्य नदी के अलावे छोटी-छोटी उपशाखाओं के द्वारा लावा उदगार के द्वारा होता है।
 

IV. एसिड लावा शंकु:- अधिक सिलिकायुक्त गाढ़ा एवं चिपचिपा लावा के उदगार से यह शंकु निर्मित होता है। इसकी ढाल तीव्र होती है।

V. पैठिक लावा शंकु:- कम सिलिका युक्त पतले लावा से इस शंकु का निर्माण होता है। यह कम ऊँचा शंकु होता है।

VI. क्रैटर:-  ज्वालामुखी के छिद्र के ऊपर स्थित किपाकार गर्त को क्रैटर कहते है। चारों तरफ इसकी ढाल तीव्र होती है।

VII. काल्डेरा:- एक बड़े क्रैटर को काल्डेरा कहते है।

2. दरारी उद्गार द्वारा निर्मित स्थलाकृति

I. लावा पठार:-  दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावा के जमा होने से निर्मित पठार लावा पठार कहलाता है। जैसे- दक्कन पठार, कोलम्बिया पठार

II. लावा मैदान:- लावा के पतली थ के रूप में जमा होने से इसका निर्माण होता है। जो फ्रांस, न्यूजीलैंड, आइसलैंड आदि देशों में मिलते है।

अभ्यान्तरिक स्थलाकृति

Volcano

 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा उत्पन्न स्थरूपों का प्रदर्शन

    अभ्यान्तरिक स्थलाकृति के अंतर्गत बैथोलिथ, लैकोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, सिल, डाइक, स्टॉक इत्यादि स्थरूपों का निर्माण भुपटल के सतह के नीचे होता है जो अपरदन द्वारा दृश्य हो पाते है।

अन्य स्थलाकृति

गेसर:- यह एक गर्म जल का स्रोत है जिससे समय-समय पर गर्मजल या वाष्प निकला करती है।

              उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंतर्जात बल द्वारा विभिन्न प्रका के स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।

12. Give a reasoned account of the constitution of the interior of the earth.

पृथ्वी की आंतरिक संचना का सकारण विवरण दीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

       स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।


Read More:-

Questions Bank

2023 में पाटलिपुत्र विश्विधालय द्वारा आयोजित सेमेस्टर-1 की वार्षिक परीक्षाओं का प्रश्न-पत्र यहाँ उपलब्ध है।
     Geomorphology (Theory) First Semester का Solved Exam Paper देखने के लिए नीचे क्लिक करें-

1. Major Course (MJC-1)

2. Minor Course (MIC-1)

3. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Humanities

4. Multidisciplinary Course (MDC-1) For Science

5. Multidisciplinary Course (MDC-1) For B.Com

1. Major Course / Geomorphology (Theory) Solved Questions Paper 2023

(Major Course or MJC-1)

Geomorphology (Theory)

Solved Questions Paper 2023



(Patliputra University Patna)

Geomorphology

Part-A/भाग-अ
(Objective Type Questions)
(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

Note: All questions are compulsory.
सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।

1. Select the correct answer from the alternatives given below: [2×10=20]

दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

(i) Who propounded the ‘Nebular Hypothesis’ in the year 1796?
(a) Kant
(b) Roche
(c) Laplace
(d) Lockyer
‘निहारिका परिकल्पना’ को वर्ष 1796 में किसने प्रतिपादित किया?
(a) काण्ट
(b) रोशे
(c) लाप्लास
(d) लॉकियर
उत्तर – (c) लाप्लास

(ii) Lithosphere consists of:
(a) Crust and Core
(b) Mantle and Core
(c) Upper and Lower Mantle
(d) Crust and Upper Mantle
स्थलमंडल में सम्मिलित है:
(a) कस्ट और कोर
(b) मैण्टिल और कोर
(c) ऊपरी और निम्न मैण्टिल
(d) क्रस्ट और ऊपरी मैण्टिल
उत्तर – (d) क्रस्ट और ऊपरी मैण्टिल

(iii) The term ‘Isostasy’ was first used by:
(a) Airy
(b) Pratt
(c) Dutton
(d) Holmes
‘समस्थिति’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया :
(a) एयरी द्वारा
(b) प्राट द्वारा
(c) डटन द्वारा
(d) होम्स द्वारा
उत्तर – (c) डटन द्वारा

(iv) Which of the following was not a part of Gondwana Land?
(a) Asia
(b) Australia
(c) India
(d) Africa
निम्नलिखित में से कौन गोंडवाना भूमि का भाग नहीं।
(a) एशिया
(b) आस्ट्रेलिया
(c) भारत
(d) अफ्रीका
उत्तर – (a) एशिया

(v) Which of the following is a major tectonic plates of the earth?
(a) Nazca Plate
(b) Philippines Plate
(c) Arabian Plate
(d) Antarctica Plate
निम्नलिखित में से कौन-सी पृथ्वी की एक प्रमुख विवर्तनिक प्लेट है?
(a) नाज्का प्लेट
(b) फिलीपाइन प्लेट
(c) अरेबियन प्लेट
(d) अण्टार्कटिका प्लेट
उत्तर – (d) अण्टार्कटिका प्लेट

(vi) Mountain building on the surface of the earth is a result of:
(a) Endogenic Forces
(b) Exogenic Forces
(c) Gravitational Forces
(d) Magnetic Forces
पृथ्वी की सतह पर पर्वत निर्माण परिणाम है:
(a) अंतर्जात बल का
(b) बहिर्जात बल का
(c) गुरुत्वाकर्षण बल का
(d) चुम्बकीय बल का
उत्तर – (a) अंतर्जात बल का

(vii) What is the scale of earthquake intensity?
(a) Beaufort Scale
(b) Seismic Scale
(c) Secant Scale
(d) None of these
भूकंप की तीव्रता मापने का पैमाना क्या है?
(a) ब्यूफोर्ट पैमाना
(b) सिस्मिक पैमाना
(c) सिकेंट पैमाना
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर – (b) सिस्मिक पैमाना

(viii) Glacial erosion is responsible for the formation of the following:
(a) Sink holes
(b) Swallow holes
(c) Kames
(d) Cirque
हिमानी अपरदन निम्नलिखित के विन्यास के लिए उत्तरदायी है:
(a) घोल रन्ध्र
(b) विलय रन्ध्र
(c) केम
(d) हिमगहर या सर्क
उत्तर – (d) हिमगहर या सर्क

(ix) Which of the following is not an agent of weathering?
(a) Glacier
(b) Wind
(c) Soil
(d) River
निम्नलिखित में से कौन अपक्षय का प्रतिनिधि नहीं है?
(a) हिमानी
(b) पवन
(c) मृदा
(d) नदी
उत्तर – (c) मृदा

(x) The most abundant metal in the earth crust is:
(a) Sodium
(b) Aluminium
(c) Calcium
(d) Iron
पृथ्वी के क्रस्ट में सबसे प्रचुर मात्रा में धातु है
(a) सोडियम
(b) एल्युमीनियम
(c) कैल्शियम
(d) लोहा
उत्तर – (b) एल्युमीनियम

Part-B / भाग-ब
(Short Answer Type Questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any four questions out of six questions. Each question carries equal marks.
[5×4=20]
छः प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का है।

2. Explain the importance of the study of Geomorphology.
भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन के महत्त्व को समझाइए।

3. Define Isostasy. Who gave the theory of Isostasy?
समस्थिति को परिभाषित कीजिए। समस्थिति का सिद्धान्त किसने दिया?

4. What is the difference between the focus and epicenter of an earthquake?
भूकम्प के मूल एवं अधिकेन्द्र में क्या अंतर है?

5. What are two types of weathering?
अपक्षय के दो प्रकार क्या हैं?

6. What is a Karst Topography? What are the essential conditions for its formation?
कार्स्ट स्थलाकृति क्या है? इसके निर्माण के लिए आवश्यक दशाएं क्या हैं?

7. Define cycle of erosion according to Davis.
डेविस के अनुसार अपरदन चक्र की परिभाषा बताइए।

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions out of five questions. Each question carries equal marks. [10×3-30]

पाँच प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का हैं

8. Describe the internal structure of the earth in detail.
पृथ्वी की आंतरिक संरचना का विस्तार से वर्णन कीजिए।

9. Explain the views of Airy and Pratt regarding Isostasy.
समस्थिति के सम्बन्ध में एयरी तथा प्राट के मतों की व्याख्या कीजिए।

10. Critically examine the theory of Plate Tectonic.
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

11. Describe the different stages of mountain building according to Kober.
कोबर के अनुसार पर्वत निर्माण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।



सभी लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का उत्तर सरल एवं आसान शब्दों में देना यहाँ सीखें



Part-B / भाग-ब
(Short Answer Type Questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

Note: Attempt any four questions out of six questions. Each question carries equal marks.
[5×4=20]
छः प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का है।

2. Explain the importance of the study of Geomorphology.
भू-आकृति विज्ञान के अध्ययन के महत्त्व को समझाइए।

उत्तर- स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

महत्त्व

        विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

       डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

       कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

      चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

3. Define Isostasy. Who gave the theory of Isostasy?
समस्थिति को परिभाषित कीजिए। समस्थिति का सिद्धान्त किसने दिया?

उत्तर- समस्थिति अर्थात भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

       भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।
     डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।
               
        ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”
भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद
           भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-
(l) साहुल विधि
(ll) त्रिभुजीकरण विधि 
        यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-
(1) एयरी का मत
(2) प्रौट का मत
(3) हिस्कानेन का मत
(4) जौली का मत

4. What is the difference between the focus and epicenter of an earthquake?
भूकम्प के मूल एवं अधिकेन्द्र में क्या अंतर है?

उत्तर- भूकम्प के मूल- भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) अथवा भूकम्प के मूल कहते है।

अधिकेंद्र- भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।

5. What are two types of weathering?
अपक्षय के दो प्रकार क्या हैं?

उत्तर- अपक्षयण के प्रकार (Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

           बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

           खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

     जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

        चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

      ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

       जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

             जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

              बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

6. What is a Karst Topography? What are the essential conditions for its formation?
कार्स्ट स्थलाकृति क्या है? इसके निर्माण के लिए आवश्यक दशाएं क्या हैं?

उत्तर- चुना प्रधान वाले क्षेत्रों को कार्स्ट प्रदेश के नाम से जानते हैं। कार्स्ट प्रदेश शब्द एड्रियाटिक सागर के पूर्वी भाग में स्थित चूना पत्थर युक्त मैदान से लिया गया है। युगोस्लाविया के लोग ही चुना पत्थर मैदान को कार्स्ट नाम से संबोधित करते हैं।          

           कार्स्ट प्रदेश में भूमिगत जल अपरदन का सबसे प्रमुख दूत होता है। कार्स्ट प्रदेश में बनने वाले स्थलाकृतियों का सबसे पहले 1911 ई०  में जे.डब्ल्यू. बीड  एवं 1918 ई० में जे. स्वीजिक  ने अध्ययन किया था। कार्स्ट स्थलाकृति का निर्माण उन्हीं प्रदेश में होता है जहाँ निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ रहती है:-
(i) जहाँ विलियन करने वाली चुना प्रधान चट्टाने पाई जाती है।
(ii) चुना प्रधान चट्टानों में संरोध(Joints) का विकास हुआ हो।
(iii) चुना प्रधान चट्टानों के नीचे अपारगम्य चट्टान पाई जाती हो तथा उसके अंदर पर्याप्त ढाल का विकास हुआ हो।

7. Define cycle of erosion according to Davis.
डेविस के अनुसार अपरदन चक्र की परिभाषा बताइए।

उत्तरडेविस का सामान्य अपरदन चक्र  

        डेविस का सामान्य अपरदन चक्र सिद्धान्त भौगोलिक चक्र का सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी भूगोलवेत्ता W. M. डेविस ने 1889 ई० में “Geographical Essay”नामक पुस्तक में अपरदन चक्र सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
                 
       डेविस ने अपरदन चक्र सिद्धान्त को परिभाषित करते हुए कहा कि “अपरदन चक्र समय की वह अवधि है जिसके अंतर्गत एक उत्थित भूखण्ड अपरदन क्रिया द्वारा प्रभावित होकर एक आकृतिविहीन समतल मैदान का निर्माण करती है।”  

        डेविस ने बताया कि किसी समतल भूखण्ड के उत्थान के बाद उस पर तीन कारकों का प्रभाव पड़ता है-

(i) संरचना

(ii) प्रक्रम और

(iii) समय।

       इसी आधार पर डेविस ने यह परिकल्पना प्रस्तुत किया कि किसी भौगोलिक क्षेत्र का भूदृश्य संरचना, प्रक्रम और समय का फलन होता है। इस परिकल्पना को डेविस का त्रिकट (Trio of Devis) के नाम से जानते है। 

            अपरदन  चक्र आर्द्र प्रदेश में, शुष्क प्रदेश में, चुना पत्थर प्रधान क्षेत्रो में, समुद्र तलीय क्षेत्र में,एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में सतत चलता रहता है। डेविस ने अपना सिद्धान्त आर्द्र प्रदेश के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि आर्द्र प्रदेश में बहता हुआ जल/नदी अपरदन का दूत होता है। बहता हुआ जल सम्पूर्ण प्रदेश को अपरदन क्रिया से प्रभावित करता है और प्रदेश में अपरदन चक्र को संचालित करता है। आर्द्र प्रदेश में अपरदन की क्रिया चक्रीय रूप से सक्रिय रहती है।

        डेविस ने अपरदन चक्र की तुलना मानव के जीवन चक्र से किया है। जैसे एक मानव जन्म के बाद युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से होकर गुजरते हुए अपने जीवन लीला को समाप्त करता है और पुनः जन्म लेता है ठीक उसी प्रकार से सामान्य अपरदन चक्र उपरोक्त तीनों अवस्थाओं से होकर गुजरती है। उन्होंने पुनर्जन्म को पुनरुत्थान से तुलना किया है। 

Part-C / भाग-स

(Long Answer Type Questions)

(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

Note: Answer any three questions out of five questions. Each question carries equal marks. [10×3-30]

पाँच प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न समान अंक का हैं

8. Describe the internal structure of the earth in detail.
पृथ्वी की आंतरिक संरचना का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने हेतु अप्रत्यक्ष साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के सम्बंध में अधिकतर ज्ञान अनुमान पर आधारित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय विज्ञान (Seismology) या भूकम्पीय तरंग को सबसे सटीक वैज्ञानिक साधन माना जाता है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना के अध्ययन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है। पृथ्वी के धरातल से केंद्र की ओर जाने पर घनत्व में लगातार बढ़ोतरी होते जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे जाने पर चट्टान के दबाव एवम भार में बढ़ोतरी होते जाती है।

⇒ सामान्य नियम के अनुसार दाब बढ़ने से तापमान में बढ़ोतरी होती है। अतः प्रत्येक 32 मी० की गहराई पर 1℃  तापमान में बढ़ोतरी होती है।

      स्वेस महोदय ने पहली बार पृथ्वी की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि रासायनिक संरचना के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक भागों को तीन परतों में बाँटा जा  सकता है।

Internal Structure of The Earth

(1) सियाल (SIAL) 

            पृथ्वी का सबसे ऊपरी परत सिलिकन & अलुमिनियम से निर्मित है।

(2) सिमा (SIMA)

     स्वेस ने मध्यवर्ती परत को सिमा से संबोधित किया है और उन्होंने बताया कि सिमा सिलिकन & मैग्नेशियम से बना है।

(3) निफे (NIFE)

          पृथ्वी के सबसे आंतरिक भाग को निफे से संबोधित किया है और बताया कि यह निकेल & लोहा से बना है।

         भूकम्पीय साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का सबसे अधिक वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जिसके अनुसार पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा गया है –

1. भूपर्पटी (Crust)

2. भूप्रावर (Mantle)

3. क्रोड (Core)

(1) भूपर्पटी (Crust):-

          यह पृथ्वी का सबसे ऊपरी एवं पतली परत है। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5% और कुल द्रव्यमान का 0.2% Crust में शामिल है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी० है। महाद्वीपों पर इसकी अधिकतम मोटाई 70 किमी० तक और महासागरीय क्षेत्र में औसत मोटाई 5 किमी० है। इसमें परतदार चट्टानों की प्रधानता होती है। लेकिन महाद्वीपीय भागों में परतदार चट्टानों के नीचे ग्रेनाइट चट्टान की परत मिलती है जबकि महासागरीय भूपटल पर बैसाल्ट चट्टाने मिलती है।

★ भूपर्पटी की रासायनिक संरचना से स्पष्ट होता है कि इसमें सर्वाधिक ऑक्सीजन (46.80%), सिलिकन (27.72%) अल्युमीनियम (8.13%) पायी जाती है। यह पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग, द्वितीयक तरंग, सतही तरंग, P*, S*, Pg & Sg जैसे भूकम्पीय तरंग चला करते है।

         भूपर्पटी भी दो भागों में विभक्त है:- 

1. महासागरीय भूपटल

2. महाद्वीपीय भूपटल

       महाद्वीपीय भूपटल का घनत्व कम (2.75) है जबकि महासागरीय भूपटल का घनत्व अधिक (3.75) है। यही कारण है कि महाद्वीपीय भूपटल फुला/खुला हुआ है जबकि महासागरीय भूपटल धँसा हुआ है। महाद्वीपीय भूपटल में भी अलग-अलग घनत्व की चट्टाने पायी जाती है। जैसे:- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व सबसे कम होता है। इससे अधिक घनत्व पठारों का और पठारों से ज्यादा घनत्व मैदानी चट्टानों में होता है।

(2) भुप्रावार (Mantle):-

        भूप्रावार की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 2900 KM तक है। पृथ्वी के कुल आयतन का 83% और कुल द्रव्यमान का 68% भाग भूप्रावार में शामिल है। यह अधिक तापमान के कारण पिघली हुई अवस्था (द्रव) के समान है। भूप्रावार पृथ्वी का वह मण्डल है जिसमें प्राथमिक तरंग  तो संचरित होती है लेकिन द्वितीयक तरंग विलुप्त हो जाती है। इसका निर्माण सिलिकन & मैग्नेशियम जैसे तत्वों से हुआ है। भूप्रावार का घनत्व 3 से 5.5 तक मानी जाती है । 

★ भूपर्पटी और भूप्रावार के बीच एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे मोहोअसम्बद्धता (Moho Discontinuty) कहते है।

★ क्रस्ट और मेंटल के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमण्डल/लिथोस्फेयर कहा जाता है।

★ स्थलमण्डल के नीचे वाले मण्डल को दुर्बलमण्डल (Aestheno Sphere) कहते है। होम्स ने बताया कि दुर्बलमण्डल में ही संवहन तरंगे चलती है। ये तरंगे इतनी शक्तिशाली होती है जो स्थलमण्डल को तोड़ने एवं मोड़ने की क्षमता रखती है।

Internal Structure of The Earth

चित्र: पृथ्वी की आतंरिक संरचना

(3) क्रोड(Core)/अंतरतम:-   

         यह पृथ्वी का केंद्रीय भाग है। इसका घनत्व -10 से 13.6 g/cm3 है। पृथ्वी के कुल आयतन का 16% एवं द्रव्यमान का 32% भाग क्रोड में शामिल है। क्रोड पृथ्वी का वह मण्डल है जसमें केवल प्राथमिक तरंगे गुजरती है। यह मण्डल निकेल & लोहा से निर्मित है। इसी कारण से पृथ्वी में चुम्बकीय गुण है। क्रोड अत्याधिक दबाव के कारण ठोस भाग के रूप में परिणत हो चुका है। क्रोड की औसत मोटाई 3471 KM है। Mantle और Core के बीच में एक संक्रमण पेटी पायी जाती है जिसे गुटेनबर्ग असम्बद्धता कहते हैं। पृथ्वी की आंतरिक संरचना को नीचे के चित्रों में भी देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:-

        इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना के संबंध में भूकम्पीय तरंग सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

9. Explain the views of Airy and Pratt regarding Isostasy.
समस्थिति के सम्बन्ध में एयरी तथा प्राट के मतों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- समस्थिति अर्थात भूसंतुलन भूगोल की एक ऐसी संकल्पना है जो भूपटल के विभिन्न स्तंभों के मध्य पाये जाने वाले संतुलन को व्याख्या करता है। भूसंतुलन का सामान्य अर्थ  “परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी के ऊपर उभरे हुये क्षेत्र (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान) एवं नीचे स्थित क्षेत्रों  (सागर, झील) में भौतिक एवं यांत्रिक स्थिरता भूसंतुलन कहलाता है।”

         भूसंतुलन आंग्ल भाषा में ‘Isostasy या Equilibrium’ कहलाता है। Isostasy शब्द ग्रीक भाषा के Isostasius से बना है जिसका तात्पर्य समस्थिति होता है। आइसोस्टैसी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1889 ई० में अमेरिकी भूवैज्ञानिक C.F. डटन ने किया था। इन्होंने कहा था कि समस्थिति के कारण ही पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र साथ-साथ स्थित है। बहिर्जात बल पर्वतों से मिट्टी काट-काट कर समुद्र एवं मैदान में निक्षेपित करते रहते हैं। इसीलिए मैदान एवं समुद्र तली का भार अधिक तथा पर्वतों के भार कम होते है। भार में कमी या अधिकता के कारण भूगर्भ के भूपटल पर दबाव समान रूप से नहीं पड़ता है। समस्थिति इसी दबाव के विभिन्नता को संतुलन बनाये रखने में मदद करता है।
        डटन ने बताया कि जिस रेखा के सहारे भूपटलीय संतुलन कायम रहता है उसे ‘समदबाव तल’ (Level of Uniform Pressure) अथवा ‘समतोल तल’ (Isotatic Level) या ‘क्षतिपूर्ति तल’ (Level of Compensation) कहते है।
       
         ऑर्थर होम्स महोदय ने भूसंतुलन की व्याख्या करते हुए कहा है कि “संतुलन की वह दशा जो भूपटल पर विभिन्न ऊँचाई वाले पर्वत, पठार, मैदान अथवा सागरीय नितल के मध्य पायी जाती है, भूसंतुलन कहलाता है।”
भूसंतुलन सिद्धांत का बुनियाद
              भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न भागों के घनत्व भिन्न-भिन्न है। इनकी पुष्टि भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी किया गया है। 1859 ई० में गंगा सिंधु मैदान के मध्य में अक्षांश ज्ञात करते समय दो विधियों को प्रयोग में लाया गया:-
 (l) साहुल विधि
 (ll) त्रिभुजीकरण विधि 
           यह अक्षांशीय मापन का कार्य कल्याण एवं कल्याणपुर नामक स्थान पर किया जा रहा था। इन दोनों स्थानों पर उपरोक्त दोनों विधियों द्वारा आये परिणाम में भारी अंतर था। यह अंतर 5.236 सेकंड बताया गया। इस अंतर का कारण बताते हुए विद्वानों ने बताया कि साहुल को हिमालय पर्वत अपनी ओर आकर्षित कर रही है लेकिन पुनः यह प्रश्न उठाया गया कि अगर हिमालय साहुल को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो हिमालय जितना विशाल है उस दृष्टि से आकर्षण और अधिक होना चाहिए तथा अंतर 15 सेकेंड से भी अधिक होना चाहिए। कालांतर में इसी जटिल तथ्यों की व्याख्या भूसंतुलन से करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि हिमालय के नीचे स्थित चट्टानों के घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से भी कम है। जबकि समुद्र नितल का घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व से अधिक है। यही कारण है कि दोनों के बीच संतुलन की स्थिति कायम है। भूसंतुलन को स्पष्ट करने हेतु अनेक मत प्रतिपादित किये गये है:-
(1) एयरी का मत
(2) प्रौट का मत
(3) हिस्कानेन का मत
(4) जौली का मत
(1) एयरी का मत
        1859 ई० में एयरी ने अपना मत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार “भूपटल के प्रत्येक स्तम्भ का घनत्व समान है, जो भाग जितना ऊँचा है वह उसी अनुपात में भूगर्भ में घुसा हुआ है। अर्थात जो भाग अधिक ऊंचा है उसका अधिक भाग और जो भाग कम ऊँचा है उसका कम ही भाग भूगर्भ में घुसा हुआ है।”
      एयरी महोदय ने पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभों की तुलना जल में तैरते हुए हिमशीलाखंडों से किया है। उन्होंने अपने मत का व्याख्या करने हेतु आर्कमिडीज के सिद्धान्तों का सहारा लिया है। अर्कमिडीज के अनुसार “कोई भी तैरती हुई वस्तु अपनी मात्रा के समतुल्य द्रव्य को नीचे से हटा देती है”। हिम के संबंध में कहा कि “हिम जब पानी के ऊपर तैर रहा होता है तो उसका 1/9 भाग जल के ऊपर तथा शेष 8/9 भाग जल में डूबा रहता है।”
         धरातल के प्रत्येक भाग के लिए उसका 8 गुणा भाग धरातल के नीचे धंसा रहता है। इसे  सिद्ध करने के लिए एयरी ने एक प्रयोग के माध्यम से प्रदर्शित किया है। एयरी ने भूपटल के विभिन्न भागों की तुलना लौह धातु के छोटे-बड़े टुकड़ों से किया है। उन्होंने बताया कि जब लोहे के विभिन्न ऊँचाई वाले टुकड़े को द्रव में डुबोया जाता है तो जिस लोहे के टुकड़े की ऊँचाई अधिक होता है उसका उतना अधिक भाग द्रव में डूबा रहता है और जो लोहा का टुकड़ा कम ऊँचा रहता है उसका उतना ही कम भाग द्रव में डूबा रहता है।
Isostasy
आलोचना
          अगर एयरी के मत को सही मान लिया जाय तो इनके अनुसार जो भाग जितना ऊँचा होगा उसका उतना ही भाग धरातल के अंदर घुसा हुआ होगा। जैसे -अगर हिमालय की ऊँचाई को आधार बनाया जाय तो 2 लाख 70 हजार फीट गहरा जड़ होना चाहिए लेकिन दूसरी ओर यह भी ज्ञात है कि धरातल के नीचे जाने पर प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1°C तापमान बढ़ जाती है। इस प्रकार हिमालय की इतनी गहरी जड़ धरातल के अंदर अति उच्च तापमान के कारण यथावत नहीं रह सकती। अतः इनका विचार भ्रामक है।
          एयरी के मत का दूसरा आलोचना यह है कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभों का औसत घनत्व एक समान है जबकि भूकम्पीय तरंगो के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी के विभिन्न स्तम्भों का घनत्व अलग-अलग है।
निष्कर्ष:
     
          एयरी के द्वारा भूसंतुलन के दिशा में किया गया यह प्रथम प्रयास था। उनके मत को “Uniform Density with Varying Depthness” (एक समान घनत्व के साथ बदलता हुआ गहराई) नामक सिद्धांत से भी जानते है। दूसरी एयरी के मत से यह भी स्पष्ट हुआ कि पहाड़ों के जड़ें होते है। इस तरह एयरी के विचार में कुछ खामियों के बावजूद विशेष महत्व रखता है।
 प्रौट के मत
           प्रौट महोदय ने अपना विचार Royan Geography of Landform (1859 ई०) में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कल्याण एवं कल्याणपुर के बीच साहुल एवं त्रिभुजीकरण विधि से किये गए मापन के परिणाम में आये अंतर के संबंध में विचार प्रकट करते हुए कहा कि पृथ्वी के सभी भू-स्तंभो का घनत्व एक समान नहीं है बल्कि अलग-अलग है। जैसे- पर्वतीय चट्टानों के घनत्व पठारी चट्टानों के घनत्व से कम है। पठारी चट्टानों का घनत्व मैदानी चट्टानों के घनत्व से कम है और मैदानी चट्टानों के घनत्व समुद्री भूपटल के घनत्व से कम है।
          प्रौट महोदय ने बताया कि पृथ्वी का सभी भू-स्तंभ एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है। उन्होंने ऊँचाई और घनत्व के बीच व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध  बताया अर्थात पृथ्वी के ऊपर स्थित भू-स्तंभ का घनत्व भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी भू-स्तंभ एक समान गहराई के साथ भूपृष्ठ में धँसे हुए है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित प्रयोग के माध्यम से पुष्टि करने का प्रयास किया है:

चित्र: प्रौट का भू-संतुलन

         प्रौट अपने मत (Varying Density With Uniform Depth) कोउपरोक्त चित्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि पृथ्वी के विभिन्न भू-स्तंभ के घनत्व अलग-अलग है और चित्रानुसार ही एक क्षतिपूर्ति रेखा के सहारे सभी भू-स्तंभ संतुलित है।                                       

आलोचना
        बहुत से विद्वानों ने प्रौट के विचारों का आलोचना करते हुए कहा कि इनका मत एयरी के मत का ही संशोधित रूप है। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि भूपटल के विभिन्न भू-स्तंभ उस तरह से नहीं है जैसा कि विभिन्न धातुओं का उदाहरण देकर प्रौट ने बताया है। फिर भी इन आलोचनाओं के बावजूद क्षतिपूर्ति रेखा और विभिन्न घनत्व के निर्मित भू-स्तंभ भूसंतुलन संकल्पना की सराहनीय कदम है। 

10. Critically examine the theory of Plate Tectonic.
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे-पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर नया विचार प्रस्तुत करता है।

      इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है। सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था। इन प्लेटों के  स्वभाव और प्रवाह से संबंधित अध्ययन को ही प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त  कहते है। यह सिद्धांत किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं है बल्कि इसमें कई विद्धानों का योगदान है। लेकिन हैरिहस महोदय ने इन सभी विचारों को संगठित कर एक सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया। 
प्लेटों का स्वभाव
       इस परिकल्पना के अनुसार प्लेटों की अधिकतम मोटाई 100 KM और न्यूनतम मोटाई 5 KM तथा औसत मोटाई 70 KM है। अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(a) अरेबियन प्लेट
(b) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(c) कोकस प्लेट
(d) नास्का प्लेट
(e) स्कोशिया प्लेट
(f) कैरेबियन प्लेट
Plate Tectonic Theory
इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट 
         स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है। 
           इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है। इसके अनुसार प्लेट में 3 प्रकार की सीमाएं बांटी जाती है। इसे  निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
       संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है- 
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय  प्लेट
            महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है।
 प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
              इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है। प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे- पृथ्वी के घूर्णन गति, प्लवनशीलता बल, गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन, सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल, संवहन तरंग आदि।
                  इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे – निर्माणकारी गति की उत्पत्ति अपसरण सीमा के सहारे होती है, विनाशकारी गति की उत्पति अभिसारी सीमा के सहारे तथा संरक्षी गति संरक्षी सीमा के सहारे उत्पन्न होता है।
प्लेटों का क्रियाविधि
         उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है। गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-
इस सिद्धांत के पक्ष में प्रस्तुत किये गए प्रमाण 
           
          प्लेट विवर्तनिकी के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है-
1. ज्वालामुखी विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।
2. भूकम्प भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।
3. सागर नितल प्रसार और पुराचुमकत्व– सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुमकत्व का गुण कम तथा पुराने चाट्टानों में चुमकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।
4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान  
           प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचालन, महाद्विपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुमकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।
आलोचना
        उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियां है। जैसे –  प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है, प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है?, हरसिनियन और कैलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है, बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता।   

         इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।

11. Describe the different stages of mountain building according to Kober.
कोबर के अनुसार पर्वत निर्माण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- कोबर महोदय ने मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के सम्बंध में भूसन्नति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इस संकल्पना के विकास का प्रथम प्रयास हॉल और डाना महोदय द्वारा किया गया, लेकिन एक सिद्धांत के रूप में इस संकल्पना का प्रतिपादन सर्वप्रथम हॉग महोदय द्वारा किया गया। कोबर ने वलित पर्वतों की उत्पत्ति के संबंध में भू-सन्नति सिद्धांत का प्रतिपादन किया। कोबर के अनुसार भूपटलीय चट्टानें लचीली होती है जब चट्टानों पर दबाव शक्ति कार्य करती है तो भूपटलीय चट्टानें मुड़कर भुसन्नति या मोड़दार पर्वत का निर्माण करती है। 

       भू-सन्नतियां लंबे, संकरे तथा उथले जलीय भाग होती है, जिनमें तलछटिय निक्षेप के साथ-साथ तली में धंसाव होता है। वर्तमान समय में प्राय: सभी विद्वानों की यह मान्यता है कि प्राचीन और नवीन वलित पर्वतों का आविर्भाव भू-सन्नतियाँ से हुआ है। जैसे- रॉकी भूसन्नति से रॉकी पर्वत, यूराल भू-सन्नति से यूराल पर्वत तथा टेथिस भू-सन्नति से महान हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ। भू-सन्नतियों का पर्वत निर्माण से संबंध होने के कारण कोबर ने इन्हें पर्वतों का पालना कहा है।

कोबर का भूसन्नति सिद्धांत

             वास्तव में उनका मुख्य उद्देश्य प्राचीन दृढ़ भूखंडों तथा भू-सन्नतियों में संबंध स्थापित करना था। इनका सिद्धांत संकुचन शक्ति पर आधारित है। पृथ्वी में संकुचन होने से उत्पन्न बल से अग्रदेशों में गति उत्पन्न होती है, जिससे प्रेरित होकर सम्पिडनात्मक बल के कारण भूसन्नति का मलवा वलीत होकर पर्वत का रूप धारण करता है। जहाँ पर आज पर्वत है, वहां पर पहले भू-सन्नतियां थी, जिन्हें कोबर ने पर्वत निर्माण स्थल बताया।  इन भू-सन्नतियों के चारों और प्राचीन दृढ़ भूखण्ड थे, जिन्हें क्रैटोजेन बताया है, कोबर के अनुसार भूसन्नतिया लंबे तथा चौड़े जलपूर्ण गर्त थी।

           प्रत्येक भूसन्नति के किनारे पर दृढ़ भूखंड होते हैं। जिन्हें कोबर ने अग्रदेश (Foreland) बताया।  इन दृढ़ भूखंडों के अपरदण से प्राप्त मलवा का नदियों द्वारा भूसन्नति में धीरे-धीरे जमा होता रहता है अवसादी जमाव के कारण भार में वृद्धि होने से भूसन्नति की तली में निरंतर धंसाव होता जाता है इसे अवतलन की क्रिया कहते हैं इन दोनों क्रियाओं के लंबे समय तक चलते रहने के कारण भूसन्नति की गहराई अत्यंत अधिक हो जाती है तथा अधिक मात्रा में मलबा का निक्षेप हो जाता है। 

      जब भूसन्नति भर जाती है तो पृथ्वी के संकुचन से उत्पन्न क्षैतिज संचलन के कारण भूसन्नति के दोनों अग्रदेश एक-दूसरे की ओर खिसकने लगते हैं। इसे पर्वत निर्माण की अवस्था कहते हैं। भूसन्नति के दोनों किनारों पर दो पर्वत श्रेणियों का निर्माण होता है जिन्हें कोबर ने ‘रेन्डकेटेन’  के नाम दिया है यदि संपीड़न का बल सामान्य होता है तो केवल किनारे वाले भाग ही वलित होते हैं तथा बीच का भाग वलन से अप्रभावित रहता है। इस अप्रभावित भाग कोबर ने स्वाशिनवर्ग की संंज्ञा प्रदान की है जिसे सामान्य रूप में मध्य पिंड (Median Mass) कहा जाता है जब संपीडन का बल सर्वाधिक सक्रिय होता है कभी-कभी वलन की ग्रीवा टूट कर दूसरे वलन पर चढ़ जाती है जिस कारण ग्रीवा खंड (Nappe) का निर्माण होता है।

        कोबर ने अपने विशिष्ट मध्य पिंड के आधार पर विश्व के वलीत पर्वतों की संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है टेथीस भूसन्नति के उत्तर में यूरोप का स्थल भाग तथा दक्षिण अफ्रीका का दृढ़ भूखण्ड था।  इन दोनों अग्रदेशों के आमने-सामने सरकने के कारण अल्पाइन पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। अफ्रीका के उत्तर की ओर सरखने के कारण बेटीक कार्डिलरा, पेरेनिज प्राविन्स श्रेणियां मुख्य आल्प्स, कार्पेथियंस, बाल्कन पर्वत तथा काकेशस का निर्माण हुआ। 

          हिमालय तथा कुनलुन के बीच तिब्बत का पठार।  इस तरह कोबर ने अपने सिद्धांत में मध्य पिंड की कल्पना करके पर्वतीकरण को उचित ढंग से समझाने का प्रयास किया है तथा मध्य पिंड की यह कल्पना कोबर के विशिष्ट पर्वत निर्माण स्थल की अच्छी तरह व्याख्या करती हैं। 

        हिमालय के निर्माण के विषय में कोबर ने बताया है कि पहले टेथिस सागर था जिसके उत्तर में अंगारालैंड तथा दक्षिण में गोंडवाना लैंड अग्रदेश के रूप में थे। इयोसीन युग में दोनों आमने-सामने सरकने लगे, जिस कारण टेथिस के दोनों किनारों पर तलछट के वलन पड़ने से उत्तर में कुनलुन पर्वत तथा दक्षिण में हिमालय की उत्तरी श्रेणी का निर्माण हुआ, दोनों के बीच तिब्बत का पठार मध्य पिंड के रूप में बच रहा। आगे चलकर मध्य हिमालय तथा लघु शिवालिक श्रेणियों का भी निर्माण हो गया।

आलोचना

        यद्दपि कोबर महोदय ने पर्वतों के निर्माण को भली-भांति समझाने का प्रयास किया तथापि उसके भुसन्नत्ति सिद्धान्त में कुछ दोष पाये जाते है, जिनका उल्लेख निम्नलिखित है।-

1. पर्वतों के निर्माण के लिये पृथ्वी के सिकुड़ने से पैदा होने वाले जिस बल का वर्णन कोबर ने किया है वह अपर्याप्त है।

2. कोबर के अनुसार भुसन्नत्ति के दोनों किनारे सरकते है जबकि स्वेस का मतानुसार भुसन्नति का एक ही किनारा सरकता है।

3. कोबर के सिद्धान्त से पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हुए पर्वतों (हिमालय,आल्पस) का स्पष्टीकरण तो हो जाता है, परन्तु उत्त-दक्षिण दिशा में फैले पर्वतों (रॉकी, एंडिज) का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता है।


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